क्या है सुशांत सिंह राजपूत की पूर्व मैनेजर दिशा सालियान की मौत का केस जिसकी अब CBI करेगी जांच? 2020 से अबतक ये सब हुआ

Disha Salian Case: दिवंगत बॉलीवुड सेलिब्रिटी मैनेजर दिशा सालियान की मौत के मामले में बुधवार (2 सितंबर) को बड़ा कानूनी मोड़ आ गया। बॉम्बे हाई कोर्ट ने बुधवार (2 सितंबर) को दिवंगत बॉलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत की पूर्व मैनेजर दिशा सालियन की मौत के मामले की केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) जांच का आदेश दिया। इस दौरान अदालत ने साफ किया कि किसी भी व्यक्ति को तब तक आरोपी नहीं माना जाना चाहिए, जब तक कि जांच अधिकारी को उसके खिलाफ पर्याप्त सबूत न मिल जाएं। कोर्ट ने CBI को निर्देश दिया है कि जांच के लिए एक वरिष्ठ और अनुभवी अधिकारी की नियुक्ति की जाए। साथ ही मामले में संबंधित धाराओं के तहत FIR दर्ज कर आगे की जांच की जाएगी।

यह मामला दिशा सालियान के पिता सतीश सालियान की याचिका के बाद एक बार फिर बॉम्बे हाईकोर्ट के सामने आया था। सतीश सालियान ने अपनी बेटी की मौत की परिस्थितियों पर सवाल उठाते हुए निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की मांग की थी। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस बात पर भी सवाल उठाए थे कि परिवार की ओर से संदेह जताए जाने के बावजूद FIR क्यों दर्ज नहीं की गई?

‘बिना सबूत किसी को भी आरोपी न माना जाए’

हाई कोर्ट ने साफ कहा है कि जब तक जांच में किसी के खिलाफ ठोस सबूत न मिल जाएं, तब तक किसी को भी आरोपी न माना जाए। अदालत ने कहा, “अगर कोई गंभीर अपराध (कॉग्निज़ेबल ऑफ़ेंस) बनता है, तो इस मामले में जल्द से जल्द चार्जशीट दाखिल की जानी चाहिए। अगर कोई गंभीर अपराध नहीं बनता है, तो जजों ने जांच अधिकारी (I.O.) को आदेश दिया है कि वे सक्षम अदालत में मामले को बंद करने की उचित प्रक्रिया शुरू करें।” दिशा के पिता को प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल करने की इजाजत दी गई है।

CBI दर्ज करेगी FIR, वरिष्ठ अधिकारी संभालेंगे जांच

हाई कोर्ट के आदेश के बाद अब मामले में संबंधित प्रावधानों के तहत FIR दर्ज की जाएगी। इसके बाद CBI जांच को आगे बढ़ाएगी। हाईकोर्ट ने विशेष रूप से निर्देश दिया है कि जांच के लिए किसी वरिष्ठ और अनुभवी अधिकारी को नियुक्त किया जाए, ताकि मामले की जांच निष्पक्ष और प्रभावी तरीके से हो सके।

दिशा सालियान की मौत 8 जून 2020 को मुंबई में एक बिल्डिंग से गिरने के बाद हुई थी। उस समय पुलिस ने इसे दुर्घटनावश हुई मौत के रूप में दर्ज किया था। बाद में मामले को लेकर कई सवाल और आरोप सामने आए तथा दिशा के पिता ने स्वतंत्र जांच की मांग की।

सतीश सालियान का बयान भी दर्ज होगा

CBI जांच के दौरान दिशा के पिता सतीश सालियान का बयान दर्ज किया जाएगा। उनके आरोपों और उन परिस्थितियों के बारे में विस्तार से जानकारी ली जाएगी। हाईकोर्ट पहले ही यह स्पष्ट कर चुका था कि किसी मामले में कानूनी रूप से उचित जांच और प्रक्रिया का पालन जरूरी है, ताकि परिवार को मामले में उचित निष्कर्ष और न्यायिक रूप से स्वीकार्य क्लोजर मिल सके।

आदित्य ठाकरे को लेकर कोर्ट का अहम रुख

मामले में शिवसेना (UBT) नेता आदित्य ठाकरे का नाम राजनीतिक और कानूनी बहस के दौरान सामने आता रहा है। हालांकि, CBI जांच का आदेश दिए जाने का अर्थ यह नहीं है कि आदित्य ठाकरे या किसी अन्य व्यक्ति को आरोपी घोषित कर दिया गया है।

Disha Salian Case_

जांच एजेंसी को उपलब्ध सबूतों, बयानों, रिकॉर्ड और अन्य तथ्यों के आधार पर अपनी जांच आगे बढ़ानी होगी। किसी भी व्यक्ति को केवल आरोपों या राजनीतिक दावों के आधार पर आरोपी नहीं माना जा सकता। ठाकरे की ओर से पहले भी उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों को खारिज किया गया है। उनके वकील ने अदालत में याचिका को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते हुए आरोपों का विरोध किया था।

कोर्ट के फैसले के बाद भावुक हुए दिशा के पिता

हाईकोर्ट के फैसले के बाद दिशा सालियान के पिता सतीश सालियान भावुक हो गए। उन्होंने अदालत के आदेश के लिए धन्यवाद दिया। साथ ही उम्मीद जताई कि अब उनकी बेटी की मौत से जुड़े सवालों की निष्पक्ष तरीके से जांच होगी। दिशा सालियान की मौत के मामले में पिछले कई वर्षों से अलग-अलग दावे और जांच को लेकर सवाल उठते रहे हैं। मुंबई पुलिस ने पहले मामले में किसी तरह की आपराधिक साजिश से इनकार किया था। जबकि दिशा के परिवार की ओर से बाद में गंभीर संदेह जताते हुए नए सिरे से जांच की मांग की गई।

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PM Modi in Uzbekistan: पीएम मोदी को उज्बेकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान, 36वें अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित

PM Modi in Uzbekistan: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रविवार (30 अगस्त) को उज्बेकिस्तान के प्रतिष्ठित सम्मान ‘ऑर्डर ऑफ ओली दराजाली दोस्तलिक’ से नवाजा गया। उन्होंने यह सम्मान भारत और उज्बेकिस्तान के बीच स्थायी संबंधों को समर्पित किया। PM मोदी व्यापार, क्लीन एनर्जी और कनेक्टिविटी समेत कई क्षेत्रों में संबंध मजबूत करने के लिए उज्बेकिस्तान के दो दिवसीय दौरे पर हैं। प्रधानमंत्री को यह सम्मान उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव ने प्रदान किया। यह प्रधानमंत्री मोदी को मिलने वाला 36वां अंतरराष्ट्रीय सम्मान है।

‘सम्मानित होना मेरे लिए बहुत गर्व की बात’

PM मोदी ने सोशल मीडिया प्लटेफॉर्म X पर एक पोस्ट में कहा, “‘ओली दराजाली दोस्तलिक’ सम्मान प्राप्त कर मैं गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं। मैं यह सम्मान भारत और उज्बेकिस्तान के बीच स्थायी संबंधों को समर्पित करता हूं।” पीएम मोदी ने अपने संबोधन में कहा, “उज्बेकिस्तान के सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित होना मेरे लिए बहुत गर्व की बात है।” उन्होंने कहा कि भारत के लोग इस सम्मान के नाम में प्रयुक्त शब्द ‘दोस्तलिक’ से भली-भांति परिचित हैं।

‘1.4 अरब भारतीयों का सम्मान’

उन्होंने कहा, “भारत में शायद ही कोई ऐसा परिवार होगा, जहां ‘दोस्तलिक’ शब्द दिन में 100 बार न बोला जाता हो। आज आपने वास्तव में इस शब्द के सार को सामने ला दिया है। ‘दोस्तलिक’ का अर्थ मित्रता है। यह शब्द अपने आप में भारत और उज्बेकिस्तान के संबंधों के केंद्र में मौजूद भावना को खूबसूरती से व्यक्त करता है।” PM मोदी ने कहा कि यह सम्मान प्राप्त करना उनका व्यक्तिगत सम्मान नहीं, बल्कि 1.4 अरब भारतीयों का सम्मान है।

PM मोदी ने आगे कहा, ‘‘सभी भारतीयों की ओर से मैं उज्बेकिस्तान की जनता, सरकार और अपने प्रिय मित्र राष्ट्रपति का हृदय से आभार व्यक्त करता हूं। मैं इस सर्वोच्च सम्मान को बहुत विनम्रता के साथ स्वीकार करता हूं। इसे हमारे दोनों देशों के सदियों पुराने मैत्रीपूर्ण संबंधों तथा हमारी साझा विरासत को समर्पित करता हूं।”

पीएम मोदी ने मिर्जियोयेव के साथ की वार्ता 

इससे पहले, प्रधानमंत्री मोदी ने मिर्जियोयेव के साथ वार्ता की, जिसके बाद भारत और उज्बेकिस्तान ने अपने संबंधों को व्यापक रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक बढ़ाने का फैसला किया। प्रधानमंत्री मोदी 31 अगस्त से 1 सितंबर तक होने वाले शंघाई सहयोग संगठन (SEO) के 26वें शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए ताशकंद से किर्गिस्तान की यात्रा करेंगे।

दोनों देशों ने अपने संबंधों को बढ़ाने का फैसला किया

प्रधानमंत्री मोदी और उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव के बीच हुई वार्ता के बाद, भारत और उज्बेकिस्तान ने रविवार को अपने संबंधों को व्यापक रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक बढ़ाने का फैसला किया। दोनों देशों ने यूरेनियम की दीर्घकालिक आपूर्ति के लिए एक व्यवस्था बनाने पर सहमति जताई। वार्ता के दौरान व्यापार, निवेश, इंफ्रास्ट्रक्चर, महत्वपूर्ण खनिजों, खनन, रक्षा और सुरक्षा, कृषि, स्वास्थ्य, टेक्नोलॉजी, UPI समेत डिजिटल सार्वजनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और एजुकेशन के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया गया।

द्विपक्षीय व्यापार को 5 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य

विदेश मंत्रालय (MEA) के अनुसार दोनों पक्षों ने 2030 तक वार्षिक द्विपक्षीय व्यापार को पांच अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य भी निर्धारित किया है। दोनों देशों के बीच वर्तमान में द्विपक्षीय व्यापार का कुल मूल्य एक अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक है। मंत्रालय ने कहा कि दोनों पक्षों ने द्विपक्षीय संबंधों को व्यापक रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक बढ़ाने का फैसला किया, जो सहयोग के विस्तृत दायरे को दर्शाता है।

दोनों नेताओं की मौजूदगी में खनन, संस्कृति, शिक्षा, पर्यटन और आयुर्वेद समेत कई अन्य क्षेत्रों से जुड़े समझौतों का आदान-प्रदान हुआ। उज्बेकिस्तान में बौद्ध स्थलों फयाज तेपा और कारा तेपा के पुनरुद्धार और संरक्षण के लिए एक आशय पत्र पर भी सहमति बनी। भारत असैन्य उद्देश्यों के लिए परमाणु ऊर्जा के उत्पादन के लिए उज्बेकिस्तान से यूरेनियम खरीदने पर विचार कर रहा है।

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Tukaram Mundhe: “क्या आपको लगता है कि आप भगवान हैं?” बॉम्बे हाई कोर्ट ने IAS तुकाराम मुंढे के FDI को क्यों लगाई फटकार?

Tukaram Mundhe: बॉम्बे हाई कोर्ट ने चर्चित IAS अधिकारी तुकाराम मुंढे की अगुवाई वाली महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) को दो अलग-अलग मामलों में सुनवाई के दौरान जमकर फटकार लगाई। इसके बाद रेगुलेटर को पुणे में सिप्ला (Cipla) की एक फैसिलिटी और मुंबई में मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन (MCA) परिसर में चल रहे पांच रेस्टोरेंट के खिलाफ जारी आदेश वापस लेने पड़े। कोर्ट ने FDA की आलोचना करते हुए कहा कि उसने बिना सोचे-समझे जल्दबाजी में काम किया।

अदालत ने कहा कि कानून का ठीक से विश्लेषण नहीं किया गया। कोर्ट के मुताबिक एक मामले में तो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन किया गया। MCA मामले में बेंच ने रेगुलेटर पर व्यावहारिक नजरिया अपनाने के बजाय किताबी या लकीर का फकीर वाला नजरिया अपनाने का आरोप भी लगाया।

‘क्या आपको लगता है कि आप भगवान हैं?’

बॉम्बे हाई कोर्ट ने सबसे तीखी टिप्पणी बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स में MCA परिसर के पांच रेस्टोरेंट से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की। एक्टिंग चीफ जस्टिस रवींद्र घुगे और जस्टिस गौतम अंखाड की बेंच ने FDA के रवैये पर सवाल उठाए। इस दौरान यह बात सामने आई कि एक नए जांच में पाया गया कि ये रेस्टोरेंट फूड सेफ्टी नियमों का 88% पालन कर रहे थे। कोर्ट ने FDA से पूछा, “क्या आपको लगता है कि आप भगवान हैं। आप कुछ भी कर सकते हैं?” साथ ही यह भी पूछा कि विभाग बार-बार बिना सोचे-समझे जल्दबाजी में क्यों काम करता है।

‘न्यूज 18’ के मुताबिक हाई कोर्ट ने कहा कि उसने पहले भी FDA से मामले पर सोच-समझकर और व्यावहारिक नजरिया अपनाने को कहा था। लेकिन आरोप लगाया कि विभाग ने इसके बजाय किताबी या लकीर का फकीर वाला रवैया अपनाया। अदालत ने कहा, “हम हर समय विभाग और अधिकारियों को फटकार लगाकर थक चुके हैं। अब कड़े आदेश जारी करने का समय आ गया है। हम संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अवमानना ​​की कार्रवाई करेंगे। वे हमें समझाएं या जेल जाएं।”

कामकाज रोकने का आदेश वापस

इसके बाद FDA ने हाई कोर्ट को बताया कि वह पांच रेस्टोरेंट का कामकाज रोकने का अपना आदेश वापस ले लेगा। साथ ही MCA को नया नोटिस जारी करेगा, ताकि उसे M/s शिर्के इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ अपने कॉन्ट्रैक्ट के बारे में जवाब देने का मौका मिल सके। कोर्ट ने इस कदम को मंजूरी देते हुए कहा कि चूंकि रेस्टोरेंट अब फूड सेफ्टी नियमों का पालन कर रहे हैं, इसलिए कामकाज रोकने का आदेश रद्द माना जाएगा। अदालत ने कहा कि अब रेस्टोरेंट फिर से खुल सकते हैं।

‘मच्छर मारने के लिए तलवार का इस्तेमाल न करें’

यह विवाद इसलिए हुआ क्योंकि फूड लाइसेंस MCA के नाम पर जारी किए गए थे। जबकि रेस्टोरेंट M/s शिर्के इंफ्रास्ट्रक्चर चला रही थी। कोर्ट ने कहा कि कानून में ऐसी व्यवस्था को रोकने वाला कोई प्रावधान नहीं है। FDA के फैसला लेने के तरीके पर सवाल उठाए। पीठ ने कहा, “हमें कितनी बार समझाने और संतुलन बनाने की कोशिश करनी चाहिए ताकि विभाग का हौसला न टूटे? हम क्यों कहते हैं, ‘मच्छर मारने के लिए तलवार का इस्तेमाल न करें’?” कोर्ट ने यह भी सवाल किया कि FDA लागू कानून का ठीक से विश्लेषण किए बिना आदेश क्यों जारी कर रहा था?

सिपला का लाइसेंस रद्द करने का फैसला वापस

दूसरे मामले में हाई कोर्ट ने FDA को पुणे के वाडकी में सिपला फार्मा एंड लाइफ साइंसेज लिमिटेड की कैरिंग एंड फॉरवर्डिंग सुविधा के दवा बिक्री लाइसेंस रद्द करने का आदेश वापस लेने के लिए मजबूर किया। ‘रिएक्टिन प्लस’ टैबलेट की पैकेजिंग और उन्हें वापस मंगाने (रिकॉल) की फॉलो-अप जांच के दौरान कथित उल्लंघन पाए जाने के बाद 27 अगस्त से लाइसेंस रद्द कर दिए गए थे।

कोर्ट ने FDA द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया पर सवाल उठाए, जिसमें राज्य सरकार द्वारा घोषित सार्वजनिक छुट्टी के दिन सुनवाई के लिए कंपनी के प्रतिनिधि को बुलाने वाला ईमेल भी शामिल था। अदालत ने FDA से कहा, “आप सराहनीय काम कर रहे हैं। लेकिन अब आप हद से आगे बढ़ रहे हैं। ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। आपने गलत किया है, और अब आपको इस मामले को सुलझाना होगा।”

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मुंढे पिछले कुछ दिनों से एफडीए द्वारा मुंबई में खाने-पीने की जगहों और रेस्तरां (जिनमें कुछ बड़े नाम भी शामिल हैं) के खिलाफ की गई सख्त कार्रवाई के कारण चर्चा में बने हुए हैं। कुछ मामलों में तो इस वजह से कानूनी जांच-पड़ताल भी हुई। ऐसे में, एफडीए कमिश्नर ने कहा कि खाने-पीने के प्रतिष्ठानों पर कार्रवाई तथ्यों और नियमों के पालन की जरूरतों के आधार पर की गई थी।

‘क्या आपको लगता है आप भगवान हैं?’ MCA परिसर में 5 रेस्टोरेंट पर कार्रवाई को लेकर बॉम्बे HC ने FDA को लगाई फटकार

Bombay High Court: बॉम्बे हाई कोर्ट ने शनिवार को सुनवाई करते हुए महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) को जमकर फटकार लगाई और मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन (MCA) के BKC परिसर में मौजूद पांच आउटलेट्स के फूड लाइसेंस सस्पेंड करने के उसके आदेशों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि FDA ने इस मामले में बहुत जल्दबाजी में कार्रवाई की और व्यावहारिक तरीके से फैसला नहीं लिया।

इस दौरान हाई कोर्ट ने FDA के अधिकारियों के खिलाफ ‘अदालत की अवमानना’ की कार्रवाई की चेतावनी भी दी। यह कार्रवाई तब की गई जब एक नए निरीक्षण में पाया गया कि पांचों रेस्टोरेंट फूड सेफ्टी नियमों का 88% पालन कर रहे थे, फिर भी विभाग ने उनके फूड लाइसेंस का सस्पेंशन हटाने से इनकार कर दिया था।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवींद्र घुगे और न्यायमूर्ति गौतम अंखड़ की खंडपीठ ने फूड लाइसेंस पर लगी रोक हटा दी, जिससे इन रेस्टोरेंट को दोबारा खोलने की अनुमति मिल गई, जबकि FDA अलग से किसी तीसरे पक्ष द्वारा उनके संचालन से जुड़े मुद्दों की जांच कर रहा है।

पीठ ने कहा कि मामले पर पुनर्विचार करने के अदालत के पिछले निर्देश के बावजूद FDA ने “व्यावहारिक दृष्टिकोण के बजाय किताबी दृष्टिकोण” अपनाया।

‘बहुत जल्दबाजी में की गई कार्रवाई’

बता दें कि MCA ने FDA के उस फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की थी, जिसमें साफ-सफाई के नियमों के उल्लंघन और थर्ड-पार्टी ऑपरेशन से जुड़ी गड़बड़ियों के आरोप में पांच रेस्टोरेंट का कामकाज रोक दिया गया था। वहीं, दोबारा जांच के बावजूद, FDA ने सस्पेंशन जारी रखा। उनका तर्क था कि रेस्टोरेंट M/s शिर्के इंफ्रास्ट्रक्चर चला रहा था, जबकि लाइसेंस MCA के नाम पर थे।

हालांकि, कोर्ट ने कहा कि उसने FDA अधिकारियों से साफ तौर पर व्यावहारिक नजरिया अपनाने को कहा था। कोर्ट ने कहा, “साफ तौर पर कहने के बावजूद, FDA ने हमारे आदेश को नहीं माना और व्यावहारिक नजरिए के बजाय लकीर का फकीर बनने वाला नजरिया अपनाया। हम हर समय विभाग और अधिकारियों को डांट-फटकार कर थक चुके हैं। अब सख्त आदेश देने का समय आ गया है। हम संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कोर्ट की अवमानना ​​की कार्रवाई करेंगे। वे हमें समझा लें या जेल जाएं।”

बेंच ने यह भी सवाल किया कि FDA ने कानूनी स्थिति का पूरी तरह से विश्लेषण किए बिना “बेवजह जल्दबाजी” में कदम क्यों उठाया। बेंच ने पूछा, “हम कितनी बार समझाने और संतुलन बनाने की कोशिश करें ताकि विभाग का मनोबल न गिरे? हम क्यों कहते हैं कि मच्छर को मारने के लिए तलवार का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए? क्या आपको लगता है कि आप कोई भगवान हैं और कुछ भी कर सकते हैं?”

यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब महाराष्ट्र में खाद्य सुरक्षा नियमों के उल्लंघन के खिलाफ FDA की कार्रवाई जारी है। पिछले कुछ हफ्तों में कई खाद्य कंपनियों को नोटिस दिए गए हैं। अधिकारी खाद्य पदार्थों में मिलावट, एक्सपायर्ड सामान की बिक्री और नियमों से जुड़ी दूसरी गड़बड़ियों को लेकर लगातार जांच कर रहे हैं।

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मराठी सीखने के लिए ऑटो-कैब ड्राइवरों को 1 साल की मोहलत, CM फडणवीस का बड़ा ऐलान

Maharashtra Language Controversy: महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने गुरुवार को घोषणा की कि राज्य सरकार के भाषा संबंधी आदेश को लेकर हो रहे विरोध और राजनीतिक विवाद के बीच, ऑटो-रिक्शा और कैब ड्राइवरों को मराठी सीखने के लिए एक साल का समय दिया जाएगा। फडणवीस ने कहा कि अगले एक साल तक ड्राइवरों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी, ताकि उन्हें मराठी का कामकाजी ज्ञान हासिल करने के लिए समय मिल सके।

फडणवीस ने कहा, “मैंने कैब और ऑटो ड्राइवरों से मुलाकात की। वे सभी इस बात से सहमत हैं कि हर किसी को मराठी आनी चाहिए, लेकिन उन्होंने कहा कि इस पेशे में अलग-अलग उम्र के लोग हैं और उनके लिए जल्दी मराठी सीखना मुश्किल है। उन्होंने एक योजना तैयार की है और इसके लिए एक साल का समय मांगा है। हालांकि, राज्य सरकार ने यह मांग मान ली है। इस साल कोई कार्रवाई नहीं होगी।”

बता दें कि यह घोषणा महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक के उस बयान के कुछ दिनों बाद की गई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि जो ड्राइवर मराठी का कामकाजी ज्ञान दिखाने में विफल रहेंगे, उनके ऑथराइजेशन बैज सस्पेंड किए जा सकते हैं।

मराठी भाषा को लेकर बढ़ा विवाद

महाराष्ट्र में मराठी भाषा को लेकर सख्ती के बीच मुंबई के कुछ ऑटो ड्राइवर बिहार और उत्तर प्रदेश लौटने लगे हैं। वहीं, पुणे में कुछ ड्राइवर RTO की कार्रवाई से बचने के लिए यात्रियों से बातचीत के दौरान सतर्कता बरत रहे हैं।

मराठी से जुड़ा नया नियम क्या है?

सरनाईक ने कहा था कि अगर ड्राइवर को मराठी की कामकाजी जानकारी नहीं है, तो उसका ड्राइवर बैज शुरू में एक महीने के लिए सस्पेंड कर दिया जाएगा। इस महीने की शुरुआत में बदले गए नियमों के मुताबिक, अगर ड्राइवर उस समय में भाषा नहीं सीख पाता है, तो बैज रद्द करने से पहले उसे तीन महीने का और समय दिया जाएगा।

मंत्री ने यह भी कहा था कि जो ड्राइवर चार महीने बाद भी मराठी नहीं सीख पाते हैं, वे असल में यह दिखा रहे होंगे कि उन्हें “भाषा से प्यार नहीं है” और उन्हें मराठी पहचान की जरूरत नहीं है।

इस बीच, सरनाईक ने मंगलवार को आरोप लगाया कि कुछ राजनीतिक नेता मुंबई और ठाणे में “मराठी-हिंदी” विवाद खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं, खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार में होने वाले चुनावों को ध्यान में रखते हुए।

बता दें कि भाषा से जुड़े इस नियम की वजह से दूसरे राज्यों से आए ड्राइवरों के बीच भी तनाव पैदा हो गया है। सोमवार को मुंबई के कांदिवली इलाके में चार ऑटो-रिक्शा ड्राइवरों ने कथित तौर पर मराठी बोलने वाले एक ड्राइवर के साथ मारपीट की, क्योंकि उसने मराठी भाषा की जानकारी की अनिवार्यता के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में शामिल होने से इनकार कर दिया था।

यह घटना उस समय हुई, जब बड़ी संख्या में ऑटो-रिक्शा ड्राइवर MG रोड पर सरकार की मराठी भाषा संबंधी अनिवार्यता के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने दूसरे ऑटो ड्राइवरों से भी अपने वाहन चलाना बंद करने को कहा।

सरकार के इस फैसले को बॉम्बे हाई कोर्ट में भी चुनौती दी गई है। चार कैब ड्राइवरों ने एक जनहित याचिका (PIL) दायर कर ऑटो-रिक्शा, टैक्सी और ऐप आधारित कैब ड्राइवरों के लिए काम चलाने लायक मराठी जानना जरूरी किए जाने वाले नियम पर रोक लगाने की मांग की है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि 12 अगस्त को जारी सरकारी नोटिफिकेशन से लाखों “गरीब और प्रवासी” ड्राइवरों की रोजी-रोटी पर असर पड़ सकता है। उन्होंने कोर्ट से इस नियम को लागू करने पर फिलहाल रोक लगाने की मांग की है।

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Tukaram Mundhe : देश के हर राज्य को तुकाराम मुंढे जैसे IAS अधिकारी की जरूरत क्यों? 21 साल में 25 तबादले, फिर भी नहीं झुके ‘सिंघम’

Tukaram Mundhe : देश के हर राज्य को तुकाराम मुंढे जैसे IAS अधिकारी की जरूरत क्यों? 21 साल में 25 तबादले, फिर भी नहीं झुके 'सिंघम'

भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी तुकाराम मुंढे एक बार फिर अपनी सख्त प्रशासनिक कार्यशैली को लेकर चर्चा में हैं। महाराष्ट्र कैडर के 2005 बैच के IAS अधिकारी मुंढे को नियमों का कड़ाई से पालन कराने और भ्रष्टाचार तथा अनियमितताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई के लिए जाना जाता है। उनके करियर में 21 साल में 25 तबादले भी चर्चा का विषय रहे हैं।

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मई 2026 में महाराष्ट्र के Food and Drug Administration (FDA) Commissioner की जिम्मेदारी संभालने के बाद मुंढे ने मिलावटखोरी और खाद्य सुरक्षा के खिलाफ कार्रवाई तेज की। दूध-पनीर में मिलावट से लेकर खाद्य सुरक्षा नियमों के उल्लंघन, प्रतिबंधित तंबाकू उत्पादों और क्विक-कॉमर्स स्टोर्स तक के खिलाफ जांच और कार्रवाई की गई। कई प्रतिष्ठानों पर छापेमारी हुई, कुछ को बंद किया गया और कई को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए।

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सवाल यह है कि हर राज्य को मुंढे जैसे अधिकारी की जरूरत क्यों है?

भारत जैसे विशाल देश में प्रशासन केवल सरकारी आदेश जारी करने का नाम नहीं है। कानूनों को जमीन पर लागू कराने के लिए ऐसे अधिकारियों की जरूरत होती है जो कानून, जनहित और प्रशासनिक जवाबदेही को प्राथमिकता दें। तुकाराम मुंढे की कार्यशैली इसी सवाल को सामने लाती है। खाद्य और दवा जैसी सीधे लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ी व्यवस्था में अगर मिलावट या नियमों का उल्लंघन होता है तो उसका असर आम आदमी पर पड़ता है। ऐसे में अधिकारी की जिम्मेदारी केवल फाइलों तक सीमित नहीं रह सकती।

 

मुंढे का कहना है कि जब तक राज्य में लोगों को सुरक्षित भोजन और दवाएं सुनिश्चित नहीं हो जातीं, तब तक वह कार्रवाई से पीछे नहीं हटेंगे। हालांकि, उनकी सख्त कार्रवाई को लेकर सवाल भी उठे हैं। बॉम्बे हाई कोर्ट ने उन्हें ‘मच्छर मारने के लिए तलवार का इस्तेमाल’ करने जैसी अति से बचने की चेतावनी दी थी। इसके बावजूद उनकी कार्रवाई को कई लोगों ने सराहा है।

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गरीब किसान परिवार से निकले IAS अधिकारी

तुकाराम मुंढे का सफर भी उनकी प्रशासनिक सोच को समझने में महत्वपूर्ण है। उनका जन्म महाराष्ट्र के बीड जिले के एक गरीब कृषि परिवार में हुआ। मराठवाड़ा के सूखा प्रभावित इलाके में उन्होंने बचपन से ही खेती की मुश्किलें, पानी की कमी और आर्थिक परेशानियां देखीं।

 

वह अपने परिवार के खेत में काम करते थे और माता-पिता के साथ साप्ताहिक बाजार में सब्जियां बेचते थे। फसलों में पानी देने के लिए उन्हें रात में करीब 2 बजे उठना पड़ता था। मिट्टी के घर में पले-बढ़े मुंढे ने बारिश पर निर्भर खेती और पानी की कमी का असर करीब से देखा। वह स्थानीय जिला परिषद स्कूल तक नंगे पैर जाते थे। इन्हीं अनुभवों ने उन्हें प्रशासनिक सेवा में जाने के लिए प्रेरित किया। उनका कहना है कि वह व्यवस्था का हिस्सा बनने के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था को बदलने के लिए उसमें शामिल हुए।

 

बिना कोचिंग के UPSC में हासिल की 20वीं रैंक

मुंढे ने बिना किसी बड़े कोचिंग संस्थान या पारिवारिक प्रशासनिक पृष्ठभूमि के 2005 में UPSC परीक्षा पास की और देशभर में 20वीं रैंक हासिल की। इसके बाद उन्हें महाराष्ट्र कैडर आवंटित हुआ। उन्होंने 1996 में औरंगाबाद के Government College of Arts and Science से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद 1998 में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाड़ा विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में एमए किया। सिविल सेवा में आने के बाद भी उन्होंने वित्तीय नीति, राजस्व पूर्वानुमान, वित्तीय बाजार नियमन, मैक्रोइकोनॉमिक मैनेजमेंट और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में अध्ययन और प्रशिक्षण जारी रखा।

 

21 साल की नौकरी में 25 तबादले

 

तुकाराम मुंढे के करियर की सबसे चर्चित बातों में उनके तबादले शामिल हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, 21 साल की सेवा में उनका 25 बार तबादला हो चुका है। कई पदों पर वह निर्धारित पूर्ण कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाए। एक IAS अधिकारी का सामान्य कार्यकाल किसी पद पर करीब तीन साल माना जाता है, जबकि मुंढे का करियर बार-बार होने वाले तबादलों के लिए चर्चा में रहा है। कुछ मौकों पर उन्हें बिना महत्वपूर्ण पोस्टिंग के भी रखा गया। फिर भी उनके प्रशासनिक काम को कई पुरस्कार और सम्मान मिले।

 

पानी से लेकर ट्रैफिक मैनेजमेंट तक काम

 

मुंढे को जल संरक्षण, शहरी प्रशासन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, परिवहन और सामाजिक समावेशन के क्षेत्र में काम के लिए पहचान मिली है। उन्हें 2015-16 में महाराष्ट्र सरकार का Best Collector Award दिया गया। सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण के क्षेत्र में भी उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला। जल संरक्षण के काम के कारण उन्हें ‘वॉटरमैन ऑफ महाराष्ट्र’ भी कहा गया। नवी मुंबई नगर निगम में उनके कार्यकाल के दौरान ई-टॉयलेट और भूकंपीय सुरक्षा से जुड़े कार्यों को SKOCH Order of Merit मिला।

 

2017 में उन्हें Best Integrated Traffic Management System के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। आखिर क्यों जरूरी हैं ऐसे अधिकारी?

 

तुकाराम मुंढे की कहानी सिर्फ एक अधिकारी के तबादलों या सख्त कार्रवाई की कहानी नहीं है। यह उस सवाल से भी जुड़ी है कि क्या प्रशासन में ऐसे अधिकारियों की जरूरत है जो दबाव के बावजूद कानून और जनहित को प्राथमिकता दें?

 

लोकतांत्रिक व्यवस्था में अधिकारी की सख्ती के साथ संवेदनशीलता और कानून के दायरे में रहना भी जरूरी है। लेकिन दूसरी तरफ, खाद्य सुरक्षा, मिलावट, अवैध कारोबार और जनस्वास्थ्य जैसे मामलों में कार्रवाई न होने का खामियाजा सीधे आम लोगों को भुगतना पड़ सकता है।

 

इसीलिए मुंढे की कार्यशैली देश के सामने एक बड़ा सवाल रखती है- क्या हर राज्य को ऐसे अधिकारियों की जरूरत है, जो व्यवस्था में रहकर व्यवस्था को बेहतर बनाने की कोशिश करें? शायद इसी वजह से, तबादलों और विवादों के बावजूद तुकाराम मुंढे का नाम आज भी सख्त और सक्रिय प्रशासन की बहस में बार-बार सामने आता है।

Mehul Choksi: भारी कैश के साथ मेहुल चोकसी के वकील विजय अग्रवाल लंदन में हिरासत में, भगोड़ा हीरा कारोबारी कब आएगा भारत?

Mehul Choksi Lawyer Detained: लंदन में भारतीय आपराधिक मामलों के चर्चित वकील और भारत के भगोड़े हीरा कारोबारी मेहुल चोकसी का केस लड़ने वाले विजय अग्रवाल को ब्रिटिश इमिग्रेशन अधिकारियों ने हिरासत में ले लिया है। ब्रिटिश मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, अग्रवाल पर ब्रिटेन में इमिग्रेशन और वर्क परमिट से जुड़े नियमों के उल्लंघन का आरोप है। विजय अग्रवाल भगोड़े हीरा कारोबारी मेहुल चोकसी के वकील के तौर पर खास तौर पर चर्चित रहे हैं।

रिपोर्टों के अनुसार, उन्हें कथित तौर पर तब हिरासत में लिया गया जब UK इमिग्रेशन अधिकारियों ने लंदन के मेफेयर इलाके में एक प्रॉपर्टी की जांच की। बताया जा रहा है कि यह कार्रवाई मकान मालिक की शिकायत के बाद की गई। इसी जांच के दौरान विजय अग्रवाल को हिरासत में लिया गया। विवेक अग्रवाल ने भारत में कई हाई-प्रोफाइल कॉर्पोरेट क्राइम और फाइनेंशियल फ्रॉड केस संभाले हैं।

बिना जरूरी अनुमति काम करने का आरोप

रिपोर्टों में दावा किया गया है कि ब्रिटिश अधिकारियों को संदेह था कि अग्रवाल ब्रिटेन में आवश्यक वर्क परमिट या अन्य जरूरी इमिग्रेशन परमिशन के बिना पेशेवर गतिविधियां कर रहे थे। इमिग्रेशन अधिकारियों की कार्रवाई के दौरान मेफेयर की इस प्रॉपर्टी में बड़ी मात्रा में कैश भी मिलने की बात सामने आई है। रिपोर्टों के मुताबिक, कैश के स्रोत की भी जांच की जा रही है। प्रॉपर्टी की जांच के समय अग्रवाल की फर्म से जुड़े कई जूनियर वकील भी कथित तौर पर वहां मौजूद थे। हालांकि, सामने आई रिपोर्टों में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि हिरासत में लिए जाने के बाद ब्रिटिश अधिकारियों ने आगे क्या कार्रवाई की।

मेहुल चोकसी के प्रमुख वकील रहे हैं अग्रवाल

विजय अग्रवाल का नाम भारत के सबसे चर्चित वित्तीय धोखाधड़ी मामलों में से एक पंजाब नेशनल बैंक (PNB) घोटाले के आरोपी भगोड़े मेहुल चोकसी की कानूनी पैरवी से जुड़ा रहा है। चोकसी भारत में कथित PNB धोखाधड़ी मामले में वांछित है। वह भारत से बाहर रह रहा है। अग्रवाल ने विभिन्न देशों में चल रही कानूनी कार्यवाहियों में चोकसी का प्रतिनिधित्व किया है। उन्होंने बॉम्बे हाई कोर्ट में भी चोकसी की ओर से पैरवी की है। बेल्जियम में चोकसी की गिरफ्तारी के बाद भी अग्रवाल उसके कानूनी बचाव से जुड़े रहे। भारत द्वारा चोकसी को वापस लाने की कोशिशों के खिलाफ भी उन्होंने कानूनी दलीलें पेश की हैं।

प्रत्यर्पण के खिलाफ दिए थे ये तर्क

चोकसी की भारत वापसी से जुड़े मामलों में अग्रवाल की ओर से मानवाधिकार, जेल की परिस्थितियों और चोकसी की स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों जैसे मुद्दे उठाए गए थे। इन आधारों पर भारत प्रत्यर्पण का विरोध किया गया। चोकसी पर भारत में करीब 13,000 करोड़ रुपये के PNB घोटाले से जुड़े गंभीर आरोप हैं। वह मामले में वांछित आरोपियों में शामिल है।

कई हाई-प्रोफाइल मामलों में कर चुके हैं पैरवी

विजय अग्रवाल सिर्फ मेहुल चोकसी के मामले के कारण ही चर्चित नहीं हैं। बल्कि उनका कानूनी करियर भारत के कई बड़े कॉरपोरेट क्राइम और वित्तीय धोखाधड़ी मामलों से जुड़ा रहा है। उन्होंने PNB बैंक घोटाले से जुड़े मामलों में बचाव पक्ष की पैरवी की है। इसके अलावा उनका नाम 2G स्पेक्ट्रम मामले से जुड़े कानूनी मामलों में भी सामने आया है।

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फिलहाल लंदन में उनकी हिरासत से जुड़े आरोपों की जांच ब्रिटिश अधिकारियों की कार्रवाई पर निर्भर है। वर्क परमिट उल्लंघन और बरामद कथित कैश से जुड़े दावों की आधिकारिक पुष्टि और जांच के नतीजे आने के बाद ही पूरे मामले की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

‘मच्छर को तलवार से मारने की कोशिश’… Amazon के वेयरहाउस पर कार्रवाई को लेकर हाई कोर्ट ने FDA को फटकारा

बॉम्बे हाई कोर्ट ने शुक्रवार को महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) को अमेजन रिटेल इंडिया के एक वेयरहाउस के खिलाफ की गई कार्रवाई को लेकर फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि नियम लागू करने के नाम पर एजेंसी “मच्छर को तलवार से मारने” जैसा कदम उठा रही है। पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवींद्र घुगे और न्यायमूर्ति गौतम अंखाड की पीठ ने नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के लिए एफडीए की तारीफ की। हालांकि, कोर्ट ने यह सवाल भी उठाया कि क्या ऐसे मामलों में किसी व्यावसायिक प्रतिष्ठान को पूरी तरह बंद करना सही तरीका है। कोर्ट ने कहा कि नियमों का पालन कराना जरूरी है, लेकिन कार्रवाई मामले की गंभीरता के हिसाब से होनी चाहिए।

हाई कोर्ट ने एफडीए से कही ये बात

कोर्ट ने खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) को कार्रवाई करते समय ज्यादा व्यवस्थित और संतुलित तरीका अपनाने की सलाह दी। मई में आईएएस अधिकारी तुकाराम मुंडे के एफडीए कमिश्नर बनने के बाद से यह विभाग लगातार चर्चा में है। उनके कार्यभार संभालने के बाद विभाग ने कई खाद्य प्रतिष्ठानों पर छापेमारी की है, जिनमें कई मशहूर रेस्टोरेंट भी शामिल हैं। सुनवाई के दौरान बेंच ने एफडीए की कार्रवाई पर टिप्पणी करते हुए कहा, “नीति को सख्ती से लागू करने के चक्कर में आप मच्छर को तलवार से मारने की कोशिश कर रहे हैं।”

यह मामला अमेजन रिटेल इंडिया की याचिका के बाद कोर्ट पहुंचा। एफडीए ने भिवंडी में अमेजन के वेयरहाउस के खिलाफ कार्रवाई की थी। एजेंसी का आरोप था कि जिन खाद्य उत्पादों की एक्सपायरी हो चुकी थी और जिन्हें नष्ट किया जाना था, उन्हें दोबारा बाजार में भेजा जा रहा था। अमेजन की ओर से पेश वरिष्ठ वकील वेंकटेश धोंड ने कोर्ट को बताया कि एफडीए के अधिकारियों ने 24 जून को वेयरहाउस का निरीक्षण किया था। इसके अगले ही दिन अधिकारियों ने बिना कोई ‘सुधार नोटिस’ जारी किए वेयरहाउस का लाइसेंस निलंबित कर दिया।

अपील के दौरान लाइसेंस रद्द करने पर कोर्ट ने उठाए सवाल

अमेजन के वकील वेंकटेश धोंड ने आगे बताया कि कंपनी ने वेयरहाउस का लाइसेंस निलंबित किए जाने के खिलाफ अपील दायर की थी। लेकिन अपील पर सुनवाई चल ही रही थी कि एफडीए ने 1 जुलाई को अमेजन को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया। इसके बाद एजेंसी ने वेयरहाउस का लाइसेंस रद्द कर दिया। हाई कोर्ट ने एफडीए की इस कार्रवाई की वैधता पर सवाल उठाया। जजों ने कहा, “जब मामला अपील में चल रहा था, तब लाइसेंस रद्द करने का आदेश कैसे दिया जा सकता है? कानून साफ है कि अपील की अवधि के दौरान इस तरह की कार्रवाई नहीं की जा सकती।” रिपोर्ट के मुताबिक, बेंच ने एफडीए को यह भी याद दिलाया कि नियमों को लागू करते समय तय कानूनी प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि सख्त कार्रवाई करने के साथ-साथ कानूनी नियमों और प्रक्रिया का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।

हाई कोर्ट ने कहा- नियमों का पालन करें 

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने एफडीए की कार्रवाई पर फिर नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा, “अपनी नीति को सख्ती से लागू करने के चक्कर में आप मच्छर को तलवार से मारने की कोशिश कर रहे हैं। तय कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।” एफडीए की ओर से सरकारी वकील नेहा भिड़े ने कोर्ट से अपना पक्ष रखने के लिए हलफनामा दाखिल करने का समय मांगा। पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, हाई कोर्ट अब इस मामले की अगली सुनवाई 10 अगस्त को करेगा।

Tarun Tejpal: यौन उत्पीड़न मामले में पत्रकार तरुण तेजपाल को 10 साल की जेल की सजा, Tehelkaके पूर्व संपादक का आया पहला बयान

Tarun Tejpal: बॉम्बे हाई कोर्ट ने ‘तहलका’ मैगजीन के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल को 2013 में अपनी एक सहकर्मी से दुष्कर्म का दोषी ठहराते हुए उसे 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने गोवा की एक सत्र अदालत द्वारा पांच साल पहले उसे बरी करने के फैसले को भी रद्द कर दिया। हाई कोर्ट की गोवा पीठ की जस्टिस नीला गोखले और जस्टिस अमित जामसांडेकर ने पहले तरुण तेजपाल को दो सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया था। लेकिन उनके वकीलों के अनुरोध पर अदालत ने यह अवधि बढ़ाकर चार सप्ताह कर दी।

अदालत ने न्यूनतम सजा सुनाते हुए कहा कि यह घटना 13 वर्ष पहले हुई थी। तब से तेजपाल ने कोई अन्य अपराध नहीं किया है। अदालत ने यह भी कहा, “संभव है कि पीड़िता और तेजपाल, दोनों अब अपने-अपने जीवन में आगे बढ़ चुके हों।” हाई कोर्ट ने तेजपाल पर 10,21,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया। अदालत ने निर्देश दिया कि यह पूरी राशि पीड़िता को दी जाएगी। पीठ ने कहा, “यौन उत्पीड़न की पीड़िता को जुर्माने की पूरी राशि सौंपी जाएगी।”

तेजपाल ने खुद को बताया ‘राजनीतिक प्रताड़ना का शिकार’

सुनवाई के दौरान तरूण तेजपाल ने खुद को राजनीतिक प्रताड़ना का शिकार बताया। दो बेटियों का पिता होने का हवाला देते हुए पूर्व संपादक ने अदालत से नरमी बरतने की अपील की। वहीं, गोवा सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अधिकतम सजा की मांग करते हुए कहा कि इससे यह स्पष्ट संदेश जाएगा कि नहीं का मतलब नहीं (शारीरिक संबंध के लिए सहमति नहीं देना) होता है। पीठ ने कहा, “हम निचली अदालत के बरी करने के आदेश को निरस्त करते हैं। प्रतिवादी (तरुण तेजपाल) को दोषी करार देते हैं।” हाई कोर्ट के फैसले के बाद अदालत परिसर के बाहर पयत्रकारों से बातचीत में तेजपाल ने कहा कि वह इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे।

बेटियों का दिया हवाला

अदालत ने तेजपाल को भारतीय दंड संहिता (भादसं) की धारा 376(2)(f) (संरक्षक या विश्वास अथवा प्राधिकार की स्थिति में रहने वाले व्यक्ति द्वारा महिला से दुष्कर्म), धारा 354(a) (यौन उत्पीड़न) और धारा 354(b) (महिला को निर्वस्त्र करने के इरादे से उसके खिलाफ आपराधिक बल प्रयोग) के तहत दोषी करार दिया है। अदालत में मौजूद तेजपाल ने खुद को राजनीतिक प्रताड़ना का शिकार बताते हुए नरमी बरतने का अनुरोध किया। तेजपाल ने यह भी कहा कि वह दो बेटियों का पिता है।

उसने अदालत में कहा, “मैं 62 वर्ष का हूं। मेरी दो बेटियां हैं और मेरी पत्नी भी है। मैं राजनीतिक प्रतिशोध की कार्रवाई का शिकार हूं। मेरे वकीलों ने भी मुझसे कहा है कि मैं अदालत से नरमी बरतने की गुजारिश करूं।” तरुण तेजपाल के वकील आबाद पोंडा ने न्यूनतम सजा देने का अनुरोध करते हुए अदालत से यह भी आग्रह किया था कि सजा और दोषसिद्धि पर कम से कम 10 सप्ताह के लिए रोक लगाई जाए, ताकि सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने का समय मिल सके।

सुप्रीम कोर्ट जाएंगे तेजपाल

बाद में पत्रकारों से बातचीत में तेजपाल ने कहा कि हम इस आदेश के खिलाफ अपील करेंगे। हमारा मानना है कि यह फैसला गलत है। हम इसके खिलाफ उच्चतम न्यायालय का रुख करेंगे। न्यूज एजेंसी ANI के मुताबिक, तेजपाल ने कहा, “हम निश्चित रूप से सुप्रीम कोर्ट जाएंगे। वे राजनीतिक बदले की भावना और ‘तहलका’ के काम की वजह से मेरे पीछे पड़े हैं। हमने ट्रायल कोर्ट में 7.5 साल तक केस लड़ा और बरी हो गए। जो लोग उनके साथ हैं, वे बरी हो जाते हैं, लेकिन वे उनके पीछे पड़ते हैं जिन्होंने उनके खिलाफ लिखा है।”

Tehelka के पूर्व एडिटर इन चीफ तेजपाल ने आगे कहा, “उमर खालिद और शरजील इमाम कई सालों से जेल में हैं। ‘तहलका’ की रिपोर्टिंग से शायद उन्हें कुछ राजनीतिक नुकसान हुआ हो या उनके निजी हितों को चोट पहुंची हो। वे पिछले 13 सालों से बदले की भावना से मेरे पीछे पड़े हैं। मुझे न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है कि ऐसे जज होंगे जो सच देखेंगे। हम सबूत सबके सामने रखेंगे।”

क्या है पूरा मामला?

यह मामला नवंबर 2013 में गोवा में आयोजित ‘थिंकफेस्ट’ कार्यक्रम के दौरान एक होटल की लिफ्ट में तेजपाल की एक पूर्व जूनियर महिला सहकर्मी के कथित यौन उत्पीड़न और दुष्कर्म से संबंधित है। निचली अदालत ने 2021 में तेजपाल को इस मामले में बरी कर दिया था, जिसके खिलाफ गोवा सरकार ने बॉम्बे हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। तेजपाल के वकील पोंडा ने कहा, “वह मुकदमे की शुरुआत से ही जमानत पर हैं और उन्होंने कभी जमानत की किसी शर्त का उल्लंघन नहीं किया है। वह वरिष्ठ नागरिक हैं।”

हालांकि, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि पीड़िता के प्रति तेजपाल के बेहद निर्लज्ज रवैये और कथित घटना के बाद उसके सामान्य आचरण को आधार बनाकर आरोपों को कमजोर साबित करने की कोशिश को देखते हुए उन्हें आजीवन कारावास की अधिकतम सजा दी जानी चाहिए। मेहता ने कहा, “दोषी (तेजपाल) पीड़िता पर अधिकार जताने और प्रभाव रखने की स्थिति में था। पीड़िता केवल उसकी सहकर्मी ही नहीं, बल्कि उसकी बेटी की मित्र भी थी। दोषी ने अपने कृत्य पर कोई पछतावा प्रदर्शित नहीं किया है।”

उन्होंने कहा कि तेजपाल ने अगले दिन भी अपराध दोहराया और मुकदमे के दौरान तथा अब हाई कोर्ट में भी यह कहकर पीड़िता के आचरण पर सवाल उठाया कि घटना के बाद वह सामान्य व्यवहार कर रही थी। राज्य सरकार की अपील पर सुनवाई के दौरान मेहता ने दलील दी थी कि ट्रायल कोर्ट ने यह मानकर गंभीर गलती की कि यौन उत्पीड़न की पीड़िता का व्यवहार एक तय धारणा के अनुसार होना चाहिए और उसी आधार पर शिकायतकर्ता के आचरण का आकलन किया।