Yes Bank News: यस बैंक ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर तोड़ी चुप्पी, शेयर 14% क्रैश होने के बाद कही ये बात

Yes Bank News: प्राइवेट सेक्टर के यस बैंक के शेयरों में गुरुवार, 15 अक्टूबर को भारी गिरावट आई। कारोबार के दौरान स्टॉक करीब 14% तक टूट गया। मामला 8,415 करोड़ रुपये के AT-1 बॉन्ड से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने इन बॉन्ड को राइट ऑफ करने का फैसला रद्द कर दिया है। इसके बाद बैंक ने कहा कि वह कोर्ट के फैसले और उसके असर की जांच कर रहा है।

बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) ने भी शेयर में गिरावट को लेकर बैंक से जवाब मांगा था। इसके बाद यस बैंक ने कहा कि वह फैसले की पूरी कॉपी हासिल कर रहा है। उसे पढ़ने और उसके असर को समझने के बाद बैंक जरूरत के मुताबिक आगे जानकारी देगा।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने 15 अक्टूबर को यस बैंक के 8,415 करोड़ रुपये के AT-1 बॉन्ड राइट ऑफ करने के फैसले को खारिज कर दिया। कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के 2023 के फैसले को बरकरार रखा। यस बैंक और दूसरे पक्षों की अपील भी खारिज कर दी गई।

कोर्ट के मुताबिक, बैंक के पुनर्गठन की अंतिम योजना में इन बॉन्ड को राइट ऑफ करने का साफ प्रावधान नहीं था। इसलिए बैंक के एडमिनिस्ट्रेशन को ऐसा करने का अधिकार नहीं था।

AT-1 बॉन्ड क्या होते हैं?

AT-1 बॉन्ड बैंकों के लिए पूंजी जुटाने का एक तरीका हैं। बैंक इनसे निवेशकों से पैसा जुटाते हैं और बदले में ब्याज देते हैं। लेकिन इनमें जोखिम भी ज्यादा होता है। बैंक की वित्तीय हालत बहुत खराब होने पर नियमों और शर्तों के तहत इन बॉन्ड की रकम घटाई या पूरी तरह खत्म की जा सकती है।

यस बैंक ने दिसंबर 2016 में 3,000 करोड़ रुपये के AT-1 बॉन्ड जारी किए थे। इसके बाद अक्टूबर 2017 में 5,415 करोड़ रुपये के और बॉन्ड जारी किए गए। इस तरह कुल रकम 8,415 करोड़ रुपये थी।

2020 में क्या हुआ था?

मार्च 2020 में यस बैंक गंभीर वित्तीय संकट में फंस गया था। उस समय केंद्र सरकार ने बैंक पर करीब एक महीने के लिए मोरेटोरियम लगाया था। यानी बैंक से पैसे निकालने पर कुछ समय के लिए पाबंदियां लगाई गई थीं। इसके बाद बैंक के पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू हुई।

इसी दौरान नियुक्त एडमिनिस्ट्रेशन ने AT-1 बॉन्ड को राइट ऑफ कर दिया। इसका मतलब था कि बॉन्डधारकों की निवेश रकम खत्म कर दी गई। बॉन्डधारकों ने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी।

बॉन्डधारक कोर्ट क्यों पहुंचे?

मई 2020 में Axis Trustee Services ने बॉन्डधारकों की ओर से बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की। इसमें बॉन्ड राइट ऑफ करने के फैसले को चुनौती दी गई। वहां बॉन्डधारकों के पक्ष में फैसला आया। मार्च 2023 में यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने भी हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है।

अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यस बैंक इसके कानूनी और वित्तीय असर की समीक्षा कर रहा है। बैंक ने कहा है कि फैसले के अलावा उसके पास ऐसी कोई दूसरी जानकारी नहीं है, जिसका खुलासा करना जरूरी हो।

यस बैंक का स्टॉक 14% क्रैश

यस बैंक का शेयर 14.53% गिरकर 18.12 रुपये पर बंद हुआ। कारोबार के दौरान यह 20% के लोअर सर्किट के साथ 16.96 रुपये तक फिसला था। हालांकि, बाद में थोड़ी रिकवरी हुई।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

दिल्ली, गुजरात और तेलंगाना के चीफ जस्टिस अब होंगे सुप्रीम कोर्ट में जज, केंद्र ने जारी किया तीनों की नियुक्ति का नोटिफिकेशन

नई दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय, गुजरात हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस जस्टिस सुनीता अग्रवाल और तेलंगाना हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जस्टिस अपरेश कुमार सिंह को सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में जज के तौर पर नियुक्त किया गया है। इस संबंध में सोमवार को केंद्र सरकार ने आधिकारिक नोटिफिकेशन जारी किया। यह अधिसूचना न्याय विभाग की तरफ से जारी की गई थी।

राष्ट्रपति डॉ द्रौपदी मुर्मू ने भारत के संविधान के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए ये नियुक्तियां की हैं। इस कदम से शीर्ष अदालत और मजबूत होगा, जिसकी मंजूर संख्या 38 है। इनकी नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा 28 सितंबर को हुई मीटिंग में पदोन्नति की सिफारिश के कुछ दिनों बाद हुई हैं। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के प्रमुख भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत हैं। उन्होंने कॉलेजियम की बैठक में तीनों की पदोन्नति की सिफारिश की थी।

अभी सुप्रीम कोर्ट में 34 जजों की वर्किंग स्ट्रेंथ है, नए जजों के शपथ लेने के बाद इन नियुक्तियों से इसकी प्रभावी स्ट्रेंथ 37 हो जाएगी। सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया समेत जजों की मंजूरी वाली संख्या 38 है। सुप्रीम कोर्ट अमेंडमेंट एक्ट, 2026 के बाद हाल ही में मंजूरी वाली संख्या 34 से बढ़ाई गई थी।

नए नियुक्त जजों के बारे में

जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय : जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय जनवरी 2025 से दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रहे हैं। इससे पहले वे बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रह चुके हैं, और जुलाई 2023 में उन्होंने अपना पद संभाला था। जस्टिस उपाध्याय को 2011 में इलाहाबाद हाई कोर्ट में प्रमोट किया गया था और वे अगस्त 2013 में परमानेंट जज बने थे।

जस्टिस अपरेश कुमार सिंह : जस्टिस अपरेश कुमार सिंह झारखंड, त्रिपुरा और तेलंगाना से बहुत ज्यादा न्यायिक अनुभव लेकर आए हैं। उन्हें जनवरी 2012 में झारखंड हाई कोर्ट का जज प्रमोट किया गया था और जनवरी 2014 में उन्हें परमानेंट जज के तौर पर कन्फर्म किया गया था।

जस्टिस सुनीता अग्रवाल : सुनीता अग्रवाल सुप्रीम कोर्ट में काम करने वाली तीसरी महिला जज होंगी। उन्हें 2011 में इलाहाबाद हाई कोर्ट में पदोन्नत किया गया था और 2013 में वह परमानेंट जज बन गईं। उन्होंने जुलाई 2023 में गुजरात हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस के तौर पर शपथ ली। जस्टिस अग्रवाल ने बेंच में आने से पहले सिविल साइड में प्रैक्टिस की और 1990 में एडवोकेट के तौर पर एनरोल हुईं।

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महाराष्ट्र FDA ने Cipla के दवा गोदाम का लाइसेंस किया रद्द, क्या सोमवार को शेयर में मचेगी भगदड़

महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने नियमों के कथित उल्लंघन को लेकर सिप्ला फार्मा एंड लाइफ साइंसेज लिमिटेड के खिलाफ एक एक्शन लिया है। इसके तहत कंपनी के पुणे के वडकी स्थित कैरिंग एंड फॉरवर्डिंग (C&F) वेयरहाउस का सेल और डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंस रद्द कर दिया गया है। न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, FDA ने शुक्रवार को बयान में कहा कि यह कार्रवाई बॉम्बे हाई कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में नए सिरे से कार्यवाही पूरी करने के बाद की गई है। सिप्ला फार्मा, सिप्ला लिमिटेड की सब्सिडियरी है।

इससे पहले FDA ने 27 अगस्त 2026 को एक कार्रवाई की थी। उस समय विभाग ने रिएक्टिन प्लस टैबलेट की पैकेजिंग, स्टोरेज, डॉक्युमेंटेशन और बाजार से दवा वापस लेने की प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं के चलते गोदाम के खिलाफ एक्शन लिया था। FDA ने तब कहा था कि डॉक्टर की पर्ची पर मिलने वाली इस ‘शेड्यूल एच’ दवा ‘रिएक्टिन प्लस’ की पैकेजिंग पर अनऑथराइज्ड दावे किए गए थे। साथ ही गोदाम में कई कमियां पाई गई थीं।

FDA का नया आदेश 1 अक्टूबर को असिस्टेंट कमिश्नर (ड्रग्स), डिवीजन 3, FDA पुणे ने पास किया। विभाग की ओर से बॉम्बे हाई कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में अपनी पिछली कार्यवाही वापस लेने के बाद यह आदेश जारी किया गया।

Cipla का क्या है कहना

FDA के एक्शन पर एक बयान में सिप्ला ने कहा है कि वह दवाओं की क्वालिटी और मरीजों की सुरक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। कंपनी के मुताबिक, ‘पुणे में हमारे वडकी C&FA को लेकर महाराष्ट्र FDA का फैसला निराशाजनक है। हमारा मानना ​​है कि हमारा पुणे C&FA वेयरहाउस डिस्ट्रीब्यूशन और स्टोरेज प्रोटोकॉल और डिजिटल रिकॉर्ड-कीपिंग स्टैंडर्ड्स के मुताबिक काम करता है।’ कंपनी आदेश की समीक्षा कर रही है और आगे के विकल्पों पर विचार कर रही है।

संशोधित कारण बताओ नोटिस हुआ था जारी

बयान के अनुसार, FDA ने 4 सितंबर को सिप्ला फार्मा एंड लाइफ साइंसेज को संशोधित कारण बताओ नोटिस जारी किया था। सिप्ला ने 11 सितंबर को अपना लिखित जवाब दिया और उसे 21 सितंबर को व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर दिया गया। प्राधिकरण ने नया आदेश जारी करने से पहले कंपनी के जवाब, सुनवाई के दौरान दी गई दलीलों, निरीक्षण के निष्कर्षों, उपलब्ध रिकॉर्ड और लागू कानूनी प्रावधानों पर विचार किया। FDA ने कहा कि इसलिए यह फैसला केवल पिछली कार्रवाई को दोहराना नहीं है, बल्कि अदालत के निर्देशों के अनुरूप पूरी प्रक्रिया नए सिरे से पूरी करने के बाद लिया गया स्वतंत्र नियामकीय निर्णय है।

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FDA की त्योरियां चढ़ने की मुख्य वजह

इस मामले में प्रमुख मुद्दों में से एक है- ‘शेड्यूल एच’ दवा रिएक्टिन प्लस। सिप्ला फार्मा के वडकी गोदाम के निरीक्षण के दौरान FDA ने पाया कि दवा की पैकेजिंग पर इसे दर्द निवारक बताया गया था। सिरदर्द, मांसपेशियों में दर्द, कमर दर्द, जोड़ों के दर्द, मोच, शरीर में दर्द और दांत दर्द जैसी स्थितियों में इसके इस्तेमाल को बढ़ावा देने वाले दावे किए गए थे। FDA का कहना है कि दवा की पैकेजिंग पर एक मानव आकृति भी थी और दवा को मांसपेशियों के दर्द से राहत देने वाली बताया गया था।

विभाग के अनुसार, पैकेज पर किए गए दावे, शब्द और चित्र लागू कानूनी प्रावधानों के अनुरूप नहीं थे और ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 के तहत गलत लेबलिंग का मामला बनता था। FDA ने दवा के मार्केटर के रूप में कंपनी की कानूनी जिम्मेदारियों पर भी विचार किया। इसका कहना है कि केवल मैन्युफैक्चरर की भूमिका का हवाला देकर इन जिम्मेदारियों से बचा नहीं जा सकता। FDA ने दवा का स्टॉक जब्त कर उसे बाजार से वापस लेने का निर्देश दिया था।

विभाग ने स्टोरेज और वेयरहाउस मैनेजमेंट में कई कमियां भी गिनाईं। इनमें निर्धारित फॉर्म-35 इंस्पेक्शन बुक का नहीं होना, पर्याप्त पैलेट या रैक नहीं होने के कारण दवाओं के डिब्बों का सीधे फर्श पर रखा जाना, दवाओं के स्टॉक पर धूल जमा होना और साफ-सफाई में कमी शामिल हैं। FDA ने यह भी पाया कि एक्सपायर हो चुकी दवाओं के लिए अलग से ऐसा कोई निर्धारित स्थान नहीं था, जिस पर स्पष्ट रूप से ‘एक्सपायरी-नॉट फॉर सेल’ लिखा हो। एक्सपायर हो चुकी दवाओं के निपटान यानि डिस्पोजल से जुड़े आवश्यक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर और रिकॉर्ड भी उपलब्ध नहीं थे। रेगुलेटर ने खरीद और बिक्री के चालानों में भी कमियां पाईं। इनमें बिक्री चालानों की डुप्लीकेट कॉपी पर साइन न होना, कंप्यूटराइज्ड या एसएपी रिकॉर्ड और दवा के फिजिकल स्टॉक में अंतर शामिल था।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

दिल्ली में 2 अक्टूबर को CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन होगा या नहीं? जानिए कल का क्या होने वाला है

2 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर अभी तस्वीर साफ नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ होने वाले इस प्रदर्शन के लिए दिल्ली पुलिस ने फिलहाल अनुमति नहीं दी है। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, आयोजकों की ओर से प्रदर्शन की तैयारी की जा रही है, लेकिन जंतर-मंतर पर सभा करने की मंजूरी अभी नहीं मिली है।

यह प्रदर्शन सामाजिक कार्यकर्ताओं और छात्र संगठनों की ओर से बुलाया गया है। प्रदर्शन में चुनाव आयोग के कामकाज और वोटर लिस्ट में होने वाले स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर सवाल उठाए जाएंगे।

पुलिस सूत्रों ने बताया कि जंतर-मंतर पर प्रस्तावित इस प्रदर्शन के लिए अभी तक अनुमति नहीं दी गई है।

बता दें कि यह प्रदर्शन गांधी जयंती यानी 2 अक्टूबर को आयोजित किया जाना है। इस दौरान प्रदर्शन के आयोजकों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

वहीं, प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन के मद्देनजर दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर इलाके की ओर जाने वाली सड़कों पर बैरिकेड्स भी लगा दिए हैं।

बता दें कि आम आदमी पार्टी (AAP) दिल्ली के अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने सोमवार को लोगों से जंतर-मंतर पर हो रहे विरोध प्रदर्शन में शामिल होने की सार्वजनिक अपील की थी। इसके अलावा, कुछ अन्य विपक्षी समूह भी इस प्रदर्शन में शामिल हो सकते हैं या अलग से प्रदर्शन कर सकते हैं।

इस बीच, ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) आंदोलन के संस्थापक अभिजीत दिपके ने 2 अक्टूबर को शाम 4 बजे मुंबई के शिवाजी पार्क में समानांतर “जेल भरो आंदोलन” की घोषणा की है।

दिपके ने पहले कहा था कि मुंबई पुलिस ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ CJP के 2 अक्टूबर को प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन की इजाजत देने से इनकार कर दिया है। इसके बाद, उन्होंने गांधी जयंती के दिन ‘जेल भरो आंदोलन’ शुरू करने का ऐलान किया।

शिवाजी पार्क में प्रदर्शन की इजाजत क्यों नहीं मिली?

हालांकि, मुंबई पुलिस ने साफ किया कि बॉम्बे हाई कोर्ट के 2013 के आदेश को देखते हुए, उन्हें शिवाजी पार्क में सभा के लिए “इजाजत देने का अधिकार नहीं है” और यह इलाका एक “साइलेंस जोन” है। पुलिस ने कहा कि आवेदन करने वाले अजिंक्य शिंदे को सलाह दी गई थी कि वे मुंबई में कोई दूसरी जगह देखें और इजाजत के लिए आवेदन करें, जिस पर उचित रूप से विचार किया जाएगा।

सूत्रों के अनुसार, CJP ने मूल रूप से योजना बनाई थी कि अगर ज्ञानेश कुमार CEC के पद से इस्तीफा नहीं देते हैं, तो 2 अक्टूबर को मुंबई से देशव्यापी विरोध प्रदर्शन शुरू किया जाएगा।

ANI के मुताबिक, 25 सितंबर को दिपके ने कहा था, “अगर ज्ञानेश कुमार कल तक इस्तीफा नहीं देते हैं, तो CJP 2 अक्टूबर को मुंबई से देशव्यापी विरोध प्रदर्शन शुरू करेगा और इसे भारत भर के शहरों तक ले जाएगा। आइए, इस गांधी जयंती पर लोकतंत्र को बचाने का संकल्प लें।”

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सुप्रीम कोर्ट और बॉम्ब हाई कोर्ट में याचिका

नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के मनमाने तरीके से चुनाव आयोग को चलाने के ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के खुलासे के बाद अब मामला अदालत में पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट में एक वकील ने याचिका दायर की है तो दो याचिकाएं बॉम्बे हाई कोर्ट में दर्ज की गई हैं। दोनों अदालतों में दायर याचिकाओं मे एसआईआर की प्रक्रिया को रद्द करने और मतदाताओं के नाम जोड़ने व हटाने के काम में ज्यादा पारदर्शिता लाने का निर्देश देने की अपील की गई है।

महाराष्ट्र हाई कोर्ट में दर्ज दो याचिकाओं में महाराष्ट्र की एसआईआर का विरोध किया गया है। इनमें एसआईआर की संवैधानिक वैधता, प्रक्रिया और लागू करने के तरीके पर सवाल उठाए गए हैं। अखबार की रिपोर्ट के आधार पर याचिकाकर्ताओं का दावा है कि दो चुनाव आयुक्तों की आपत्ति के बावजूद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने एसआईआर से जुड़े कई आदेश जारी किए। दोनों याचिकाओं में इन आदेशों को रद्द करने और चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज आपत्तियों को सार्वजनिक करने की मांग की गई है।

सुप्रीम कोर्ट में भी एक याचिका दायर की गई है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार द्वारा कथित तौर पर दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए फैसलों, जारी दिशा निर्देशों और साफ्टवेयर में किए गए बदलावों को चुनौती दी गई है। याचिका में कहा गया है कि इस तरह की कार्रवाई सामूहिक निर्णय लेने की वैधानिक अनिवार्यता का उल्लंघन करती है। यह याचिका अधिवक्ता चांद कुरैशी के जरिए अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से दायर की गई है। याचिका में अनुरोध किया गया है कि ज्ञानेश कुमार द्वारा कथित तौर पर दोनों चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए फैसलों को असंवैधानिक और अमान्य घोषित किया जाए।

महाराष्ट्र UCC पैनल में विवाद: सार्वजनिक फीडबैक पर मतभेद के बाद जस्टिस आरसी चव्हाण का इस्तीफा, प्रक्रिया पर उठाए सवाल

UCC Panel Shock In Maharashtra: महाराष्ट्र में समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर गठित समिति में अब मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। समिति की दूसरी बैठक के दो दिन बाद बॉम्बे हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस आरसी चव्हाण ने समिति से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने आम लोगों से सुझाव और फीडबैक लेने की प्रक्रिया को लेकर असहमति जताई है। मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि महाराष्ट्र सरकार ने यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) के लिए नियम और सिफारिशें तैयार करने के लिए जुलाई 2026 में सात सदस्यीय समिति बनाई थी।

खास बात यह है कि इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की रिटायर्ड जज जस्टिस रंजना देसाई कर रही हैं। इस समिति को अपनी रिपोर्ट देने के लिए छह महीने का समय दिया गया है। जस्टिस चव्हाण ने कमिटी की ऑनलाइन मीटिंग के कुछ घंटे बाद 19 सितंबर को अपना इस्तीफा भेज दिया। राज्य सरकार ने सोमवार 21 सितंबर को इसे मंजूरी दे दी।

क्या है पूरा विवाद?

‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस आरसी चव्हाण ने इस्तीफे के पीछे मुख्य रूप से जनता से फीडबैक लेने की प्रक्रिया को लेकर मतभेद का हवाला दिया है। उनका कहना है कि समिति को पहले क्वेश्चनेयर (Questionnaire) को अंतिम रूप देना था। लेकिन समिति की अध्यक्ष जस्टिस रंजना देसाई की ओर से कथित तौर पर क्वेश्चनेयर पहले ही जारी कर दी गई। चव्हाण ने समिति की बैठक में एक ऐसे व्यक्ति की कथित मौजूदगी और भूमिका पर भी सवाल उठाया, जो समिति का सदस्य नहीं था। रिपोर्ट के अनुसार, चव्हाण ने इसके बाद 19 सितंबर को अपना इस्तीफा दिया।

समिति को भेजे अपने ईमेल में जस्टिस चव्हाण ने कहा कि मीटिंग के एजेंडा में से एक UCC पर लोगों की राय जानने के लिए क्वेश्चनेयर (questionnaire) को अंतिम रूप देना था। उन्होंने कहा, “तीन सदस्यों ने अपनी बात रखने की कोशिश की, जैसे कि जवाब देने वालों को सिर्फ ‘हां’ या ‘ना’ में जवाब देना हो, या फिर सदस्य डॉ. सुवर्णा रावल की देखरेख में प्रोफेसरों से क्वेश्चनेयर की जल्द और पेशेवर तरीके से जांच करवाई जाए।”

उन्होंने आगे लिखा, “माननीय चेयरपर्सन पहले ही अपने द्वारा तैयार की गई क्वेश्चनेयर सभी को भेज चुकी थीं और कहा था कि वेबसाइट तैयार होने पर इसे अपलोड कर दिया जाएगा। इस तरह, आज की मीटिंग के एजेंडा का तीसरा और आखिरी मुद्दा पूरा हो गया। इसलिए, समय और इंटरनेट बचाने के लिए मैंने लॉग-आउट कर दिया।”

सात सदस्यीय समिति में कौन-कौन?

महाराष्ट्र सरकार ने UCC का मसौदा तैयार करने और उसके क्रियान्वयन से जुड़ी सिफारिशें देने के लिए सात सदस्यीय समिति बनाई है। चव्हाण के इस्तीफे के बाद समिति की संरचना में बदलाव आया है। इसमें जस्टिस रंजना देसाई के अलावा ये लोग भी शामिल हैं:-

  • जस्टिस आरसी चव्हाण- पूर्व बॉम्बे हाई कोर्ट जज
  • जस्टिस एसजी मेहरे- पूर्व हाई कोर्ट जज
  • डीके जैन- महाराष्ट्र के पूर्व मुख्य सचिव
  • वीरेंद्र सराफ- पूर्व एडवोकेट जनरल
  • रमेश पतांगे- संवैधानिक विशेषज्ञ
  • सुवर्णा रावल- शिक्षाविद

UCC पर महाराष्ट्र सरकार की क्या प्लान है?

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने 14 सितंबर को कहा था कि समिति अपनी रिपोर्ट और सिफारिशें सौंपने के बाद सरकार UCC को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ेगी। सरकार ने संकेत दिया है कि UCC से जुड़ा विधेयक विधानसभा के नागपुर में होने वाले शीतकालीन सत्र में पेश किया जा सकता है। समिति को अपनी सिफारिशें तैयार करने के लिए छह महीने का समय दिया गया है।

जनता की राय लेने की प्रक्रिया क्यों अहम?

UCC का उद्देश्य विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े मामलों के लिए एक समान कानूनी ढांचा तैयार करना है। ऐसे में समिति द्वारा आम लोगों और संबंधित पक्षों से सुझाव लेने की प्रक्रिया उसके मसौदे का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसी प्रक्रिया को लेकर समिति के भीतर मतभेद सामने आने से महाराष्ट्र की UCC प्रक्रिया पर अब ध्यान और बढ़ गया है। हालांकि, इस्तीफा समिति की अंतिम सिफारिशों या प्रस्तावित UCC के अंतिम स्वरूप का संकेत नहीं है। ये चीजें समिति की आगे की कार्यवाही और रिपोर्ट से स्पष्ट होंगी।

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Disha Salian Death Case: आदित्य ठाकरे से लेकर डिनो मोरिया और रिया चक्रवर्ती तक…दिशा सालियन मौत मामले में CBI की FIR में इन दिग्गजों के नाम

Disha Salian Death Case: केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने दिवंगत अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की पूर्व मैनेजर दिशा सालियान की मौत के मामले में FIR दर्ज की है। इस महीने की शुरुआत में बॉम्बे हाई कोर्ट ने सालियान की मौत की जांच सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI) से कराने का आदेश दिया था। कोर्ट ने छह साल तक FIR दर्ज नहीं करने के लिए मुंबई पुलिस को फटकार लगाते हुए कहा था कि उसकी जांच से जवाब मिलने के बजाय और सवाल खड़े होते हैं। पीठ ने छह साल तक मामले को केवल दुर्घटनावश मौत के रूप में देखने के लिए पुलिस की आलोचना की थी। जांच में स्पष्ट विसंगतियों की ओर इशारा किया था।

कैसे हुई थी सालियान की मौत?

राजपूत की मैनेजर के रूप में कुछ समय काम कर चुकीं दिशा सालियान की 8 जून 2020 को मुंबई के मलाड इलाके में एक आवासीय इमारत की 12वीं मंजिल से गिरने के बाद मौत हो गई थी। मुंबई पुलिस ने मामले में दुर्घटनावश मौत की रिपोर्ट (ADR) दर्ज की थी। राजपूत एक सप्ताह बाद 14 जून 2020 को अपने अपार्टमेंट में मृत पाए गए थे। इसके बाद दोनों की मौत की घटनाओं के बीच संभावित संबंध को लेकर अटकलें लगने लगी थीं।

राजपूत की मौत के बाद मचे हंगामे के बीच महाराष्ट्र सरकार ने मामले की सीबीआई जांच का आदेश दिया था। केंद्रीय जांच एजेंसी ने बाद में ‘क्लोजर रिपोर्ट’ दाखिल करते हुए कहा था कि राजपूत की मौत आत्महत्या से हुई थी। हालांकि, संबंधित अदालत ने अभी इस रिपोर्ट पर सुनवाई नहीं की है।

CBI की FIR में इन दिग्गजों के नाम

अधिकारियों ने बताया कि दिशा सालियन की मौत के मामले में दर्ज FIR में शिवसेना (UBT) विधायक आदित्य ठाकरे, अभिनेता डिनो मोरिया और रिया चक्रवर्ती के नाम शामिल हैं। यह घटनाक्रम बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा केंद्रीय एजेंसी को मामले की जांच अपने हाथ में लेने का आदेश देने के लगभग दो सप्ताह बाद हुआ है। हत्या, गैंगरेप, आपराधिक साजिश, सबूत मिटाने और गलत जानकारी देने से संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है।

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के मुताबिक, इस FIR में कई दिग्गजों के नाम हैं जिनकी भूमिका की जांच की जानी है। इनमें शिवसेना (UBT) नेता आदित्य ठाकरे के अलावा रोहन रॉय, एक्टर डिनो मोरिया और सूरज पंचोली, आदित्य के बॉडीगार्ड, रिया चक्रवर्ती, शोविक चक्रवर्ती, पूर्व पुलिस अधिकारी सचिन वाजे, मुंबई पुलिस के पूर्व कमिश्नर परमबीर सिंह, DCP विशाल ठाकुर और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के नाम शामिल हैं। दस्तावेज में राज्य के पूर्व गृह मंत्री अनिल देशमुख, कई पुलिस अधिकारियों, फोरेंसिक अधिकारियों, डॉक्टरों और अन्य लोगों के नाम भी शामिल हैं।

उद्धव ठाकरे का जिक्र

NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, CBI की FIR में कहा गया है, “तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे (आदित्य ठाकरे के पिता) और अन्य लोगों ने साजिश और उसके बाद मामले को दबाने में अहम भूमिका निभाई। संबंधित सरकारी कर्मचारियों और पुलिस अधिकारियों की भी जांच की जानी चाहिए। उन पर केस के कागजात, फाइलें और अन्य सार्वजनिक रिकॉर्ड नष्ट करने या छिपाने, आधिकारिक रिकॉर्ड में हेरफेर करने और गैर-कानूनी कामों एवं अपराधियों को बचाने के लिए सार्वजनिक धन, मैनपावर और पुलिस मशीनरी का गलत इस्तेमाल करने का आरोप है।”

CBI की FIR के अनुसार, आदित्य ठाकरे, डिनो मोरिया, सूरज पंचोली, रिया चक्रवर्ती और पोस्टमार्टम में देरी के लिए जिम्मेदार डॉक्टर एवं कर्मचारी उन लोगों में शामिल हैं जिनकी भूमिका की जांच जरूरी है। इससे पहले, केंद्रीय जांच एजेंसी ने जांच में मदद के लिए पुलिस को पत्र लिखकर दिशा सालियन की मौत से जुड़े सभी दस्तावेज और रिकॉर्ड मांगे थे।

पिता ने की थी CBI जांच की अपील

पिछले हफ्ते सालियन के पिता सतीश सालियन ने अपनी बेटी की मौत की जांच के सिलसिले में CBI के सामने अपना बयान दर्ज कराया था। अपने बयान में सतीश सालियन ने आरोप लगाया कि महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे, उनके बेटे और शिवसेना (UBT) नेता आदित्य ठाकरे समेत कई लोगों ने कथित साजिश और उसके बाद मामले को दबाने में अहम भूमिका निभाई।

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बॉम्बे हाई कोर्ट ने 2 सितंबर को CBI जांच का आदेश दिशा सालियन के पिता की याचिका पर दिया। उन्होंने आरोप लगाया था कि जून 2020 में अपनी बेटी की मौत की जांच में मुंबई पुलिस ने लापरवाही बरती थी। कोर्ट ने छह साल तक FIR दर्ज न करने के लिए मुंबई पुलिस को फटकार लगाई। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि मौत के छह साल बाद भी सालियन के परिवार को पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और ADR की कॉपी नहीं दी गई थी।

Disha Salian Death: दिशा सालियान केस में आया अपडेट, CBI ने सुशांत सिंह राजपूत की दिवंगत मैनेजर के मामले में FIR दर्ज की

Disha Salian Death: सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI) ने सोमवार को दिवंगत एक्टर सुशांत सिंह राजपूत की पूर्व मैनेजर दिशा सालियन की मौत के मामले में FIR दर्ज की। यह कदम बॉम्बे हाई कोर्ट के उस आदेश के बाद उठाया गया जिसमें मामले की गहन जांच के लिए कहा गया था।

सालियन 8 जून 2020 को मृत पाई गई थीं। उनकी मौत मुंबई के बांद्रा में स्थित सुशांत सिंह राजपूत के घर पर उनके मृत पाए जाने से कुछ दिन पहले हुई थी। उनकी मौत को पहले ‘एक्सीडेंटल डेथ रिपोर्ट’ (ADR) के तौर पर दर्ज किया गया था।

कोर्ट ने CBI जांच का आदेश दिया

यह घटनाक्रम बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा CBI को FIR दर्ज करने और सालियन की मौत से जुड़ी परिस्थितियों की जांच करने का आदेश दिए जाने के बाद हुआ है। इससे पहले हुई सुनवाई के दौरान जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की डिवीजन बेंच ने इस बात पर चिंता जताई थी कि सालियन के परिवार के हत्या के आरोपों के बावजूद केवल ADR ही दर्ज किया गया था।

कोर्ट ने यह भी गौर किया था कि मौत के पांच साल बाद भी सालियन के परिवार को पोस्टमार्टम रिपोर्ट और ADR की कॉपी नहीं दी गई थी। कोर्ट के आदेश के बाद सालियन के पिता सतीश सालियन ने कहा था कि उन्होंने जांच अधिकारियों को अपनी बेटी की मौत से जुड़ी परिस्थितियों की जानकारी दे दी है और उन्हें भरोसा है कि जल्द ही कार्रवाई शुरू हो जाएगी।

परिवार ने जानकारी दी

शुक्रवार को ANI से बात करते हुए सतीश सालियन ने कहा कि उन्होंने जांचकर्ताओं को अपनी बेटी की मौत से जुड़ी घटनाओं के बारे में जो कुछ भी पता था वह बता दिया है और उन कई लोगों के नाम भी दिए हैं, जिनसे वे चाहते हैं कि अधिकारी पूछताछ करें।

उन्होंने कहा, “मैंने तथ्य वैसे ही बताए जैसे वे थे। मैंने उन्हें अपनी बेटी के साथ हुई हर घटना के बारे में बताया। मैंने सभी नाम बताए- आदित्य, सूरज पंचोली, डिनो मोरिया और बॉडीगार्ड्स। उन्होंने सब कुछ नोट कर लिया। उन्होंने कहा कि वे मेरी बताई बातों के आधार पर कार्रवाई करेंगे। कुछ दिनों में कार्रवाई शुरू हो जाएगी।” उन्होंने कहा, “सच को हराया नहीं जा सकता। भगवान वहीं होते हैं जहां सच होता है। इसीलिए न्याय जरूर होगा।”

सुशांत की बहन की प्रतिक्रिया

CBI की जांच पर सुशांत सिंह राजपूत की बहन श्वेता सिंह कीर्ति का भी ध्यान गया है, जिन्होंने हाल ही में जांच को लेकर उम्मीद जताई है। सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर करते हुए श्वेता ने कहा, “सच की अपनी ताकत होती है… इसे कुछ समय के लिए दबाया जा सकता है, परेशान किया जा सकता है, लेकिन इसे हराया नहीं जा सकता।” उन्होंने सालियन मामले में CBI जांच का स्वागत करते हुए कहा कि इससे राजपूत के कई फॉलोअर्स को उम्मीद मिली है।

क्या है सुशांत सिंह राजपूत की पूर्व मैनेजर दिशा सालियान की मौत का केस जिसकी अब CBI करेगी जांच? 2020 से अबतक ये सब हुआ

Disha Salian Case: दिवंगत बॉलीवुड सेलिब्रिटी मैनेजर दिशा सालियान की मौत के मामले में बुधवार (2 सितंबर) को बड़ा कानूनी मोड़ आ गया। बॉम्बे हाई कोर्ट ने बुधवार (2 सितंबर) को दिवंगत बॉलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत की पूर्व मैनेजर दिशा सालियन की मौत के मामले की केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) जांच का आदेश दिया। इस दौरान अदालत ने साफ किया कि किसी भी व्यक्ति को तब तक आरोपी नहीं माना जाना चाहिए, जब तक कि जांच अधिकारी को उसके खिलाफ पर्याप्त सबूत न मिल जाएं। कोर्ट ने CBI को निर्देश दिया है कि जांच के लिए एक वरिष्ठ और अनुभवी अधिकारी की नियुक्ति की जाए। साथ ही मामले में संबंधित धाराओं के तहत FIR दर्ज कर आगे की जांच की जाएगी।

यह मामला दिशा सालियान के पिता सतीश सालियान की याचिका के बाद एक बार फिर बॉम्बे हाईकोर्ट के सामने आया था। सतीश सालियान ने अपनी बेटी की मौत की परिस्थितियों पर सवाल उठाते हुए निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की मांग की थी। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस बात पर भी सवाल उठाए थे कि परिवार की ओर से संदेह जताए जाने के बावजूद FIR क्यों दर्ज नहीं की गई?

‘बिना सबूत किसी को भी आरोपी न माना जाए’

हाई कोर्ट ने साफ कहा है कि जब तक जांच में किसी के खिलाफ ठोस सबूत न मिल जाएं, तब तक किसी को भी आरोपी न माना जाए। अदालत ने कहा, “अगर कोई गंभीर अपराध (कॉग्निज़ेबल ऑफ़ेंस) बनता है, तो इस मामले में जल्द से जल्द चार्जशीट दाखिल की जानी चाहिए। अगर कोई गंभीर अपराध नहीं बनता है, तो जजों ने जांच अधिकारी (I.O.) को आदेश दिया है कि वे सक्षम अदालत में मामले को बंद करने की उचित प्रक्रिया शुरू करें।” दिशा के पिता को प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल करने की इजाजत दी गई है।

CBI दर्ज करेगी FIR, वरिष्ठ अधिकारी संभालेंगे जांच

हाई कोर्ट के आदेश के बाद अब मामले में संबंधित प्रावधानों के तहत FIR दर्ज की जाएगी। इसके बाद CBI जांच को आगे बढ़ाएगी। हाईकोर्ट ने विशेष रूप से निर्देश दिया है कि जांच के लिए किसी वरिष्ठ और अनुभवी अधिकारी को नियुक्त किया जाए, ताकि मामले की जांच निष्पक्ष और प्रभावी तरीके से हो सके।

दिशा सालियान की मौत 8 जून 2020 को मुंबई में एक बिल्डिंग से गिरने के बाद हुई थी। उस समय पुलिस ने इसे दुर्घटनावश हुई मौत के रूप में दर्ज किया था। बाद में मामले को लेकर कई सवाल और आरोप सामने आए तथा दिशा के पिता ने स्वतंत्र जांच की मांग की।

सतीश सालियान का बयान भी दर्ज होगा

CBI जांच के दौरान दिशा के पिता सतीश सालियान का बयान दर्ज किया जाएगा। उनके आरोपों और उन परिस्थितियों के बारे में विस्तार से जानकारी ली जाएगी। हाईकोर्ट पहले ही यह स्पष्ट कर चुका था कि किसी मामले में कानूनी रूप से उचित जांच और प्रक्रिया का पालन जरूरी है, ताकि परिवार को मामले में उचित निष्कर्ष और न्यायिक रूप से स्वीकार्य क्लोजर मिल सके।

आदित्य ठाकरे को लेकर कोर्ट का अहम रुख

मामले में शिवसेना (UBT) नेता आदित्य ठाकरे का नाम राजनीतिक और कानूनी बहस के दौरान सामने आता रहा है। हालांकि, CBI जांच का आदेश दिए जाने का अर्थ यह नहीं है कि आदित्य ठाकरे या किसी अन्य व्यक्ति को आरोपी घोषित कर दिया गया है।

Disha Salian Case_

जांच एजेंसी को उपलब्ध सबूतों, बयानों, रिकॉर्ड और अन्य तथ्यों के आधार पर अपनी जांच आगे बढ़ानी होगी। किसी भी व्यक्ति को केवल आरोपों या राजनीतिक दावों के आधार पर आरोपी नहीं माना जा सकता। ठाकरे की ओर से पहले भी उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों को खारिज किया गया है। उनके वकील ने अदालत में याचिका को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते हुए आरोपों का विरोध किया था।

कोर्ट के फैसले के बाद भावुक हुए दिशा के पिता

हाईकोर्ट के फैसले के बाद दिशा सालियान के पिता सतीश सालियान भावुक हो गए। उन्होंने अदालत के आदेश के लिए धन्यवाद दिया। साथ ही उम्मीद जताई कि अब उनकी बेटी की मौत से जुड़े सवालों की निष्पक्ष तरीके से जांच होगी। दिशा सालियान की मौत के मामले में पिछले कई वर्षों से अलग-अलग दावे और जांच को लेकर सवाल उठते रहे हैं। मुंबई पुलिस ने पहले मामले में किसी तरह की आपराधिक साजिश से इनकार किया था। जबकि दिशा के परिवार की ओर से बाद में गंभीर संदेह जताते हुए नए सिरे से जांच की मांग की गई।

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PM Modi in Uzbekistan: पीएम मोदी को उज्बेकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान, 36वें अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित

PM Modi in Uzbekistan: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रविवार (30 अगस्त) को उज्बेकिस्तान के प्रतिष्ठित सम्मान ‘ऑर्डर ऑफ ओली दराजाली दोस्तलिक’ से नवाजा गया। उन्होंने यह सम्मान भारत और उज्बेकिस्तान के बीच स्थायी संबंधों को समर्पित किया। PM मोदी व्यापार, क्लीन एनर्जी और कनेक्टिविटी समेत कई क्षेत्रों में संबंध मजबूत करने के लिए उज्बेकिस्तान के दो दिवसीय दौरे पर हैं। प्रधानमंत्री को यह सम्मान उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव ने प्रदान किया। यह प्रधानमंत्री मोदी को मिलने वाला 36वां अंतरराष्ट्रीय सम्मान है।

‘सम्मानित होना मेरे लिए बहुत गर्व की बात’

PM मोदी ने सोशल मीडिया प्लटेफॉर्म X पर एक पोस्ट में कहा, “‘ओली दराजाली दोस्तलिक’ सम्मान प्राप्त कर मैं गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं। मैं यह सम्मान भारत और उज्बेकिस्तान के बीच स्थायी संबंधों को समर्पित करता हूं।” पीएम मोदी ने अपने संबोधन में कहा, “उज्बेकिस्तान के सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित होना मेरे लिए बहुत गर्व की बात है।” उन्होंने कहा कि भारत के लोग इस सम्मान के नाम में प्रयुक्त शब्द ‘दोस्तलिक’ से भली-भांति परिचित हैं।

‘1.4 अरब भारतीयों का सम्मान’

उन्होंने कहा, “भारत में शायद ही कोई ऐसा परिवार होगा, जहां ‘दोस्तलिक’ शब्द दिन में 100 बार न बोला जाता हो। आज आपने वास्तव में इस शब्द के सार को सामने ला दिया है। ‘दोस्तलिक’ का अर्थ मित्रता है। यह शब्द अपने आप में भारत और उज्बेकिस्तान के संबंधों के केंद्र में मौजूद भावना को खूबसूरती से व्यक्त करता है।” PM मोदी ने कहा कि यह सम्मान प्राप्त करना उनका व्यक्तिगत सम्मान नहीं, बल्कि 1.4 अरब भारतीयों का सम्मान है।

PM मोदी ने आगे कहा, ‘‘सभी भारतीयों की ओर से मैं उज्बेकिस्तान की जनता, सरकार और अपने प्रिय मित्र राष्ट्रपति का हृदय से आभार व्यक्त करता हूं। मैं इस सर्वोच्च सम्मान को बहुत विनम्रता के साथ स्वीकार करता हूं। इसे हमारे दोनों देशों के सदियों पुराने मैत्रीपूर्ण संबंधों तथा हमारी साझा विरासत को समर्पित करता हूं।”

पीएम मोदी ने मिर्जियोयेव के साथ की वार्ता 

इससे पहले, प्रधानमंत्री मोदी ने मिर्जियोयेव के साथ वार्ता की, जिसके बाद भारत और उज्बेकिस्तान ने अपने संबंधों को व्यापक रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक बढ़ाने का फैसला किया। प्रधानमंत्री मोदी 31 अगस्त से 1 सितंबर तक होने वाले शंघाई सहयोग संगठन (SEO) के 26वें शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए ताशकंद से किर्गिस्तान की यात्रा करेंगे।

दोनों देशों ने अपने संबंधों को बढ़ाने का फैसला किया

प्रधानमंत्री मोदी और उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव के बीच हुई वार्ता के बाद, भारत और उज्बेकिस्तान ने रविवार को अपने संबंधों को व्यापक रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक बढ़ाने का फैसला किया। दोनों देशों ने यूरेनियम की दीर्घकालिक आपूर्ति के लिए एक व्यवस्था बनाने पर सहमति जताई। वार्ता के दौरान व्यापार, निवेश, इंफ्रास्ट्रक्चर, महत्वपूर्ण खनिजों, खनन, रक्षा और सुरक्षा, कृषि, स्वास्थ्य, टेक्नोलॉजी, UPI समेत डिजिटल सार्वजनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और एजुकेशन के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया गया।

द्विपक्षीय व्यापार को 5 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य

विदेश मंत्रालय (MEA) के अनुसार दोनों पक्षों ने 2030 तक वार्षिक द्विपक्षीय व्यापार को पांच अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य भी निर्धारित किया है। दोनों देशों के बीच वर्तमान में द्विपक्षीय व्यापार का कुल मूल्य एक अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक है। मंत्रालय ने कहा कि दोनों पक्षों ने द्विपक्षीय संबंधों को व्यापक रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक बढ़ाने का फैसला किया, जो सहयोग के विस्तृत दायरे को दर्शाता है।

दोनों नेताओं की मौजूदगी में खनन, संस्कृति, शिक्षा, पर्यटन और आयुर्वेद समेत कई अन्य क्षेत्रों से जुड़े समझौतों का आदान-प्रदान हुआ। उज्बेकिस्तान में बौद्ध स्थलों फयाज तेपा और कारा तेपा के पुनरुद्धार और संरक्षण के लिए एक आशय पत्र पर भी सहमति बनी। भारत असैन्य उद्देश्यों के लिए परमाणु ऊर्जा के उत्पादन के लिए उज्बेकिस्तान से यूरेनियम खरीदने पर विचार कर रहा है।

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