एसआईआर के बाद भी मतदाता सूची में गड़बड़ी, फर्जी मतदाताओं के नाम शामिल : अखिलेश

समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्‍यक्ष अखिलेश यादव ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर सवाल उठाते हुए सोमवार को कहा कि इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद भी मतदाता सूची में गड़बड़ी है और उसमें फर्जी मतदाताओं के नाम शामिल हैं।

सपा मुख्‍यालय की ओर से जारी एक बयान के मुताबिक, अखिलेश ने कहा एसआईआर के बाद भी मतदाता सूची में गड़बड़ी है और उसमें फर्जी मतदाताओं के नाम शामिल हैं। कई जगहों पर एक ही व्यक्ति एक से ज्यादा मतदान केंद्रों पर मतदाता के रूप में पंजीकृत है।

बयान में अखिलाश ने दावा किया कि “निर्वाचन आयोग ने भी इन गड़बिड़यों को स्वीकार किया है, हालांकि वह इन्हें छोटी-मोटी गलती बता रहा है। उन्होंने कहा यह छोटी-मोटी नहीं, बल्कि बहुत मोटी गड़बड़ी है।

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अखिलेश ने सोमवार को लखनऊ के गोमती नगर में पूर्व मंत्री विद्या चौधरी के आवास पर पहुंचकर उनका हालचाल जाना। उन्होंने संवाददाताओं से बातचीत में कहा पूरा देश जानता है कि जब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) हारने लगती है, तो वह बेईमानी और चोरी पर उतर आती है।

अखिलेश ने आरोप लगाया भाजपा निर्वाचन आयोग की मिलीभगत से बेईमानी करती है। निर्वाचन आयोग भाजपा के इशारे पर काम करता है।

उन्होंने कहा अगर विपक्षी दल और आम जनता निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हैं, तो भाजपा को क्यों दर्द होता है? भाजपा बचाव के लिए क्यों सामने आती है?”

अखिलेश ने “मतदाता सूची में गड़बड़ी और चुनावों में वोटों की लूट” को लेकर अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।

उन्होंने दावा किया कि सपा ने मतदाता सूची में गड़बड़ी और उपचुनाव में “वोटों की चोरी” को लेकर निर्वाचन आयोग से सबूतों के साथ शिकायत की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

अखिलेश ने कहा कि निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक संस्था है और उसे भाजपा के इशारे पर काम नहीं करना चाहिए।

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कानपुर में नकली सीमेंट का कारोबार! तीन वर्षों में 11 लाख बोरी नकली सीमेंट की सप्लाई

कानपुर में नकली सीमेंट का कारोबार! तीन वर्षों में 11 लाख बोरी नकली सीमेंट की सप्लाई

Kanpur fake cement factory

Kanpur fake cement factory: औद्योगिक नगरी कानपुर के पनकी में नकली सीमेंट फैक्ट्री के खुलासे ने प्रदेश भर के निर्माण तंत्र और प्रशासनिक महकमे में हलचल मचा दी है। नामी कंपनियों की साख की आड़ में पिछले तीन सालों से चल रहे इस अवैध खेल में न सिर्फ 10 लाख से अधिक बोरियां खपाए जाने का संगीन आरोप है, बल्कि इसके तार मेरठ से लेकर सीएम ग्रिड और लखनऊ एयरपोर्ट जैसे हाई-प्रोफाइल निर्माण कार्यों तक जुड़ने के दावे सामने आ रहे है। अब योगी सरकार के एक्शन का इंतजार है।

 

यूपी के कानपुर में SOG और स्थानीय पुलिस ने पनकी थाना क्षेत्र के इस्पात नगर में छापेमारी कर नामी ब्रांडों (ACC और अंबुजा) के नाम पर नकली सीमेंट बनाने वाली एक विशाल अवैध फैक्ट्री का भंडाफोड़ किया है। जांच में सामने आया है कि इस सिंडिकेट ने पिछले 3 वर्षों में करीब 10.80 लाख बोरी नकली सीमेंट उत्तर प्रदेश के कई जिलों और बड़े सरकारी व निजी प्रोजेक्ट्स में सप्लाई की है। इस पूरे मामले में एक स्थानीय भाजपा नेता द्वारा आरोपियों को संरक्षण देने के भी गंभीर आरोप लग रहे हैं। 

कैसे हुआ इस बड़े खेल का खुलासा?

अडानी ग्रुप की कानपुर शाखा के सीनियर सेल्स मैनेजर मुमताजुल हक को जब अचानक अपने ब्रांड्स की बिक्री में भारी गिरावट महसूस हुई, तो कंपनी की विजिलेंस टीम ने पिछले 15 दिनों से निजी स्तर पर खुफिया जांच शुरू की। कंपनी की पुख्ता शिकायत मिलने पर कानपुर के पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल के निर्देश पर SOG और स्थानीय पुलिस की टीम ने पनकी के इस्पात नगर स्थित गोदाम पर अचानक छापेमारी कर इस अवैध सिंडिकेट का भंडाफोड़ कर दिया। छापेमारी के दौरान मौके से 1000 से अधिक भरी हुई नकली बोरियां, 3000 खाली बोरियां, अत्याधुनिक पैकिंग मशीनें और नकली सीमेंट से लदे दो ट्रक जब्त किए गए। 

​महज 30 रुपए की लागत और मुनाफा… 

​पुलिस जांच में सामने आया है कि यह सिंडिकेट बेहद शातिर तरीके से लोगों की जान और सरकारी संपत्ति के साथ खिलवाड़ कर रहा था। यह गैंग बुंदेलखंड इलाके से खराब और एक्सपायर्ड हो चुकी सीमेंट को महज ₹10 से ₹20 प्रति बोरी की दर से खरीदता था। मेरठ के सप्लायरों (सुनील मित्तल और निशांत मित्तल) की मदद से इस पुराने माल को मशीनों में दोबारा पीसकर, उसमें हानिकारक केमिकल्स और थोड़ी असली सीमेंट मिलाकर नामी कंपनियों के ब्रांडेड बैगों में पैक किया जाता था।

 

​मोटा मुनाफा : महज ₹30 की लागत में तैयार होने वाली इस जानलेवा नकली सीमेंट की बोरी को बाजार में असली बताकर ₹250 से ₹280 में बेचा जा रहा था। गिरोह हर महीने करीब 30,000 से ज्यादा बोरियां बाजार में खपा रहा था। 

Kanpur fake cement factory

​बड़े सरकारी प्रोजेक्ट्स पर मंडराया खतरा!

​इस खुलासे के बाद सबसे बड़ा सवाल प्रदेश के बुनियादी ढांचे की सुरक्षा पर उठ रहा है। जांच में सामने आया है कि ​CM ग्रिड सड़क योजना के तहत बन रही महत्वपूर्ण सड़कों में भी इसी घटिया सीमेंट का इस्तेमाल किया गया है। ​लखनऊ इंटरनेशनल एयरपोर्ट के नए टर्मिनल के निर्माण कार्यों में भी इस नकली सीमेंट की भारी सप्लाई किए जाने का गंभीर दावा किया गया है।

​पुलिसिया कार्रवाई और गरमाई सियासत

​पुलिस ने फैक्ट्री के मुंशी/सुपरवाइजर राहुल को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। वहीं, मुख्य संचालक भाई नीरज गुप्ता और धीरज गुप्ता अपने दो अन्य साझेदारों के साथ फरार हैं, जिनकी तलाश में पुलिस लगातार दबिश दे रही है, इंतजार योगी सरकार के बड़े एक्शन का है।

 

​इस खुलासे के बाद उत्तर प्रदेश का राजनीतिक पारा चढ़ गया है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सरकार को घेरते हुए कड़ा तंज कसा है कि भाजपा का भ्रष्टाचार देश और प्रदेश की नींव को कमजोर कर रहा है। साथ ही, कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेस-वे जैसे प्रोजेक्ट्स में भी इस सीमेंट के इस्तेमाल की उच्चस्तरीय जांच की मांग उठाई है।

UP Holiday List 2026: 18 से 20 अक्टूबर तक दफ्तर बंद, चलिए जानते हैं मायावती, अखिलेश या योगी-किस सरकार में मिलीं ज्यादा छुट्टियां?

UP Holiday List 2026: त्योहारों के बीच उत्तर प्रदेश के सरकारी कर्मचारियों को लगातार तीन दिन की छुट्टी मिलने जा रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने महानवमी के मौके पर 19 अक्टूबर को सार्वजनिक अवकाश घोषित करने का फैसला लिया है। वहीं, रविवार की साप्ताहिक छुट्टी और मंगलवार को विजयादशमी की छुट्टी पहले से तय है। ऐसे में अब सरकारी दफ्तर लगातार तीन दिन बंद रहेंगे।

राज्य के सामान्य प्रशासन विभाग ने 2026 की छुट्टियों की पहले जारी की गई सूची में बदलाव को लेकर आदेश जारी किया है। हालांकि, पुराने आदेश की बाकी सभी बातें पहले की तरह लागू रहेंगी।

बता दें कि शिक्षकों और कर्मचारियों के संगठनों ने मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव को पत्र लिखकर महानवमी पर छुट्टी देने की मांग की थी। इससे पहले राज्य सरकार ने 20 अक्टूबर को महानवमी और विजयादशमी, दोनों त्योहारों के लिए एक ही दिन की छुट्टी घोषित की थी।

दफ्तर कब तक बंद रहेंगे?

तारीखदिनस्थितिकारण
18 अक्टूबररविवारबंदसाप्ताहिक छुट्टी (महाअष्टमी)
19 अक्टूबरसोमवारबंदनए आदेश के तहत महानवमी की सार्वजनिक छुट्टी
20 अक्टूबरमंगलवारबंदपहले से घोषित विजयादशमी/दशहरा की छुट्टी
21 अक्टूबरबुधवारखुलेंगेसरकारी दफ्तर दोबारा खुलेंगे

क्या योगी सरकार ने पहली बार किसी त्योहार की छुट्टी बढ़ाई है?

नहीं। इस साल की शुरुआत में, राज्य सरकार ने 26 और 27 मार्च को राम नवमी के मौके पर दो दिन की छुट्टी की घोषणा की थी, और 15 जनवरी को मकर संक्रांति के लिए सार्वजनिक अवकाश था। अक्टूबर 2024 में, सरकार ने नवमी के दिन छुट्टी घोषित की।

अलग-अलग सरकारों के दौरान यूपी में छुट्टियों को लेकर क्या बदलाव आए हैं?

राज्य सरकारें पहले भी अपनी छुट्टियों की सूची का इस्तेमाल एक राजनीतिक संकेत देने के लिए करती रही हैं। मई 2007 में मायावती सरकार ने 9 अक्टूबर को-जो बीएसपी संस्थापक कांशी राम की पुण्यतिथि है-छुट्टी घोषित की थी। हालांकि, अक्टूबर 2012 में अखिलेश यादव सरकार ने इस छुट्टी को खत्म कर दिया।

बता दें कि सपा सरकार ने महर्षि कश्यप और निषादराज जयंती, अजमेर उर्स, तथा चंद्रशेखर और महाराणा प्रताप की जयंती पर भी छुट्टियां घोषित की थीं।

वहीं अप्रैल 2017 में, योगी कैबिनेट ने 15 छुट्टियां रद्द कर दीं थी, जिनमें चेटी चंड, परशुराम जयंती, छठ पूजा और वाल्मीकि जयंती शामिल थीं। सरकार का कहना था कि स्कूलों को इन महापुरुषों के बारे में पढ़ाना चाहिए, न कि उनके नाम पर छुट्टी देनी चाहिए।

सरकारछुट्टीफैसलासमयकिससे संबंधित
मायावती (BSP)कांशीराम की पुण्यतिथि (9 अक्टूबर)नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट के तहत छुट्टी घोषितमई 2007बहुजन समाज के प्रमुख नेता
मायावती (BSP)कांशीराम की जयंती (15 मार्च)यूपी की छुट्टियों की सूची में शामिल2012 तकबहुजन समाज के प्रमुख नेता
अखिलेश यादव (SP)कांशीराम की पुण्यतिथि (9 अक्टूबर)छुट्टी रद्द कीअक्टूबर 2012BSP सरकार के फैसले में बदलाव
अखिलेश यादव (SP)महर्षि कश्यप और निषादराज जयंती (5 अप्रैल)छुट्टी घोषित की2012–2017धार्मिक और सामुदायिक महत्व
अखिलेश यादव (SP)अजमेर गरीब नवाज उर्सछुट्टी घोषित की2012–2017धार्मिक महत्व
अखिलेश यादव (SP)चंद्रशेखर जयंती (17 अप्रैल) और महाराणा प्रताप जयंती (9 मई)छुट्टी घोषित की2012–2017महापुरुषों की जयंती
योगी आदित्यनाथ (BJP)चेती चंद, परशुराम जयंती, अजमेर उर्स, जमात-उल-विदा, विश्वकर्मा पूजा, वाल्मीकि जयंती, छठ पूजा और ईद-ए-मिलाद समेत 15 छुट्टियांछुट्टियां रद्द कींअप्रैल 2017त्योहार और जयंती
योगी आदित्यनाथ (BJP)महानवमी (11 अक्टूबर)छुट्टी घोषित की2024धार्मिक त्योहार
योगी आदित्यनाथ (BJP)मकर संक्रांति (15 जनवरी)छुट्टी घोषित की2026धार्मिक त्योहार
योगी आदित्यनाथ (BJP)रामनवमी (26–27 मार्च)दो दिन की छुट्टी घोषित की2026धार्मिक त्योहार
योगी आदित्यनाथ (BJP)महानवमी (19 अक्टूबर)छुट्टी घोषित की2026धार्मिक त्योहार

क्या योगी ने नवरात्रि के दौरान कुछ और भी कहा?

छुट्टी का यह आदेश नवरात्रि के छठे दिन आया। इस मौके पर मुख्यमंत्री ने महिलाओं की शक्ति के बारे में एक संदेश भी दिया। उन्होंने इस संदेश के जरिए लड़कियों और खेलों के क्षेत्र में अपनी सरकार के कामकाज को सामने रखा।

मां कात्यायनी को समर्पित इस दिन, योगी ने सोशल मीडिया पर एक संदेश साझा किया, जिसमें उन्होंने देवी को महिलाओं के साहस, संकल्प और वीरता का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा, “सभी बाधाओं और राक्षसी प्रवृत्तियों का नाश करने वाली मां कात्यायनी, महिलाओं के अदम्य साहस, अटूट संकल्प और अजेय वीरता का प्रतीक हैं।”

उन्होंने दावा किया कि 2017 से पहले, “राज्य में डर और अराजकता का माहौल था, जहां बेटियों के सपनों को दबा दिया जाता था, उनका आत्मविश्वास कुचल दिया जाता था और मौकों की कमी के कारण उनकी प्रतिभा मुरझा जाती थी।”

सीएम योगी ने कहा कि खेल के मैदान माफियाओं के नियंत्रण में थे, और लड़कियों के सपनों को उड़ान मिलने के बजाय, उन्हें “चार दीवारों के भीतर कैद” कर दिया गया था।

उन्होंने कहा, “पिछले साढ़े नौ वर्षों में, राज्य में बदलाव का एक नया अध्याय लिखा गया है। डर की जगह सुरक्षा ने ले ली है, उपेक्षा की जगह प्रोत्साहन ने, और संसाधनों की कमी की जगह खेल सुविधाओं के विस्तार ने ले ली है।”

योगी ने खेलों से जुड़ी किन सुविधाओं का जिक्र किया?

मुख्यमंत्री ने कहा कि अब लड़कियों के पास अपनी प्रतिभा को निखारने के लिए एक मजबूत आधार है, जिसमें “गांव के खेल के मैदानों और ब्लॉक-स्तरीय मिनी स्टेडियमों से लेकर जिला स्टेडियम, मंडल स्तरीय खेल कॉलेज और मेरठ में स्थित मेजर ध्यानचंद खेल विश्वविद्यालय” शामिल हैं।

उन्होंने ओलंपिक, कॉमनवेल्थ और एशियाई खेलों के पदक विजेताओं को मिलने वाले लाखों-करोड़ों रुपये के नकद पुरस्कारों और खिलाड़ियों की सीधी भर्ती का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ये चीजें प्रतिभा को बढ़ावा देती हैं, उपलब्धियों का सम्मान करती हैं और खिलाड़ियों के भविष्य को सुरक्षित बनाती हैं।

मुख्यमंत्री ने किन महिला खिलाड़ियों के नाम गिनाए?

सीएम योगी आदित्यनाथ ने एथलेटिक्स में पारुल चौधरी, प्रियंका गोस्वामी, प्राची चौधरी और अन्नू रानी; जूडो में अस्मिता डे; क्रिकेट में दीप्ति शर्मा और मेघना सिंह; हॉकी में वंदना कटारिया; और कुश्ती में दिव्या काकरान का नाम लिया। उन्होंने कहा कि कॉमनवेल्थ और एशियाई खेलों में उनके प्रदर्शन ने भारत और उत्तर प्रदेश, दोनों का मान बढ़ाया है।

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एसआईआर के बाद परिसीमन सबसे बड़ा उपाय

भाजपा को इतना भरोसा कैसे है कि 2029 में भी राहुल गांधी और उनका गठबंधन चुनाव हारेगा और भाजपा पहले से ज्यादा बहुमत से जीतेगी? इस भरोसे का एक कारण तो भाजपा का अपना संगठन, पार्टी का आधार, समर्पित हिंदू मतदाताओं का वोट, आरएसएस का नेटवर्क, ध्रुवीकरण की राजनीति जैसी पारंपरिक चीजें दिखाई देंगी। लेकिन इन पारंपरिक चीजों से हट कर तीन चीजें ऐसी हैं, जिसने भाजपा को ज्यादा भरोसा दिया है। पहली चीज है मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर। एसआईआऱ के जरिए करोड़ों मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं और नए नाम जोड़े जा रहे हैं।

पूरी प्रक्रिया इतनी गोपनीय और नियंत्रित है कि सारी विपक्षी पार्टियां परेशान हैं। सोचें, अभी इस बात का विवाद चल रहा था कि करोड़ों नाम हटाए जा रहे हैं लेकिन खबर है कि अखिलेश यादव मतदाता सूची में फर्जी नाम जोड़े जाने के खिलाफ सड़क पर उतरने वाले हैं। सब कुछ इतने नियंत्रित और केंद्रीकृत तरीके से हो रहा है कि किसी को असली बात का पता नहीं चल रहा है।

एसआईआर से भाजपा को सबसे बड़ा फायदा इस वजह से हुआ है कि देश के ज्यादातर राज्यों में उसकी या उसकी सहयोगी पार्टियों की सरकार है। सरकार में होना अपने आप में बहुत सारी चीजों को आसान बना देता है। उसमें अगर सरकार में बैठे लोगों को सत्ता के उपकरणों का मनमाना इस्तेमाल यानी दुरुपयोग करने में कोई हिचक नहीं हो तो चीजें और आसान हो जाती हैं। सरकार में होने के कारण भाजपा को पता है कि कहां से कितना नाम कट गया और कहां जुड़ गया। अभी तक की एसआईआर में मृत और फर्जी श्रेणी में चार करोड़ के करीब नाम कटे हैं। शिफ्टेड और अपने पते पर नहीं मिलने वालों की संख्या साढ़े नौ करोड़ के करीब है। पहले भी इन मतों का इस्तेमाल सत्ता में बैठी पार्टियां करती थीं। बोगस वोटिंग में इनका इस्तेमाल होता था। बड़ी संख्या में नए नाम जोड़े जाने की जो चर्चा है उसका इस्तेमाल भी बोगस वोटिंग के लिए ही होगा या तकनीक का इस्तेमाल करके वोट मैनिपुलेट करने के लिए होगा। अब ज्यादातर जगह भाजपा की सत्ता में है तो विपक्ष तो यह काम नहीं कर पाएगा।

एसआईआर के बाद दूसरा सबसे बड़ा हथियार परिसीमन का है। हालांकि इसमें बहुत सारे अगर मगर हैं। अगर समय रहते परिसीमन बिल पास हो गया और समय रहते इस पर काम पूरा हो गया तो इसका लाभ है। लेकिन परिसीमन किस कदर लाभप्रद है इसे जम्मू कश्मीर और असम के उदाहरण से समझा जा सकता है। जम्मू कश्मीर में पहले 87 सीटें थीं। लद्दाख अलग होने के बाद 83 सीटें बचीं। परिसीमन के बाद इनकी संख्या बढ़ा कर 90 कर दी गईं। यानी सात सीटों का इजाफा हुआ। इनमें से छह सीटें जम्मू संभाग बढ़ाई गईं। वहां सीटों की संख्या 37 से बढ़ कर 43 हो गई। कश्मीर घाटी में सिर्फ एक सीट बढ़ी। सबको पता है कि भाजपा कश्मीर घाटी में एक भी सीट नहीं जीत सकती है। तभी जम्मू में ज्यादा सीटें बढ़ीं और भाजपा ने उसमें से ज्यादातर सीटें जीत लीं। भाजपा ने परिसीमन के बाद हुए चुनाव में पांच सीटें ज्यादा जीतीं। उसकी सीटों की संख्या बढ़ कर 30 हो गई।

ऐसे ही असम में परिसीमन के बाद पूरा समीकरण बदल गया। इसे कई तरह से बदला गया। सीटों की संख्या 126 ही रखी गई लेकिन एससी और एसटी आरक्षित सीटों की संख्या 24 से बढ़ा कर 28 कर दी गई। ऐसे ही बोडोलैंड स्वायत्त परिषद  के इलाके में सीटों की संख्या 16 से बढ़ा कर 19 कर दी गईं। ककरीब 40 सीटों की भौगोलिक संरचना में इस तरह का बदलाव किया गया कि वहां की पूरा सामाजिक व धार्मिक संरचना बदल गई। इन 40 इलाकों में मुस्लिम मतदाताओं की निर्णायक संख्या होती थी। इसे इस तरह से विभाजित किया गया कि मुस्लिम आबादी करीब 25 सीटों पर बहुत सघन हो गई और बाकी सीटों पर उनकी निर्णायक भूमिका समाप्त हो गई।

इसका लाभ भाजपा को मिला। पहली बार ऐसा हुआ है कि 126 के सदन में भाजपा अपने दम पर बहुमत हासिल करने में कामयाब रही। उसने 82 सीटें जीत लीं। परिसीमन के असर को इस आंकड़े से भी समझ सकते हैं कि कांग्रेस सिर्फ 19 सीटों पर जीती, जिसमें से 18 मुस्लिम विधायक हैं। लोकसभा चुनाव में भी 14 सीटों में से भाजपा अकेले 10 सीटों पर जीती और दो सीटें उसकी सहयोगी पार्टियों को गईं। सो, असम में परिसीमन ने जादू का काम किया है। इस प्रयोग को पूरे देश में दोहराने की तैयारी है।

लोकसभा चुनाव में अब ढाई साल का समय बचा है क्या इतने कम समय में पूरे देश में परिसीमन का काम हो जाएगा? अगर इससे पहले हुए परिसीमन की बात करें तो उसमें करीब छह साल लगे थे। हालांकि वह मामला प्रशासनिक व राजनीतिक कारणों से उलझा रहा था। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज जस्टिस कुलदीप सिंह की अध्यक्षता में 12 जुलाई 2002 को चौथे परिसीमन आयोग का गठन किया गया था। इसे 2001 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों की संख्या 543 बनाए रखते हुए उसको रिस्ट्रक्चर करने की सिफारिश करना था। आयोग ने 2007 के अंत में अपनी सिफारिश सौंपी थी, जिसे फरवरी 2008 में स्वीकार किया गया था। लेकिन उससे पहले तीसरे परिसीमन आयोग ने अपना काम तीन साल में पूरा कर लिया था।

इंदिरा गांधी की सरकार ने 1971 की जनगणना के आधार पर परिसीमन के लिए 1973 में तीसरे आयोग का गठन किया था। आयोग ने 1976 में अपनी सिफारिश की। इसकी सिफारिशों के आधार पर लोकसभा सीटों की संख्या 522 से बढ़ा कर 543 कर दी गई। उसी समय इंदिरा गांधी ने परिसीमन के लिए 1971 के आंकड़े और लोकसभा की सीटों की संख्या 25 साल के लिए फ्रीज कर दी थी। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने 2001 में सीटों की संख्या पर फ्रीज को 25 साल के लिए बढ़ा दिया था।

बहरहाल, तीसरे और चौथे परिसीमन आयोग ने जो समय लिया हो लेकिन अगर केंद्र सरकार किसी तरह से परिसीमन बिल को पास कराने में कामयाब हो जाती है तो अगले चुनाव से पहले उसकी सिफारिशों को स्वीकार करने और लागू करने का प्रयास होगा। आज तक जनसंख्या के आंकड़ों से लेकर सीटों की भौगोलिक संरचना तक सब कुछ डिजिटल रूप में उपलब्ध है। इसलिए पहले की तरह इस काम में बहुत समय नहीं लगेगा। गौरतलब है कि परिसीमन आयोग का अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के किसी रिटायर जज को बनाया जाता है। उसके अलावा मुख्य चुनाव आयुक्त या उनकी ओर से नामित कोई आयुक्त इसका सदस्य होता है। फिर राज्यों के मुख्य चुनाव अधिकारी इसके सदस्य होते हैं। सहयोगी सदस्य के रूप में हर राज्य से पांच लोकसभा सांसद और पांच विधायक नामित किए जाते हैं। चूंकि केंद्र से लेकर ज्यादातर जगहों पर भाजपा या एनडीए की सरकार है। तो नामित सदस्य उसकी पसंद के होंगे और वे कामकाज में ज्यादा अड़चन नहीं डालेंगे।

आबादी की संरचना को समझने या एससी, एसटी आबादी के हिसाब से सीटों की संरचना तय करने और आरक्षित सीटों की सिफारिश करने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। समय लगने का काम यह है कि ड्राफ्ट तैयार होने के बाद उसे सार्वजनिक किया जाता है, उस पर आपत्ति मंगाई जाती है और जन सुनवाई आय़ोजित करनी पड़ती है। हालांकि इसमें भी सरकार जो चाहती है वही होता है। ज्यादातर काम दिखावे का ही होता है। इस बार समस्या यह है कि विपक्ष बहुत आंदोलित है और सहयोग करने के मूड में नहीं है। उधर दक्षिण भारत के राज्य भी टकराव के मूड में है। इसलिए वह उस लेवल पर भी काम को अटकाने की कोशिश होगी। सरकार के हाथ में एक अस्त्र यह है कि संविधान के मुताबिक आयोग की अनुशंसा अंतिम मानी जाती है। उसे किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है और लोकसभा व विधानसभा में भी जब इसे मंजूरी के लिए रखा जाता है तो कोई भी सदन इसमें बदलाव नहीं कर सकता है।

Yogi Adityanath Popularity Survey: यूपी में आज चुनाव हुए तो सीएम पद के लिए योगी आदित्यनाथ कितने लोकप्रिय?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कद और उनकी लोकप्रियता एक बार फिर बुलंदियों पर नजर आ रही है। आगामी विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर न्यूज 18 की ओर से कराए गए मेगा ओपिनियन पोल में मुख्यमंत्री पद की पसंद, सरकार के कामकाज और जनता के मूड को लेकर बेहद चौंकाने वाले नतीजे सामने आए हैं। सीएम योगी आदित्यनाथ इस पद की रेस में अपने प्रतिद्वंद्वियों से काफी आगे नजर आ रहे हैं।

सर्वे: सीएम पद की पसंद में योगी आदित्यनाथ सबसे आगे, अखिलेश यादव काफी पीछे

सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ राज्य के मतदाताओं के बीच फिर से सत्ता की कमान संभालने के लिए सबसे पसंदीदा चेहरा बने हुए हैं। सर्वे में शामिल कुल लोगों में से 66.2% लोगों ने योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री पद के लिए सबसे उपयुक्त और योग्य उम्मीदवार माना है। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव इस मुकाबले में काफी पीछे छूटते नजर आए। उन्हें सिर्फ 24.4% लोगों का समर्थन मिला। बहुजन समाज पार्टी (BSP) की प्रमुख मायावती को मात्र 5% लोगों ने पसंद किया है जबकि चंद्रशेखर आजाद को 1.8% उत्तरदाताओं का समर्थन हासिल हुआ।

विपक्षी दलों के वोटर्स के बीच भी है सीएम योगी का प्रभाव

इस सर्वे का सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आकर्षण सिर्फ एनडीए के पारंपरिक मतदाताओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि विपक्षी दलों के कैडर में भी उनकी स्वीकार्यता है। सर्वे के अनुसार, सपा-कांग्रेस गठबंधन का समर्थन करने वाले 11.7% मतदाताओं ने भी यह माना कि योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री पद के लिए सबसे उपयुक्त उम्मीदवार हैं। इसके अलावा बसपा समर्थकों में से भी 10.2% लोगों ने सीएम योगी के पक्ष में अपनी पसंद जाहिर की है।

बीजेपी की बंपर बढ़त और वोट शेयर का अनुमान

अगर उत्तर प्रदेश में आज विधानसभा चुनाव आयोजित कराए जाते हैं, तो सर्वे के नतीजे एक बार फिर बीजेपी के लिए भारी बहुमत की ओर इशारा करते हैं। सर्वे के अनुसार, एनडीए को 66.6% वोट शेयर मिलने का अनुमान है। वहीं, 66.6% लोगों का यह भी मानना है कि अगली सरकार भी बीजेपी ही बनाएगी और 65.2% जनता चाहती है कि बीजेपी को उत्तर प्रदेश में लगातार तीसरे कार्यकाल (हैट्रिक) के लिए मौका मिलना चाहिए। सपा-कांग्रेस के गठबंधन को 26.4% वोट शेयर मिलने की संभावना जताई गई है, जबकि 26.5% लोगों ने इनके सरकार बनाने की उम्मीद जताई है। बीएसपी को 5.4% वोट शेयर मिलने का अनुमान है।आपको बता दें कि यह सर्वे उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में 18 वर्ष से अधिक आयु के 30925 लोगों के बीच 17 सितंबर से 2 अक्टूबर 2026 के दौरान किया गया था।

UP Election Survey: यूपी में अभी चुनाव हुए तो किसकी बनेगी सरकार? ओपिनियन पोल में सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े

उत्तर प्रदेश की सियासत को लेकर देश के सबसे बड़े ओपिनियन पोल के आंकड़े सामने आ चुके हैं। हमारे सहयोगी न्यूज 18 द्वारा कराए गए इस सर्वे में राज्य की भावी राजनीतिक दिशा, मुख्यमंत्री पद की पसंद और योगी सरकार के कामकाज का लेखा-जोखा जनता की राय के आधार पर पेश किया गया है। उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों में 30925 के बीच किए गए इस ओपिनियन पोल के नतीजे बताते हैं कि राज्य में आज विधानसभा चुनाव होते हैं, तो भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाला एनडीए (NDA) विपक्ष के इंडिया गठबंधन पर भारी पड़ता नजर आ रहा है। हालांकि आंकड़े ये भी बता रहे हैं कि मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन भी युवाओं और आर्थिक रूप से पिछड़े समूहों के बीच अपनी पैठ मजबूत कर रहा है।

सत्ता की हैट्रिक की ओर बीजेपी/एनडीए, सपा-कांग्रेस गठबंधन दूसरे नंबर पर

ओपिनियन पोल में जब लोगों से पूछा गया कि आज चुना हुए तो वो किसे वोट देना पसंद करेंगे, तो बीजेपी/एनडीए को 66.6% फीसदी लोगों ने अपनी पहली चॉइस बताया। सपा-कांग्रेस गठबंधन 26.4% वोट शेयर के साथ दूसरे स्थान पर है। बहुजन समाज पार्टी (BSP) 5.4% वोट शेयर के साथ तीसरे स्थान पर सिमटती नजर आई। यानी ओपिनियन पोल में ये बात साफ समझ में आई कि सीएम योगी के नेतृत्व में एनडीए चुनावों में हैट्रिक लगा सकता है।

सीएम पद की पहली पसंद योगी आदित्यनाथ, 77% लोग कामकाज से संतुष्ट

योगी आदित्यनाथ सरकार का प्रदर्शन और उनका नेतृत्व बीजेपी की इस बढ़त का सबसे मजबूत स्तंभ बनकर उभरा है। सर्वे के मुताबिक ओपनियन पोल में शामिल 77.1% लोग योगी सरकार के कामकाज से पूरी तरह संतुष्ट हैं, जबकि केवल 13.5% लोगों ने असंतोष जताया है। अगले मुख्यमंत्री के रूप में 66.2% लोगों की पहली पसंद योगी आदित्यनाथ हैं। वहीं, सपा प्रमुख अखिलेश यादव को 24.4% लोग मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं।

विपक्ष की वापसी और मतदाताओं का रुझान

सर्वे से यह भी संकेत मिलता है कि 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव की तुलना में सपा-कांग्रेस गठबंधन के जनाधार में क्रमशः 3.7% और 2.4% की बढ़त देखने को मिली है। यह रुझान मुख्य रूप से युवाओं, बेरोजगारों, पेपर लीक/जेन-जी विरोध प्रदर्शनों से प्रभावित लोगों और पूर्वी उत्तर प्रदेश में देखने को मिल रहा है। हालांकि ओपिनियन पोल के मुताबिक बीजेपी न सिर्फ अपने 91% पुराने मतदाताओं को बरकरार रखने में सफल रही है, बल्कि 2024 में वोट न देने वाले 53.0% नए मतदाताओं को भी अपनी ओर आकर्षित कर रही है।

कैसा रहा इस ओपिनियन पोल का सर्वे सैंपल?

न्यूज 18 द्वारा कराए गए इस व्यापक ओपिनियन पोल का सर्वे 17 सितंबर से 2 अक्टूबर 2026 के बीच आयोजित किया गया था। उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों से 30925 लोगों की राय ली गई।

राहुल के मार्च से सुप्रीम कोर्ट नाराज

नई दिल्ली। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और विपक्ष के अन्य नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करके अदालत को नाराज कर दिया है। अदालत ने राहुल सहित सभी नेताओं को नोटिस जारी किया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने तीखी टिप्पणी भी की है। विपक्ष के नेताओं की ओर से 12 अक्टूबर को दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए गुरुवार को चीफ जस्टिस ने कहा कि कोई भी कोर्ट को डरा धमकाकर दबाव में नहीं ला सकता। ऐसी कोशिशें बेकार हैं। इन पर कोई ध्यान नहीं देता।

चीफ जस्टिस इतने पर नहीं रूके। उन्होंने आगे कहा, ‘हमें पता कि कोर्ट के बाहर क्या कहा जा रहा है और कोर्ट के अंदर क्या कहा जा रहा है। हम किसी काल्पनिक दुनिया में नहीं जी रहे हैं। हमें हर बात की जानकारी है’। चीफ जस्टिस ने किसी नेता का नाम नहीं लिया लेकिन जब उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ताओं में से एक के आचरण पर सवाल करेंगे और उसे सफाई देनी होगी तो उनका इशारा राहुल गांधी की ओर ही था।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने 12 अक्टूबर को अदालत परिसर में विपक्षी नेताओं और उनके समर्थकों के जुटने से जुड़े मामले में राहुल गांधी, अखिलेश यादव और अन्य 14 नेताओं को नोटिस जारी किया है। वहीं, SIR प्रक्रिया और चुनाव आयोग के फैसलों के खिलाफ इन नेताओं की याचिका पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगा। 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट परिसर में विपक्षी नेताओं और उनके समर्थकों के जुटने से जुड़े मामले में राहुल गांधी, अखिलेश यादव और अन्य 14 नेताओं को नोटिस जारी किया है।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले विपक्ष के प्रति सद्भाव दिखाया था। जब विपक्ष की ओर से उनसे मिलने का समय मांगा गया तो उन्होंने कई कारण बताते हुए मिलने से इनकार कर दिया था। लेकिन यह कहा था कि अगर विपक्षी नेता याचिका दायर करते हैं तो उस पर जल्दी सुनवाई की जाएगी। लेकिन उस समय उनको आइडिया नहीं था कि उनके इनकार के बाद विपक्ष के नेता सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करेंगे और खुद परिसर में आकर याचिका दायर करेंगे। उनके इनकार के बाद विपक्षी नेता कनॉट प्लेस से मार्च करते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे और वहां याचिका दायर की थी। हालांकि याचिका में कई कमियां थीं, जिन्हें बाद में दुरुस्त किया गया और उस पर गुरुवार को सुनवाई हुई।

वोटर लिस्ट पर चुनाव आयोग का बड़ा फैसला, यूपी-पंजाब समेत 17 राज्यों में होगा SSR

Voter List Revision: वोटर लिस्ट में अपना नाम जुड़वाने या उसमें किसी तरह का बदलाव कराने की तैयारी कर रहे लोगों के लिए अहम खबर है। भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूची को अपडेट करने की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया है। गुरुवार को जारी नोटिस के मुताबिक, इन जगहों पर स्पेशल समरी रिवीजन (SSR) किया जाएगा। यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब देशभर में वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विवाद चल रहा है।

इस प्रक्रिया के दायरे में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा समेत 17 राज्य शामिल हैं। चुनाव आयोग ने इन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 के तहत मतदाता सूची की जांच और उसे अपडेट करने का निर्देश दिया है।

आयोग ने इस प्रक्रिया के लिए 1 जनवरी 2027 को पात्रता की तारीख तय किया है।

इस पुनरीक्षण (रिवीजन) में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरल, लक्षद्वीप, मध्य प्रदेश, मणिपुर, पुडुचेरी, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल शामिल होंगे।

यह अधिसूचना तब आई है, जब सुप्रीम कोर्ट ने विपक्ष के नेता राहुल गांधी और ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के नौ अन्य नेताओं द्वारा दायर एक याचिका पर ECI (चुनाव आयोग), CEC ज्ञानेश कुमार, और चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी को नोटिस जारी किया है। इस याचिका में मतदाता सूचियों के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) को चुनौती दी गई है।

आयोग ने कहा है कि जिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) चल रहा है या हाल ही में पूरा हुआ है, वहां SSR (स्पेशल समरी रिवीजन) का कार्यक्रम बाद में घोषित किया जाएगा।

बता दें कि यह याचिका 12 अक्टूबर को गांधी के नेतृत्व में विपक्ष द्वारा सुप्रीम कोर्ट की ओर निकाले गए मार्च के बाद दायर की गई है, जो SIR (विशेष पुनरीक्षण) प्रक्रिया के खिलाफ था।

खड़गे, अखिलेश और तेजस्वी समेत कई विपक्षी नेताओं ने दायर की याचिका

इस याचिका को गांधी के साथ-साथ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, तृणमूल कांग्रेस नेता सौगत रॉय, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, RJD नेता तेजस्वी प्रसाद यादव, शिवसेना (UBT) नेता संजय राउत, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के नेता एम.ए. बेबी, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के नेता डी. राजा, झारखंड मुक्ति मोर्चा की महुआ माजी, नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार गुट) की सुप्रिया सुले, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के नेता मोहम्मद बशीर, विदुथलाई चिरुथैगल काची (VCK) के अध्यक्ष थोल. थिरुमावलवन और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मंत्री सज्जाद अहमद किचलू ने दायर किया है।

इसमें SIR प्रक्रिया की वैधता को चुनौती दी गई है। साथ ही, चुनाव आयोग के रिकॉर्ड को सार्वजनिक करने, हटाए गए मतदाताओं का विवरण जारी करने, मनमाने ढंग से नाम हटाए जाने के खिलाफ सुरक्षा उपाय करने और नाम वापस जोड़ने के लिए एक व्यवस्था बनाने की मांग की गई है।

नेताओं ने वोटर लिस्ट ने संशोधन प्रक्रिया के न्यायिक ऑडिट की भी मांग की और यह भी कहा कि जब तक इस मामले पर कोई फैसला नहीं आ जाता, तब तक सभी राज्यों में यह प्रक्रिया रोक दी जानी चाहिए।

इससे पहले, विपक्षी नेताओं ने SIR प्रक्रिया को लेकर अपनी चिंताएं जताने और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करने के लिए CJI सूर्य कांत से मिलने का समय मांगा था। लेकिन CJI ने इसे अस्वीकार कर दिया और कहा कि ये मुद्दे पहले से ही कोर्ट के सामने लंबित हैं, इसलिए नेता न्यायिक कार्यवाही के जरिए राहत मांग सकते हैं।

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एसआईआर के खिलाफ विपक्षी दलों की याचिका पर चुनाव आयोग को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस

उच्चतम न्यायालय ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के विरुद्ध लोक सभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन के अन्य घटक दलों के नेताओं की ओर से दायर याचिका पर गुरुवार को चुनाव आयोग को नोटिस जारी किये।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने चुनाव आयोग के साथ-साथ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी को नोटिस जारी किये । मुख्य न्यायाधीश ने याचिका पर सुनवाई के दौरान मौखिक रूप से टिप्पणी की, ” हम याचिकाकर्ताओं में से एक से उनके आचरण के बारे में भी पूछेंगे।” गौरतलब है कि 12 अक्टूबर को श्री गांधी, कांग्रेस और विपक्षी दलों के कुछ अन्य विपक्षी नेताओं ने उच्चतम न्यायालय तक एक मार्च निकाला था और उसके वे उच्चतम न्यायालय में याचिका दाखिल करने गये थे। इससे न्यायालय परिसर में भारी भीड़ जमा हो गई और हंगामा के स्थिति बन गयी थी।

याचिकाकर्ताओं में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, ममता तृणमूल कांग्रेस के सौगत राय, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी प्रसाद यादव, शिवसेना (यूबीटी) के संजय राउत, मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के एम ए बेबी, भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के डी. राजा, झारखंड मुक्ति मोर्चा की महुआ माजी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एसपी) की सुप्रिया सुले और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के ईटी. मुहम्मद बशीर शामिल हैं। विदुथलाई चिरुथाइगल काची के अध्यक्ष थोल. थिरुमावलवन और नेशनल कॉन्फ्रेंस के सज्जाद अहमद किचलू भी याचिकाकर्ताओं में शामिल हैं।

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कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल एसआईआर प्रक्रिया का शुरू से ही विरोध कर रहे हैं। उनका आरोप है कि चुनाव आयोग ने भारतीय जनता पार्टी के दबाव में मतदाता सूची में बड़ी संख्या में नाम काट दिये हैं। वे इसको लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे है। न्यायालय ने अल हिंद मुस्लिम इत्तेहाहुल मुसलमीन के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और कांग्रेस के दिग्विजय सिंह ने भी एसआईआर के विरुद्ध न्यायालय में अलग अलग याचिकाएं दायर की हैं।

याचिकाकर्ताओं ने एसआईआर कराने के संबंध में चुनाव आयोग के 24 जून, 2025 के फैसले के रिकॉर्ड को तलब किये जाने और यह तय करने का अनुरोध किया है कि इस प्रक्रिया में नियम कायदे का पालन हुआ है या नहीं । याचिका में यह भी अनुरोध किया गया है कि इस मामले में यह न्यायिक समीक्षा भी की जाए कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 के तहत आयोग की निर्णय प्रक्रिया में सामूहिक दायित्व और दस्तावेजी निर्णय लेने की व्यवस्था का अनुपालन हुआ या नहीं।

याचिकाकर्ताओं ने मतदाता सूची से नाम हटाने तथा मतदाता सूची डेटाबेस का ऑडिट करने के लिए उच्चतम न्यायालय के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक समिति बनाने की भी मांग की है। याचिकाकर्ताओं ने एसआईआर प्रक्रिया के तहत मतदाता सूचियों से हटाए गए नामों और उन्हें हटाने के कारणों की बूथ-वार जानकारी दिये जाने, नाम हटाने से पहले नोटिस और सुनवाई , नाम वापस जोड़ने की व्यवस्था किये जाने, चुनाव वाले राज्यों में पंजीकरण की समय-सीमा बढ़ाये जाने और जब तक यह मामला चल रहा है, तब तक पूरे देश में एसआईआर प्रक्रिया पर रोक लगाने की भी मांग की है।

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UP News: ‘जो भगवान श्री राम का विरोध करें…’; यूपी चुनाव से पहले अखिलेश यादव को बड़ा झटका, अभय सिंह समेत सपा के 3 विधायक BJP में शामिल

UP News: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले समाजवादी पार्टी (SP) के प्रमुख अखिलेश यादव को बड़ा झटका लगा है। बुधवार (14 अक्टूबर) को SP के तीन बागी विधायक भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हो गए। समाजवादी पार्टी के ये तीन बागी विधायक राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह और विनोद चतुर्वेदी हैं। राकेश प्रताप सिंह अमेठी की गौरीगंज विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं। जबकि अभय सिंह अयोध्या की गोसाईंगंज सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं। वहीं, विनोद चतुर्वेदी जालौन की कालपी विधानसभा सीट से विधायक हैं।

इन विधायकों ने 2022 का चुनाव SP के टिकट पर जीता था। लेकिन 2024 के राज्यसभा चुनाव में BJP उम्मीदवार के पक्ष में वोट कर दिया था। यूपी के अमेठी में बुधवार (14 अक्टूबर) को BJP प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की मौजूदगी में तीनों बागी सपा विधायक राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह और विनोद चतुवेर्दी BJP में शामिल हुए।

कौन हैं MLA अभय सिंह?

अभय सिंह भगवान राम की नगरी अयोध्या की गोसाईगंज विधानसभा सीट से विधायक हैं। सिंह भी समाजवादी पार्टी के एक प्रमुख नेता हैं। राज्यसभा चुनाव के दौरान क्रॉस वोटिंग के बाद अभय सिंह पर कार्रवाई हुई थी। बीजेपी के पक्ष में क्रॉस वोटिंग के बाद समाजवादी पार्टी ने अभय सिंह को पार्टी से निष्कासित कर दिया था। पार्टी नेतृत्व के साथ मतभेदों और राजनीतिक बयानों के कारण उनका नाम पहले भी सुर्खियों में रहा है। औपचारिक सदस्यता से पहले भी अभय सिंह कई मौकों पर भगवा पार्टी के मंच पर दिखाई दिए थे। 2027 विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सियासत का प्रमुख केंद्र बन चुकी अयोध्या का सियासी तापमान अब और बढ़ने की उम्मीद है।

बुधवार को गोसाईंगंज के विधायक अभय सिंह आधिकारिक तौर पर भगवा पार्टी का दामन थाम लिया। इसके बाद अब वह BJP के लिए निर्भय होकर मैदान में उतर सकेंगे। अभय सिंह ने SP के टिकट पर 2012 और 2022 में गोसाईंगंज विधानसभा सीट जीती। 2017 के विधानसभा चुनाव में वे भारतीय जनता पार्टी (BJP) के उम्मीदवार इंद्र प्रताप उर्फ खब्बू तिवारी से हार गए थे। जबकि 2022 में सिंह ने BJP उम्मीदवार आरती तिवारी को 13,079 वोटों से हराया।

‘जो श्री राम का विरोध करेगा, हम लोग उसके विरोधी हो जाएंगे’

समाजवादी पार्टी के विधायक अभय सिंह ने BJP में शामिल होने पर न्यूज एजेंसी ANI से कहा, “जो मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम का विरोध करें, जो राष्ट्र का विरोध करेंगे, हम लोग उसके विरोधी हो जाएंगे। मर्यादा पुरुषोत्तम राम के बारे में जन-जन तक हिंदी और अवधि में पहुंचाने वाले, तुलसीदास ने राम चरित मानस को लिखा। उस रामचरित मानस को जलाया जाए, फाड़ा जाए। उसके बाद इस घटना पर कोई टिप्पणी न की जाए। उसके बाद दर्शन से रोका जाए। ये सब चीजें ऐसी हैं जो उचित नहीं हैं।”

कौन हैं राकेश प्रताप सिंह?

राकेश प्रताप सिंह अमेठी के गौरीगंज से विधायक हैं। सिंह हाईस्कूल तक की पढ़ाई की हुई है। वह साल 2012, 2017 और 2022 में तीन बार विधायक चुने गए हैं। 2022 में राकेश प्रताप सिंह सपा के टिकट पर चुनाव लड़े थे। उन्होंने शानदार जीत भी दर्ज की थी। लेकिन 2024 के राज्यसभा चुनाव के बाद से राकेश प्रताप सिंह सपा को धोखा देकर अपनी पार्टी के अन्य बागी विधायकों के साथ चले गए। इसके बाद अखिलेश यादव ने साल 2025 के जून महीने में राकेश सिंह को सपा से निकाल दिया था।

विनोद चतुर्वेदी के बारे में जानें

जालौन जिले की कालपी विधानसभा सीट से विधायक विनोद चतुर्वेदी भी  BJP में शामिल हो गए हैं। उन्होंने 2022 में समाजवादी पार्टी (SP) के टिकट पर निषाद पार्टी के उम्मीदवार छोटे सिंह को 2,816 वोटों से हराकर कालपी विधानसभा सीट पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। कालपी निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने से पहले चतुर्वेदी ने यूपी के जालौन जिले में उरई विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया था। वे 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इंडियन नेशनल कांग्रेस (INC) के उम्मीदवार के तौर पर उरई सीट से चुने गए थे।

अखिलेश पर बोला हमला

राकेश प्रताप सिंह ने उनके BJP में शामिल होने पर ANI से कहा, “मैं अपने क्षेत्रवासियों का धन्यवाद देता हूं जिन्होंने हमारा समर्थन किया और मुझसे अनुरोध किया कि भाजपा की सदस्यता लीजिए। उन लोगों ने मुझसे कहा कि वे मेरे साथ हैं… 98% लोग जो अपना बूथ जिताते या हराते थे, वे समाजवादी पार्टी का परित्याग करेंगे और BJP की सदस्यता लेंगे।” उन्होंने आगे कहा, “विधायक विनोद चतुर्वेदी, अभय सिंह और मैं स्वयं भाजपा में शामिल हो रहा हूं। हमारे साथ ऐसे करीब 1000 लोग जो जनप्रतिनिधि या पूर्व जनप्रतिनिधि हैं वो शामिल होंगे…लगभग 1 दर्जन विधायक मंच पर मौजूद रहेंगे।”

इसके अलावा राकेश प्रताप सिंह ने एक X पोस्ट में लिखा, “14 अक्टूबर 2026 का दिन मेरे राजनीतिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और भावनात्मक दिन है। यह मेरे लिए केवल भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण करने का अवसर नहीं, बल्कि सनातन की रक्षा, अपनी आस्था, अपने संस्कारों और अपने सिद्धांतों के साथ एक नई राजनीतिक यात्रा प्रारंभ करने का बहुमूल्य दिन है।”

उन्होंने आगे कहा, “मैंने अपने राजनीतिक जीवन में सदैव अपनी सनातन संस्कृति, धार्मिक आस्था और सामाजिक मूल्यों को सर्वोपरि रखा है। बीते समय में समाजवादी पार्टी के भीतर सनातन धर्म, हमारी धार्मिक परंपराओं और पवित्र ग्रंथों को लेकर जिस प्रकार की टिप्पणियां और घटनाएं सामने आईं, उनसे मेरी भावनाएँ बार-बार आहत हुईं। विशेष रूप से जब मुझ जैसे सैकड़ों विधायकों एवं राजनैतिक व्यक्तियों को आराध्य मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम जी के दर्शन करने ना जाने देना, तो वह क्षण मेरे लिए अत्यंत पीड़ादायक था। उसी दिन मेरे मन में यह विचार दृढ़ हो गया था कि जिस राजनीतिक विचारधारा के साथ मेरी आस्था और मेरा अंतर्मन सहमत नहीं है, उसके साथ आगे बढ़ना मेरे लिए संभव नहीं होगा।”

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