चारपाई पर पति की लाश और पास बैठा जिंदा सांप… मेरठ कोर्ट ने प्रेमी संग मिलकर हत्या करने वाली पत्नी को सुनाई फांसी की सजा

Meerut Amit Kashyap Murder Case: उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में चर्चित और सनसनीखेज अमित कश्यप हत्याकांड में कोर्ट ने कड़ा फैसला सुनाया है। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (ACJM) जयवीर सिंह नागर की अदालत ने शुक्रवार को अपने पति की गला घोटकर हत्या करने वाली बेवफा पत्नी और उसके प्रेमी को मौत की सजा सुनाई है। इस खौफनाक वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपियों ने मौत को प्राकृतिक रूप देने के लिए चारपाई पर एक जिंदा सांप छोड़ दिया था ताकि सबको लगे कि पति की मौत सांप के डसने से हुई है। अदालत ने हत्या के इस संगीन मामले में मृतका की पत्नी रविता और उसके प्रेमी अमरदीप को दोषी करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई है।

क्या था पूरा मामला और कैसे रचा गया षड्यंत्र?

यह सनसनीखेज मामला मेरठ के अकबरपुर सादात गांव का है। यहां रहने वाले अमित कश्यप उर्फ मिक्की कश्यप की पत्नी रविता के अमरदीप नाम के शख्स के साथ संबंध थे। प्रेम प्रसंग के रास्ते का कांटा बन रहे पति को रास्ते से हटाने के लिए दोनों ने एक खतरनाक साजिश रची। 17 अप्रैल 2025 की रात रविता ने अपने प्रेमी अमरदीप के साथ मिलकर सोते समय अपने पति अमित कश्यप की गला घोटकर बेरहमी से हत्या कर दी। इस जघन्य हत्याकांड को एक दुर्घटना या प्राकृतिक मौत का रूप देने के लिए आरोपियों ने हत्या के बाद अमित की चारपाई के पास एक जिंदा सांप लाकर छोड़ दिया था। अगले दिन जब परिवार के लोगों ने अमित को चारपाई पर मृत देखा और पास में सांप को बैठा पाया तो शुरुआत में परिजनों को यही लगा कि उसकी मौत किसी जहरीले सांप के डसने से हुई है।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने खोली पोल, 551 दिनों में आया फैसला

जब अमित का पोस्टमार्टम कराया गया तो डॉक्टरों की रिपोर्ट ने इस पूरी साजिश का पर्दाफाश कर दिया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में अमित के गले और नाक पर गंभीर चोट के निशान मिले। इससे यह साफ हो गया कि उसकी मौत सांप के काटने से नहीं, बल्कि गला घोटकर की गई थी। इसके बाद पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए हत्या का मुकदमा दर्ज किया।

पुलिस ने मुस्तैदी दिखाते हुए घटना के सिर्फ 60 दिनों के भीतर ही अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी थी। एसीजेएम जयवीर सिंह नागर की अदालत में इस मामले की सुनवाई चली। महज 551 दिनों के भीतर इस ट्रायल के दौरान कुल 87 तारीखें पड़ीं और अभियोजन पक्ष की ओर से 12 से अधिक गवाहों के बयान दर्ज कराए गए। गवाहों और वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर 7 अक्टूबर को कोर्ट ने रविता और अमरदीप को दोषी करार दे दिया था, जिसके बाद आज अदालत ने दोनों को फांसी की सजा सुनाई है।

मेरठ कोर्ट का ऐतिहासिक कदम: 3 दिन में 4 दोषियों को मौत की सजा

मेरठ की अदालत ने पिछले कुछ दिनों में अपराधियों के खिलाफ बेहद सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने महज 3 दिनों के भीतर दो अलग-अलग चर्चित मामलों में कुल 4 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई है। इससे पहले मेरठ कोर्ट ने चर्चित ‘नीले ड्रम हत्याकांड में साहिल और मुस्कान को भी फांसी की सजा सुनाई थी।

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UP Panchayat Chunav 2026: यूपी पंचायत चुनाव पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा आदेश, तीन महीने के भीतर इलेक्शन कराने के निर्देश

UP Panchayat Chunav 2026: उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा आदेश दिया है। कोर्ट ने तीन महीने के भीतर यूपी पंचायत चुनाव कराने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में बने रहने की बात कही गई है। इस आदेश के बाद प्रदेश में पंचायत चुनाव की तैयारियों और समयसीमा को लेकर चर्चा तेज हो गई है। हाईकोर्ट के निर्देश के अनुसार, पंचायत चुनाव की प्रक्रिया को तीन महीने के भीतर पूरा कराने की बात कही गई है। यह आदेश ग्राम पंचायतों में निर्वाचित प्रतिनिधियों का कार्यकाल समाप्त होने और आगे की प्रशासनिक व्यवस्था के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

निवर्तमान ग्राम प्रधानों की भूमिका पर भी निर्देश

कोर्ट ने निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में बनाए रखने की बात भी कही है। इससे चुनाव होने तक ग्राम पंचायतों के प्रशासनिक कामकाज को जारी रखने की व्यवस्था प्रभावित होगी। हालांकि, प्रशासक के तौर पर उनकी शक्तियों और जिम्मेदारियों का सटीक दायरा आधिकारिक आदेश के विस्तृत डिटेल्स आने के बाद ही स्पष्ट होगा। कोर्ट ने उन याचिकाओं को खारिज कर दिया है, जिसमें निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने के फैसले को अवैध बताया गया था। इसका मतलब है कि अगले तीन महीने तक पंचायतों का कामकाज प्रशासकों के माध्यम से जारी रह सकता है।

चुनाव की तैयारियों पर रहेगी नजर

हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब राज्य सरकार और संबंधित प्रशासनिक विभागों की ओर से पंचायत चुनाव की तैयारियों को लेकर उठाए जाने वाले कदम अहम होंगे। चुनाव की तारीखों, अधिसूचना और अन्य प्रक्रियाओं से संबंधित आधिकारिक जानकारी सामने आने के बाद स्थिति और स्पष्ट होगी। फिलहाल, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ कहा है कि तीन महीने के अंदर यूपी के पंचायत चुनाव हो जाने चाहिए। पहले कयास ये कगाए जा रहे थे कि विधानसभा चुनाव के बाद पंचायत चुनाव होगा। यह फैसला जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने करीब तीन घंटे तक चली सुनवाई के बाद सुनाया।

सरकार के आदेश को कोर्ट ने बताया वैध

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि प्रशासकों की नियुक्ति को लेकर यूपी सरकार की ओर से जारी शासनादेश पूरी तरह वैध है। अदालत ने सरकार को निर्देश दिया कि पंचायत निकायों के चुनाव निर्धारित समयसीमा के भीतर पूरे कराए जाएं। इस फैसले से पंचायत चुनाव की तैयारी और समयसीमा को लेकर स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है। अदालत ने प्रशासकों को चुनाव समाप्त होने तक कामकाज जारी रखने की व्यवस्था भी बरकरार रखी है।

OBC आयोग की प्रक्रिया से अलग होगी चुनाव की तैयारी?

हाई कोर्ट ने कहा कि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आयोग अपना काम बिना किसी बाधा के जारी रखेगा। लेकिन पंचायत चुनाव कराने की प्रक्रिया आयोग की कार्यवाही पूरी होने पर निर्भर नहीं रहेगी। यानी आयोग की प्रक्रिया के कारण चुनाव को अनिश्चितकाल तक टाला नहीं जा सकेगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पंचायत चुनाव मौजूदा नियमों और व्यवस्था के तहत कराए जाएंगे।

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चुनाव प्रक्रिया में 27 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान का पालन करना होगा। इस फैसले के बाद अब राज्य सरकार के सामने तीन महीने के भीतर पंचायत चुनाव कराने की समयसीमा पूरी करने की जिम्मेदारी होगी। हालांकि, चुनाव की तारीखों और मतदान के शेड्यूल को लेकर सरकार की ओर से जारी होने वाली आधिकारिक अधिसूचना महत्वपूर्ण होगी।

जेएनयू में एबीवीपी का प्रदर्शन

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने यौन उत्पीड़न के आरोपों को लेकर कांग्रेस सांसद तथा जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर अंगोमचा बिमल अकोइजम को तुरंत गिरफ्तार करने की मांग करते हुए बुधवार को विश्वविद्यालय में विरोध प्रदर्शन किया।

एबीवीपी की जेएनयू इकाई ने मामले की निष्पक्ष जांच की भी मांग की। संगठन ने आरोप लगाया कि महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताने के बावजूद कांग्रेस इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए है।

प्रदर्शनकारी विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर इकट्ठा हुए और अकोइजम का पुतला फूंका। यह प्रदर्शन विश्वविद्यालय की आंतरिक समिति द्वारा छात्राओं की शिकायतों की जांच के बाद अकोइजम को प्रोफेसर के पद से हटाए जाने के बाद हुआ।

छात्र संगठन ने बताया कि इस मामले में प्राथमिकी भी दर्ज की गई है। एबीवीपी की जेएनयू इकाई के अध्यक्ष मयंक पांचाल ने कहा कि पुलिस को आरोपी की तुरंत गिरफ्तारी सुनिश्चित करनी चाहिए और जांच में किसी भी तरह का राजनीतिक प्रभाव बाधा नहीं बनना चाहिए।

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पांचाल ने कहा महिलाओं की सुरक्षा केवल नारों और भाषणों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस राजनीतिक हितों के आधार पर महिलाओं की सुरक्षा के मामले में अलग-अलग मापदंड अपनाती है।

एबीवीपी की जेएनयू इकाई के सचिव प्रवीण कुमार पीयूष ने कहा कि संगठन विश्वविद्यालय परिसर में छात्राओं की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को लगातार उठाता रहा है।

उन्होंने जनप्रतिनिधियों से जुड़े मामलों में जवाबदेही तय करने की मांग की और कहा कि कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई की जानी चाहिए।

एबीवीपी ने कहा कि किसी भी राजनीतिक पार्टी की छवि से ज्यादा प्राथमिकता छात्राओं की सुरक्षा और सम्मान को दी जानी चाहिए।

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काशी विश्वनाथ मंदिर के शिखर से सोना गायब? PMO तक पहुंची शिकायत, मंडलायुक्त ने बताई सच्चाई

Kashi Vishwanath Temple Gold Controversy: अयोध्या स्थित राम मंदिर से चंदा चोरी के बाद अब वाराणसी के श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के शिखर से सोना गायब होने के आरोप ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। इस मामले में अधिवक्ता नित्यानंद राय ने शिकायत दर्ज कराते हुए दावा किया है कि मंदिर के शिखर पर लगे सोने के कई कलश गायब हो गए हैं। उनका आरोप है कि यह मामला लगातार गंभीर होता जा रहा है और कथित तौर पर हर दूसरे दिन सोना निकाला जा रहा है। अधिवक्ता ने यह भी दावा किया है कि प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने उनकी शिकायत पर संज्ञान लिया है। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।

29 सितंबर को की थी PMO से शिकायत

वाराणसी के तेलियाबाग निवासी अधिवक्ता नित्यानंद राय ने बताया कि 29 सितंबर को उन्होंने मंडल आयुक्त समेत प्रधानमंत्री कार्यालय को एक पत्र भेज कर शिकायत की थी। पत्र में उन्‍होंने बताया कि मंदिर के उत्तरी द्वार के ठीक ऊपर दो स्थानों पर स्वर्ण कलश गायब है। उसकी जगह वहां पर कुछ पेंट किया गया है। नित्यानंद राय ने बताया कि यह तकरीबन 2 से लेकर 3 फीट की चौड़ाई का था। पहले भी मंदिर से सोना चांदी की चोरी हो चुकी है, इसलिए इस प्रकरण की गंभीरता से जांच किए जाने की आवश्यकता है। ऐसा पैच करीब दो से तीन जगहों पर है।

श्वेत पत्र जारी करने और वेबसाइट पर जानकारी देने की मांग

अधिवक्ता नित्यानंद राय ने मांग की है कि मंदिर के शिखर से सोना गायब होने के आरोपों की निष्पक्ष जांच कराई जाए। उनका कहना है कि मंदिर में सोना कब से गायब हो रहा है और अब तक कितनी मात्रा में सोना या चांदी गायब हुआ है, इसकी पूरी जानकारी सामने आनी चाहिए।

उन्होंने मंदिर प्रशासन से इस मामले में श्वेत पत्र जारी करने की मांग की है। साथ ही, मंदिर के अंदर और शिखर पर लगे सोने-चांदी का पूरा ब्योरा सार्वजनिक करने की बात कही है। नित्यानंद राय चाहते हैं कि यह जानकारी मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट पर भी उपलब्ध कराई जाए, ताकि लोग इसे आसानी से देख सकें। शिकायतकर्ता के मुताबिक, मंदिर प्रशासन की ओर से अब तक जो जवाब दिया गया है, उससे वह संतुष्ट नहीं हैं।

ओलावृष्टि में टूटा था कलश का हिस्सा, मंदिर प्रशासन ने सुरक्षित रखा

दूसरी ओर, वाराणसी के मंडलायुक्त एस. राजलिंगम ने मंदिर से सोना गायब होने के आरोपों को खारिज किया है। उन्होंने इन खबरों को भ्रामक और बेबुनियाद बताया। मंडलायुक्त के मुताबिक, करीब तीन महीने पहले ओलावृष्टि के दौरान मंदिर के प्रवेश द्वार के ठीक ऊपर बने गुंबद या कलश का एक हिस्सा टूटकर गिर गया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि टूटे हुए हिस्से को मंदिर प्रशासन ने सुरक्षित रख लिया है।

IIT मद्रास की तकनीकी टीम करेगी सर्वे

मंडलाआयुक्त ने बताया कि गिरा हुआ कलश जिसे विश्वनाथ धाम में सुरक्षित रखा गया है, पुनर्स्थापना के लिए IIT मद्रास से सर्वे कराया गया है। उसकी मदद से जल्द ही फिर से कलश स्थापित कराया जाएगा। बिना किसी तकनीकी परीक्षण के कलश को दोबारा लगाना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं है। इसके लिए IIT मद्रास से संपर्क किया गया है और वहां की टीम प्राथमिक सर्वे का काम कर चुकी है।

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मेरठ के चर्चित ‘नीला ड्रम’ हत्याकांड मामले में दोषी मुस्कान और साहिल को सजा-ए-मौत

मेरठ के चर्चित सौरभ हत्याकांड में दोषी करार दी गयी उसकी पत्नी मुस्कान और उसके प्रेमी साहिल को एक स्थानीय अदालत ने फांसी की सजा सुनायी है।

जिला शासकीय अधिवक्ता केके चौबे ने बताया कि जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा की अदालत में बुधवार को सजा पर सुनवाई के बाद दोनों दोषियों को फांसी की सजा सुनायी गयी।

उन्होंने बताया कि गत 30 सितंबर को सौरभ राजपूत हत्याकांड मामले में दोषी करार दिये गये साहिल और मुस्कान जेल से वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिये अदालत के समक्ष पेश हुए, जिसके बाद सजा पर बहस और दोषियों को अपना पक्ष रखने का अवसर देने के लिए सुनवाई हुई।

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चौबे ने बताया कि सुनवाई के दौरान न्यायाधीश ने दोनों से पूछा कि वे सजा के संबंध में कुछ कहना चाहते हैं या नहीं। जेल प्रशासन के मुताबिक, मुस्कान और साहिल को अलग-अलग पेश किया गया और दोनों ने अपना पक्ष रखा।

वरिष्ठ जेल अधीक्षक वीरेश राज शर्मा ने बताया कि सुनवाई संक्षिप्त रही। उन्होंने बताया कि अदालत ने दोनों से विभिन्न बिंदुओं पर सवाल किए, जिनमें फॉरेंसिक रिपोर्ट से जुड़े सवाल भी शामिल थे। हालांकि, उन्होंने सवालों का विस्तृत ब्योरा साझा करने से इनकार किया।

अभियोजन के मुताबिक, सौरभ राजपूत की हत्या मार्च 2025 में की गई थी। आरोप था कि मुस्कान ने अपने प्रेमी साहिल के साथ मिलकर पति की हत्या की और शव के टुकड़े कर उन्हें नीले ड्रम में डालकर उसे सीमेंट से सील कर दिया था। मामला सामने आने के बाद पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार किया था।

मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने अदालत में गवाह और साक्ष्य पेश किए और करीब 126 तारीखों तक चली सुनवाई के बाद अदालत ने 30 सितंबर को दोनों को दोषी ठहराया था।

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पूर्व बांग्लादेशी एडवाइजर यूनुस को लोगों ने आतंकवादी कहा:न्यूयॉर्क एयरपोर्ट पर घेरा; सरकार बोली- विरोध करने वालों पर कार्रवाई करेंगे

बांग्लादेश के पूर्व चीफ एडवाइजर मोहम्मद यूनुस को अमेरिका के न्यूयॉर्क एयरपोर्ट पर विरोध का सामना करना पड़ा। एयरपोर्ट पर मौजूद कुछ लोगों ने उन्हें घेर लिया और ‘आतंकवादी’ कहा। लोगों ने उन पर बांग्लादेश में हत्याएं कराने और लोकतंत्र को बर्बाद करने के आरोप लगाए। उन्होंने यूनुस से कहा कि तुम यहां क्यों आए हो, वापस जाओ। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वीडियो में कुछ लोग यूनुस के खिलाफ नारे लगाते और उन पर सवाल उठाते नजर आ रहे हैं। हालात को देखते हुए यूनुस और उनकी सहयोगी लामिया मोर्शेद को एयरपोर्ट के अंदर वापस ले जाया गया। प्रदर्शनकारियों ने हजारों लोगों की मौत का आरोप लगाया प्रदर्शनकारियों ने यूनुस पर हजारों पुलिसकर्मियों की मौत के लिए जिम्मेदार होने का आरोप लगाया। उन्होंने यह दावा भी किया कि बांग्लादेश में करीब 2 लाख लोगों को गिरफ्तार किया गया है। विरोध करने वालों की पहचान नहीं हुई है। बांग्लादेश के एक मीडिया संस्थान ने उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग का समर्थक बताया है। घटना पर यूनुस या उनके प्रतिनिधियों की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। सरकार बोली- विरोध करने वालों पर कार्रवाई करेंगे बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के सूचना एवं कम्युनिकेशन सलाहकार जाहेद उर रहमान ने मंगलवार को कहा कि यूनुस का सामना करने वाले लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि किन कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जाएगी। यूनुस के कार्यकाल में हिंसा और गिरफ्तारियों पर उठे सवाल शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद 8 अगस्त 2024 को यूनुस ने अंतरिम सरकार की कमान संभाली थी। उनके कार्यकाल में बांग्लादेश में हिंसा रोकने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने को लेकर सवाल उठे। इस दौरान हिंदू समुदाय और उनके धार्मिक स्थलों पर हमलों, लोगों की गिरफ्तारी और हिरासत में मौतों की खबरें भी सामने आईं। अवामी लीग ने आरोप लगाया था कि उसके नेताओं और समर्थकों को निशाना बनाया गया। मानवाधिकार संगठनों ने इन मामलों की जांच और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग की थी। खसरे से 1170 बच्चों की मौतों पर भी घिरे यूनुस बांग्लादेश में खसरे के प्रकोप से बच्चों की मौतों को लेकर भी यूनुस की अंतरिम सरकार की आलोचना हुई। रिपोर्ट के मुताबिक, इस बीमारी से 1,170 बच्चों की मौत हुई है। यूनिसेफ ने मई 2026 में कहा था कि उसने वैक्सीन की खरीद में देरी को लेकर अंतरिम सरकार को कम से कम 10 बार चेतावनी दी थी। इसके बाद भी सरकार ने यूनिसेफ के जरिए वैक्सीन खरीदने के बजाय खुली टेंडर प्रक्रिया अपनाई। इस प्रक्रिया में देरी के बीच वैक्सीन का स्टॉक खत्म हो गया। इसके बाद बीमारी का प्रकोप बढ़ गया। हालांकि, इस मामले में सरकार की जिम्मेदारी को लेकर जांच के निष्कर्ष अलग से देखे जाने चाहिए। हसीना की सरकार गिरने के बाद डेढ़ साल सत्ता में रहे यूनुस अगस्त 2024 में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद यूनुस ने अंतरिम सरकार का नेतृत्व किया। उनकी सरकार करीब डेढ़ साल तक सत्ता में रही। 2025 में बांग्लादेश के एक विशेष ट्रिब्यूनल ने शेख हसीना की गैरमौजूदगी में मुकदमा चलाया और उन्हें मौत की सजा सुनाई। यूनुस की सरकार ने अवामी लीग पर प्रतिबंध लगाया और भारत से हसीना को बांग्लादेश भेजने की मांग की।

अमेरिका में पहली बार सजा-ए-मौत टीवी पर लाइव होगी:16 साल पहले जहां 13 लोगों की जान ली, दोषी को वहीं गोली मारी जाएगी

अमेरिका में पहली बार मौत की सजा को लाइव टीवी पर दिखाया जाएगा। पूर्व आर्मी मेजर निदाल हसन को गोली मारकर मौत की सजा दी जाएगी। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने कहा है कि इस सजा का लाइव टेलिकास्ट किया जाएगा, ताकि आम लोग इसे देख सकें। BBC के मुताबिक, 100 साल में यह अमेरिका में पहली सार्वजनिक तौर पर दी गई मौत की सजा होगी। हसन ने 2009 में टेक्सास के सैन्य अड्डे पर धार्मिक नारा लगाते हुए गोलीबारी की थी, जिसमें 13 सैनिकों की मौत हो गई थी। अब 3 दिसंबर को यहीं मौत की सजा दी जाएगी। 65 साल बाद सैनिक को मौत की सजा का पहला ऐसा मामला 1961 के बाद अमेरिकी सैन्य न्याय व्यवस्था के तहत मौत की सजा पाने वाला निदाल हसन पहला व्यक्ति होगा। सैन्य व्यवस्था में आखिरी बार प्राइवेट जॉन ए. बेनेट को मौत की सजा दी गई थी। हेगसेथ ने एक इंटरव्यू में कहा कि हसन को सैनिकों की एक टुकड़ी गोली मारकर मौत की सजा देगी। हेगसेथ ने कहा, ‘हम यह सुनिश्चित करेंगे कि लोग इसे देख सकें और यह सार्वजनिक हो। लोगों को समझना चाहिए कि इस तरह के कामों के गंभीर नतीजे होते हैं।’ हमले के बाद माना था- जिहाद के लिए किया 5 नवंबर 2009 को सेना के मनोचिकित्सक मेजर निदाल हसन निजी पिस्तौल लेकर फोर्ट हुड सैन्य अड्डे पहुंचा और सैनिकों व अन्य लोगों पर अचानक गोलीबारी कर दी। यह अमेरिकी सैन्य अड्डे पर हुई सबसे घातक सामूहिक गोलीबारी थी। उस समय अमेरिका अफगानिस्तान और इराक में युद्ध लड़ रहा था। हसन ने बाद में कहा कि वह इन युद्धों को गैरकानूनी और अनैतिक मानता था और जिहाद के लिए हमला किया था। गोलीबारी में हसन भी घायल हुआ और कमर के नीचे से लकवाग्रस्त हो गया। सैन्य अदालत में उसने हत्याओं की बात स्वीकार की। 2013 में उसे पहले से हत्या की योजना बनाने और हत्या की कोशिश के कुल 45 मामलों में दोषी ठहराया गया। हसन ने हमले पर कोई पछतावा नहीं जताया। सैन्य मानसिक स्वास्थ्य पैनल के सामने उसने कहा कि वह चाहता था कि हमले में उसकी भी मौत हो जाती, ताकि वह शहीद बन सके। उसका यह तक कहा कि मौत की सजा मिलने पर भी वह खुद को शहीद मानेगा। अदालत में अपील करने से सजा अब भी टल सकती है सैन्य व्यवस्था में किसी कैदी को तब तक मौत की सजा नहीं दी जा सकती, जब तक राष्ट्रपति खुद उस सजा की पुष्टि न करें। इसके बाद भी कानूनी अपील के कारण सजा पर रोक लग सकती है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने मंगलवार को हसन को गोली मारकर मौत की सजा देने का आदेश मंजूर कर दिया था। वकील जॉन मिल्स के मुताबिक, हसन के मामले में अपील की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है। हसन अपने दोषी ठहराए जाने और मौत की सजा के फैसले को अदालत में चुनौती दे सकता है। ऐसी स्थिति में सजा पर रोक लगने की संभावना है। उन्होंने कहा, ‘गोली मारकर दी जाने वाली मौत की सजा का लाइव प्रसारण करने की कोशिश ट्रम्प प्रशासन का सिर्फ ध्यान खींचने का तरीका है। इसकी संभावना भी कम है कि सजा दी जा सकेगी, न्याय मिलना तो दूर की बात है।’ ——————– यह खबर भी पढ़ें… ओबामा के करीबी थे, अब ट्रम्प के खास बने जुकरबर्ग:राष्ट्रपति ने जेल भेजने की धमकी दी थी, अब साथ मिलकर AI के नियम बना रहे मेटा चीफ मार्क जुकरबर्ग कभी अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के करीबी थे। 2021 में फेसबुक और इंस्टाग्राम ने ट्रम्प का अकाउंट बंद कर दिए, तो उन्होंने जुकरबर्ग को जेल भेजने की धमकी दी थी। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। पूरी खबर पढ़ें…

अमेरिकी सैनिक को गोली मारकर मौत की सजा दी जाएगी:65 साल में पहला ऐसा मामला; धार्मिक नारा लगाकर 13 लोगों को मार दिया था

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पूर्व अमेरिकी सैनिक निदाल हसन को गोली मारकर मौत की सजा देने का आदेश दिया है। पेंटागन ने सोमवार को इसकी जानकारी दी। अगर हसन की सजा लागू होती है तो वह 1961 के बाद अमेरिकी सैन्य न्याय व्यवस्था के तहत मौत की सजा पाने वाला पहला व्यक्ति होगा। सैन्य व्यवस्था में आखिरी बार प्राइवेट जॉन ए. बेनेट को मौत की सजा दी गई थी। हसन ने 2009 में टेक्सास के सैन्य अड्डे पर धार्मिक नारा लगाते हुए गोलीबारी की थी, जिसमें 13 लोगों की मौत हो गई थी। हमले के बाद माना- जिहाद के लिए किया 5 नवंबर 2009 को सेना के मनोचिकित्सक मेजर निदाल हसन निजी पिस्तौल लेकर फोर्ट हुड सैन्य अड्डे पहुंचा और सैनिकों व अन्य लोगों पर अचानक गोलीबारी कर दी। यह अमेरिकी सैन्य अड्डे पर हुई सबसे घातक सामूहिक गोलीबारी थी। उस समय अमेरिका अफगानिस्तान और इराक में युद्ध लड़ रहा था। हसन ने बाद में कहा कि वह इन युद्धों को गैरकानूनी और अनैतिक मानता था और जिहाद के लिए हमला किया था। गोलीबारी में हसन भी घायल हुआ और कमर के नीचे से लकवाग्रस्त हो गया। सैन्य अदालत में उसने हत्याओं की बात स्वीकार की। 2013 में उसे पहले से हत्या की योजना बनाने और हत्या की कोशिश के कुल 45 मामलों में दोषी ठहराया गया। हसन ने हमले पर कोई पछतावा नहीं जताया। सैन्य मानसिक स्वास्थ्य पैनल के सामने उसने कहा कि वह चाहता था कि हमले में उसकी भी मौत हो जाती, ताकि वह शहीद बन सके। उसका यह तक कहा कि मौत की सजा मिलने पर भी वह खुद को शहीद मानेगा। हमले से पहले कट्टर हुए थे धार्मिक विचार मेजर हसन का जन्म वर्जीनिया के अर्लिंगटन में फिलिस्तीनी मूल के मुस्लिम माता-पिता के घर हुआ था। उसने वर्जीनिया टेक में पढ़ाई की और 1997 में सैन्य मेडिकल स्कूल की ट्रेनिंग शुरू की। हमले से पहले के कुछ सालों में इस्लाम को लेकर उसके विचार कट्टर होते गए थे। पेंटागन के प्रवक्ता सीन पार्नेल ने अपने बयान में हसन के जिहादी मकसद का जिक्र करते हुए उसे आतंकवादी बताया। हालांकि, हसन पर आतंकवाद से जुड़ी धाराओं में मुकदमा नहीं चलाया गया था। राष्ट्रपति बुश ने भी सैन्य कैदी की मौत की सजा मंजूर की थी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने 2008 में प्राइवेट रोनाल्ड ए. ग्रे की मौत की सजा मंजूर की थी। ग्रे को 1980 के दशक में बलात्कार और हत्याओं की एक सीरीज में दोषी ठहराया गया था। लेकिन एक जज ने उसकी मौत की सजा पर रोक लगा दी थी। जज ने कहा था कि ग्रे को संघीय अदालत में अपील करने के लिए और समय मिलना चाहिए। 2026 तक ग्रे सैन्य डेथ रो में ही है। अमेरिकी सैन्य डेथ रो में फिलहाल चार कैदी मौत की सजा का इंतजार कर रहे हैं। सैन्य व्यवस्था में किसी कैदी को तब तक मौत की सजा नहीं दी जा सकती, जब तक राष्ट्रपति खुद उस सजा की पुष्टि न करें। हसन के मामले में ट्रम्प की मंजूरी के बाद अब सेना के सचिव को सजा की तारीख और जगह तय करनी है। इसके बाद भी कानूनी अपील के कारण सजा पर रोक लग सकती है। गोली मारकर अब तक सिर्फ 6 को मौत की सजा अमेरिका में मौत की सजा देने का सबसे आम तरीका इंजेक्शन है। 1976 में मौत की सजा दोबारा शुरू होने के बाद से अब तक 1488 लोगों को इंजेक्शन के जरिए मौत दी जा चुकी है। इसके मुकाबले गोली मारकर सिर्फ 6 लोगों को मौत की सजा दी गई है। यानी यह तरीका अमेरिका में बेहद रेयर है। ———————- यह खबर भी पढ़ें… अमेरिकी उपराष्ट्रपति बोले- हमलावर पायलट मुसीबत था: मालूम होने पर भी प्लेन क्यों उड़ाने दिया; ओमान बोला- किसी देश ने हमामी की जानकारी नहीं मांगी अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने सोमवार को कहा कि फ्लाईदुबई का को-पायलट हमाम अल-हमामी पहले से मुसीबत था। इसके बावजूद उसे पैसेंजर विमान उड़ाने की अनुमति कैसे मिली, यह सवाल उठता है। पूरी खबर पढ़ें…

नाजियों की जीत का कारण हिंसा, हिटलर का करिश्मा नहीं:जर्मनी के दो प्रांत्रों में नाजी समर्थक पार्टी की जीत से छिड़ी नई बहस

जर्मनी के दो प्रांतों में धुर-दक्षिणपंथी पार्टी के सत्ता में आने के बाद यूरोप में जर्मन तानाशाह एडॉल्फ हिटलर (1933-1945 तक सत्ता में था) पर नई बहस छिड़ गई है। आम धारणा है कि हिटलर गजब का करिश्माई नेता था। उसका प्रचार मंत्री जोसेफ गोएबल्स का प्रोपेगैंडा बेजोड़ था और जर्मनी की आर्थिक मंदी ने नाजियों की राह आसान की। अब इन बातों को जर्मनी के लेखक और इतिहासकार फिलिप रुख ने सिरे से खारिज किया है। अपनी नई शोधपरक किताब ‘डेर रुकफॉल’ में रुख बताते हैं कि हिटलर कोई कुशल नेता नहीं था। वह एक आलसी अपराधी था, जो दोपहर तक सोता था। उसकी नाजी पार्टी की जीत को समझने के लिए 14 सितंबर 1930 के चुनावों को देखना होगा। 1928 में नाजी पार्टी को महज 8 लाख वोट और 12 सीटें मिली थीं। रुख बताते हैं कि 1930 में नाजियों को 64 लाख वोट और 107 सीटें मिलीं, जिससे यह सनकी गुट दूसरी राजनीतिक ताकत बना। हिंसा के खौफ से लोग नाजियों के साथ हुए और 1933 में सत्ता में आया। हिटलर से जुड़े 3 बड़े भ्रम ‘सेंटर फॉर पॉलिटिकल ब्यूटी’ के संस्थापक रुख कहते हैं- 1. हिटलर का करिश्मा छलावा था 1930 के चुनाव में हिटलर उम्मीदवार भी नहीं था, क्योंकि उसके पास जर्मन नागरिकता नहीं थी। तख्तापलट की साजिश में उस पर देश से निकाले जाने का खतरा था। 1929 में हिटलर ने पूरे साल में केवल 29 भाषण दिए थे। पार्टी दफ्तर जाने के बजाय कैफे और सिनेमाघरों में वक्त बिताता था। 2. कमजोर प्रोपेगैंडा नाजी अखबार जैसे- ‘इलुस्ट्रिएटर बीओबैक्टर’ बेहद स्तरहीन था। उसे बहुत कम लोग पढ़ते थे। अन्य पार्टियों के पास प्रचार के लिए नियॉन साइन जैसे बेहतर साधन थे, जबकि नाजियों की प्रचार सामग्री पेशेवर नहीं थी। 3. महामंदी मुख्य वजह नहीं जिन इलाकों में बेरोजगारी ज्यादा थी, वहां नाज़ियों को सबसे कम वोट मिले। महामंदी का असर जर्मनी में जुलाई 1931 में दिखा। रुख लिखते हैं कि नाजियों की सबसे बड़ी ताकत उनकी ‘राजनीतिक हिंसा और विरोधियों के सफाए की खुली सनक’ थी। दावा- दक्षिणपंथी पार्टियां समाज में नफरत का फायदा उठाती हैं फिलिप रुख के अनुसार, नाजी पार्टी किसी आर्थिक या सामाजिक नीति पर बात नहीं कर रही थी, बल्कि विरोधियों की हत्याओं के षड्यंत्र रच रही थी। दुर्भाग्य से यही हिंसक सनक उस समय के जर्मन मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को आकर्षित कर गई। रुख चेताते हैं कि आज के दौर में भी दक्षिणपंथी, चरमपंथी पार्टियों पर घोटालों या खुलासों का असर नहीं पड़ता, क्योंकि वे समाज के भीतर मौजूद नफरत का फायदा उठाती हैं।

Azamgarh Triple Murder: पत्नी और 2 पुजारियों को गोलियों से भूना, फिर 3 मासूम बच्चों को बनाया बंधक… आजमगढ़ में अरविंद का 7 घंटे का खौफनाक ड्रामा!

Azamgarh Triple Murder: उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के अहरौला थाना क्षेत्र के शंभूपुर गांव में मंगलवार (22 सितंबर) शाम पूजा के दौरान हुए विवाद के बाद तीन लोगों की हत्या के आरोपी अरविंद सिंह को आजमगढ़ की स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप और ATS की संयुक्त टीम ने देर रात मुठभेड़ में मार गिराया। आजमगढ़ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक डॉक्टर अनिल कुमार ने बताया कि रात्रि साढ़े तीन बजे मुठभेड़ में घायल अहरौला पुलिस थाना अंतर्गत शंभूपुर गांव निवासी अरविंद सिंह की इलाज के दौरान मौत हो गई।

पत्नी और दो पूजारियों की हत्या

आजमगढ़ पुलिस के मुताबिक, अरविंद सिंह मंगलवार शाम छह बजे घर लौटा। उस समय, उसकी पत्नी बबिता सिंह (32) दो पंडितों से पूजा-पाठ करवा रही थी। घर में धार्मिक अनुष्ठान होता देख अरविंद भड़क गया। फिर नाराज अरविंद ने अपनी पत्नी एवं दो पंडितों को गाली देना शुरू कर दिया। पत्नी की आपत्ति पर विवाद बढ़ गया। इस बीच, अरविंद ने अपनी लाइसेंसी बंदूक निकाली और कथित तौर पर पत्नी बबिता सिंह को गोली मार दी। इसके बाद दोनों पंडितों को भी गोली मार दी। पंडितों की पहचान महेंद्र पाठक (60) और अखिलेश मिश्रा (50) के रूप में की गई है।

तीन बच्चों को बनाया बंधक

इस घटना के बाद उसने खुद को घर के भीतर बंद कर लिया। मामले की सूचना मिलने पर कई थानों से पुलिस टीमें मौके पर पहुंची और घर को चारों तरफ से घेर लिया। डॉक्टर अनिल कुमार ने बताया कि तीन हत्याओं के आरोपी ने तीन बच्चों के साथ खुद को कमरे में बंद कर लिया था। इस दौरान वह लगातार उन बच्चों को मारने की धमकी दे रहा था। आरोपी द्वारा चलाई गई गोली से एक बच्चे को भी गोली लगी है जिसे इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया।

घायल बेटे ने भी तोड़ा दम, दो बेटियां बचाई गईं

पुलिस ने सबसे पहले घायल बेटे को कमरे से बाहर निकाला। ‘दैनिक जागरण’ की रिपोर्ट के मुताबिक, उसकी पहचान आठ वर्षीय शौर्य के रूप में हुई। उसे गोली लगी थी। इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। इसके बाद पुलिस ने अरविंद की दोनों बेटियों को सुरक्षित बाहर निकाला। दोनों बच्चियां सदमे में थीं। पुलिस के मुताबिक उनमें पानी और भोजन की कमी के संकेत दिखाई दिए। उन्हें इलाज के लिए अस्पताल भेजा गया।

पुलिस पर की फायरिंग

अधिकारियों ने बताया कि आरोपी ने पुलिस पर अंधाधुंध फायरिंग करनी शुरू कर दी। पुलिस की जवाबी कार्रवाई में आरोपी को गोली लगी। मंगलवार रात साढ़े तीन बजे आरोपी की इलाज के दौरान मौत हो गई। जबकि दो बच्चे खतरे से बाहर हैं। डॉक्टर अनिल कुमार ने न्यूज एजेंसी पीटीआई को बताया कि आरोपी को लगभग सात घंटे तक समझाने का प्रयास किया गया। इसके साथ ही रिश्तेदारों और परिजनों को बुलाकर भी प्रयास किया गया। लेकिन वह लगातार बच्चों को मारने की धमकी दे रहा था।

भूत प्रेत और आत्मा के साए!

गांव के लोगों ने बताया कि आरोपी की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी। इसलिए भूत प्रेत और आत्मा के साए की बात को लेकर उसके घर में पूजा पाठ का आयोजन किया गया था। इसी बात से आरोपी नाराज था। वाराणसी के एडीजी नवीन अरोड़ा का कहना है कि लगातार सात घंटे के प्रयास के बाद भी आरोपी बाहर नहीं निकला। इसी बीच फायरिंग की आवाज आई जिसके बाद हमारे पास कोई विकल्प नहीं था।

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स्टन ग्रेनेड और टियर गैस ग्रेनेड का प्रयोग करके दरवाजा तोड़ा गया। इसके बाद डॉक्टर अनिल कुमार एसओजी टीम के साथ अंदर गए। उन्होंने बताया कि अंदर जाते ही लगातार आरोपी फायरिंग करने लगा। अधिकारियों ने बताया कि उसने पांच राउंड फायर किया। इसी दौरान पुलिस की जवाबी कार्रवाई में आरोपी को गोली लगी। इस मुठभेड़ में आरोपी की मौत हो गई है।

5 मौतों से दहला आजमगढ़

इस पूरी वारदात में कुल पांच लोगों की मौत हुई। इनमें अरविंद सिंह, उसकी पत्नी बाबिता सिंह, दो पुजारी महेंद्र पाठक और अखिलेश मिश्रा तथा उसका आठ वर्षीय बेटा शौर्य शामिल है। इस हत्याकांड के बाद पूरे जिले में दहशत का माहौल है। फिलहाल पुलिस पूरे घटनाक्रम की कड़ियों को जोड़ने में जुटी है। धार्मिक अनुष्ठान से शुरू हुए विवाद से लेकर गोलीबारी, बच्चों को कमरे में बंद करने और सात घंटे बाद पुलिस कार्रवाई तक की पूरी घटनाक्रम की जांच की जा रही है।