परिसीमन से अब जुड़ गई फेरबदल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में फेरबदल का मामला कई महीने से चर्चा में है। अब कहा जा रह है कि पहले परिसीमन का बिल पास होगा और उसके बाद ही फेरबदल होगी। परिसीमन बिल का अर्थ है कि एक साथ तीन बिल पास कराना है। उसमें सबसे अहम महिला आरक्षण कानून में संशोधन का बिल है, जिसके लिए दो तिहाई बहुमत की जरुरत है। सरकार और भाजपा के प्रबंधक संख्या जुटाने में लगे हैं। जानकार सूत्रों का कहना है कि संख्या जुटाने के अभियान में मंत्रिमंडल फेरबदल का इस्तेमाल होना है। नई पार्टियों और नए नेताओं को मंत्री बनाने का प्रलोभन दिया जा रहा है।

पार्टियों को सरकार में शामिल कराने के प्रयास चल रहे हैं। बताया जा रहा है कि एक साथ कई प्रयास हो रहे हैं। एमके स्टालिन की पार्टी को एनडीए में लाने का प्रयास हो रहा है तो ममता बनर्जी की पार्टी से अलग होकर 20 सांसद जिस एनसीपीआई में गए हैं उसके विलय की बात हो रही है। अगल विलय नहीं होता है तो 17 सांसद भाजपा में शामिल हो सकते हैं और बाकी तीन सरकार को बाहर से समर्थन देंगे।

भाजपा को सबसे ज्यादा उम्मीद डीएमके से है। उसको लग रहा है कि कांग्रेस और उसके साथ ही जितनी सेकुलर पार्टियां हैं, जिनमें लेफ्ट पार्टियां भी शामिल हैं उनका टीवीके से स्थायी तालमेल हो गया। दूसरी ओर अन्ना डीएमके नीचे जा रही है। पिछले चुनाव में जीती उसकी दो सीटों पर उपचुनाव हुए थे। उन दोनों सीटों पर अन्ना डीएमके तीसरे स्थान पर चली गई। ई पलानीस्वामी के असर वाले पश्चिमी तमिलनाडु के कोंगू क्षेत्र में अन्नाडीएमके तीसरे स्थान पर रही और डीएमके दूसरे स्थान पर आ गई। इससे लग रहा है कि अब अगले कुछ दिन डीएमके बनाम टीवीके मुकाबला होगा।

ऐसे में डीएमके को एनडीए में आने में समस्या नहीं है। अगर डीएमके एनडीए में आए तो 22 लोकसभा सांसदों के दम पर उसे कम से कम चार मंत्री पद देने होंगे। यह फैसला होने के बाद ही मंत्रिमंडल में फेरबदल का काम होगा। शरद पवार अपनी पार्टी के एनडीए में जाने की संभावना से इनकार कर रहे हैं। लेकिन भाजपा की ओर से प्रयास किया जा रहा है। अगर वे एनडीए में नहीं जाते हैं तो उनकी पार्टी भी टूट सकती है। उनमें से दो को मंत्री पद देने की बात है।

गौरतलब है कि उद्धव ठाकरे की शिव सेना के छह सांसद एकनाथ शिंदे गुट में शामिल हो गए हैं। इससे उसके सांसदों की संख्या 13 हो गई है। वह जनता दल यू से बड़ी पार्टी बन गई है। ऐसे में उसके नेता कम से कम दो मंत्री पद और मांग रहे हैं। एकनाथ शिंदे के बेटे श्रीकांत शिंदे के मंत्री बनने की चर्चा है। इसी तरह एनसीपीआई में गए ममता बनर्जी की पार्टी के कम से कम तीन सांसदों को मंत्री बनाए जाने की खबर है। इस तरह जो मंत्री पद खाली हैं और जो खाली होने वाले हैं उनके दावेदार भाजपा से बाहर ज्यादा हैं। जनता दल यू ने भी एक मंत्री पद की मांग रखी है। पहले जदयू के सांसद हरिवंश नारायण सिंह राज्यसभा के उप सभापति थे। लेकिन अब वे मनोनीत सांसद हैं। इस वजह से जदयू की ओर से संजय झा के लिए एक मंत्री पद की दावेदारी रखी गई है। सो, डीएमके, एनसीपीआई, शिव सेना, जदयू जैसी सहयोगी पार्टियों की ओर से कम से कम 10 मंत्री पद की मांग है। अगर परिसीमन से पहले मंत्रिमंडल फेरबदल होगी तो जितने लोग संतुष्ट होंगे उससे ज्यादा लोग नाराज होंगे। इस समय सरकार एक भी सांसद की नाराजगी अफोर्ड करने की स्थिति में नहीं है।

सरकार के पास संख्या अब भी नहीं है

इसी महीने संसद का विशेष सत्र बुलाने की तैयारी की जा रही है। सरकार के जानकार सूत्रों की कहना है कि ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की खोजी रिपोर्ट ने विशेष सत्र बुला कर महिला आरक्षण कानून में संशोधन और परिसीमन बिल पास कराने के सरकार के प्रयास को धीमा कर दिया। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर आई रिपोर्ट के बाद से लगातार विपक्ष हमलावर है। विपक्ष की पार्टियों के साथ साथ कॉकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन भी चल रहा है। सरकार के प्रबंधकों का मानना है कि इससे राजनीतिक माहौल में गर्मी बनी हुई है।

ऐसे समय में चुनाव से जुड़ा हुआ कोई भी सुधार करने की कोशिश समस्या पैदा कर सकती है। सरकार और भाजपा के संसदीय प्रबंधकों को यह भी लग रहा है कि इस समय कोई भी पार्टी सरकार का साथ देने से हिचकेगी। तभी सवाल है कि अचानक सरकार ने यह विचार कैसे शुरू कर दिया कि इसी महीने यानी बचे हुए 12 दिन में संसद का विशेष सत्र बुला कर महिला आरक्षण कानून में संशोधन करा लिया जाए और परिसीमन बिल भी पास हो जाए?

ध्यान रहे परिसीमन से जुड़े दो बिल हैं, एक राज्यों के लिए और एक केंद्र शासित प्रदेशों के लिए। इनको साधारण बहुमत से पास किया जा सकता है। लेकिन महिला आरक्षण कानून में बदलाव संविधान संशोधन के जरिए होगा, जिसके लिए दोनों सदनों में अलग अलग दो तिहाई बहुमत की जरुरत है। वास्तविक स्थिति यह है कि अब भी सरकार के पास दो तिहाई बहुमत नहीं है। दो तिहाई बहुमत नहीं होने के कारण ही 16 से 18 अप्रैल के विशेष सत्र में यह बिल पास नहीं हो पाया था।

पिछले कई दशक में पहली बार ऐसा हुआ था कि सरकार का बिल गिर गया। नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए भी यह शर्मिंदगी की बात थी। कहा जा रहा है कि उसके बाद दोनों ने इसे प्रतिष्ठा का मुद्दा बनाया है। इसी वजह से संसद के मानसून सत्र का सत्रावसान नहीं किया जा रहा है। पिछले 65 दिन से सत्रावसान नहीं हुआ है। ऐसा इसलिए किया गया है कि सात दिन के अंदर नोटिस देकर फिर सत्र बुला लिया जाए।

जब से दूसरे विशेष सत्र की चर्चा शुरू हुई है तब से भाजपा के नेता भी परेशान हैं। उनको लग रहा है कि इस बार भी संख्या पूरी नहीं हो पाएगी। इसका कारण यह है कि सरकार को लोकसभा में हर हाल में 360 सांसदों की जरुरत है। इस समय विपक्ष के साथ 178 सांसद लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। राहुल गांधी और कांग्रेस नेताओं ने 30 सितंबिर की ‘इंडिया’ ब्लॉक की बैठक में शामिल पार्टियों और उनके सांसदों की यह संख्या बताई है। विपक्ष की यह ताकत स़ड़कों पर भी दिख रही है। राज्यसभा में जरूर विपक्ष के साथ सिर्फ 62 सांसद हैं।

लेकिन लोकसभा में 178 सांसद हैं। इनके अलावा कई और पार्टियां हैं, जो विपक्ष के साथ नहीं हैं लेकिन सरकार के साथ भी नहीं हैं। जगन मोहन रेड्डी अब खुल कर भाजपा का विरोध कर रहे हैं। के चंद्रशेखर राव की पार्टी सरकार के खिलाफ है। अरविंद केजरीवाल और ओवैसी की पार्टी सरकार के खिलाफ है। ममता बनर्जी और उद्धव ठाकरे की पार्टी टूटने के बाद भी एनडीए के पास 318 ही सांसद हैं, जबकि ‘इंडिया’ ब्लॉक के पास 178 सांसद हैं। डीएमके सहित तटस्थ सांसदों की संख्या इस समय 45 है। इनमें से कम से कम 40 लोग सरकार को वोट करें तभी दो तिहाई बहुमत पूरा होगा। इसकी संभावना बहुत कम दिख रही है।

ज्ञानेश का इस्तीफा लेकर रहेंगे

नई दिल्ली। राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं ने मंगलवार को यह लाइन दोहराई। उन्होंने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा लेकर रहेंगे, चाहे इसमें जितना समय लगे और जितना आंदोलन करना पड़े। लगातार कई दिन के प्रदर्शन के बाद मंगलवार को विपक्ष की एक दर्जन पार्टियों के नेता राहुल गांधी के घर पर इकट्ठा हुए। वहां ‘इंडिया’ ब्लॉक की बैठक हुई। करीब दो घंटे की इस बैठक के बाद सभी नेताओं ने बाहर आकर साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस की। सभी नेताओं ने अपनी बात रखी।

बैठक के बाद मीडिया से बात करते हुए राहुल गांधी ने कहा, ‘मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा लेना हमारा मिशन है। इसमें जितना भी समय लगे, एक दिन, एक साल या दो साल, हमारा आंदोलन जारी रहेगा’। राहुल ने आगे कहा, ‘विपक्ष लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल करने के लिए अंत तक संघर्ष करेगा’। जंतर मंतर को प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थानों की सूची से हटाने के मुद्दे पर राहुल ने कहा, ‘सरकार ने तय कर लिया है कि जंतर मंतर का इस्तेमाल लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने के लिए नहीं किया जा सकता। हम सरकार की इस सोच को चुनौती देंगे’।

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष ने कहा, ‘नरेंद्र मोदी, अमित शाह, ज्ञानेश कुमार और अन्य लोगों को समझना होगा कि संविधान को नुकसान पहुंचा कर बच निकलना इतना आसान नहीं होगा। ऐसे लोगों को न्याय के कटघरे में लाया जाएगा देश में लोकतंत्र को नष्ट कर दिया गया है। चुनावी व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया गया है और संविधान को फाड़कर फेंक दिया गया है’।

राहुल ने मीडिया से कहा, ‘यह लड़ाई हमारे लिए नहीं, भारत के लोगों और उनके भविष्य के लिए है। हम सभी मिलकर देश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल करने के लिए अंत तक लड़ेंगे। कोई भी संस्था अपनी भूमिका निभाए या न निभाए, राजनीतिक विरोध जारी रहेगा, जनता का संघर्ष जारी रहेगा और अंत में उसकी जीत होगी’। उन्होंने आगे कहा, ‘विपक्ष का संघर्ष जारी रहेगा और वह अपने लक्ष्य तक पहुंचकर रहेगा। इसमें कल, परसों या दो साल भी लग जाएं, हमारी टीम रुकने वाली नहीं है’।

पिछले आठ दिन में विपक्षी नेताओं की यह छठी बैठक थी। इसमें राहुल के अलावा कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, शरद पवार की एनसीपी की नेता सुप्रिया सुले, सीबीआई महासचिव डी राजा, राजद के तेजस्वी यादव, उद्धव ठाकरे की शिव सेना के संजय राउत और अन्य नेता शामिल हुए। सीपीआई एमएल के छात्र संगठन आईसा की नेता नेहा बोरा भी बैठक में शामिल हुईं।  बाद में उन्होंने भी मीडिया के सामने अपनी बात रखी। गौरतलब है कि एक दिन पहले सोमवार को विपक्ष ने ‘चलो दिल्ली मार्च’ किया था और सुप्रीम कोर्ट जाकर मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने और एसआईआर रद्द करने की याचिका दी थी।

विपक्ष का सुप्रीम कोर्ट तक मार्च

नई दिल्ली। राहुल गांधी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरोध में नए नए तरीके आजमा रहे हैं। सोमवार को उन्होंने एक नई मिसाल कायम की। एक दर्जन विपक्षी पार्टियों के नेताओं के साथ राहुल ने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च किया। विपक्षी नेताओं के मार्च को सुप्रीम कोर्ट से आधा किलोमीटर दूर रोक दिया गया। वहां से विपक्ष के चुनिंदा नेता सुप्रीम कोर्ट में पहुंचे और ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिका दायर की। यह याचिका 10 विपक्षी राजनीतिक दलों के 11 नेताओं की ओर से दायर की गई है।

इससे पहले राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, प्रियंका गांधी वाड्रा और विपक्ष के अन्य नेताओं के साथ सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च किया। जब विपक्ष के नेता सुप्रीम कोर्ट के अंदर गए तो वहां राहुल गांधी की लीगल टीम पहले से मौजूद थी। लीगल टीम ने याचिका तैयार कर रखी थी, जिसमें मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में गड़बड़ी के आरोप लगाए गए हैं।

गौरतलब है कि कांग्रेस नेताओं ने रविवार को चिट्ठी लिख कर चीफ जस्टिस से मिलने का समय मांगा था। विपक्ष उनको ज्ञापन देना चाहता था। लेकिन चीफ जस्टिस ने मिलने का समय देने से इनकार कर दिया था। उन्होंने हितों के टकराव, शक्तियों के पृथक्करण और मामला न्यायालय के विचाराधीन होने के हवाले मिलने का समय देने से इनकार किया था। इसके बाद विपक्ष ने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करने का फैसला किया। राहुल ने इससे पहले एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जिसमें उन्होंने कहा कि उनका मार्च शिवजी की बारात की तरह है, जिसमें जो चाहे वह शामिल हो सकता है। इसके बाद राहुल कांस्टीट्यूशन क्लब पहुंचे, जहां से विपक्ष ने मार्च शुरू किया।

राहुल गांधी के मार्च में देरी होने पर उनकी कानूनी टीम ने दोपहर में सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री के शाम साढ़े चार बजे बंद होने की समय सीमा के बाद याचिका दाखिल करने के लिए समय बढ़ाने की मांग कर रही है। आम तौर पर ऐसे मामलों में पक्षकार सुप्रीम कोर्ट की ई फाइलिंग सेवा का इस्तेमाल कर सकते हैं, जो 24 घंटे उपलब्ध रहती है।

मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ याचिका दायर करने वालों में कांग्रेस से राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे शामिल हैं। उनके अलावा समाजवादी पार्टी से अखिलेश यादव, तृणमूल कांग्रेस से सौगत राय, राजद से तेजस्वी यादव, उद्धव ठाकरे की शिव सेना से संजय राउत, सीपीएम महासचिव एमए बेबी, सीपीआई महासचिव डी राजा, जेएमएम सांसद महुआ माझी, शरद पवार की एनसीपी से सुप्रिया सुले और मुस्लिम लीग से ईटी मोहम्मद बशीर शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट तक मार्च में शामिल सपा के नेता अखिलेश यादव ने कहा, ‘आंदोलन और धरना जारी रहेगा। लोकतंत्र को बचाना हमारी जिम्मेदारी है। बीजेपी, चुनाव आयोग के साथ मिलकर संविधान और लोकतंत्र को खत्म करना चाहती है। वह हमेशा सत्ता में बने रहना चाहती है। वे फर्जी वोटर लिस्ट बनाते हैं, फर्जी वोट डालते हैं और चुनाव के नतीजे तैयार करते हैं’। राजद के नेता तेजस्वी यादव ने कहा, ‘देश की जनता उन्हें नहीं भूलेगी। हम सभी लोकतंत्र और संविधान को बचाने के लिए एकजुट हुए हैं। अब उन्हें सजा देने का समय आ गया है’।

दलबदल को सुप्रीम कोर्ट ने ‘संवैधानिक पाप’ कहा

नई दिल्ली। शिव सेना में विभाजन और नाम व चुनाव चिन्ह आवंटन को लेकर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बड़ी टिप्पणी की। अदालत ने दलबदल को संवैधानिक पाप करार दिया। चुनाव चिन्ह विवाद पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने सुनवाई की। असल में शिव सेना के उद्धव ठाकरे गुट ने एकनाथ शिंदे गुट को धनुष बाण चुनाव चिन्ह देने के चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती दी है।

इस पर सुनवाई के दौरान मंगलवार को जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने पूछा, ‘क्या चुनाव चिन्ह की भावना उन लोगों के लिए लागू होगी, जिन्होंने संवैधानिक पाप किया है? या उन लोगों के लिए, जिन्होंने संवैधानिक पाप की शिकायत की है’?  सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले भी पूछा था कि क्या चुनाव आयोग दोनों गुटों को आरक्षित धनुष बाण निशान देने से इनकार कर सकता था? कोर्ट ने यह भी सवाल किया कि जिन विधायकों की सदस्यता पर अयोग्यता की कार्यवाही चल रही हो, उनकी संख्या को बहुमत का सुरक्षित आधार माना जा सकता है या नहीं?

मंगलवार को सुनवाई के दौरान एकनाथ शिंदे गुट ने दलीलें दी कि चुनाव आयोग का विधायी बहुमत के आधार पर फैसला लेना कानूनी रूप से सही था। शिंदे गुट की ओर से वरिष्ठ वकील नीरज किशन कौल ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया। उन्होंने चुनाव आयोग के विधायी बहुमत की कसौटी पर भरोसा करने का बचाव किया। कौल ने कहा कि शिंदे का समर्थन करने वाले 40 विधायक, 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में जीतने वाले शिवसेना के 55 विधायकों के पक्ष में पड़े कुल वोटों का 76 फीसदी का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने लोकसभा के आंकड़ों का भी हवाला देते हुए कहा कि शिंदे का समर्थन करने वाले 13 सांसद, पार्टी के जीतने वाले 18 सांसदों के पक्ष में पड़े कुल वोटों का 73 फीसदी का प्रतिनिधित्व करते हैं।

विपक्षी पार्टियां अलग अलग लड़ रही हैं

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को स्थगित कराने के लिए विपक्ष ने साझा कार्य योजना बनाई थी लेकिन तीन दिन के बाद ऐसा दिख रहा है कि सब अलग अलग लड़ रहे हैं। सबके प्रदर्शन अलग अलग हो रहे हैं। पहले दिन यानी दो अक्टूबर को कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई के छात्रों ने जंतर मंतर पर लेफ्ट और आम आदमी पार्टी के प्रदर्शन का समर्थन किया लेकिन किसी ने उनका नाम नहीं लिया। इसलिए अगले दिन यानी तीन अक्टूबर को एनएसयूआई ने जगह बदल दी। लेफ्ट और आप के नेता कुछ सिविल सोसायटी के लोगों के साथ जंतर मंतर पहुंचे तो एनएसयूआई के छात्र और नेता इंडिया गेट पर प्रदर्शन करने पहुंच गए। तभी ने तो जंतर मंतर के प्रदर्शन का कोई माहौल बना और न इंडिया गेट पर हुए प्रदर्शन को किसी ने तवज्जो दी। ऐसे ही मुंबई में रविवार, चार अक्टूबर को उद्धव ठाकरे ने अपने चचेरे भाई राज ठाकरे की पार्टी मनसे के साथ मिल कर प्रदर्शन किया। दो अक्टूबर को उद्धव सीजेपी के प्रदर्शन में भी शामिल हुए थे।

सोचें, 30 सितंबर को दिल्ली में हुई ‘इंडिया’ ब्लॉक की बैठक में कांग्रेस और लेफ्ट दोनों के नेता शामिल थे। उसमें एक साथ दो से आठ अक्टूबर तक प्रदर्शन करने का फैसला किया। यह भी तय किया गया कि छह अक्टूबर को चुनाव आयोग के मुख्यालय निर्वाचन सदन का घेराव किया जाएगा, जिसमें सभी पार्टियों के सभी बड़े नेता शामिल होंगे। इस बैठक में जो पार्टियां नहीं शामिल हुईं या जिनको नहीं बुलाया गया। उनकी बात अलग है। आम आदमी पार्टी को नहीं बुलाया गया था। इसलिए अगर उसके नेता अलग प्रदर्शन करते हैं तो कांग्रेस को आपत्ति नहीं है। इसी तरह कॉकरोच जनता पार्टी तो अभी पार्टी भी नहीं है। इसलिए उसके लिए लोग अलग प्रदर्शन कर रहे हैं तो उससे भी कांग्रेस को समस्या नहीं है।

लेकिन अगर लेफ्ट पार्टियों के नेता अलग प्रदर्शन करते हैं या उद्धव ठाकरे की शिव सेना अलग प्रदर्शन करती है तो यह विपक्षी एकता के लिए ठीक नहीं है। कांग्रेस नेता इस बात से आहत हैं कि लेफ्ट के बड़े नेता आम आदमी पार्टी के साथ मिल कर दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे हैं तो उद्धव व आदित्य ठाकरे ने सीजेपी के आंदोलन में हिस्सा लिया। उद्धव और आदित्य ठाकरे दो अक्टूबर को मुंबई के शिवाजी पार्क में हुए प्रदर्शन में शामिल हुए थे। अब तक कांग्रेस का साथ देने वाले सिविल सोसायटी और फिल्म बिरादरी के लोग भी सीजेपी या लेफ्ट के आंदोलन में शामिल हो रहे हैं। कांग्रेस के प्रदर्शन में उसकी सहयोगी राजद के नेता भी नहीं शामिल हो रहे हैं।

ज्ञानेश है भाजपा का हथियारः उद्धव

मुंबई। शिवसेना (उबाठा) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने रविवार को मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के ‘हथियार’ के रूप में काम करने का आरोप लगाया। वहीं महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे ने महाराष्ट्र में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को रद्द करने और भविष्य के चुनाव मतपत्र से कराने की मांग की।

सीईसी और एसआईआर के खिलाफ ठाकरे बंधुओं के नेतृत्व में मुंबई में निकाले गए ‘विराट गर्जना मोर्चा’ में हजारों लोग शामिल हुए। मार्च के बाद हुई रैली में कांग्रेस नेता बालासाहेब थोराट और विजय वडेट्टीवार तथा शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के जयंत पाटिल, शशिकांत शिंदे, जितेंद्र आव्हाड और अनिल देशमुख भी शामिल हुए।

उद्धव ठाकरे ने सवाल किया कि अगर एसआईआर मतदाता सूची से बांग्लादेशियों को बाहर करने के लिए कराया गया था तो सरकार बताए कि देश में अवैध रूप से रह रहे कितने बांग्लादेशियों का पता लगाया गया है। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया, ‘ज्ञानेश कुमार भाजपा का हथियार हैं।’

निर्वाचन आयोग को निशाना बनाते हुए उद्धव ने दावा किया कि महाराष्ट्र में एसआईआर के दौरान दो करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। उन्होंने कहा कि इसी तरह की कवायद में पश्चिम बंगाल में 30 लाख और तमिलनाडु में 70 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं।

उद्धव ठाकरे ने नूर्नबर्ग मुकदमों की तर्ज पर भाजपा नेताओं के खिलाफ अभियोजन की चेतावनी भी दी। उन्होंने कहा, ‘भाजपा और इन अधिकारियों को समझ लेना चाहिए कि देश में भी ऐसा ही होगा।’

उन्होंने कहा कि विपक्षी दलों की लड़ाई किसी एक पार्टी या नेता, धर्म या जाति के लिए नहीं, बल्कि देश की स्वतंत्रता के लिए है। उद्धव ने दावा किया, ‘भाजपा को समझ लेना चाहिए कि लोग आज शांत हैं। अगर वे आक्रोशित हो गए तो वे उसका सिंहासन जला देंगे।’

उद्धव ने भाजपा पर न केवल वोट और विधायकों को ‘चुराने’ का आरोप लगाया, बल्कि अयोध्या में राम मंदिर के लिए मिले चढ़ावे को भी ‘चुराने’ का आरोप लगाया।

शिवसेना (उबाठा) प्रमुख ने इस सप्ताह की शुरुआत में पश्चिम बंगाल में एसआईआर से जुड़े मामले की तत्काल सुनवाई नहीं करने को लेकर उच्चतम न्यायालय की भी आलोचना की। यह मामला राज्य में उपचुनाव से एक दिन पहले तत्काल सुनवाई के लिए उठाया गया था। अदालत इस मामले पर पांच अक्टूबर को सुनवाई करेगी, जबकि राज्य की दो विधानसभा सीटों पर उपचुनाव छह अक्टूबर को होने हैं।

उद्धव ने दावा किया, ‘यह दिखाता है कि वे सभी संस्थानों को किस तरह नियंत्रित कर रहे हैं।’ राज ठाकरे ने महाराष्ट्र में एसआईआर की प्रक्रिया रद्द करने की मांग करते हुए कहा कि देश में भविष्य के चुनाव मतपत्र के जरिए कराए जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि वे 2017-18 से ही राजनीतिक नेताओं को निर्वाचन निकाय में कथित ‘अनियमितताओं’ के बारे में बताते रहे हैं।

मनसे प्रमुख ने कहा कि उन्होंने ईवीएम और मतदाता सूची के मुद्दे पर तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मुलाकात की थी। उन्होंने दोनों नेताओं से इन मुद्दों के स्पष्ट होने तक चुनाव का बहिष्कार करने का आग्रह भी किया था।

दक्षिण मुंबई के मेट्रो सिनेमा से शुरू हुआ विरोध मार्च कुछ ही दूरी तय कर बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) मुख्यालय पहुंचा। एसआईआर प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं के विरोध में आयोजित इस मार्च में सीईसी ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने या उनके इस्तीफे की मांग की गई।

मार्च में राजनीतिक दलों के झंडे ले जाने की अनुमति नहीं थी। प्रतिभागियों से केवल राष्ट्रीय तिरंगा साथ रखने को कहा गया था। प्रदर्शनकारियों का समर्थन करते हुए कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने कहा कि शहर एक बार फिर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आया है। सभी भारतीयों से एकजुट होने का आह्वान करते हुए दीपके ने कहा, ‘अब या कभी नहीं।’

मतदाताओं का नहीं पार्टियों का प्रदर्शन है

असल में कुछ प्रक्रियागत मामलों में चुनाव आयुक्तों की असहमति थी, जिसे उन्होंने जाहिर किया और आयोग ने उसे ठीक किया। जब इसकी रिपोर्ट मीडिया में आई तो विपक्ष ने इसको अपने लिए अवसर मान कर प्रदर्शन शुरू कर दिया। यह विशुद्ध रूप से एक राजनीतिक आंदोलन है, जो राजनीतिक दलों द्वारा प्रायोजित है और विपक्षी राजनीतिक दलों के फायदे के लिए है। आम मतदाता भी इस बात को समझ रहा है।

महात्मा गांधी की जयंती यानी दो अक्टूबर पर देश के कई हिस्सों में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन हुए। हाल के महीनों में दूसरी बार राजनीतिक दलों और गैर राजनीतिक संगठनों ने सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन किया। दिल्ली से मुंबई तक खूब शोरगुल हुआ। लेकिन जून और जुलाई में दिल्ली के जंतर मंतर पर चले 36 दिन के आंदोलन और गांधी जयंती पर हुए इस आंदोलन में एक बुनियादी अंतर है, जो अलग अलग जगहों पर प्रदर्शनों में दिख भी रहा है। 20 जून से शुरू होकर 25 जुलाई तक जंतर मंतर पर चला आंदोलन पेपर लीक से प्रभावित हुए छात्रों और उनके समर्थन में उतरे एक नए संगठन कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी का था। बाद में लेफ्ट पार्टियों और समाजवादी पार्टी के अलावा शरद पवार की एनसीपी और उद्धव ठाकरे की शिव सेना के नेता भी इसमें शामिल हुए थे। लेकिन बुनियादी रूप से वह आंदोलन प्रभावित छात्रों का था, जिनकी संख्या बहुत बड़ी थी।

गौरतलब है कि 2026 की नीट परीक्षा करीब 24 लाख छात्रों ने दी थी, जो पेपर लीक होने और दोबारा परीक्षा होने से प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुए थे। उसी समय कई और परीक्षाओं में गड़बड़ी की खबरें आई थीं, जिनसे प्रभावितों की संख्या बहुत बड़ी हो गई थी। तभी उस आंदोलन का आयाम बहुत बड़ा हो गया था। हजारों लोग हर दिन प्रदर्शन में शामिल हो रहे थे और लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों लोग हर दिन डिजिटल माध्यम से उस आंदोलन से जुड़ रहे थे। लोगों का एक भावनात्मक लगाव आंदोलन से दिख रहा था। आंदोलन की जगह पर मीडिया और सोशल मीडिया के लोग जब किसी से बात करते थे तो वह प्रभावित परिवार का हिस्सा निकलता था। प्रभावित छात्र या उसके परिजन आंदोलन में शामिल थे इसलिए उसकी तीव्रता बहुत ज्यादा थी। उसमें आक्रोश भी बहुत ज्यादा था।

तभी सरकार ने छात्रों व युवाओं की भावनाओं को समझा और उस हिसाब से कार्रवाई की। सरकार ने दो बड़े मंत्रियों को भेज कर बात कराई, सोनम वांगचुक का अनशन समाप्त कराया और छात्रों की सारी मांगें मान कर आंदोलन खत्म कराया।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए अभी जो आंदोलन हो रहा है वह बुनियादी रूप से छात्रों व युवाओं को आंदोलन से भिन्न है। यह प्रभावित पक्ष का आंदोलन नहीं है। इसमें ऐसे लोग नहीं दिख रहे हैं, जिनके वोट कट गए हैं। याद करें कैसे जंतर मंतर पर आंदोलन के दौरान उन छात्रों की तस्वीरें रखी गई थीं, जिन्होंने पेपर लीक के बाद सुसाइड किया था। उनके परिजनों को आंदोलन में आमंत्रित किया गया था। इस बार का आंदोलन चाहे दिल्ली का जंतर मंतर हो या मुंबई का शिवाजी पार्क कहीं भी प्रभावित लोग नहीं दिखे।

प्रदर्शनकारियों ने ऐसे लोगों को मंच पर नहीं प्रस्तुत किया, जिनका नाम कट गया है। अगर यह आंदोलन मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में नाम काटे जाने के खिलाफ है तो इसमें अनिवार्य रूप से उन लोगों को शामिल होना चाहिए, जिनके नाम कटे हैं। हालांकि यह जरूरी नहीं है कि हर बार प्रभावित पक्ष ही आंदोलन करे। कई बार प्रभावित पक्ष ऐसा करने में सक्षम नहीं होता है तो उसकी लड़ाई सिविल सोसायटी या राजनीतिक दल लड़ते हैं। लेकिन जब प्रभावितों की संख्या करोड़ों में हो और मुद्दा राजनीतिक अधिकार का हो तब निश्चित रूप से प्रभावित लोग इसमें शामिल होते हैं।

मिसाल के तौर पर राजधानी दिल्ली में 47 लाख लोगों के नाम कटे हैं। दिल्ली में एसआईआर से पहले 1.45 करोड़ मतदाता थे, जिनमें से अब 97 लाख ही मतदाता बचे हैं। अगर दिल्ली के साथ एनसीआर मिला लें यानी नोएडा, गाजियाबाद और गुरुग्राम को जोड़ दें तो नाम कटने वालों की संख्या एक करोड़ के करीब पहुंच जाएगी। अगर इनमें से एक फीसदी आदमी भी आंदोलन करने उतरे तो वह संख्या एक लाख होगी। लेकिन दो अक्टूबर को दिल्ली के आंदोलन में 10 हजार लोग नहीं जुटे, जबकि आम आदमी पार्टी और लेफ्ट की तीनों पार्टियों ने भीड़ जुटाने के लिए पूरा जोर लगाया था। लेफ्ट की तीन पार्टियों के छात्र संगठन लगे हुए थे और परदे के पीछे से कांग्रेस के छात्र संगठन के लोग भी जुटे थे। फिर भी भीड़ नहीं जुटी, जबकि जून और जुलाई में हुए आंदोलन में बिना किसी प्रयास के लोग जुट रहे थे।

जाहिर है वोट कटने वाले आंदोलन से आम आदमी का जुड़ाव नहीं बन रहा है। जबकि यह एक राजनीतिक मुद्दा है। यह महंगाई या बेरोजगारी की तरह कोई सार्वभौमिक मुद्दा नहीं है, बल्कि व्यक्ति के राजनीतिक अधिकार से जुड़ा मुद्दा है और व्यापक रूप से वैयक्तिक है। तभी इस मुद्दे को लेकर हो रहे आंदोलन में प्रभावितों को शामिल होना चाहिए था, जो नहीं हो रहे हैं। इसका अर्थ है कि यह कोई वास्तविक मुद्दा नहीं है, बल्कि राजनीतिक दलों द्वारा गढ़ा गया एक मुद्दा है, जिसका मकसद धारणा को प्रभावित करना है।

पहले दिन से यह स्पष्ट दिख रहा है कि एसआईआर के खिलाफ आंदोलन स्वंयस्फूर्त नहीं है, बल्कि राजनीतिक दलों द्वारा प्रायोजित है, जिसका उद्देश्य देश में एक झूठा नैरेटिव स्थापित करना है। राहुल गांधी ने पिछले साल जून में बिहार में एसआईआर शुरू होने के बाद इसके खिलाफ 16 दिन तक यात्रा की थी। उसी समय उनको लग गया था कि इससे जनता का कनेक्ट नहीं है। बाद में नतीजों से यह प्रमाणित भी हुआ। तभी उन्होंने यह मुद्दा छोड़ दिया था। कॉकरोच जनता पार्टी के दिल्ली के सफल आंदोलन के बाद राहुल गांधी को यह चिंता सताने लगी है कि राजनीति में नई शक्तियों का उदय हो रहा है।

जिस तरह से आम आदमी पार्टी ने दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस को रिप्लेस किया और टीवीके ने तमिलनाडु में डीएमके व अन्ना डीएमके दोनों को रिप्लेस किया उस तरह किसी नई शक्ति के उभरने और किसी अन्य राज्य में कांग्रेस को रिप्लेस करने का खतरा भी कांग्रेस को दिख रहा है। इसलिए भी वह ऐसे गढ़े हुए मुद्दों पर आंदोलन कर रही है या उसमें शामिल हो रही है ताकि प्रासंगिकता बनी रहे।

वास्तविकता यह है कि एसआईआर का मुद्दा आम आदमी का मुद्दा है ही नहीं। यह राजनीतिक दलों का मुद्दा है, जो अपनी लगातार हो हार का ठीकरा चुनाव आयोग पर फोड़ना चाहती हैं। विपक्षी पार्टियों की हार राजनीतिक कारणों से है। उनकी संगठनात्मक क्षमता कमजोर होने और नेतृत्व की कमी से उनकी हार हो रही है। लेकिन अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने और खुद को दिलासा देने के लिए वे चुनाव आयोग को निशाना बना रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि एसआईआर की प्रक्रिया में कानूनी और तकनीकी वजहों से कुछ ऐसे लोगों के नाम कटे होंगे, जो वास्तव में मतदाता हैं। लेकिन उनकी संख्या बहुत कम है और उनके पास नाम जुड़वाने के विकल्प हैं। जितनी संख्या में विपक्ष दावा कर रहा है अगर उतनी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम कटे होते तो अब तक देश में क्रांति हो गई होती।

चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर एक अंग्रेजी अखबार की जिस रिपोर्ट के बाद से नए सिरे से आंदोलन शुरू हुए हैं वह रिपोर्ट भी तकनीकी और कानूनी असंगति को ज्यादा दिखाती है। उसमें भी यह कहीं नहीं कहा गया है कि दोनों चुनाव आयुक्त एसआईआऱ के फैसले से सहमत नहीं हैं। एसआईआर का फैसला पूर्ण चुनाव आयोग का संपूर्ण सहमति से किया गया फैसला है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट की भी मुहर है। चुनाव आय़ोग संविधान से मिले अधिकार के तहत ही यह काम कर रहा है। असल में कुछ प्रक्रियागत मामलों में चुनाव आयुक्तों की असहमति थी, जिसे उन्होंने जाहिर किया और आयोग ने उसे ठीक किया। जब इसकी रिपोर्ट मीडिया में आई तो विपक्ष ने इसको अपने लिए अवसर मान कर प्रदर्शन शुरू कर दिया। यह विशुद्ध रूप से एक राजनीतिक आंदोलन है, जो राजनीतिक दलों द्वारा प्रायोजित है और विपक्षी राजनीतिक दलों के फायदे के लिए है। आम मतदाता भी इस बात को समझ रहा है। इसलिए वह इन प्रदर्शनों में शामिल नहीं हो रहा है।  (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)

कांग्रेस को अकेला छोड़ रहे हैं सहयोगी

दो अक्टूबर को महात्मा गांधी की जयंती पर देश के अलग अलग हिस्सो में खूब प्रदर्शन और आंदोलन हुए। दिल्ली से लेकर मुंबई तक हजारों लोग सड़कों पर उतरे। महात्मा गांधी की तस्वीर वाली टीशर्ट पहन कर और तिरंगा हाथ में लेकर लोगों ने प्रदर्शन किया। लेकिन गांधी की विरासत का दावा करने वाली कांग्रेस इससे नदारद रही। कांग्रेस ने अपनी कार्य समिति की बैठक में और उसके अगले दिन विपक्षी गठबंधन की बैठक में यह तय जरूर किया कि दो अक्टूबर से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन होगा, जो आठ अक्टूबर तक चलेगा। लेकिन कांग्रेस ने दो अक्टूबर के लिए कोई निश्चित योजना नहीं बनाई। कांग्रेस ने तय कराया कि छह अक्टूबर को दिल्ली में निर्वाचन सदन का घेराव किया जाएगा। हो सकता है कि छह अक्टूबर को भी भीड़ जुटे और कांग्रेस व दूसरी विपक्षी पार्टियां अपने संसाधनों से आंदोलन को सफल बनाने का प्रयास करें। लेकिन दो अक्टूबर का विरोध प्रदर्शन ज्यादा व्यस्थित और स्वंयस्फूर्त दिख रहा था। कांग्रेस की सहयोगी पार्टियों ने दो अक्टूबर के आंदोलन को कामयाब बनाने में बड़ी भूमिका निभाई।

दिल्ली में आम आदमी पार्टी के नेता जरूर सक्रियता दिखा रहे थे लेकिन मूल रूप से आंदोलन लेफ्ट का था। लेफ्ट की तीनों पार्टियों सीपीआई, सीपीएम और सीपीआई माले के छात्र संगठनों ने आंदोलन की प्लानिंग की थी। एक दिन पहले एक अक्टूबर को जंतर मंतर पर जाकर नेहा बोरा ने वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर डाला। उसके बाद लेफ्ट के छात्र संघों एआईएसएफ, एसएफआई और आईसा ने लोग जुटाए। यह अलग बात है कि आम आदमी पार्टी के सौरव भारद्वाज, संजीव झा आदि सुबह ही जंतर मंतर पहुंच गए और क्रेडिट लेने का प्रयास किया। हो सकता है कि आप के लोग भी जंतर मंतर के आसपास या कनॉट प्लेस में जुटे हों लेकिन मूल रूप से लेफ्ट औऱ सिविल सोसायटी का आंदोलन था। कांग्रेस के छात्र संघ एनएसयूआई के छात्र भी इसमें शामिल थे लेकिन किसी ने उनको क्रेडिट नहीं दिया। इसे सीपीएम महासचिव एमए बेबी की अरविंद केजरीवाल से हुई मुलाकात से भी जोड़ कर देख सकते हैं। आप और लेफ्ट इस समय ज्यादा बॉन्डिंग दिखा रहे हैं।

ऐसे ही मुंबई में कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी ने आंदोलन का ऐलान किया तो उद्धव ठाकरे की पार्टी उसमें शामिल हो गई। शिवाजी पार्क में सीजेपी ने उद्धव की पार्टी की मदद से अच्छी भीड़ जुटा ली। सुबह दिल्ली में आंदोलन शुरू हुआ तो शाम चार बजे से मुंबई में सीजेपी ने प्रदर्शन किया। उसमें शामिल होने के लिए आदित्य़ ठाकरे कुछ फिल्मी कलाकारों के साथ पहुंचे तो बाद में उद्धव ठाकरे भी पहुंचे। बड़ी संख्या में फिल्मी कलाकार भी आंदोलन का हिस्सा बने। ध्यान रहे 30 सितंबर की बैठक में उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस को नसीहत दी थी कि वह एकला चलो का रवैया छोड़े लेकिन दो अक्टूबर को खुद ही कांग्रेस से अलग सीजेपी के आंदोलन में शामिल हो गए। उनका अपना आंदोलन चार अक्टूबर को होना है, जिसकी घोषणा उन्होंने कांग्रेस के साथ मिल कर नहीं की है, बल्कि मनसे के नेता और अपने चचेरे भाई राज ठाकरे के साथ मिल कर की है। यह आंदोलन भी विपक्ष की बैठक में तय हुए प्रदर्शन से अलग है। कांग्रेस ने विपक्ष की बैठक में बनी सहमति के आधार पर कई राज्यों में प्रदर्शन किए लेकिन हर जगह वह अकेले ही दिखी। पटना में महागठबंधन के नाम पर प्रदर्शन हुआ, जिसमें कांग्रेस के सारे बड़े नेता शामिल हुए पर राजद के प्रमुख तेजस्वी यादव नदारद रहे।

मुंबई में जंतर मंतर जैसा प्रदर्शन

मुंबई। कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी ने मुंबई के शिवाजी पार्क को जंतर मंतर में बदल दिया। शुक्रवार, दो अक्टूबर को महात्मा गांधी की जयंती के दिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग लेकर मुंबई के लोग सड़कों पर उतरे। बड़ी संख्या में लोग शिवाजी पार्क में इकट्ठा हुए और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने आंदोलन का नेतृत्व किया। उनके साथ राजनीति और फिल्म जगत की बड़ी हस्तियां भी शामिल हुईं। देर शाम तक प्रदर्शनकारी शिवाजी पार्क में जमा रहे।

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और उनके बेटे आदित्य ठाकरे भी आंदोलन में शामिल हुए। फिल्मी हस्तियों की बात करें तो नसीरूद्दीन शाह से लेकर शबाना आजमी और विशाल ददलानी से लेकर विशाल भारद्वाज तक अनके अभिनेता, गायक, गीतकार, संगीतकार, निर्माता और निर्देशक शिवाजी पार्क पहुंचे और आंदोलन में शामिल हुए। इससे पहले सीजेपी ने ऐलान किया था कि अगर प्रशासन ने प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी तो जेल भरो अभियान चलेगा। हालांकि उसकी नौबत नहीं आई।

सीजेपी के इस प्रदर्शन में बड़ी संख्या में युवा शामिल हुए। वे सोशल मीडिया में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ चल रहे मीम्स के पोस्टर बना कर पहुंचे थे। सब एक सुर में ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे थे। प्रदर्शन के दौरान मंच पर मौजूद सभी लोगों ने महात्मा गांधी की तस्वीर वाली टीशर्ट पहनी थी। गौरतलब है कि इससे पहल सीजेपी ने 20 जून से 25 जुलाई तक दिल्ली में जंतर मंतर पर प्रदर्शन किया था, जो धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ खत्म हुआ था।

बहरहाल, शुक्रवार के प्रदर्शन में अभिजीत दीपके ने कहा, ‘जब भारत के प्रधानमंत्री अमेरिका जाते हैं, तब भी वहां कहा जाता है कि ये गांधी के देश से आए हैं। गांधी देश की आत्मा हैं, आंबेडकर रीढ़ की हड्डी और नेहरू दिमाग हैं’। दीपके ने भाजपा पर हमला करते हुए कहा कि भाजपा ‘एक देश, एक पार्टी’ चाहती है। प्रदर्शन के दौरान सीजेपी ने सरकार के सामने अपनी तीन मांगें रखीं, जिसमें पहली मांग मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की है। इसके बाद जनवरी 2025 की मतदाता सूची बहाल करने और मतदाता सूची में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया को बंद करने की मांग की गई।

सीजेपी के प्रदर्शन में अभिनेत्री शबाना आजमी ने कहा, ‘हमारा वोट हमारा अधिकार है, हमारी आवाज है। जब मतदाता सूची से हमारे नाम हटा दिए जाएं, तो हम क्या करेंगे’? गायक संगीतकार विशाल ददलानी ने प्रदर्शन के दौरान गाना गाया। मशहूर फिल्मकार विशाल भारद्वाज अपनी पत्नी रेखा भारद्वाज के साथ प्रदर्शन में पहुंचे थे। उन्होंने इस दौरान कहा, ‘मैं यहां केवल अपना समर्थन देने आया हूं’। मुंबई में विरोध प्रदर्शन के दौरान सीजेपी के मुख्य प्रवक्ता सौरव दास ने दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई का जिक्र किया और कहा, ‘दिल्ली पुलिस ने फिर से बर्बरता की है, सुधर जाओ वरना हम तुम्हें सुधार देंगे’।