यूसुफ पठान को 500 वर्ग मीटर जमीन मुफ्त देगी गुजरात सरकार? 14 साल पुराने विवाद का होगा अंत

Yusuf Pathan Land Dispute: पश्चिम बंगाल चुनाव में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की हार के बाद पार्टी छोड़ने वाले सांसद यूसुफ पठान को गुजरात सरकार से 900 वर्ग मीटर से ज्यादा जमीन मिलने वाली है। इसके साथ ही राज्य सरकार के साथ उनका 14 साल पुराना जमीन विवाद भी खत्म होने जा रहा है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, यह जमीन गुजरात के वडोदरा के तांदलजा इलाके में है। जो कि यूसुफ पठान के परिवार के घर के पास स्थित है।

प्रस्तावित व्यवस्था के तहत, 500 वर्ग मीटर जमीन उन्हें घर बनाने के लिए उपहार के तौर पर दी जाएगी। वहीं, बाकी 478 वर्ग मीटर जमीन उसके तय मूल्य के 55 फीसदी भुगतान पर उन्हें दी जाएगी। बता दें कि यह जमीन वडोदरा नगर निगम (VMC) की है।

पठान ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस से की थी। 2024 में, उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर पश्चिम बंगाल की बहरामपुर लोकसभा सीट जीती। हालांकि, जून 2026 में, वह उन सांसदों में शामिल थे जिन्होंने TMC से अलग होकर ‘नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ जॉइन कर ली।

यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब पठान के राजनीतिक जुड़ावों पर फिर से चर्चा हो रही है, और साथ ही इसने राज्य के साथ ज़मीन से जुड़े विवाद के पुराने इतिहास को भी फिर से सुर्खियों में ला दिया है।

यूसुफ पठान का जमीन विवाद क्या था?

पठान – जो उस समय एक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर थे – ने सबसे पहले 2012 में VMC (वडोदरा नगर निगम) से संपर्क किया था। उन्होंने बिना किसी सार्वजनिक नीलामी के, 99 साल की लीज पर एक प्लॉट की मांग की। उन्होंने एक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर होने के नाते अपनी सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं का हवाला दिया और अपने पारिवारिक घर से सटी जमीन मांगी।

2014 में गुजरात सरकार के शहरी विकास विभाग ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया।

हालांकि, जून 2024 में यह विवाद फिर से सामने आया – जो कि TMC के साथ पठान के राजनीतिक करियर की शुरुआत के 2 महीने बाद की बात है। VMC ने पठान को एक नोटिस जारी किया, जिसमें उनसे उस जमीन से ‘अतिक्रमण’ हटाने के लिए कहा गया।

पठान ने गुजरात हाई कोर्ट में इस नोटिस को चुनौती दी। जून 2026 में, कोर्ट ने सवाल उठाया कि बिना किसी औपचारिक आवंटन या भुगतान के, जमीन पर कब्जं कैसे किया जा सकता है और वहाँ बाड़ कैसे लगाई जा सकती है। इसके बाद, यह कानूनी विवाद कोर्ट के बाहर सुलझाने की दिशा में आगे बढ़ा।

इस प्लॉट की कीमत कितनी है?

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के अनुसार, 978 वर्ग मीटर के इस प्लॉट की अनुमानित बाजार कीमत लगभग 20.5 करोड़ रुपये है, जो कि 2.10 लाख रुपये प्रति वर्ग मीटर के मूल्यांकन पर आधारित है।

प्रस्तावित व्यवस्था के तहत, पठान को 500 वर्ग मीटर जमीन उपहार के तौर पर मिलेगी, जबकि बाकी 478 वर्ग मीटर के लिए उन्हें रियायती दर पर भुगतान करना होगा। सरकार के प्रस्ताव में यह भी प्रावधान है कि राज्य का राजस्व विभाग VMC को इतनी ही कीमत की जमीन आवंटित करेगा।

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ममता को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली

नई दिल्ली। तृणमूल कांग्रेस की संस्थापक ममता बनर्जी की पार्टी टूट गई है और टूटे हुए गुट की याचिका पर ममता बनर्जी की पार्टी के बैंक खातों पर रोक लग गई है। इस मामले में ममता सुप्रीम कोर्ट पहुंची थीं लेकिन वहां से उनको कोई राहत नहीं मिली है। सर्वोच्च अदालत ने गुरुवार को तृणमूल कांग्रेस को उन चार बैंक खातों को संचालित करने की इजाजत देने से इनकार कर दिया, जिन्हें पश्चिम बंगाल पुलिस ने साइबर क्राइम की शिकायत के सिलसिले में फ्रीज कर दिया था।

इस मामले में सुनवाई करते हुए जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस पीबी वराले की बेंच ने कहा, ‘चुनाव आयोग ने टीएमसी का चुनाव चिन्ह फ्रीज कर दिया है। खातों में मौजूद फंड का असली हकदार कौन है, इस मामले पर कलकत्ता हाई कोर्ट में सुनवाई चल रही है। इसलिए हम इस मामले की सुनवाई नहीं करेंगे’। गौरतलब है कि चार मई को पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजे आए थे, जिसमें टीएमसी 15 साल बाद राज्य की सत्ता से बाहर हो गई थी।

इसके बाद पार्टी के 58 विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में अलग गुट बना लिया था। यह गुट असली तृणमूल कांग्रेस होने का दावा करता है। बहरहाल, ममता बनर्जी की पार्टी की ओर से पेश हुए सीनियर एडव्होकेट अभिषेक सिंघवी ने कहा कि बैंक खातों को फ्रीज करना पार्टी की राजनीतिक गतिविधियों को रोकने की कोशिश है। इससे पार्टी की गतिविधियां ठप्प हो गई हैं। उन्होंने कहा कि उपचुनावों आदि को देखते हुए पार्टी के खर्चों के लिए हर महीने कम से कम 12.15 करोड़ रुपए की आवश्यकता है। टीएमसी जैसी बड़ी पार्टी की राजनीतिक गतिविधियों के लिए यह न्यूनतम राशि है। इसलिए इन खातों को चलाने की मंजूरी दी जाए।

राज्य सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि दो गुट खुद को असली तृणमूल बता रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को यह तय करने को कहा है कि असली पार्टी कौन सी है। उन्होंने कहा, ‘दूसरा गुट भी कह रहा है कि हमें खाता चलाने की अनुमति दी जाए। इसलिए उन्हें असली तृणमूल पर फैसले का इंतजार करना चाहिए’।

West Bengal SIR: ‘क्या हम नए चुनाव कराने का निर्देश दे सकते हैं?’; बंगाल SIR पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा सवाल

West Bengal SIR: सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) मामले की सुनवाई के दौरान एक अहम कानूनी सवाल उठाए। शीर्ष अदालत ने पूछा कि क्या न्यायपालिका नए चुनाव का आदेश दे सकती है, जब ऐसे दावे किए जा रहे हों कि कई विधानसभा क्षेत्रों में हटाए गए वोटरों की संख्या जीत के अंतर (victory margin) से ज्यादा थी। न्यूज 18 के मुताबिक, चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) सदस्य की ओर से सीनियर एडवोकेट कल्याण बंदोपाध्याय द्वारा दायर याचिका पर विचार-विमर्श किया।

TMC याचिकाकर्ता का पक्ष रखते हुए, सीनियर एडवोकेट कल्याण बंदोपाध्याय ने 31 विधानसभा क्षेत्रों का ब्योरा पेश किया। इन क्षेत्रों में जीतने वाले BJP उम्मीदवारों की जीत का अंतर, SIR प्रक्रिया के दौरान हटाए गए कुल वोटरों की संख्या से कम था। एक विधानसभा क्षेत्र (AC-145) में हार का अंतर सिर्फ 401 वोट था। जबकि 8,785 वोटर हटाए गए थे। एक और सीट पर SIR के तहत बहुत ज्यादा वोटर हटाए जाने के बावजूद उम्मीदवार 316 वोटों से हार गया।

नतीजों पर असर

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि इतने बड़े पैमाने पर वोटर हटाने से चुनाव के नतीजों पर असर पड़ा। हजारों वैध नागरिकों को वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया। सार्वजनिक डेटा की कमी: TMC के वकील ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि विधानसभा-वार अपील डेटा का हिसाब लगाना मुश्किल है क्योंकि भारत के चुनाव आयोग (ECI) ने ये आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए हैं।

सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

इन दलीलों के जवाब में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत ने मौखिक रूप से टिप्पणी की, “आप इस पर याचिका दायर कर सकते हैं, लेकिन क्या कोर्ट इस तरह नए चुनाव का आदेश दे सकता है?” चीफ जस्टिस ने पूछा कि क्या प्रभावित उम्मीदवारों ने उन 31 विधानसभा क्षेत्रों में जीते हुए उम्मीदवारों को चुनौती देने के लिए औपचारिक चुनाव याचिकाएं दायर की थीं। इस पर वकील ने जवाब दिया कि कुछ सीटों पर चुनाव याचिकाएं दायर की गई थीं, लेकिन सभी पर नहीं। इस पर जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने इस बात पर जोर दिया कि यह पता लगाना जरूरी है कि वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने के बाद कितने लोगों ने असल में अपील दायर की थी।

देश की सबसे बड़ी अदालत ने कहा कि अगर नाम हटाए जाने वाले किसी वोटर ने अपील दायर किए बिना इसे स्वीकार कर लिया, तो उनकी ओर से नतीजों को चुनौती देना केवल सैद्धांतिक बात रह जाती है। हालांकि, अगर 100 लोगों के नाम हटाए गए, जीत का अंतर 50 था। हटाए गए वोटरों में से 60 या 70 ने अपील दायर की जो अभी भी लंबित है, तो नाम हटाने की इस प्रक्रिया को चुनौती देना एक अहम और बहुत जरूरी मामला बन जाता है।

लंबित अपील का आंकड़ा मांगा

इससे एक दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को चुनाव आयोग (ECI) को पश्चिम बंगाल में SIR के बाद मतदाता सूची से नाम हटाए जाने या नाम शामिल किए जाने को चुनौती देने वाली विभिन्न अपील पर अधिकारियों द्वारा निपटाए गए मामलों और लंबित मामलों का आंकड़ा पेश करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि इन मामलों का समयबद्ध तरीके से निपटारा किया जाना जरूरी है। पीठ ने निर्वाचन आयोग से यह बताने को कहा कि लंबित अपील के निपटारे की प्रक्रिया को सुचारू बनाने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कल्याण बनर्जी ने कहा कि लोगों को यह जानकारी नहीं मिल रही है कि न्यायाधिकरणों के समक्ष कितनी अपील लंबित हैं या कितनी अपील का निपटारा हो चुका है, क्योंकि यह जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। बनर्जी ने कहा कि नगर निकाय और पंचायत चुनाव होने वाले हैं। इस सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह मामले को केवल 31 विधानसभा क्षेत्रों तक सीमित नहीं रखेगा।

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24 अप्रैल को शीर्ष अदालत ने अपीलीय न्यायाधिकरणों को निर्देश दिया था कि पश्चिम बंगाल में एसआईआर के बाद मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ तत्काल सुनवाई की जरूरत साबित करने वाले मामलों की प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई की जाए। करीब 60 लाख दावों और आपत्तियों के निपटारे के लिए पश्चिम बंगाल एवं पड़ोसी राज्यों ओडिशा और झारखंड के करीब 700 न्यायिक अधिकारियों को तैनात किया गया था।