चीन के अमीर अरबपतियों पर कस रहा टैक्स का शिकंजा, जानिए यहां के रईसों की कैसे बढ़ने वाली हैं मुश्किलें

चीनी कारोबारी अपनी कमाई पर कर बचाने के लिए ग्लोबल एक्सचेंज पर बिजनेस लिस्ट करने और अपने अरबों डॉलर ऑफशोर रखने का तरीका अपनाते रहे हैं। लेकिन अब ऐसा नहीं हो सकता है, क्योंकि टैक्स अधिकारियों ने जुलाई में कहा कि वे स्थानीय करदाताओं के लिए विदेशी ट्रस्ट से होने वाले मुनाफे पर 20% टैक्स लगाना शुरू करेंगे। इन लोगों के पास अब 22 अक्टूबर तक बिना किसी पेनल्टी के अपनी देनदारियों को टैली करने, रिपोर्ट करने और चुकाने का समय है।

ब्लूमबर्ग बिलियनेयर्स इंडेक्स के अनुसार, इस कदम से दुनिया के 500 सबसे अमीर लोगों में से आठ और उनके लाभार्थी सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। स्टॉक एक्सचेंज फाइलिंग के मुताबिक इन टाइकून्स के ऑफशोर ट्रस्ट के जरिए चीन में बड़े ऑपरेशन वाले बिजनेस में लिस्टेड स्टेक हैं। चीनी सरकार ने किसी भी व्यक्ति को सार्वजनिक तौर से अलग नहीं किया है। यह साफ़ नहीं है कि इनमें से किसी अरबपति को अपने विदेशी ट्रस्ट से हुए मुनाफे पर टैक्स देना होगा या उनसे ऐसा करने के लिए कहा गया है। ब्लूमबर्ग के रेगुलेटरी फाइलिंग के आधार पर की गई गणना के मुताबिक, शुक्रवार तक उनकी होल्डिंग्स कुल मिलाकर लगभग $140.2 बिलियन थीं।

चीन की कुछ सबसे जानी-मानी कंपनियों की स्थापना करने वाले आठ अरबपतियों ने अपने ट्रस्ट ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स और केमैन आइलैंड्स जैसे टैक्स हेवन में खोले हैं। वीडियो गेम डेवलपर NetEase Inc. चलाने वाले विलियम डिंग इनमें शामिल हैं। विदेशों में उनके लगभग $37 बिलियन रखे हैं, और कॉलिन हुआंग, जिन्होंने ई-कॉमर्स की बड़ी कंपनी PDD Holdings Inc. लॉन्च की और चीन के बाहर उनके पास $29 बिलियन हैं।

एल्युमिनियम बनाने वाली कंपनी चाइना होंगकियाओ ग्रुप लिमिटेड के एक स्पोक्सपर्सन ने कहा कि उसके फाउंडर झांग बो और कंपनी की लीडरशिप को टैक्स पॉलिसी में बदलाव से जोड़ना “बेबुनियाद और गुमराह करने वाला है।” बाकी सात कंपनियों के प्रतिनिधियों ने टिप्पणी के अनुरोध का जवाब नहीं दिया। विदेशों में ज्यादातर पैसा उन निवेशों से जमा हुआ था जो कंपनियों ने अमेरिका या हांगकांग में इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग पूरी करने से पहले किए थे। उनमें से कुछ कारोबार, जैसे PDD और पॉप मार्ट, ने ट्रेडिंग शुरू करने के बाद से वैल्यू में बहुत बढ़ोतरी की है, जिससे उनके संस्थापकों को कागज पर अरबों डॉलर मिले हैं।

लॉ फर्म इंस एंड कंपनी हांगकांग के पार्टनर केविन वू ने कहा कि टैक्स में हड़पने से पुराने मनी ट्रस्ट पर ज्यादा असर पड़ता है। उन्होंने कहा, “कंपनी के पब्लिक होने के बाद मूल्य बहुत बढ़ जाता है।” जिन होने वाले क्लाइंट्स ने बहुत पहले अपनी कंपनियों को लिस्ट किया था, वे “ऐसे इनवेंटिव वकीलों की मांग कर रहे हैं जो सिर्फ नियम बताने के बजाय ट्रस्ट को रीस्ट्रक्चर कर सकें।” उन्होंने ब्लूमबर्ग द्वारा पहचाने गए आठ अरबपतियों के बजाय अपनी बातचीत का जिक्र करते हुए कहा।

टैक्स कलेक्शन का यह अभियान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के “आम खुशहाली” के अभियान का ही एक हिस्सा है, जिसमें घरेलू टेक्नोलॉजी की बड़ी कंपनियों पर कार्रवाई और बैंकरों की सैलरी में कटौती शामिल थी। भले ही पिछले कुछ सालों में इनमें से कुछ पाबंदियां कम हुई हैं, लेकिन लंबे समय से चल रही प्रॉपर्टी की मंदी ने स्थानीय सरकारों के फाइनेंस को भी गहरा झटका दिया है, जिससे रेवेन्यू के दूसरे सोर्स खोजने पड़े हैं।

यूनियन बैंकेयर प्रिवी में एशिया के सीनियर इकोनॉमिस्ट कार्लोस कैसानोवा ने कहा, “उन्हें स्थानीय और केंद्र सरकार के लेवल पर रेवेन्यू के सोर्स को बेहतर बनाने की जरूरत है और वे एक चैनल के तौर पर ऑफशोर वेल्थ की तलाश कर रहे हैं।”

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सरकार को चैन नहीं लेने देगी कांग्रेस

ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस पार्टी ने फैसला कर लिया है कि वह सरकार को चैन नहीं लेने देगी। इसके लिए उसने तय किया है कि वह सरकार के हर फैसले को संदिग्ध बना देगी और हर कदम पर उससे सवाल करेगी। इसका पता नहीं कितना राजनीतिक लाभ मिलेगा लेकिन यह जरूर है कि भाजपा और सरकार के तंत्र को जवाब देने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर और पहले से चल रहे विवादों को छोड़ दें तो हाल के दो मामले ऐसे हैं, जिनमें ऊपरी तौर पर कोई गड़बड़ी नहीं दिख रही है लेकिन कांग्रेस ने इसे मुद्दा बना दिया और ऐसा विवाद खड़ा किया कि सरकार बैकफुट पर आ गई है।

पहला मामला अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो के भारत दौरे से जुड़ा है। विदेश मंत्री एस जयशंकर और रूबियो की मुलाकात मुंबई में तय हुई है। इस पर राहुल गांधी ने कहा कि अमेरिका के विदेश मंत्री ने अपने कर्मचारी को मुंबई तलब किया। इस बात को कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी आगे बढ़ाया। अब सोचें, भारत के दौरे पर आ रहे अमेरिका के विदेश मंत्री से अगर भारत के विदेश मंत्री देश के किसी और शहर में मिलेंगे तो यह कहा जाएगा कि उनको वहां तलब किया गया? भारत के विदेश मंत्री को अमेरिकी विदेश मंत्री का कर्मचारी बता कर राहुल कौन सा नैरेटिव सेट कर रहे हैं? लेकिन उन्होंने जानते बूझते ऐसा कर दिया क्योंकि उनको पता है कि सरकार इस पर भी बैकफुट पर आएगी। कई बार ऐसा होता है कि नेता राजधानी से इतर दूसरे शहरों में मिलते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन गए तो राष्ट्रपति शी जिनपिंग से उनकी मुलाकात वुहान में हुई। तो क्या कहा जा सकता है कि मोदी ने जिनपिंग को वुहान तलब किया?

बहरहाल, दूसरा मामला जनगणना के नियमों में बदलाव का है। भारत के महापंजीयक ने अगले साल होने वाली जनगणना में सरकारी कर्मचारियों और शिक्षकों के अलावा निजी स्कूलों के शिक्षकों व कर्मचारियों और वॉलंटियर्स को भी शामिल करने का फैसला किया है। महापंजीयक कार्यालय की ओर से इसका आदेश निकला तो कांग्रेस ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के लोगों के लिए रोजगार योजना है। जबकि यह एक अच्छी पहल है कि वॉलंटियर्स को प्रशिक्षण देकर इस तरह के कामों में लगाया जाए। इससे स्कूलों में शिक्षकों की कमी से होने वाली समस्याएं कम होंगी, स्कूलों में पढ़ाई का काम कम प्रभावित होगा और सरकारी कार्यालयों के कामकाज में आने वाली बाधा भी दूर होगी। इसी तरह की योजना के तहत अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में अपनी सरकार रहते हुए अपने कार्याकर्ताओं को सिविल डिफेंस वॉलंयिटर्स के रूप में भर्ती किए थे। अपने लोगों को बस मार्शल में रखा था और चौराहों पर तख्ती लेकर खड़े होने के लिए भी अपने लोगों को चुना था। अगर यह रोजगार की भी योजना है तो इससे कुछ लोगों को काम मिलेगा।

अमित शाह का इतना भरोसा!

अमित शाह ने इस सप्ताह खम ठोंक कर कहा कि विपक्ष कुछ कर लें 2029 में मोदी जीतेंगे। कांग्रेस की लगातार चौथी हार होगी। सवाल है यह शाह की गणित है या अहंकार? आखिर 2029 के चुनाव में अभी ढाई वर्ष से अधिक का समय है। तब तक देश की आर्थिकी का कैसा कबाड़ा होगा? 35 वर्ष की उम्र से कम नौजवानों की उम्मीदों और बेकारी का गुस्सा किस करवट बैठेगा? नैरेटिव कैसा चलेगा? ट्रंप, शी जिनपिंग, मुनीर जैसी विदेशी ताकतें भारत का कितना टेंटुआ दबा चुकी होंगी? इसलिए कि घर के अंदर हो या घर के बाहर कोई ऐसा है नहीं, जिसे मोदी सरकार ने ठगा नहीं! बावजूद इसके अमित शाह के लिए 2029 का चुनाव चुटकी बजा कर जीतना वैसा ही है जैसे महाराष्ट्र, बिहार, बंगाल जीता और आने वाले महीनों में जीतेंगे। मानों चुनाव होना महज औपचारिकता हो। नतीजा उन्होंने पहले से लिखाया हुआ हो। 13 अक्टूबर का उनका वाक्य था, ‘2029 के चुनाव में भी कांग्रेस बुरी तरह से हारेगी’।

यों राजनीति में नेता की मजबूरी होती है कि वह आत्मविश्वास दिखाए। पर अमित शाह का हुंकारा उस समय और परिस्थितियों में है, जिसमें अब गारंटीशुदा माना जा रहा है कि मतदाता सूचियों में वोटरों के नाम कटवा कर, हटवा कर भाजपा पश्चिम बंगाल में चुनाव जीती है। 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदाताओं के मोदी से मोहभंग को मोदी सरकार-चुनाव आयोग की मशीनरी ने वोट सूचियों में हेराफेरी से पलटा है। देश अब करोड़ों नामों (15 करोड़ मतदाताओं के अनुमान!) के कटने, नए नाम जुड़वाने की शर्तों, माता-पिता के दस्तावेजों, प्रवासी मजदूरों और पहली बार वोट देने वाले नौजवानों की पात्रता पर तलवार लटकी देख रहा है। चुनाव आयोग अराजक सूचियां बना रहा है!

सोचें, इसके पीछे की राजनीति पर। जरा सोचें। चुनाव में जनता किसे वोट देगी, उससे पहले यह तय होता है कि वोट देने वालों की सूची में कौन होगा? फिर यह कि किस इलाके के वोट किस लोकसभा क्षेत्र में (आगे की सीट परिसीमन योजना) गिने जाएंगे! फिर इरादा महिला आरक्षण लागू कराने का है। मतलब किस सीट पर किस तरह का उम्मीदवार खड़ा करने में मोदी-शाह का अपर हैंड। मुझे लग रहा है कि तीनों बातें चुनाव से पहले तय होंगी। तीनों के नियम, प्रक्रियाएं और प्रशासनिक फैसले (याकि सरकार) हैं। अब यदि इसी गेमप्लान में मोदी-शाह अपने चक्रवर्ती राजनीतिक भविष्य की गारंटी मान काम करें, सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग आदि सभी रास्ता बनवाएं तो सड़क पर राहुल गांधी या जेनरेशन ज़ेड कितना ही आंदोलन करें, हल्ला मचाएं पर 2029 के नतीजे मोदी के लिए पश्चिम बंगाल जैसे होंगे।

असली सवाल बूथ का है। मोदी की कमान में भाजपा ने बूथवार मतदाताओं का राजनीतिक हिसाब रखने के पेशेवरों (सर्वेयर, पन्ना प्रमुखों आदि) की फौज बनाई हुई है। इनके पास मतदाताओं की केवल जानकारी ही नहीं है, बल्कि मतदाता सूचियों में मनमाफिक छंटनी की सामर्थ्य भी है। फॉर्म-7 सबमिट करो और नाम कटाओ। फिलहाल इतना तो प्रमाणित है कि एसआईआर के बहाने बड़ी संख्या में मौजूद मतदाताओं के नाम हटे हैं। और नए नौजवानों के वोटर पंजीकरण की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल हैं। नौजवान पहले यों भी कम वोटर बनते थे लेकिन अब तो उनके आगे पंजीकरण में अतिरिक्त दस्तावेजी शर्तों को ऐसा बनाया है कि यूथ भले बेरोजगार भटकता रहे, सड़क पर आंदोलन करे लेकिन वोटर बनने के महत्त्व के प्रति लापरवाह बना रहेगा। जैसे नौकरी के आवेदनों से निराशा है वैसे ही वोटर बनने की भागदौड़ से बेरुखी रही तो 2029 में मोदी 2014 से भी बड़े बहुमत से जीतेंगे।

यही अमित शाह के आत्मविश्वास का बीजमंत्र है। सो, जेनरेशन ज़ेड का सड़क पर गुस्सा एक बात है और मतदाता सूची में उनका नाम होना दूसरी। फिर मतदान केंद्र पहुंचकर वोट डालना तीसरी। यदि पहली बार वोट देने वाले लाखों पात्र नौजवानों के पंजीकरण में बाधाएं हों तो उनकी राजनीतिक सक्रियता और चुनावी भागीदारी के बीच फासला अपने आप होगा।

अमित शाह ने कांग्रेस को याद दिलाया कि वह एसआईआर से पहले भी चुनाव हारती रही है। सही है। लेकिन इससे एसआईआर के सवाल का जवाब कैसे है? कांग्रेस 2014 और 2019 में हारी, 2024 में भी सरकार नहीं बना सकी। मगर 2024 में भाजपा की अपनी सीटें 303 से घटकर 240 हुई थीं। कांग्रेस 52 से 99 पर पहुंची थी। तब क्या उस चुनाव का सबक केवल कांग्रेस की हार था? या यह भी था कि पूर्ण बहुमत वाली भाजपा को गठबंधन के सहारे सरकार बनानी पड़ी? भाजपा के जीत के लाले पड़े तो एसआईआर को सुनियोजित नए फॉर्म, नई प्रक्रियाओं याकि झंझटों से भरपूर बनाने की धांधलेबाजी हुई।

अमेरिका ने जमीन के नीचे धमाके किए:मकसद- परमाणु विस्फोट की पहचान करना, 2020 में चीन पर सीक्रेट न्यूक्लियर टेस्ट के आरोप लगे थे

अमेरिका ने बुधवार को नेवादा में जमीन के नीचे हाई-एक्सप्लोसिव टेस्ट किया। इसमें परमाणु हथियार का इस्तेमाल नहीं हुआ। इस प्रयोग का मकसद ऐसी तकनीक को बेहतर बनाना है, जिससे कम ताकत वाले या छिपाकर किए गए परमाणु विस्फोट का भी पता लगाया जा सके। अमेरिका ने साल 2020 में चीन पर लोप नूर परमाणु परीक्षण केंद्र में सीक्रेट न्यूक्लियर टेस्ट करने का आरोप लगाया था। जमीन के नीचे शक्तिशाली रासायनिक विस्फोटक लगाए प्रयोग नेवादा नेशनल सिक्योरिटी साइट के P-टनल इलाके में किया गया। वैज्ञानिकों ने जमीन के नीचे शक्तिशाली रासायनिक विस्फोटक लगाए और विस्फोट के दौरान पैदा होने वाले कंपन, ध्वनि और दूसरे संकेतों को रिकॉर्ड किया। इसके लिए कई तरह के सेंसर लगाए गए थे। अमेरिका के मुताबिक, इस टेस्ट से मिले डेटा से कंप्यूटर मॉडल और डिटेक्शन सिस्टम को बेहतर किया जाएगा, ताकि दुनिया में कहीं भी होने वाले संभावित परमाणु धमाकों का पता लगाया जा सके। परमाणु बम का इस्तेमाल क्यों नहीं किया? अमेरिका का मकसद परमाणु धमाका करना नहीं था। वैज्ञानिकों ने उसकी जगह बड़े रासायनिक विस्फोट किए। इन विस्फोटों से जमीन में जो कंपन पैदा हुआ, उसका अध्ययन किया गया। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि अगर भविष्य में कहीं परमाणु परीक्षण होता है, तो उसे पहचानने वाले सिस्टम क्या संकेत पकड़ सकते हैं। छिपे हुए परमाणु धमाके पकड़ना आसान नहीं आमतौर पर जब जमीन के नीचे परमाणु धमाका होता है, तो उससे भूकंप जैसा कंपन पैदा होता है। दुनिया भर में लगे सेंसर इसी कंपन को पकड़कर पता लगाते हैं कि कहीं परमाणु परीक्षण तो नहीं हुआ। लेकिन अगर कोई देश धमाका ऐसी जगह करे कि उसका कंपन बाहर कम पहुंचे, तो उसे पकड़ना मुश्किल हो सकता है। आसान भाषा में कहें तो धमाका तो होगा, लेकिन उसके निशान कमजोर दिखेंगे। अमेरिका का कहना है कि वह ऐसी तकनीक तैयार कर रहा है, जिससे कम ताकत वाले या छिपाने की कोशिश किए गए परमाणु परीक्षणों का भी आसानी से पता लगाया जा सके। चीन ने अमेरिका के आरोप को खारिज किया था अमेरिका का आरोप है कि चीन ने 22 जून 2020 को शिनजियांग के लोप नूर परमाणु परीक्षण केंद्र में सीक्रेट भूमिगत परमाणु परीक्षण किया था। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, वहां 2.75 तीव्रता का भूकंपीय झटका रिकॉर्ड हुआ था। उनका दावा था कि यह सामान्य भूकंप या खनन से हुआ धमाका नहीं था। अमेरिका का कहना है कि चीन ने ‘डिकपलिंग’ तकनीक अपनाई, जिसमें धमाके को जमीन के अंदर बड़ी गुफा में किया जाता है। इससे निगरानी सिस्टम में झटके रिकॉर्ड नहीं होते। चीन ने आरोपों को पूरी तरह खारिज किया था। उसका कहना है कि उसने कोई परमाणु परीक्षण नहीं किया और अमेरिका बिना सबूत के आरोप लगा रहा है। वहीं, CTBTO ने कहा था कि उसके निगरानी नेटवर्क को उस दिन परमाणु परीक्षण का कोई साफ संकेत नहीं मिला। दो छोटे भूकंपीय झटके जरूर दर्ज हुए, लेकिन यह तय नहीं हो सका कि वे भूकंप, किसी दूसरे धमाके या परमाणु परीक्षण की वजह से थे। ——————— ये खबर भी पढ़ें… जिनपिंग के बॉडीगार्ड की पहचान उजागर:व्हाइट हाउस की गेस्ट लिस्ट में नाम-पद सामने आया चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ कई साल से एक अधिकारी विदेश दौरों और बड़ी बैठकों में नजर आता रहा है। वह कभी शी के पीछे खड़ा दिखा तो कभी उनके साथ मीटिंग में बैठा नजर आया। पूरी खबर यहां पढ़ें…

दुबई-तेल अवीव फ्लाइट हाईजैक होने का अलर्ट:इजराइल ने फाइटर जेट भेजा, लैंडिंग के बाद पता चला- पायलटों में हाथापाई हुई थी

दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की फ्लाइट से अचानक हाइजैक का अलर्ट मिला। टाइम्स ऑफ इजराइल के मुताबिक विमान ने पहले इमरजेंसी का 7700 कोड भेजा और फिर 7500 कोड भेजा, जिसका मतलब हाइजैक होता है। अलर्ट मिलते ही इजराइल ने विमान की ओर फाइटर जेट भेज दिए। इसके बाद फ्लाइट ने अपना रास्ता बदलकर सऊदी अरब के ताबुक एयरपोर्ट पर लैंडिंग की। विमान में करीब 180 यात्री सवार थे, जिनमें 150 से ज्यादा इजराइली नागरिक थे। बाद में इजराइली सूत्रों ने बताया कि विमान हाइजैक नहीं हुआ था बल्कि पायलटों के बीच कहासुनी हो गई थी। वहीं CNN ने दावा किया है कि विमान में दोनों पायलटों के बीच हाथापाई हुई थी। इसी वजह से इमरजेंसी सिग्नल भेजा गया। फ्लाइट के रूट बदलने की वीडियो सऊदी अरब के ऊपर बदला रास्ता फ्लाइट-ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक, विमान सऊदी अरब के ऊपर पहुंचने के बाद अपने तय रास्ते से मुड़ गया था। फ्लाइट-ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक, विमान ने करीब दो मिनट में 34 हजार फीट से 16,600 फीट तक की ऊंचाई कम कर ली थी। यह घटना भारतीय समय के हिसाब से रात के समय हुई थी। इसके करीब 12 मिनट बाद विमान से इमरजेंसी सिग्नल भेजा। कुछ समय के लिए फ्लाइट-ट्रैकिंग वेबसाइटों पर विमान की स्थिति दिखनी भी बंद हो गई थी। इजराइल में प्रधानमंत्री-रक्षा मंत्री की इमरजेंसी बातचीत विमान से मिले अलर्ट के बाद इजराइल में सुरक्षा एजेंसियां सक्रिय हो गईं। हिब्रू मीडिया के मुताबिक, प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री ने भी मामले को लेकर इमरजेंसी बातचीत की। इस दौरान विमान की स्थिति और उसमें सवार यात्रियों को लेकर जानकारी जुटाई गई। इजराइली एयरफोर्स के फाइटर जेट भी विमान की तरफ भेजे गए थे। पायलटों के बीच झगड़ा क्यों हुआ अभी पता नहीं पायलटों के बीच किस बात को लेकर हाथापाई हुई थी, इसकी जानकारी अभी सामने नहीं आई है। फिलहाल इस मामले की जांच की जा रही है। विमान के सऊदी अरब में उतरने के बाद अधिकारियों को घटना की पूरी जानकारी जुटाने का मौका मिला है।

—————————- ये खबर भी पढ़ें… जिनपिंग के बॉडीगार्ड की पहचान उजागर: व्हाइट हाउस की गेस्ट लिस्ट में नाम-पद सामने आया चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ कई साल से एक अधिकारी विदेश दौरों और बड़ी बैठकों में नजर आता रहा है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

जिनपिंग के बॉडीगार्ड की पहचान उजागर:व्हाइट हाउस की गेस्ट लिस्ट में नाम-पद सामने आया, मोदी-जिनपिंग की बैठक में भी मौजूद थे

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ कई साल से एक अधिकारी विदेश दौरों और बड़ी बैठकों में नजर आता रहा है। वह कभी शी के पीछे खड़ा दिखा तो कभी उनके साथ बैठक में बैठा नजर आया। लेकिन चीन ने कभी सार्वजनिक तौर पर नहीं बताया कि वह कौन है और क्या जिम्मेदारी संभालता है। अब उसकी पहचान सामने आई है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने शी जिनपिंग के सम्मान में पिछले हफ्ते अमेरिका में एक खास रात्रिभोज आयोजित किया था। इसमें शामिल चीनी मेहमानों की लिस्ट व्हाइट हाउस ने जारी की। इसी लिस्ट से पहली बार झोउ होंगशू का नाम और उनका पद सामने आया। होंगशू को सेंट्रल गार्ड ब्यूरो का डायरेक्टर बताया गया है। यह विभाग चीन के राष्ट्रपति और दूसरे बड़े नेताओं की सुरक्षा करता है। झोउ इसी महीने नई दिल्ली में शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात के दौरान भी मौजूद थे। सालों से शी के साथ दिखते रहे, लेकिन नाम नहीं बताया गया झोउ होंगशू के बारे में चीन में भी बहुत कम जानकारी सार्वजनिक है। उनकी पढ़ाई, शुरुआती नौकरी और पुराने पदों की पूरी जानकारी सामने नहीं आई है। 2022 में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की 20वीं बड़ी राष्ट्रीय बैठक हुई थी। इसमें झोउ होंगशू को भी प्रतिनिधि बनाया गया था। लेकिन तब भी उनकी पूरी प्रोफाइल सार्वजनिक नहीं की गई थी। चीन के पूर्व पार्टी अधिकारी देंग यूवेन ने CNN से कहा कि उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, झोउ ऐसे पहले बड़े सुरक्षा अधिकारियों में हो सकते हैं, जो इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों में लगातार नजर आए हैं। आखिर इस अफसर की नौकरी इतनी सीक्रेट क्यों है? इसकी एक बड़ी वजह वह संस्था है, जिसमें झोउ होंगशू काम करते हैं। सेंट्रल गार्ड ब्यूरो चीन की बेहद गोपनीय सुरक्षा संस्थाओं में से एक है। यह चीन के शीर्ष नेताओं की सुरक्षा करता है। यह बीजिंग के झोंगनानहाई परिसर की सुरक्षा से भी जुड़ा है। इसी परिसर में चीन के शीर्ष नेता और कम्युनिस्ट पार्टी के बड़े अधिकारी काम करते हैं। चीन के सरकारी मीडिया ने इस ब्यूरो को पुलिस और सेना, दोनों से जुड़ी एक खास संस्था बताया है। यहां काम करने वाले अधिकारियों के लिए देश के शीर्ष नेतृत्व का भरोसा बेहद जरूरी माना जाता है। यही वजह है कि इस संस्था में काम करने वाले अधिकारियों के बारे में बहुत कम जानकारी सार्वजनिक होती है। खासकर उन अधिकारियों की जानकारी और भी सीमित रहती है, जो सीधे शीर्ष नेताओं की सुरक्षा और कार्यक्रमों से जुड़े होते हैं। 2018 से अलग-अलग मौकों पर जिनपिंग के साथ दिखे झोउ की मौजूदगी का रिकॉर्ड कई साल पुराना है। 2018 में चीन की सेना के नॉर्दर्न थिएटर कमांड के निरीक्षण के दौरान वह तत्कालीन सेंट्रल गार्ड ब्यूरो प्रमुख वांग शाओजुन के साथ नजर आए थे। दोनों ने उस समय सैन्य वर्दी पहन रखी थी। 2019 में शी जिनपिंग जब नेपाल की तत्कालीन राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी से काठमांडू में मिले थे, तब भी झोउ उनके पीछे बैठे दिखाई दिए थे। 2023 में सैन फ्रांसिस्को में हुए एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग यानी एपीईसी सम्मेलन के दौरान भी वह शी के साथ नजर आए। इन मौकों की वजह से यह अनुमान लगाया जाता रहा है कि झोउ का पुराना करियर चीन की सेना यानी पीएलए से जुड़ा रहा होगा। हालांकि उनके पुराने पदों की आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। झोउ से पहले वाले अफसर की मौत भी रही रहस्य झोउ से पहले सेंट्रल गार्ड ब्यूरो के डायरेक्टर वांग शाओजुन थे। अप्रैल 2023 में उनकी मौत हो गई थी। चीन के सरकारी मीडिया ने उनकी मौत की जानकारी करीब तीन महीने बाद दी थी। मौत की वजह किसी बीमारी को बताया गया, लेकिन बीमारी का नाम नहीं बताया गया। उनकी मौत के बाद ही सरकारी मीडिया ने पहली बार आधिकारिक तौर पर बताया कि वांग सेंट्रल गार्ड ब्यूरो के डायरेक्टर थे। इसके बाद उनके उत्तराधिकारी के नाम की सार्वजनिक घोषणा नहीं हुई थी। अगली पार्टी कांग्रेस से पहले झोउ पर नजर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की 21वीं राष्ट्रीय कांग्रेस अगले साल अक्टूबर में होने वाली है। यह हर पांच साल में होने वाली बड़ी बैठक है, जिसमें पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में बदलाव हो सकते हैं। मौजूदा कई वरिष्ठ नेता तब 70 साल से ज्यादा उम्र के हो जाएंगे। इनमें चीन के शीर्ष राजनयिक वांग यी भी शामिल हैं, जो अगले साल 73 साल के हो जाएंगे। ऐसे में पार्टी के युवा अधिकारियों की भूमिका पर भी नजर रहेगी। झोउ की हालिया सार्वजनिक मौजूदगी को भी इसी से जोड़कर देखा जा रहा है।

शहबाज को ट्रंप ने बड़ा बना दिया

संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा की सालाना बैठक में आमतौर पर कुछ सब्सटेंटिव नहीं होता है। वहां से कोई देश कुछ हासिल करके नहीं लौटता है। यूएनजीए में कुल जमा हासिल नेताओं का भाषण होता है। इसी की चर्चा होती है और उसी में सूत्र खोजे जाते हैं। भारत की ओर से इस बार प्रधानमंत्री नहीं गए थे। भारत का प्रतिनिधित्व विदेश मंत्री एस जयशंकर ने किया था। इसलिए पहले से ही तय लग रहा था कि भारत का प्रतिनिधित्व बहुत हाईलाइट नहीं होगा। लेकिन पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हाईलाइट चुरा ली। ऊपर से चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से दोपक्षीय वार्ता के लिए अमेरिका में थे। इसलिए लाइमलाइट शी पर था। बाद में राष्ट्रपति ट्रंप ने शहबाज का भाव भी बढ़ा दिया।

असल में शहबाज शरीफ ने अपने भाषण में भारत को लेकर जो अनाप शनाप बोला वह अपनी जगह है। लेकिन उन्होंने पिछले साल मई में हुए ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए खुले दिल से राष्ट्रपति ट्रंप की तारीफ की और उन्होंने कहा कि समय से दखल देकर राष्ट्रपति ट्रंप ने युद्ध रूकवाया और दक्षिण एशिया के करोड़ों लोगों की जान बचाई। ध्यान रहे भारत इस बात से इनकार करता है कि अमेरिका ने युद्ध रुकवाया लेकिन शहबाज बार बार दोहराते हैं। पहले तो ट्रंप भी कहते थे। इस बार भी ट्रंप ने शहबाज शरीफ के भाषण का यह वाला हिस्सा निकाल कर उसे अपने ट्रूथ सोशल प्लेटफ़ॉर्म पर साझा किया। इससे शहबाज की हैसियत बढ़। ट्रंप ने राष्ट्रपति शी को भी गले लगाया और उनके हिसाब से समझौते किए। यह दोनों घटनाक्रम भारत के लिए चिंता की बात होनी चाहिए।

रूबियो की नजर में भारत सूडान जैसा!

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के अधिकारी भारत को क्या समझते हैं, यह धीरे धीरे और स्पष्ट होता जा रहा है। ट्रंप ने खुद जिस तरह से चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का स्वागत किया है और विवाद के मुद्दों को किनारे करके उनके साथ दोस्ती बढ़ाई है वह भारत के लिए अलग चिंता का विषय है। अमेरिका अब एशिया का शक्ति संतुलन साधने की पुरानी नीति से पीछे हट गया है। वह भारत को चीन के काउंटरवेट के तौर पर तैयार नहीं करेगा, बल्कि चीन की ही ताकत बढ़ा कर उसके साथ दोस्ती करेगा।

इसका संकेत इस साल नई दिल्ली में रायसीना डायलॉग के समय अमेरिकी विदेश उप मंत्री ने दिया था, जब उन्होंने कहा था कि अमेरिकी किसी हाल में भारत को इतना बड़ा नहीं होने देगा कि वह एक चुनौती बन जाए। यह बात उन्होंने भारत में भारत के अधिकारियों, विदेश नीति के जानकारों और रणनीतिक विशेषज्ञों के सामने कही थी। हालांकि बीच बीच में ट्रंप प्रशासन के अधिकारी भारत को खुश करने वाली बातें भी कर देते हैं। जैसे भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर जम्मू कश्मीर गए तो उन्होंने कह दिया कि कश्मीर भारत का अहम हिस्सा है। इस पर भारत में खूब तालियां बजीं।

लेकिन अब कश्मीर को लेकर अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने जो बयान दिया है उस पर चौतरफा सन्नाटा खींच गया है। कोई कुछ नहीं बोल रहा है। एकाध सामरिक जानकारों ने इस पर सवाल उठाए लेकिन सरकारी स्तर पर इसे दबा दिया गया। मार्को रूबियो ने पिछले दिनों एक कार्यक्रम में कहा कि, ‘एक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बननी चाहिए, जो भारत और पाकिस्तान के बीच संभावित संघर्ष को हैंडल कर सके या सूडान और रवांडा में जो हो रहा है उसे संभाल सके’।

सोचें, अमेरिका के विदेश मंत्री और वहां के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने भारत और पाकिस्तान के संभावित संघर्ष की बात कही, उसे संभालने के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाने की जरुरत बताई और दोनों देशों की तुलना सूडान और रवांडा से की। सवाल है कि क्या अमेरिका कुछ ऐसा देख रहा है, जिससे उसको लग रहा है कि भारत की स्थिति सूडान और रवांडा जैसी हो सकती है? पाकिस्तान की स्थिति तो उस तरफ बढ़ रही है लेकिन भारत!

मार्को रूबियो का बयान इस नाते भी बहुत आपत्तिजनक है कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के मामले को हैंडल करने के लिए किसी ‘इंटरनेशनल सिस्टम’ की जरुरत बताई। ध्यान रहे भारत का स्टैंड हमेशा यह रहा है कि भारत और पाकिस्तान के मुद्दे दोपक्षीय हैं और इनमें भारत किसी भी तीसरे पक्ष की भूमिका स्वीकार नहीं करेगा। सारा विवाद ही इसी बात का है कि पाकिस्तान हमेशा आपसी दोपक्षीय मुद्दों का अंतरराष्ट्रीयकरण करना चाहता है और भारत इसका विरोध करता है।

सोचें, मार्को रूबियो ने इतने स्पष्ट शब्दों में भारत की पोजिशन को चैलेंज किया और भारत व पाकिस्तान के दोपक्षीय मामले में अंतरराष्ट्रीय दखल की जरुरत बताई, साथ ही भारत की तुलना सूडान और रवांडा जैसे देशों से ही लेकिन भारत की ओर से एक शब्द नहीं कहा गया। हैरानी की बात यह है कि जिस समय रूबियो ने यह बात कही उसके तुरंत बाद विदेश मंत्री एस जयशंकर अमेरिका गए और वहां उनकी रूबियो से मुलाकात भी हुई। दोनों के बीच दोपक्षीय वार्ता हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रस्तावित अमेरिका यात्रा की तैयारियों पर भी चर्चा हुई होने की खबर है। लेकिन रूबियो ने जो कहा उस बारे में कोई बात होने की खबर नही है।

Xi-Trump Dinner: व्हाइट हाउस में शाही डिनर पर अपना ‘थर्मस’ लेकर पहुंचे जिनपिंग! सोशल मीडिया पर छा गईं ये 2 तस्वीरें

White House Dinner: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और उनकी पत्नी पेंग लियुआन के सम्मान में आयोजित व्हाइट हाउस स्टेट बैंकवेट की चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है। टेक और वॉल स्ट्रीट के दिग्गजों से सजी इस दावत से जुड़ी दो ऐसी बातें और तस्वीरें सामने आई हैं, जो इंटरनेट पर तेजी से ट्रेंड कर रही हैं।

डिनर टेबल पर जिनपिंग की ‘थर्मस’ बनी चर्चा का विषय

व्हाइट हाउस के ईस्ट रूम में सजी भव्य रेड-थीम वाली मुख्य टेबल पर मेहमानों का ध्यान एक अनोखी चीज ने खींचा। टेबल पर महंगी वाइन ग्लासेज और शाही क्रॉकरी के बीच दो थर्मस बोतलें रखी दिखाई दीं। एक काले रंग की और दूसरी सफेद रंग की।तस्वीरों के मुताबिक, काली थर्मस बोतल शी जिनपिंग के पास और सफेद थर्मस बोतल उनकी पत्नी पेंग लियुआन के पास रखी थी।

चीन में पारंपरिक रूप से सेहत के लिए गुनगुना या गर्म पानी पीना दैनिक जीवन का अहम हिस्सा माना जाता है। सोशल मीडिया पर यूजर चुटकी लेते हुए कह रहे हैं कि ‘शायद जिनपिंग इसमें गोजी बेरीज (Goji Berries) या अपनी खास ग्रीन टी लेकर आए थे।’

वैसे कूटनीतिक हलकों में विदेशी दौरों पर राष्ट्राध्यक्षों द्वारा अपना पानी या चाय इस्तेमाल करना कोई नई बात नहीं है, लेकिन व्हाइट हाउस के आधिकारिक स्टेट डिनर की टेबल पर थर्मस का इस तरह नजर आना लोगों को काफी दिलचस्प लगा।

‘चलो कंस्ट्रक्शन साइट देखने चलते हैं…’ ट्रंप के बयान पर लगे ठहाके

डिनर के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने खास अंदाज में माहौल को हल्का-फुल्का बनाते नजर आए। ट्रंप ने शी जिनपिंग को अमेरिका के राष्ट्रीय प्रतीक ‘बाल्ड ईगल’ (Bald Eagle) की एक खास मूर्ति भेंट की।

अपने टोस्ट स्पीच के दौरान ट्रंप ने कहा कि व्हाइट हाउस का मौजूदा बैंक्वेट हॉल काफी छोटा पड़ता है, इसलिए वह $400 मिलियन की लागत से 1,000 लोगों की क्षमता वाला नया विशाल बॉलरूम बनवा रहे हैं।

ट्रंप ने मुस्कुराते हुए शी जिनपिंग और वहां मौजूद मेहमानों को आमंत्रित किया कि ‘डिनर के बाद चलिए, चलकर नए बॉलरूम की कंस्ट्रक्शन साइट देखते हैं, आप लोग इसके फर्श पर कदम रखने वाले पहले इंसान होंगे।’

जैसे ही दुनिया के दो सबसे शक्तिशाली नेताओं के डिनर के बाद ‘कंस्ट्रक्शन साइट का मुआयना’ करने की बात सामने आई, टेबल पर बैठे एलन मस्क, टिम कुक, जेन्सन हुआंग और सैम ऑल्टमैन समेत तमाम बड़े उद्योगपति ठहाका लगाकर हंस पड़े।

White House Dinner

टेक जगत के दिग्गजों की रही मौजूदगी 

यह डिनर सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें सिलिकॉन वैली के लगभग सभी बड़े चेहरे मौजूद थे। टेस्ला के एलन मस्क, एपल के टिम कुक, एनवीडिया के जेन्सन हुआंग, ओपनएआई के सैम ऑल्टमैन, गूगल के सुंदर पिचाई और मेटा के मार्क जुकरबर्ग जैसे दिग्गजों ने इसमें शिरकत की।

ट्रम्प-जिनपिंग की मीटिंग खत्म, 60 मिनट ज्यादा चली:AI से टैरिफ तक कई मुद्दों पर चर्चा; आज व्हाइट हाउस में स्टेट डिनर

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच व्हाइट हाउस में मीटिंग करीब 2 घंटे बाद खत्म हो गई है। यह निर्धारित समय से 1 घंटे ज्यादा चली। बंद कमरे में हुई इस बैठक में AI, व्यापार, सुरक्षा और अमेरिका-चीन के रिश्तों जैसे कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक ट्रम्प ने जिनपिंग के साथ अपने निजी रिश्ते पर जोर दिया। उन्होंने दोनों नेताओं की दोस्ती को सच्ची और गहरी बताया। वहीं, जिनपिंग ने निजी रिश्तों के बजाय दोनों देशों के बीच लंबे समय के संबंधों और आपसी हितों पर ज्यादा जोर दिया। जिनपिंग के सम्मान में गुरुवार रात व्हाइट हाउस में स्टेट डिनर रखा गया है। इसमें टेक्नोलॉजी और AI से जुड़े बड़े कारोबारी भी शामिल होंगे। ट्रम्प-जिनपिंग की मुलाकात से जुड़ीं 4 अहम बातें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सबसे अहम मुद्दा AI इस बैठक के अहम मुद्दों में रहा। ट्रम्प ने इसे सुपरइंटेलिजेंस कहा। उन्होंने कहा कि आज इन क्षेत्रों में लिए गए फैसलों का असर आने वाले कई दशकों तक रहेगा। जिनपिंग ने AI को लेकर कहा कि यह हमेशा इंसानों के नियंत्रण में रहना चाहिए। दोनों देशों के बीच व्यापार समझौता 2 महीने बढ़ा अमेरिका और चीन के बीच चल रहे व्यापार समझौते को दो महीने और बढ़ाकर 10 जनवरी तक कर दिया गया है। यह समझौता पहले 10 नवंबर को खत्म होना था। जिनपिंग ने 1 लाख अमेरिकी छात्रों को चीन बुलाया जिनपिंग ने अगले 5 साल में 1 लाख अमेरिकी छात्रों को चीन आने का न्योता भी दिया। जिनपिंग ने यह भी कहा कि चीन अमेरिकी कंपनियों के लिए अपना बाजार खुला रखेगा और उम्मीद करता है कि अमेरिका में चीनी कंपनियों के साथ भी निष्पक्ष व्यवहार किया जाएगा। ट्रम्प ने जिनपिंग को व्हाइट हाउस का निर्माण दिखाया बैठक के दौरान ट्रम्प ने जिनपिंग को व्हाइट हाउस में बन रहे नए बॉलरूम और हेलिपैड का काम भी दिखाया। ट्रम्प ने जिनपिंग को ‘ग्रेनाइट एक्सपर्ट’ बताया और कहा कि उन्हें अच्छा ग्रेनाइट पसंद है। अमेरिकी मीडिया की एंट्री पर विवाद जिनपिंग की अमेरिका यात्रा के दौरान व्हाइट हाउस और अमेरिकी मीडिया के बीच भी विवाद देखने को मिला। ट्रम्प प्रशासन ने CNN, MS NOW और पॉलिटिको के पत्रकारों को व्हाइट हाउस में एंट्री पर रोक लगा दी थी। इसके बाद कोर्ट ने इनकी व्हाइट हाउस में एंट्री बहाल करने का आदेश दिया। इसके बावजूद अगले दिन पत्रकारों को दोबारा अंदर जाने से रोक दिया गया। कई कोशिशों के बाद दोपहर करीब 12 बजे उन्हें व्हाइट हाउस में प्रवेश मिला। मीडिया की एंट्री को लेकर हुए इस विवाद का असर ट्रम्प-जिनपिंग की मुलाकात की टीवी कवरेज पर भी पड़ा। अमेरिका के कई बड़े टीवी नेटवर्क ने दोनों नेताओं की शुरुआती मुलाकात का लाइव प्रसारण नहीं किया। इसी दौरान ओवल ऑफिस में ट्रम्प ने चीनी पत्रकारों को लेकर मजाक करते हुए कहा कि चीन की मीडिया सबसे दोस्ताना है।