बयानों की आग में झुलसता भारत: क्या शब्दों से बढ़ रही है देश की मुश्किलें?

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भारत-जहां बुद्ध की शांति, महावीर की अहिंसा, कबीर का भ्रातृभाव और गांधी का सत्याग्रह पला-बढ़ा, आज वही देश कड़वे, विवादास्पद और घृणास्पद बयानों के तीर से बार-बार छलनी हो रहा है। हाल के समय में, चाहे वह राजनीति का गलियारा हो, धार्मिक मंच हों, या सोशल मीडिया के ट्रेंड्स- ऐसे बयानों की एक बाढ़ सी आ गई है जो देश के सामाजिक ताने-बाने को लगातार नुकसान पहुँचा भारत को अराजक रास्ते पर ले जा रही है। इस बाढ़ में सभी बह रहे हैं।

 

“शब्द यदि विचारपूर्वक न बोले जाएं, तो वे बाण से भी अधिक घातक सिद्ध होते हैं। बाण शरीर को बेधता है, किंतु अनुचित शब्द देश और समाज की आत्मा को घायल कर देते हैं।”

 

1. भाषा का गिरता स्तर और राजनीतिक मर्यादाएं

हाल के दौर में हमने देखा है कि सार्वजनिक संवाद में गरिमा की जगह तीखे व्यक्तिगत हमलों और भड़काऊ बयानबाजी ने ले ली है।

ध्रुवीकरण की राजनीति: चुनावी रैलियों और जनसभाओं के दौरान अक्सर ऐसे बयान देखने को मिलते हैं जहाँ विरोधी दल के नेताओं के लिए अमर्यादित शब्दों का इस्तेमाल होता है।

पहचान पर प्रहार: हालिया बहसों और भाषणों में अक्सर किसी वर्ग, क्षेत्र या धर्म विशेष के लोगों को 'फर्जी', 'घुसपैठिया' या 'अराष्ट्रीय' करार देने की होड़ दिखाई देती है। राजनीतिक लाभ के लिए की जाने वाली यह बयानबाजी समाज में स्थायी दरार पैदा करती है।

 

2. नफ़रत भरे बयान (Hate Speech) और सामाजिक दरार

विभिन्न रिसर्च और रिपोर्टों (जैसे इंडिया हेट लैब और मानवाधिकार अध्ययन) के आंकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में घृणास्पद भाषणों (Hate Speech) की घटनाओं में चिंताजनक वृद्धि हुई है।

आस्था बनाम उकसावा: धार्मिक आयोजनों और रैलियों के मंचों से कभी-कभी ऐसे बयान सामने आते हैं, जहाँ एक समुदाय को दूसरे के खिलाफ भड़काया जाता है या उनके बहिष्कार की बात की जाती है।

सहिष्णुता का ह्रास: जब ऐसे बयान सामने आते हैं, तो यह सदियों पुरानी 'गंगा-जमुनी तहज़ीब' और आपसी भाईचारे की भावना को गहराई से चोट पहुँचाते हैं।

 

3. सोशल मीडिया: आग में घी का काम

आज के डिजिटल युग में एक भड़काऊ बयान केवल उस जगह तक सीमित नहीं रहता जहाँ वह बोला गया।

टीआरपी और एल्गोरिदम का खेल: सोशल मीडिया के एल्गोरिदम (Algorithms) विवादित बयानों को मिनटों में वायरल कर देते हैं।

अधूरी जानकारी और नफ़रत का प्रसार: भ्रामक संदर्भों और विवादित वीडियो क्लिप्स का इस्तेमाल युवाओं के मन में आक्रोश और ज़हर घोलने के लिए किया जा रहा है।

 

4. बयानों से भारत को होने वाले नुकसान

सामाजिक समरसता: समाज में अविश्वास और भय का माहौल बनता है, जिससे आपसी सौहार्द नष्ट होता है।

वैश्विक छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की एक लोकतांत्रिक और सहिष्णु राष्ट्र की छवि को आघात पहुँचता है।

आर्थिक प्रगति: जिस देश या राज्य में सामाजिक अस्थिरता होती है, वहाँ निवेशक और उद्योग आने से हिचकिचाते हैं।

युवाओं पर प्रभाव: संवाद की आक्रामकता देखकर भावी पीढ़ी तर्क और विचारशीलता के स्थान पर नफ़रत को सामान्य मानने लगती है।

 

5. समाधान का मार्ग: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम ज़िम्मेदारी

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिक को 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' देता है, लेकिन अनुच्छेद 19(2) इसके साथ युक्तियुक्त निर्बंधन (Reasonable Restrictions) भी जोड़ता है- अर्थात् यह स्वतंत्रता किसी को नफ़रत फैलाने या लोक व्यवस्था (Public Order) को बिगाड़ने का अधिकार नहीं देती।

कानूनी सख्त कार्रवाई: हेट स्पीच पर किसी भी राजनीतिक या सामाजिक दबाव से परे हटकर निष्पक्ष और कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।

नेताओं और जिम्मेदार पदों का आत्म-नियमन: सार्वजनिक जीवन में मौजूद लोगों को समझना होगा कि उनके हर एक शब्द का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

डिजिटल साक्षरता और संयम: आम जनता को भी सोशल मीडिया पर किसी भड़काऊ बयान को बढ़ावा देने या शेयर करने से बचना चाहिए।

 

शब्द ही जोड़ते हैं और शब्द ही तोड़ते हैं। भारत अगर विभिन्नताओं में एकता की विशाल मिसाल है, तो इस मिसाल को बनाए रखने का दायित्व हम सभी का है। जब तक सार्वजनिक जीवन में भाषण की गरिमा, मर्यादा और सत्य निष्ठा वापस नहीं लौटती, तब तक देश की आत्मा बयानों के इस ज़हर से घायल होती रहेगी। अब समय आ गया है कि हम “बोलो, पर जोड़ने के लिए; तोड़ो, पर केवल नफ़रत के बंधनों को” का विचार अपनाएं। चलिए अब जान लेते हैं 10 विवादित बयान।

 

10 विवादित बयान: 

राज बब्बर, रशीद मसूद, मायावती, अखिलेश यादव, फारूख अब्दुल्ला, मोहम्मद हामिद अंसारी, नसीरुद्दीन शाह, चंदन मित्रा, अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन, जयराम रमेश, कपिल सिब्बल, मणिशंकर अय्यर, दिग्विजय सिंह, बेनी प्रसाद वर्मा, बाबा रामदेव, अरविन्द केजरीवाल, नरेंद्र मोदी, बाल ठाकरे, संजय राउत, नितिन गडकरी, सलमान खुर्शीद, लालू यादव, गिरिराज सिंह, डेरेक ओ ब्रायन, ममता बनर्जी, सायली घोष आदि कई लोग हैं जो समय समय पर बयानवीर का खिताब लेते रहे हैं। देश की हर पार्टी में एक से बढ़कर एक बयानवीर भरेपड़े हैं।

 

1. “अनुपवेशकों और अधिक बच्चों वालों को धन बांटने” पर पीएम मोदी का बयान (2024)

बयान: लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान राजस्थान की एक रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष के घोषणापत्र पर निशाना साधते हुए कहा था कि संपत्ति का सर्वे कराकर उसे “अनुप्रवेशकर्ताओं” (Infiltrators) और “जिनके ज्यादा बच्चे हैं” को बांट दिया जाएगा।

विवाद: विपक्ष और मानवाधिकार संगठनों ने इसे एक विशेष समुदाय को निशाना बनाने वाला और धुव्रीकरण पैदा करने वाला बयान बताया, जिसकी काफी आलोचना हुई।

 

2. “सनातन धर्म डेंगू-मलेरिया की तरह है”– उदयनिधि स्टालिन (2023)

बयान: तमिलनाडु के मंत्री उदयनिधि स्टालिन ने एक सम्मेलन में कहा कि “सनातन धर्म का केवल विरोध नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि डेंगू और मलेरिया की तरह इसे समाप्त कर देना चाहिए।” उदयनिधि स्टालिन के सनातन धर्म वाले बयान का समर्थन करते हुए कर्नाटक सरकार में मंत्री प्रियांक खरगे ने कहा था कि “कोई भी ऐसा धर्म जो समानता को बढ़ावा नहीं देता, जो इंसानों में भेदभाव करता है और सम्मान नहीं देता, वह बीमारी के समान है।”

विवाद: इस बयान पर देश भर में भारी आक्रोश फैला। भाजपा और कई हिंदू संगठनों ने इसे बहुसंख्यक आबादी की आस्था का अपमान बताते हुए अदालतों में याचिकाएं दायर कीं। बीजेपी और विभिन्न हिंदू संगठनों ने इस बयान को सनातन धर्म और हिंदू मान्यताओं पर सीधा प्रहार बताया। इसके बाद प्रियांक खरगे और उदयनिधि स्टालिन के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराई गई थी।

 

3. “मोदी सरनेम” टिप्पणी– राहुल गांधी (2019/कानूनी कार्रवाई 2023)

बयान: चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी ने कहा था, “सब चोरों का सरनेम मोदी ही क्यों होता है?”

विवाद: इस बयान के खिलाफ गुजरात में मानहानि का मुकदमा दर्ज हुआ। मार्च 2023 में सूरत की अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया, जिसके चलते उनकी संसद सदस्यता रद्द (जो बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बहाल) हो गई थी।

 

4. “शक्ति” से लड़ने संबंधी बयान– राहुल गांधी (2024)

बयान: भारत जोड़ो न्याय यात्रा के समापन पर मुंबई में राहुल गांधी ने कहा, “हिंदू धर्म में एक शब्द है 'शक्ति'। हम एक शक्ति के खिलाफ लड़ रहे हैं।”

विवाद: प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा ने इस बयान को हिंदू आस्था और नारियों की 'शक्ति' के अपमान के रूप में प्रस्तुत किया, जिससे चुनाव के दौरान भारी राजनीतिक घमासान मचा।

 

5. “देश के गद्दारों को, गोली मारो…” – अनुराग ठाकुर (2020)

बयान: दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान तत्कालीन केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने एक रैली में नारा लगवाया: “देश के गद्दारों को… गोली मारो सा… को।”

विवाद: इस बयान को चुनावी माहौल में नफरत और हिंसा भड़काने वाला माना गया। चुनाव आयोग ने उनके चुनाव प्रचार करने पर प्रतिबंध भी लगाया था।

 

6. “अगर रोड खाली नहीं हुई तो सड़कों पर उतरेंगे”– कपिल मिश्रा (2020)

बयान: नागरिकता संशोधन कानून (CAA) विरोधी प्रदर्शनों के दौरान दिल्ली पुलिस की मौजूदगी में कपिल मिश्रा ने कहा था कि “अमेरिकी राष्ट्रपति के जाने तक हम शांत हैं, लेकिन अगर रास्ते खाली नहीं कराए गए तो हम पुलिस की भी नहीं सुनेंगे।”

विवाद: इस बयान के तुरंत बाद उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भीषण सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे थे, जिसके लिए कई रिपोर्टों में इस भाषण को जिम्मेदार माना गया।

 

7. रामचरितमानस और पांडुलिपियों पर विवादित टिप्पणी– स्वामी प्रसाद मौर्य (2023)

बयान: समाजवादी पार्टी के तत्कालीन नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने रामचरितमानस की कुछ चौपाइयों पर सवाल उठाते हुए कहा था कि “इनमें दलितों, पिछड़ों और महिलाओं का अपमान किया गया है, इसलिए इस ग्रंथ या इसके विवादित अंशों पर बैन लगना चाहिए।”

विवाद: इस बयान से साधु-संतों और धार्मिक संगठनों में भारी रोष पैदा हुआ और देश भर में जगह-जगह मौर्य के पुतले फूंके गए थे।

 

8. किसान आंदोलन और “100-100 रुपये में आने वाली महिलाएं”- कंगना रनौत (2020)

बयान: कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे किसान आंदोलन के दौरान कंगना ने एक बुजुर्ग महिला (दादी) की तस्वीर शेयर करते हुए लिखा कि “ऐसी महिलाएं 100-100 रुपये लेकर धरने में बैठने आ जाती हैं।” उल्लेखनीय है कि हाल ही में कंगना ने 'जेन जी' (Gen Z) को गटर जनरेशन कहा है।

विवाद: इस बयान से किसान संगठन बेहद नाराज हुए। इसी बयान के गुस्से के कारण जून 2024 में चंडीगढ़ एयरपोर्ट पर एक सुरक्षाकर्मी महिला (CISF कांस्टेबल) ने उन्हें थप्पड़ मार दिया था।

 

9. 'कॉकरोच' (Cockroach) शब्द वाली टिप्पणी और विवाद- CJI (2026) 

बयान: कोर्ट में एक याचिका की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत (CJI) की टिप्पणी में कहा गया था कि “बेरोजगार युवा कॉकरोच की तरह सोशल मीडिया, पत्रकारिता और RTI कार्यकर्ता बनकर सिस्टम पर हमला करने लगते हैं”। उन्होंने कहा था कि कई युवा नौकरी या वकालत के पेशे में जगह न मिलने पर सोशल मीडिया, आरटीआई (RTI) एक्टिविज़्म या अन्य माध्यमों से सिस्टम पर हमला करने का जरिया ढूंढ लेते हैं। उन्होंने कहा कि उनकी यह टिप्पणी फर्जी और जाली डिग्रियों (Fake Degrees) के जरिए वकालत या अन्य पेशों में पिछले दरवाजे से घुसे लोगों और फर्जी पत्रकारों/एक्टिविस्टों के लिए थी, न कि देश के ईमानदार छात्रों और युवाओं के लिए। उन्होंने कहा कि उन्हें देश के युवाओं पर गर्व है।

विवाद: जब इस बयान पर देशभर के युवाओं में भारी विरोध और बहस छिड़ी, तो CJI ने स्पष्टीकरण जारी किया कि उनकी इस टिप्पणी को गलत तरीके से पेश किया गया था, लेकिन इस एक बयान ने CJP पार्टी को जन्म देकर देश में एक बहुत बड़ा छात्र आंदोलन खड़ा कर दिया और फिर जो हुआ उसे सभी ने देखा है।

 

10. कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खरगे का विवादित बयान: 

बयान: अप्रैल 2023 में कर्नाटक के कलबुर्गी (गुलबर्गा) में एक जनसभा को संबोधित करते हुए खरगे ने सीधे हिंदू धर्म पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) की विचारधारा पर निशाना साधते हुए 'सांप' का उदाहरण दिया था। बीजेपी/आरएसएस की विचारधारा एक जहरीले सांप की तरह है। अगर आप सोचेंगे कि यह जहरीला है या नहीं, और इसे चाटकर (जांचकर) देखेंगे, तो आप मारे जाएंगे। इसलिए पहले इस सांप को मारना जरूरी है।'

विवाद: भाजपा ने इस बयान को मुद्दा बनाते हुए आरोप लगाया कि कांग्रेस और उसके शीर्ष नेता बहुसंख्यक समुदाय की विचारधारा और पार्टी का अपमान करने के लिए ऐसी अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करते हैं।

‘तीन संजय की ताकत और ऑपरेशन टाइगर…’, 4 साल में दूसरी बार टूटी शिवसेना UBT, अब 6 सांसदों ने छोड़ा साथ

महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर से बड़ी हलचल देखने को मिली है। सोमवार 22 जून को उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) के छह सांसद आधिकारिक रूप से मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल हो गए हैं। एकनाथ शिंदे ने इन नेताओं के पार्टी में शामिल होने की पुष्टि करते हुए इसे वर्ष 2022 में हुए राजनीतिक बदलाव का दूसरा चरण बताया। शिंदे की शिवसेना में शामिल होने वाले सांसदों में संजय जाधव, संजय पाटिल, संजय देशमुख, भाऊसाहेब वाकचौरे, नागेश पाटिल अष्टिकर और ओमप्रकाश निंबालकर शामिल हैं। इन सांसदों के जाने से उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) को बड़ा झटका माना जा रहा है। लोकसभा में पार्टी के कुल नौ सांसद थे, जिनमें से अब छह सांसद शिंदे गुट के साथ चले गए हैं।

अब 6 सांसदों ने छोड़ा साथ

शिवसेना (यूबीटी) के सांसदों के शिंदे गुट में शामिल होने के लिए पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सांसदों का समर्थन जरूरी था। 17 जून को दिल्ली में उद्धव ठाकरे गुट की संसदीय दल की बैठक हुई थी, लेकिन इसमें ये छह सांसद शामिल नहीं हुए थे। तभी से उनके पार्टी छोड़ने की अटकलें लगाई जा रही थीं। उस बैठक में लोकसभा सांसद अरविंद सावंत, अनिल देसाई और राजाभाऊ वाजे के साथ राज्यसभा सांसद संजय राउत मौजूद थे। रविवार को नागेश पाटिल अष्टिकर और ओमप्रकाश निंबालकर ने भी सार्वजनिक रूप से यह साफ कर दिया था कि वे एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट में शामिल होने जा रहे हैं। वहीं, शिवसेना (यूबीटी) ने इन छह सांसदों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने की बात कही थी और उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल बताया था।

‘यही असली शिवसेना…’

अपने साथ आए छह सांसदों के साथ एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने कहा कि आज उनके साथ छह मजबूत नेता खड़े हैं। उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि इन छह सांसदों में से तीन का नाम संजय है, इसलिए इसे “तीन संजय की ताकत” कहा जा सकता है। उन्होंने बिना नाम लिए शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत पर भी निशाना साधा और कहा कि जब उनके साथ इतने संजय मौजूद हैं, तो किसी दूसरे संजय की चर्चा करने की जरूरत नहीं है। शिंदे ने इस राजनीतिक घटनाक्रम की तुलना क्रिकेट से करते हुए कहा कि उनकी टीम ने अब “छक्का” लगा दिया है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2022 में उद्धव ठाकरे गुट से अलग होने का फैसला बालासाहेब ठाकरे की हिंदुत्व विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए लिया गया था। उन्होंने कहा, “जहां शिवसेना की मूल विचारधारा है, वहीं असली शिवसेना है।”

चला ऑपरेशन टाइगर

शिंदे गुट ने छह सांसदों को अपने साथ जोड़ने के अभियान को “ऑपरेशन टाइगर” नाम दिया था। यह नाम शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे की पार्टी के पुराने चुनाव चिह्न ‘बाघ’ से प्रेरित था। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस अभियान की सफलता पर कहा कि इससे एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना पर नेताओं का बढ़ता विश्वास दिखाई देता है। उन्होंने इस राजनीतिक स्थिति के लिए उद्धव ठाकरे को जिम्मेदार ठहराया। वहीं, रविवार को भांडुप में पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उद्धव ठाकरे ने कहा कि उनका हौसला बिल्कुल नहीं टूटा है। उन्होंने भरोसा जताया कि वह आगे भी अपनी पार्टी का नेतृत्व करते रहेंगे। ठाकरे ने कहा कि उनकी पार्टी ही असली शिवसेना है और वह उसे मजबूत बनाने के लिए लगातार काम करते रहेंगे।

साल 2022 में हुई शिवसेना की टूट का बचाव करते हुए शिंदे ने कहा कि उस समय कई लोगों ने दावा किया था कि उनके साथ आने वाले 40 विधायक दोबारा चुनाव नहीं जीत पाएंगे। उन्होंने बताया कि तब उन्होंने कहा था कि अगर ये विधायक चुनाव नहीं जीतते हैं, तो वह मुख्यमंत्री पद छोड़कर अपने गांव लौट जाएंगे और खेती करेंगे। शिंदे ने कहा कि बाद में हुए चुनाव में उनके साथ जुड़े 60 नेता दोबारा जीतकर आए, जिससे यह साबित हुआ कि जनता ने उनके फैसले और नेतृत्व पर भरोसा जताया।

‘अब सिर्फ एक ही शिवसेना है’, महाराष्ट्र में ‘ऑपरेशन टाइगर’ के बीच अमित शाह का बड़ा बयान

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शुक्रवार को बड़ा राजनीतिक बयान देते हुए कहा कि अब महाराष्ट्र में सिर्फ एक ही शिवसेना है, कोई दूसरा गुट नहीं है। उनका यह बयान महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के समर्थन के रूप में देखा जा रहा है।

“पहले गुट कहा जाता था, अब सिर्फ शिवसेना है”

एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कहा, “पहले एकनाथ शिंदे को गुट कहा जाता था, लेकिन अब सिर्फ एक ही शिवसेना है। कोई दूसरा गुट नहीं है।”

शाह का यह बयान ऐसे समय आया है, जब महाराष्ट्र की राजनीति में कथित ‘ऑपरेशन टाइगर’ को लेकर चर्चाएं तेज हैं।

क्या है ‘ऑपरेशन टाइगर’?

हाल के दिनों में शिवसेना नेताओं की ओर से “ऑपरेशन टाइगर” का जिक्र किया जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में इसे उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली शिवसेना (UBT) के कुछ सांसदों के संभावित पाला बदलने और NDA में शामिल होने की अटकलों से जोड़कर देखा जा रहा है।

चर्चा है कि शिवसेना (UBT) के कुछ सांसद सत्तारूढ़ गठबंधन के संपर्क में हैं, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

शिंदे गुट के लिए बड़ा संदेश

अमित शाह का बयान शिंदे गुट के लिए बड़ा मनोबल बढ़ाने वाला माना जा रहा है। चुनाव आयोग पहले ही एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले दल को आधिकारिक शिवसेना के रूप में मान्यता दे चुका है।

शिंदे गुट लगातार दावा करता रहा है कि वही शिवसेना संस्थापक Bal Thackeray की असली विचारधारा और विरासत को आगे बढ़ा रहा है।

“ये तो सिर्फ ट्रेलर है…”

हाल ही में एकनाथ शिंदे ने भी पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था, “ये तो सिर्फ ट्रेलर है, पिक्चर अभी बाकी है।”

उनके इस बयान के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में संभावित राजनीतिक घटनाक्रमों और दल-बदल की अटकलें और तेज हो गई थीं।

शिंदे ने अपने सांसदों और विधायकों को पार्टी की “अनमोल पूंजी” बताते हुए कहा था कि शिवसेना मराठी अस्मिता के मुद्दे पर मजबूती से खड़ी है।

महाराष्ट्र की राजनीति में बढ़ी हलचल

फिलहाल महाराष्ट्र में भाजपा, शिंदे की शिवसेना और अजित पवार के नेतृत्व वाले NCP गुट की महायुति सरकार सत्ता में है।

ऐसे में अमित शाह के बयान को केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की बदलती सियासी तस्वीर और विपक्ष के भविष्य को लेकर बड़ा संकेत माना जा रहा है।

हालांकि, उद्धव ठाकरे गुट और अन्य विपक्षी दलों की ओर से अमित शाह के इस बयान पर तत्काल कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

Sanjay Raut: ‘कुछ लोग कुत्ते होते हैं, लेकिन वफादार नहीं’… ‘ऑपरेशन टाइगर’ की चर्चा के बीच संजय राउत ने शेयर किया पोस्ट

 

Sanjay Raut: ‘कुछ लोग कुत्ते होते हैं, लेकिन वफादार नहीं’… ‘ऑपरेशन टाइगर’ की चर्चा के बीच संजय राउत ने शेयर किया पोस्ट

Sanjay Raut: शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय राउत ने शनिवार को पार्टी में चल रही सियासी हलचल के बीच सोशल मीडिया पर एक रहस्यमयी पोस्ट शेयर किया है। यह पोस्ट पार्टी के भीतर बढ़ते उस उथल-पुथल के बीच आई है, जब चर्चा है कि पार्टी के छह लोकसभा सांसद एकनाथ शिंदे की नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो सकते हैं।

संजय राउत ने एक तस्वीर साझा की, जिस पर लिखा था, “कुछ लोग कुत्ते तो होते हैं, लेकिन वफादार नहीं होते।” इसके साथ उन्होंने कैप्शन में लिखा, “जय महाराष्ट्र!”

यह पोस्ट ऐसे समय में आई है जब उद्धव बालासाहेब ठाकरे के गुट को पार्टी में दूसरी बड़ी फूट का सामना करना पड़ सकता है। इससे पहले 2022 में डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे ने बगावत की थी।

गुरुवार को स्थिति तब और गंभीर हो गई, जब पार्टी के 9 में से 6 लोकसभा सांसद नई दिल्ली स्थित संसद परिसर में बुलाई गई संसदीय दल की बैठक में शामिल नहीं हुए। बैठक में केवल अरविंद सावंत, अनिल देसाई और राजाभाऊ वाजे ही पहुंचे।

गैर-मौजूद सांसदों में नागेश आष्टिकर, संजय देशमुख, संजय जाधव, संजय दीना पाटिल, ओमप्रकाश राजेनिंबालकर और भाऊसाहेब वाकचौरे शामिल थे।

इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए राउत ने सांसदों पर पार्टी व्हिप का उल्लंघन करने का आरोप लगाया और कहा कि उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू हो चुकी है।

उन्होंने पत्रकारों से कहा, “जो लोग खुद को शिवसैनिक मानते थे, वे डरपोक हैं। शिवसैनिक इतने डरपोक नहीं होते। ये लोग खुद को शिवसैनिक कहते हैं, लेकिन छिपने के लिए कहां गए हैं? जयपुर में।”

उन्होंने आगे कहा कि इन सांसदों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए हैं और पार्टी उनकी सदस्यता रद्द कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ाएगी।

राउत ने कहा, “कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू हो गई है। हम उन्हें अयोग्य घोषित कराने की पूरी कोशिश करेंगे। अगर लोकसभा अध्यक्ष नियमों, कानून और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक काम करते हैं, तो इन लोगों की सदस्यता रद्द हो जाएगी।”

‘ऑपरेशन टाइगर’ की चर्चा

शिवसेना (यूबीटी) में बड़े पैमाने पर टूट की अटकलें, जिसे ‘ऑपरेशन टाइगर’ नाम दिया जा रहा है, उस समय और तेज हो गईं जब शिवसेना एमएलसी चंद्रकांत रघुवंशी ने दावा किया कि शिवसेना (यूबीटी) के छह लोकसभा सांसद उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व पर भरोसा जता चुके हैं और वे उनके गुट के साथ जा चुके हैं।

इस झटके के बावजूद, राउत ने जोर देकर कहा कि पार्टी बालासाहेब ठाकरे की विरासत के प्रति प्रतिबद्ध है।

उन्होंने कहा, “शिवसेना के 60 साल पूरे हो गए हैं और बालासाहेब ठाकरे की जन्म शताब्दी मनाई जा रही है। हमें हमेशा बालासाहेब ठाकरे से प्रेरणा मिलती है। हम बुराई के खत्म होने तक लड़ते रहेंगे।”

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