‘एक ही शहर में हों तो मिलना तय!’ एस जयशंकर संग अपनी केमिस्ट्री और Quad पर बोले मार्को रुबियो

Marco Rubio S Jaishankar Relation: भारत दौरे पर आए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत और अमेरिका के रिश्तों को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। नेटवर्क18 के एडिटर-इन-चीफ राहुल जोशी को दिए एक स्पेशल इंटरव्यू में रुबियो ने भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ अपने गहरे और मजबूत कामकाजी रिश्तों की तारीफ की। उन्होंने कहा कि दोनों देश QUAD के जरिए अपने रणनीतिक सहयोग को एक नए मुकाम पर ले जा रहे हैं।

‘एक ही शहर में हों तो मिलना तय’: जयशंकर संग मजबूत केमिस्ट्री

मार्को रुबियो ने खुलासा किया कि पिछले डेढ़ साल के दौरान वे और विदेश मंत्री एस. जयशंकर कम से कम 12 बार मिल चुके हैं। रुबियो के अमेरिकी विदेश मंत्री बनने के बाद उनकी पहली मुलाकात भी जयशंकर के साथ ही हुई थी।

रुबियो ने कहा, ‘जब भी हम किसी वैश्विक सम्मेलन, अंतरराष्ट्रीय बैठक या एक ही शहर में होते हैं, तो हम एक-दूसरे से मिलना कभी नहीं भूलते। हमने एक बेहद सकारात्मक और मजबूत वर्किंग रिलेशनशिप बनाई है।’

उन्होंने जोर देकर कहा कि इसी मजबूत बॉन्डिंग की बदौलत दोनों देश पिछले डेढ़ साल में कई नाजुक और संवेदनशील मुद्दों को बहुत आसानी से सुलझाने में सफल रहे हैं।

Quad सम्मेलन में होंगे ऐतिहासिक फैसले

भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया की सदस्यता वाले ग्रुप Quad के भविष्य पर बात करते हुए रुबियो ने कहा कि यह संगठन अब सिर्फ बैठकों और समझौतों तक सीमित नहीं है, बल्कि धरातल पर ठोस कार्रवाई की ओर बढ़ रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि आगामी क्वाड लीडर्स समिट केवल एक ‘गेट-टुगेदर’ नहीं होगी। इस शिखर सम्मेलन में चारों देश ठोस और बड़े फैसलों का ऐलान करेंगे।

वैश्विक चुनौतियों के बीच भारत-US के रिश्ते बेहद अहम

मार्को रुबियो ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच वैश्विक मामलों को लेकर एक जैसी सोच है। दोनों देशों के पास रक्षा, सुरक्षा, तकनीक और व्यापार के क्षेत्र में अपने संबंधों को और गहराई तक ले जाने के ‘असाधारण अवसर’ मौजूद हैं।

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सरकार को चैन नहीं लेने देगी कांग्रेस

ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस पार्टी ने फैसला कर लिया है कि वह सरकार को चैन नहीं लेने देगी। इसके लिए उसने तय किया है कि वह सरकार के हर फैसले को संदिग्ध बना देगी और हर कदम पर उससे सवाल करेगी। इसका पता नहीं कितना राजनीतिक लाभ मिलेगा लेकिन यह जरूर है कि भाजपा और सरकार के तंत्र को जवाब देने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर और पहले से चल रहे विवादों को छोड़ दें तो हाल के दो मामले ऐसे हैं, जिनमें ऊपरी तौर पर कोई गड़बड़ी नहीं दिख रही है लेकिन कांग्रेस ने इसे मुद्दा बना दिया और ऐसा विवाद खड़ा किया कि सरकार बैकफुट पर आ गई है।

पहला मामला अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो के भारत दौरे से जुड़ा है। विदेश मंत्री एस जयशंकर और रूबियो की मुलाकात मुंबई में तय हुई है। इस पर राहुल गांधी ने कहा कि अमेरिका के विदेश मंत्री ने अपने कर्मचारी को मुंबई तलब किया। इस बात को कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी आगे बढ़ाया। अब सोचें, भारत के दौरे पर आ रहे अमेरिका के विदेश मंत्री से अगर भारत के विदेश मंत्री देश के किसी और शहर में मिलेंगे तो यह कहा जाएगा कि उनको वहां तलब किया गया? भारत के विदेश मंत्री को अमेरिकी विदेश मंत्री का कर्मचारी बता कर राहुल कौन सा नैरेटिव सेट कर रहे हैं? लेकिन उन्होंने जानते बूझते ऐसा कर दिया क्योंकि उनको पता है कि सरकार इस पर भी बैकफुट पर आएगी। कई बार ऐसा होता है कि नेता राजधानी से इतर दूसरे शहरों में मिलते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन गए तो राष्ट्रपति शी जिनपिंग से उनकी मुलाकात वुहान में हुई। तो क्या कहा जा सकता है कि मोदी ने जिनपिंग को वुहान तलब किया?

बहरहाल, दूसरा मामला जनगणना के नियमों में बदलाव का है। भारत के महापंजीयक ने अगले साल होने वाली जनगणना में सरकारी कर्मचारियों और शिक्षकों के अलावा निजी स्कूलों के शिक्षकों व कर्मचारियों और वॉलंटियर्स को भी शामिल करने का फैसला किया है। महापंजीयक कार्यालय की ओर से इसका आदेश निकला तो कांग्रेस ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के लोगों के लिए रोजगार योजना है। जबकि यह एक अच्छी पहल है कि वॉलंटियर्स को प्रशिक्षण देकर इस तरह के कामों में लगाया जाए। इससे स्कूलों में शिक्षकों की कमी से होने वाली समस्याएं कम होंगी, स्कूलों में पढ़ाई का काम कम प्रभावित होगा और सरकारी कार्यालयों के कामकाज में आने वाली बाधा भी दूर होगी। इसी तरह की योजना के तहत अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में अपनी सरकार रहते हुए अपने कार्याकर्ताओं को सिविल डिफेंस वॉलंयिटर्स के रूप में भर्ती किए थे। अपने लोगों को बस मार्शल में रखा था और चौराहों पर तख्ती लेकर खड़े होने के लिए भी अपने लोगों को चुना था। अगर यह रोजगार की भी योजना है तो इससे कुछ लोगों को काम मिलेगा।

जयशंकर और रूबियो की मुलाकात आज

नई दिल्ली। अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो और विदेश मंत्री एस जयशंकर मंगलवार को मुंबई में मिलेंगे। दोनों नेताओं के बीच व्यापार और सामरिक विषयों के साथ साथ सभी दोपक्षीय मसलों पर बातचीत होगी। इस मुलाकात के बाद रूबियो गुजरात के जामनगर जाएंगे, जहां वे रिलायंस समूह की रिफाइनरी का दौरा करेंगे। रिलायंस समूह के प्रमुख मुकेश अंबानी से भी उनकी मुलाकात होगी।

बहरहाल, रूबियो का दौरा ऐसे समय में हो रहा है, जब भारत और अमेरिका के संबंध बहुत अच्छे नहीं है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत पर टैरिफ लगाने की धमकी और तेल खरीद को नियंत्रित करने के प्रयासों के कारण दोनों देशों में तनाव आया है। दोनों देशों के बीच व्यापार संधि अटकी है। उधर राष्ट्रपति ट्रंप भारतीय पेशेवरों के लिए वीजा पाना मुश्किल बना रहे हैं। उन्होंने पाकिस्तान के शहबाज, मुनीर प्रशासन के साथ भी खूब नजदीकी बढ़ाई है।

बताया जा रहा है कि जयशंकर और रूबियो भारत व अमेरिका के संबंधों में आए तनाव को दूर करने के उपायों पर चर्चा करेंगे। जानकार अधिकारियों का कहना है, ‘बहुत ही महत्वपूर्ण बैठक होगी, जिसमें दोपक्षीय संबंधों को लेकर ज्यादा फोकस रहेगा’। गौरतलब है कि इस साल रुबियो दूसरी बार भारत आ रहे हैं। उनकी पिछली यात्रा का मुख्य केंद्र क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक थी, जहां भारत के साथ अलग से सीमित चर्चा हुई थी।

इस अमेरिकी विदेश मंत्री की यात्रा का एजेंडा साफ तौर पर भारत के साथ दोपक्षीय संबंधों को सुधारने और मजबूत करने पर केंद्रित है। अधिकारियों का कहना है कि मंगलवार की मुलाकात पुरानी बैठकों से काफी अलग होगी, क्योंकि इसमें क्वाड जैसे बहुपक्षीय मंच की छाया नहीं रहेगी। यह पूरी तरह दोपक्षीय होगी और दोनों पक्ष खुले मन से मुद्दों पर बात करेंगे। ट्रंप प्रशासन पहले ही बता चुका है कि रुबियो की यात्रा में ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग काफी अहम रहने वाला है।

मुंबई की दोपक्षीय वार्ता के के बाद रूबियो जामनगर जाएंगे, जहां रिलायंस समूह के प्रतिनिधियों के साथ उनकी अलग बैठक होगी। इसमें रिलायंस की तरफ से अमेरिका में लगाई जाने वाली रिफाइनरी, वेनेजुएला से उत्पादित क्रूड की खरीद, रिलायंस की रिफाइनरी से डीजल आपूर्ति जैसे मुद्दे शामिल होंगे। यह पहला मौका है जब कोई अमेरिकी विदेश मंत्री अपनी पूरी आधिकारिक टीम के साथ जामनगर जा रहा है, जहां रिलायंस की रिफाइनरी स्थिति है।

रूसी तेल और गैस की खरीद पर ट्रंप ने प्रतिबंधों से दी छूट, भारत से हटी 100% तक टैरिफ की तलवार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रीय हितों का हवाला देते हुए रूस और ईरान पर प्रतिबंध लगाने संबंधी कानून के तहत प्रतिबंधों, पाबंदियों और ड्यूटीज यानि शुल्कों से छूट दी है। ट्रंप ने शुक्रवार रात जारी एक कार्यकारी आदेश में कहा कि कुछ प्रतिबंधों को लागू नहीं करना अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है। ट्रंप ने कहा, ‘‘मैं ग्राहम कानून के तहत ऐसे प्रतिबंधों, पाबंदियों और शुल्कों को लागू करने से छूट दे रहा हूं।’’ उन्होंने अमेरिकी संसद को एक सर्टिफिकेशन सौंपा है, जिसमें कहा गया है कि इस समय ऐसी छूट देना अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है।

‘लिंडसे ओ. ग्राहम रूस और ईरान प्रतिबंध अधिनियम’ ट्रंप को रूस पर व्यापक प्रतिबंध लगाने और रूस से सबसे अधिक तेल व गैस खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाने का अधिकार देता है। इस कानून को ग्राहम कानून के नाम से जाना जाता है। इसे अमेरिकी कांग्रेस ने 16 सितंबर को पास किया था और ट्रंप ने दो दिन बाद इसे साइन किया था।

इस कानून के तहत ट्रंप को इसे लागू किए जाने के 30 दिन के अंदर रूस से कच्चा तेल या गैस आयात करने वाले 5 सबसे बड़े देशों से अमेरिका में आने वाले सभी सामान पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार दिया गया था। ग्राहम कानून की धारा 115 में यह प्रावधान भी है कि अगर प्रतिबंधों, पाबंदियों और शुल्कों को लागू करने से छूट देना अमेरिका के राष्ट्रीय हित में हो, तो राष्ट्रपति ऐसी छूट दे सकते हैं।

भारत से फिलहाल हटी 100 प्रतिशत टैरिफ की तलवार

रूस से सबसे अधिक तेल व गैस खरीदने वाले देशों में चीन और भारत शामिल हैं। ग्राहम कानून के तहत प्रतिबंधों, पाबंदियों और ड्यूटीज से छूट के नए फैसले से अमेरिका जाने वाले भारतीय सामान पर 100 प्रतिशत टैरिफ की तलवार फिलहाल के लिए हट गई है। ट्रंप ने कहा, ‘‘ग्राहम कानून की धारा 115(ए) के तहत, मैं ग्राहम कानून की धारा 112 और 113 या इस आदेश में निर्धारित किसी भी शुल्क को लागू करने से छूट देता हूं।’’ धारा 113 में रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों या उसे प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान है।

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ग्राहम कानून पर विदेश मंत्री एस जयशंकर और मार्को रुबियो की हुई थी मीटिंग

भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पिछले महीने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा से इतर अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ बैठक के दौरान ग्राहम कानून को लेकर चिंता जताई थी। समझा जाता है कि जयशंकर ने रुबियो को बताया था कि भारत की तेल रिफाइनरियां मुख्य रूप से मध्यम श्रेणी के सल्फरयुक्त कच्चे तेल की प्रोसेसिंग के लिए तैयार की गई हैं, जिसकी आपूर्ति पश्चिम एशिया के देशों और रूस से होती है।उन्होंने रुबियो को यह भी बताया था कि वेनेजुएला से हैवी ग्रेड का कच्चा तेल मिलता है, जबकि अमेरिका से हल्के ग्रेड का कच्चा तेल आता है। भारत की रिफाइनरियों में इस्तेमाल से पहले इन्हें दूसरे तेल के साथ मिलाना होगा।

ईरान युद्ध के चलते पश्चिम एशिया के देशों से तेल की आपूर्ति प्रभावित होने के कारण भारत अपनी अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए रूसी कच्चे तेल पर निर्भर है। अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो कुछ दिन बाद भारत आने वाले हैं।

उच्च सदन का यह उद्देश्य तो नहीं था

भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश की आठ राज्यसभा सीटों के लिए सोमवार, पांच अक्टूबर को जब उम्मीदवारों के नाम का ऐलान किया तो चौतरफा इस बात की चर्चा थी कि इससे कैसे भाजपा ने चुनाव का सामाजिक समीकरण साधा है। हर जगह प्रमुखता से यह बताया गया कि इन आठ में तीन पिछड़ी जाति के हैं, दो दलित समुदाय के हैं, दो ब्राह्मण हैं और एक ठाकुर समाज के हैं।

उच्च सदन में जाने के लिए इसके अलावा उनकी क्या योग्यता है यह बताने की जरुरत किसी ने नहीं समझी। ध्यान रहे संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत उच्च सदन यानी राज्यसभा का गठन किया गया है, जिसमें कम से कम एक योग्यता ऐसी रखी गई है, जो लोकसभा सदस्य बनने की जरूरी योग्यता से अलग है। वह भिन्नता उम्र की है। अनुच्छेद 80 में तय किया गया है कि कम से कम 30 साल की उम्र का व्यक्ति राज्यसभा जाएगा। लोकसभा की सदस्यता के लिए उम्र सीमा 25 साल की रखी गई है।

उच्च सदन के लिए उम्र सीमा पांच साल ज्यादा रखने का उद्देश्य बहुत स्पष्ट है। संविधान बनाने वाले चाहते थे कि राज्यसभा में जाने वाले सदस्य अपेक्षाकृत ज्यादा परिपक्व हों। उम्र की परिपक्वता प्रतीकात्मक है। बुनियादी रूप से यह सोचा गया था कि ज्यादा बेहतर अनुभव और योग्यता वाले लोग उच्च सदन में जाएं। अघोषित रूप से यह भी माना गया कि ऐसे नेता, जो लोकसभा का चुनाव नहीं जीत सकते हैं या लोकसभा का चुनाव हार गए हैं लेकिन संसद में उनकी उपस्थिति अनिवार्य है, उनको राज्यसभा के रास्ते संसद में भेजा जाए। अब तक ऐसी परंपरा भी रही है।

ध्यान रहे संविधान के अनुच्छेद 80 में ही 12 सदस्यों के मनोनयन की भी व्यवस्था है। सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति ऐसे 12 लोगों को मनोनीत करते हैं, जिनका साहित्य, कला, संस्कृति, समाजसेवा आदि में विशिष्ट योगदान हो। बाकी सदस्यों के लिए ऐसी योग्यता व अर्हता तय नहीं की गई है लेकिन आमतौर पर यही माना जाता है कि चुनाव के जरिए आने वाले अन्य सदस्य भी दूसरे नेताओं के मुकाबले कुछ विशिष्ट योग्यता रखते होंगे।

इस अघोषित नियम के कई गौरवशाली उदाहरण मिल जाएंगे। मिसाल के तौर पर डॉक्टर भीमराव अंबेडकर 1952 में लोकसभा का पहला चुनाव हार गए थे। वे उस समय की बॉम्बे नॉर्थ सीट से चुनाव लड़े थे लेकिन जीत नहीं सके थे। उसी साल अप्रैल में उनको बॉम्बे प्रेसिडेंसी से राज्यसभा में भेजा गया था। इंदिरा गांधी पहली बार राज्यसभा के रास्ते सांसद बनी थीं। जब नरसिंह राव को लगा कि अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए डॉक्टर मनमोहन सिंह की आवश्यकता है तो पहले उनको मंत्री बनाया गया और फिर राज्यसभा के रास्ते संसद में लाया गया। स्वंय नरेंद्र मोदी जब पहली बार प्रधानमंत्री बने तो अरुण जेटली लोकसभा का चुनाव हार गए थे लेकिन मोदी ने उनको राज्यसभा भेजा और वित्त व रक्षा मंत्री बनाया। अब भी शीर्ष पांच मंत्रालयों में से दो में राज्यसभा सांसदों को मंत्री बनाया गया है। विदेश मंत्री एस जयशंकर और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण दोनों राज्यसभा सांसद हैं।

ऐसी अनगिनत मिसालें हैं कि विशिष्ट योग्यता रखने वाले नेता या विशेषज्ञ को राज्यसभा के रास्ते संसद में लाया जाता है और वे अपनी विशिष्ट योग्यता से विधायी कामकाज या कार्यकारी भूमिका में सकारात्मक योगदान करते हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से ऐसा देखने को मिल रहा है कि भारतीय जनता पार्टी ने राज्यसभा को भी यह संदेश देने का मंच बना दिया है कि वह किसी को भी उच्च सदन का सदस्य बना देती है। इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के मास्टरस्ट्रोक की तरह पेश किया जाता है। हो सकता है कि भाजपा को इसका कुछ राजनीतिक लाभ मिलता हो लेकिन इससे राज्यसभा के स्वरूप, संसदीय कामकाज और विधायी कार्यों में उच्च सदन की भूमिका नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है।

संसदीय बहसों की गुणवत्ता का मूल्यांकन करके इसकी पुष्टि की जा सकती है। राज्यसभा में भी ज्यादातर सदस्य ऐसे आते हैं, जिनका विधायी कामकाज में कोई सार्थक योगदान नहीं होता है। वे सिर्फ सदन के माननीय सदस्य होते हैं। अगर कभी बोलना पड़ा तो बहुत जेनेरिक बातों का भाषण देते हैं। उसमें कोई गुणवत्ता नहीं होती है। विषय के मामले में विद्वता की झलक नहीं दिखती है। उनका काम भी हाथ उठा कर सरकार के प्रस्तावों का समर्थन करना और मेज थपथपा कर प्रधानमंत्री का स्वागत करना या उनके नाम के नारे लगाना रह गया है।

प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने पद्म पुरस्कारों जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मानों का लोकतंत्रीकरण किया था। वह एक अच्छी पहल थी। ऐसे लोग जो अपने क्षेत्र में बहुत अच्छा काम कर रहे थे लेकिन मीडिया और महानगरों की लाइमलाइट से दूर थे और इस वजह से उनके काम की पहचान और पूछ नहीं हो रही थी, उनको पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया जाने लगा। पहले संपर्कों और मीडिया में चर्चा के आधार पर ऐसे पुरस्कार दिए जाते थे। तब भी अच्छे और योग्य लोगों को पुरस्कार मिलता था। लेकिन दूरदराज के लोग छूट जाते थे। हालांकि इसका यह अर्थ कतई नहीं होता है कि मीडिया की चर्चा में रहे अच्छे लोगों को पुरस्कारों से दूर कर दिया जाए।

बहरहाल, वह एक अच्छी पहल थी। लेकिन उसी तरह की पहल राज्यसभा को उसके मूल उद्देश्यों से दूर ले जा रही है। राज्यसभा को राज्यों के हितों की बात करने के साथ साथ लोकसभा की मनमानियों पर चेक एंड बैलेंस की भूमिका भी निभानी होती है। इसके अलावा देश और दुनिया के ज्वलंत मुद्दों पर सार्थक चर्चा, जीवंत संवाद और विधायी कामकाज में गुणवत्तापूर्ण हस्तक्षेप सुनिश्चित करना भी राज्यसभा का काम था। दुर्भाग्य से उसकी यह भूमिका कम होती जा रही है। मनोनयन के जरिए भी ऐसे लोग उच्च सदन में लाए जा रहे हैं, जो सत्तारूढ़ दल की राजनीतिक आवश्यकता को पूरा करते हैं।

चुनाव के जरिए तो जो लोग उच्च सदन पहुंच रहे हैं वे या तो अकूत संपत्ति वाले होते हैं या संबंधित पार्टी के लिए सामाजिक व राजनीतिक महत्व वाले होते हैं। भाजपा ने अगर अपने आठ उम्मीदवारों के जरिए सामाजिक समीकरण साधा है तो सपा ने अपने उम्मीदवारों के जरिए परिवार और धन को महत्व दिया है। कह सकते हैं कि हर दोवार्षिक चुनाव के बाद राज्यसभा की गुणवत्ता में थोड़ी और कमी हो जा रही है।

ड्रोन हमले के बाद तुर्किये का मालवाहक जहाज ब्लैक सी में डूब, 3 भारतीय सहित 11 को सुरक्षित बचाया गया

हाल ही में ब्लैक सी यानी काला सागर में ड्रोन हमले की चपेट में आने से तुर्किये का एक मालवाहक जहाज MV रोयाड मम्मादोव डूब गया। उस पर सवार दो विदेशी नागरिकों की मौत हो गई, जबकि कई अन्य क्रू मेंबर घायल हो गए। इस जहाह पर सवार 3 भारतीयों समेत 11 अन्य लोगों को सुरक्षित बचा लिया गया है। बचाए गए भारतीयों में से एक घायल है, जिसका इलाज रोमानिया में किया जा रहा है।

रोमानिया में भारतीय दूतावास ने सोमवार को बताया कि ब्लैक सी में एक वाणिज्यिक जहाज पर हमला हुआ। इसमें सवार तीन भारतीय नागरिक सुरक्षित हैं, जिनमें से एक घायल है और उसका रोमानिया में इलाज चल रहा है। MV रोयाड मम्मादोव जहाज पर ब्लैक सी में सफर करते समय हमला हुआ। जिसमें दो विदेशी नागरिकों की मौत हो गई और कई क्रू मेंबर घायल हो गए। भारतीय मिशन के मुताबिक, घायल क्रू मेंबर को इलाज के लिए रोमानिया ले जाया गया।

रोमानिया में भारतीय दूतावास ने X पर एक पोस्ट में कहा, “तीनों भारतीय नागरिक सुरक्षित हैं। हमने उनसे बात की है। उनमें से एक घायल हो गया है और उसका इलाज चल रहा है।”

रोमानिया में भारतीय राजदूत मनोज महापात्रा ने भी कॉन्स्टैंटा काउंटी हॉस्पिटल में तीन भारतीय क्रू मेंबर से बात की, जहां उनका इलाज चल रहा था। दूतावास ने कहा कि राजदूत ने हॉस्पिटल के चीफ फिजिशियन से भी बात की। इंडियन मिशन ने कहा कि वह रोमानियाई अधिकारियों और हॉस्पिटल अधिकारियों के संपर्क में है और प्रभावित भारतीय क्रू मेंबर्स को हर मुमकिन मदद दे रहा है।

ड्रोन हमले से जहाज में लगी आग, 2 की मौत

रोमानियाई अधिकारियों ने कहा कि ब्लैक सी में 139 मीटर लंबे जहाज में आग लगने से दो क्रू मेंबर्स की मौत हो गई और 11 अन्य को बचा लिया गया। खबर है कि जहाज में अजरबैजानी और भारतीय नागरिक सवार थे। तुर्किये का मालवाहक जहाज रोमानियाई मछली पकड़ने वाले पोर्ट स्फांटू घोरघे से लगभग 30 नॉटिकल मील दक्षिण में डूब गया। रोमानिया के गृह मंत्रालय ने कहा कि उसके कोस्ट गार्ड बॉर्डर पुलिस को अलर्ट किया गया था कि रोमानिया के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन में मौजूद एक कमर्शियल जहाज में आग लग गई है।

ड्रोन हमले के लिए रूस जिम्मेदार

यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने इस घटना के लिए रूस को जिम्मेदार ठहराया, और आरोप लगाया कि रूसी ड्रोन हमला अंतरराष्ट्रीय जल सीमा में यात्रा कर रहे नागरिक जहाज पर किया गया। जेलेंस्की ने X पर एक पोस्ट में कहा, “न्यूट्रल पानी में मक्का ले जा रहे एक नागरिक जहाज पर दो रूसी ड्रोन ने भयानक हमला किया।” उन्होंने यह भी कहा कि हमले में जहाज का कैप्टन मारा गया।

रूस-यूक्रेन युद्ध से ब्लैक सी में कारोबार पर बढ़ खतरा

इस घटना ने एक बार फिर साबित किया है कि रूस-यूक्रन युद्ध से काला सागर से गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाजों पर खतरा बढ़ गया है। हमले और मिलिट्री ऑपरेशन की वजह से इस इलाके में और उसके आस-पास चलने वाले मर्चेंट जहाजों को बढ़ती सुरक्षा चिंताओं का सामना करना पड़ रहा है।

भारत ने कमर्शियल शिपिंग पर हमलों पर चिंता जताई

यह हमला ऐसे समय में हुआ है जब भारत ने मुख्य समुद्री कॉरिडोर में बढ़ते खतरों के बीच कमर्शियल जहाजों और नाविकों की सुरक्षा पर बार-बार चिंता जताई है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पिछले हफ्ते 81वीं यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली में अपने भाषण में खाड़ी, लाल सागर और काला सागर में कमर्शियल शिपिंग और नाविकों पर हमलों पर जोर दिया।

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जयशंकर बोले- जब पाकिस्तान के पीछे दुनिया खड़ी थी:तब भारत के साथ रूस था, 70 साल में कश्मीर समेत 4 मसलों पर समर्थन किया

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि जब पूरी दुनिया पाकिस्तान के साथ खड़ी थी तब रूस ने भारत का साथ दिया। दिल्ली में म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में रविवार को जयशंकर ने कहा कि, भारत-रूस के रिश्ते लंबे समय से अच्छे रहे हैं। नई दिल्ली के लिए मॉस्को के साथ रिश्ते सिर्फ आज की स्थिति से तय नहीं होते। रूस ने बीते 70 साल में कश्मीर समेत 4 अहम मसलों पर भारत का समर्थन किया है। ‘अमेरिका अपनी नीतियों के कारण अलग-थलग पड़ा’ जयशंकर ने कहा कि आज की दुनिया में दो बड़े बदलाव दिख रहे हैं- उनके मुताबिक, अमेरिका अपनी नीतियों के कारण दुनिया में अलग-थलग पड़ गया है। वहीं चीन का बढ़ता असर देशों के बीच मुकाबला बढ़ा रहा है। अब दूसरे देश भी अपनी ताकत और प्रभाव का इस्तेमाल फायदे के लिए कर रहे हैं। 5 दिन पहले कहा था- अमेरिका भारत की चिंता नहीं समझता 29 सितंबर को न्यूयॉर्क के एशिया सोसाइटी पॉलिसी इंस्टीट्यूट में जयशंकर ने अमेरिका पर बयान दिया था। उस कार्यक्रम में भारत-अमेरिका रिश्तों पर पूछे गए सवाल के जवाब में जयशंकर ने कहा था कि भारत की सबसे बड़ी चिंताओं में से एक पाकिस्तान से आने वाला आतंकवाद है। अगर अमेरिका इस चिंता को पूरी तरह नहीं समझता या इसकी गंभीरता को महसूस नहीं करता, तो इसका असर भारत-अमेरिका रिश्तों पर पड़ता है। जयशंकर बोले- भारत ने रूस-यूक्रेन के बीच जंग रोकने पर बातचीत की जयशंकर ने यूक्रेन युद्ध को लेकर भारत का पुराना रुख दोहराया। उन्होंने कहा कि युद्ध खत्म करने के लिए बातचीत, कूटनीति और समझौते का रास्ता अपनाना जरूरी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कई बार यही बात कह चुके हैं। उन्होंने 2022 में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से कहा था कि आज का दौर युद्ध का नहीं है। जयशंकर ने कहा कि भारत अब सिर्फ शांति की अपील करने तक सीमित नहीं है। हाल के महीनों में भारत ने रूस और यूक्रेन दोनों से बातचीत की है। इन बातचीत में ब्लैक सी में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही, अनाज और ऊर्जा के निर्यात और अहम बुनियादी ढांचे पर हमले रोकने जैसे मुद्दे शामिल हैं। ———————— यह खबर भी पढ़ें… पुतिन बोले-मोदी दोस्त, फिर भी जंग रोकने को कहते हैं: उनके पास अच्छे सुझाव; PM 5 मौकों पर यूक्रेन जंग का मुद्दा उठा चुके रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने गुरुवार को कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार यूक्रेन युद्ध खत्म करने की बात उठाते हैं। वह हर मुलाकात में युद्ध रोकने और शांति का रास्ता निकालने पर बात करते हैं। पूरी खबर पढ़ें…

होर्मुज में जहाज पर मिसाइल हमला, 5 भारतीय सवार थे:सभी सुरक्षित; 8 महीने में इस इलाके में 11 भारतीय नाविकों की जान गई

होर्मुज स्ट्रेट में शुक्रवार को एक जहाज पर मिसाइल हमला हुआ। इस जहाज में 5 भारतीय सवार थे। ओमान में भारतीय दूतावास ने शनिवार को बताया कि पांचों भारतीय नाविकों को सुरक्षित बचा लिया गया है। ये नाविक कुवैत के झंडे वाले टैंकर एमटी काजिमाह III पर सवार थे। यह कच्चे तेल से भरा था और अफ्रीका की ओर जा रहा था। हालांकि, यह हमला किसने किया, यह अभी जानकारी तक सामने नहीं आई। फरवरी से अब तक होर्मुज में हमलो में 100 से ज्यादा भारतीय नाविक प्रभावित हो चुके हैं। वहीं, इन हमलों में 11 भारतीय नाविकों की जान गई। खाड़ी क्षेत्र में जहाजों पर 4500 भारतीय नाविक विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इससे पहले मंगलवार को बताया था कि इस क्षेत्र में चल रहे व्यावसायिक जहाजों पर 4500 से ज्यादा भारतीय नाविक सवार हैं। जायसवाल के मुताबिक, इस समय फारस की खाड़ी में भारत के झंडे वाले 6 कमर्शियल जहाज हैं। इसके अलावा 6 विदेशी झंडे वाले जहाज भी हैं, जो भारत के लिए सामान लेकर जा रहे हैं। इन 12 जहाजों पर करीब 163 भारतीय नाविक सवार हैं। जायसवाल के मुताबिक, भारत का शिपिंग मंत्रालय इन जहाजों की आवाजाही पर नजर रख रहा है। भारतीय दूतावासों और स्थानीय एजेंसियों के साथ मिलकर नाविकों की सुरक्षा और उनकी स्थिति की जानकारी ली जा रही है। उन्होंने बताया कि जरूरत पड़ने पर भारतीय दूतावास नाविकों की सुरक्षा और भलाई के लिए जरूरी कदम उठाते हैं। उन्होंने कहा कि विदेशों में काम कर रहे भारतीय नाविकों की सुरक्षा और उनकी भलाई भारत की प्राथमिकता है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र में नाविकों की सुरक्षा पर चिंता जताई थी विदेश मंत्री एस जयशंकर ने 26 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा की 81वीं बैठक में व्यावसायिक जहाजों और नाविकों पर हमलों को लेकर चिंता जताई थी। जयशंकर ने कहा था, समुद्र में नए खतरे पहले से मौजूद जमीन से जुड़े संकटों को और बढ़ा रहे हैं। भारतीय नाविकों के साथ दूसरे देशों के नाविकों की भी जान गई है। यह पूरी तरह अस्वीकार्य है। जयशंकर ने खाड़ी क्षेत्र में तुरंत तनाव कम करने और संयम बरतने की अपील भी की। उन्होंने कहा कि इससे आम लोगों के लिए काम कर रहे जहाजों के क्रू की सुरक्षा बनी रहेगी और ऊर्जा की सप्लाई के साथ-साथ दुनिया का व्यापार भी बिना रुकावट चलता रहेगा। ट्रम्प ने ईरान का जंग खत्म करने का प्रस्ताव ठुकराया अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने ईरान का युद्ध खत्म करने और होर्मुज खोलने का प्रस्ताव ठुकरा दिया। ट्रम्प ने व्हाइट हाउस के बाहर पत्रकारों से कहा कि ईरान समझौता करना चाहता है, क्योंकि वह बुरी तरह हार रहा है और उसके पास पैसा नहीं आ रहा। उन्होंने कहा कि ईरान की कमाई होर्मुज से होने वाले कारोबार पर निर्भर है। अमेरिका ने इस समुद्री रास्ते पर सैन्य इतिहास की सबसे बड़ी नाकेबंदी की है, जो लोहे की दीवार जैसी है। 28 फरवरी से चल रही है अमेरिका-ईरान की लड़ाई अमेरिका और इजराइल ने 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की थी। इसके जवाब में ईरान ने इजराइल और उन खाड़ी देशों में हमले किए, जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं। अमेरिका का कहना है कि उसका मकसद ईरान की परमाणु क्षमता को कमजोर करना है। वहीं ईरान लगातार कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और उसे परमाणु तकनीक के इस्तेमाल का अधिकार है। ———————— यह खबर भी पढ़ें… रिपोर्ट- सऊदी अरब हूती विद्रोहियों पर हमला करेगा सऊदी अरब यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ जंग शुरू करने की तैयारी कर रहा है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी 1 लाख से ज्यादा यमनी सैनिकों को उतार सकता है। पूरी खबर पढ़ें…

ट्रंप और मोदी ने फोन पर बात की

ट्रंप

नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के संबंधों में बढ़ रही तल्खी के बीच बुधवार को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच टेलीफोन पर बात हुई। इस साल चौथी बार दोनों नेताओं के बीच फोन पर बात हुई है। मोदी ने बाद में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट करके बताया कि ट्रंप के साथ सभी दोपक्षीय और वैश्विक मुद्दों पर चर्चा हुई। दोनों नेताओं ने वैश्विक रणनीतिक साझेदारी बढ़ाने पर बातचीत की। गौरतलब है कि इस बातचीत से एक दिन पहले विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा था कि दोनों देशों के बीच संबंध ठीक नहीं हैं।

बहरहाल, प्रधानमंत्री मोदी ने एक्स पर पोस्ट में लिखा, ‘राष्ट्रपति ट्रंप के साथ अच्छी बातचीत हुई। हम लोगों ने व्यापार, रक्षा, ऊर्जा, जरूरी तकनीक और दूसरे क्षेत्रों में भारत व अमेरिका सहयोग की समीक्षा की। हम भारत और अमेरिका की व्यापक वैश्विक रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाने के लिए लगातार संपर्क बनाए रखने पर सहमत हुए’। मोदी ने आगे लिखा, ‘हमने क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी चर्चा की, जिसमें वैश्विक शांति और सुरक्षा को आगे बढ़ाने के लिए चल रही कोशिशें भी शामिल हैं’।

प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप इस साल जून में फ्रांस में हुई जी 7 की बैठक में मिले थे। उससे पहले 14 अप्रैल को ट्रंप ने मोदी को फोन किया था। दोनों के बीच करीब 40 मिनट तक बातचीत हुई थी। उस समय पश्चिम एशिया, होर्मुज की खाड़ी और भारत व अमेरिका के बीच सहयोग की समीक्षा हुई थी। उससे पहले भी इस साल दोनों के बीच दो बार बातचीत हुई थी। गौरतलब है कि भारत और अमेरिका के बीच लगातार हो रही बातचीत के बावजूद व्यापार संधि पर अंतिम समझौता नहीं हो पा रहा है।

शहबाज को ट्रंप ने बड़ा बना दिया

संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा की सालाना बैठक में आमतौर पर कुछ सब्सटेंटिव नहीं होता है। वहां से कोई देश कुछ हासिल करके नहीं लौटता है। यूएनजीए में कुल जमा हासिल नेताओं का भाषण होता है। इसी की चर्चा होती है और उसी में सूत्र खोजे जाते हैं। भारत की ओर से इस बार प्रधानमंत्री नहीं गए थे। भारत का प्रतिनिधित्व विदेश मंत्री एस जयशंकर ने किया था। इसलिए पहले से ही तय लग रहा था कि भारत का प्रतिनिधित्व बहुत हाईलाइट नहीं होगा। लेकिन पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हाईलाइट चुरा ली। ऊपर से चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से दोपक्षीय वार्ता के लिए अमेरिका में थे। इसलिए लाइमलाइट शी पर था। बाद में राष्ट्रपति ट्रंप ने शहबाज का भाव भी बढ़ा दिया।

असल में शहबाज शरीफ ने अपने भाषण में भारत को लेकर जो अनाप शनाप बोला वह अपनी जगह है। लेकिन उन्होंने पिछले साल मई में हुए ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए खुले दिल से राष्ट्रपति ट्रंप की तारीफ की और उन्होंने कहा कि समय से दखल देकर राष्ट्रपति ट्रंप ने युद्ध रूकवाया और दक्षिण एशिया के करोड़ों लोगों की जान बचाई। ध्यान रहे भारत इस बात से इनकार करता है कि अमेरिका ने युद्ध रुकवाया लेकिन शहबाज बार बार दोहराते हैं। पहले तो ट्रंप भी कहते थे। इस बार भी ट्रंप ने शहबाज शरीफ के भाषण का यह वाला हिस्सा निकाल कर उसे अपने ट्रूथ सोशल प्लेटफ़ॉर्म पर साझा किया। इससे शहबाज की हैसियत बढ़। ट्रंप ने राष्ट्रपति शी को भी गले लगाया और उनके हिसाब से समझौते किए। यह दोनों घटनाक्रम भारत के लिए चिंता की बात होनी चाहिए।