एसआईआर के खिलाफ विपक्षी दलों की याचिका पर चुनाव आयोग को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस

उच्चतम न्यायालय ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के विरुद्ध लोक सभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन के अन्य घटक दलों के नेताओं की ओर से दायर याचिका पर गुरुवार को चुनाव आयोग को नोटिस जारी किये।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने चुनाव आयोग के साथ-साथ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी को नोटिस जारी किये । मुख्य न्यायाधीश ने याचिका पर सुनवाई के दौरान मौखिक रूप से टिप्पणी की, ” हम याचिकाकर्ताओं में से एक से उनके आचरण के बारे में भी पूछेंगे।” गौरतलब है कि 12 अक्टूबर को श्री गांधी, कांग्रेस और विपक्षी दलों के कुछ अन्य विपक्षी नेताओं ने उच्चतम न्यायालय तक एक मार्च निकाला था और उसके वे उच्चतम न्यायालय में याचिका दाखिल करने गये थे। इससे न्यायालय परिसर में भारी भीड़ जमा हो गई और हंगामा के स्थिति बन गयी थी।

याचिकाकर्ताओं में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, ममता तृणमूल कांग्रेस के सौगत राय, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी प्रसाद यादव, शिवसेना (यूबीटी) के संजय राउत, मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के एम ए बेबी, भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के डी. राजा, झारखंड मुक्ति मोर्चा की महुआ माजी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एसपी) की सुप्रिया सुले और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के ईटी. मुहम्मद बशीर शामिल हैं। विदुथलाई चिरुथाइगल काची के अध्यक्ष थोल. थिरुमावलवन और नेशनल कॉन्फ्रेंस के सज्जाद अहमद किचलू भी याचिकाकर्ताओं में शामिल हैं।

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कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल एसआईआर प्रक्रिया का शुरू से ही विरोध कर रहे हैं। उनका आरोप है कि चुनाव आयोग ने भारतीय जनता पार्टी के दबाव में मतदाता सूची में बड़ी संख्या में नाम काट दिये हैं। वे इसको लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे है। न्यायालय ने अल हिंद मुस्लिम इत्तेहाहुल मुसलमीन के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और कांग्रेस के दिग्विजय सिंह ने भी एसआईआर के विरुद्ध न्यायालय में अलग अलग याचिकाएं दायर की हैं।

याचिकाकर्ताओं ने एसआईआर कराने के संबंध में चुनाव आयोग के 24 जून, 2025 के फैसले के रिकॉर्ड को तलब किये जाने और यह तय करने का अनुरोध किया है कि इस प्रक्रिया में नियम कायदे का पालन हुआ है या नहीं । याचिका में यह भी अनुरोध किया गया है कि इस मामले में यह न्यायिक समीक्षा भी की जाए कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 के तहत आयोग की निर्णय प्रक्रिया में सामूहिक दायित्व और दस्तावेजी निर्णय लेने की व्यवस्था का अनुपालन हुआ या नहीं।

याचिकाकर्ताओं ने मतदाता सूची से नाम हटाने तथा मतदाता सूची डेटाबेस का ऑडिट करने के लिए उच्चतम न्यायालय के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक समिति बनाने की भी मांग की है। याचिकाकर्ताओं ने एसआईआर प्रक्रिया के तहत मतदाता सूचियों से हटाए गए नामों और उन्हें हटाने के कारणों की बूथ-वार जानकारी दिये जाने, नाम हटाने से पहले नोटिस और सुनवाई , नाम वापस जोड़ने की व्यवस्था किये जाने, चुनाव वाले राज्यों में पंजीकरण की समय-सीमा बढ़ाये जाने और जब तक यह मामला चल रहा है, तब तक पूरे देश में एसआईआर प्रक्रिया पर रोक लगाने की भी मांग की है।

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Delhi Protest: दिल्ली में CJP प्रदर्शन से पहले वकीलों की हिरासत पर बवाल, SCAORA और SCBA ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत से की ये अपील

सुप्रीम कोर्ट के पास शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने के लिए जुटे वकीलों को हिरासत में लिए जाने की खबर ने न्यायिक व्यवस्था और विरोध-प्रदर्शन की आजादी को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस मामले में लॉयर एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन (LAFC) ने भी चिंता जताई है। एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA), सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन (SCAORA) और बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन के साथ मिलकर शनिवार (10 अक्टूबर) को दिल्ली में पुलिस की कार्रवाई और प्रदर्शन पर लगाई गई पाबंदियों पर चिंता जताई है।

CJI सूर्यकांत से दखल देने की अपील

10 अक्टूबर को जारी एक प्रेस रिलीज में LAFC ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत से इस मामले में तुरंत दखल देने की अपील की है। एसोसिएशन ने कहा कि हिरासत में लिए गए वकीलों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, उन्हें कानूनी मदद दी जाए और जिन वकीलों को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में लिया गया है, उन्हें तुरंत रिहा किया जाए।

एसोसिएशन ने कहा, “शांतिपूर्ण विरोध का जवाब ताकत, गोपनीयता या अंधाधुंध हिरासत से नहीं दिया जा सकता।” साथ ही, एसोसिएशन ने कानून के मुताबिक जवाबदेही तय करने की भी मांग की।

इसके साथ ही LAFC ने हिरासत में लिए गए हर वकील के नाम, उनके ठिकाने, सुरक्षा और उन्हें हिरासत में लेने के कानूनी आधार की जानकारी मांगी। एसोसिएशन ने उन वकीलों को रिहा करने की मांग की जिन्हें हिरासत में लेने का कोई ठोस और कानूनी आधार नहीं था। इसके अलावा, उन्हें वकील, परिवार के सदस्यों और जरूरी मेडिकल मदद तक पहुंच देने की भी मांग की।

पुलिस कार्रवाई से जुड़े सबूत सुरक्षित रखने की मांग

एसोसिएशन ने विरोध-प्रदर्शन, कथित बल प्रयोग और उसके बाद की हिरासत से जुड़े CCTV फुटेज, बॉडी-कैमरा रिकॉर्डिंग, पुलिस स्टेशन के रिकॉर्ड, हिरासत रजिस्टर और अन्य सबूतों को सुरक्षित रखने की मांग की। एसोसिएशन ने बल प्रयोग की खबरों—खासकर महिला वकीलों के खिलाफ—की एक तय समय-सीमा वाली, स्वतंत्र जांच की भी मांग की, और जहां भी गैर-कानूनी कार्रवाई साबित हो, वहां जवाबदेही तय करने और उचित राहत देने की बात कही।

प्रदर्शन करने पर वकीलों को परेशान न किया जाए

LAFC ने यह भी मांग की है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल होने के कारण किसी वकील के खिलाफ बदले की भावना से FIR दर्ज न की जाए। वकीलों को डराने-धमकाने या उनके पेशेवर काम पर असर डालने वाली कार्रवाई से भी सुरक्षा मिलनी चाहिए।

इसके अलावा, एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट परिसर के आसपास भविष्य में होने वाले शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के लिए स्पष्ट और पारदर्शी नियम बनाने की मांग की है, ताकि प्रदर्शन करने वालों के अधिकारों और सुरक्षा का ध्यान रखा जा सके।

इस बीच, बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन ने भी एक प्रस्ताव पास करके केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा सार्वजनिक विरोध-प्रदर्शनों और लोगों की आवाजाही पर लगाई गई पाबंदियों को तुरंत हटाने की मांग की। एसोसिएशन ने मौजूदा हालात को “अघोषित इमरजेंसी” करार देते हुए कहा कि ये हालात इमरजेंसी के दिनों की याद दिलाते हैं।

प्रस्ताव में कहा गया, “यह तय किया गया है कि केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा सार्वजनिक विरोध-प्रदर्शन पर लगाई गई मौजूदा पाबंदियों को तुरंत हटाया जाए। लोगों की आवाजाही पर लगाई गई सभी पाबंदियां भी फौरन हटाई जाएं, क्योंकि ये मौजूदा सरकार की असंवैधानिक और गैर-कानूनी गतिविधियां हैं।”

एसोसिएशन ने बताया कि यह प्रस्ताव 10 अक्टूबर को हुई एक आपातकालीन बैठक में सर्वसम्मति से पास किया गया। साथ ही, एसोसिएशन ने इस प्रस्ताव की एक कॉपी बॉम्बे बार एसोसिएशन और एडवोकेट्स एसोसिएशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया के अध्यक्षों को भेजने का भी फैसला किया।

सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन (SCAORA) ने भी मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत को पत्र लिखकर वकीलों को हिरासत में लिए जाने का मुद्दा उठाया है। एसोसिएशन ने कहा कि ऐसी खबरें सामने आई हैं कि पुलिस ने वरिष्ठ और युवा वकीलों के साथ-साथ महिला वकीलों को भी हिरासत में लिया। आरोप है कि हिरासत में लेने वाले कुछ पुलिसकर्मियों ने अपनी वर्दी पर बैज भी नहीं लगा रखे थे।

एसोसिएशन ने हिरासत में लिए गए लोगों के ठिकाने का पता बताने, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने और उन्हें वकीलों व परिवार के सदस्यों से मिलने की सुविधा देने की मांग की। साथ ही, यह भी कहा कि अगर हिरासत में रखने का कोई कानूनी आधार नहीं है, तो उन्हें तुरंत रिहा किया जाए।

इसी तरह, SCBA ने भी CJI से अनुरोध किया कि वे अधिकारियों के साथ इस मामले पर बात करें, हिरासत में लिए गए वकीलों का पता लगाएं और हिरासत में लेने की परिस्थितियों व कथित बल प्रयोग की जांच करें। इस प्रस्ताव पर मानद सचिव प्रज्ञा बघेल ने हस्ताक्षर किए।

ये मांगें ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के प्रस्तावित “जंतर-मंतर 2.0” प्रदर्शन के लिए कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच सामने आई हैं। यह प्रदर्शन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग के लिए बुलाया गया है, जिन पर मतदाता सूची में गड़बड़ी और ‘विशेष गहन संशोधन प्रक्रिया’ (Special Intensive Revision process) से जुड़े आरोप हैं।

मेट्रो पर लगी पाबंदियों को लेकर अवमानना ​​याचिका

इसके अलावा, वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) के खिलाफ अवमानना ​​की कार्रवाई की मांग करते हुए याचिका दायर की। उन्होंने आरोप लगाया कि कोर्ट के 9 अक्टूबर के निर्देशों का पालन नहीं किया गया।

10 अक्टूबर को सुबह 8.17 बजे डायरी नंबर 63801/2026 के तहत दायर इस याचिका में केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार और DMRC की चेयरपर्सन डी. थारा को प्रतिवादी बनाया गया है। इसमें संविधान के अनुच्छेद 129 और ‘कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट्स एक्ट, 1971’ की धारा 12 का हवाला दिया गया है।

त्रिपाठी ने आरोप लगाया कि कोर्ट के इस स्पष्टीकरण के बावजूद कि सेवाओं को रेगुलेट किया जा सकता है लेकिन पूरी तरह से रोका नहीं जा सकता, मेट्रो स्टेशन के गेट बंद रखे गए। बता दें कि 9 अक्टूबर को CJI सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने कहा था कि “मेट्रो ट्रेनों की आवाजाही पर पूरी तरह से रोक नहीं लगाई जाएगी” और अधिकारियों को निर्देश दिया था कि वे ट्रांसपोर्ट से जुड़े नियमों का प्रचार करें और चार दिनों के भीतर अनुपालन रिपोर्ट सौंपें।

लगभग 500 लोगों को हिरासत में लिया गया

ANI के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने एहतियाती उपायों के तहत समूहों में आ रहे लगभग 500 लोगों को हिरासत में लिया और आपराधिक बैकग्राउंड वाले करीब 50 लोगों को पकड़ा। बता दें कि नई दिल्ली को 20 जोन में बांटा गया था और स्टेडियमों में डिटेंशन सेंटर बनाए गए थे। पुलिस सूत्रों के अनुसार, कनॉट प्लेस में हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या लगभग 200 थी।

मुंबई से आने के बाद CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके और नेता सौरव दास और आशुतोष रांका को हिरासत में ले लिया गया। पार्टी ने यह भी आरोप लगाया कि उसकी कानूनी टीम की प्रमुख रत्ना सिंह और तीन अन्य वकीलों को बिना कारण बताए हिरासत में ले लिया गया। पार्टी ने गुरुग्राम स्थित आवास से ध्रुव राठी को हिरासत में लिए जाने की भी निंदा की।

सुरक्षा के लिए RAF और CRPF की तैनाती

सुरक्षा व्यवस्था में रैपिड एक्शन फोर्स, दिल्ली पुलिस पिंक फोर्स और CRPF शामिल थे। साथ ही मोहन एस्टेट में ड्रोन, मजबूत बैरिकेड्स और स्पाइक स्ट्रिप्स भी तैनात किए गए थे। इस दौरान CJP ने प्रदर्शन में शामिल होने वाले लोगों के लिए 12-सूत्रीय एडवाइजरी जारी कर हिंसा, तोड़फोड़, आगजनी, नफरत फैलाने वाले भाषण और अफवाहों से बचने, आपातकालीन रास्तों को खाली रखने, कानूनी निर्देशों का पालन करने और हिरासत में लिए जाने पर कानूनी सहायता लेने का आग्रह किया है।

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सीजेपी के प्रदर्शन पर पुलिस की सख्त कार्रवाई, कई नेता हिरासत में

कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे सहित अन्य मांगों में शनिवार को राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर पर पहुंचने की आशंका को देखते हुए दिल्ली पुलिस तथा अन्य सुरक्षा बलों ने कड़ी कार्रवाई करते हुए राष्ट्रीय स्तर के कई नेताओं माकपा के एमए बेबी, तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी, आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल और सैकड़ों की संख्या में प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया।

जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन को देखते हुए पुलिस ने इससे पहले कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रमुख नेताओं अभिजीत दीपके, सौरभ दास और आशुतोष रांका को दिल्ली पहुंचने के बाद इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर हिरासत में लिया गया। दिल्ली पुलिस ने बार्डर सहित कई इलाकों में पहरा सख्त करते हुए कई जगह पर बैरिकेडिंग लगा दी और सुबह से ही यातायात पर कड़ी पाबंदियां लागू कर दी गईं।

वाहनों की आवाजाही को नियंत्रित करने और स्थिति पर निगरानी रखने के लिए प्रमुख चौराहों पुलिस बल तैनात किया गया है। दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने कनॉट प्लेस, मंडी हाउस, जंतर-मंतर, पटेल चौक और मध्य दिल्ली के अन्य हिस्सों में यातायात जाम और रूट डायवर्जन की चेतावनी देते हुए एडवाइजरी जारी की। पुलिस की सख्ती के बावजूद बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी जगह जगह पहुंचे। इनमें मिंटो ब्रिज, दिल्ली रेलवे स्टेशन, प्रभावित चौराहों और मार्गों में अशोक रोड-जंतर-मंतर रोड गोल चक्कर, टॉलस्टॉय मार्ग-जनपथ क्रॉसिंग, जय सिंह रोड-संसद मार्ग क्रॉसिंग, रेल भवन गोल चक्कर, गोल डाकखाना और विंडसर प्लेस शामिल हैं।

पुलिस ने सीजेपी संस्थापक सर्वश्री दीपके, दास और रांका को राष्ट्रीय राजधानी में तब हिरासत में ले लिया जब वे मुंबई से यहां आए हवाई जहाज से उतरने वाले थे। दिल्ली पुलिस ने उनको विमान के भीतर से अपनी हिरासत में ले लिया। इस घटना के बाद पार्टी ने सोशल मीडिया पर बताया कि इन नेताओं के हिरासत में लिए जाने के बाद संगठन प्रभारी अजिंक्य शिंदे शनिवार को जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शन का नेतृत्व करेंगे।

श्री दीपके ने एक पूर्व रिकार्डेड मैसेज से यह जानकारी देते हुए कहा कि शीर्ष नेतृत्व की हिरासत के बावजूद यह प्रदर्शन जारी रहेगा तथा श्री कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को वापस लेने की मांग पर आंदोलन पूरी दृढ़ता से आगे बढ़ाया जाएगा। इस बीच यह भी जानकारी सामने आई कि श्री दीपके की दादी का निधन हो गया। पार्टी ने एक बयान जारी कर कहा कि नेताओं की इस तरह की गई हिरासत कार्यकर्ताओं के हौसलों को नहीं डिगा सकती और यह लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए एक निर्णायक संघर्ष है।

बयान में कहा गया जब राज्य सत्ता लोकतांत्रिक असंतोष को दबाने के लिए बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों का सहारा लेती है, तो लोकतंत्र को बचाने के लिए जनता को स्वयं कमान संभालनी होगी । इसके अलावा खुफिया एजेंसियों के सूत्रों के अनुसार, शनिवार सुबह एक संयुक्त अभियान के तहत दिल्ली और गुरुग्राम पुलिस ने गुरुग्राम के एक आवासीय फ्लैट से चर्चित यूट्यूबर ध्रुव राठी को हिरासत में लेकर अज्ञात स्थान पर भेज दिया है। श्री राठी ऐसे वीडियोज के लिए जाने जाते हैं जिनमें केंद्र सरकार की कठोर आलोचना की जाती है।

इस विरोध प्रदर्शन को रोकने के लिए मध्य दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों में सुरक्षा बलों और पुलिसकर्मियों को भारी संख्या में तैनात किया गया है। निर्धारित प्रदर्शन स्थल के पास एकत्र हुए प्रदर्शनकारियों को पुलिस द्वारा हिरासत में लेकर बसों में भरकर अन्य स्थानों पर ले जाया गया। सुरक्षा उपायों के तहत दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 65 के अंतर्गत बड़े पैमाने पर कार्रवाई करते हुए अब तक हजारों लोगों को हिरासत में लिया जा चुका है। दिल्ली पुलिस ने सीजेपी के इस प्रदर्शन की अनुमति देने से यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि पार्टी द्वारा प्रस्तुत सूचना कोई औपचारिक आवेदन नहीं थी, क्योंकि नियमों के अनुसार जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए कम से कम 10 दिन पहले आवेदन देना अनिवार्य होता है।

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भी सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासन को दिल्ली पुलिस के साथ समन्वय स्थापित करने और राजधानी की ओर प्रदर्शनकारियों के आने को रोकने के लिए एहतियाती कदम उठाने के निर्देश दिए थे। एहतियात के तौर पर अधिकारियों ने दिल्ली के कुछ हिस्सों में इंटरनेट सेवाओं पर पाबंदियां लगाई हैं, बाजारों और मेट्रो स्टेशनों को बंद रखने के आदेश दिए हैं तथा शहर में आने वाली कई ट्रेनों को रद्द कर दिया है। दिल्ली के लोकप्रिय दिल्ली हाट से छात्रों की भीड़ का नेतृत्व करने की कोशिश कर रही वामपंथी छात्र नेता नेहा बोरा को भी “सरफ़रोशी की तमन्ना” कविता गाते हुए देर दोपहर हिरासत में ले लिया गया।

ममता बनर्जी और उनके सांसदों और समर्थकों का एक समूह प्रतिबंध का उल्लंघन करने के कारण हिरासत में लिए जाने से पहले अपने साउथ एवेन्यू स्थित आवास के बाहर तख्तियां लेकर धरने पर बैठा था। ममता बनर्जी ने एक पुलिस वाहन में ले जाए जाते समय संवाददाताओं से कहा देश में क्या चल रहा है, सबको पता है । दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी ने शनिवार को विपक्ष पर अपना हमला तेज करते हुए राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल सहित अन्य नेताओं पर देश में तनाव भड़काने की कोशिश करने का आरोप लगाया। भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन ने कहा कि सरकार उनके द्वारा अशांति भड़काने के प्रयासों से सख्ती से निपटेगी।

उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी नेता बार-बार की चुनावी हार के बाद हताश होकर काम कर रहे हैं और चेतावनी दी कि पार्टी तथा उसके समर्थक उनके इन प्रयासों का विरोध करेंगे। उन्होंने कहा भारत सरकार आपके द्वारा तनाव पैदा करने के लिए किए जा रहे प्रयासों से सख्ती से निपटेगी । कांग्रेस ने सत्तारूढ़ पार्टी और सरकार पर राष्ट्रीय राजधानी को “किले” में तब्दील करने का आरोप लगाया, जिसके तहत पार्टी के महासचिव जयराम रमेश ने ‘एक्स’ पर लिखा राष्ट्रीय राजधानी को एक किले में बदल दिया गया है, जहाँ हर तरफ सशस्त्र सुरक्षाकर्मी तैनात हैं ।कांग्रेस अध्यक्ष एवं राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया है कि सरकार से सवाल करने वालों को हिरासत में लेकर उनकी आवाज दबायी जा रही है और देश को ‘खामोश लोकतंत्र’ में बदला जा रहा है।

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श्री खरगे ने सोशल मीडिया एक्स पर कहा कि युवाओं, छात्रों, वकीलों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, किसान संगठनों के नेताओं, यूट्यूबरों और कंटेंट क्रिएटरों सहित सरकार से सवाल करने वाले सभी लोगों को हिरासत में लिया जा रहा है। उन्होंने कहा “भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की कायरता आज पूरी तरह सामने आ गयी है। हिरासत, गिरफ्तारियां, जेल, लाठियां और पैलेट भी भारत के लोगों को रोक नहीं सकते। स्वतंत्रता संग्राम के समय से ही युवा देश की नियति तय करने में अग्रणी भूमिका निभाते रहे हैं । कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि उनकी पार्टी एकजुट विपक्ष के साथ मिलकर इस तानाशाही शासन के खिलाफ पूरी ताकत से लड़ती रहेगी। भारत की आजादी के लिए खून बहाने वाली कांग्रेस लोकतंत्र, संविधान और प्रत्येक भारतीय के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रखेगी। समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भाजपा सरकार पर निशाना साधते हुये कहा कि जनता की आवाज को ताकत के बल पर दबाने की कोशिश सरकार की बड़ी भूल साबित होगी।

श्री यादव ने ‘एक्स’ पर कहा किसी के रोकने से नहीं रुकेगा, अब दिल्ली में देश जुटेगा । उन्होंने कहा कि देश की युवा ऊर्जा उनके साथ है। भाजपा सरकार अगर यह समझ रही है कि वह ताकत के बल पर जनता को रोक लेगी, तो यह उसकी और भी बड़ी भूल साबित होगी। श्री यादव ने कहा कि ‘जंतर-मंतर’ अब केवल एक जगह का नाम नहीं, बल्कि नई चेतना और जागरण का प्रतीक बन गया है। पुलिस ने सुबह ही जंतर-मंतर पर आयोजित प्रदर्शन में शामिल होने जा रहे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के शीर्ष नेताओं समेत कई नेताओं को हिरासत में ले लिया। हिरासत में लिए गए नेताओं में माकपा महासचिव एमए बेबी, पूर्व मुख्यमंत्री एवं केरलम विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष पिनराई विजयन, केरलम के पूर्व वित्त मंत्री केएन. बालगोपाल, राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास, मणिकंतन वी. गोविंदान, श्रीमती, वृंदा करात, के के शैलजा और पी राजीव शामिल हैं।

श्रीमती करात ने फेसबुक पेज पर लिखा मोदी और उनकी सरकार को यह समझ लेना चाहिए कि भारत के लोग उठ खड़े हुए हैं और वे उन्हें रोक नहीं सकते। दिल्ली का दिल उसके सभी लोगों का है। ये दबाने वाले तरीके हमें नहीं रोक पाएंगे! चलो जंतर-मंतर की ओर!”

केरलम भवन से बाहर निकलते ही पुलिस ने वामपंथी नेताओं को जंतर-मंतर की ओर मार्च करने से रोक दिया और उन्हें हिरासत में ले लिया। शुरुआत में पुलिस ने श्री विजयन, श्री ब्रिटास और श्री केएन बालगोपाल को छोड़कर अन्य नेताओं को हिरासत में लिया था लेकिन जब ये तीनों नेता जंतर-मंतर की ओर बढ़ने लगे तो पुलिस के साथ उनकी तीखी बहस हुई और पुलिस ने उन्हें भी हिरासत में ले लिया। हिरासत में लिए जाने के दौरान मीडिया से बात करते हुए श्री विजयन ने इस कार्रवाई को ‘लोकतंत्र की हत्या’ करार दिया। उन्होंने कहा कि नागरिकों से उनकी सरकार चुनने का अधिकार छीना जा रहा है और 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि यह काम मुख्य चुनाव आयुक्त ने सरकार के इशारे पर किया है और सरकार अब उन्हें बचाने के लिए गैर-कानूनी तरीके अपना रही है लेकिन यह विरोध आज खत्म नहीं होगा। श्री विजयन ने कहा कि भारत देश कोई पुलिस राज्य नहीं, बल्कि एक लोकतांत्रिक देश है और सत्ताधारी दल के मन में लोकतंत्र के प्रति कोई सम्मान न होने के कारण ऐसी कार्रवाई की जा रही है।

वहीं, सांसद जॉन ब्रिटास ने स्पष्ट किया कि वे किसी भी दबाव के आगे नहीं झुकेंगे। इसी बीच, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट क्षेत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान वकीलों के खिलाफ बल प्रयोग किए जाने और उनकी हिरासत की खबरों पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। एसोसिएशन ने विशेष रूप से महिला अधिवक्ताओं सहित वरिष्ठ और युवा वकीलों की कथित हिरासत का मुद्दा उठाया है। उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को दिए गए एक ज्ञापन में एसोसिएशन ने हस्तक्षेप की मांग करते हुए हिरासत में लिए गए वकीलों की सुरक्षा और उनके ठिकाने का पता लगाने का आग्रह किया है। इसके साथ ही, बिना किसी कानूनी आधार के रोके गए वकीलों को तत्काल कानूनी सहायता प्रदान करने, उनकी रिहाई सुनिश्चित करने और पूरी घटना की निष्पक्ष जांच के बाद उचित कानूनी कार्रवाई करने की मांग की गई है।

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने जा रहे आम आदमी पार्टी (आप) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल समेत पार्टी के कई नेताओं को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया है। हिरासत में लिए गए नेताओं में आप के राज्यसभा सांसद संजय सिंह, दिल्ली के पूर्व मंत्री सौरभ भारद्वाज और विधायक दुर्गेश पाठक भी शामिल हैं।आप विधायक कुलदीप कुमार ने आज दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि अरविंद केजरीवाल और आप सांसद संजय सिंह को पुलिस मोदी सरकार के आदेश पर हिरासत में लेकर जा रही है। उन्होंने कहा कि पार्टी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन करने पहुंच रही थी और इसी दौरान पुलिस ने नेताओं को हिरासत में लिया।

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आदेश और अंतरात्मा के बीच खड़ी वर्दी !

सुधार किसी एक प्रदर्शन की जीत-हार से नहीं निकलेगा। बल प्रयोग की हर घटना की वीडियो, समय और आदेश-श्रृंखला सार्वजनिक होनी चाहिए। निषेधाज्ञा लिखित हो और बाद में आनुपातिकता की स्वतंत्र जाँच हो। चिह्नित स्थलों पर पूर्व सूचना और यातायात व्यवस्था को अनुमति के पूर्ण निषेध से अलग रखा जाए। प्रदर्शनकारियों के लिए भी सीमा साफ है।

लोकतंत्र केवल मतपेटी में बंद मतों का नाम नहीं है। वह उस सांस का भी नाम है, जिसमें नागरिक अपनी नाराजगी शांतिपूर्वक सड़क पर रख सके। भारत के संविधान ने यह सांस अनुच्छेद 19(1)(क) और 19(1)(ख) में दी है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बिना हथियार के शांतिपूर्वक एकत्र होने का अधिकार और सीमा भी उसी अनुच्छेद में है। अनुच्छेद 19(2) और 19(3) संप्रभुता, अखंडता और सार्वजनिक व्यवस्था के हित में युक्तियुक्त निर्बंधन की अनुमति देते हैं। यहीं से पुलिस का कठिन कर्तव्य शुरू होता है। उसे न विरोध को कुचलना है, न अव्यवस्था को खुली छूट देनी है।

यह द्वंद्व किसी एक आंदोलन की संपत्ति नहीं है। परीक्षा-पत्र लीक से निकले युवा मार्च हों, किसान कानूनों के खिलाफ घेराव हो, नागरिकता कानून पर धरना हो, या चुनावी सूची और निर्वाचन आयोग की विश्वसनीयता पर उठे सवाल हों। हर बार सवाल एक ही लौटता है। राज्य विरोध को सुविधा दे रहा है, या केवल उसे नियंत्रित करने के नाम पर संकुचित कर रहा है। अक्टूबर 2026 का दिल्ली दृश्य इसी प्रश्न की ताजा तस्वीर है।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर विपक्षी गठबंधन के सांसद जंतर-मंतर की ओर बढ़े, तो लुटियंस दिल्ली बैरिकेड, आरएएफ और केंद्रीय बलों की छावनी बन गई। बसें रोक दी गईं, रास्ते सील कर दिए गए। उसी बीच, पेपर लीक मुद्दे पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा लेने वाली कॉकरोच जनता पार्टी ने 10 अक्टूबर के जंतर-मंतर प्रदर्शन की औपचारिक सूचना संसद मार्ग थाने में दी। पिछली बार के धरने से सबक लेते हुए इस बार दिल्ली पुलिस ने अनुमति नामंजूर कर दी।

तर्क यह था कि निर्धारित स्थल पर भी बैठक या धरने के लिए आवेदन कम से कम दस दिन पहले देना होता है, और भीड़ के आकार के अनुसार स्थल जंतर-मंतर, रामलीला मैदान या बुराड़ी तय होते हैं। आयोजकों का जवाब सीधा था। जंतर-मंतर ऐतिहासिक और चिह्नित विरोध-स्थल है। पुलिस का काम सुरक्षा, व्यवस्था और यातायात है, अनुमति देकर नागरिक के अधिकार का फैसला करना नहीं।

कानून इस बहस में खाली नहीं है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की वे धाराएँ, जो पहले दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 129 से 132 थीं, कार्यपालक मजिस्ट्रेट या थाना प्रभारी को गैरकानूनी जमाव को तितर-बितर करने का आदेश देती हैं। बल तभी है जब आदेश न माना जाए, और तब भी जितना कम बल और जितनी कम क्षति हो, उतना ही। धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लगाई जा सकती है, पर सर्वोच्च न्यायालय अनुराधा भसीन मामले में कह चुका है कि ऐसा आदेश वास्तविक आपात पर टिका हो, तथ्यों को दर्ज करे और आनुपातिकता की कसौटी पर खरा उतरे।

हिम्मत लाल शाह (1973) में सार्वजनिक सड़कों पर बैठकों का पूर्ण निषेध नकारा गया। रामलीला मैदान (2012) में प्रक्रियात्मक सुरक्षा को औपचारिकता नहीं माना गया। अमित साहनी, यानी शाहीन बाग (2020), में शांतिपूर्ण विरोध को माना गया, पर सार्वजनिक मार्ग के अनिश्चितकालीन कब्जे को नहीं। मार्च 2025 में न्यायालय ने कहा कि पुलिस अनुच्छेद 12 के अर्थ में राज्य का अंग है, इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा उसका संवैधानिक दायित्व है। जुलाई 2026 में, नीट व अन्य पेपर लीक पर ‘चलो संसद’ मार्च के बाद, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने मौखिक रूप से रेखांकित किया कि शांतिपूर्ण विरोध गारंटीकृत है और केवल आंदोलन होने से लाठीचार्ज जायज नहीं हो जाता।

जुलाई का वह मार्च याद दिलाने लायक है, क्योंकि वहाँ बल की सीमा ही विवाद बनी। पुलिस का पक्ष था कि मार्च मना था, भीड़ ने बैरिकेड तोड़े और पथराव किया, बल अंतिम उपाय था और इस प्रदर्शन में सौ से अधिक सुरक्षाकर्मी घायल हुए। प्रदर्शनकारियों, अस्पताल रिकॉर्ड और बाद की रिपोर्टों ने लाठी, आँसू गैस और पेलेट गन के इस्तेमाल की बात कही। न्यायालय ने नाबालिगों की रिहाई के आदेश दिए और स्वतंत्र जाँच का पैनल बनाया। वहीं दिल्ली पुलिस ने अपने आचरण को कानूनी और पेशेवर बताया। दोनों बयान अब भी अधूरे हैं। यही अधूरापन हर बड़े प्रदर्शन के बाद दोहराया जाता है।

इसी ढाँचे में वर्दी की नैतिक स्थिति समझी जा सकती है। धरने प्रदर्शन का सामना कर रहा पुलिस का सिपाही अक्सर उसी वर्ग से आता है जिससे प्रदर्शनकारी। वह परीक्षा की अनियमितता, बेरोजगारी, फसल के दाम या मतदाता सूची के संदेह को व्यक्तिगत रूप से समझ सकता है। पर उसके साथ ही वह वर्दी में वह राजनीतिक कार्यपालिका के आदेश का सेवक है। संविधान की सातवीं अनुसूची में पुलिस और सार्वजनिक व्यवस्था राज्य सूची के विषय हैं। दिल्ली में यह नियंत्रण केन्द्र के गृह मंत्रालय से जुड़ा है। स्थानांतरण, पदोन्नति और विभागीय जाँच उसी सत्ता के हाथ में हैं, जिसकी नीतियों के खिलाफ भीड़ खड़ी होती है।

परिणाम यह होता है कि ‘न्यूनतम बल’ का सिद्धांत असल में मौके पर ‘आदेश का पालन’ में सिकुड़ जाता है। यह भी सच है कि जब भीड़ पथराव करती है, वाहन क्षतिग्रस्त करती है या सुरक्षाकर्मियों पर हमला होता है, तब संयम बरतने वाले अधिकारी को बाद में ढिलाई का आरोप झेलना पड़ता है। पुलिस न पूरी तरह दमन का औजार है, न भीड़ का स्वयंसेवक। वह बीच की संस्था है। उसकी निष्पक्षता तभी बचती है जब राजनीतिक आका ऐसा कोई आदेश दें, पर कानून सीमा बाँधे।

इसलिए सुधार किसी एक प्रदर्शन की जीत-हार से नहीं निकलेगा। बल प्रयोग की हर घटना की वीडियो, समय और आदेश-श्रृंखला सार्वजनिक होनी चाहिए। निषेधाज्ञा लिखित हो और बाद में आनुपातिकता की स्वतंत्र जाँच हो। चिह्नित स्थलों पर पूर्व सूचना और यातायात व्यवस्था को अनुमति के पूर्ण निषेध से अलग रखा जाए। प्रदर्शनकारियों के लिए भी सीमा साफ है। बिना हथियार, बिना मार्ग के अनंत कब्जे, और बिना हिंसा के। लोकतंत्र में पुलिस संविधान का अभिकर्ता है। जब वह राजनीतिक इच्छा और नागरिक के नैतिक दावे के बीच कानून को चुनती है, तभी विरोध सड़क की गरमी बना रहता है, राजधानी का घेरा नहीं।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का छत्तीसगढ़ प्रवास स्थगित

मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार का बुधवार और गुरुवार को प्रस्तावित दो दिवसीय छत्तीसगढ़ प्रवास स्थगित कर दिया गया है।

चुनाव आयोग ने अपरिहार्य कारणों से मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ आयोग के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों का निर्धारित कार्यक्रम फिलहाल स्थगित किया है। संशोधित कार्यक्रम की तारीख बाद में घोषित की जाएगी। छत्तीसगढ़ के मुख्य चुनाव पदाधिकारी कार्यालय ने छह अक्टूबर को संबंधित अधिकारियों को पत्र भेजकर कार्यक्रम स्थगित होने की सूचना दी, जिसकी जानकारी आज सुबह दी गई। 

श्री कुमार के प्रस्तावित प्रवास को देखते हुए उन्हें राज्य अतिथि का दर्जा दिया गया था। उनके आगमन के मद्देनजर सुरक्षा, आवागमन और अन्य प्रोटोकॉल व्यवस्थाओं को लेकर प्रशासनिक स्तर पर तैयारियां भी की जा रही थीं। प्रस्तावित प्रवास के दौरान चुनाव संबंधी तैयारियों सहित विभिन्न विषयों पर अधिकारियों के साथ बैठक और समीक्षा की संभावना थी। चुनाव आयोग से संशोधित कार्यक्रम प्राप्त होने के बाद नई तारीख की जानकारी संबंधित विभागों को अलग से दी जाएगी।

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फिलहाल सात और आठ अक्टूबर का निर्धारित प्रवास स्थगित है। इस बीच, श्री कुमार से संबंधित एक याचिका की सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय में मतदाता पंजीकरण से जुड़े फॉर्म 6 में कथित बदलाव का विषय भी उठा। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसने फॉर्म 6 में किए गए किसी बदलाव को मंजूरी नहीं दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान कहा, “हम भी होमवर्क करते हैं। 

हमें भी मामले की जानकारी है। श्री कुमार को निलंबित करने की मांग पर न्यायालय ने तत्काल कोई आदेश देने से इनकार करते हुए कहाहम याचिका पर नोटिस जारी कर रहे हैं। याचिका का आधार न्यूज रिपोर्ट है, वह शत प्रतिशत सही, आंशिक रूप से सही या गलत भी हो सकती है। हम उसके आधार पर कोई आदेश नहीं दे सकते हैं।” न्यायालय ने याचिका में उठाए गए मुद्दों पर चुनाव आयोग से जवाब मांगा है।

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सुप्रीम कोर्ट का सवाल, क्या अब नए खेल कानून के दायरे में आएंगे बीसीसीआई और राज्य क्रिकेट संघ?

सुप्रीम कोर्ट का सवाल, क्या अब नए खेल कानून के दायरे में आएंगे बीसीसीआई और राज्य क्रिकेट संघ?

Supreme Court questions BCCI

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) और देश के सभी राज्य क्रिकेट संघों को एक बड़ा नोटिस जारी किया है। अदालत ने पूछा है कि क्यों न बीसीसीआई और उससे जुड़े तमाम राज्य संघों को नए 'राष्ट्रीय खेल शासन अधिनियम, 2025' के दायरे में लाया जाए। ALSO READ: उज्‍जैन के खड़े हनुमानजी के सामने सारी तकनीकें ध्‍वस्‍त, अब IIT इंदौर बताएगा क्‍या है वजह, कैसे विस्‍थापित होगी प्रतिमा?

शीर्ष अदालत ने बोर्ड के पदाधिकारियों के कार्यकाल और सेवा शर्तों को भी इस कानून के अंतर्गत शामिल करने को लेकर जवाब तलब किया गया है।

 

पीठ ने उठाया अहम सवाल

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं, ने मंगलवार को इस मामले की सुनवाई के दौरान यह निर्देश दिया। अदालत ने बीसीसीआई के वकीलों से स्पष्ट रूप से निर्देश लेकर यह बताने को कहा है कि खेल प्रशासन से जुड़े इस नए कानून के प्रावधान क्रिकेट बोर्ड पर क्यों न लागू किए जाएं।

 

2014 से लंबित है मामला

बीसीसीआई में सुधार और उसके कामकाज को लेकर यह कानूनी लड़ाई साल 2014 से सुप्रीम कोर्ट में चल रही है। इससे पहले इस मामले में सुधारों की रूपरेखा तैयार करने के लिए पूर्व मुख्य न्यायाधीश आर.एम. लोढ़ा की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया था, जिसकी कई सिफारिशों को अदालत पहले ही मंजूरी दे चुकी है।ALSO READ: डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों से क्यों नाराज हैं भारतीय-अमेरिकी? मिडटर्म इलेक्शन पर दिखेगा असर

क्या है राष्ट्रीय खेल शासन अधिनियम 2025?

राष्ट्रीय खेल शासन अधिनियम, 2025 (National Sports Governance Act, 2025) भारत की संसद द्वारा पारित एक प्रमुख कानून है। इसका उद्देश्य देश में खेल निकायों के कामकाज में पारदर्शिता, जवाबदेही और नैतिक आचरण को बढ़ावा देना तथा खेल प्रशासन में सुधार करना है। यह कानून भारतीय खेल प्रशासन को अंतरराष्ट्रीय मानकों (जैसे ओलंपिक और पैरालंपिक चार्टर) के अनुरूप बनाने के लिए लाया गया है।

 

बीसीसीआई इसमें शामिल क्यों नहीं है?

बीसीसीआई दुनिया के सबसे अमीर क्रिकेट बोर्डों में से एक है। यह अपने खर्चों और संचालन के लिए पूरी तरह आत्मनिर्भर है और सरकार से कोई आर्थिक मदद नहीं लेता। वर्ष 2014 से सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मामलों और पूर्व मुख्य न्यायाधीश आर.एम. लोढ़ा समिति की सिफारिशों के आधार पर बीसीसीआई का अपना एक अलग प्रशासनिक ढांचा और संविधान तैयार किया गया है। पारंपरिक तौर पर बीसीसीआई को सीधे तौर पर अन्य ओलंपिक खेलों की तरह एक आम राष्ट्रीय खेल महासंघ के रूप में नहीं देखा जाता रहा है। इस वजह से यह राष्ट्रीय खेल शासन अधिनियम के दायरे में नहीं आता।

अब इस ताजा कानूनी कदम के बाद यह तय होने की उम्मीद है कि क्या बीसीसीआई भी अन्य राष्ट्रीय खेल महासंघों की तरह नए खेल शासन अधिनियम के प्रशासनिक दायरे में आएगा या नहीं।

CJP Protest Marc h: 5 सितंबर के दिल्ली मार्च पर SC ने क्यों नहीं लगाई रोक? जानिए सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा

CJP Protest Marc h: 5 सितंबर के दिल्ली मार्च पर SC ने क्यों नहीं लगाई रोक? जानिए सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा

Supreme Court Jantar Mantar Protest

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को Cockroach Janata Party (CJP) की ओर से 5 सितंबर को दिल्ली में प्रस्तावित विरोध मार्च पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका पर तत्काल प्रतिबंध लगाने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि उसे उम्मीद है कि सभी पक्ष शांतिपूर्ण और कानून के मुताबिक व्यवहार करेंगे तथा कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी संबंधित एजेंसियों की होगी।

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मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा वी. मोहना की पीठ ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि पुलिस द्वारा NEET प्रदर्शन के दौरान कथित हिंसा की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित High Powered Enquiry Committee के समक्ष भी अपनी याचिका प्रस्तुत करें। पीठ ने मामले में नोटिस जारी करते हुए कहा कि इसे लंबित याचिकाओं के साथ सूचीबद्ध किया जाए और 10 सितंबर को सुनवाई की जाए।

 

कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी एजेंसियों की

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रदर्शनकारियों से कानून-व्यवस्था बनाए रखने और शांतिपूर्ण तरीके से व्यवहार करने की उम्मीद है। वहीं, कानून लागू कराने वाली एजेंसियों की जिम्मेदारी है कि वे तय करें कि क्या कानूनी है और क्या प्रतिबंधित है। अदालत ने कहा कि दोनों पक्षों से अपेक्षा है कि वे कानून का सम्मान करें, अपने आचरण में संयम रखें और देश के कानून का पालन करें।

 

5 सितंबर को दिल्ली में मार्च निकालने की तैयारी

CJP ने 5 सितंबर को दिल्ली में विरोध मार्च का आह्वान किया है। पार्टी का आरोप है कि केंद्र सरकार ने परीक्षा में कथित अनियमितताओं के खिलाफ चलाए गए 36 दिन के आंदोलन को समाप्त कराने के लिए 25 जुलाई को किए गए वादों को पूरा नहीं किया। CJP के मुताबिक प्रस्तावित मार्च इंडिया गेट से दिल्ली पुलिस मुख्यालय तक निकाला जाना है। हालांकि, दिल्ली पुलिस ने पहले कहा था कि उसे इस तरह के किसी जुलूस के आयोजन के लिए अभी तक कोई अनुरोध प्राप्त नहीं हुआ है।

 

याचिका में सुरक्षा-संवेदनशील इलाकों में मार्च पर रोक की मांग

सेवानिवृत्त दिल्ली पुलिस अधिकारी राजेंद्र सिंह की ओर से दायर याचिका में मांग की गई है कि इंडिया गेट, सेंट्रल विस्टा और आसपास के इलाकों जैसे सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील संवैधानिक क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर जुटान, मार्च या संगठित प्रदर्शन की अनुमति तभी दी जाए, जब आयोजकों ने आवश्यक अनुमति हासिल कर ली हो। याचिका में लुटियंस दिल्ली में प्रस्तावित किसी भी बड़े प्रदर्शन को नियंत्रित करने, टालने या उसके स्वरूप में बदलाव करने की मांग भी की गई है। याचिकाकर्ता ने यह व्यवस्था 12-13 सितंबर को प्रस्तावित BRICS Summit के समाप्त होने तक लागू रखने की मांग की है।

 

इसके अलावा याचिका में कहा गया है कि कोई भी मार्च या जुलूस निर्धारित और अधिकृत सीमा से आगे न बढ़े तथा संबंधित क्षेत्र में लागू कानूनी अनुमति और नियामक व्यवस्था का पालन किया जाए।

 

Teachers' Day पर होगा प्रस्तावित मार्च

CJP का प्रस्तावित मार्च Teachers' Day यानी 5 सितंबर को आयोजित किया जाना है। खबर के मुताबिक इसमें उन छात्रों के परिवारों के शामिल होने की बात कही गई है, जिन्होंने इस साल NEET परीक्षा रद्द होने और उसके बाद दोबारा परीक्षा कराए जाने के घटनाक्रम के बाद कथित तौर पर आत्महत्या की थी। इसके अलावा जुलाई के आंदोलन के दौरान कथित पुलिस ज्यादती का सामना करने वाले छात्रों के परिवारों के भी मार्च में शामिल होने की बात कही गई है।

‘8 अरब लोगों के लिए लैपटॉप खरीदने लायक काला धन मौजूद’, ग्लोबल मनी लॉन्ड्रिंग पर बोले CJI सूर्यकांत

CJI Surya Kant: भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने दुनिया भर में हो रही मनी लॉन्ड्रिंग के बड़े पैमाने पर प्रकाश डाला है। उन्होंने कहा कि एक साल में दुनिया भर में अवैध तरीके से घुमाया जाने वाला पैसा इतना हो सकता है कि उससे दुनिया के 8 अरब लोगों में से हर एक के लिए एक साधारण लैपटॉप खरीदा जा सके। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि उस पैसे का एक प्रतिशत से भी कम हिस्सा कभी वापस मिल पाता है।

शनिवार को कैम्ब्रिज में ‘इकोनॉमिक क्राइम’ पर 43वें इंटरनेशनल सिम्पोजियम के समापन सत्र में बोलते हुए, जस्टिस कांत ने आपराधिक गतिविधियों से कमाए गए पैसे का पता लगाने, उसे जब्त करने और उसे वापस पाने पर वैश्विक स्तर पर ज्यादा ध्यान देने का आह्वान किया।

न्यूज एजेंसी PTI की रिपोर्ट के मुताबिक, CJI ने ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे धोखाधड़ी वाले मामलों का जिक्र करते हुए कहा कि भारतीय न्यायपालिका ने संसद के कदम उठाने का इंतजार करने के बजाय, ऐसे नए तरह के अपराधों पर तेजी से प्रतिक्रिया दी है।

‘100 में से एक से भी कम’ पैसा हो पाता है बरामद

जस्टिस कांत ने कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग का दायरा इतना बड़ा है कि वैश्विक अनुमानों के आधार पर भी उसे समझना मुश्किल है। उन्होंने कहा, “अगर मनी लॉन्ड्रिंग के वैश्विक अनुमान मोटे तौर पर भी सही हैं, तो दुनिया एक साल में इतना पैसा लॉन्डर करती है कि उससे आज धरती पर मौजूद सभी 8 अरब लोगों के लिए एक साधारण लैपटॉप खरीदा जा सकता है, और फिर भी खजाने में कुछ पैसे बच जाएंगे।”

इसके बाद उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अवैध तरीके से कमाए गए धन का बहुत छोटा हिस्सा ही आखिरकार वापस मिल पाता है।

जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, “अवैध धन की इस विशाल रकम में से सबसे उदार अनुमान के मुताबिक भी 100 में से एक फीसदी से कम ही कभी वापस हासिल किया जाता है।”

उन्होंने कहा, “हर 100 हिस्सों में से 99 हिस्सों का जिक्र सिर्फ भाषणों और रिपोर्टों में होता है, जबकि वास्तव में सिर्फ एक हिस्से को ही वापस हासिल किया जा पाता है।”

उन्होंने कहा कि आर्थिक अपराध के खिलाफ लड़ाई को सिर्फ समस्या पहचानने तक सीमित नहीं रखना चाहिए। अब ध्यान अपराध से कमाए गए पैसे का पता लगाने और उसे वापस हासिल करने पर होना चाहिए।

पुराने जमाने की धोखाधड़ी से लेकर डिजिटल अरेस्ट तक

CJI ने कहा कि आर्थिक अपराध कोई नई बात नहीं है, बल्कि यह एक पुरानी बुराई है जो टेक्नोलॉजी और फाइनेंशियल सिस्टम में बदलाव के साथ बदलती रही है।

उन्होंने चौथी सदी ईसा पूर्व के एक यूनानी व्यापारी हेगेस्ट्रेटोस का उदाहरण दिया, जिसने कथित तौर पर इंश्योरेंस का क्लेम पाने के लिए अपना माल बेचने के बाद अपना जहाज डुबोने की योजना बनाई थी। जस्टिस कांत ने इस मामले को आर्थिक धोखाधड़ी का शुरुआती उदाहरण बताया।

उन्होंने कौटिल्य के अर्थशास्त्र का भी जिक्र किया, जिसमें उन 40 तरीकों की पहचान की गई थी जिनसे अधिकारी सरकारी राजस्व का गबन कर सकते थे। इस ग्रंथ में ऑडिट, मुखबिर, क्रॉस-वेरिफिकेशन और जब्ती जैसे उपाय भी बताए गए थे।

CJI ने कहा, “अर्थशास्त्र में बताए गए चोरी के 40 तरीकों के साथ-साथ अब पता लगाने, फ्रीज करने और वापस पाने के चालीस बेहतर तरीकों को भी शामिल किया जाए।”

भारत का कानूनी ढांचा

जस्टिस कांत ने आर्थिक अपराधों से निपटने के लिए भारत के कानूनी ढांचे का जिक्र किया, जिसमें ‘प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट, 2002’ और ‘फ्यूजिटिव इकोनॉमिक ऑफेंडर्स एक्ट, 2018’ शामिल हैं।

उन्होंने अपराध से मिली कमाई का पता लगाने, उसे जब्त करने और अपने कब्जे में लेने के लिए इस्तेमाल होने वाले संस्थागत सिस्टम के तहत खास एजेंसियों और स्पेशल कोर्ट का भी जिक्र किया।

CJI ने इस बात पर जोर दिया कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग तेजी से जरूरी होता जा रहा है क्योंकि गैर-कानूनी पैसा आसानी से सीमाओं के पार जा सकता है।

उन्होंने कहा, “दूसरे देशों के साथ ‘म्यूचुअल लीगल असिस्टेंस ट्रीटी’ (आपसी कानूनी सहायता समझौते) – भले ही उनका सिस्टम और तौर-तरीके कितने भी अधूरे क्यों न हों – प्रत्यर्पण (extradition) की तुलना में बरामद संपत्ति को कहीं ज्यादा भरोसेमंद तरीके से वापस लाते हैं। आखिरकार, गैर-कानूनी दौलत शायद ही कभी उस जगह रहती है जहां से उसे चुराया गया था।”

उन्होंने गैर-कानूनी फंड का पता लगाने के लिए फाइनेंशियल इंटेलिजेंस शेयरिंग और ‘बेनिफिशियल ओनरशिप रजिस्ट्री’ जैसे टूल्स पर भी जोर दिया, जिन्हें एक साथ मिलकर काम करने की जरूरत है।

चोरी हुई संपत्ति वापस पाने पर ध्यान दें

जस्टिस कांत ने कहा कि कानून को सख्ती से लागू करने का काम कानून के दायरे में ही होना चाहिए। उन्होंने ‘डिजिटल अरेस्ट’ स्कैम का भी जिक्र किया, जिसमें धोखेबाज सरकारी या कानून लागू करने वाले अधिकारियों का रूप धारण कर लोगों से पैसे ऐंठते हैं।

उन्होंने कहा कि आर्थिक अपराधों के खिलाफ कोशिशों की कामयाबी को इस आधार पर नहीं मापा जाना चाहिए कि समस्या का वर्णन कितनी अच्छी तरह किया गया है, बल्कि इस आधार पर मापा जाना चाहिए कि चोरी हुई संपत्ति का पता लगाने, उसे फ्रीज करने और वापस लाने में कितनी कामयाबी मिली है।

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