सरकार को चैन नहीं लेने देगी कांग्रेस

ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस पार्टी ने फैसला कर लिया है कि वह सरकार को चैन नहीं लेने देगी। इसके लिए उसने तय किया है कि वह सरकार के हर फैसले को संदिग्ध बना देगी और हर कदम पर उससे सवाल करेगी। इसका पता नहीं कितना राजनीतिक लाभ मिलेगा लेकिन यह जरूर है कि भाजपा और सरकार के तंत्र को जवाब देने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर और पहले से चल रहे विवादों को छोड़ दें तो हाल के दो मामले ऐसे हैं, जिनमें ऊपरी तौर पर कोई गड़बड़ी नहीं दिख रही है लेकिन कांग्रेस ने इसे मुद्दा बना दिया और ऐसा विवाद खड़ा किया कि सरकार बैकफुट पर आ गई है।

पहला मामला अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो के भारत दौरे से जुड़ा है। विदेश मंत्री एस जयशंकर और रूबियो की मुलाकात मुंबई में तय हुई है। इस पर राहुल गांधी ने कहा कि अमेरिका के विदेश मंत्री ने अपने कर्मचारी को मुंबई तलब किया। इस बात को कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी आगे बढ़ाया। अब सोचें, भारत के दौरे पर आ रहे अमेरिका के विदेश मंत्री से अगर भारत के विदेश मंत्री देश के किसी और शहर में मिलेंगे तो यह कहा जाएगा कि उनको वहां तलब किया गया? भारत के विदेश मंत्री को अमेरिकी विदेश मंत्री का कर्मचारी बता कर राहुल कौन सा नैरेटिव सेट कर रहे हैं? लेकिन उन्होंने जानते बूझते ऐसा कर दिया क्योंकि उनको पता है कि सरकार इस पर भी बैकफुट पर आएगी। कई बार ऐसा होता है कि नेता राजधानी से इतर दूसरे शहरों में मिलते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन गए तो राष्ट्रपति शी जिनपिंग से उनकी मुलाकात वुहान में हुई। तो क्या कहा जा सकता है कि मोदी ने जिनपिंग को वुहान तलब किया?

बहरहाल, दूसरा मामला जनगणना के नियमों में बदलाव का है। भारत के महापंजीयक ने अगले साल होने वाली जनगणना में सरकारी कर्मचारियों और शिक्षकों के अलावा निजी स्कूलों के शिक्षकों व कर्मचारियों और वॉलंटियर्स को भी शामिल करने का फैसला किया है। महापंजीयक कार्यालय की ओर से इसका आदेश निकला तो कांग्रेस ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के लोगों के लिए रोजगार योजना है। जबकि यह एक अच्छी पहल है कि वॉलंटियर्स को प्रशिक्षण देकर इस तरह के कामों में लगाया जाए। इससे स्कूलों में शिक्षकों की कमी से होने वाली समस्याएं कम होंगी, स्कूलों में पढ़ाई का काम कम प्रभावित होगा और सरकारी कार्यालयों के कामकाज में आने वाली बाधा भी दूर होगी। इसी तरह की योजना के तहत अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में अपनी सरकार रहते हुए अपने कार्याकर्ताओं को सिविल डिफेंस वॉलंयिटर्स के रूप में भर्ती किए थे। अपने लोगों को बस मार्शल में रखा था और चौराहों पर तख्ती लेकर खड़े होने के लिए भी अपने लोगों को चुना था। अगर यह रोजगार की भी योजना है तो इससे कुछ लोगों को काम मिलेगा।

जनगणना के नए नियम पर विवाद क्यों

छह साल की देरी से हो रही जनगणना के लिए इसके नियमों में संशोधन किया गया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन आने वाले भारत के महापंजीयक कार्यालय ने जनगणना अधिनियम 1948 की धारा 18 की उपधारा एक के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए जनगणना नियम 1990 में कुछ और बदलाव करने के लिए निर्देश जारी किए हैं। इनमें प्रस्तावित बदलावों को लेकर कांग्रेस पार्टी ने आपत्ति दर्ज कराई है। कांग्रेस की आपत्तियों पर बात करने से पहले उन दो बदलावों को रेखांकित करने की आवश्यकता है, जो अपनी प्रकृति में बिल्कुल नई हैं। पहला, महापंजीयक कार्यालय ने पहली बार सरकारी स्कूलों व कार्यालयों के कर्मियों के साथ साथ निजी स्कूलों और ट्रस्टों के कर्मियों को भी जनगणना के काम में शामिल करने का प्रस्ताव किया है और दूसरा, किसी सामान्य नागरिक को भी बतौर वॉलंटियर इसमें शामिल करने का प्रस्ताव है। महापंजीयक कार्यालय की ओर से 16 अक्टूबर को जारी अधिसूचना के मुताबिक, ‘ऐसा कोई व्यक्ति, जिसे राज्य सरकार या संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन, प्रगणक के रूप में कर्तव्यों का निष्पादन करने के लिए उपयुक्त समझे’ उसे जनगणना के काम में लगाया जा सकता है।

कांग्रेस ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति की है। कांग्रेस का कहना है कि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के लोगों को जनगणना के काम में शामिल करने के लिए यह बदलाव किया जा रहा है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने दावा किया है कि इस साल 10 से 12 जुलाई को कर्नाटक के बेलगाम में आरएसएस के कार्यकर्ताओं का एक बड़ा प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया था, जिसका एकमात्र एजेंडा जनगणना 2027 था। उनका कनहा है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 26 मई 2026 को देश की बदलती डेमोग्राफी पर सुझाव देने के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी का गठन किया था। उस कमेटी में सभी सदस्य आरएसएस हैं और उसके सुझाव पर ही जनगणना के नियमों में बदलाव किया जा रहा है। कांग्रेस को आशंका है कि डेमोग्राफी पर बनी कमेटी और आरएसएस के लोगों को जनगणना में शामिल करके एसआईआर की तरह जनगणना के आंकड़ों में भी खतरनाक तरीके से हेरफेर किया जाएगा। हालांकि खतरनाक रूप से क्या हेराफेरी हो सकती है यह कांग्रेस ने नहीं बताया है। फिर भी कांग्रेस की आशंका को आधारहीन बता कर खारिज नहीं किया जा सकता है। लेकिन सवाल है कि क्या भारत में ऐसी एक व्यवस्था की आवश्यकता नहीं है, जहां वालंटियर्स यानी स्वैच्छिक कार्यकर्ताओं की मदद से जनगणना, मतदाता सूची के पुनरीक्षण, सामाजिक व आर्थिक सर्वेक्षण, नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे जैसे काम कराए जाएं?

ध्यान रहे दुनिया भर के देशों में ऐसी व्यवस्था है। पता नहीं कांग्रेस और दूसरी पार्टियों ने कभी इसका अध्ययन करने का प्रयास किया है या नहीं कि अमेरिका में लगभग पूरा चुनाव वालंटियर्स की देखरेख में होता है। वहां भारत के चुनाव आयोग जैसी कोई केंद्रीय संस्था नहीं है। राज्यों में अपनी अपनी संस्थाएं हैं। लेकिन उनमें भी बहुत लंबी चौड़ी वर्क फोर्स नहीं है और न चुनाव कराने के लिए स्कूलों के शिक्षक व सरकारी कर्मचारियों को बड़े पैमाने पर शामिल किया जाता है। थोड़े से सरकारी कर्मचारी और ढेर सारे वॉलंटियर मिल कर चुनाव कराते हैं। दशकों से ऐसे ही चुनाव होते हैं और डोनाल्ड ट्रंप के आने से पहले किसी ने चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोप भी नहीं लगाए थे। भारत में इस तरह की व्यवस्था बनाने की बहुत आवश्यकता है।

भारत में आजादी के बाद से ही तदर्थ प्रक्रिया चल रही है। सरकारी कर्मचारियों को और उसमें भी सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को किसी भी तरह की ड्यूटी में लगा दिया जाता है। मतदाता सूची का ‘संक्षिप्त’ या ‘विशेष संक्षिप्त’ या ‘विशेष गहन’ पुनरीक्षण होना है तो सरकारी शिक्षक करेंगे, मतदान कराना है तो सरकारी शिक्षक कराएंगे, मतगणना करनी है तो सरकारी शिक्षक करेंगे, सामाजिक व आर्थिक सर्वे करना हो, नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे करना हो, पशुओं की गिनती करनी हो, टीकाकरण करना हो, कोरोना या बाढ़ जैसी कोई महामारी में राहत बांटना हो, सारे काम सरकारी शिक्षकों को करने होते हैं। कुछ दिन पहले ही एक शिक्षक ने सोशल मीडिया में तंज करते हुए कहा कि वह तो अच्छा है कि सरकार कृषि कार्य नहीं कराती है अन्यथा फसलों की बुवाई, कटाई भी सरकारी स्कूल के शिक्षक करते। सचमुच ऐसी ही स्थिति है। इसका सीधा असर शिक्षा व्यवस्था पर पड़ता है। अभी एसआईआर की प्रक्रिया चल रही है तो राजधानी दिल्ली जैसे राज्य में सैकड़ों स्कूल एक एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। सरकारी स्कूलों के शिक्षकों से ये सब काम कराने से साल के कई महीने तक पढ़ाई, लिखाई का काम लगभग पूरी तरह से ठप्प रहता है।

सरकार ने अब अनुदान प्राप्त और बिना अनुदान वाले निजी स्कूलों के शिक्षकों को भी इसमें शामिल करने का प्रस्ताव दिया है। इससे वहां भी सरकारी स्कूलों जैसे ही पढ़ाई प्रभावित होगी। ऐसा लग रहा है कि सरकार स्कूली शिक्षा को पूरी तरह से बरबाद करने का संकल्प किए हुए है। वैसे पिछले दिनों आरएसएस से जुड़े रहे एक युवा स्कॉलर के मुंह से सुनने को मिला कि स्कूली शिक्षा को लेकर ‘भाई साहेब’ लोग क्या सोच रहे हैं। एक ‘भाई साहेब’ ने उस युवा स्कॉलर से कहा था कि कॉलेज पहुंचने वाले युवा इतने आंदोलित इसलिए हो रहे हैं क्योंकि देश में आज भी बड़ी संख्या में अच्छे स्कूल चल रहे हैं, जहां से वे पढ़ कर आते हैं। कॉलेज और यूनिवर्सिटीज की पढ़ाई और प्रशासन की व्यवस्था तो पिछले कुछ बरसों में पूरी तरह से बिगाड़ दी गई है। लेकिन चूंकि वे अच्छे स्कूल से आते हैं तो बिगड़े हुई व्यवस्था वाले कॉलेजों में एडजस्ट होने में उनको दिक्कत होती है। सो, इसका उपाय यह है कि स्कूली शिक्षा को भी वैसे ही बरबाद कर दिया जाए जैसे कॉलेज और यूनिवर्सिटीज को किया गया है।

बहरहाल, अगर सरकार गंभीर है तो उसे कांग्रेस की आलोचना की परवाह नहीं करनी चाहिए और देश में ऐसे कामों के लिए वॉलंटियर्स का नेटवर्क तैयार करना चाहिए। इससे देश के युवाओं को सीजनल रोजगार भी मिलेगा और यह बड़ी वर्क फोर्स तैयार होगी। ध्यान रहे देश की आबादी डेढ़ सौ करोड़ है और यहां जनगणना और चुनाव से लेकर अलग अलग तरह के सर्वेक्षण का काम बहुत बड़े पैमाने पर होता है। इसके लिए पढ़े, लिखे बेरोजगार नौजवानों को अगर वालंटियर के तौर पर शामिल किया जाए तो यह योजना ग्रामीण रोजगार की मनरेगा जैसी योजना से बड़ी हो सकती है और इसमें ज्यादा लोगों को रोजगार मिल सकता है। इसके लिए बहुत गहन गंभीर प्रशिक्षण की आवश्यकता भी नहीं होती है। सरकार एक बार प्रशिक्षण की व्यवस्था करके वालंटियर्स की फौज तैयार कर सकती है। यह वर्क फोर्स सरकारी कामकाज तो करेगी ही साथ ही निजी कंपनियों, विज्ञापन एजेंसियों, चुनावी सर्वे करने वाली कंपनियों आदि के लिए भी उपलब्ध रहेगी।

इस मामले में कांग्रेस की आलोचना का कोई खास आधार नहीं है। अगर सरकारी शिक्षक ही जनगणना करेंगे तो क्या गारंटी है कि जयराम रमेश जिस हेरफेर की आशंका जता रहे हैं वह नहीं होगी? आखिर मतदाता सूची का काम तो सरकारी लोग ही कर रहे हैं तो क्या कांग्रेस को उस पर भरोसा है? जयराम रमेश को यह समझना चाहिए सरकारी और निजी शिक्षकों में भी संघ और भाजपा के प्रति रूझान रखने वाले लोग होंगे और कांग्रेस व विपक्ष को पसंद करने वाले भी होंगे। वैसे ही चुनाव कराने या जनगणना के लिए वॉलंटियर नियुक्त होंगे तो उसमें भी हर विचार और राजनीतिक रूझान वाले लोग होंगे। अगर पेशेवर तरीके से कामकाज का वातावरण बनता है, तकनीक का बेहतर इस्तेमाल होता है और निगरानी की ईमानदार व्यवस्था बनती है तो वॉलंटियर वाली व्यवस्था एक साथ भारत की कई समस्याओं का समाधान कर सकती है।

भारत ने जम्मू-कश्मीर से संबंधित ओआईसी के प्रस्ताव की कड़ी निंदा की

भारत ने जम्मू-कश्मीर की स्थिति पर इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) के प्रस्ताव को खारिज करते हुए सोमवार को कड़े शब्दों में कहा कि संगठन ने पाकिस्तान को अपने “कट्टरपंथी एजेंडे” को आगे बढ़ाने के लिए अपने मंच का ‘दुरूपयोग’ करने की छूट दे रखी है।

नई दिल्ली ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ओआईसी की ओर से भारत के बारे में की गई टिप्पणियां “दुर्भावनापूर्ण, पक्षपातपूर्ण व झूठी हैं तथा पाकिस्तान के इशारे पर की गई हैं।

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विदेश मंत्रालय ने कहा हम 17-18 अक्टूबर को बगदाद में हुई ओआईसी की विदेश मंत्री परिषद की बैठक में पारित प्रस्तावों में भारत के खिलाफ की गई टिप्पणियों को स्पष्ट रूप से खारिज करते हैं।

मंत्रालय ने कहा भारत के बारे में की गई टिप्पणियां दुर्भावनापूर्ण, पक्षपातपूर्ण व झूठी हैं तथा पाकिस्तान के इशारे पर की गई हैं। हमें इस बात से निराशा है कि ओआईसी ने एक बार फिर पाकिस्तान को उसके कट्टरपंथी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए अपने मंच के दुरूपयोग की अनुमति दी है।

विदेश मंत्रालय ने कहा कि ओआईसी को भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है। मंत्रालय ने कहा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के अभिन्न और अविभाज्य अंग हैं। राजनीतिक मकसद से किया जाने वाला दुष्प्रचार इस सच्चाई को कभी नहीं बदल सकता।

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एसआईआर के बाद भी मतदाता सूची में गड़बड़ी, फर्जी मतदाताओं के नाम शामिल : अखिलेश

समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्‍यक्ष अखिलेश यादव ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर सवाल उठाते हुए सोमवार को कहा कि इस प्रक्रिया के पूरा होने के बाद भी मतदाता सूची में गड़बड़ी है और उसमें फर्जी मतदाताओं के नाम शामिल हैं।

सपा मुख्‍यालय की ओर से जारी एक बयान के मुताबिक, अखिलेश ने कहा एसआईआर के बाद भी मतदाता सूची में गड़बड़ी है और उसमें फर्जी मतदाताओं के नाम शामिल हैं। कई जगहों पर एक ही व्यक्ति एक से ज्यादा मतदान केंद्रों पर मतदाता के रूप में पंजीकृत है।

बयान में अखिलाश ने दावा किया कि “निर्वाचन आयोग ने भी इन गड़बिड़यों को स्वीकार किया है, हालांकि वह इन्हें छोटी-मोटी गलती बता रहा है। उन्होंने कहा यह छोटी-मोटी नहीं, बल्कि बहुत मोटी गड़बड़ी है।

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अखिलेश ने सोमवार को लखनऊ के गोमती नगर में पूर्व मंत्री विद्या चौधरी के आवास पर पहुंचकर उनका हालचाल जाना। उन्होंने संवाददाताओं से बातचीत में कहा पूरा देश जानता है कि जब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) हारने लगती है, तो वह बेईमानी और चोरी पर उतर आती है।

अखिलेश ने आरोप लगाया भाजपा निर्वाचन आयोग की मिलीभगत से बेईमानी करती है। निर्वाचन आयोग भाजपा के इशारे पर काम करता है।

उन्होंने कहा अगर विपक्षी दल और आम जनता निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हैं, तो भाजपा को क्यों दर्द होता है? भाजपा बचाव के लिए क्यों सामने आती है?”

अखिलेश ने “मतदाता सूची में गड़बड़ी और चुनावों में वोटों की लूट” को लेकर अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।

उन्होंने दावा किया कि सपा ने मतदाता सूची में गड़बड़ी और उपचुनाव में “वोटों की चोरी” को लेकर निर्वाचन आयोग से सबूतों के साथ शिकायत की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

अखिलेश ने कहा कि निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक संस्था है और उसे भाजपा के इशारे पर काम नहीं करना चाहिए।

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राहुल ने दी केस करने की चुनौती

पणजी। मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के जरिए वोट चोरी के आरोपों को दोहराते हुए राहुल गांधी ने केंद्र सरकार को चुनौती दी है कि वह उनके ऊपर मुकदमा करे। राहुल ने कहा है कि वे लगातार वोट चोरी के आरोप लगा रहे हैं। उन्होंने कहा कि वे डंके की चोट पर कहते हैं कि और राज्य में कहते हैं कि प्रधानमंत्री वोट चोरी करते हैं। फिर भी उनके ऊपर कोई मुकदमा दर्ज नहीं किया जाता है।

गौरतलब है कि गोवा में चार महीने के बाद विधानसभा चुनाव होने वाले हैं उससे पहले राज्य के दौरे पर पहुंचे राहुल गांधी ने कहा, ‘मैं हर राज्य से कहता हूं पीएम वोट चोरी करते हैं। लेकिन मुझ पर कोई केस दर्ज नहीं होता। क्योंकि, ये जानते हैं कि अगर केस हुआ तो मामला लीगल हो जाएगा और ये फंस जाएंगे’। उन्होंने दावा करते हुए कहा, ‘दिल्ली में हम कुछ ही समय में पीएम, गृहमंत्री से निपट लेंगे। काम जारी है। सरकार की एक्सपायरी डेट आने वाली है’। राहुल ने आगे कहा, ‘आपने देखा है कि आजकल पीएम सामने खड़े नहीं हो सकते हैं। क्योंकि ये जानते हैं कि देश का युवा इनके खिलाफ खड़ा हो गया है’।

राहुल गांधी गोवा विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के जनसंपर्क अभियान ‘गोय राखोन यात्रा’ में शामिल होने पहुंचे थे। यहा यात्रा 28 दिन चली थी और इसमें राज्य की सभी 40 विधानसभा सीटों को कवर किया गया। राहुल का पिछले चार सालों में यह पहला गोवा दौरा है।

कांग्रेस की यात्रा के समापन कार्यक्रम में राहुल ने कहा, ‘पूरी दुनिया मानती थी कि इंडिया का एजुकेशन सिस्टम नंबर वन मॉडल का था। लेकिन, आज दिल्ली में स्टूडेंट्स को ही मारा जा रहा है। हर एजुकेशनल सिस्टम में इन्होंने बीजेपी और आरएसएस के लोग बैठे हुए हैं’। उन्होंने दावा किया कि राज्य में बहुत भ्रष्टाचार है और कांग्रेस जीतेगी तो इसे समाप्त करेगी। उन्होंने कहा, ‘हाईटेक करप्शन, जमीन का करप्शन ये यहां करते हैं। जैसे पहले गुजरात में नरेंद्र मोदी का मॉडल था। वैसे ही गोवा में करप्शन का मॉडल है। इसे सिर्फ कांग्रेस ही खत्म कर सकती है’।

राहुल गांधी ने दावा किया कि देश में सबसे ज्यादा बेरोजगारी गोवा में है। उन्होंने कहा, ‘पहले मास्टर प्लान था, मास्टर प्लान को रद्द कर दिया। इनका यही काम है कि पैसा कैसे बनाए। इनका यही काम है। गोवा की जनता को लूटने का, आपकी जमीन छीनकर अरबपतियों को देने का’। उन्होंने कहा कि गोवा देश में सबसे सुंदर जगह है, सबसे अच्छा कल्चर है। लेकिन यहां भी सरकार लोगों की जमीन छीनकर गोवा के जो बाहर के लोगों को करोड़ों में बेचती है।

अराजकता फैलाना चाहता है विपक्ष

प्रशांत भूषण ने ‘रिजीम चेंज’ की बात कही। वे वकील हैं और राजनीति में भी खूब सक्रिय रहे हैं। वे पहले आम आदमी पार्टी में थे, जहां से अरविंद केजरीवाल ने उनको निकाल दिया। उन्होंने जब ‘रिजीम चेंज’ की बात कही तो उसका एक खास संदर्भ होता है। लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार को रिजीम नहीं कहा जाता है। रिजीम का मतलब होता है तानाशाहों का शासन, जिसको जन विद्रोह के जरिए या विदेशी ताकतों के समर्थन से बदला जाता है।

विपक्ष के चेहरे पर लोकतंत्र, संविधान, संसदीय प्रणाली, गांधी मार्ग आदि का जो झीना सा परदा था वह परदा भी गिर गया है। उसकी असलियत खुल कर सामने आ गई है। देश और दुनिया को यह पता चल गया है कि भारत का विपक्ष बांग्लादेश के कट्टरपंथी जमात के लोगों के आंदोलन से प्रभावित है और उसी मॉडल पर देश में ‘रिजीम चेंज’ यानी सत्ता बदलने की मंशा से काम कर रहा है। निष्कर्ष अनजाने में दिए गए किसी प्रदर्शनकारी के बयान या किसी की जुबान से अनायास निकल गए किसी जुमले पर आधारित नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांगने के लिए प्रदर्शन कर रहे दो अलग अलग लोगों ने इस तरह के बयान दिए है। इसलिए यह सिर्फ संयोग नहीं हो सकता है। सीपीआई एमएल के छात्र संगठन आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा ने कहा कि वे बांग्लादेश के आंदोलन और वहां के आंदोलनकारियों से प्रभावित हैं तो सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण ने कॉकरोच जनता पार्टी और आइसा नेताओं की मौजूदगी में कहा कि इस प्रदर्शन का उद्देश्य ‘रिजीम चेंज’ करना यानी सत्ता बदलना है।

देश के सामान्य नागरिकों को यह समझना चाहिए कि ये दोनों बातें कितनी खतरनाक हैं। एक तो बांग्लादेश के आंदोलन से प्रेरणा और दूसरी उसी मॉडल से ‘रिजीम चेंज’ की बात, दोनों के गहरे निहितार्थ हैं। सबसे पहले यह समझने की जरुरत है कि बांग्लादेश में क्या हुआ था। बांग्लादेश में कट्टरपंथी इस्लामी संगठन ‘जमात ए इस्लामी’ ने तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना के खिलाफ आंदोलन किया था। बाद में जब आरक्षण के नियमों में बदलाव किए गए तो कुछ युवा भी उस आंदोलन में जुड़े। लेकिन चाहे जमात के लोग हों या युवाओं की ‘नेशनल सिटीजंस पार्टी’ के लोग हैं, सबने आंदोलन के दौरान जितना सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया उससे ज्यादा हमला वहां के अल्पसंख्यकों यानी हिंदुओं पर किया। बांग्लादेश के ‘जेन जी’ का पूरा आंदोलन वहां के हिंदुओं के खिलाफ था। किस तरह के जघन्य कांड हुए, वह पूरी दुनिया ने देखा। हिंदुओं के घरों को चारों तरफ से घेर कर उनमें आग लगाई गई। हिंदुओं की हत्या करके उनके शव पेड़ से लटकाए गए। क्या भारत में ऐसे हालात बनाना चाहते हैं प्रदर्शनकारी?

उस आंदोलन के बाद भी बांग्लादेश में क्या बदला? हिंसक आंदोलन के जरिए एक चुनी हुई सरकार को हटा दिया गया और एक कठपुतली के रूप में मोहम्मद यूनुस को बैठाया गया। यूनुस के शासन में बांग्लादेश के हिंदुओं पर जितने अत्याचार हुआ उनकी मिसाल नहीं है। उसके बाद भी जब चुनाव हुए तो उसका नतीजा यह निकला कि युवा देखते रह गए और सैनिक तानाशाह रहे जिया उर रहमान व खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान देश के प्रधानमंत्री बन गए। क्या ऐसा ही आंदोलन नेहा बोरा भारत में करना चाहती हैं कि एक चुनी हुई सरकार को अराजकता के जरिए हटाने का प्रयास किया जाए, उसके बाद कोई कठपुतली बैठे और फिर पुराने राज परिवार के किसी व्यक्ति को सत्ता मिल जाए? भारत के विकास और मजबूती से ईर्ष्या कर रहे बहुत से देश भारत की जनता द्वारा लगातार तीसरी बार चुनी हुई सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अस्थिर करना चाह रहे हैं। क्या यह आंदोलन उन विदेशी ताकतों की मंशा पूरी करने के लिए चलाया जा रहा है?

इन बयानों को इस संदर्भ में देखने का कारण यह भी है कि प्रशांत भूषण ने ‘रिजीम चेंज’ की बात कही। वे वकील हैं और राजनीति में भी खूब सक्रिय रहे हैं। वे पहले आम आदमी पार्टी में थे, जहां से अरविंद केजरीवाल ने उनको निकाल दिया। उन्होंने जब ‘रिजीम चेंज’ की बात कही तो उसका एक खास संदर्भ होता है। लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार को रिजीम नहीं कहा जाता है। रिजीम का मतलब होता है तानाशाहों का शासन, जिसको जन विद्रोह के जरिए या विदेशी ताकतों के समर्थन से बदला जाता है। रिजीम सीरिया में असद था, इराक में सद्दाम का था और लीबिया में गद्दाफी का था। भारत में रिजीम नहीं होता है। भारत में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार होती है, जिसे लोकतांत्रिक तरीके से ही बदला जाता है। इंदिरा गांधी की तानाशाही और इमरजेंसी का जवाब भी इस देश की जनता ने लोकतांत्रिक तरीके से ही दिया था। उनको वोट के जरिए हराया गया था। नरेंद्र मोदी को देश की जनता ने लगातार तीसरी बार वोट देकर प्रधानमंत्री चुना है। इस जनादेश के बाद नरेंद्र मोदी सबसे ज्यादा समय तक निर्वाचित प्रधानमंत्री रहने का रिकॉर्ड बना चुके हैं। देश की जनता न सिर्फ उनको बार बार देश की सत्ता सौंप रही है, बल्कि उनकी अपील पर बंगाल, असम जैसे पूर्वी व पूर्वोत्तर के राज्यों से लेकर पश्चिम में गुजरात और महाराष्ट्र तक भाजपा की सरकार बनवाती है। इतने लोकप्रिय नेता के शासन को ‘रिजीम’ कहना अपने आप में विपक्ष के लोगों की मंशा दिखाने वाला है।

असल में चाहे कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल हों या कॉकरोच जनता पार्टी जैसे सोशल मीडिया हैंडल्स हों या आइसा जैसे छात्र संगठन हों या प्रशांत भूषण जैसे कथित सिविल सोसायटी के लोग हों, इनका प्रदर्शन एक खास राजनीतिक मंशा से प्रेरित है। वह राजनीतिक मंशा है सरकार बदलने की। दूसरी बात यह है कि इनके प्रदर्शन से आम आदमी का कोई लेना देना नहीं है। जंतर मंतर पर सीजेपी का पहला प्रदर्शन पीड़ित पक्ष यानी पेपर लीक से प्रभावित हुए छात्रों, युवाओं और उनके परिजनों का था। लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जो प्रदर्शन हो रहा है वह मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में नाम कटने से प्रभावित मतदाताओं का नहीं है। ऐसे लोग तो सामने आ ही नहीं रहे हैं। क्योंकि ऐसे वास्तविक मतदाता बहुत कम हैं, जिनके नाम कटे हैं और अगर कट गए हैं तो वे उसे जुड़वाने की कोशिश कर रहे हैं। तभी किसी प्रदर्शन में ऐसे लोग नहीं दिख रहे हैं, जिनके नाम कटे हैं। प्रदर्शन के दौरान, जिससे भी पूछा जाता है, वह कहता है कि उसका नाम मतदाता सूची में है। जब प्रभावित पक्ष आंदोलन में नहीं शामिल है तो इसका क्या मतलब है?

जाहिर है इसका मकसद अराजकता फैलाना है। लोगों की भावनाओं को उभार कर सरकार के खिलाफ नाराजगी पैदा करना है। इसमें भी कोई बुराई नहीं है। विपक्ष का यही काम है कि वह सरकार के खिलाफ आम आदमी के मन में नाराजगी बढ़ाने की कोशिश करे। लेकिन इसके लिए पहले आम आदमी के मन में नाराजगी होनी भी तो चाहिए? जिस मामले में आम आदमी प्रभावित था वहां जुड़ा और सरकार ने भी उसे समझते हुए तत्काल केंद्रीय मंत्री का इस्तीफा कराया। लेकिन मौजूदा प्रदर्शन तो आम आदमी का है ही नहीं। यह राजनीतिक दलों का विरोध है और इसका मकसद संवैधानिक या लोकतांत्रिक तरीके से कोई मुद्दा उठाना नहीं, बल्कि अराजकता फैलाना है। अगर अराजकता फैलाना मकसद नहीं होता है तो क्या कोई समझदार नेता या राजनीतिक दल सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च करता है? आपने सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया और राष्ट्रपति को ज्ञापन दिया यहां तक तो बात समझ में आती है। लेकिन विपक्ष ने सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च किया। कांग्रेस की एक प्रदेश कमेटी की ओर से चीफ जस्टिस के लिए असम्मानजनक संबोधन वाला पोस्ट किया गया, जिसे बाद में डिलीट किया गया। प्रदर्शन में शामिल नेताओं ने चीफ जस्टिस के खिलाफ अपमानजनक बातें कहीं। यह इससे पहले कभी नहीं हुआ था।

विपक्ष के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों को कोहनी मार रहे थे। प्रदर्शनकारी महिला पुलिसकर्मियों की वर्दी पर हाथ डाल रहे थे और उनके नाम सोशल मीडिया में उजागर करके उनको शर्मिंदा करने की कोशिश कर रहे थे। यह सब पहले कभी नहीं हुआ। पूरे आंदोलन के दौरान पुलिस को उकसाने का प्रयास किया गया ताकि पुलिस पलट कर कार्रवाई करे तो उसका मुद्दा बनाया जाए। यह सोची समझी रणनीति के तहत किया जा रहा था। पूरे प्रदर्शन का मकसद चुनाव आयोग की साख और देश के स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना है। इसके जरिए विपक्ष यह दिखाना चाहता है कि वह अपनी कमजोरी से नहीं हार रहा है, बल्कि उसको हराया जा रहा है। लेकिन इसकी हकीकत देश की जनता से बेहतर और कौन जानता है! आखिर जनता ही वोट देकर भाजपा को जीता रही है और कांग्रेस व अन्य विपक्षी पार्टियों को हरवा रही है। विपक्ष को जनता के जनादेश को अराजक आंदोलनों के जरिए चुनौती देने की बजाय राजनीतिक रूप से अपने को मजबूत करके आगे की लड़ाई की तैयारी करनी चाहिए।

(लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)

डीएमके ने सीईसी का इस्तीफा मांगा

नई दिल्ली। महिला आरक्षण और परिसीमन पर डीएमके से समर्थन की उम्मीद कर रही भाजपा को झटका लगा है। डीएमके संसदीय बोर्ड की शनिवार को हुई बैठक में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर का विरोध करने का फैसला हुआ है। साथ ही पार्टी ने एसआईआर में कथित गड़बड़ियों का मुद्दा उठा कर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है। गौरतलब है कि कांग्रेस सहित सभी विपक्षी पार्टियां भी यही मांग कर रही हैं।

हालांकि डीएमके ने एसआईआर और मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ साथ कांग्रेस पर भी सवाल उठाए। संसदीय दल की बैठक के बाद मीडिया से बात करते हुए पार्टी के वरिष्ठ नेता ए राजा ने कांग्रेस पर सवाल उठाते हुए कहा कि डीएमके शुरुआत से एसआईआर का विरोध कर रही है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को डीएमके की आलोचना करने का नैतिक अधिकार नहीं है। बहरहाल, संसदीय दल की बैठक में चार प्रस्ताव पास किए गए।

गौरतलब है कि चार मई को आए विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद कांग्रेस और डीएमके अलग हो गए हैं। कांग्रेस ने टीवीके से अलायंस कर लिया है। बहरहाल, ए राजा ने कहा कि डीएमके ने एसआईआर लागू होने के समय से ही इसका विरोध किया है। उन्होंने कहा कि पार्टी ने संसद के अंदर और बाहर कई कदम उठाए हैं और पार्टी का यह रुख अभी भी कायम है। उन्होंने बताया कि डीएमके संसदीय दल का प्रस्ताव तमिलनाडु की जनता और देश भर के राजनीतिक पर्यवेक्षकों के सामने पार्टी के विरोध का क्रम रखने के लिए तैयार किया गया है।

एसआईआर की प्रक्रिया पर निशाना साधते हए राजा ने कहा कि इसके जरिए वैध वोटर्स को वोटिंग के अधिकार से वंचित किया जा रहा है। डीएमके ने कहा कि कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर एसआईआर का विरोध कर रही है, लेकिन केरलम और तमिलनाडु में वह इसी तरह की आलोचना से बच रही है। प्रस्ताव में टीवीके प्रमुख और राज्य के मुख्यमंत्री विजय की चुप्पी पर भी सवाल उठाया गया।

रामलीला मैदान में कांग्रेस करेगी रैली

नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में हुई कथित गड़बड़ियों के खिलाफ कई दिन तक प्रदर्शन के बाद अब कांग्रेस पार्टी ने बड़ी रैली का ऐलान किया है। एक नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में इसे लेकर एक महारैली का आय़ोजन किया जाएगा। कांग्रेस पार्टी ने इस रैली के लिए दिल्ली पुलिस की अनुमति हासिल कर ली है।

शनिवार को दिल्ली पुलिस ने कांग्रेस पार्टी को रामलीला मैदान में एक नवंबर को होने वाली रैली के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र यानी एनओसी जारी कर दिया। सेंट्रल दिल्ली के डीसीपी रोहित राजबीर सिंह ने बताया कि पार्टी ने मैदान की बुकिंग के लिए 25 अक्टूबर से तीन नवंबर तक की तारीखें मांगी थी। उसे एक नवंबर को रैली करने की इजाजत मिल गई है। इससे पहले कांग्रेस पार्टी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर छह अक्टूबर से लेकर 12 अक्टूबर तक लगातार प्रदर्शन किया।

गौरतलब है कि पिछले दिनों गृह मंत्रालय ने जंतर मंतर पर प्रदर्शनों पर रोक लगाते हुए रामलीला मैदान सहित तीन जगहों को प्रदर्शन स्थल घोषित किया। इन तीन जगहों में रामलीला मैदान एक है, जहां 50 हजार लोगों तक की रैली हो सकती है। अभी यह तय नहीं है कि रैली सिर्फ कांग्रेस पार्टी की होगी या उसमें विपक्षी पार्टियों के नेताओं को भी बुलाया जाएगा। गौरतलब है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और एसआईआर के खिलाफ कांग्रेस के आंदोलन में ‘इंडिया’ ब्लॉक की सभी पार्टियां शामिल रही हैं।

ज्ञानेश कुमार सरकारी गवाह बनें : राहुल

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष तथा लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा है कि देश में ‘वोट चोरी’ करवाई जा रही है इसलिए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देकर सरकारी गवाह बन जाना चाहिए।

श्री गांधी ने शनिवार को अपने पॉडकास्ट में परीक्षाओं में देरी, नियुक्तियां अटकने और बुनियादी सुविधाओं की कमी का जिक्र करते हुए ऐसे मुद्दों पर जवाबदेही तय करने की जरूरत बतायी। उन्होंने पिछले एक महीने में इंदौर, नासिक, बालाघाट और दिल्ली में छात्रों की गूंज कार्यक्रम के दौरान के अनुभव साझा करते हुए कहा कि छात्रों के सवाल ऐसी व्यवस्था को चुनौती देते हैं।

उन्होंने कहा कि आरएसएस-भाजपा से जुड़े लोगों ने देश के संस्थानों पर कब्जा कर लिया है और आदिवासी और पिछड़े वर्ग के छात्रों को जो सुविधाएं मिलती हैं उनमें कटौती की जा रही है इसलिए इन मामलों में सरकार की ओर से जवाबदेही तय होनी चाहिए।

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श्री गांधी ने इस पॉडकास्ट में महाराष्ट्र के नासिक में आंदोलनरत आदिवासी विद्यार्थियों, महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग की परीक्षा में कथित अनियमितताओं के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों और मध्य प्रदेश के बालाघाट में कुपोषण तथा बीमारियों से बच्चों को खोने वाले आदिवासी परिवारों के साथ अपनी मुलाकात का भी जिक्र किया। उन्होंने बालाघाट में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण पूरी तरह लागू करने का आग्रह किया और कहा कि उन्होंने मुख्यमंत्री मोहन यादव को इस संदर्भ में पत्र लिखा है।

उन्होंने कहा कि दिल्ली के बेला एस्टेट की झुग्गी बस्ती में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद 729 निवासियों में से 728 के नाम मतदाता सूची से हट गये। इसे मतदान के अधिकार के उल्लंघन का गंभीर मामला बताते हुए उन्होंने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देकर सरकारी गवाह बनना चाहिए।

वोट चोरी को संविधान पर हमला बताते हुए श्री गांधी ने 30 सितंबर को यहां इंडिया गठबंधन के नेताओं के साथ हुई बैठक का उल्लेख किया और कहा कि उसमें प्रत्येक भारतीय के मतदान के अधिकार की रक्षा पर विचार-विमर्श किया गया है।

उन्होंने परीक्षा में देरी, नियुक्तियां अटकने और बुनियादी सुविधाओं की कमी जैसे मुद्दों के साथ ही दिल्ली के सत्य निकेतन की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि शिक्षा बजट में कटौती की वजह से ऐसा हो रहा है और इन सब मामलों में जवाबदेही तय होनी चाहिए।

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अमित शाह का इतना भरोसा!

अमित शाह ने इस सप्ताह खम ठोंक कर कहा कि विपक्ष कुछ कर लें 2029 में मोदी जीतेंगे। कांग्रेस की लगातार चौथी हार होगी। सवाल है यह शाह की गणित है या अहंकार? आखिर 2029 के चुनाव में अभी ढाई वर्ष से अधिक का समय है। तब तक देश की आर्थिकी का कैसा कबाड़ा होगा? 35 वर्ष की उम्र से कम नौजवानों की उम्मीदों और बेकारी का गुस्सा किस करवट बैठेगा? नैरेटिव कैसा चलेगा? ट्रंप, शी जिनपिंग, मुनीर जैसी विदेशी ताकतें भारत का कितना टेंटुआ दबा चुकी होंगी? इसलिए कि घर के अंदर हो या घर के बाहर कोई ऐसा है नहीं, जिसे मोदी सरकार ने ठगा नहीं! बावजूद इसके अमित शाह के लिए 2029 का चुनाव चुटकी बजा कर जीतना वैसा ही है जैसे महाराष्ट्र, बिहार, बंगाल जीता और आने वाले महीनों में जीतेंगे। मानों चुनाव होना महज औपचारिकता हो। नतीजा उन्होंने पहले से लिखाया हुआ हो। 13 अक्टूबर का उनका वाक्य था, ‘2029 के चुनाव में भी कांग्रेस बुरी तरह से हारेगी’।

यों राजनीति में नेता की मजबूरी होती है कि वह आत्मविश्वास दिखाए। पर अमित शाह का हुंकारा उस समय और परिस्थितियों में है, जिसमें अब गारंटीशुदा माना जा रहा है कि मतदाता सूचियों में वोटरों के नाम कटवा कर, हटवा कर भाजपा पश्चिम बंगाल में चुनाव जीती है। 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदाताओं के मोदी से मोहभंग को मोदी सरकार-चुनाव आयोग की मशीनरी ने वोट सूचियों में हेराफेरी से पलटा है। देश अब करोड़ों नामों (15 करोड़ मतदाताओं के अनुमान!) के कटने, नए नाम जुड़वाने की शर्तों, माता-पिता के दस्तावेजों, प्रवासी मजदूरों और पहली बार वोट देने वाले नौजवानों की पात्रता पर तलवार लटकी देख रहा है। चुनाव आयोग अराजक सूचियां बना रहा है!

सोचें, इसके पीछे की राजनीति पर। जरा सोचें। चुनाव में जनता किसे वोट देगी, उससे पहले यह तय होता है कि वोट देने वालों की सूची में कौन होगा? फिर यह कि किस इलाके के वोट किस लोकसभा क्षेत्र में (आगे की सीट परिसीमन योजना) गिने जाएंगे! फिर इरादा महिला आरक्षण लागू कराने का है। मतलब किस सीट पर किस तरह का उम्मीदवार खड़ा करने में मोदी-शाह का अपर हैंड। मुझे लग रहा है कि तीनों बातें चुनाव से पहले तय होंगी। तीनों के नियम, प्रक्रियाएं और प्रशासनिक फैसले (याकि सरकार) हैं। अब यदि इसी गेमप्लान में मोदी-शाह अपने चक्रवर्ती राजनीतिक भविष्य की गारंटी मान काम करें, सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग आदि सभी रास्ता बनवाएं तो सड़क पर राहुल गांधी या जेनरेशन ज़ेड कितना ही आंदोलन करें, हल्ला मचाएं पर 2029 के नतीजे मोदी के लिए पश्चिम बंगाल जैसे होंगे।

असली सवाल बूथ का है। मोदी की कमान में भाजपा ने बूथवार मतदाताओं का राजनीतिक हिसाब रखने के पेशेवरों (सर्वेयर, पन्ना प्रमुखों आदि) की फौज बनाई हुई है। इनके पास मतदाताओं की केवल जानकारी ही नहीं है, बल्कि मतदाता सूचियों में मनमाफिक छंटनी की सामर्थ्य भी है। फॉर्म-7 सबमिट करो और नाम कटाओ। फिलहाल इतना तो प्रमाणित है कि एसआईआर के बहाने बड़ी संख्या में मौजूद मतदाताओं के नाम हटे हैं। और नए नौजवानों के वोटर पंजीकरण की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल हैं। नौजवान पहले यों भी कम वोटर बनते थे लेकिन अब तो उनके आगे पंजीकरण में अतिरिक्त दस्तावेजी शर्तों को ऐसा बनाया है कि यूथ भले बेरोजगार भटकता रहे, सड़क पर आंदोलन करे लेकिन वोटर बनने के महत्त्व के प्रति लापरवाह बना रहेगा। जैसे नौकरी के आवेदनों से निराशा है वैसे ही वोटर बनने की भागदौड़ से बेरुखी रही तो 2029 में मोदी 2014 से भी बड़े बहुमत से जीतेंगे।

यही अमित शाह के आत्मविश्वास का बीजमंत्र है। सो, जेनरेशन ज़ेड का सड़क पर गुस्सा एक बात है और मतदाता सूची में उनका नाम होना दूसरी। फिर मतदान केंद्र पहुंचकर वोट डालना तीसरी। यदि पहली बार वोट देने वाले लाखों पात्र नौजवानों के पंजीकरण में बाधाएं हों तो उनकी राजनीतिक सक्रियता और चुनावी भागीदारी के बीच फासला अपने आप होगा।

अमित शाह ने कांग्रेस को याद दिलाया कि वह एसआईआर से पहले भी चुनाव हारती रही है। सही है। लेकिन इससे एसआईआर के सवाल का जवाब कैसे है? कांग्रेस 2014 और 2019 में हारी, 2024 में भी सरकार नहीं बना सकी। मगर 2024 में भाजपा की अपनी सीटें 303 से घटकर 240 हुई थीं। कांग्रेस 52 से 99 पर पहुंची थी। तब क्या उस चुनाव का सबक केवल कांग्रेस की हार था? या यह भी था कि पूर्ण बहुमत वाली भाजपा को गठबंधन के सहारे सरकार बनानी पड़ी? भाजपा के जीत के लाले पड़े तो एसआईआर को सुनियोजित नए फॉर्म, नई प्रक्रियाओं याकि झंझटों से भरपूर बनाने की धांधलेबाजी हुई।