आज से मध्यप्रदेश विधानसभा का मानसून सत्र, UCC बिल पेश करेगी सरकार, जानें बिल का खास बातें?

Uniform civil code

भोपाल। मध्यप्रदेश विधानसभा के आज से शुरु हो रहे विधानसभा के मानसून सत्र में सरकार में समान नागरिक संहिता से जुड़ा अहम विधेयक लाने जा रही है। विधानसभा के मानसून सत्र के पहले दिन ही आज सरकार UCC से जुड़ा अहम बिल सदन में पेश कर सकती है। जिस पर मंगलवार को सदन में चर्चा हो सकती है। 

समान नागरिक संहिता को लेकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मीडिया से कहा कि भारत के संविधान में बताए गए एक समानता, बराबरी, न्याय और धर्मनिरपेक्षता के विज़न को साकार करने की दिशा में एक खास कदम है। इसे मध्य प्रदेश के निवासियों के लिएचाहे उनका धर्म कोई भी हो, शादी, तलाक, वैवाहिक झगड़ों से जुड़े भरण-पोषण, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे निजी मामलों को नियंत्रित करने के लिए एक समान पर्सनल सिविल कानून लागू करने के मकसद से बनाया गया है। 

 

मध्यप्रदेश UCC विधेयक की विशेषताएं- 


1-अनुसूचित जनजातियों को संरक्षण-संवैधानिक सुरक्षा-कवच का सम्मान करते हुए यह कानून संविधान के अनुच्छेद 342 और अनुच्छेद 366 (खंड 25) के तहत आने वाली अनुसूचित जनजातियों जैसे भील, गोंड, कोरकू, बैगा, सहरिया और भारिया पर लागू नहीं होगा। इसके अलावा, जिन समुदायों के पारंपरिक अधिकारों की रक्षा संविधान के भाग XXI के तहत की गई है, उन्हें भी इस कोड से विशेष रूप से बाहर रखा गया है। कोड का परिभाषा वाला हिस्सा इसके अधिकार क्षेत्र को तय करता है। उत्तराधिकार से जुड़े जिन शब्दों की परिभाषा इसमें नहीं है, उनके लिए 'भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925' के अर्थ मान्य होंगे।

 

2-विवाह और तलाक से जुड़े बड़े सुधार-बहुविवाह-तीन तलाक पर पूर्ण रोक: यह कोड सभी समुदायों में केवल एक ही शादी (मोनोगैमी) को अनिवार्य बनाता है। कोई भी व्यक्ति एक समय में केवल एक ही जीवित जीवनसाथी के साथ शादीशुदा रह सकता है। विवाह के लिए पुरुषों की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं की 18 वर्ष तय की गई है। अमान्य सहमति और प्रतिबंधित रिश्तों (जब तक परंपरा की अनुमति न हो) के बीच विवाह पर रोक लगाई गई है। मौखिक तलाक या अनौपचारिक पंचायत के फैसलों को पूरी तरह गैर-कानूनी घोषित किया गया है।

अब विवाह का समापन केवल कानून में बताए गए स्पष्ट और वैधानिक आधारों पर ही हो सकता है। मौजूदा व्यवस्था के विपरीत, अब महिलाओं को भी यह अधिकार दिया गया है कि यदि उनके पति ने शादी के समय किसी दूसरी महिला को गर्भवती किया है, तो पत्नी शादी को रद्द घोषित करने की मांग कर सकती है। 

 

लोगों के लिए शादी और तलाक दोनों का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किया गया है। शहरी क्षेत्रों में 'MP ई-नगर पालिका पोर्टल' और ग्रामीण क्षेत्रों में SDM, नगरपालिका या पंचायत के ज़रिए यह प्रक्रिया पूरी होगी। रजिस्ट्रेशन न होने से शादी अमान्य नहीं होगी, लेकिन रजिस्ट्रार द्वारा बिना ठोस लिखित कारण के आवेदन खारिज करने पर जुर्माने का प्रावधान है। तलाक के बाद उसी जीवनसाथी से दोबारा शादी करने के लिए 'निकाह हलाला' जैसी अपमानजनक या नीचा दिखाने वाली शर्तों को मानना, बढ़ावा देना या मजबूर करना एक दंडनीय आपराधिक अपराध माना जाएगा।

 

3- बच्चों के अधिकार और कस्टडी-'अवैध' शब्द की समाप्ति: संहिता ने एक प्रगतिशील कदम उठाते हुए कानूनी ढांचे से 'अवैध' (illegitimate) शब्द को पूरी तरह हटा दिया है। विवाहित या अविवाहित माता-पिता के बच्चों, जैविक, गोद लिए गए, सरोगेसी या असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (ART) से पैदा हुए सभी बच्चों को समान कानूनी दर्जा प्राप्त होगा। कस्टडी से जुड़े किसी भी विवाद में माता-पिता के अधिकारों के मुकाबले “बच्चे का हित और सर्वांगीण भलाई” ही अदालत के फैसले का मुख्य और अनिवार्य आधार होगी।

 

4-उत्तराधिकार का एकसमान और जेंडर-न्यूट्रल ढांचा-लिंग-तटस्थ अधिकार: बेटों और बेटियों को संपत्ति के उत्तराधिकार में समान अधिकार दिए गए हैं, चाहे उनकी वैवाहिक स्थिति कुछ भी हो। मृतक की संपत्ति में विधवाओं और विधुरों के साथ भी समान व्यवहार होगा। जीवित माता और पिता दोनों को क्लास-1 का उत्तराधिकारी माना गया है, और वे मृतक बच्चे की संपत्ति में जीवनसाथी और बच्चों के साथ बराबर का हिस्सा पाएंगे। बिना वसीयत मरे व्यक्ति की संपत्ति को तीन वर्गों (क्लास-1, क्लास-2 और अन्य रिश्तेदार) में क्रमिक तरीके से बांटा जाएगा। पिछली पीढ़ियों के लिए एक 'यूनिट सिस्टम' और 'सर्वाइवरशिप का अधिकार' लागू किया गया है। यदि कोई व्यक्ति संपत्ति के मालिक की हत्या या उसमें मदद का दोषी है, तो वह विरासत से हमेशा के लिए अयोग्य हो जाएगा। यदि किसी का कोई कानूनी वारिस नहीं है, तो 'एस्चीट' सिद्धांत के तहत संपत्ति राज्य को हस्तांतरित हो जाएगी।

 

5- वसीयत (Will) की पूर्ण स्वतंत्रता– एक नई धर्मनिरपेक्ष प्रणाली के तहत अब कोई भी स्वस्थ दिमाग का वयस्क अपनी 100% संपत्ति (स्वयं-अर्जित और पैतृक दोनों) वसीयत के माध्यम से किसी को भी दे सकता है। इससे पुरानी 'अनिवार्य उत्तराधिकार' की सीमाएं (जैसे इस्लामी कानून में एक-तिहाई की सीमा) समाप्त हो गई हैं। यह प्रक्रिया 'भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925' के तहत संचालित होगी।

 

6-लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य विनियमन (Live-in Relationship)-अनिवार्य रजिस्ट्रेशन: लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों के लिए साथ रहने की शुरुआत के एक महीने के भीतर रजिस्ट्रार के पास “लिव-इन रिलेशनशिप का बयान” जमा करना कानूनी रूप से अनिवार्य होगा। पार्टनर्स की न्यूनतम आयु 18 वर्ष होनी चाहिए। वे प्रतिबंधित श्रेणी में न हों, पहले से विवाहित न हों और उनकी सहमति स्वतंत्र होनी चाहिए। यदि कोई पार्टनर 21 साल से कम उम्र का है, तो लिव-इन के शुरू होने और खत्म होने की जानकारी उनके माता-पिता-अभिभावकों को भेजी जाएगी। रजिस्ट्रार यह रिकॉर्ड स्थानीय पुलिस स्टेशन को भी भेजेगा।

 

7-महिला पार्टनर और बच्चों को सुरक्षा- लिव-इन से पैदा हुए बच्चों को वैध माना जाएगा और उन्हें पूर्ण उत्तराधिकार मिलेगा। यदि पुरुष पार्टनर महिला को छोड़ देता है, तो वह सक्षम अदालत के माध्यम से कानूनी पत्नी की तरह ही भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) का दावा कर सकती है। बिना रजिस्ट्रेशन एक महीने से ज्यादा साथ रहने पर 3 महीने तक की जेल या 10,000 जुर्माना हो सकता है। गलत जानकारी देने पर 3 महीने की जेल और 25,000 जुर्माना तथा रजिस्ट्रार के नोटिस के बाद भी बयान न देने पर 6 महीने तक की जेल और 25,000 का जुर्माना हो सकता है।

मध्य प्रदेश : लिव-इन रिलेशनशिप पर सरकार ने लाया नया नियम, तोड़ने पर होगी 3 महीने की जेल

मध्य प्रदेश सरकार ने रविवार को भोपाल में हुई विशेष कैबिनेट बैठक में यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) को मंजूरी दे दी। सरकार का कहना है कि इस कानून का उद्देश्य शादी, विरासत और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे मामलों में सभी नागरिकों को समान अधिकार देना है। PTI की रिपोर्ट के अनुसार, मुख्यमंत्री मोहन यादव ने बताया कि यह कानून सभी समुदायों पर समान रूप से लागू होगा। हालांकि, संरक्षित क्षेत्रों में रहने वाली अनुसूचित जनजातियों (ST) और विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTG) को इसके दायरे से बाहर रखा जाएगा। मुख्यमंत्री ने कहा, “चाहे राम हों या रहीम, यूनिफॉर्म सिविल कोड सभी लोगों को समान अधिकार देने के उद्देश्य से लाया गया है।”

UCC में लिव-इन, शादी और संपत्ति को लेकर बड़े बदलाव

मध्य प्रदेश में मंजूर किए गए यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) के तहत शादी, लिव-इन रिलेशनशिप और संपत्ति के नियमों में कई बड़े बदलाव किए गए हैं। नए कानून के अनुसार एक समय में केवल एक ही शादी मान्य होगी। तलाक सिर्फ अदालत की मंजूरी के बाद ही मान्य होगा। वहीं, शादी के लिए पुरुष की न्यूनतम उम्र 21 साल और महिला की न्यूनतम उम्र 18 साल तय की गई है। इसके अलावा, गांव की पंचायत से लेकर शहर के नगर निकाय तक हर शादी का रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य होगा।

लिव-इन रिलेशनशिप का भी कराना होगा रजिस्ट्रेशन

इस कानून के तहत लिव-इन रिलेशनशिप को भी कानूनी दायरे में लाया गया है। साथ रहने वाले जोड़ों को एक महीने के भीतर अपना रजिस्ट्रेशन कराना होगा। लिव-इन में रहने के लिए भी वही उम्र की शर्तें लागू होंगी, जो शादी के लिए तय की गई हैं। अगर कोई शादीशुदा व्यक्ति लिव-इन रिलेशनशिप में रहता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है और पांच साल तक की जेल की सजा का प्रावधान रखा गया है।

बेटा और बेटी को मिलेगा बराबर का हक

नए कानून के तहत बेटे और बेटियों को पैतृक संपत्ति में समान अधिकार मिलेगा। पहले कई मामलों में महिलाओं को संपत्ति में कम हिस्सा मिलता था, लेकिन अब दोनों को बराबरी का अधिकार दिया जाएगा।

CM मोहन यादव ने असंभव को किया संभव, UCC को कैबिनेट ने दी मंजूरी, जानें लिव-इन के लिए क्या हैं शर्तें?

Meeting of Madhya Pradesh Cabinet was held under chairmanship of Chief Minister Dr Mohan Yadav

– जगदीशपुर में हुई मध्यप्रदेश कैबिनेट की ऐतिहासिक मीटिंग

– तीन तलाक-हलाला से जुड़े मामले अब अपराध की श्रेणी में

– अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं होगी समान नागरिक संहिता

– प्रदेश के मुखिया ने कैबिनेट के बाद खुद दी यूसीसी की जानकारी 

Chief Minister Dr. Mohan Yadav : मध्यप्रदेश के लिए 19 जुलाई का दिन ऐतिहासिक रहा। अब राज्य में किसी के लिए कोई विशेष कानून नहीं होगा। सभी धर्मों के लोग एक ही कानून के तहत जीवन-यापन करेंगे। चाहे लिव-इन हो या जीवन से जुड़ा कोई भी मामला, सब एक ही नियम से तय होगा। दरअसल, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने असंभव को संभव कर दिया है। उनकी अध्यक्षता में जगदीशपुर में हुई कैबिनेट ने राज्य में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code-UCC) लागू करने को सहमति दे दी है। 

 

समान नागरिक संहिता को लेकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मीडिया से कहा कि भारत के संविधान में बताए गए एक समानता, बराबरी, न्याय और धर्मनिरपेक्षता के विज़न को साकार करने की दिशा में एक खास कदम है। इसे मध्य प्रदेश के निवासियों के लिए , चाहे उनका धर्म कोई भी हो, शादी, तलाक, वैवाहिक झगड़ों से जुड़े भरण-पोषण, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे निजी मामलों को नियंत्रित करने के लिए एक समान पर्सनल सिविल कानून लागू करने के मकसद से बनाया गया है।

इस कोड का मुख्य मकसद महिलाओं की सुरक्षा और उन्हें सशक्त बनाना है, ताकि शादी, तलाक और उत्तराधिकार से जुड़े अलग-अलग पर्सनल कानूनों के तहत उनके साथ होने वाले पुराने भेदभाव को खत्म किया जा सके।

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उन्होंने कहा कि इन अलग-अलग और कभी-कभी बिना लिखित नियमों वाली प्रथाओं में सुधार करके और एक समान व निष्पक्ष ढांचा बनाकर, यह कोड पर्सनल सिविल कानून को आधुनिक बनाता है, ताकि पुरुषों और महिलाओं को समान अधिकार मिल सकें। साथ ही, यह धार्मिक रीति-रिवाजों, समारोहों और पारंपरिक प्रथाओं की भी साफ तौर पर सुरक्षा करता है, बशर्ते वे सार्वजनिक नैतिकता और नीति के अनुरूप हों।

 

धर्मनिरपेक्षता के विजन के मद्देनजर बड़ा कदम

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि भारत के संविधान के भाग-4 में राज्य के नीति-निदेशक तत्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 44 में यह उपबंध किया गया है कि राज्य भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा। इसके उ‌द्देश्य के परिप्रेक्ष्य में राज्य में विवाह, विवाह-विच्छेद, उत्तराधिकार तथा सहवासी-संबंध और उनसे संबंधित विषयों के विनियमन के लिए “मध्यप्रदेश समान नागरिक संहिता, 2026” का प्रारूप तैयार किया गया है।

प्रस्तावित संहिता का उ‌द्देश्य विभिन्न व्यक्तिगत विधियों के अंतर्गत समान प्रकृति के नागरिक विषयों में प्रचलित भिन्नताओं को एक समेकित विधिक ढांचे में विनियमित करना तथा समानता, लैंगिक न्याय, गरिमा और विधि के शासन के संवैधानिक मूल्यों को प्रभावी बनाना है। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश सरकार ने राज्य के निवासियों के लिए एक समान पर्सनल सिविल कानून लागू करने के उद्देश्य से 'समान नागरिक संहिता' (Uniform Civil Code) का एक ऐतिहासिक ड्राफ्ट तैयार किया है।

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यह प्रस्तावित कोड भारत के संविधान में निहित एकसमानता, बराबरी, न्याय और धर्मनिरपेक्षता के विज़न को साकार करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। इस संहिता का मुख्य मकसद पर्सनल कानूनों के तहत महिलाओं के साथ होने वाले पुराने भेदभाव को खत्म करना, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना और उन्हें सशक्त बनाना है।

पुरुषों और महिलाओं को समान अधिकार देने के साथ-साथ यह कोड उन धार्मिक रीति-रिवाजों और पारंपरिक प्रथाओं की साफ तौर पर सुरक्षा करता है जो सार्वजनिक नैतिकता और नीति के अनुरूप हैं। यह कोड उत्तराखंड (2024), गुजरात (2026) और असम (2026) के यूनिफॉर्म सिविल कोड के गहन अध्ययन और उनके मार्गदर्शन से तैयार किया गया है।

 

सीएम डॉ. यादव ने बताईं संहिता की मुख्य विशेषताएं

1- अनुसूचित जनजातियों को संरक्षण: संवैधानिक सुरक्षा-कवच का सम्मान करते हुए यह कानून संविधान के अनुच्छेद 342 और अनुच्छेद 366 (खंड 25) के तहत आने वाली अनुसूचित जनजातियों जैसे भील, गोंड, कोरकू, बैगा, सहरिया और भारिया पर लागू नहीं होगा।

इसके अलावा, जिन समुदायों के पारंपरिक अधिकारों की रक्षा संविधान के भाग XXI के तहत की गई है, उन्हें भी इस कोड से विशेष रूप से बाहर रखा गया है। कोड का परिभाषा वाला हिस्सा इसके अधिकार क्षेत्र को तय करता है। उत्तराधिकार से जुड़े जिन शब्दों की परिभाषा इसमें नहीं है, उनके लिए 'भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925' के अर्थ मान्य होंगे।

 

2- विवाह और तलाक से जुड़े बड़े सुधार

बहुविवाह-तीन तलाक पर पूर्ण रोक: यह कोड सभी समुदायों में केवल एक ही शादी (मोनोगैमी) को अनिवार्य बनाता है। कोई भी व्यक्ति एक समय में केवल एक ही जीवित जीवनसाथी के साथ शादीशुदा रह सकता है। विवाह के लिए पुरुषों की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं की 18 वर्ष तय की गई है। अमान्य सहमति और प्रतिबंधित रिश्तों (जब तक परंपरा की अनुमति न हो) के बीच विवाह पर रोक लगाई गई है।

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मौखिक तलाक या अनौपचारिक पंचायत के फैसलों को पूरी तरह गैर-कानूनी घोषित किया गया है। अब विवाह का समापन केवल कानून में बताए गए स्पष्ट और वैधानिक आधारों पर ही हो सकता है। मौजूदा व्यवस्था के विपरीत, अब महिलाओं को भी यह अधिकार दिया गया है कि यदि उनके पति ने शादी के समय किसी दूसरी महिला को गर्भवती किया है, तो पत्नी शादी को रद्द घोषित करने की मांग कर सकती है।

लोगों के लिए शादी और तलाक दोनों का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किया गया है। शहरी क्षेत्रों में 'MP ई-नगर पालिका पोर्टल' और ग्रामीण क्षेत्रों में SDM, नगरपालिका या पंचायत के ज़रिए यह प्रक्रिया पूरी होगी। रजिस्ट्रेशन न होने से शादी अमान्य नहीं होगी, लेकिन रजिस्ट्रार द्वारा बिना ठोस लिखित कारण के आवेदन खारिज करने पर जुर्माने का प्रावधान है। तलाक के बाद उसी जीवनसाथी से दोबारा शादी करने के लिए 'निकाह हलाला' जैसी अपमानजनक या नीचा दिखाने वाली शर्तों को मानना, बढ़ावा देना या मजबूर करना एक दंडनीय आपराधिक अपराध माना जाएगा।

 

3- बच्चों के अधिकार और कस्टडी

'अवैध' शब्द की समाप्ति: संहिता ने एक प्रगतिशील कदम उठाते हुए कानूनी ढांचे से 'अवैध' (illegitimate) शब्द को पूरी तरह हटा दिया है। विवाहित या अविवाहित माता-पिता के बच्चों, जैविक, गोद लिए गए, सरोगेसी या असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (ART) से पैदा हुए सभी बच्चों को समान कानूनी दर्जा प्राप्त होगा। कस्टडी से जुड़े किसी भी विवाद में माता-पिता के अधिकारों के मुकाबले “बच्चे का हित और सर्वांगीण भलाई” ही अदालत के फैसले का मुख्य और अनिवार्य आधार होगी।

 

4- उत्तराधिकार का एकसमान और जेंडर-न्यूट्रल ढांचा

लिंग-तटस्थ अधिकार: बेटों और बेटियों को संपत्ति के उत्तराधिकार में समान अधिकार दिए गए हैं, चाहे उनकी वैवाहिक स्थिति कुछ भी हो। मृतक की संपत्ति में विधवाओं और विधुरों के साथ भी समान व्यवहार होगा। जीवित माता और पिता दोनों को क्लास-1 का उत्तराधिकारी माना गया है, और वे मृतक बच्चे की संपत्ति में जीवनसाथी और बच्चों के साथ बराबर का हिस्सा पाएंगे।

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बिना वसीयत मरे व्यक्ति की संपत्ति को तीन वर्गों (क्लास-1, क्लास-2 और अन्य रिश्तेदार) में क्रमिक तरीके से बांटा जाएगा। पिछली पीढ़ियों के लिए एक 'यूनिट सिस्टम' और 'सर्वाइवरशिप का अधिकार' लागू किया गया है। यदि कोई व्यक्ति संपत्ति के मालिक की हत्या या उसमें मदद का दोषी है, तो वह विरासत से हमेशा के लिए अयोग्य हो जाएगा। यदि किसी का कोई कानूनी वारिस नहीं है, तो 'एस्चीट' सिद्धांत के तहत संपत्ति राज्य को हस्तांतरित हो जाएगी।

 

5- वसीयत (Will) की पूर्ण स्वतंत्रता

– एक नई धर्मनिरपेक्ष प्रणाली के तहत अब कोई भी स्वस्थ दिमाग का वयस्क अपनी 100% संपत्ति (स्वयं-अर्जित और पैतृक दोनों) वसीयत के माध्यम से किसी को भी दे सकता है। इससे पुरानी 'अनिवार्य उत्तराधिकार' की सीमाएं (जैसे इस्लामी कानून में एक-तिहाई की सीमा) समाप्त हो गई हैं। यह प्रक्रिया 'भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925' के तहत संचालित होगी।

 

6- लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य विनियमन (Live-in Relationship)

अनिवार्य रजिस्ट्रेशन: लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों के लिए साथ रहने की शुरुआत के एक महीने के भीतर रजिस्ट्रार के पास “लिव-इन रिलेशनशिप का बयान” जमा करना कानूनी रूप से अनिवार्य होगा। पार्टनर्स की न्यूनतम आयु 18 वर्ष होनी चाहिए। वे प्रतिबंधित श्रेणी में न हों, पहले से विवाहित न हों और उनकी सहमति स्वतंत्र होनी चाहिए। यदि कोई पार्टनर 21 साल से कम उम्र का है, तो लिव-इन के शुरू होने और खत्म होने की जानकारी उनके माता-पिता-अभिभावकों को भेजी जाएगी। रजिस्ट्रार यह रिकॉर्ड स्थानीय पुलिस स्टेशन को भी भेजेगा।

 

7- महिला पार्टनर और बच्चों को सुरक्षा

लिव-इन से पैदा हुए बच्चों को वैध माना जाएगा और उन्हें पूर्ण उत्तराधिकार मिलेगा। यदि पुरुष पार्टनर महिला को छोड़ देता है, तो वह सक्षम अदालत के माध्यम से कानूनी पत्नी की तरह ही भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) का दावा कर सकती है।

बिना रजिस्ट्रेशन एक महीने से ज्यादा साथ रहने पर 3 महीने तक की जेल या 10,000 जुर्माना हो सकता है। गलत जानकारी देने पर 3 महीने की जेल और 25,000 जुर्माना तथा रजिस्ट्रार के नोटिस के बाद भी बयान न देने पर 6 महीने तक की जेल और 25,000 का जुर्माना हो सकता है।

MP में UCC बिल को कैबिनेट की मंजूरी, CM डॉ. मोहन यादव ने बताई बड़ी बातें

cm mohan yadav

मध्यप्रदेश में मोहन यादव कैबिनेट ने समान नागरिक संहिता (UCC) बिल को मंजूरी दे दी है। अब यह विधेयक 20 जुलाई से शुरू हो रहे मानसून सत्र के दौरान मध्य प्रदेश विधानसभा में पेश किया जाएगा। सीएम डॉ. यादव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि आज का दिन कई कारणों से महत्वपूर्ण है। आज समान नागरिक संहिता (UCC) को सदन में पेश करने का फैसला लिया गया है। यूसीसी के जरिए राज्य में सभी को बराबरी का दर्जा मिल जाएगा। इनमें 'राम' और 'रहीम' भी शामिल हैं।

CM मोहन यादव का ‘डेस्टिनेशन कैबिनेट’ विजन विकास को दे रहा नई दिशा, जनता को ला रहा करीब

Chief Minister Mohan Yadav's Destination Cabinet vision is giving new direction to development

Chief Minister Dr. Mohan Yadav : मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने शासन की पारंपरिक शैली और विकास को अपने विजन से नई दिशा दी है। राजधानी भोपाल के वल्लभ भवन से बाहर निकलकर प्रदेश के विभिन्न शहरों, ऐतिहासिक स्थलों और पिछड़े क्षेत्रों में कैबिनेट बैठकें आयोजित करने की 'डेस्टिनेशन कैबिनेट' पहल न केवल शासन को जनता के करीब लाई है, बल्कि स्थानीय संस्कृति, पर्यटन और विकास को भी नई गति  प्रदान की है। यह पहल विकास और विरासत को साथ-साथ ले जाने का अनूठा उदाहरण बन गई है।

 

जनता तक शासन की सीधी पहुंच

पहले एमपी की कैबिनेट बैठकें हमेशा राजधानी भोपाल स्थित वल्लभ भवन में ही होती थी। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन ने इस परंपरा को तोड़ते हुए वर्ष 2024 से 'डेस्टिनेशन कैबिनेट' के नए कांसेप्ट की शुरुआत की। इसका मकसद सिर्फ फैसले लेना नहीं, बल्कि उन स्थानों की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पर्यटन क्षमता को उजागर करना भी है। अब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की पहल पर कैबिनेट बैठकें छोटे शहरों, आदिवासी क्षेत्रों और गौरवशाली स्थलों पर हो रही हैं।

इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिल रहा है और जनता तक शासन की पहुंच हो रही है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की डेस्टिनेशन कैबिनेट की यह अनूठी पहल राज्य के विकास में नया रंग भर रही है। इस मॉडल के जरिए सरकार जनता के बीच जाकर फैसले ले रही है, जिससे योजनाओं का क्रियान्वयन और अधिक प्रभावी हो गया है।

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जन- जन तक पहुंच रहे सरकार के फैसले

'डेस्टिनेशन कैबिनेट' सरीखी पहल का मुख्य उद्देश्य स्थानीय स्तर पर विकास कार्यों की मैदानी समीक्षा करना, पर्यटन को बढ़ावा देना और राज्य की सांस्कृतिक विरासत को सहेजना है। एक तरफ ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों पर कैबिनेट बैठकें होने से उन क्षेत्रों में पर्यटन की संभावनाओं और बुनियादी ढांचे के विकास को नई गति मिल रही है, वहीं, सरकार के फैसलों को सिर्फ वल्लभ भवन तक सीमित रखने के बजाय, सरकार राज्य के कोने-कोने तक पहुंच रही है।

 

'डेस्टिनेशन कैबिनेट’ ने बदली शासन की कार्यशैली

मोहन सरकार ने ‘डेस्टिनेशन कैबिनेट’ के जरिए शासन की कार्यशैली को बदला है। अब अधिकारी एसी कमरों की चहारदीवारी से निकलकर पहली बार फील्ड गवर्नेंस की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। यहां फैसले वल्लभ भवन की पांचवीं मंजिल से बाहर सीधे जनता के बीच लिए जा रहे हैं। पहले आयोजित इन 'डेस्टिनेशन कैबिनेट' बैठकों में ओरछा, चित्रकूट, महेश्वर, सिंग्रामपुर, विश्व धरोहर स्थल खजुराहो, नागलवाड़ी, इंदौर का राजवाड़ा जैसे महत्वपूर्ण स्थानों को शामिल किया गया।

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इससे स्थानीय संस्कृति को वैश्विक पटल पर उभारने और स्थानीय विकास को गति मिली है। पचमढ़ी में जनप्रिय शासक रहे भभूत सिंह की स्मृति में डेस्टिनेशन कैबिनेट बैठक आयोजित की गई, वहीं रानी दुर्गावती और लोकमाता देवी अहिल्याबाई की स्मृति में भी भव्य डेस्टिनेशन कैबिनेट आयोजित की गई।

प्रदेश में जिन स्थानों में डेस्टिनेशन कैबिनेट का आयोजन किया जा चुका है उन क्षेत्रों में विकास से जुड़े प्रोजेक्ट्स को तेजी से प्राथमिकता मिल रही है। इससे स्थानीय विकास की गति तेज हो गई है। अब राजधानी भोपाल से सटे प्राचीन महल और स्मारक वाले गांव जगदीशपुर में रविवार 19 जुलाई को सरकार की डेस्टिनेशन कैबिनेट आयोजित की जा रही है।

 

अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणादायक

मोहन सरकार का यह मॉडल अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणादायक साबित हो सकता है। यह दिखाता है कि शासन केवल नीतियां बनाने तक सीमित नहीं, बल्कि उन्हें जमीन पर रंग भरने का माध्यम भी है। इससे जहां एक तरफ पर्यटन विकास को बढ़ावा मिल रहा है, वहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विकसित भारत विजन को धरातल पर उतारा जा रहा है।

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मोहन की 'डेस्टिनेशन कैबिनेट' प्रदेश को इन्वेस्टमेंट डेस्टिनेशन, कल्चरल डेस्टिनेशन के साथ डेवेलपमेंट डेस्टिनेशन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। यह नई पहल विकास, संस्कृति और जन-सहभागिता का सुंदर समन्वय और सामंजस्य है, जो मध्यप्रदेश को दिन पर दिन नई ऊंचाइयों की तरफ ले जा रही है।

MP UCC: मोहन सरकार समान नागरिक संहिता के जरिए साध रही है हिंदुत्व का एजेंडा?

मध्यप्रदेश के मानसून सत्र में मोहन सरकार UCC से जुड़ा अहम विधयेक लाने जा रही है। 20 जुलाई से शुरु हो रहे विधानसभा के मानसून सत्र के पहले 19 जलाई को कैबिनेट की बैठक में UCC कमेटी के प्रतिवेदन को कैबिनेट में रखा जाएगा। कैबिनेट से मंजूरी के बाद मोहन सरकार विधानसभा सत्र के पहले दिन ही UCC विधेयक को पेशन करने तैयारी में है।

समान नागरिक संहिता लंबे समय से भाजपा के प्रमुख वैचारिक मुद्दों में शामिल रही है। 2023 के विधानसभा चुनाव में मध्यप्रदेश भाजपा के चुनावी मेनिफेस्टो में प्रदेश में UCC लागू करना प्रमुख चुनावी एजेंडा रहा है। ऐसे में अब मोहन सरकार अब उसको पूरा करती हुई दिख रही है। दरअसल भाजपा का मानना है कि UCC लागू होने से विवाह,तलाक,उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे मामलों में सभी नागरिकों के लिए एक समान कानूनी व्यवस्था बनेगी।

बुधवार को इंदौर में एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने UCC के मुद्दें पर सरकार का नजरिया साफ करते हुए कहा कि सरकार समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में अब आगे बढ़ रही है। वहीं मुख्यमंत्री ने कहा कि अगर रामचंद्र एक शादी करता है तो रहीम से भी एक ही शादी की अपेक्षा की जा सकती है।

मुख्यमंत्री मोहन यादव का कहना है कि UCC का मकसद किसी धर्म विशेष को निशाना बनाना नहीं, बल्कि सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार सुनिश्चित करना है। सरकार ने पहले जनता, सामाजिक संगठनों और विभिन्न वर्गों से सुझाव लेने की प्रक्रिया भी शुरू की थी, जिसमें 10 लाख से अधिक लोगों के सुझाव लिए गए है। जिसमें 9 लाख लोगों ने यूसीसी के समर्थन में आए है और अब सरकार इसको अमलीजामान पहनाने जा रही है।

UCC पर अपना रूख साफ करें कांग्रेस-
मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि समिति द्वारा मुझे यूसीसी की रिपोर्ट सौंप दी गई है। अब कांग्रेस को भी इस विषय पर अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए। चाहे यूसीसी का मुद्दा हो या भोजशाला का, कांग्रेस हर विषय को केवल हिंदू-मुस्लिम और वोट बैंक की राजनीति के नजरिए से देखती है। उन्होंने कहा कि सकारात्मक बात यह है कि सभी धर्मों के नागरिकों ने यूसीसी पर अपने विचार खुलकर और स्पष्ट रूप से रखे हैं, लेकिन कांग्रेस ने अब तक अपना स्पष्ट रुख सामने नहीं रखा है।

UCC प्रतिवेदन में क्या है?- मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को सौंपे गए UCC प्रतिवेदन में समिति की रिपोर्ट 3 खण्डों में संकलित है। पहले खंड में समिति की अनुशंसाओं का प्रतिवेदन है और इसमें समिति ने अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय एवं राज्य के विभिन्न विधियों एवं प्रथाओं का विश्लेषण कर अपनी अनुशंसाएं प्रतिवेदित की है। इस खंड में 10 अध्याय है। प्रतिवेदन का दूसरा खंड विधेयक के प्रारूप के रूप में है। समिति द्वारा प्रस्तावित विधेयक के प्रारूप को मध्यप्रदेश में प्रचलित विधियों एवं नियमों के दृष्टिगत तैयार किया गया है। प्रस्तावित विधेयक के 4 भाग, 404 धाराएं एवं 7 अनुसूचियां है। तीसरे खंड में जन परामर्श प्रतिवेदन है, जिसमें समिति द्वारा जिला स्तर, राज्य स्तर एवं वेबसाइट के माध्यम से किए गए व्यापक जन-परामर्श का विवरण है। समिति को 9.58 लाख से अधिक परामर्श प्राप्त हुए थे। उनका प्रश्नवार, लिंगवार एवं समुदायवार विश्लेषण इस खंड में शामिल है। समिति ने अनुसूचित जनजातियों को समान नागरिक संहिता से बाहर रखने की अनुशंसा की है।
 

UCC Bill West Bengal: पश्चिम बंगाल में सोमवार को UCC बिल होगा पेश, जानें इसमें क्या है खास?

UCC Bill West Bengal: पश्चिम बंगाल अब समान नागरिक संहिता (UCC) की दिशा में कदम बढ़ाने वाला अगला भाजपा शासित राज्य बनने जा रहा है। इस सोमवार को राज्य विधानसभा में UCC बिल पेश किया जाएगा। गौरतलब है कि भाजपा ने अपने चुनावी घोषणापत्र में UCC लागू करने का वादा किया था और इसे नई सरकार की प्राथमिक प्राथमिकताओं में शामिल किया था।

बता दें कि पश्चिम बंगाल उन BJP-शासित राज्यों की बढ़ती सूची में शामिल हो गया है जिन्होंने UCC की दिशा में कदम उठाए हैं। जबकि उत्तराखंड ने इसे सबसे पहले लागू किया था, जिसके बाद असम, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात ने भी ऐसा किया।

यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) क्या है?

UCC का मकसद धर्म-आधारित पर्सनल कानूनों की जगह एक ऐसा एकसमान कानूनी ढांचा लाना है जो सभी नागरिकों के लिए – चाहे उनका धर्म कोई भी हो – शादी, तलाक, विरासत, संपत्ति के बंटवारे और गोद लेने जैसे सिविल मामलों को नियंत्रित करे।

इसके समर्थकों का तर्क है कि यह कानून के सामने समानता सुनिश्चित करता है और धर्म-आधारित पर्सनल कानूनों से होने वाले भेदभाव को खत्म करता है।

पश्चिम बंगाल के UCC में क्या-क्या शामिल होगा?

भाजपा द्वारा प्रस्तावित ढांचे के आधार पर, इस विधेयक में निम्नलिखित मुद्दों को संबोधित किए जाने की उम्मीद है:

क्षेत्रक्या बदलाव होंगे
विवाह (Marriage)सभी समुदायों के लिए विवाह की समान न्यूनतम कानूनी उम्र; सभी शादियों का अनिवार्य पंजीकरण
लैंगिक समानता (Gender Equality)बहुविवाह पर प्रतिबंध; महिलाओं को संपत्ति और उत्तराधिकार में समान अधिकार; धर्म की परवाह किए बिना समान कानूनी सुरक्षा
लिव-इन संबंध (Live-in Relationships)लिव-इन संबंधों का शुरुआत और अंत दोनों समय अनिवार्य पंजीकरण, निर्धारित प्राधिकरण के पास
तलाक (Divorce)तलाक की प्रक्रिया के लिए एक समान कानूनी ढांचा, जो धर्म-आधारित या पारंपरिक तरीकों की जगह लेगा; दोनों पक्षों को समान कानूनी अधिकार और राहत

पश्चिम बंगाल में यह बात खास तौर पर क्यों अहम है?

राजनीतिक नेताओं ने बताया है कि अल्पसंख्यक बहुल जिलों – मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तरी दिनाजपुर के कुछ हिस्सों में इसका बड़ा राजनीतिक और सामाजिक असर हो सकता है। पार्टी सूत्रों का दावा है कि अल्पसंख्यक समुदायों की महिलाओं का एक वर्ग UCC प्रस्ताव का स्वागत कर रहा है। उनका कहना है कि इससे शादी, तलाक और विरासत से जुड़े उनके कानूनी अधिकार मजबूत हो सकते हैं। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।

भाजपा के लिए UCC एक लंबे समय से चला आ रहा वैचारिक और नीतिगत संकल्प है। अगर यह विधेयक पारित हो जाता है, तो इसे पश्चिम बंगाल की पहली भाजपा सरकार के सबसे महत्वपूर्ण विधायी सुधारों में से एक माना जाएगा।

इस पर राजनीतिक बहस कैसी हो सकती है?

समर्थक UCC को कानूनी एकरूपता और लैंगिक समानता की दिशा में एक कदम के तौर पर देखते हैं। आलोचकों के धर्म-आधारित पर्सनल लॉ और सांस्कृतिक रीति-रिवाजों पर इसके संभावित असर को लेकर चिंता जताने की उम्मीद है। यह बहस पश्चिम बंगाल जैसे विविध जनसंख्या और राजनीतिक संरचना वाले राज्य में काफी तीखी हो सकती है।

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