ट्रम्प ने ड्रोन इंपोर्ट पर 100% तक टैरिफ लगाया:राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला दिया, चीनी कंपनियों को सबसे ज्यादा नुकसान

अमेरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अनमैन्ड ड्रोन और उनके कंपोनेंट्स के आयात यानी इंपोर्ट पर 100% तक का टैरिफ लगाने का ऐलान किया। अमेरिका ने राष्ट्रीय सुरक्षा कारणों और चीनी कंपनियों के वर्चस्व वाले इस सेक्टर में दूसरे देशों पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से यह फैसला लिया है। व्हाइट हाउस की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि इस फैसले से अमरीका में ड्रोन और उनके कंपोनेंट्स का घरेलू प्रोडक्शन बढ़ेगा और विदेशी सप्लाई चेन पर निर्भरता कम होगी। पिछले साल तक अमेरीकी कॉमर्शियल ड्रोन बाजार में चीनी कंपनी की लगभग 70% हिस्सेदारी थी। ड्रोन के वजन और क्षमता के हिसाब से टैरिफ तय हुआ व्हाइट हाउस के मुताबिक, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से संवेदनशील माने जाने वाले ड्रोन पर 100% टैरिफ लगाया जाएगा। लागू होने की समय-सीमा और छूट के नियम नया टैरिफ स्ट्रक्चर अलग-अलग समय-सीमा में लागू किया जाएगा… विशेष छूट: हस्ताक्षर के 20 दिनों के भीतर अमरीकी युद्ध विभाग यानी डिपार्टमेंट ऑफ वॉर द्वारा FCC की कवर्ड लिस्ट से छूट प्राप्त प्रोडक्ट्स और कंपोनेंट्स पर भी टैरिफ 180 दिनों बाद प्रभावी होगा। ब्रिटेन और यूरोप समेत 7 सहयोगी देशों पर भी टैरिफ अमेरिका ने केवल विरोधी देशों पर ही नहीं, बल्कि अपने सहयोगी देशों से आने वाले ड्रोन पर भी टैरिफ लागू किया है… चीन की ड्रोन कंपनियों पर नकेल कसने की तैयारी फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, यह फैसला ऐसे समय में आया है जब ट्रम्प प्रशासन चीनी ड्रोन तकनीक पर अपनी कार्रवाई तेज कर रहा है। पिछले साल दिसंबर में फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन (FCC) ने चीनी ड्रोन के आयात पर प्रतिबंध की घोषणा की थी और विरोधी देशों के ड्रोन को वायरलेस कम्युनिकेशंस की मंजूरी देने पर रोक लगा दी थी। वैश्विक बाजार में शेनझेन स्थित कंपनी DJI टेक्नोलॉजीज का दबदबा है, जिसकी पिछले साल तक अमेरीकी कॉमर्शियल ड्रोन बाजार में लगभग 70% हिस्सेदारी थी। इसके अलावा, हाल ही में चीन ने भी अमरीकी व्यापारिक प्रतिबंधों के जवाब में अमेरीका को ड्रोन एक्सपोर्ट पर रोक लगा दी थी और छह कंपनियों को ब्लैकलिस्ट कर दिया था। रूस-यूक्रेन युद्ध और हाइब्रिड वॉर से बढ़ी चिंता ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, रूस-यूक्रेन युद्ध ने आधुनिक युद्धक्षेत्र में ड्रोन की महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर किया है। दोनों देशों द्वारा इलाके की रक्षा और उस पर कब्जा करने के लिए ड्रोन के इस्तेमाल ने एक नए हाइब्रिड वॉर को जन्म दिया है। ट्रम्प ने अपने आधिकारिक पत्र में अनमैन्ड एयरक्राफ्ट सिस्टम को अमरीका की राष्ट्रीय और आर्थिक सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी करार दिया है। एक्सपर्ट्स की राय: कॉमर्शियल मार्केट का ढांचा पूरी तरह बदलेगा अमरीका-चीन टेक्नोलॉजी प्रतिस्पर्धा के विशेषज्ञ क्रेग सिंगलेटन ने फाइनेंशियल टाइम्स को बताया कि यह फैसला कॉमर्शियल मार्केट को पूरी तरह से नया आकार देगा। क्रेग सिंगलेटन ने कहा कि अमरीकी कॉमर्शियल और सरकारी खरीदारों को तुरंत एक बड़े पूंजीगत बदलाव की जरूरत होगी। उन्हें अब अमरीका या सहयोगी देशों के सप्लायर्स की तरफ रुख करना होगा, भले ही उनके प्रोडक्ट्स की कीमत ज्यादा क्यों न हो। यह फैसला चीन के ड्रोन बाजार को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है और ट्रम्प तथा चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच होने वाली आगामी बैठक से पहले तनाव बढ़ा सकता है। क्या है अनमैन्ड एयरक्राफ्ट सिस्टम (UAS)? अनमैन्ड एयरक्राफ्ट सिस्टम (UAS) को सामान्य भाषा में ड्रोन कहा जाता है। ये ऐसे विमान होते हैं जिन्हें बिना किसी इंसानी पायलट के रिमोट कंट्रोल या ऑटोमैटिक सॉफ्टवेयर के जरिए उड़ाया जाता है। इनका इस्तेमाल फोटोग्राफी, सामान की डिलीवरी से लेकर मिलिट्री सर्विलांस और सटीक हमलों तक में किया जाता है। ये खबर भी पढ़ें… सुप्रीम कोर्ट बोला- पैकेज्ड फूड पर वॉर्निंग लेबल लगाओ: ज्यादा चीनी-नमक और फैट की जानकारी दो, सरकार ऐसा नहीं करती तो हम आदेश देंगे सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को पैकेज्ड फूड प्रोडक्ट्स के वॉर्निंग लेबल पर केंद्र सरकार और फूड सेफ्टी अथॉरिटी (FSSAI) को आखिरी चेतावनी दी है। कोर्ट ने कहा कि नमकीन, बिस्किट और चिप्स के पैकेट पर ज्यादा चीनी-नमक और फैट की चेतावनी देने वाले वॉर्निंग लेबल लगाने पर अगर सरकार फैसला नहीं ले पा रही है तो हम आदेश जारी करेंगे। पूरी खबर पढ़ें…

Arunachal Pradesh: अरुणाचल की 27 जगहों का भारत ने कर दिया पक्का नामकरण! चीन को मिर्ची क्यों लगी ये भी समझिए

Arunachal Pradesh: भारत और चीन के बीच अरुणाचल प्रदेश को लेकर विवाद एक बार फिर चर्चा में है। चीन द्वारा अरुणाचल प्रदेश के कुछ स्थानों के नाम बार-बार बदले जाने के जवाब में भारत ने पिछले सप्ताह औपचारिक रूप से राज्य के 27 स्थानों और भौगोलिक विशेषताओं को सर्वे ऑफ इंडिया के आधिकारिक मानचित्र पर उनके मानक भारतीय नामों के साथ दर्ज किया था। चीन के नागरिक मामलों का मंत्रालय 2017 से समय-समय पर अरुणाचल प्रदेश के विभिन्न स्थानों के लिए चीनी नाम जारी करता रहा है। ताकि उस क्षेत्र पर चीन के दावे को मजबूत किया जा सके। इस साल अप्रैल में भी नामों की एक नई लिस्ट जारी की गई थी।

अरुणाचल प्रदेश में स्थानों के नाम बदलने की चीन की हरकत को भारत ने हमेशा स्पष्ट रूप से खारिज किया है। भारत ने लगातार ऐसे कदमों को निरर्थक और बेतुक बताया है। भारत ने कहा है कि इस तरह के प्रयास इस अटल सच्चाई को नहीं बदल सकते कि अरुणाचल प्रदेश हमेशा भारत का अभिन्न हिस्सा रहा है, है और रहेगा। चीन तिब्बत को शीजांग और अरुणाचल प्रदेश को जांगनान कहता है।

भारत ने दिया सख्त संदेश

भारत द्वारा अरुणाचल प्रदेश की 27 जगहों और भौगोलिक क्षेत्रों को उनके आधिकारिक भारतीय नामों के साथ सर्वे ऑफ इंडिया के आधिकारिक मानचित्र पर दर्ज करना चीन को सख्त संदेश है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है, जब चीन लंबे समय से अरुणाचल प्रदेश के अलग-अलग स्थानों को अपने हिसाब से नाम देने की कोशिश करता रहा है। भारत ने चीन के इस कदम को पहले भी खारिज करते हुए साफ कहा है कि नाम बदलने से जमीन की वास्तविक स्थिति नहीं बदल सकती।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत-चीन सीमा से जुड़े मामलों को भारत बेहद गंभीरता से लेता है और वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC पर शांति और स्थिरता बनाए रखना दोनों देशों के संबंधों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

27 जगहों के नाम तय करने का क्या मतलब है?

भारत ने अरुणाचल प्रदेश के आधिकारिक नक्शे में 27 स्थानों और भौगोलिक विशेषताओं को उनके मानक भारतीय नामों से दर्ज किया है। सरकार के मुताबिक इसका उद्देश्य इन स्थानों की सटीक पहचान सुनिश्चित करना और आम लोगों के बीच इनके बारे में जागरूकता बढ़ाना है। इन स्थानों में कुछ ऐसे इलाके भी शामिल हैं, जिनका भारत-चीन सीमा विवाद के इतिहास और रणनीतिक दृष्टि से खास महत्व है।

जैसे लोंगजू (Long Ju) LAC के पास स्थित है। वर्ष 1959 में यह भारत-चीन तनाव के शुरुआती बड़े फ्लैशप्वाइंट में से एक रहा था, जब चीनी सेना ने इस इलाके में प्रवेश किया था। इसके अलावा अपर सुबनसिरी जिले का माजा गांव भी लिस्ट में शामिल है।

इसके अलावा इस लिस्ट में बिसा गांव तथा ऊंचाई वाले महत्वपूर्ण दर्रे ड्जो ला, रिजा ला और पुकुर ला भी शामिल हैं। वहीं, थाग ला भी इस लिस्ट का हिस्सा है, जो 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान बेहद महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्र रहा था।

थाग ला और 1962 के युद्ध का कनेक्शन

थाग ला का नाम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 1962 के भारत-चीन युद्ध के शुरुआती दौर में यहां बड़ी सैन्य कार्रवाई हुई थी। यह इलाका ऊंचाई पर स्थित होने के कारण रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।इसी तरह जयरामपुर को भी लिस्ट में शामिल किया गया है। चांगलांग जिले में स्थित जयरामपुर पूर्वी अरुणाचल प्रदेश और म्यांमार सीमा की ओर जाने वाला महत्वपूर्ण लॉजिस्टिक केंद्र है और सुरक्षा बलों की आवाजाही के लिहाज से इसका महत्व है।

लिस्ट में सांभो सरोवर, बारा कुंडुन, छोटा कुंडुन, धनबाड़ी, प्रीतनगर, तेरीतनगर, रामनगर और जसवंतगढ़ जैसे स्थान भी शामिल हैं। जसवंतगढ़ में 1962 के युद्ध में शहीद भारतीय सैनिक जसवंत सिंह रावत की स्मृति से जुड़ा स्मारक है। इसके अलावा सागर, पद्मा, ज्योतिनगर और बैसाखी जैसे गांव भी सूची में हैं।

चीन अरुणाचल के नाम क्यों बदलता रहा है?

चीन अरुणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा बताता रहा है। वह इसे जांगनान कहता है। इसी दावे के तहत चीन ने समय-समय पर अरुणाचल प्रदेश के अलग-अलग स्थानों के लिए चीनी नाम जारी किए हैं। चीन के नागरिक मामलों के मंत्रालय ने 2017 में पहली बार अरुणाचल प्रदेश के छह स्थानों के लिए नामों की लिस्ट जारी की थी। इसके बाद 2021 में 15 और 2023 में 11 स्थानों के नामों की लिस्ट जारी की गई।

भारत ने हर बार इन कोशिशों को खारिज किया है। नई दिल्ली का स्पष्ट रुख है कि किसी भारतीय इलाके का नाम बदलने की कोशिश से उसकी संप्रभुता या वास्तविक स्थिति पर कोई असर नहीं पड़ता।इसी बीच अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबनसिरी क्षेत्र में चीनी सैनिकों के आक्रामक रुख की खबरों ने भी चिंता बढ़ाई है। हालांकि चीन ने सीमा पर स्थिति को फिलहाल सामान्य और स्थिर बताया है।

 

अभी सीमा पर कैसे हैं हालात?

चीन ने बुधवार को कहा कि भारत-चीन सीमा पर स्थिति फिलहाल आम तौर पर स्थिर है। हालांकि, उसने अरुणाचल प्रदेश में सीमा के पास चीनी सेना की गतिविधियां बढ़ने संबंधी खबरों पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन मीडिया के इन सवालों का जवाब दे रहे थे कि क्या हाल में भारत के साथ कोई सैन्य घटना हुई है और क्या चीन ने अरुणाचल प्रदेश की सीमा के पास अपनी सैन्य गतिविधियां बढ़ा दी हैं।

गुओ ने कहा, “चीन-भारत सीमा पर स्थिति फिलहाल आम तौर पर स्थिर है।” उन्होंने बताया कि बीजिंग और नई दिल्ली ने भारत-चीन सीमा मामलों पर 36वीं बैठक पिछले हफ्ते आयोजित की थी।

भारत ने क्या कहा?

भारत ने मंगलवार को कहा था कि वह चीन की सीमा से लगे इलाकों से जुड़े मामलों को बेहद गंभीर मानता है। उसने इस बात पर जोर दिया था कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर शांति एवं स्थिरता बनाए रखना बेहद जरूर है, क्योंकि सीमा की स्थिति दोनों देशों के आपसी संबंधों की आगे की दिशा तय करेगी। यह बयान अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सुबनसिरी इलाके में चीनी सैनिकों के आक्रामक रुख अपनाने की अपुष्ट खबरों के बीच आया।

भारत ने अरुणाचल प्रदेश की 27 जगहों और भौगोलिक क्षेत्रों की पहचान उनके आधिकारिक नामों से करने के अपने फैसले की चीन की ओर से की गई आलोचना को भी खारिज कर दिया। उसने कहा कि अरुणाचल प्रदेश भारत का एक अटूट एवं अभिन्न हिस्सा है। इस अविवादित सत्य को कोई नहीं बदल सकता।

2020 से भारत और चीन के रिश्तों में भारी तनाव

वर्ष 2020 में पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में हुई भीषण झड़पों और उसके बाद चार साल से ज्यादा समय तक चले सैन्य टकराव के कारण भारत और चीन के रिश्तों में भारी तनाव आ गया था। इसके बाद द्विपक्षीय रिश्तों को फिर से बेहतर बनाने के लिए दोनों देशों ने पिछले करीब एक साल से ज्यादा समय में कई कदम उठाए हैं।

अक्टूबर 2024 में दोनों देशों ने पूर्वी लद्दाख में गतिरोध वाले अंतिम दो स्थान-देपसांग और डेमचोक से सैनिकों की वापसी से जुड़े समझौते को अंतिम रूप दिया था। समझौते को अंतिम रूप दिए जाने के कुछ दिनों बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने रूस के कजान में मुलाकात करके संबंध सुधारने के लिए कई फैसले लिए थे।

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पिछले साल अगस्त में मोदी शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के वार्षिक शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए चीन के तियानजिन शहर गए थे। एससीओ शिखर सम्मेलन से इतर pm मोदी और जिनपिंग के बीच विस्तृत बातचीत हुई थी। इस बैठक में पीएम मोदी ने कहा था कि भारत आपसी विश्वास, सम्मान और संवेदनशीलता के आधार पर चीन के साथ संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।