ईरान में अमेरिकी हमला युद्ध अपराध हो सकता है:UN रिपोर्ट में गर्ल्स स्कूल पर हमले का जिक्र; पुतिन के बाद अब ट्रम्प की जवाबदेही पर सवाल

ईरान पर फरवरी में हुए अमेरिका हमलों को लेकर UN की जांच रिपोर्ट गुरुवार को सामने आई। UN की स्वतंत्र जांच टीम ने कहा कि उसके पास यह मानने की पर्याप्त वजह है कि मिनाब के गर्ल्स स्कूल और एक स्पोर्ट्स सेंटर पर हमले अमेरिकी सेना ने किए थे। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों हमले अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत युद्ध अपराध हो सकते हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध में भी रूसी राष्ट्रपति पुतिन पर युद्ध अपराध के आरोप लगे थे। इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट ने 2023 में उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। अब UN की रिपोर्ट के बाद ट्रम्प की किसी तरह की व्यक्तिगत जिम्मेदारी को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। ईरान में अमेरिका के 2 हमलों की UN ने जांच की पहला- मिनाब गर्ल्स स्कूल पर हमले में 120 बच्चों की मौत मिनाब स्कूल पर हमले के बाद की तस्वीरें… दूसरा- स्पोर्ट्स सेंटर पर हमले में 22 नागरिक मारे गए UN की रिपोर्ट के बाद अब क्या होगा? रिपोर्ट अभी किसी अदालत का फैसला नहीं है। इसे UN मानवाधिकार परिषद में रखा जाएगा। इसके बाद आगे जांच और कार्रवाई की मांग उठ सकती है। अमेरिका से भी पूछा जा सकता है कि स्कूल को सैन्य ठिकाना क्यों माना गया और हमला करने से पहले खुफिया जानकारी की ठीक से जांच क्यों नहीं हुई। आगे की जांच में पता लगाया जाएगा कि हमले का फैसला किसने लिया और किस जानकारी के आधार पर लिया। अगर किसी अधिकारी की गंभीर गलती या जानबूझकर की गई कार्रवाई सामने आती है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई या मुकदमा हो सकता है। क्या ट्रम्प भी जिम्मेदार माने जाएंगे? UN की रिपोर्ट में अमेरिकी सेना पर युद्ध अपराध का आरोप है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि ट्रम्प भी इसके लिए सीधे जिम्मेदार माने जाएंगे। इसके लिए यह देखना होगा कि ट्रम्प ने हमले का आदेश दिया था या नहीं, उन्हें इसकी जानकारी थी या नहीं और उन्हें हमला रोकने की जानकारी या ताकत थी या नहीं। पहले जांच में हमले के लिए जिम्मेदार सैन्य अधिकारियों की भूमिका सामने आएगी। उसके बाद ही यह देखा जाएगा कि ट्रम्प की इसमें कोई भूमिका थी या नहीं। ईरान की सरकार पर भी गंभीर आरोप UN की जांच में ईरानी सरकार की कार्रवाई को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। जांच टीम के मुताबिक, दिसंबर के आखिर में शुरू हुए सरकार विरोधी प्रदर्शनों को दबाने के दौरान ईरानी अधिकारियों ने गैरकानूनी हत्याएं, मनमानी गिरफ्तारियां और लोगों को जबरन गायब करने जैसी कार्रवाइयां कीं। रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने प्रदर्शनकारियों की आवाज दबाने के लिए इंटरनेट बंद किया और मौत की सजा का भी इस्तेमाल किया। UN टीम ने कहा कि ईरानी अधिकारियों की कार्रवाई आम नागरिकों के खिलाफ व्यापक और सुनियोजित हमले का हिस्सा थी। जांच के मुताबिक, यह मानवता के खिलाफ अपराध की श्रेणी में आ सकता है। ————————- यह खबर भी पढ़ें… बांग्लादेश में टॉर्च की रोशनी में मरीजों का इलाज: 20 साल का सबसे बड़ा बिजली संकट; भारत पहले ही ज्यादा बिजली दे रहा, मदद मुश्किल बांग्लादेश इस समय 20 साल के सबसे गंभीर बिजली संकट से जूझ रहा है। कई इलाकों में रोजाना घंटों कटौती हो रही है। पूरी खबर पढ़ें…

Judge Ravi Kumar Diwakar: यूपी के जज रवि कुमार दिवाकर ने 5 महीनों में 23 को सुनाई फांसी की सजा! उन सभी की पूरी लिस्ट जिन्हें अब तक वो दे चुके डेथ सेंटेंस

Judge Ravi Kumar Diwakar: उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में सिर्फ पांच महीने में 23 लोगों को फांसी की सजा सुनाने वाले जज रवि कुमार दिवाकर एक बार फिर चर्चा में हैं। उनके कोर्ट में लंबित हत्या और गंभीर अपराधों से जुड़े करीब 100 मामलों को अब दूसरे कोर्ट में भेज दिया गया है। इनमें ऐसे मामले शामिल हैं जिनमें मौत की सजा या उम्रकैद का प्रावधान है। न्यूज एजेंसी ‘पीटीआई’ के मुताबिक, मुजफ्फरनगर में फास्ट-ट्रैक कोर्ट के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज रवि कुमार दिवाकर ने पिछले पांच महीनों में 11 अलग-अलग मामलों में 23 दोषियों को मौत की सजा सुनाई है। इसके बाद उनके कोर्ट में लंबित करीब 100 गंभीर आपराधिक मामलों को प्रशासनिक आदेश के जरिए दूसरे कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया।

सरकारी वकील कुलदीप कुमार के मुताबिक, ये मामले अब डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज वीरेंद्र कुमार सिंह की अदालत में जाएंगे। हालांकि, बाद की रिपोर्टों में प्रशासनिक आदेश में 97 मामलों को ‘रिकॉल्ड (recalled)’ किए जाने की बात सामने आई है। यानी शुरुआती खबरों में बताए गए करीब 100 मामलों की संख्या प्रशासनिक रिकॉर्ड में 97 है।

आखिर क्यों ट्रांसफर किए गए इतने मामले?

मुजफ्फरनगर जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रमोद त्यागी के अनुसार, वकीलों और मुकदमों से जुड़े लोगों के बीच यह आशंका थी कि जज दिवाकर के सामने लंबित गंभीर मामलों में भी मौत की सजा सुनाई जा सकती है। इसके बाद जिला जज ने प्रशासनिक आदेश के जरिए मामलों को अपने कोर्ट में वापस बुला लिया। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि केस ट्रांसफर करना जिला जज के अधिकार क्षेत्र में आने वाली प्रशासनिक प्रक्रिया है। सरकारी वकील के मुताबिक, ट्रांसफर किए गए मामलों में हत्या जैसे गंभीर अपराध शामिल हैं, जिनमें कानून के तहत मौत या उम्रकैद जैसी सजा हो सकती है।

दहेज हत्या के दोषी नदीम को फांसी की सजा सुनाई

मुजफ्फरनगर कोर्ट ने दहेज की मांग को लेकर 2018 में अपनी पत्नी को जिंदा जलाकर मारने के मामले में एक व्यक्ति को सोमवार (7 सितंबर) को मौत की सजा सुनाई। इसके साथ ही पिछले चार महीनों में इस अदालत द्वारा सुनाई गई मृत्युदंड की सजाओं की संख्या बढ़कर 23 हो गई है। सरकारी वकील कुलदीप कुमार ने ‘पीटीआई’ को बताया कि अपर जिला एवं सत्र जज रवि कुमार दिवाकर ने आरोपी नदीम को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 302 और 504 के तहत दोषी ठहराते हुए उस पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है।

8 साल पुराना है केस

उन्होंने बताया कि यह मामला आठ साल पुराना है। इसमें नदीम पर आरोप था कि उसने 23 जुलाई 2018 को मुजफ्फरनगर जिले के शाहपुर कस्बे में दहेज की मांग को लेकर अपनी पत्नी शहजादी (23) को आग लगा दी थी। कुमार ने बताया कि गंभीर रूप से झुलसी शहजादी को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया था, जहां बाद में उसकी मौत हो गई। उन्होंने बताया कि मौत से पहले शहजादी का बयान दर्ज किया गया था। इसमें उसने कथित रूप से अपने पति पर आग लगाने का आरोप लगाया था।

पुलिस ने 23 नवंबर 2018 को नदीम, उसकी मां शमशिदा और बहन सोनी के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया था। कुमार ने बताया कि साक्ष्यों के अभाव में सोनी को बरी कर दिया गया। जबकि मुकदमे की सुनवाई के दौरान शमशिदा की मृत्यु हो गई। उन्होंने बताया कि शहजादी और नदीम का विवाह 10 जनवरी 2015 को हुआ था।

23 लोगों को मौत की सजा के बाद एक्शन

सरकारी वकील के मुताबिक, सोमवार के फैसले के बाद जज दिवाकर की अदालत ने पिछले पांच-छह महीनों में 11 अलग-अलग मामलों में 23 लोगों को मौत की सजा सुनाई है। इससे पहले, अगस्त में जज दिवाकर की अदालत में लंबित करीब 100 हत्या के मामलों को प्रशासनिक आदेश के तहत डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज वीरेंद्र कुमार सिंह की अदालत में ट्रांसफर कर दिया गया था।

कुलदीप कुमार ने बताया था कि मौत की सजा या उम्रकैद से जुड़े अपराधों वाले इन मामलों को दिवाकर की अध्यक्षता वाली फास्ट ट्रैक अदालत से डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज सिंह की अदालत में भेजा गया है। जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रमोद त्यागी ने बताया था कि यह ट्रांसफर वकीलों और वादकारियों के बीच अदालत द्वारा मृत्युदंड सुनाए जाने की आशंकाओं के बीच किया गया था।

कौन हैं जज रवि कुमार दिवाकर?

रवि कुमार दिवाकर का जन्म जुलाई 1980 में हुआ था। वह मूल रूप से यूपी की राजधानी लखनऊ के रहने वाले बताए जाते हैं। उन्होंने B.Com और LLM की पढ़ाई की है। वर्ष 2009 में वह अतिरिक्त सिविल जज के तौर पर न्यायिक सेवा में प्रवेश किया।

इसके बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश के कई जिलों में न्यायिक जिम्मेदारियां संभालीं। उनकी पोस्टिंग सुल्तानपुर, बदायूं, वाराणसी और बरेली समेत कई जगहों पर रही। नवंबर 2025 से वह मुजफ्फरनगर में एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज (अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश) के तौर पर तैनात हैं।

2022 में ज्ञानवापी मामले से देशभर में चर्चा में आए

जज रवि कुमार दिवाकर को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान साल 2022 में मिली थी। उस समय वह वाराणसी में सिविल जज के पद पर तैनात थे। उन्होंने ज्ञानवापी मस्जिद परिसर का वीडियोग्राफिक सर्वे कराने का आदेश दिया था। यह मामला देश के सबसे चर्चित कानूनी और धार्मिक विवादों में शामिल हो गया और उनके आदेश की व्यापक चर्चा हुई।

5 महीने में 23 मौत की सजाएं

मुजफ्फरनगर में उनकी अदालत के फैसलों ने हाल के महीनों में सबसे ज्यादा ध्यान खींचा। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच उन्होंने 11 मामलों में 23 दोषियों को मौत की सजा सुनाई। इनमें हत्या, अपहरण और लूट के दौरान हत्या जैसे गंभीर अपराध शामिल हैं। कई मामलों में अदालत ने अपराध को ‘रेयरेस्ट ऑफ द रेयर’ यानी दुर्लभतम से दुर्लभ कैटेगरी का माना।

कुछ चर्चित प्रमुख मामलों की लिस्ट

  • 6 अप्रैल: वकील मोहम्मद समीर की 2019 में हत्या के मामले में तीन दोषियों को मौत की सजा सुनाई गई। मामला कथित तौर पर ₹45 लाख के आर्थिक विवाद से जुड़ा था।
  • 28 अप्रैल: 2019 के एक हत्या मामले में एक महिला और उसके तीन बेटों समेत चार लोगों को मौत की सजा दी गई।
  • 30 मई: 2011 में एक महिला और उसके छह वर्षीय बेटे की हत्या के मामले में रहिस को मौत की सजा सुनाई गई।
  • 20 जून: राजेंद्र सैनी हत्याकांड में गजेंद्र और रामकिरण को फांसी की सजा सुनाई गई।
  • 2 जुलाई: ड्यूटी पर तैनात होमगार्ड रतिराम की हत्या के मामले में दीपक को मौत की सजा दी गई।
  • 6 जुलाई: 2010 में राजबीर सिंह की हत्या के मामले में पूर्व ग्राम प्रधान प्रमोद और उसके सहयोगी सहदेव को मौत की सजा सुनाई गई।
  • 17 जुलाई: 2011 में लूट की कोशिश के दौरान किसान राज सिंह की हत्या के मामले में चार लोगों को मौत की सजा दी गई।
  • 12 अगस्त: 1999 में ₹5 लाख की फिरौती के लिए लकड़ी व्यापारी सलीम के अपहरण और हत्या के मामले में शाहनवाज को मौत की सजा दी गई।
  • 13 अगस्त: शामली में पुरानी रंजिश से जुड़े 2014 के हत्या मामले में रामवीर, राजीव, राहुल और हरेंद्र कुमार को मौत की सजा सुनाई गई।
  • 7 सितंबर: जज रवि की अदालत ने दहेज की मांग को लेकर 2018 में अपनी पत्नी को जिंदा जलाकर मारने के मामले में एक व्यक्ति को 7 सितंबर को मौत की सजा सुनाई। इसके साथ ही पिछले चार महीनों में इस अदालत द्वारा सुनाई गई मृत्युदंड की सजाओं की संख्या बढ़कर 23 हो गई है।

क्या इन सभी को फांसी दे दी जाएगी?

ऐसा नहीं है। यह एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू है। सेशन कोर्ट द्वारा सुनाई गई मौत की सजा को तुरंत लागू नहीं किया जा सकता। उसे हाई कोर्ट की पुष्टि की आवश्यकता होती है। इसलिए जज दिवाकर द्वारा सुनाई गई 22 मौत की सजाओं का मतलब यह नहीं है कि सभी दोषियों को तत्काल फांसी दी जाएगी।

1 साल में पूरे UP की तुलना में कितना बड़ा आंकड़ा?

इस फैसलों की संख्या इसलिए भी असामान्य मानी गई क्योंकि पूरे उत्तर प्रदेश में वर्ष 2025 के दौरान ट्रायल कोर्ट ने 20 मामलों में कुल 28 मौत की सजाएं सुनाई थीं। इसके मुकाबले मुजफ्फरनगर की एक फास्ट-ट्रैक अदालत से कुछ ही महीनों में 22 मौत की सजाएं सामने आईं। जज रवि दिवाकर ने अकेले मुजफ्फरनगर में ही 23वीं फांसी की सजा सुनाते हुए फैसले में लिखा, “मैं मरना पसंद करूंगा, डरपोक जज कहलवाना पसंद नहीं करूंगा।”

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उन्होंने अपने फैसले में आगे लिखा है, “जब तक मैं अपने सिद्धांतों पर चलता हूं, तब तक सर्विस करूंगा, अन्यथा त्यागपत्र दे दूंगा। जब तक मैं जज की कुर्सी पर हूं तो फैसला लेने का अधिकार भी एकमात्र मेरा होगा। मुझे पश्चिम के एक माफिया/गैंगस्टर द्वारा यह संदेश भी भिजवाया गया कि अभी तो सिर्फ पत्रावलियां हटवाई गई हैं, अगर मेरे पीछे पड़े तो जिले से बाहर ट्रांसफर करवा देंगे।”

बांग्लादेशी PM तारिक रहमान के दिल्ली आने पर सस्पेंस:BRICS समिट के लिए भारत का न्योता; शेख हसीना के वापस भेजने की शर्त पर विवाद

भारत 12-13 सितंबर को BRICS समिट की मेजबानी करने जा रहा है। समिट में कई देशों के नेता दिल्ली पहुंचेंगे। लेकिन पड़ोसी देश बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के के आने पर अभी भी सस्पेंस बना हुआ है। बांग्लादेश BRICS का सदस्य नहीं है। इसके बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तारिक रहमान को खास मेहमान के तौर पर समिट के आउटरीच सेशन में शामिल होने का न्योता दिया है। हालांकि, दोनों देशों के रिश्तों में शेख हसीना का मुद्दा बड़ी अड़चन बना हुआ है। भारत ने तारिक रहमान को द्विपक्षीय यात्रा के लिए भी न्योता दिया था। इसके जवाब में ढाका ने शर्त रखी कि पहले भारत में रह रहीं बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को वापस भेजा जाए।ट तारिक की अगस्त में भारत यात्रा टली थी प्रधानमंत्री तारिक रहमान इससे पहले अगस्त में भारत दौरे पर आने वाले थे। लेकिन ढाका की शर्त थी कि भारत शेख हसीना को वापस भेजे। इसके बाद ही पीएम के भारत दौरे की तैयारियां आगे बढ़ेंगी। बांग्लादेशी अधिकारियों के मुताबिक, भारत की ओर से इस मुद्दे पर कुछ अच्छे संकेत मिले थे। लेकिन ढाका चाहता था कि भारत का रुख और स्पष्ट हो। तारिक के अगस्त के तीसरे हफ्ते में भारत आने की खबरें आई थीं। लेकिन स्पष्ट जवाब न मिलने की वजह से यह यात्रा टल गई थी। बांग्लादेश हसीना के प्रत्यर्पण की मांग कर रहा है अगस्त 2024 में छात्र आंदोलन के बाद शेख हसीना भारत आ गई थीं। उन्हें ढाका की इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (ICT) ने हत्या के लिए उकसाने और हत्या का आदेश देने के लिए मौत की सजा दी है। बाकी मामलों में उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। ICT ने उन्हें 5 मामलों में आरोपी बनाया था। ट्रिब्यूनल ने शेख हसीना को छात्र आंदोलन के दौरान हुई हत्याओं का मास्टरमाइंड बताया था। इसी के चलते बांग्लादेश लगातार उनके प्रत्यर्पण की मांग कर रहा है। इस पर भारत ने कहा था कि वह बांग्लादेश के अनुरोध की कानूनी प्रक्रिया के तहत समीक्षा कर रहा है। हसीना की दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद तनाव बढ़ा दरअसल 5 अगस्त को शेख हसीना ने दिल्ली में वर्चुअल प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। इसमें उन्होंने अवामी लीग सरकार के सत्ता से हटने की दूसरी बरसी पर पत्रकारों के सवालों के जवाब दिए और बांग्लादेश की राजनीति पर भी अपनी बात रखी। इस पर बांग्लादेश सरकार ने कड़ी आपत्ति जताई। ढाका का कहना था कि भारत में रहते हुए हसीना का सार्वजनिक रूप से राजनीतिक बयान देना दोनों देशों के रिश्तों को सामान्य बनाने की कोशिशों को नुकसान पहुंचा सकता है। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने कहा कि इस बारे में भारत को पहले आगाह किया गया था लेकिन फिर भी भारत ने उन्हें यह प्रेस कॉन्फ्रेंस करने की अनुमति दी। गौरतलब है कि भारत ने शेख हसीना का प्रेस कॉन्फ्रेंस रोकने से इनकार कर दिया था। भारत ने कहा था कि उनका कार्यक्रम एक निजी मीडिया संस्था आयोजित कर रही है। इससे सरकार का कोई लेना-देना नहीं है। भारत से तनाव के बीच पाकिस्तान-तुर्किये के करीब बांग्लादेश हसीना के मुद्दे पर भारत से तनाव के बीच बांग्लादेश अपनी विदेश नीति में दूसरे विकल्पों पर भी जोर दे रहा है। ढाका पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब के साथ रणनीतिक और रक्षा संबंध मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। इसे हसीना के बाद बांग्लादेश की बदलती विदेश नीति के संकेत के तौर पर भी देखा जा रहा है। बांग्लादेश ने मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट में शामिल होने में भी आधिकारिक रुचि दिखाई है। यह सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच बना नया आपसी रक्षा समझौता है। बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने संसद में कहा कि अगर बांग्लादेश को इस समझौते में शामिल होने का न्योता मिलता है तो वह इसे सकारात्मक तरीके से देखेगा। उन्होंने इसे मुस्लिम देशों की आत्मरक्षा से जुड़ा कदम बताया। पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी के बीच हुआ मक्का एग्रीमेंट के जरूरी पॉइंट्स देखें… पीएम रहमान की पार्टी उनकी भारत यात्रा के खिलाफ BRICS क्या है? BRICS 11 प्रमुख उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों का एक समूह है। इनमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, UAE, सऊदी अरब और इंडोनेशिया शामिल हैं। इसका मकसद इन देशों के बीच आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक सहयोग को बढ़ावा देना है। इसमें शुरुआत में 4 देश थे, जिसे BRIC कहा जाता था। यह नाम 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने दिया था। भारत 2026 में BRICS समिट की अध्यक्षता कर रहा है। 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित होने जा रही है। —————- यह खबर भी पढे़ं… जर्मनी में कट्टर दक्षिणपंथी पार्टी पहली बार सत्ता के करीब जर्मनी की दक्षिणपंथी पार्टी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (AfD) ने सक्सोनी-आनहाल्ट के राज्य चुनाव में बड़ी जीत हासिल की है। एग्जिट पोल के मुताबिक, AfD को करीब 44% वोट मिले हैं और वह सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। पूरी खबर पढ़ें…

गुवाहाटी में खौफनाक हत्याकांड: पत्नी की बेरहमी से हत्या कर फ्रिज में छिपाया सिर

गुवाहाटी में खौफनाक हत्याकांड: पत्नी की बेरहमी से हत्या कर फ्रिज में छिपाया सिर

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असम के गुवाहाटी से एक रोंगटे खड़े कर देने वाला मामला सामने आया है, जहां एक पति ने अपनी ही पत्नी की निर्मम हत्या कर दी। हत्या के बाद आरोपी ने शव के टुकड़े कर दिए और सिर को फ्रिज में छिपा दिया। इस जघन्य हत्याकांड के प्रकाश में आते ही आरोपी ने खुद थाने पहुंचकर पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया। ALSO READ: कार चालक ने दो दोस्‍तों को रौंदा, दोनों की मौत, रिक्शा और ठेलों को भी लिया चपेट में, ड्रिंक एंड ड्राइव मुहिम की पोल खुली

 

फ्लैट से आ रही थी बदबू

यह सनसनीखेज घटना गुवाहाटी के हाटीगांव पुलिस थाना क्षेत्र की है, जहां आरोपी और उसकी पत्नी एक अपार्टमेंट में रहते थे। स्थानीय लोगों को जब फ्लैट से अजीब सी बदबू महसूस हुई और दंपति पिछले दो दिनों से नजर नहीं आया तथा उनके फोन भी बंद मिले, तो उन्होंने तुरंत इसकी सूचना हाटीगांव पुलिस को दी।

 

दरवाजा तोड़कर अंदर घुसी पुलिस, चीखें निकल गईं

सूचना मिलने पर मौके पर पहुंची पुलिस ने जब फ्लैट का दरवाजा तोड़ा, तो अंदर का खौफनाक मंजर देखकर उनके होश उड़ गए। पुलिस को वहां एक महिला का क्षत-विक्षत शव मिला, जिसकी पहचान 25 वर्षीय रिया तालुकदार के रूप में हुई। मृतका की उंगलियां आधी कटी हुई थीं, शव सड़ने लगा था और उसका सिर धड़ से अलग था। जब पुलिस ने घर की तलाशी ली, तो उन्हें रिया का सिर एक फ्रिज के अंदर पॉलिथीन बैग में रखा हुआ मिला। ALSO READ: 10 मिनट, 107 डंडे और 'ऑन-द-स्पॉट इंसाफ' : भावनगर में लिव-इन पार्टनर के हत्यारे की पिटाई के वीडियो पर बवाल

 

पति ने किया सरेंडर, पुलिस जांच जारी

मृतका की पहचान 25 वर्षीय रिया तालुकदार के रूप में हुई है, जबकि आरोपी पति की पहचान 30 वर्षीय रामानुज गोस्वामी के रूप में की गई है। पुलिस ने शव और कटे हुए सिर को अपने कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। पुलिस आरोपी से कड़ाई से पूछताछ कर रही है ताकि इस खौफनाक कृत्य के पीछे की असल वजह का पता लगाया जा सके।

 

10 मिनट, 107 डंडे और ‘ऑन-द-स्पॉट इंसाफ’ : भावनगर में लिव-इन पार्टनर के हत्यारे की पिटाई के वीडियो पर बवाल

10 मिनट, 107 डंडे और 'ऑन-द-स्पॉट इंसाफ' : भावनगर में लिव-इन पार्टनर के हत्यारे की पिटाई के वीडियो पर बवाल

Bhavnagar News

Bhavnagar Police Video Viral: गुजरात के भावनगर में लिव-इन पार्टनर की नृशंस हत्या के आरोपी पर पुलिस का ऑन-द-स्पॉट 'इंसाफ' चर्चा और विवाद का विषय बन गया है। 70 वर्षीय महिला की बेटी काजलबेन की बेरहमी से हत्या करने वाले आरोपी फैसल को जब नीलमबाग पुलिस स्टेशन के पीआई डीपी उंडडकट क्राइम सीन रीक्रिएशन के लिए ले गए, तो महज 10 मिनट के भीतर उस पर 107 डंडे बरसा दिए। जहां पीआई ने इस कदम को अपराधियों में खौफ पैदा करने वाला बताया, वहीं सुप्रीम कोर्ट और डीजीपी के निर्देशों का उल्लंघन होने के कारण अब पुलिसिया कार्रवाई के इस तरीके पर संवैधानिक सवाल खड़े हो रहे हैं।

लिव-इन पार्टनर की नृशंस हत्या की पूरी कहानी

भावनगर के कुंभारवाड़ा की रहने वाली 70 वर्षीय भगूबेन बारैया की 40 वर्षीय बेटी काजलबेन पिछले आठ वर्षों से एसटी बस स्टैंड के पास फुटपाथ पर रहने वाले 20 वर्षीय फैसल उर्फ खटकी रफीकभाई लखानी के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही थी।

 

3 सितंबर की दोपहर, हाल ही में जेल से छूटकर आया फैसल बस स्टैंड पहुंचा। वहां उसने काजलबेन को अपने परिचित रवि उर्फ बाड़ो गोहिल के साथ बात करते देखा। रिश्ते को लेकर हुए विवाद में गुस्से में आकर फैसल ने दोनों को लात मारी। इसके बाद उसने काजलबेन के बाल पकड़कर उसका सिर, गर्दन और चेहरा जमीन पर लगी टाइल्स पर बार-बार दे मारा।
 

गंभीर चोटों के कारण काजलबेन बेहोश हो गई। फैसल उसे एम्बुलेंस से सर टी. अस्पताल ले गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

पुलिस का एक्शन और 10 मिनट में 107 डंडे

घटना के बाद पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज के आधार पर फैसल को गिरफ्तार कर लिया। 5 सितंबर को नीलमबाग पुलिस स्टेशन के पुलिस निरीक्षक (PI) डीपी उंडडकट आरोपी को अपराध स्थल (क्राइम सीन रीक्रिएशन) पर लेकर आए।

 

इस दौरान पीआई उंडडकट ने आरोपी फैसल को रस्सी से बांधकर सार्वजनिक रूप से सड़क पर घुमाया और महज 10 मिनट के भीतर उस पर 107 डंडे बरसाए। यह पूरी घटना कैमरों में कैद हो गई और इसका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया।

पीआई उंडडकट का तर्क : दूसरों को सबक मिले

इस कार्रवाई के बाद जब नीलमबाग पुलिस स्टेशन के पीआई डीपी उंडडकट से संपर्क किया गया, तो उन्होंने ऑन-रिकॉर्ड अपने कृत्य का बचाव किया। उन्होंने कहा कि उसे सार्वजनिक रूप से इसलिए सजा दी गई ताकि भविष्य में कोई अन्य व्यक्ति किसी महिला के साथ ऐसी दरिंदगी करने की हिम्मत न करे।

सर्वोच्च न्यायालय और डीजीपी के आदेशों का उल्लंघन?

पीआई के इस कदम ने कानूनी गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। आलोचकों का मानना है कि यह कृत्य सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक दिशा-निर्देशों और गुजरात पुलिस के अपने सर्कुलर का सीधा उल्लंघन है:

  • डीजीपी के सख्त निर्देश : गुजरात के पूर्व प्रभारी डीजीपी डॉ. केएलएन राव ने लिखित आदेश जारी कर स्पष्ट किया था कि किसी भी आरोपी का सार्वजनिक रूप से जुलूस निकालना (परेड कराना) या उनके साथ अपमानजनक व्यवहार करना अवैध है और ऐसा करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।
  • कानून का शासन बनाम त्वरित न्याय : भारतीय संविधान के तहत आरोपी को अदालत के समक्ष प्रस्तुत कर निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) का अधिकार प्राप्त है। पुलिस का काम साक्ष्य जुटाना और अदालत के समक्ष प्रस्तुत करना है, ऑन-द-स्पॉट सजा देना नहीं।

भावनगर की यह घटना दो बेहद संवेदनशील पहलुओं को सामने लाती है। एक ओर जहां महिलाओं के खिलाफ बढ़ते जघन्य अपराधों पर सख्त कार्रवाई और त्वरित न्याय की सामाजिक मांग है, वहीं दूसरी ओर यदि रक्षक ही स्वयं जज बनकर सड़क पर सजा सुनाने लगेंगे, तो संवैधानिक न्याय प्रणाली का महत्व समाप्त हो जाएगा।

यह मामला अब गुजरात पुलिस प्रशासन के लिए एक बड़ी परीक्षा बन गया है कि वह आरोपी को कड़ी से कड़ी न्यायिक सजा दिलाने के साथ-साथ पुलिस अधिकारियों द्वारा कानून सीमा से बाहर जाकर किए गए कार्यों पर क्या रुख अपनाता है।

Yasin Malik wife: ‘8 साल से आवाज नहीं सुनी…’; तिहाड़ जेल में बंद यासीन मलिक अपनी पाकिस्तानी पत्नी को देगा तलाक, खुद के लिए की फांसी की मांग

Yasin Malik wife Mushaal Mullick: राजधानी दिल्ली के तिहाड़ जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे कश्मीरी अलगाववादी संगठन जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) के चेयरमैन यासीन मलिक ने अपनी पाकिस्तानी पत्नी मुशाल मलिक से शादी खत्म करने की इच्छा जाहिर की है। यासीन मलिक ने जम्मू की टाडा (TADA) कोर्ट में एक 25 पन्नों का हलफनामा दायर किया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसमें उसने अपनी पाकिस्तानी पत्नी मुशाल हुसैन मलिक को तलाक देने और सरला भट्ट हत्याकांड में केस लड़े बिना खुद के लिए फांसी की मांग की है।

पत्नी-बेटी का किया जिक्र

मलिक ने इस मर्डर केस की सुनवाई के दौरान जम्मू की स्पेशल TADA/POTA कोर्ट में 25 पेज का पर्सनल हलफनामा (एफिडेविट) दाखिल करने का अनुरोध किया है। हमारे सहयोगी News18 की रिपोर्ट के मुताबिक, हलफनामे में उसने अपनी मां, पत्नी और 13 साल की बेटी रजिया सुल्ताना का जिक्र किया है। इसमें उसने परिवार से लंबे समय तक अलग रहने के बारे में लिखा।

‘8 साल से आवाज नहीं सुनी…’

रिपोर्ट के मुताबिक, मलिक ने हलफनामे में यह भी कहा कि उसने पिछले आठ वर्षों से अपनी पत्नी की आवाज तक नहीं सुनी है। उसका दावा है कि जेल में रहने के दौरान उसे पत्नी और बेटी से नियमित फोन पर बातचीत या सामान्य वीडियो कॉल की सुविधा नहीं मिल सकी। मलिक के मुताबिक, जेल में रहने के दौरान उनके परिवार से बातचीत सीमित और अनिश्चित रही है। उसने इस लंबे अलगाव की वजह अपनी जेल की सज़ा और बातचीत पर लगी पाबंदियों को बताया।

पत्नी से कहा- अपनी जिंदगी में आगे बढ़ो

यासीन मलिक ने अपनी पत्नी मुशाल से कहा कि वह अपनी बाकी जिंदगी उसका इंतजार करते हुए या उनके भविष्य को लेकर अनिश्चितता में न बिताएं। उसने उन्हें जिंदगी में नया अध्याय शुरू करने की बात कही है। मलिक ने लिखा कि उसका फैसला किसी नाराजगी या दुश्मनी की वजह से नहीं है। वह अब भी अपनी पत्नी का सम्मान करता है। मलिक ने यह भी कहा कि उसने मुशाल के साथ बिताए वैवाहिक वर्षों का अफसोस नहीं है। दोनों के बीच दूरी के लिए उसने उन परिस्थितियों को जिम्मेदार बताया, जो उसके कंट्रोल से बाहर थीं।

बेटी का बचपन मिस करने का भी जिक्र

हलफनामे में मलिक ने अपनी बेटी के बचपन से दूर रहने का भी जिक्र किया है। उसने कहा कि लंबे समय तक जेल में रहने और परिवार से अलगाव के कारण वह अपने बच्चों के बचपन में उनके साथ नहीं रह सका। उसने लिखा कि उसके बच्चे माता-पिता की सामान्य मौजूदगी और मार्गदर्शन के बिना बड़े हुए। परिवार को उम्मीद थी कि वह किसी दिन वापस घर लौटेंगे। लेकिन बाद में उन्हें फिर हिरासत में ले लिया गया। मलिक ने यह भी माना कि उनकी गिरफ्तारी और लंबे कारावास का उनकी पत्नी और पूरे परिवार की निजी जिंदगी पर गहरा असर पड़ा है।

बेटी से दादी के साथ रहने की अपील

अपनी बेटी रजिया सुल्ताना को संबोधित करते हुए मलिक ने उससे अपनी दादी के करीब रहने की अपील की है। उसने बेटी से कहा कि वह अपनी दादी से हर दिन कम से कम पांच मिनट फोन पर बात करे, ताकि परिवार से दूर रहने के बावजूद उनकी मां को अपनी पोती का स्नेह और साथ मिलता रहे। मलिक ने कहा कि उसका हलफनामा किसी से सहानुभूति या दया हासिल करने के लिए नहीं है, बल्कि यह उनकी अंतरात्मा की आवाज और परिवार के लिए एक संदेश है।

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आतंकी फंडिंग मामले में उम्रकैद की काट रहा सजा

यासीन मलिक को साल 2022 में दिल्ली की स्पेशल NIA कोर्ट ने आतंकी फंडिंग मामले में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। वह फिलहाल तिहाड़ जेल में बंद है। मलिक और उसके नेतृत्व वाले JKLF पर जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद और हिंसा से जुड़े कई मामले दर्ज हैं। कश्मीर में उग्रवाद के दौर में हिंदूओं के खिलाफ टारगेटेड हिंसा और हत्याओं की घटनाएं भी हुई थीं। इनमें कश्मीरी हिंदुओं के विस्थापन से जुड़ी घटनाएं भी शामिल थीं। इन सभी मामलों में मलिक मुख्य रूप से शामिल था।

आतंकी पम्मा की गैंगस्टर गोल्डी बराड़ को धमकी:तूने 40 गोलियां चलाईं, हम 4 हजार चलाएंगे, मार-मार के छन्नी बना देंगे; ऑडियो लीक से गुस्साया

ब्रिटेन(UK) में बैठे खालिस्तानी आतंकी परमजीत सिंह पम्मा ने गैंगस्टर गोल्डी बराड़ को धमकी दी है। पम्मा ने कहा कि बहाने से बात कर गोल्डी ने कॉल रिकॉर्डिंग लीक कर दी। कनाडा में हरदीप निज्जर को मरवाकर अच्छा नहीं किया। गोल्डी बराड़ एजेंसियों का बंदा है। पम्मा ने कहा कि गोल्डी बराड़ ने 40 गोलियों की बात की है, हम 4 हजार चलाएंगे और तेरे पूरे शरीर को छन्नी बना देंगे। तुझे निज्जर के कत्ल का हिसाब चुकाना पड़ेगा। गैंगस्टर गोल्डी बराड़ ने लॉरेंस के साथ मिलकर पंजाबी सिंगर सिद्धू मूसेवाला का कत्ल कराया था। वहीं परमजीत सिंह पम्मा को जुलाई 2020 में भारतीय गृह मंत्रालय ने UAPA के तहत आतंकी घोषित किया है। वह NIA की मोस्ट वांटेड सूची में है। NIA के अनुसार उसका संबंध Khalistan Tiger Force (KTF) से रहा है। हरदीप निज्जर भी इसी संगठन से जुड़ा था। इससे पहले सिख फॉर जस्टिस (SFJ) का आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू भी गोल्डी बराड़ को धमका चुका है। पन्नू ने बदला लेने की धमकी देते हुए कहा था कि गोल्डी FBI, कनाडाई या अमेरिकी अदालतों से बच सकता है लेकिन ‘खालसा न्याय’ से नहीं बच पाएगा। आतंकी पम्मा ने गैंगस्टर गोल्डी बराड़ के लिए क्या-क्या कहा… जिस रिकॉर्डिंग पर पम्मा भड़का, उसमें गोल्डी बराड़ ने क्या कहा था
जिस रिकॉर्डिंग को लेकर पम्मा ने बयान जारी किया, उसमें गोल्डी बराड़ ने कनाडा में खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या की जिम्मेदारी लेने की बात कही थी। बराड़ ने उसे ‘शहीद’ का दर्जा दिए जाने पर आपत्ति जताई। उसने दावा किया कि निज्जर ऐसे लोगों को समर्थन देता था, जो युवाओं को ड्रग्स के कारोबार में धकेलते और उन्हें ब्लैकमेल कर मुखबिर के तौर पर इस्तेमाल करते थे। बराड़ ने निज्जर पर हथियारों की तस्करी से जुड़े लोगों को संरक्षण देने का भी आरोप लगाया। बातचीत में उसने कहा कि इन्हीं वजहों से उसकी टीम ने निज्जर को निशाना बनाया। ************ ये खबरें भी पढ़ें: निज्जर हत्याकांड में 2 पंजाबी गैंगस्टर आमने-सामने: अर्श डल्ला बोला- गोल्डी बराड़ का दावा झूठा, इसने सिद्धू मूसेवाला को झूठ बोलकर मारा गैंगस्टर गोल्डी बराड़ बोला- हरदीप निज्जर को मैंने मरवाया:मेरे भाइयों को मरवाने वाले इसकी कोठी में रहते थे; पहले भारतीय एजेंसियों पर आरोप लगे थे आतंकी की गोल्डी बराड़ को धमकी- गोली माथे पर लगेगी:कनाडा-अमेरिका की अदालतों से बचोगे, खालसाई इंसाफ से नहीं; निज्जर हत्याकांड पर आमने-सामने

पश्चिमी यूपी में ‘पीडीए’ की नई बिसात, जाट बनाम जाटव-गुर्जर की सियासी गोलबंदी

पश्चिमी यूपी में ‘पीडीए’ की नई बिसात, जाट बनाम जाटव-गुर्जर की सियासी गोलबंदी

Akhilesh Yadav

मेरठ की घटना को अखिलेश यादव का राजनीतिक मंच बनाना महज पुलिस कार्रवाई का सवाल नहीं, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बदलते जातीय समीकरणों को साधने की कोशिश है। जाटों के बीच ‘चवन्नी’ विवाद से पैदा हुई नाराजगी के बीच सपा अब जाटव और गुर्जर समुदाय को अपने पीडीए प्लस के पाले में खड़ा करने की कवायद में लगी है। ALSO READ: शामली में पुलिस मुठभेड़, अंकित बालियान हत्याकांड के दो शूटर ढेर

 

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा से सिर्फ चुनावी आंकड़ों का खेल नहीं रही, बल्कि जातीय अस्मिता, सामाजिक वर्चस्व और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन साधने की कवायद रही है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यही पुराना मैदान एक बार फिर नए किरदारों और नए समीकरणों के साथ अपनी बिसात बिछाता नजर आ रहा है। जाट, मुस्लिम, दलित, गुर्जर और सवर्ण मतदाताओं के बीच बनते-बिगड़ते रिश्ते यह तय करेंगे कि पश्चिमी यूपी में 2027 की अगली पटकथा कौन लिखेगा।

 

अखिलेश यादव द्वारा ललिता मर्डर केस में न्याय की मांग कर रहें दो नेताओं को सामने लाकर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। यह वहीं नेता है जिन्होंने मेरठ एस एस पी अविनाश पांडे पर उनकी टीम पर बर्बरता से मारपीट का आरोप लगाया है। इस प्रेसवार्ता व्यापक राजनीतिक रणनीति के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। हालांकि पुलिस का अपना पक्ष है और दोनों आरोपियों के आपराधिक मुकदमों का रिकॉर्ड भी सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा है। पुलिस का कहना है कि दोनों ने पुलिस के खिलाफ तथ्यहीन और भ्रामक आरोप लगाए हैं। लेकिन राजनीति में कई बार घटना से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका बनाया गया नैरेटिव होता है। अखिलेश ने इसी नैरेटिव को जातीय पहचान और पुलिस उत्पीड़न के सवाल से जोड़ने की कोशिश की है।

 

यहां सपा की रणनीति अपेक्षाकृत स्पष्ट दिखाई देती है, जाटव और गुर्जर समाज को यह संदेश देना कि सत्ता और पुलिस व्यवस्था के कथित अन्याय के खिलाफ खड़ा होने के लिए उनके पास एक राजनीतिक मंच मौजूद है। यानी किसी एक घटना को व्यापक सामाजिक असुरक्षा के प्रतीक में बदलना और फिर उसे ‘पीडीए’ की राजनीति से जोड़ देना।

 

पश्चिमी यूपी में यह प्रयोग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां दलित राजनीति का अर्थ केवल दलित वोट नहीं है। जाटव मतदाता लंबे समय से बहुजन राजनीति का महत्वपूर्ण आधार रहा है, जबकि गुर्जर समुदाय भी कई विधानसभा क्षेत्रों में निर्णायक प्रभाव रखता है। मुस्लिम मतदाताओं के साथ इन समूहों का संभावित मेल सपा के लिए एक ऐसा सामाजिक गठजोड़ बना सकता है, जो जाट-केंद्रित राजनीति के मुकाबले नया संतुलन खड़ा करे।

 

लेकिन सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती जाट राजनीति है। भाजपा और राष्ट्रीय लोकदल का गठबंधन पश्चिमी यूपी में जाट मतदाताओं के लिए वर्तमान में फेवीकोल का जोड़ है। जयंत चौधरी इस सामाजिक आधार को अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी मानते हैं। ऐसे में अखिलेश यादव और जयंत के बीच ‘चवन्नी’ विवाद महज दो नेताओं की व्यक्तिगत राजनीतिक तकरार नहीं रह गया है। इसे जाट सम्मान और राजनीतिक प्रतिबिंब से जोड़कर पेश किया जा रहा है। ALSO READ: लखनऊ के विकास में मुख्यमंत्री योगी का सबसे बड़ा सहयोग : राजनाथ सिंह

 

यही वह बिंदु है जहां पश्चिमी यूपी की राजनीति दिलचस्प हो जाती है। सपा अगर जाटों के एक हिस्से को खोने की आशंका महसूस कर रही है, तो उसका विकल्प जाटव, गुर्जर, मुस्लिम और अन्य पिछड़े समूहों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करना है। दूसरी तरफ भाजपा-रालोद गठबंधन के लिए चुनौती यह है कि वह जाट आधार को बनाए रखते हुए मुस्लिम, गुर्जर, दलित और गैर-यादव पिछड़े मतदाताओं के बीच भी अपनी ग्राह्यता (उपयुक्तता) बढ़ाए।

 

दरअसल, पश्चिमी यूपी में 2027 का चुनाव केवल भाजपा बनाम सपा या गठबंधन बनाम विपक्ष की लड़ाई नहीं होगा। यह उस पुराने सामाजिक समीकरण के पुनर्गठन का चुनाव भी हो सकता है, जिसने दशकों तक उत्तर प्रदेश की राजनीति को दिशा दी है।

 

कांग्रेस का इतिहास इस बदलाव को समझने की एक महत्वपूर्ण कुंजी है। एक समय मुस्लिम, दलित और ब्राह्मण उसके मजबूत सामाजिक स्तंभ थे। मंडल-कमंडल की राजनीति, बहुजन आंदोलन और क्षेत्रीय दलों के उभार के साथ ये सामाजिक आधार अलग-अलग राजनीतिक खेमों में बंटते चले गए। दलितों का बड़ा हिस्सा बसपा के साथ गया, मुस्लिम मतदाता सपा की तरफ खिसका, ब्राह्मणों और अन्य सवर्णों का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ जुड़ा और पिछड़े वर्गों की राजनीति भी अलग-अलग क्षेत्रीय दलों में बंट गई। कांग्रेस का क्षरण इसी सामाजिक गठजोड़ के टूटने की कहानी है।

 

आज अखिलेश यादव उसी इतिहास को उलटने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन बदले हुए सामाजिक संदर्भ में। ‘पीडीए’ इसी कोशिश का राजनीतिक नाम है। पश्चिमी यूपी में इसका ‘प्लस’ संस्करण जाटव, गुर्जर, मुस्लिम और अन्य पिछड़े समूहों को जोड़कर तैयार करने की कोशिश है।

 

मगर सवाल यह है कि क्या एक घटना के जरिए जातीय अस्मिता को राजनीतिक गोलबंदी में बदला जा सकता है? और क्या जाटों के बीच पैदा हुई नाराजगी की भरपाई जाटव-गुर्जर-मुस्लिम समीकरण से संभव होगी?
 

2027 की पश्चिमी यूपी की सबसे बड़ी राजनीतिक पहेली

अखिलेश के लिए चुनौती केवल वोट जोड़ने की नहीं, बल्कि अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच ऐसा विश्वास पैदा करने की है कि उनका ‘पीडीए’ केवल चुनावी नारा नहीं, सत्ता में हिस्सेदारी का वास्तविक मॉडल है। जयंत चौधरी के लिए चुनौती जाट अस्मिता को भाजपा गठबंधन की राजनीति से जोड़कर रखना है। भाजपा के लिए चुनौती इन दोनों के बीच बनने वाले किसी भी नए सामाजिक समीकरण को प्रभावी होने से रोकना है।

 

इसलिए मेरठ की घटना के बाद अखिलेश यादव की प्रेस कॉन्फ्रेंस को केवल एक पुलिस विवाद के रूप में देखना पश्चिमी यूपी की मौजूदा राजनीति को छोटा करके देखना होगा। इसके पीछे असली लड़ाई नैरेटिव की है—कौन पीड़ित की आवाज बनेगा, कौन जातीय सम्मान का प्रतिनिधि बनेगा और कौन अलग-अलग सामाजिक समूहों को एक चुनावी गठजोड़ में बदल पाएगा।

 

एक बात और समझना जरूरी है। पश्चिमी उत्तरप्रदेश में जाट मतदाताओं ने बीजेपी से गलबहियां कर ली थीं। मुजफ्फरनगर और बागपत में अजित सिंह और जयंत चौधरी की कालांतर में हुई पराजय इसका स्पष्ट प्रमाण हैं। ऐसे में बीजेपी से हाथ मिलाकर सत्ता सुख भोगना जयंत को हितकर लगा और वे अखिलेश का साथ छोड़कर बीजेपी के कॉर्पोरेट का हिस्सा बन गए। जब से चवन्नी पलटी तब से आरएलडी लगातार कमजोर ही हुई है। आरएलडी के अनेक लॉयल नेता उनका साथ छोड़ चुके हैं। यहां यह भी समझना जरूरी है कि समाजवादी पार्टी का जाटों के बीच जनाधार नगण्य है।

सिर्फ स्थानीय स्तर पर किसी प्रभावशाली नेता को सामने रख सोशल इंजीनियरिंग कर अखिलेश यादव को कुछ प्राप्ति हो सकती है। इसलिए यह कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अखिलेश के पास खोने के लिए अपना कुछ नहीं है लेकिन कुछ जिलें ऐसे हैं जिन्हें अखिलेश से संभल की तर्ज पर ही कुछ छीना जा सकता है, वरना इंडिया गठबंधन वहां उन्नीस-बीस  नहीं बल्कि 19-25 है।

अगर अखिलेश का दांव चल गया तो पश्चिमी यूपी में 2027 की लड़ाई दिलचस्प होगी! यह इस पर भी निर्भर होगा कि बीजेपी को अब तक अजेय बनाए रखने वाला ओबीसी किस करवट बैठता है! कांग्रेस के साथ होने पर इंडिया गठबंधन कितने प्रतिशत जाटव वोटों को अपने पाले में खींच पाता है! गुर्जरों का रुख क्या रहता है? ओवैसी कितने फीसदी वोट काटकर बीजेपी की राह को सुगम बना पाते हैं या नहीं?

दिल्ली में फिर निर्भया जैसा कांड: 47KM तक बस में नाबालिग के साथ होती रही दरिंदगी

दिल्ली में फिर निर्भया जैसा कांड: 47KM तक बस में नाबालिग के साथ होती रही दरिंदगी

crime news

राजधानी दिल्ली और एनसीआर क्षेत्र में एक बार फिर मानवता को शर्मसार करने वाली घटना सामने आई है, जिसने छह साल पुरानी ‘निर्भया’ कांड की खौफनाक यादें ताजा कर दी हैं। 47 किलोमीटर लंबे सफर के दौरान एक चलती हुई बस में ग्यारहवीं कक्षा की नाबालिग छात्रा के साथ हैवानियत की गई। इस मामले में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दोनों आरोपियों (ड्राइवर और कंडक्टर) को तिमारपुर बस पार्किंग से गिरफ्तार कर लिया है। ALSO READ: शामली में पुलिस मुठभेड़, अंकित बालियान हत्याकांड के दो शूटर ढेर

 

क्या है पूरा मामला?

प्राप्त जानकारी के अनुसार, उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले की रहने वाली यह छात्रा 4 अगस्त को घर में किसी बात से नाराज होकर बिना बताए निकल गई थी। वह नोएडा में रहने वाले अपने चचेरे भाई के पास जा रही थी। भारी बारिश और रात के अंधेरे के कारण वह अपनी सही जगह पर उतरने के बजाय परी चौक पर उतर गई।

 

 वहां से गुजर रही एक खाली स्लीपर बस को देखकर उसने रुकने का इशारा किया। बस के कंडक्टर ने उसे आश्वस्त किया कि वह उसे नोएडा सेक्टर-63 उतार देगा। लेकिन बस में चढ़ने के कुछ ही देर बाद कंडक्टर और ड्राइवर ने अपनी घिनौनी करतूत शुरू कर दी। विरोध करने पर आरोपियों ने उसे जान से मारने की धमकी दी और चलती बस में उसके साथ दुष्कर्म किया। घटना को अंजाम देने के बाद आरोपी देर रात उसे कश्मीरी गेट बस अड्डे के पास रिंग रोड पर छोड़कर फरार हो गए।

 

सुरक्षा व्यवस्था और पुलिस चेकिंग पर उठे गंभीर सवाल

 

47 किलोमीटर का लंबा रास्ता: परी चौक से कश्मीरी गेट तक के इस सफर में बस ने लगभग 47 किलोमीटर की दूरी तय की, लेकिन इस बीच उन्हें कहीं भी पुलिस बैरिकेडिंग या चेकिंग का सामना नहीं करना पड़ा।

 

काले पर्दे और सुनियोजित साजिश: बस में गहरे रंग के पर्दे लगे हुए थे, जिसके कारण बाहर से गुजर रहे किसी भी राहगीर को अंदर चल रही इस दरिंदगी का अहसास नहीं हो सका।

 

वर्कशॉप जा रही थी बस: पुलिस पूछताछ में सामने आया है कि आरोपी बस खराब होने के बाद उसे सूरजपुर की वर्कशॉप में रिपेयरिंग के लिए ले गए थे और फिर खाली बस को तिमारपुर ला रहे थे, तभी रास्ते में छात्रा उन्हें मिल गई। ALSO READ: राहुल गांधी की बढ़ीं मुश्किलें, उत्तराखंड में FIR दर्ज, जातिवादी टिप्पणी का लगा आरोप

 

सीसीटीवी फुटेज की मदद से आरोपी गिरफ्तार

घायल अवस्था में पीड़िता ने तुरंत पुलिस से संपर्क किया और आपबीती बताई। पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज के आधार पर जाल बिछाया और दोनों आरोपियों को तिमारपुर से दबोच लिया। बस की फॉरेंसिक जांच कराई जा रही है। साथ ही, परिजनों को तुरंत दिल्ली बुलाकर काउंसलिंग के बाद पीड़िता को सुरक्षित उनके हवाले कर दिया गया है। इस घटना ने एक बार फिर बसों के नियमों और सार्वजनिक सुरक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

शामली में पुलिस मुठभेड़, अंकित बालियान हत्याकांड के दो शूटर ढेर

शामली में पुलिस मुठभेड़, अंकित बालियान हत्याकांड के दो शूटर ढेर

shamli encounter

Shamli Encounter: उत्तर प्रदेश के शामली में सोमवार तड़के पुलिस और बदमाशों के बीच हुई मुठभेड़ में दो बदमाश मारे गए। पुलिस के मुताबिक, दोनों बदमाश अंकित बालियान हत्याकांड में शामिल शूटर थे और उनकी गिरफ्तारी पर 50-50 हजार रुपए का इनाम घोषित था।

 

शामली के कोतवाली क्षेत्र में हुई इस कार्रवाई की जानकारी देते हुए एसपी एनपी सिंह ने बताया कि पुलिस को सुबह करीब चार बजे सूचना मिली थी कि अंकित बालियान हत्याकांड में शामिल दो शूटर शामली की ओर आ रहे हैं। सूचना मिलते ही जिले के सभी संबंधित थानों की पुलिस को अलर्ट कर मौके पर भेजा गया।

 

पुलिस के अनुसार, बदमाशों ने पुलिस को चकमा देने की कोशिश की और मन्ना माजरा की ओर भागने लगे। इसी दौरान होटल राजमहल के पास उन्होंने पुलिस टीम पर फायरिंग शुरू कर दी। बदमाशों की गोलीबारी में पुलिस की एक गाड़ी को भी गोली लगी, जबकि दो पुलिसकर्मी घायल हो गए।

 

इसके बाद पुलिस ने जवाबी कार्रवाई करते हुए फायरिंग की, जिसमें दोनों बदमाशों को गोली लगी। पुलिस टीम ने दोनों को घायल अवस्था में अस्पताल पहुंचाया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। मृत बदमाशों की पहचान सुमित पुत्र धर्मपाल और मोहित के रूप में हुई है। दोनों हरियाणा के सोनीपत जिले के राझड़ा गांव के निवासी बताए गए हैं।

 

मुठभेड़ के बाद पुलिस ने घटनास्थल को घेर लिया और जांच शुरू कर दी है। मौके पर एसपी एनपी सिंह समेत पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद हैं। पुलिस अब दोनों बदमाशों के आपराधिक रिकॉर्ड और अंकित बालियान हत्याकांड में उनकी भूमिका से जुड़े अन्य पहलुओं की जांच कर रही है।