जनगणना के नए नियम पर विवाद क्यों

छह साल की देरी से हो रही जनगणना के लिए इसके नियमों में संशोधन किया गया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन आने वाले भारत के महापंजीयक कार्यालय ने जनगणना अधिनियम 1948 की धारा 18 की उपधारा एक के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए जनगणना नियम 1990 में कुछ और बदलाव करने के लिए निर्देश जारी किए हैं। इनमें प्रस्तावित बदलावों को लेकर कांग्रेस पार्टी ने आपत्ति दर्ज कराई है। कांग्रेस की आपत्तियों पर बात करने से पहले उन दो बदलावों को रेखांकित करने की आवश्यकता है, जो अपनी प्रकृति में बिल्कुल नई हैं। पहला, महापंजीयक कार्यालय ने पहली बार सरकारी स्कूलों व कार्यालयों के कर्मियों के साथ साथ निजी स्कूलों और ट्रस्टों के कर्मियों को भी जनगणना के काम में शामिल करने का प्रस्ताव किया है और दूसरा, किसी सामान्य नागरिक को भी बतौर वॉलंटियर इसमें शामिल करने का प्रस्ताव है। महापंजीयक कार्यालय की ओर से 16 अक्टूबर को जारी अधिसूचना के मुताबिक, ‘ऐसा कोई व्यक्ति, जिसे राज्य सरकार या संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन, प्रगणक के रूप में कर्तव्यों का निष्पादन करने के लिए उपयुक्त समझे’ उसे जनगणना के काम में लगाया जा सकता है।

कांग्रेस ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति की है। कांग्रेस का कहना है कि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के लोगों को जनगणना के काम में शामिल करने के लिए यह बदलाव किया जा रहा है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने दावा किया है कि इस साल 10 से 12 जुलाई को कर्नाटक के बेलगाम में आरएसएस के कार्यकर्ताओं का एक बड़ा प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया था, जिसका एकमात्र एजेंडा जनगणना 2027 था। उनका कनहा है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 26 मई 2026 को देश की बदलती डेमोग्राफी पर सुझाव देने के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी का गठन किया था। उस कमेटी में सभी सदस्य आरएसएस हैं और उसके सुझाव पर ही जनगणना के नियमों में बदलाव किया जा रहा है। कांग्रेस को आशंका है कि डेमोग्राफी पर बनी कमेटी और आरएसएस के लोगों को जनगणना में शामिल करके एसआईआर की तरह जनगणना के आंकड़ों में भी खतरनाक तरीके से हेरफेर किया जाएगा। हालांकि खतरनाक रूप से क्या हेराफेरी हो सकती है यह कांग्रेस ने नहीं बताया है। फिर भी कांग्रेस की आशंका को आधारहीन बता कर खारिज नहीं किया जा सकता है। लेकिन सवाल है कि क्या भारत में ऐसी एक व्यवस्था की आवश्यकता नहीं है, जहां वालंटियर्स यानी स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं की मदद से जनगणना, मतदाता सूची के पुनरीक्षण, सामाजिक व आर्थिक सर्वेक्षण, नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे जैसे काम कराए जाएं?

ध्यान रहे दुनिया भर के देशों में ऐसी व्यवस्था है। पता नहीं कांग्रेस और दूसरी पार्टियों ने कभी इसका अध्ययन करने का प्रयास किया है या नहीं कि अमेरिका में लगभग पूरा चुनाव वालंटियर्स की देखरेख में होता है। वहां भारत के चुनाव आयोग जैसी कोई केंद्रीय संस्था नहीं है। राज्यों में अपनी अपनी संस्थाएं हैं। लेकिन उनमें भी बहुत लंबी चौड़ी वर्क फोर्स नहीं है और न चुनाव कराने के लिए स्कूलों के शिक्षक व सरकारी कर्मचारियों को बड़े पैमाने पर शामिल किया जाता है। थोड़े से सरकारी कर्मचारी और ढेर सारे वॉलंटियर मिल कर चुनाव कराते हैं। दशकों से ऐसे ही चुनाव होते हैं और डोनाल्ड ट्रंप के आने से पहले किसी ने चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोप भी नहीं लगाए थे। भारत में इस तरह की व्यवस्था बनाने की बहुत आवश्यकता है।

भारत में आजादी के बाद से ही तदर्थ प्रक्रिया चल रही है। सरकारी कर्मचारियों को और उसमें भी सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को किसी भी तरह की ड्यूटी में लगा दिया जाता है। मतदाता सूची का ‘संक्षिप्त’ या ‘विशेष संक्षिप्त’ या ‘विशेष गहन’ पुनरीक्षण होना है तो सरकारी शिक्षक करेंगे, मतदान कराना है तो सरकारी शिक्षक कराएंगे, मतगणना करनी है तो सरकारी शिक्षक करेंगे, सामाजिक व आर्थिक सर्वे करना हो, नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे करना हो, पशुओं की गिनती करनी हो, टीकाकरण करना हो, कोरोना या बाढ़ जैसी कोई महामारी में राहत बांटना हो, सारे काम सरकारी शिक्षकों को करने होते हैं। कुछ दिन पहले ही एक शिक्षक ने सोशल मीडिया में तंज करते हुए कहा कि वह तो अच्छा है कि सरकार कृषि कार्य नहीं कराती है अन्यथा फसलों की बुवाई, कटाई भी सरकारी स्कूल के शिक्षक करते। सचमुच ऐसी ही स्थिति है। इसका सीधा असर शिक्षा व्यवस्था पर पड़ता है। अभी एसआईआर की प्रक्रिया चल रही है तो राजधानी दिल्ली जैसे राज्य में सैकड़ों स्कूल एक एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। सरकारी स्कूलों के शिक्षकों से ये सब काम कराने से साल के कई महीने तक पढ़ाई, लिखाई का काम लगभग पूरी तरह से ठप्प रहता है।

सरकार ने अब अनुदान प्राप्त और बिना अनुदान वाले निजी स्कूलों के शिक्षकों को भी इसमें शामिल करने का प्रस्ताव दिया है। इससे वहां भी सरकारी स्कूलों जैसे ही पढ़ाई प्रभावित होगी। ऐसा लग रहा है कि सरकार स्कूली शिक्षा को पूरी तरह से बरबाद करने का संकल्प किए हुए है। वैसे पिछले दिनों आरएसएस से जुड़े रहे एक युवा स्कॉलर के मुंह से सुनने को मिला कि स्कूली शिक्षा को लेकर ‘भाई साहेब’ लोग क्या सोच रहे हैं। एक ‘भाई साहेब’ ने उस युवा स्कॉलर से कहा था कि कॉलेज पहुंचने वाले युवा इतने आंदोलित इसलिए हो रहे हैं क्योंकि देश में आज भी बड़ी संख्या में अच्छे स्कूल चल रहे हैं, जहां से वे पढ़ कर आते हैं। कॉलेज और यूनिवर्सिटीज की पढ़ाई और प्रशासन की व्यवस्था तो पिछले कुछ बरसों में पूरी तरह से बिगाड़ दी गई है। लेकिन चूंकि वे अच्छे स्कूल से आते हैं तो बिगड़े हुई व्यवस्था वाले कॉलेजों में एडजस्ट होने में उनको दिक्कत होती है। सो, इसका उपाय यह है कि स्कूली शिक्षा को भी वैसे ही बरबाद कर दिया जाए जैसे कॉलेज और यूनिवर्सिटीज को किया गया है।

बहरहाल, अगर सरकार गंभीर है तो उसे कांग्रेस की आलोचना की परवाह नहीं करनी चाहिए और देश में ऐसे कामों के लिए वॉलंटियर्स का नेटवर्क तैयार करना चाहिए। इससे देश के युवाओं को सीजनल रोजगार भी मिलेगा और यह बड़ी वर्क फोर्स तैयार होगी। ध्यान रहे देश की आबादी डेढ़ सौ करोड़ है और यहां जनगणना और चुनाव से लेकर अलग अलग तरह के सर्वेक्षण का काम बहुत बड़े पैमाने पर होता है। इसके लिए पढ़े, लिखे बेरोजगार नौजवानों को अगर वालंटियर के तौर पर शामिल किया जाए तो यह योजना ग्रामीण रोजगार की मनरेगा जैसी योजना से बड़ी हो सकती है और इसमें ज्यादा लोगों को रोजगार मिल सकता है। इसके लिए बहुत गहन गंभीर प्रशिक्षण की आवश्यकता भी नहीं होती है। सरकार एक बार प्रशिक्षण की व्यवस्था करके वालंटियर्स की फौज तैयार कर सकती है। यह वर्क फोर्स सरकारी कामकाज तो करेगी ही साथ ही निजी कंपनियों, विज्ञापन एजेंसियों, चुनावी सर्वे करने वाली कंपनियों आदि के लिए भी उपलब्ध रहेगी।

इस मामले में कांग्रेस की आलोचना का कोई खास आधार नहीं है। अगर सरकारी शिक्षक ही जनगणना करेंगे तो क्या गारंटी है कि जयराम रमेश जिस हेरफेर की आशंका जता रहे हैं वह नहीं होगी? आखिर मतदाता सूची का काम तो सरकारी लोग ही कर रहे हैं तो क्या कांग्रेस को उस पर भरोसा है? जयराम रमेश को यह समझना चाहिए सरकारी और निजी शिक्षकों में भी संघ और भाजपा के प्रति रूझान रखने वाले लोग होंगे और कांग्रेस व विपक्ष को पसंद करने वाले भी होंगे। वैसे ही चुनाव कराने या जनगणना के लिए वॉलंटियर नियुक्त होंगे तो उसमें भी हर विचार और राजनीतिक रूझान वाले लोग होंगे। अगर पेशेवर तरीके से कामकाज का वातावरण बनता है, तकनीक का बेहतर इस्तेमाल होता है और निगरानी की ईमानदार व्यवस्था बनती है तो वॉलंटियर वाली व्यवस्था एक साथ भारत की कई समस्याओं का समाधान कर सकती है।

जगन मोहन रेड्डी को 2023 के चुनाव आयोग के कानून पर क्यों है पछतावा? NDA को दे दी टेंशन!

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर अब YSR कांग्रेस पार्टी ने अपने पुराने रुख पर सवाल उठाए हैं। आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और पार्टी प्रमुख वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी ने रविवार को माना कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े बिल पर NDA सरकार का समर्थन करना उनकी पार्टी की गलती थी। उन्होंने कहा कि पार्टी को अब अपने उस फैसले पर अफसोस है।

उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “हमें अब इस बात का पछतावा है… हमें एहसास हुआ है कि ऐसी चयन प्रक्रिया को मंजूरी देना हमारी गलती थी, जिसमें चुनाव आयुक्त का चुनाव तीन सदस्यीय पैनल द्वारा किया जाता है। इस पैनल में प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री द्वारा चुने गए एक मंत्री और विपक्ष के नेता शामिल होते हैं।” उन्होंने तर्क दिया कि मौजूदा व्यवस्था ने चुनाव आयोग (EC) के ढांचे को असंतुलित कर दिया है।

इस दौरान जगन ने कानून में संशोधन की भी मांग की, ताकि चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को फिर से शामिल किया जा सके। उन्होंने कहा, “अभी की प्रक्रिया इतनी एकतरफा है, जैसे कि छात्र खुद ही अपना परीक्षक चुन रहे हों। ऐसा नहीं होना चाहिए।”

बता दें कि यह बयान इसलिए अहम है क्योंकि 2023 के कानून का YSRCP ने लोकसभा और राज्यसभा, दोनों जगह समर्थन किया था, जबकि विपक्ष ने इसमें से CJI को हटाए जाने पर आपत्ति जताई थी।

‘सोच बदल गई है’

यह पहली बार नहीं है जब जगन मोहन रेड्डी ने चुनाव आयोग (EC) के कामकाज को लेकर चिंता जताई है। सितंबर में, चुनाव आयोग के भीतर मतभेदों पर ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की जांच पर प्रतिक्रिया देते हुए, उन्होंने ‘X’ पर लिखा कि “लोकतंत्र तभी कायम रह सकता है जब लोगों को चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं पर पूरा भरोसा हो”।

रिपोर्ट में मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) से जुड़े फैसलों पर दो चुनाव आयुक्तों द्वारा जताई गई आपत्तियों का जिक्र किया गया था।

इस पर जगन ने लिखा था, “आरोप-प्रत्यारोप लगाने के बजाय, जनता को यह स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए कि क्या आपत्तियां दर्ज की गईं, उन पर क्या कार्रवाई हुई, और मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने या बहाल करने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी तरीके से पूरी की गई।”

उन्होंने चुनावी प्रक्रिया में जनता का भरोसा बहाल करने, नागरिकों के मतदान के अधिकारों की रक्षा करने और यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाने की मांग की कि लोग बिना किसी डर के अपने इन अधिकारों का इस्तेमाल कर सकें।

YSRCP के एक नेता ने कहा, “हमने हमेशा कहा है कि (NDA) सरकार को हमारा समर्थन मुद्दों पर आधारित होगा। इस मामले में, हमें लगता है कि जनता को सरकार से और अधिक आश्वासन मिलने की जरूरत है।”

NDA को संसदीय समर्थन

कुछ विधायी मामलों में NDA को पार्टी का समर्थन मिलने का मतलब यह नहीं था कि BJP के साथ कोई औपचारिक गठबंधन हो गया है। हालांकि, संसद में पार्टी के रुख ने अक्सर सरकार को अपने गठबंधन के दायरे से बाहर भी समर्थन जुटाने में मदद की, जिससे जगन का बदला हुआ रुख राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है।

YSRCP ने संसद में लगातार NDA का समर्थन किया है। 2020 में, पार्टी ने केंद्र सरकार को उन विवादास्पद कृषि कानूनों पर समर्थन दिया था, जिन्हें बाद में रद्द कर दिया गया। 2023 में, जब विपक्षी दलों ने नए संसद भवन के उद्घाटन समारोह का बहिष्कार किया था, तब भी YSRCP के विधायक उस कार्यक्रम में शामिल हुए थे।

साल 2019 से 2024 के बीच, जब आंध्र प्रदेश में YSRCP सत्ता में थी, तब पार्टी ने नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) और अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के मुद्दों पर NDA का समर्थन किया था।

जानकारी के मुताबिक, 2024 के चुनावों के बाद, जब YSRCP के केवल चार लोकसभा सांसद ही जीत पाए और आंध्र प्रदेश में पार्टी सत्ता से बाहर हो गई, तब भी उसने स्पीकर पद के लिए NDA की पसंद का समर्थन किया था। इसके अलावा, 2025 में पार्टी ने सत्ताधारी गठबंधन की ओर से उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार सी.पी. राधाकृष्णन का भी समर्थन किया, और इस साल की शुरुआत में उसने परिसीमन विधेयक (डिलिमिटेशन बिल) पैकेज को अपना समर्थन देने की घोषणा की।

वाम दलों के साथ तालमेल

जगन के करीबी सूत्रों ने बताया कि YSRCP वाम दलों (जिसमें CPI(M) और CPI शामिल हैं) के साथ बातचीत कर रही है। यह बातचीत आंध्र प्रदेश में मतदाताओं के नाम बड़े पैमाने पर सूची से हटाए जाने के मुद्दे पर हो रही है।

एक सूत्र ने कहा, “आंध्र प्रदेश में विपक्ष की एक पार्टी होने के नाते, हमारा मानना ​​है कि हमें उन लोगों के साथ खड़ा होना चाहिए जो उन मतदाताओं के हितों का समर्थन कर रहे हैं, जिनके नाम अवैध रूप से हटा दिए गए हैं। TDP के नेतृत्व वाली आंध्र प्रदेश सरकार, राज्य चुनाव आयोग (EC) का पक्ष ले रही है और अपनी बात मानने वाले इस आयोग का फायदा उठा रही है।”

गौरतलब है कि जगन मोहन रेड्डी की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब YSRCP और सत्ताधारी TDP के नेतृत्व वाले गठबंधन (जिसमें BJP और जन सेना पार्टी भी शामिल हैं) के बीच राजनीतिक टकराव जारी है।

YSRCP ने सत्ताधारी गठबंधन पर अपने लोकसभा फ्लोर लीडर, पी.वी. मिथुन रेड्डी की हत्या की कोशिश करने का भी आरोप लगाया है। वहीं, TDP ने आरोप लगाया है कि आगामी स्थानीय निकाय चुनावों के लिए नामांकन दाखिल करने के दौरान, मिथुन ने भीड़ को आगजनी के लिए उकसाया था।

राज्य में TDP के नेतृत्व वाला गठबंधन पूरी तरह से सत्ता में है। ऐसे में, YSRCP मतदाता सूची में बदलाव और संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज जैसे मुद्दों पर विपक्ष का समर्थन एकजुट करने की कोशिश कर रही है।

क्या एक व्यापक विपक्षी मोर्चा बनेगा?

जगन ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के नेताओं को सार्वजनिक रूप से अपना समर्थन दिया है। बता दें कि CJP के सदस्य सौरव दास और आशुतोष रंका को जंतर-मंतर पर तिरंगा फहराने के बाद गिरफ्तार किया गया था। इस पर जगन ने एक बार फिर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी प्रतिक्रिया दी।

उन्होंने एक पोस्ट में कहा, “व्यवस्था में एक खामी है जिसे ठीक करने की जरूरत है। चुनावी प्रक्रिया में लोगों का भरोसा फिर से बहाल होना चाहिए। सौरव दास और आशुतोष रांका की गिरफ्तारी से कोई समस्या हल नहीं होगी, बल्कि इससे हालात और बिगड़ेंगे।”

उनका यह कदम तब आया है जब पड़ोसी राज्य तेलंगाना की एक क्षेत्रीय पार्टी, ‘भारत राष्ट्र समिति’ (BRS) ने भी CJP का समर्थन किया है। इससे संकेत मिलता है कि क्षेत्रीय पार्टियों के राजनीतिक हित आपस में मेल खा सकते हैं।

बता दें कि जगन का यह बदला हुआ रुख ऐसे समय में सामने आया है, जब क्षेत्रीय पार्टियों को मिलाकर एक व्यापक विपक्षी मोर्चा बनाने की कोशिशों को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं।

वहीं तमिलनाडु में, इस साल हुए विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस के विजय की पार्टी ‘TVK’ के साथ हाथ मिलाने से, कांग्रेस और DMK के रिश्तों में खटास आ गई है। DMK ने भी CJP का समर्थन किया है।

पार्टी सूत्रों के अनुसार, YSRCP के लिए इस तरह का कोई भी गठबंधन मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश में उसकी राजनीतिक लड़ाई से प्रेरित होगा।

एक सूत्र ने बताया, “आंध्र प्रदेश में YSRCP को समर्थन देने वाले गठबंधनों के लिए जगन हमेशा तैयार रहे हैं। फिलहाल, राज्य में TDP के नेतृत्व वाले गठबंधन को रोकने के लिए ‘लेफ्ट फ्रंट’ (वाम मोर्चा) या क्षेत्रीय दलों का गठबंधन काफी लग रहा है।”

हालांकि, कांग्रेस के साथ गठबंधन की संभावना फिलहाल कम ही है, क्योंकि जगन और उनकी बहन YS शर्मिला के बीच रिश्ते तनावपूर्ण हैं। शर्मिला कांग्रेस की राज्य इकाई की प्रमुख हैं।

एक सूत्र ने कहा, “फिलहाल कांग्रेस के साथ गठबंधन की कोई संभावना नहीं है।”

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एनडीए को एक एक सीट की चिंता

भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले एनडीए को लोकसभा की एक एक सीट की चिंता है। इसलिए कई सांसदों के ऊपर अनुशानहीनता के आरोप लगने के बावजूद कार्रवाई नहीं हो रही है। दूसरी बात यह है कि भाजपा की इस चिंता को लेकर चुनाव आयोग कितना संवेदनशील है वह भी दिखाई देता है। सोचें, पिछले दो साल से पश्चिम बंगाल की बशीरहाट लोकसभा सीट खाली है। इस साल मई में खाली हुई असम की नगांव सीट पर चुनाव आयोग ने उपचुनाव करा लिया है लेकिन बशीरहाट सीट खाली रखी गई है। इसका एकमात्र कारण यह है कि मुस्लिम बहुल इस सीट पर उपचुनाव हुआ तो भाजपा नहीं जीत पाएगी। कोई विपक्षी पार्टी ही जीतेगी। इसलिए आयोग चुनाव ही नहीं करा रहा है। इसके बावजूद चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाने वाले कठघरे में खड़ा किए जा रहे हैं!

बहरहाल, बिहार में जनता दल यू के कई सांसद बागी हो गए हैं। कई तो नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री रहते ही पार्टी विरोधी काम में लग गए थे। बांका के सांसद गिरधारी यादव ने अपने बेटे को राजद की टिकट पर विधानसभा का चुनाव लड़ाया था। संसद में सरकार की लाइन से अलग बोलते हैं। उनके खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश भी की गई थी। लेकिन फिर रोक दिया गया। ऐसे ही भागलपुर के सासंद अजय मंडल अपने प्रतिद्वंद्वी शैलेश कुमार उर्फ बुलो मंडल के जदयू में आने और राज्य सरकार में मंत्री बन जाने से नाराज हैं और पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल हैं। तीसरी सांसद लवली आनंद के पति आनंद मोहन लगातार पार्टी के खिलाफ लाइन पर चल रहे हैं। मधेपुरा के सांसद दिनेश चंद्र यादव भी पार्टी से उलट कामकाज कर रहे हैं। लेकिन किसी के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा रही है। क्योंकि इस समय एनडीए एक भी सांसद गंवाने की जोखिम नहीं ले सकता है।

अराजकता फैलाना चाहता है विपक्ष

प्रशांत भूषण ने ‘रिजीम चेंज’ की बात कही। वे वकील हैं और राजनीति में भी खूब सक्रिय रहे हैं। वे पहले आम आदमी पार्टी में थे, जहां से अरविंद केजरीवाल ने उनको निकाल दिया। उन्होंने जब ‘रिजीम चेंज’ की बात कही तो उसका एक खास संदर्भ होता है। लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार को रिजीम नहीं कहा जाता है। रिजीम का मतलब होता है तानाशाहों का शासन, जिसको जन विद्रोह के जरिए या विदेशी ताकतों के समर्थन से बदला जाता है।

विपक्ष के चेहरे पर लोकतंत्र, संविधान, संसदीय प्रणाली, गांधी मार्ग आदि का जो झीना सा परदा था वह परदा भी गिर गया है। उसकी असलियत खुल कर सामने आ गई है। देश और दुनिया को यह पता चल गया है कि भारत का विपक्ष बांग्लादेश के कट्टरपंथी जमात के लोगों के आंदोलन से प्रभावित है और उसी मॉडल पर देश में ‘रिजीम चेंज’ यानी सत्ता बदलने की मंशा से काम कर रहा है। निष्कर्ष अनजाने में दिए गए किसी प्रदर्शनकारी के बयान या किसी की जुबान से अनायास निकल गए किसी जुमले पर आधारित नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांगने के लिए प्रदर्शन कर रहे दो अलग अलग लोगों ने इस तरह के बयान दिए है। इसलिए यह सिर्फ संयोग नहीं हो सकता है। सीपीआई एमएल के छात्र संगठन आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा ने कहा कि वे बांग्लादेश के आंदोलन और वहां के आंदोलनकारियों से प्रभावित हैं तो सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण ने कॉकरोच जनता पार्टी और आइसा नेताओं की मौजूदगी में कहा कि इस प्रदर्शन का उद्देश्य ‘रिजीम चेंज’ करना यानी सत्ता बदलना है।

देश के सामान्य नागरिकों को यह समझना चाहिए कि ये दोनों बातें कितनी खतरनाक हैं। एक तो बांग्लादेश के आंदोलन से प्रेरणा और दूसरी उसी मॉडल से ‘रिजीम चेंज’ की बात, दोनों के गहरे निहितार्थ हैं। सबसे पहले यह समझने की जरुरत है कि बांग्लादेश में क्या हुआ था। बांग्लादेश में कट्टरपंथी इस्लामी संगठन ‘जमात ए इस्लामी’ ने तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना के खिलाफ आंदोलन किया था। बाद में जब आरक्षण के नियमों में बदलाव किए गए तो कुछ युवा भी उस आंदोलन में जुड़े। लेकिन चाहे जमात के लोग हों या युवाओं की ‘नेशनल सिटीजंस पार्टी’ के लोग हैं, सबने आंदोलन के दौरान जितना सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया उससे ज्यादा हमला वहां के अल्पसंख्यकों यानी हिंदुओं पर किया। बांग्लादेश के ‘जेन जी’ का पूरा आंदोलन वहां के हिंदुओं के खिलाफ था। किस तरह के जघन्य कांड हुए, वह पूरी दुनिया ने देखा। हिंदुओं के घरों को चारों तरफ से घेर कर उनमें आग लगाई गई। हिंदुओं की हत्या करके उनके शव पेड़ से लटकाए गए। क्या भारत में ऐसे हालात बनाना चाहते हैं प्रदर्शनकारी?

उस आंदोलन के बाद भी बांग्लादेश में क्या बदला? हिंसक आंदोलन के जरिए एक चुनी हुई सरकार को हटा दिया गया और एक कठपुतली के रूप में मोहम्मद यूनुस को बैठाया गया। यूनुस के शासन में बांग्लादेश के हिंदुओं पर जितने अत्याचार हुआ उनकी मिसाल नहीं है। उसके बाद भी जब चुनाव हुए तो उसका नतीजा यह निकला कि युवा देखते रह गए और सैनिक तानाशाह रहे जिया उर रहमान व खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान देश के प्रधानमंत्री बन गए। क्या ऐसा ही आंदोलन नेहा बोरा भारत में करना चाहती हैं कि एक चुनी हुई सरकार को अराजकता के जरिए हटाने का प्रयास किया जाए, उसके बाद कोई कठपुतली बैठे और फिर पुराने राज परिवार के किसी व्यक्ति को सत्ता मिल जाए? भारत के विकास और मजबूती से ईर्ष्या कर रहे बहुत से देश भारत की जनता द्वारा लगातार तीसरी बार चुनी हुई सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अस्थिर करना चाह रहे हैं। क्या यह आंदोलन उन विदेशी ताकतों की मंशा पूरी करने के लिए चलाया जा रहा है?

इन बयानों को इस संदर्भ में देखने का कारण यह भी है कि प्रशांत भूषण ने ‘रिजीम चेंज’ की बात कही। वे वकील हैं और राजनीति में भी खूब सक्रिय रहे हैं। वे पहले आम आदमी पार्टी में थे, जहां से अरविंद केजरीवाल ने उनको निकाल दिया। उन्होंने जब ‘रिजीम चेंज’ की बात कही तो उसका एक खास संदर्भ होता है। लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार को रिजीम नहीं कहा जाता है। रिजीम का मतलब होता है तानाशाहों का शासन, जिसको जन विद्रोह के जरिए या विदेशी ताकतों के समर्थन से बदला जाता है। रिजीम सीरिया में असद था, इराक में सद्दाम का था और लीबिया में गद्दाफी का था। भारत में रिजीम नहीं होता है। भारत में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार होती है, जिसे लोकतांत्रिक तरीके से ही बदला जाता है। इंदिरा गांधी की तानाशाही और इमरजेंसी का जवाब भी इस देश की जनता ने लोकतांत्रिक तरीके से ही दिया था। उनको वोट के जरिए हराया गया था। नरेंद्र मोदी को देश की जनता ने लगातार तीसरी बार वोट देकर प्रधानमंत्री चुना है। इस जनादेश के बाद नरेंद्र मोदी सबसे ज्यादा समय तक निर्वाचित प्रधानमंत्री रहने का रिकॉर्ड बना चुके हैं। देश की जनता न सिर्फ उनको बार बार देश की सत्ता सौंप रही है, बल्कि उनकी अपील पर बंगाल, असम जैसे पूर्वी व पूर्वोत्तर के राज्यों से लेकर पश्चिम में गुजरात और महाराष्ट्र तक भाजपा की सरकार बनवाती है। इतने लोकप्रिय नेता के शासन को ‘रिजीम’ कहना अपने आप में विपक्ष के लोगों की मंशा दिखाने वाला है।

असल में चाहे कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल हों या कॉकरोच जनता पार्टी जैसे सोशल मीडिया हैंडल्स हों या आइसा जैसे छात्र संगठन हों या प्रशांत भूषण जैसे कथित सिविल सोसायटी के लोग हों, इनका प्रदर्शन एक खास राजनीतिक मंशा से प्रेरित है। वह राजनीतिक मंशा है सरकार बदलने की। दूसरी बात यह है कि इनके प्रदर्शन से आम आदमी का कोई लेना देना नहीं है। जंतर मंतर पर सीजेपी का पहला प्रदर्शन पीड़ित पक्ष यानी पेपर लीक से प्रभावित हुए छात्रों, युवाओं और उनके परिजनों का था। लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जो प्रदर्शन हो रहा है वह मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में नाम कटने से प्रभावित मतदाताओं का नहीं है। ऐसे लोग तो सामने आ ही नहीं रहे हैं। क्योंकि ऐसे वास्तविक मतदाता बहुत कम हैं, जिनके नाम कटे हैं और अगर कट गए हैं तो वे उसे जुड़वाने की कोशिश कर रहे हैं। तभी किसी प्रदर्शन में ऐसे लोग नहीं दिख रहे हैं, जिनके नाम कटे हैं। प्रदर्शन के दौरान, जिससे भी पूछा जाता है, वह कहता है कि उसका नाम मतदाता सूची में है। जब प्रभावित पक्ष आंदोलन में नहीं शामिल है तो इसका क्या मतलब है?

जाहिर है इसका मकसद अराजकता फैलाना है। लोगों की भावनाओं को उभार कर सरकार के खिलाफ नाराजगी पैदा करना है। इसमें भी कोई बुराई नहीं है। विपक्ष का यही काम है कि वह सरकार के खिलाफ आम आदमी के मन में नाराजगी बढ़ाने की कोशिश करे। लेकिन इसके लिए पहले आम आदमी के मन में नाराजगी होनी भी तो चाहिए? जिस मामले में आम आदमी प्रभावित था वहां जुड़ा और सरकार ने भी उसे समझते हुए तत्काल केंद्रीय मंत्री का इस्तीफा कराया। लेकिन मौजूदा प्रदर्शन तो आम आदमी का है ही नहीं। यह राजनीतिक दलों का विरोध है और इसका मकसद संवैधानिक या लोकतांत्रिक तरीके से कोई मुद्दा उठाना नहीं, बल्कि अराजकता फैलाना है। अगर अराजकता फैलाना मकसद नहीं होता है तो क्या कोई समझदार नेता या राजनीतिक दल सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च करता है? आपने सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया और राष्ट्रपति को ज्ञापन दिया यहां तक तो बात समझ में आती है। लेकिन विपक्ष ने सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च किया। कांग्रेस की एक प्रदेश कमेटी की ओर से चीफ जस्टिस के लिए असम्मानजनक संबोधन वाला पोस्ट किया गया, जिसे बाद में डिलीट किया गया। प्रदर्शन में शामिल नेताओं ने चीफ जस्टिस के खिलाफ अपमानजनक बातें कहीं। यह इससे पहले कभी नहीं हुआ था।

विपक्ष के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों को कोहनी मार रहे थे। प्रदर्शनकारी महिला पुलिसकर्मियों की वर्दी पर हाथ डाल रहे थे और उनके नाम सोशल मीडिया में उजागर करके उनको शर्मिंदा करने की कोशिश कर रहे थे। यह सब पहले कभी नहीं हुआ। पूरे आंदोलन के दौरान पुलिस को उकसाने का प्रयास किया गया ताकि पुलिस पलट कर कार्रवाई करे तो उसका मुद्दा बनाया जाए। यह सोची समझी रणनीति के तहत किया जा रहा था। पूरे प्रदर्शन का मकसद चुनाव आयोग की साख और देश के स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना है। इसके जरिए विपक्ष यह दिखाना चाहता है कि वह अपनी कमजोरी से नहीं हार रहा है, बल्कि उसको हराया जा रहा है। लेकिन इसकी हकीकत देश की जनता से बेहतर और कौन जानता है! आखिर जनता ही वोट देकर भाजपा को जीता रही है और कांग्रेस व अन्य विपक्षी पार्टियों को हरवा रही है। विपक्ष को जनता के जनादेश को अराजक आंदोलनों के जरिए चुनौती देने की बजाय राजनीतिक रूप से अपने को मजबूत करके आगे की लड़ाई की तैयारी करनी चाहिए।

(लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)

नवाज शरीफ की तरह देश छोड़ सकते हैं इमरान खान:विपक्षी नेता का दावा- सरकार ने ऑफर दिया, समझौता करने का दबाव बना रहे

पाकिस्तान में जेल में बंद पूर्व PM इमरान खान भी पूर्व प्रधानमंत्रियों की तरह देश छोड़ सकते हैं। विपक्षी नेता महमूद खान अचकजई ने शुक्रवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में यहा दावा किया। अचकचई ने कहा कि सरकार इमरान पर समझौते के लिए दबाव बना रही है। वे नवाज शरीफ और बेनजीर भुट्टो की तरह देश छोड़कर जा सकते हैं। अचकचई पख्तूनख्वा मिल्ली अवामी पार्टी (PKMP) के अध्यक्ष और पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में विपक्ष के नेता हैं। नवाज-बेनजीर ने क्यों छोड़ा था पाकिस्तान? अचकजई ने अपने दावे के समर्थन में पाकिस्तान के दो पूर्व प्रधानमंत्रियों नवाज शरीफ और बेनजीर भुट्टो के पुराने मामलों का हवाला दिया। नवाज शरीफ: 1999 में तत्कालीन सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ ने सैन्य तख्तापलट कर नवाज सरकार को हटा दिया था। नवाज को जेल में डाल दिया गया। इसके बाद 2000 में सऊदी अरब और लेबनान के नेताओं की मध्यस्थता से हुए समझौते के तहत वे पाकिस्तान छोड़कर चले गए। समझौते की शर्तों के मुताबिक, नवाज को 10 साल तक पाकिस्तान से बाहर रहना था और राजनीति से दूर रहना था। बेनजीर भुट्टो: 1997 में तत्कालीन राष्ट्रपति फारूक लेघारी ने बेनजीर को भ्रष्टाचार के आरोप में प्रधानमंत्री पद से हटा दिया था। इसके बाद 1997 के आम चुनाव में उन्हें हार मिली। इसके बाद बेनजीर भुट्टो ने देश छोड़ दिया। वह 9 साल तक ब्रिटेन और दुबई में रहीं। अगस्त 2023 से जेल में हैं इमरान 73 साल के इमरान खान अगस्त 2023 से जेल में हैं। उन्हें सबसे पहले तोशाखाना मामले में 3 साल की सजा मिलने के बाद गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद उन पर सिफर, अल-कादिर ट्रस्ट और इद्दत निकाह समेत कई मामले दर्ज हुए। बाद में सिफर और इद्दत निकाह मामलों में उन्हें अदालत से राहत मिल गई। तोशाखाना मामले में भी उनकी एक सजा रोक दी गई। इसके बावजूद दूसरे मामलों के चलते वह अभी जेल में हैं। इमरान खान और उनकी पार्टी पीटीआई का कहना है कि 2022 में प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद उनके खिलाफ मामले राजनीतिक वजहों से दर्ज किए गए। उनका आरोप है कि उन्हें राजनीति और चुनाव से दूर रखने के लिए ऐसा किया गया। वहीं, पाकिस्तान सरकार और जांच एजेंसियां इन आरोपों को खारिज करती हैं और कहती हैं कि ये मामले कानूनी प्रक्रिया के तहत चल रहे हैं। तोशाखाना क्या है और इमरान खान का मामला क्या है? तोशाखाना पाकिस्तान सरकार का सरकारी भंडार है। यहां प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मंत्री और दूसरे सरकारी अधिकारियों को विदेशों से मिले कीमती तोहफे जमा किए जाते हैं। इनमें घड़ियां, गहने, पेंटिंग जैसी चीजें शामिल होती हैं। इमरान खान से जुड़े विवाद इमरान खान 2018 से 2022 तक पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे। इस दौरान उन्हें कई महंगे विदेशी तोहफे मिले। आरोप है कि कुछ तोहफों की जानकारी और उनकी बिक्री से मिली रकम की पूरी जानकारी नहीं दी गई। इससे जुड़े तीन मामले… 1. तोहफों की जानकारी छिपाने का आरोप 2022 में पाकिस्तान के चुनाव आयोग ने इमरान को तोहफों की जानकारी गलत तरीके से घोषित करने का दोषी माना और उन्हें अयोग्य ठहराया। 2. तोशाखाना का पहला मामला इमरान पर आरोप था कि उन्होंने कुछ महंगे तोहफे तय कीमत देकर अपने पास रखे और बाद में बेच दिए। अगस्त 2023 में उन्हें 3 साल की सजा सुनाई गई। बाद में सजा निलंबित हो गई। 3. तोशाखाना-2 मामला इसमें 2021 में सऊदी क्राउन प्रिंस से मिले बुल्गारी ज्वेलरी सेट का मामला है। अभियोजन के मुताबिक इसकी कीमत करीब 8 करोड़ पाकिस्तानी रुपए थी, जबकि इसे करीब 29 लाख रुपए में रखने का आरोप है। इमरान खान के प्रमुख केस की वर्तमान स्थिति 1. तोशाखाना केस 2023 में इमरान खान को तोशाखाना मामले में 3 साल की सजा हुई थी। बाद में यह सजा निलंबित हुई। हालांकि, बाद में तोशाखाना से जुड़े एक अन्य मामले में दिसंबर 2025 में इमरान खान और बुशरा बीबी को 17-17 साल की सजा सुनाई गई। यह सजा महंगे सरकारी तोहफों की कथित कम कीमत पर खरीद से जुड़े मामले में है। 2. साइफर केस इमरान खान को साइफर/स्टेट सीक्रेट्स केस में मिली 10 साल की सजा हाईकोर्ट ने पलट दी थी। जून 2024 में उन्हें इस मामले में बरी कर दिया गया। 3. इद्दत निकाह केस फरवरी 2024 में इमरान खान और बुशरा बीबी को 7-7 साल की सजा मिली थी। जुलाई 2024 में दोनों को इस मामले में बरी कर दिया गया। 4. अल-कादिर ट्रस्ट/£190 मिलियन केस यह मामला इमरान खान के प्रधानमंत्री रहते हुए ब्रिटेन से पाकिस्तान लौटाए गए करीब £190 मिलियन और उससे जुड़े कथित भ्रष्टाचार से संबंधित है।17 जनवरी 2025 को इमरान खान को 14 साल और बुशरा बीबी को 7 साल की सजा सुनाई गई। मई 2026 में इस सजा को निलंबित करने की उनकी याचिका इस्लामाबाद हाईकोर्ट ने खारिज कर दी। उनकी मुख्य अपील पर सुनवाई जारी है।

अमित शाह का इतना भरोसा!

अमित शाह ने इस सप्ताह खम ठोंक कर कहा कि विपक्ष कुछ कर लें 2029 में मोदी जीतेंगे। कांग्रेस की लगातार चौथी हार होगी। सवाल है यह शाह की गणित है या अहंकार? आखिर 2029 के चुनाव में अभी ढाई वर्ष से अधिक का समय है। तब तक देश की आर्थिकी का कैसा कबाड़ा होगा? 35 वर्ष की उम्र से कम नौजवानों की उम्मीदों और बेकारी का गुस्सा किस करवट बैठेगा? नैरेटिव कैसा चलेगा? ट्रंप, शी जिनपिंग, मुनीर जैसी विदेशी ताकतें भारत का कितना टेंटुआ दबा चुकी होंगी? इसलिए कि घर के अंदर हो या घर के बाहर कोई ऐसा है नहीं, जिसे मोदी सरकार ने ठगा नहीं! बावजूद इसके अमित शाह के लिए 2029 का चुनाव चुटकी बजा कर जीतना वैसा ही है जैसे महाराष्ट्र, बिहार, बंगाल जीता और आने वाले महीनों में जीतेंगे। मानों चुनाव होना महज औपचारिकता हो। नतीजा उन्होंने पहले से लिखाया हुआ हो। 13 अक्टूबर का उनका वाक्य था, ‘2029 के चुनाव में भी कांग्रेस बुरी तरह से हारेगी’।

यों राजनीति में नेता की मजबूरी होती है कि वह आत्मविश्वास दिखाए। पर अमित शाह का हुंकारा उस समय और परिस्थितियों में है, जिसमें अब गारंटीशुदा माना जा रहा है कि मतदाता सूचियों में वोटरों के नाम कटवा कर, हटवा कर भाजपा पश्चिम बंगाल में चुनाव जीती है। 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदाताओं के मोदी से मोहभंग को मोदी सरकार-चुनाव आयोग की मशीनरी ने वोट सूचियों में हेराफेरी से पलटा है। देश अब करोड़ों नामों (15 करोड़ मतदाताओं के अनुमान!) के कटने, नए नाम जुड़वाने की शर्तों, माता-पिता के दस्तावेजों, प्रवासी मजदूरों और पहली बार वोट देने वाले नौजवानों की पात्रता पर तलवार लटकी देख रहा है। चुनाव आयोग अराजक सूचियां बना रहा है!

सोचें, इसके पीछे की राजनीति पर। जरा सोचें। चुनाव में जनता किसे वोट देगी, उससे पहले यह तय होता है कि वोट देने वालों की सूची में कौन होगा? फिर यह कि किस इलाके के वोट किस लोकसभा क्षेत्र में (आगे की सीट परिसीमन योजना) गिने जाएंगे! फिर इरादा महिला आरक्षण लागू कराने का है। मतलब किस सीट पर किस तरह का उम्मीदवार खड़ा करने में मोदी-शाह का अपर हैंड। मुझे लग रहा है कि तीनों बातें चुनाव से पहले तय होंगी। तीनों के नियम, प्रक्रियाएं और प्रशासनिक फैसले (याकि सरकार) हैं। अब यदि इसी गेमप्लान में मोदी-शाह अपने चक्रवर्ती राजनीतिक भविष्य की गारंटी मान काम करें, सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग आदि सभी रास्ता बनवाएं तो सड़क पर राहुल गांधी या जेनरेशन ज़ेड कितना ही आंदोलन करें, हल्ला मचाएं पर 2029 के नतीजे मोदी के लिए पश्चिम बंगाल जैसे होंगे।

असली सवाल बूथ का है। मोदी की कमान में भाजपा ने बूथवार मतदाताओं का राजनीतिक हिसाब रखने के पेशेवरों (सर्वेयर, पन्ना प्रमुखों आदि) की फौज बनाई हुई है। इनके पास मतदाताओं की केवल जानकारी ही नहीं है, बल्कि मतदाता सूचियों में मनमाफिक छंटनी की सामर्थ्य भी है। फॉर्म-7 सबमिट करो और नाम कटाओ। फिलहाल इतना तो प्रमाणित है कि एसआईआर के बहाने बड़ी संख्या में मौजूद मतदाताओं के नाम हटे हैं। और नए नौजवानों के वोटर पंजीकरण की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल हैं। नौजवान पहले यों भी कम वोटर बनते थे लेकिन अब तो उनके आगे पंजीकरण में अतिरिक्त दस्तावेजी शर्तों को ऐसा बनाया है कि यूथ भले बेरोजगार भटकता रहे, सड़क पर आंदोलन करे लेकिन वोटर बनने के महत्त्व के प्रति लापरवाह बना रहेगा। जैसे नौकरी के आवेदनों से निराशा है वैसे ही वोटर बनने की भागदौड़ से बेरुखी रही तो 2029 में मोदी 2014 से भी बड़े बहुमत से जीतेंगे।

यही अमित शाह के आत्मविश्वास का बीजमंत्र है। सो, जेनरेशन ज़ेड का सड़क पर गुस्सा एक बात है और मतदाता सूची में उनका नाम होना दूसरी। फिर मतदान केंद्र पहुंचकर वोट डालना तीसरी। यदि पहली बार वोट देने वाले लाखों पात्र नौजवानों के पंजीकरण में बाधाएं हों तो उनकी राजनीतिक सक्रियता और चुनावी भागीदारी के बीच फासला अपने आप होगा।

अमित शाह ने कांग्रेस को याद दिलाया कि वह एसआईआर से पहले भी चुनाव हारती रही है। सही है। लेकिन इससे एसआईआर के सवाल का जवाब कैसे है? कांग्रेस 2014 और 2019 में हारी, 2024 में भी सरकार नहीं बना सकी। मगर 2024 में भाजपा की अपनी सीटें 303 से घटकर 240 हुई थीं। कांग्रेस 52 से 99 पर पहुंची थी। तब क्या उस चुनाव का सबक केवल कांग्रेस की हार था? या यह भी था कि पूर्ण बहुमत वाली भाजपा को गठबंधन के सहारे सरकार बनानी पड़ी? भाजपा के जीत के लाले पड़े तो एसआईआर को सुनियोजित नए फॉर्म, नई प्रक्रियाओं याकि झंझटों से भरपूर बनाने की धांधलेबाजी हुई।

कितने भक्तों के भरोसे 2029 की जीत?

सवाल है भाजपा के पास ऐसे कितने करोड़ वोट हैं जो कुछ भी हो जाए, मोदी के नाम पर ही वोट देंगे? महंगाई बढ़े, बेरोजगारी बढ़े, रुपया गिरे, नौजवान सड़कों पर उतरें, मुसलमान नाराज हों, दलित और आदिवासी बिदकें, तब भी जिनका वोट नहीं बदलेगा। क्या ऐसे मतदाता बीस करोड़ हैं? पच्चीस करोड़ हैं? या तीस करोड़? पिछले तीन चुनावों का हिसाब देखें। 2014 में भाजपा को 31.34 प्रतिशत वोट मिले थे। 2019 में यह बढ़कर 37.7 प्रतिशत हुआ। फिर 2024 में घटकर 36.56 प्रतिशत रह गया। एनडीए को इन तीन चुनावों में क्रमशः लगभग 38.5, 45.4 और 43.8 प्रतिशत वोट मिले। मतलब 2019 के मुकाबले 2024 में भाजपा और एनडीए, दोनों का वोट प्रतिशत घटा। भाजपा की सीटें 303 से घटकर 240 हो गईं। बावजूद इस ट्रेंड के अमित शाह को 2029 में जीत का पक्का भरोसा है!

सवाल है क्या उन्हें लगता है कि भाजपा के 2024 के लगभग 23.6 करोड़ मतदाता अब स्थायी मोदी भक्त बन चुके हैं? या एनडीए के लगभग 28.3 करोड़ वोटों में कोई कमी संभव नहीं? लेकिन इन संख्याओं में तो सब तरह के मतदाता हैं। हिंदुत्व के पक्के समर्थक हैं तो सरकारी योजनाओं के लाभार्थी भी। जाति के हिसाब से वोट देने वाले हैं तो स्थानीय उम्मीदवार के कारण भाजपा को चुनने वाले भी। कुछ मोदी के नाम पर वोट देते हैं तो कुछ विपक्ष को पसंद नहीं करने के कारण। इनमें से कितने ऐसे हैं जो हर परिस्थिति में भाजपा को ही वोट देंगे?

ऐसी ही एक दूसरी गणित भी है। 2014 में भाजपा ने महज 31.34 प्रतिशत वोटों से लोकसभा में अपने दम पर बहुमत बनाया था। यानी सौ वोट डालने वालों में लगभग 69 ने भाजपा को वोट नहीं दिया, फिर भी उसे पूर्ण बहुमत मिला। 2019 में 37.7 प्रतिशत वोटों से 303 सीटें मिलीं। और 2024 में 36.56 प्रतिशत वोटों पर 240 सीटें। अंतर सिर्फ वोट प्रतिशत का नहीं था। वोट कहां पड़े, किस सीट पर विपक्ष बंटा, कहां उम्मीदवार मजबूत था, कहां गठबंधन बना, इन बातों से सीटों का गणित बदला और हमेशा बदलता है।

यहीं 2029 में मोदी-शाह की जीत का असली सूत्र याकि रहस्य है। भाजपा को देश के पचास प्रतिशत मतदाताओं का समर्थन मिलना जरूरी नहीं। उसे उन निर्वाचन क्षेत्रों में पर्याप्त वोट चाहिए जहां से लोकसभा की बहुमत वाली संख्या बनती है। इसलिए संभव है कि देश में असंतोष बढ़े, कई सामाजिक समूहों में नाराजगी हो, नौजवान आंदोलन करें, फिर भी पार्टी विशेष का चुनावी आधार बना रहे। हालांकि इसमें यह भी खतरा है कि राष्ट्रीय वोट प्रतिशत में मामूली गिरावट से दर्जनों सीटें हाथ से निकल जाएं। जैसे 2024 में भाजपा का अनुभव था।

फिलहाल जेनरेशन ज़ेड का भौकाल मुखर है। नौजवानों में आज कितने मोदी समर्थक हैं और कितने विरोधी? मुसलमानों, दलितों और आदिवासियों में कितने भाजपा को वोट देते हैं? पर इन्हें एक साथ जोड़कर कोई मोदी विरोधी आबादी नहीं बनाई जा सकती। जेनरेशन ज़ेड में भी मोदी समर्थक हैं। दलितों और आदिवासियों में भी भाजपा को वोट मिले हैं। लेकिन यह भी सच है कि एक ही मतदाता युवा भी हो सकता है, दलित भी और किसी आंदोलन का समर्थक भी। इसलिए इन समूहों की आबादी जोड़कर भाजपा विरोधी वोटों की संख्या निकालना संभव ही नहीं।

तो अमित शाह ने कैसे हिसाब लगाया हुआ होगा? मेरा मानना है कि वे भाजपा के प्रतिबद्ध वोटों पर निर्भर नहीं रहते। वह बूथवार वोट हिसाब के पारखी हैं। समर्थकों को मतदान केंद्र तक पहुंचाने से लेकर उम्मीदवार, गठबंधन और स्थानीय सामाजिक समीकरणों का हिसाब रखते हैं। अब इस सबके साथ मतदाता सूचियों के एसआईआर, परिसीमन और महिला आरक्षण की संभावनाएं भी हैं। इसलिए राहुल गांधी, कांग्रेस और विपक्ष के लिए जीवन-मरण का स्वाभाविक सवाल है कि 2029 का चुनाव आखिर किन मतदाता सूचियों, किन निर्वाचन क्षेत्रों और किन नियमों के अंतर्गत होगा?

कैसे? आखिर जब चुनावी जीत का अंतर कई जगह कुछ हजार वोटों का हो, तब मतदाताओं के नाम कटने या जुड़ने से ही चुनावी मुकाबला तय होता है। पश्चिम बंगाल उदाहरण है। दो-चार, दस लाख नहीं, लाखों (39 लाख) वैध दस्तावेजी सबूतों के बावजूद वोट डालने के अधिकार से वंचित किया गया। ऐसा चुनाव आयोग, ट्रिब्यूनल और सुप्रीम कोर्ट सभी के बावजूद हुआ।

तो नरेंद्र मोदी-अमित शाह के 2029 में चुनाव जीतने के अडिग विश्वास का कारण सत्ता का ऐसा दुरुपयोग और अहंकार क्या नहीं है? यदि 2024 के 23.6 करोड़ भाजपा वोटों को भक्तों की स्थायी संख्या भी मान लें तब भी इनके बूते जीत संभव नहीं है जब तक वोट सूची ईमानदार न हो। 2029 में कितने करोड़ नए या पुराने वोटर मतदान करने के पात्र रहेंगे? कितने कटेंगे, और कितने बंगाल की तरह लटकाए रखे जाएंगे, उससे अधिक तय होगा?

सो, भाजपा को 2029 में कितने करोड़ लोग पसंद करते हैं, से अधिक महत्त्वपूर्ण होगा कि उसने सीटवार अपने वोट कितने करवाए हुए हैं? और यह काम ज्ञानेश कुमार की कमान के चुनाव आयोग के जरिए चुटकियों में संभव बना रहेगा।

एसआईआर घुसपैठियों के लिए नहीं है

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता यहां तक कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन जैसे नेता यह स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर का उद्देश्य घुसपैठियों को देश से बाहर निकालना है। इसी आधार पर उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी का एसआईआर विरोधी प्रदर्शन घुसपैठियों को बचाने के लिए हो रहा है। उनको लग रहा है कि जैसे ही घुसपैठिया शब्द कहेंगे वैसे ही मामला हिंदू और मुस्लिम का हो जाएगा और हिंदू मतदाता राहुल के खिलाफ हमलावर हो जाएंगे। ध्यान रहे घुसपैठियों का मामला भाजपा का पुराना चुनावी एजेंडा रहा है। बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे सीमावर्ती राज्यों के साथ साथ राजधानी दिल्ली से लेकर हरियाणा और महाराष्ट्र तक भाजपा घुसपैठियों के मुद्दे पर वोट मांगती रही है। हाल में संपन्न हुए पश्चिम बंगाल के चुनाव में घुसपैठियों का मुद्दा बहुत बड़ा था। लेकिन क्या भाजपा एसआईआर को घुसपैठियों से जोड़ कर राहुल गांधी और विपक्ष के आंदोलन की साख खराब कर पाएगी?

यह मुश्किल लग रहा है क्योंकि एसआईआर की प्रक्रिया को घुसपैठियों की पहचान करने वाला अभियान साबित करना ही मुश्किल होगा। अगर एसआईआर का मकसद घुसपैठियों की पहचान करके उनको निकालने का है तो सरकार और चुनाव आयोग क्यों नहीं बता रहे हैं कि अब तक 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हुई एसआईआऱ में कितने घुसपैठियों की पहचान हुई है, कितने पकड़े गए हैं और कितने लोगों को बाहर निकाला गया है? पिछले साल जून में जब बिहार से एसआईआर का अभियान शुरू हुआ तभी इससे जुड़े कई मामले सुप्रीम कोर्ट में पहुंचे थे और सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट कर दिया था कि नागरिकता तय करने का अधिकार चुनाव आयोग के पास नहीं है। ऐसे ही घुसपैठियों की पहचान करना और उन्हें बाहर निकालने का न तो अधिकार चुनाव आयोग के पास है और न उसके पास इसके लिए जरूरी साधन हैं।

तभी यह सवाल उठा था कि अगर चुनाव आयोग को एसआईआर के दौरान किसी मतदाता की नागरिकता पर संदेह होता है तो वह क्या करेगा? उस समय अदालत ने कहा था कि चुनाव आयोग ऐसे मामले केंद्रीय गृह मंत्रालय के संज्ञान में ले लाएगा। क्या चुनाव आयोग बता सकता है कि उसने 13 करोड़ से ज्यादा जो नाम काटे हैं उनमें से कितने लोगों की नागरिकता पर संदेह हुआ और उसने कितने मामले गृह मंत्रालय को कार्रवाई के लिए भेजे? अगर गोपनीय तरीके से कुछ मामले गृह मंत्रालय की संज्ञान में लाए गए हों तो अलग मामला है। लेकिन सार्वजनिक रूप से ऐसे किसी मामले की खबर नहीं है। इसका मतलब है कि ज्यादातर राज्यों में एसआईआर की प्रक्रिया का कम से कम एक चरण पूरा हो चुका है अभी तक घुसपैठियों का कोई आधिकारिक आंकड़ा सामने नहीं आया है।

हालांकि सोशल मीडिया में राइटविंग के कुछ अपढ़ और कुपढ़ लोग एक अनुमान लगा रहे हैं कि 13 करोड़ जो नाम कटे हैं उनमें करीब तीन करोड़ ऐसे लोगों के हैं, जो सत्यापन के दौरान अपने पते पर नहीं मिले। गौरतलब है कि 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 2.80 करोड़ लोगों का नाम मृत श्रेणी में कटा है और 6.30 करोड़ के करीब लोगों के लिए कहा गया है कि वे स्थायी रूप से शिफ्ट कर गए हैं। इसके अलावा एक करोड़ से कुछ ज्यादा लोग डुप्लीकेट वोट वाले बताए गए हैं। इस आधार पर कहा जा रहा है कि जो तीन करोड़ लोग सत्यापन के दौरान पते पर नहीं मिले वे ही घुसपैठिया हैं। सोचें, अगर इनके अनुमान को मान लिया जाए तो देश में तीन करोड़ यानी कुल आबादी की दो फीसदी से ज्यादा आबादी घुसपैठियों की है! क्या यह संभव है? अगर ऐसा है तो 12 साल से सरकार चला रहे नरेंद्र मोदी और सात साल से ज्यादा समय से देश का गृह मंत्रालय संभाल रहे अमित शाह क्या जवाब देंगे? वे क्या बताएंगे कि इतने घुसपैठिए कहां से आए? अगर पहले से थे तो 12 साल में उनको निकालने के लिए क्या किया गया? 12 साल में कितने लोग निकाले गए? और अगर सचमुच आज इतने घुसपैठिए हैं तो उनको निकालने के लिए क्या हो रहा है?

असल में यह मामला घुसपैठियों का है ही नहीं। सरकार को यह पता है और सरकार व भाजपा के लोग भी पहले यह दावा नहीं करते थे कि घुसपैठियों को पहचानने या हटाने के लिए एसआईआर हो रही है। पहले यही कहा जाता था कि मतदाता सूची की शुद्धता के लिए ऐसा किया जा रहा है। भाजपा के प्रवक्ता मीडिया में सवाल पूछते थे कि क्या मर चुके लोगों का नाम मतदाता सूची में होना चाहिए या क्या एक व्यक्ति का नाम दो जगह मतदाता सूची में होना चाहिए? अब ये सवाल बदल गए हैं। जब से राहुल गांधी और विपक्ष की पार्टियों ने एसआईआर के खिलाफ आंदोलन तेज किया है और कॉकरोच जनता पार्टी ने पेपर लीक सहित दूसरे अन्य मामलों में जनता खास कर युवाओं की नाराजगी को वोट चोरी के मामले से जोड़ा है तब से भाजपा ने घुसपैठियों की पहचान का दावा शुरू कर दिया है। भाजपा को लग रहा है कि किसी भावनात्मक या सांप्रदायिक मुद्दे से ही राहुल गांधी के अभियान की साख बिगाड़ी जा सकती है।

याद करें कैसे नोटबंदी के समय इसी तरह से गोलपोस्ट बदला जाता था। जो अभियान काला धन और जाली नोट खत्म करने के नाम पर शुरू हुआ था उसके लिए बाद में कहा गया कि यह आतंकवादियों, नक्सलियों की कमर तोड़ने और देश में डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देने के लिए हुई थी। वैसे ही मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के अभियान को घुसपैठियों की पहचान के अभियान में बदल दिया गया है। इसका एकमात्र मकसद राहुल गांधी के विरोध प्रदर्शन की साख बिगाड़ना है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि केंद्रीय गृह मंत्री और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन एसआईआर का जो मकसद बता रहे हैं वही मकसद सरकार सुप्रीम कोर्ट में बताती है या नहीं और अगर बताती है तो घुसपैठियों की कोई संख्या बताती है या नहीं?

राहुल के मार्च से सुप्रीम कोर्ट नाराज

नई दिल्ली। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और विपक्ष के अन्य नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करके अदालत को नाराज कर दिया है। अदालत ने राहुल सहित सभी नेताओं को नोटिस जारी किया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने तीखी टिप्पणी भी की है। विपक्ष के नेताओं की ओर से 12 अक्टूबर को दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए गुरुवार को चीफ जस्टिस ने कहा कि कोई भी कोर्ट को डरा धमकाकर दबाव में नहीं ला सकता। ऐसी कोशिशें बेकार हैं। इन पर कोई ध्यान नहीं देता।

चीफ जस्टिस इतने पर नहीं रूके। उन्होंने आगे कहा, ‘हमें पता कि कोर्ट के बाहर क्या कहा जा रहा है और कोर्ट के अंदर क्या कहा जा रहा है। हम किसी काल्पनिक दुनिया में नहीं जी रहे हैं। हमें हर बात की जानकारी है’। चीफ जस्टिस ने किसी नेता का नाम नहीं लिया लेकिन जब उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ताओं में से एक के आचरण पर सवाल करेंगे और उसे सफाई देनी होगी तो उनका इशारा राहुल गांधी की ओर ही था।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने 12 अक्टूबर को अदालत परिसर में विपक्षी नेताओं और उनके समर्थकों के जुटने से जुड़े मामले में राहुल गांधी, अखिलेश यादव और अन्य 14 नेताओं को नोटिस जारी किया है। वहीं, SIR प्रक्रिया और चुनाव आयोग के फैसलों के खिलाफ इन नेताओं की याचिका पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगा। 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट परिसर में विपक्षी नेताओं और उनके समर्थकों के जुटने से जुड़े मामले में राहुल गांधी, अखिलेश यादव और अन्य 14 नेताओं को नोटिस जारी किया है।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले विपक्ष के प्रति सद्भाव दिखाया था। जब विपक्ष की ओर से उनसे मिलने का समय मांगा गया तो उन्होंने कई कारण बताते हुए मिलने से इनकार कर दिया था। लेकिन यह कहा था कि अगर विपक्षी नेता याचिका दायर करते हैं तो उस पर जल्दी सुनवाई की जाएगी। लेकिन उस समय उनको आइडिया नहीं था कि उनके इनकार के बाद विपक्ष के नेता सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करेंगे और खुद परिसर में आकर याचिका दायर करेंगे। उनके इनकार के बाद विपक्षी नेता कनॉट प्लेस से मार्च करते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे और वहां याचिका दायर की थी। हालांकि याचिका में कई कमियां थीं, जिन्हें बाद में दुरुस्त किया गया और उस पर गुरुवार को सुनवाई हुई।

विवाद के बाद मतदाता सूची की समीक्षा की घोषणा

नई दिल्ली। चुनाव आयोग ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में गड़बड़ियों को लेकर चल रहे विवाद के बीच अब 17 राज्यों में मतदाता सूची की स्पेशल समरी रिवीजन यानी एसएसआर का ऐलान किया है। गौरतलब है कि मतदाता सूची का समरी रिवीजन यानी संक्षिप्त समीक्षा हमेशा चलती रहती है। इस बार स्पेशल समरी रिवीजन की घोषणा हुई है। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान सहित 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में यह काम होगा।

संक्षिप्त समीक्षा के दौरान मतदाता सूची को और अद्यतन बनाया जाएगा। इसमें नए नाम जोड़े जाएंगे और पहले से दर्ज जानकारी में गलतियां सुधारी जाएंगी। आयोग ने कहा है कि 2027 में 18 साल की उम्र पूरी करने वाले युवा भी मतदाता सूची में अपना नाम जुड़वाने के लिए आवेदन कर सकेंगे। गौरतलब है कि एसआईआर के दौरान 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में करीब 13 करोड़ नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं।

बहरहाल, चुनाव आयोग ने कहा है कि जिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर चल रहा है या हाल ही में पूरा हुआ है, वहां एसएसआर का शेड्यूल बाद में घोषित किया जाएगा। चुनाव आयोग ने कहा है कि एसएएआर का मकसद वोटर लिस्ट को सही और अपडेट रखना है। इसके तहत पात्र मतदाताओं के नाम जोड़ने, दर्ज जानकारी में गलतियां सुधारने और जरूरी बदलाव करने का काम होगा। इसमें युवाओं और पहली बार वोट देने वाले लोगों को शामिल करने पर खास ध्यान दिया जाएगा।

आयोग ने बताया है कि एक जनवरी 2027 के अलावा एक अप्रैल, एक जुलाई और एक अक्टूबर 2027 को 18 साल की उम्र पूरी करने वाले युवा भी पहले से आवेदन कर सकेंगे। चुनाव आयोग के मुताबिक दो नवंबर 2026 तक मतदान केंद्रों की व्यवस्था में जरूरी बदलाव किए जाएंगे। इसके बाद 12 नवंबर को मतदाता सूची की मसौदा कॉपी जारी होगी। मसौदा सूची में नाम या जानकारी को लेकर 12 नवंबर से 11 दिसंबर तक दावे और आपत्तियां दर्ज कराई जा सकेंगी। इनका निपटारा 28 दिसंबर तक किया जाएगा। इसके बाद चार जनवरी 2027 को वोटर लिस्ट की अंतिम सूची जारी होगी।