UNGA में डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा ऐलान, यूक्रेन युद्ध पर जल्द कुछ करूंगा, ईरान पर कड़ा रुख

UNGA में डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा ऐलान, यूक्रेन युद्ध पर जल्द कुछ करूंगा,  ईरान पर कड़ा रुख

donald trump

संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के मंच से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अपनी ट्रेडमार्क आक्रामक शैली में दुनिया को अपना कड़ा रुख दिखा दिया है। ट्रंप ने कहा कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार नहीं बना पाएगा। चुनाव के बाद ईरान से डील करेंगे। हमने यह युद्ध लगभग खत्म कर दिया है। ईरान का पूरी तरह से आर्थिक बहिष्कार करें।

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ट्रंप ने कहा कि मैंने 8 युद्ध खत्म करवाए। ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में उन देशों को चेतावनी दी जो रूस और ईरान से तेल या ऊर्जा खरीद रहे हैं। ट्रंप ने कहा कि रूस- यूक्रेन के युद्ध पर कुछ करने वाला हूं। हालांकि ट्रंप ने अपने भाषण में बड़े-बड़े दावे किए लेकिन चुनाव से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति की लोकप्रियता में बड़ी गिरावट आई है।  

यूक्रेन और मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध और तेज़ी से हो रहे AI डेवलपमेंट के खतरों जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा करने के लिए न्यूयॉर्क में UN जनरल असेंबली में दुनिया भर के लगभग 130 नेता इकट्ठा हो रहे हैं। असेंबली में अपने भाषण में, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि उन्हें लगता है कि नवंबर में होने वाले मिड-टर्म चुनावों के ठीक बाद अमेरिका ईरान के साथ कोई डील करेगा।

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस इवेंट में शामिल नहीं हो रहे हैं और इसके बजाय गुरुवार को वॉशिंगटन में ट्रंप के साथ आमने-सामने बातचीत करेंगे, जिससे दुनिया के बड़े मामलों से UN के किनारे हो जाने का डर और बढ़ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र को संबोधित करते हुए अपनी विदेश नीति और अमेरिका की सैन्य ताकत का उल्लेख किया। ट्रंप ने शांति के क्षेत्र में अपने रिकॉर्ड का जिक्र करते हुए कहा कि कई नेताओं ने शांति की बात की, लेकिन उन्होंने शांति कायम करने के लिए कदम उठाए।

 

ईरान का सीधे तौर पर जिक्र करते हुए ट्रंप ने कहा कि जब कुछ नेता खतरों को नजरअंदाज कर रहे थे, तब उन्होंने उनका सामना किया। उन्होंने कहा कि जहां दूसरे नेता साहस और ताकत की बात करते रहे, वहीं अमेरिका ने दोनों का प्रदर्शन किया। ट्रंप ने दावा किया कि उनके दृष्टिकोण ने अमेरिका को दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश बनाया है।

 

ट्रंप ने अमेरिका के ‘गोल्डन एज’ का किया दावा

 

ट्रंप ने पिछली सरकार से विरासत में मिले दौर को अमेरिका का “डार्क एज” बताते हुए कहा कि उनकी सरकार ने देश को “गोल्डन एज” की ओर बढ़ाया है। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका की संपत्ति, ताकत, ऊर्जा और गति से पूरी दुनिया को भी फायदा हो रहा है।

 

हालांकि, ईरान से जुड़े संघर्ष के मामले में व्हाइट हाउस के कई घोषित लक्ष्य अभी तक पूरी तरह हासिल नहीं हुए हैं। इस संघर्ष का आर्थिक असर भी पड़ा है, खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने के बाद वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बढ़ा है।

 

ईरान को लेकर ट्रंप ने रखे दो विकल्प

 

ईरान के साथ संभावित समझौते को लेकर ट्रंप ने कहा कि उनके सामने एक बड़ा फैसला है। उन्होंने कहा कि सवाल यह है कि क्या ऐसा समझौता हो सकता है, जिससे ईरान दोबारा निर्माण कर सके और पहले से कहीं अधिक मजबूत देश बन सके।

 

ट्रंप ने इसके साथ ही इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान को सैन्य कार्रवाई के जरिए पूरी तरह खत्म करने की संभावना का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ऐसा करने से ईरान के पास भविष्य में लोगों और देशों को नुकसान पहुंचाने का अवसर नहीं रहेगा।

 

हालांकि, ट्रंप ने कहा कि उन्हें विश्वास है कि अमेरिका के मध्यावधि चुनावों के बाद ईरान के साथ जल्द समझौता हो सकता है। उन्होंने दावा किया कि ईरान यह देखना चाहता है कि अमेरिका के मध्यावधि चुनावों में उनका प्रदर्शन कैसा रहता है। ट्रंप ने यह भी कहा कि वह इस चुनाव में उम्मीदवार नहीं होंगे और पहले ही चुनाव लड़कर भारी जीत हासिल कर चुके हैं।

 

पुतिन से बोले ट्रंप- यूक्रेन युद्ध खत्म करें

 

संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय पहुंचने पर ट्रंप ने अमेरिका की प्रगति का जिक्र किया। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लिए संदेश पूछे जाने पर ट्रंप ने संक्षेप में कहा कि उन्हें “युद्ध खत्म करना चाहिए”।

 

ट्रंप के निशाने पर फिर संयुक्त राष्ट्र

राष्ट्रपति बनने के बाद से ट्रंप संयुक्त राष्ट्र और महासचिव एंटोनियो गुटेरेस की कार्यप्रणाली की आलोचना करते रहे हैं। पिछले वर्ष संयुक्त राष्ट्र में उनके संबोधन के दौरान भी कई शिकायतें सामने आई थीं। इनमें संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय की एस्केलेटर के कुछ समय के लिए बंद होने और टेलीप्रॉम्प्टर में आई तकनीकी समस्या को लेकर की गई टिप्पणियां शामिल थीं।

 

संयुक्त राष्ट्र की आलोचना के बावजूद, अमेरिका ने पिछले सप्ताह संयुक्त राष्ट्र के बजट में करीब 72.5 करोड़ डॉलर का भुगतान किया। इससे संगठन को कुछ वित्तीय दबाव से राहत मिली और उसके मतदान अधिकारों पर संभावित असर का जोखिम टला।

 

ट्रंप के इस वर्ष के संबोधन में संयुक्त राष्ट्र की आलोचना के साथ-साथ उनकी सरकार की विदेश नीति की उपलब्धियों को सामने रखने पर भी जोर रहा। इसमें ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियान और मध्य पूर्व में कूटनीतिक पहलों का विशेष उल्लेख शामिल है।

तो प्रदूषण के पैसे देने पड़ते हैं 

ट्रम्प ने कहा कि अमेरिका ने दुनिया के जहाजों पर कार्बन टैक्स लगाने की योजना को रोकने के लिए दखल दिया। यह योजना संयुक्त राष्ट्र की संस्था इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन (IMO) ला रही थी। इसके तहत दुनियाभर की शिपिंग कंपनियों को अपने जहाजों से होने वाले प्रदूषण के लिए टैक्स देना पड़ता। ट्रम्प ने कहा कि यह बहुत महंगा टैक्स होता, इसलिए अमेरिका को इसे रोकने के लिए आगे आना पड़ा। अगर यह योजना लागू हो जाती तो यह पहली बार होता जब पूरे शिपिंग उद्योग को अपने प्रदूषण के लिए पैसे देने पड़ते।

Gold Silver Prices: दिल्ली सर्राफा बाजार में सोना 1500 रुपये गिरा, चांदी में बदलाव नहीं

Gold Silver Prices: दिल्ली सर्राफा बाजार में सोने में 22 सितंबर को गिरावट आई। यह 1,500 रुपये गिरकर 1,54,900 रुपये प्रति 10 ग्राम पर आ गया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने पर दबाव का असर इसकी घरेलू कीमतों पर पड़ा। दिल्ली सर्राफा बाजार में यह सोने में गिरावट का लगातार दूसरा दिन था।

चांदी की कीमतें 2.42 लाख रुपये पर स्थिर

दिल्ली सर्राफा बाजार में चांदी कीमत 2.42 लाख रुपये प्रति किलोग्राम पर अपरिवर्तित रही। एचडीएफसी सिक्योरिटीज में सीनियर कमोडिटीज एनालिस्ट सौमिल गांधी ने कहा, “सोने में मंगलवार को भी गिरावट देखने को मिली। इसकी वजह फेडरल रिजर्व के अधिकारियों का बयान और अमेरिकी डॉलर में मजबूती है।”

डॉलर इंडेक्स में मजबूती का सोने पर असर

डॉलर इंडेक्स 100 से ऊपर बना हुआ है। यह जुलाई के आखिर के बाद से इसका सबसे हाई लेवल है। डॉलर में मजबूती से दूसरी करेंसी में सोना खरीदना महंगा हो जाता है, जिसका असर उसकी कीमतों पर पड़ता है। इस बीच, फेडरल रिजर्व के अधिकारियों ने कहा है कि इंटरेस्ट रेट लंबे समय तक हाई बना रह सकता है।

क्रूड में गिरावट का फिलहाल सोने पर असर नहीं 

क्रूड की कीमतों में गिरावट आई है। लेकिन, फिलहाल इसका असर गोल्ड पर नहीं दिख रहा। ब्रेंट क्रूड की कीमत गिरकर 98.95 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई है। यह हाल में 108-109 डॉलर प्रति बैरल के करीब आ गई है। क्रूड में नरमी से महंगाई बढ़ने का डर घटा है। लेकिन, कीमत अब भी फरवरी में अमेरिका-ईरान के बीच लड़ाई शुरू होने से पहले के लेवल से काफी ज्यादा है।

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अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सोने और चांदी में कमजोरी

अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने में गिरावट दिखी। स्पॉट गोल्ड करीब 1 फीसदी गिरकर 4,315 डॉलर प्रति औंस पर चल रहा था। स्पॉट सिल्वर भी नरमी के साथ 65.60 डॉलर प्रति औंस पर था। इस बीच, इनवेस्टर्स की नजरें गुरुवार को न्यूयॉर्क में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात पर लगी हैं। माना जा रहा है कि इस बैठक में मध्यपूर्व क्राइसिस पर भी चर्चा होगी।

Bitcoin 8 महीने के हाई पर पहुंचा, क्रिप्टो में आई इस तेजी की वजह क्या है?

Bitcoin Price: ग्लोबल रिस्क एसेट्स में सुधार का असर क्रिप्टोकरेंसी पर भी दिखा। यहीं वजह है कि बिटकॉइन की कीमत $87,000 के पार जाकर 8 महीने के हाई पर पहुंच गई। US स्पॉट बिटकॉइन ETF में नई खरीदारी और शॉर्ट कवरिंग ने भी इस तेजी को बढ़ावा दिया। ब्लूमबर्ग के अनुसार, न्यूयॉर्क में बिटकॉइन की कीमत 7.7% बढ़कर $87,354 हो गई। पिछले हफ़्ते के निचले स्तर से इसकी कीमत में $10,000 से ज़्यादा का उछाल आया है। यह क्रिप्टोकरेंसी जनवरी के आखिर में देखे गए स्तरों के आसपास ट्रेड कर रही थी, हालांकि यह अक्टूबर में बने अपने रिकॉर्ड हाई से अभी भी लगभग एक-तिहाई नीचे है।

यह तेजी ग्लोबल स्टॉक और बॉन्ड में बढ़त के साथ आई। तेल की कम कीमतों और US प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप और चीनी प्रेसिडेंट शी जिनपिंग के बीच होने वाली प्रस्तावित समिट को लेकर उम्मीदों ने मार्केट के सेंटीमेंट को बेहतर बनाया। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, छोटी क्रिप्टोकरेंसी में भी बढ़त देखी गई। डॉजकॉइन (Dogecoin) में 14% तक और XRP में लगभग 8% की बढ़ोतरी हुई।

इस तेज़ी के दौरान क्रिप्टो मार्केट में बड़े पैमाने पर पोजीशन लिक्विडेशन भी देखा गया।

ब्लूमबर्ग ने CoinGlass के डेटा का हवाला देते हुए बताया कि 24 घंटों में डिजिटल एसेट्स में लॉन्ग और शॉर्ट पोजीशन का लिक्विडेशन लगभग $1 बिलियन तक पहुंच गया, जो अगस्त के आखिर के बाद सबसे ज़्यादा स्तर है।

इस दौरान हुए लिक्विडेशन में शॉर्ट पोजीशन का हिस्सा लगभग $878 मिलियन था।

बिटकॉइन अब तक लगभग 44% ऊपर 

मुद्रेक्स (Mudrex) के बिजनेस हेड प्रतीक गुप्ता ने कहा कि फेडरल रिजर्व के रुख को अपेक्षाकृत नरम (dovish) माने जाने के बाद रिस्क के लिए बेहतर माहौल बना, जिससे इस तेज़ी को सपोर्ट मिला। साथ ही, तेल की गिरती कीमतों ने महंगाई को लेकर चिंताएं कम करने में मदद की। उन्होंने शॉर्ट कवरिंग को भी एक अतिरिक्त वजह बताया।

मुद्रेक्स के अनुसार, इस तिमाही में बिटकॉइन अब तक लगभग 44% ऊपर है। कंपनी ने कहा कि यह 2024 की चौथी तिमाही के बाद से इसकी सबसे मज़बूत तिमाही बढ़त होगी। फर्म ने यह भी बताया कि स्ट्रैटेजी (Strategy) ने 950 और बिटकॉइन जोड़े हैं, जिससे उनकी होल्डिंग 846,000 बिटकॉइन हो गई है।

ETF में आने वाले फंड (इनफ्लो) ने भी सपोर्ट का एक और ज़रिया दिया है।

गियोटस (Giottus) के CEO विक्रम सुब्बुराज ने कहा कि हफ़्ते की शुरुआत में भारी आउटफ्लो के बाद, US स्पॉट बिटकॉइन ETF में 18 सितंबर को $433 मिलियन और 21 सितंबर को $617.6 मिलियन का इनफ्लो दर्ज किया गया। CoinSwitch के मार्केट्स डेस्क ने कहा कि बिटकॉइन का $87,000 से ऊपर जाना $82,000 के लेवल को तोड़ने के बाद हुआ, जबकि लगभग $750 मिलियन की शॉर्ट पोजीशन लिक्विडेट हो गईं। उन्होंने फ्यूचर्स ओपन इंटरेस्ट में लगभग $2 बिलियन की बढ़ोतरी की ओर भी इशारा किया, जिससे पता चलता है कि कीमत में उछाल के साथ-साथ लेवरेज भी बढ़ा है।

हालांकि, लेवरेज में बढ़ोतरी का मतलब है कि इस उछाल का टिके रहना इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या स्पॉट डिमांड कीमतों को सपोर्ट करती रहती है। CoinSwitch ने कहा कि मजबूत अंडरलाइंग बाइंग महत्वपूर्ण होगी क्योंकि बढ़ी हुई पोजीशनिंग से कीमतों में तेज गिरावट का जोखिम भी बढ़ सकता है।

बिटकॉइन के लिए अहम लेवल क्या हैं?

WazirX के फाउंडर निश्चल शेट्टी ने कहा कि $86,000 से ऊपर जाने का मतलब है कि महीनों के दबाव के बाद मार्केट सेंटीमेंट में सुधार हुआ है। उन्होंने $80,000 से ऊपर रिकवरी, US एजेंसियों की लगातार रेगुलेटरी एक्टिविटी और तेल की कीमतों व ट्रेजरी यील्ड में नरमी को इस उछाल को सपोर्ट करने वाले कारकों के रूप में बताया।

शेट्टी ने इंस्टीट्यूशनल एक्टिविटी में नई तेजी पर भी जोर दिया। उनके डेटा के अनुसार, US स्पॉट बिटकॉइन ETF में लगभग $617.6 मिलियन का डेली नेट इनफ्लो दर्ज किया गया, जो लगभग 7,610 बिटकॉइन के बराबर है, जबकि कुल ETF ट्रेडिंग वॉल्यूम लगभग $5.72 बिलियन था। US स्पॉट इथेरियम ETF में भी लगभग 55,640 ETH का नेट इनफ्लो दर्ज किया गया।

ZebPay में ट्रेड के हेड हरीश जी वतनानी ने कहा कि बिटकॉइन की रिकवरी CLARITY एक्ट के लिए झटके और फेडरल रिजर्व के रेट फैसले को लेकर अनिश्चितता के दौर के बाद हुई। उन्होंने कहा कि मार्केट ने शुरू में नेगेटिव प्रतिक्रिया दी, लेकिन इन दो घटनाओं को लेकर अनिश्चितता खत्म होने के बाद यह स्थिर हो गया।

वतनानी ने कहा, “स्पॉट बिटकॉइन ETF में नए इनफ्लो, शॉर्ट कवरिंग और बेहतर होते व्यापक रिस्क सेंटीमेंट ने इस मूवमेंट को और सपोर्ट किया है।” यह उछाल ऑल्टकॉइन्स तक भी फैल गया है।

CoinDCX में एग्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट और ग्रोथ व क्रिप्टो बिजनेस हेड मिनल ठुकराल ने कहा कि बिटकॉइन कुछ ही घंटों में लगभग $82,000 से बढ़कर $85,000 से ऊपर पहुंच गया, और इस मूवमेंट को शुरू में US स्पॉट बिटकॉइन ETF इनफ्लो और तेल व इक्विटी मार्केट में बेहतर होते सेंटीमेंट से सपोर्ट मिला। थुकराल ने कहा कि इसके बाद रैली एक ऐसे ज़ोन में पहुंच गई जहां बहुत ज़्यादा ‘शॉर्ट’ पोजीशन थीं। एक घंटे में 300 मिलियन डॉलर से ज़्यादा की शॉर्ट पोजीशन बंद (लिक्विडेट) हो गईं, जिससे कीमतें बढ़ने पर ट्रेडर्स को बिटकॉइन वापस खरीदना पड़ा। उन्होंने यह भी बताया कि SUI और NEAR में 20% से ज़्यादा की बढ़त हुई, जबकि RENDER और AVAX में लगभग 17% से 18% की बढ़ोतरी देखी गई।

तेज़ी से हुई इस रिकवरी के बावजूद, एनालिस्ट्स ने चेतावनी दी कि इस बदलाव को व्यापक मैक्रो-इकोनॉमिक माहौल के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रेडर्स कच्चे तेल की कीमतों और US ट्रेजरी यील्ड के ऊँचे स्तर को लेकर चिंतित बने हुए हैं, जबकि फेडरल रिजर्व की पॉलिसी का असर रिस्क वाले एसेट्स पर पड़ना जारी रह सकता है।

इन्वेस्टर्स के लिए, सुब्बुराज ने कहा कि ब्रेकआउट के बाद $82,000-$82,800 का दायरा नज़र रखने के लिए एक अहम सपोर्ट ज़ोन होगा। थुकराल ने कहा कि जो इन्वेस्टर्स लंबे समय के लिए निवेश करना चाहते हैं, वे कई बार में खरीदारी करने पर विचार कर सकते हैं, जबकि एक्टिव ट्रेडर्स को इस तेज़ी के बाद पोजीशन साइज़, कोलेटरल और लिक्विडेशन लेवल पर बारीकी से ध्यान देना चाहिए।

(डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सार्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

ट्रम्प ने कहा- अमेरिका में अब ‘AI फोर्स’ बनेगी:ये आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की निगरानी करेगी; 2019 में स्पेस फोर्स की भी घोषणा की थी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने शनिवार को नया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सलाहकार नियुक्त करने की योजना के बारे में बताया। उन्होंने एक ‘AI फोर्स’ बनाने का ऐलान किया। ट्रम्प ने ट्रुथ सोशल पर यह जानकारी दी। उन्होंने दोनों योजनाओं के ढांचे और उन्हें लागू करने का तरीका नहीं बताया। यह ऐलान ऐसे समय हुआ है, जब अमेरिका और चीन AI में बढ़त हासिल करने की होड़ में हैं। ट्रम्प की गुरुवार को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात होनी है। ट्रम्प ने कहा कि उनका प्रशासन AI को बढ़ावा देगा। संभावित गलत कामों से निपटने के लिए मौजूदा आपराधिक और सिविल न्याय व्यवस्था का इस्तेमाल किया जाएगा। ट्रम्प ने 2019 में स्पेस फोर्स बनाई थी। ट्रम्प ने लिखा, “हम इस शानदार उद्योग की ग्रोथ को किसी भी तरह नहीं रोकेंगे या दबाएंगे। इसके बजाय, हम इसे महत्व देंगे, मदद करेंगे और इसके बढ़ने पर नजर रखेंगे।” ट्रम्प ने कहा हम AI इंडस्ट्री को खत्म नहीं करना चाहते ट्रम्प ने AI और डेटा सेंटर के आलोचकों पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि उदारवादी लोग इस इंडस्ट्री को ‘खत्म’ करना चाहते हैं। ट्रम्प ने लिखा, “अमेरिका के राष्ट्रपति के तौर पर मैं ऐसा नहीं होने दूंगा।” उन्होंने आगे लिखा, “हम किसी भी तरह इस शानदार इंडस्ट्री के विकास में रुकावट नहीं डालेंगे। हम इसे बढ़ने में मदद करेंगे और इसकी निगरानी करेंगे।” अमेरिका में AI कंपनियों के खिलाफ केस अमेरिका में एंथ्रोपिक, OpenAI, स्पेसएक्सएआई और गूगल के खिलाफ शनिवार को मुकदमा दायर हुआ है। इन कंपनियों पर AI विकास की रफ्तार धीमी करने के लिए अवैध समझौते का आरोप है। इसमें कहा गया है कि कंपनियों ने एंटीट्रस्ट कानून तोड़े हैं। याचिका के मुताबिक, कंपनियों के बीच तालमेल से पेड AI सब्सक्रिप्शन लेने वाले ग्राहकों को मिलने वाला लाभ कम हो सकता है। इससे पहले 12 सितंबर को एंथ्रोपिक के CEO डारियो अमोडेई ने AI विकास धीमा करने और सुरक्षा उपाय बढ़ाने के लिए उद्योग-स्तरीय सहयोग की अपील की थी। इसके बाद OpenAI के CEO सैम ऑल्टमैन, स्पेसएक्सएआई के CEO एलन मस्क और गूगल डीपमाइंड के सह-संस्थापक व चेयर डेमिस हासाबिस ने उनके प्रस्ताव पर सहमति जताई। मुकदमे में कहा गया है कि AI क्षेत्र के प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों के बीच विकास की रफ्तार प्रतियोगिता से कम रखने का समझौता उपभोक्ताओं के खिलाफ प्रतिस्पर्धा-विरोधी असर डालता है। ———————————————– ये खबर भी पढ़ें… आज का एक्सप्लेनर:‘2030 तक AI हम सबको मार सकता है’, रिसर्चर के इस्तीफे में चेतावनी; AI की दुनिया में अंदरखाने ऐसा क्या चल रहा ChatGPT बनाने वाली कंपनी OpenAI का दावा है कि उनके AI सिस्टम ने गणित की उस समस्या को 88 घंटे में सुलझा लिया, जिसने करीब 90 साल से इंसानों को उलझा रखा था। पूरी खबर पढ़ें…

ट्रम्प का दावा- डेनमार्क और ग्रीनलैंड के साथ समझौता हुआ:अमेरिका ग्रीनलैंड में ज्यादा सैनिक तैनात करेगा; डेनमार्क ने कहा- संप्रभुता बरकरार रहेगी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने शुक्रवार को कहा कि अमेरिका ने डेनमार्क और ग्रीनलैंड के साथ एक समझौता किया है। इसके तहत ग्रीनलैंड में अमेरिका की सैन्य मौजूदगी बढ़ेगी। ट्रम्प के ऐलान के कुछ देर बाद डेनमार्क के प्रधानमंत्री कार्यालय ने कहा कि समझौते से डेनमार्क और ग्रीनलैंड की संप्रभुता बरकरार रहेगी। ग्रीनलैंड डेनमार्क के अधीन एक स्वशासित क्षेत्र है। समझौते की पूरी जानकारी अभी सामने नहीं आई है। समझौते पर अगले हफ्ते संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के दौरान अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड की सरकारें हस्ताक्षर करेंगी। इसे लागू करने से पहले डेनमार्क और ग्रीनलैंड की संसदों की मंजूरी जरूरी होगी। ग्रीनलैंड में अमेरिका विरोधी देशों के सैन्य अड्डे नहीं होंगे ट्रम्प ने कहा कि समझौते के तहत अमेरिका के विरोधी देश ग्रीनलैंड में सैन्य अड्डा नहीं बना सकेंगे। ट्रम्प के मुताबिक, ग्रीनलैंड में संवेदनशील क्षेत्रों में कोई बड़ा निवेश भी अमेरिका की लिखित मंजूरी के बिना नहीं किया जा सकेगा। अमेरिकी विदेश विभाग के एक अधिकारी ने भी कहा कि नाटो से बाहर के देशों को ग्रीनलैंड में सैन्य अड्डा बनाने या सैन्य मौजूदगी रखने की अनुमति नहीं होगी। ग्रीनलैंड आजाद हुआ तो भी अमेरिकी सेना की पहुंच रहेगी अमेरिकी विदेश विभाग के अधिकारी के मुताबिक, समझौता ग्रीनलैंड के भविष्य में स्वतंत्र देश बनने की स्थिति में भी लागू रहेगा। ग्रीनलैंड लंबे समय में आजादी की मांग कर रहा है और वहां कई लोग स्वतंत्र देश चाहते हैं। अभी ग्रीनलैंड डेनमार्क के अधीन है और उसकी रक्षा की जिम्मेदारी डेनमार्क के पास है। ट्रम्प प्रशासन की एक बड़ी चिंता यह रही है कि अगर भविष्य में ग्रीनलैंड आजाद हो जाता है, तो भी अमेरिकी सेना को वहां मौजूदा सैन्य पहुंच मिलती रहे। अमेरिका नए सैन्य ठिकाने भी बना सकता है ट्रम्प ने कहा कि अमेरिका ग्रीनलैंड में बड़ी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने की प्रक्रिया तुरंत शुरू करेगा। उन्होंने कहा कि ग्रीनलैंड में कई ऐसी जगहें हैं, जहां अमेरिकी सेना की मौजूदगी बढ़ाई जा सकती है। शीत युद्ध के दौरान अमेरिका के ग्रीनलैंड में एक दर्जन से ज्यादा सैन्य ठिकाने थे। बाद में इनमें से ज्यादातर बंद कर दिए गए। फिलहाल वहां अमेरिका का पिटुफिक स्पेस बेस मौजूद है। हाल के हफ्तों में अमेरिकी सैन्य अधिकारी ग्रीनलैंड का दौरा कर पुराने सैन्य ठिकानों को फिर से खोलने की संभावनाएं देख रहे हैं। 1951 से ग्रीनलैंड में अमेरिकी सेना की मौजूदगी अमेरिका ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान पहली बार ग्रीनलैंड में सैन्य मौजूदगी बनाई थी। 1951 में अमेरिका और डेनमार्क के बीच एक रक्षा समझौता हुआ। इसके तहत अमेरिका को ग्रीनलैंड में सैन्य ठिकाने चलाने और वहां अपनी सेना की गतिविधियां करने की काफी आजादी मिली। इस समझौते में नाटो देशों की सेनाओं को भी ग्रीनलैंड में पहुंच की अनुमति थी। लेकिन इसमें रूस या चीन जैसे देशों की सैन्य मौजूदगी पर साफ रोक नहीं थी। नए समझौते में गैर-नाटो देशों को सैन्य अड्डा बनाने और सेना रखने से रोकने की बात कही गई है। हालांकि, ग्रीनलैंड नाटो क्षेत्र का हिस्सा है, इसलिए किसी गैर-नाटो देश के वहां सैन्य अड्डा बनाने की संभावना पहले से ही काफी कम मानी जाती थी। जनवरी में अमेरिका-डेनमार्क के बीच तनाव बढ़ गया था ट्रम्प लंबे समय से ग्रीनलैंड को अमेरिका के साथ जोड़ने की इच्छा जाहिर करते रहे हैं। लेकिन डेनमार्क और ग्रीनलैंड के नेताओं ने इस विचार को खारिज किया है। इस साल जनवरी में दोनों पक्षों के बीच तनाव इतना बढ़ गया था। डेनमार्क की सेना ने अमेरिकी हमले की स्थिति के लिए ग्रीनलैंड के एयरफील्ड को नष्ट करने तक की योजना बनाई थी। डेनमार्क ने ग्रीनलैंड में सैनिक भी भेजे थे। हालांकि, ऐसी स्थिति कभी नहीं आई। ———————— यह खबर भी पढ़ें… रिपोर्ट- ट्रम्प को भरोसा, जिनपिंग से अपनी बात मनवा लेंगे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प 24 सितंबर को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मिलेंगे। पूरी खबर पढ़ें…

रूस पर ट्रंप का शिकंजा, 100% टैरिफ वाले बिल पर किया साइन, जानें भारत और चीन पर कैसे पड़ेगा असर

Russia Sanctions Bill: भारत और चीन जैसे देशों के लिए एक बड़ी और चिंता बढ़ाने वाली खबर सामने आई है। दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाने वाले नए कानून पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इस बिल से उन्हें उन देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल गया है जो रूस से तेल और गैस खरीदते हैं।

Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 के तहत रूस के एनर्जी सेक्टर, सीनियर अधिकारियों, वित्तीय संस्थानों और उन टैंकरों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी, जिन्हें पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों से बचने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इन टैंकरों को आमतौर पर ‘शैडो फ्लीट’ कहा जाता है।

भारत-चीन पर कैसे पड़ेगा असर?

बुधवार को हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने यह कानून 262-159 के अंतर से पास कर दिया। इससे पहले इस बिल को सीनेट से मंजूरी मिल चुकी थी। नए कानून के तहत रूस से तेल या गैस खरीदने वाले पांच सबसे बड़े खरीदार देशों पर 100% तक टैरिफ लगाया जा सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत या चीन पर तुरंत 100% टैरिफ लगा दिया जाएगा। टैरिफ लगाना है या नहीं और अगर लगाना है तो किस दर पर, इसका फैसला राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप करेंगे।

जानकारी के मुताबिक, इस कानून का मकसद एनर्जी एक्सपोर्ट से मॉस्को की कमाई कम करना और यूक्रेन युद्ध को लेकर उस पर दबाव बढ़ाना है।

कब लागू हो सकता है टैरिफ?

यह कानून राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के 30 दिनों के भीतर लागू हो जाएगा। इसके तहत, उन देशों से आयातित सामान पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाना जरूरी है, जो कानून बनने से पहले के 12 महीनों में कुल मात्रा के हिसाब से रूसी कच्चे तेल या प्राकृतिक गैस के शीर्ष पांच खरीदार रहे हों। अगर किसी देश का रूसी गैस आयात, लागू अवधि के दौरान रूस के कुल निर्यात का 15 प्रतिशत से कम रहा हो और उसने उस आयात को कम करने के लिए “महत्वपूर्ण कदम” उठाए हों, तो उसे गैस से जुड़े शुल्कों से छूट मिलती है।

भारत ने रिश्तों पर असर पड़ने की चेतावनी दी

भारत ने वॉशिंगटन को पहले ही चेतावनी दे दी है कि नए कदमों से दोनों देशों के रिश्तों पर असर पड़ सकता है। नई दिल्ली ने कहा है कि वह एनर्जी सिक्योरिटी के लिए प्रतिबद्ध है और मार्केट की स्थितियों के आधार पर अलग-अलग सप्लायर्स से तेल खरीदना जारी रखेगी।

बता दें कि भारत, रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले दुनिया के सबसे बड़े देशों में से एक है। जबकि चीन भी एक बड़ा खरीदार है, इसलिए नए कानून के तहत दोनों देशों पर असर पड़ सकता है।

वहीं, इस कानून से ट्रंप को टैरिफ के बारे में बड़े फैसले लेने की छूट मिलती है और कुछ खास स्थितियों में छूट देने का भी प्रावधान है।

भारत के लिए यह कानून ऐसे समय में आया है, जब नई दिल्ली, रूस से तेल खरीदने को लेकर वॉशिंगटन के बढ़ते दबाव और अपनी एनर्जी की जरूरतों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है।

शी जिनपिंग के दौरे से बढ़ सकती है टेंशन

सूत्रों के मुताबिक, ट्रंप के इस कदम से ठीक पहले, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग 24 सितंबर को अमेरिकी राष्ट्रपति से बातचीत के लिए वॉशिंगटन आने वाले हैं।

यह बैठक एक दशक में शी की पहली व्हाइट हाउस यात्रा होगी और इस साल दोनों नेताओं के बीच आमने-सामने की दूसरी मुलाकात होगी। इससे पहले उनकी मुलाकात मई में बीजिंग में हुई थी।

इस बैठक में व्यापार एक अहम मुद्दा हो सकता है। इसके अलावा ताइवान को लेकर तनाव, ईरान युद्ध, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अमेरिका-चीन के बीच टैरिफ (आयात शुल्क) को लेकर बनी अस्थायी शांति को आगे बढ़ाने की कोशिशों पर भी चर्चा हो सकती है।

गौरतलब है कि रूस पर लगाए गए नए प्रतिबंधों वाला कानून दोनों देशों के बीच दबाव का एक और मुद्दा बन सकता है, क्योंकि चीन रूस से ऊर्जा खरीदने वाले दुनिया के सबसे बड़े देशों में शामिल है।

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ट्रम्प ने सऊदी को F-35 फाइटर-जेट बेचने की मंजूरी दी:48 विमानों के लिए 2.3 लाख करोड़ रुपए की डील, अब कांग्रेस की मंजूरी जरूरी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के प्रशासन ने सऊदी अरब को 48 F-35 फाइटर जेट बेचने की मंजूरी दे दी है। इन विमानों की कीमत करीब 24 अरब डॉलर यानी ₹2.3 लाख करोड़ है। हालांकि, डील पूरी होने से पहले अमेरिकी कांग्रेस की मंजूरी जरूरी है। इस बीच अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने चिंता जताई है कि F-35 की संवेदनशील तकनीक चीन के हाथ लग सकती है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, पेंटागन की डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (DIA) की एक रिपोर्ट में इस खतरे का जिक्र किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन सऊदी अरब में जासूसी करके या वहां की सेना के साथ अपने सहयोग के जरिए F-35 की तकनीक हासिल करने की कोशिश कर सकता है। F-35 की कौन-सी तकनीक की चिंता? F-35 अमेरिका का सबसे आधुनिक लड़ाकू विमान माना जाता है। इसमें बेहद आधुनिक रडार और निगरानी सिस्टम लगे हैं। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को डर है कि अगर चीन को इन सिस्टम से जुड़ी जानकारी मिल गई तो अमेरिकी सैन्य तकनीक को नुकसान हो सकता है। इसलिए रिपोर्ट में कहा गया है कि F-35 से जुड़ी जगहों पर सिर्फ अमेरिकी और सऊदी अधिकारियों और अधिकृत कर्मचारियों को ही जाने की अनुमति होनी चाहिए। चीन से सऊदी की बढ़ती दोस्ती चिंता की वजह सऊदी अरब के चीन के साथ पहले से सैन्य और तकनीकी संबंध हैं। सऊदी चीन से बैलिस्टिक मिसाइलें भी खरीदता है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, चीन सऊदी को मिसाइल बनाने और उनका इस्तेमाल बेहतर करने में भी मदद कर रहा है। सऊदी के टेलीकॉम और दूसरे ढांचे में चीन की कंपनियों हुआवे और ZTE के उपकरण भी इस्तेमाल होते हैं। अमेरिकी एजेंसियों ने इन उपकरणों को लेकर भी सवाल उठाए हैं। UAE को F-35 बेचने की डील रोकनी पड़ी थी अमेरिका को अरब देशों को F-35 देने में चीन से जुड़ी चिंता पहले भी रही है। 2020 में ट्रम्प प्रशासन ने UAE को F-35 बेचने पर सहमति दी थी। उस समय भी अमेरिकी एजेंसियों ने UAE के चीन के साथ बढ़ते सैन्य और तकनीकी संबंधों को लेकर चिंता जताई थी। बाद में वह बिक्री प्रक्रिया रोक दी गई थी। सऊदी अरब को F-35 देने पर इजराइल ने भी चिंता जताई है। इजराइल फिलहाल मिडिल-ईस्ट का एकमात्र देश है जिसके पास F-35 विमान हैं। अमेरिका की नीति रही है कि मिडिल-ईस्ट में इजराइल की सैन्य बढ़त बनी रहे। इसलिए सऊदी को F-35 देने के मामले में यह भी देखा जा रहा है कि इससे इजराइल की सैन्य बढ़त पर असर न पड़े। फाइटर जेट्स की डिलीवरी में कई साल लगेंगे अमेरिकी विदेश विभाग ने जून में 48 F-35 विमानों और एक अतिरिक्त इंजन की बिक्री का प्रस्ताव कांग्रेस की दो समितियों को भेजा था। F-35 बनाने वाली अमेरिकी कंपनी लॉकहीड मार्टिन है। विमान तैयार करने और उनकी डिलीवरी में कई साल लग सकते हैं। यानी ट्रम्प प्रशासन की मंजूरी के बावजूद सऊदी को विमान तुरंत नहीं मिलेंगे। सऊदी अरब लंबे समय से F-35 खरीदना चाहता था। अमेरिका और सऊदी के बीच कई दशकों से सैन्य सहयोग है और सऊदी अमेरिकी हथियारों का बड़ा खरीदार है। ———————– ये खबर भी पढ़ें… रिपोर्ट: ट्रम्प को भरोसा, जिनपिंग से अपनी बात मनवा लेंगे:चीनी राष्ट्रपति निजी रिश्तों से ज्यादा देशहित को देते हैं तरजीह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प 24 सितंबर को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मिलेंगे। ट्रम्प को भरोसा है कि शी के साथ उनके अच्छे निजी रिश्ते बातचीत में अमेरिका के काम आएंगे। पूरी खबर यहां पढ़ें…

रिपोर्ट: ट्रम्प को भरोसा, जिनपिंग से अपनी बात मनवा लेंगे:चीनी राष्ट्रपति निजी रिश्तों से ज्यादा देशहित को देते हैं तरजीह

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प 24 सितंबर को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मिलेंगे। ट्रम्प को भरोसा है कि शी के साथ उनके अच्छे निजी रिश्ते बातचीत में अमेरिका के काम आएंगे। लेकिन द अटलांटिक की रिपोर्ट के मुताबिक, शी निजी रिश्तों से ज्यादा चीन के हित को महत्व देते हैं। पिछले दो साल में इसके दो उदाहरण भी सामने आए। दोनों मामलों में चीन के जवाब के बाद अमेरिका को अपने कदम पीछे खींचने पड़े। पहला मामला: टैरिफ अप्रैल 2025 में ट्रम्प ने चीन से आने वाले सामान पर बहुत ज्यादा टैरिफ लगा दिया। मकसद था चीन पर दबाव बनाना, ताकि वह अमेरिका की शर्तें मान ले। चीन ने भी अमेरिका के सामान पर जवाबी टैरिफ लगा दिए। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार पर असर पड़ने लगा। आखिरकार ट्रम्प को अपने लगाए कुछ टैरिफ कम करने पड़े। दूसरा मामला: रेयर अर्थ इसके बाद चीन ने रेयर अर्थ के निर्यात पर नए नियम लगा दिए। रेयर अर्थ ऐसी धातुएं हैं, जिनका इस्तेमाल मोबाइल, इलेक्ट्रिक गाड़ियों, इलेक्ट्रॉनिक्स और हथियारों में होता है। चीन इन धातुओं का बड़ा उत्पादक है। इसलिए उसके निर्यात पर रोक से अमेरिका की कई कंपनियों के लिए कच्चे माल की सप्लाई प्रभावित हो सकती थी। चीन के इस कदम के बाद अमेरिका ने भी चीन पर लगाए कुछ निर्यात प्रतिबंधों में ढील दे दी। दोनों की बातचीत में फर्क ट्रम्प को लगता है कि शी के साथ उनके अच्छे रिश्ते बातचीत में काम आएंगे। इसलिए पिछले एक साल में चीन से जुड़े कई बड़े मामलों में उन्होंने खुद शी से बात की। लेकिन शी के फैसलों में निजी रिश्तों का असर कम दिखाई देता है। उनका ध्यान चीन के लंबे समय के हितों पर रहता है। इसी फर्क को समझाने के लिए रिपोर्ट में शी के पुराने सहयोगी जनरल झांग यूशिया का उदाहरण दिया गया है। शी और झांग के परिवारों के रिश्ते कई दशक पुराने थे। दोनों के पिता चीन के गृहयुद्ध के दौरान साथ रहे थे। चार साल पहले शी ने झांग की रिटायरमेंट भी टाल दी थी। इसके बावजूद जनवरी में शी ने झांग को चीन के शीर्ष सैन्य पद से हटा दिया। उन्हें हटाने की असली वजह सार्वजनिक नहीं हुई। यह उदाहरण बताता है कि शी राजनीतिक फैसलों में पुराने निजी रिश्तों को भी प्राथमिकता नहीं देते। ट्रम्प जल्दी नतीजा चाहते हैं, शी इंतजार करते हैं ट्रम्प बातचीत में जल्दी दबाव बनाकर समझौता कराने की कोशिश करते हैं। शी का तरीका अलग है। वे लंबे समय तक इंतजार कर सकते हैं और सही समय आने पर दबाव बढ़ाते हैं। इसी वजह से दोनों नेताओं के बीच दोस्ताना बातचीत के बावजूद बड़े मुद्दों पर समझौता करना आसान नहीं रहा है। ट्रम्प एयरबेस जाकर जिनपिंग का स्वागत करेंगे ट्रम्प 24 सितंबर को सिर्फ जिनपिंग से मुलाकात ही नहीं करेंगे, बल्कि उनके वॉशिंगटन पहुंचने पर एंड्रयूज एयर फोर्स बेस जाकर खुद उनका स्वागत भी करेंगे। पोलिटिको के मुताबिक, ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में यह पहली बार होगा जब वे किसी विदेशी नेता का स्वागत करने एयरबेस जाएंगे। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, इसका मकसद जिनपिंग को सम्मान देना और बातचीत का माहौल बेहतर बनाना है। चीन के लिए भी यह खास संकेत है, क्योंकि इससे जिनपिंग को अमेरिकी राष्ट्रपति के बराबर सम्मान दिए जाने का संदेश जाता है। ट्रम्प इसके अलावा जिनपिंग के लिए स्टेट डिनर भी रख रहे हैं। रॉयटर्स के मुताबिक, राष्ट्रपति बनने के बाद यह ट्रम्प का सिर्फ दूसरा स्टेट डिनर होगा। इससे पहले उन्होंने ब्रिटेन के किंग चार्ल्स और क्वीन कैमिला के लिए ऐसा डिनर रखा था। मुलाकात में ये 5 मुद्दे अहम होंगे 1. ताइवान
चीन लगातार ताइवान को लेकर अमेरिका पर दबाव बनाता रहा है। जिनपिंग ने ट्रम्प से बातचीत में अमेरिकी हथियारों की बिक्री का मुद्दा भी उठाया है। ट्रम्प ने ताइवान के लिए आगे होने वाली करीब 14 अरब डॉलर की हथियार बिक्री को बातचीत में इस्तेमाल होने वाले कार्ड के तौर पर बताया था। 2. टैरिफ और व्यापार
अमेरिका-चीन के बीच टैरिफ, बाजार में पहुंच और व्यापार का संतुलन बड़ा मुद्दा रहेगा। दोनों देश तनाव कम करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन व्यापार से जुड़े मतभेद अभी खत्म नहीं हुए हैं। 3. ईरान और होर्मुज स्ट्रेट
ईरान युद्ध के दौरान होर्मुज स्ट्रेट बंद होने का मुद्दा भी दोनों नेताओं की बातचीत में आया था। ट्रम्प ने कहा था कि जिनपिंग ईरान से स्ट्रेट खोलने के लिए कहने पर सहमत हुए थे। हालांकि, चीन ने ऐसा कोई भरोसा देने की पुष्टि नहीं की थी। 4. AI की होड़
अब अमेरिका-चीन की प्रतिस्पर्धा सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है। दोनों देश एआई और एडवांस्ड चिप्स में बढ़त हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिका चीन को अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर और चिप बनाने वाली तकनीक देने पर रोक लगा रहा है। 5. सोयाबीन और व्यापारिक समझौते
जिनपिंग के दौरे से पहले चीन ने अमेरिका से करीब 10 लाख टन सोयाबीन खरीदा है। इससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्तों को स्थिर करने की कोशिश का संकेत मिलता है। ——————– यह खबर भी पढ़ें… रिपोर्ट- ट्रम्प-जिनपिंग की मुलाकात से पहले ताइवान में डर ट्रम्प और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की 24 सितंबर को होने वाली मुलाकात से पहले ताइवान में डर बढ़ गया है। ताइवान को आशंका है कि चीन के साथ कोई बड़ा आर्थिक समझौता करने के लिए ट्रम्प उसके मुद्दे पर नरम रुख अपना सकते हैं। पूरी खबर पढ़ें…

रिपोर्ट- ट्रम्प-जिनपिंग की मुलाकात से पहले ताइवान में डर:जापान-साउथ कोरिया को चिंता, चीन से डील के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति नरम न पड़ जाएं

ट्रम्प और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की 24 सितंबर को होने वाली मुलाकात से पहले ताइवान में डर बढ़ गया है। ताइवान को आशंका है कि चीन के साथ कोई बड़ा आर्थिक समझौता करने के लिए ट्रम्प उसके मुद्दे पर नरम रुख अपना सकते हैं। जापान और साउथ कोरिया समेत अमेरिका के सहयोगी देशों को भी यही चिंता सता रही है। रॉयटर्स के मुताबिक, ट्रम्प ने मई में ताइवान को अमेरिकी हथियारों की बिक्री को चीन से डील के लिए ‘सौदेबाजी का जरिया’ बताया था। अब जिनपिंग फिर ताइवान का मुद्दा ट्रम्प के सामने उठा सकते हैं। ऐसे में ताइवान को डर है कि ट्रम्प चीन से कोई बड़ी डील निकालने के चक्कर में कहीं उसके मुद्दे पर पीछे न हट जाएं। अमेरिका के किसी नरम बयान से भी बीजिंग को ताइवान पर दबाव बढ़ाने का हौसला मिल सकता है। पहले ताइवान का मामला समझिए ताइवान चीन के करीब स्थित एक द्वीप है। वहां अपनी सरकार है और लोग अपने नेताओं को चुनाव के जरिए चुनते हैं। ताइवान खुद को अलग तरीके से चलाता है, लेकिन चीन उसे अपना हिस्सा मानता है। चीन चाहता है कि ताइवान एक दिन उसके साथ मिल जाए। बीजिंग ने यह भी साफ कर रखा है कि जरूरत पड़ी तो वह इसके लिए सैन्य ताकत का इस्तेमाल कर सकता है। दूसरी तरफ, अमेरिका ताइवान को हथियार देता है ताकि वह अपनी सुरक्षा कर सके। लेकिन अमेरिका ने यह साफ नहीं किया है कि अगर चीन ताइवान पर हमला करता है, तो अमेरिकी सेना सीधे उसकी मदद के लिए युद्ध में उतरेगी या नहीं। यही वजह है कि ताइवान को लेकर अमेरिका का रुख हमेशा से थोड़ा अस्पष्ट रहा है। वॉशिंगटन चीन को खुलकर चुनौती भी नहीं देता और ताइवान को अकेला भी नहीं छोड़ता। जापान को किस बात की चिंता है? ताइवान को लेकर सिर्फ वहां की सरकार ही चिंतित नहीं है। जापान भी ट्रम्प-शी की बैठक को करीब से देख रहा है। रॉयटर्स के मुताबिक, जापान चाहता है कि अमेरिका ताइवान को लेकर अब तक इस्तेमाल की जाने वाली कूटनीतिक भाषा पर कायम रहे। टोक्यो यह भी चाहता है कि बैठक में ताइवान का मुद्दा इतना न छाए कि दोनों देशों के रिश्तों में तनाव और बढ़ जाए। जापान के दो सीनियर नेताओं ने रॉयटर्स को बताया कि उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि ट्रम्प चीन से अमेरिकी सामान खरीदने का बड़ा समझौता हासिल करने के बदले ताइवान के मामले में कोई रियायत न दे दें। अमेरिका में अगले साल मिडटर्म चुनाव होने हैं। ऐसे में चीन के साथ बड़ा कारोबारी समझौता ट्रम्प के लिए घरेलू राजनीति में भी अहम हो सकता है। बैठक से पहले ताइवान ने अपनी चिंता बताई बैठक से पहले ताइवान सरकार लगातार अमेरिका के सामने अपना पक्ष रख रही है। ताइवान के सीनियर अधिकारी शेन यू-चुंग ने कहा कि उनकी उम्मीद है कि ऐसा कोई फैसला नहीं होगा जिससे ताइवान को नुकसान पहुंचे। ताइवान के विदेश मंत्री लिन चिया-लुंग ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि शी बैठक में ताइवान का मुद्दा उठाएंगे। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका कई बार साफ कर चुका है कि ताइवान को लेकर उसकी नीति में बदलाव नहीं हुआ है। अमेरिका की ‘वन चाइना पॉलिसी’ क्या है? ताइवान को लेकर अमेरिका की नीति को समझने के लिए ‘वन चाइना पॉलिसी’ को समझना जरूरी है। अमेरिका ताइवान को एक अलग देश के तौर पर आधिकारिक मान्यता नहीं देता। लेकिन वह चीन के इस दावे को भी अपनी तरफ से मंजूर नहीं करता कि ताइवान पर उसका पूरा अधिकार है। इसी नीति के तहत अमेरिका चीन के साथ अपने राजनयिक रिश्ते भी बनाए रखता है और ताइवान को अपनी सुरक्षा के लिए हथियार भी देता है। यानी अमेरिका दोनों पक्षों के बीच एक संतुलन बनाए रखने की कोशिश करता है। ट्रम्प के बयान पर इतनी नजर क्यों? अमेरिका ने अभी तक यह साफ नहीं किया है कि अगर चीन ताइवान पर हमला करता है, तो क्या अमेरिकी सेना ताइवान की मदद करने जाएगी। इसलिए ट्रम्प ताइवान को लेकर क्या कहते हैं, इस पर सबकी नजर रहती है। पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अपने कार्यकाल में कई बार कहा था कि चीन ने हमला किया तो अमेरिका ताइवान की मदद करेगा। लेकिन ट्रम्प ने इस बारे में अब तक ऐसी साफ बात नहीं कही है। जापान के दो सरकारी सूत्रों ने रॉयटर्स को बताया कि ट्रम्प का अचानक दिया गया कोई बयान भी ताइवान को लेकर चिंता बढ़ा सकता है। चीन लगातार अमेरिका से कहता रहा है कि वह ताइवान को अलग देश बनाने की बात का समर्थन न करे। ताइवान का मुद्दा दुनिया की अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा ताइवान का मामला सिर्फ चीन और अमेरिका के बीच सत्ता की खींचतान तक सीमित नहीं है। इसका असर दुनिया के कारोबार पर भी पड़ सकता है। ताइवान दुनिया की सबसे आधुनिक कंप्यूटर चिप्स का 90% से ज्यादा बनाता है। इन चिप्स का इस्तेमाल मोबाइल फोन, कार, कंप्यूटर से लेकर मिसाइल और दूसरे आधुनिक उपकरणों में होता है। अगर यहां बड़ा सैन्य संघर्ष होता है तो चिप्स की सप्लाई रुक सकती है। इससे दुनिया के कई देशों में कार, इलेक्ट्रॉनिक्स और दूसरे सामानों का उत्पादन प्रभावित हो सकता है। मलेशिया के राष्ट्रीय सुरक्षा महानिदेशक राजा नुशिरवान जैनल आबिदीन ने रॉयटर्स से कहा कि ताइवान में संघर्ष हुआ तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा। ——————– यह खबर भी पढ़ें… रिपोर्ट- ट्रम्प सरकार ने हूती विद्रोहियों से सीक्रेट डील की अमेरिका ने यमन के हूती विद्रोहियों के साथ सीक्रेट डील की है। एक्सिओस की रिपोर्ट के मुताबिक इस डील के तहत हूतियों ने अमेरिका को भरोसा दिया है कि वे लाल सागर में अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय जहाजों को निशाना नहीं बनाएंगे। पूरी खबर पढ़ें…

ब्रिक्स की बातों से बनेगा क्या?

ब्रिक्स को लेकर कूटनीतिक और सामरिक जानकारों की राय बंटी हुई है। एक वर्ग ऐसा है, जो मानता है कि इसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है और इससे भारत को कुछ भी हासिल नहीं होगा। सुरजीत भल्ला जैसे आर्थिक जानकार और राजेश राजगोपालन जैसे विश्व मामलों के जानकार इस श्रेणी में आते हैं। दूसरी ओर जानकारों का एक समूह है, जो मानता है कि यह पश्चिमी दुनिया के वर्चस्व के बीच संतुलन बनाने वाला मंच है और नई दिल्ली में हुए 18वें ब्रिक्स सम्मेलन की यह बहुत बड़ी उपलब्धि है कि मौजूदा विश्व व्यवस्था के बीच एक वैकल्पिक बहुपक्षीय मंच उभरा है, जिसमें सबकी आवाज बराबर है और जो बहुत बड़े आर्थिक, राजनीतिक व सामरिक वजन वाला है। भाजपा और सरकार के लोगों के अलावा प्रतिष्ठित सामरिक विशेषज्ञ ब्रह्मा चैलानी इस राय के हैं। असल में वास्तविकता इन दोनों अतिवादी विचारों के बीच है। ब्रिक्स न तो बिल्कुल अप्रासंगिक है और न इतना प्रासंगिक है कि वह अमेरिका व यूरोप केंद्रित विश्व व्यवस्था को चुनौती दे सके या उसका विकल्प बन सके।

इस बात को समझने के लिए सबसे पहले ब्रिक्स सम्मेलन में बार बार दोहराए गए आंकड़ों की वास्तविकता समझने की जरुरत है। नई दिल्ली सम्मेलन की मेजबानी कर रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन आंकड़ों को कई बार दोहराया तो रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी इनका जिक्र किया। भारतीय मीडिया तो उन्हीं आंकड़ों पर खेल ही रहा है। जैसे कहा गया कि ब्रिक्स दुनिया की 50 फीसदी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है। यह मैटर ऑफ फैक्ट है, जिसे कोई चुनौती नहीं दे सकता। दुनिया के आठ अरब लोगों में से तीन अरब तो भारत और चीन में ही रहते हैं। लेकिन इसके बाद का जो आंकड़ा है उसे वस्तुनिष्ठ तरीके से देखने की जरुरत है। कहा गया कि ब्रिक्स देशों की जीडीपी 40 फीसदी है और जी 7 देशों की जीडीपी 29 फीसदी है। यह नहीं बताया गया कि यह आंकड़ा पीपीपी यानी परचेज पावर पैरिटी पर आधारित है। जब नॉमिनल जीडीपी यानी बाजार विनियम दर पर जीडीपी को देखते हैं तो  जी 7 देशों की जीडीपी 44 फीसदी है और ब्रिक्स की 29 फीसदी है। पीपीपी के आधार पर गणना में ब्रिक्स की जीडीपी इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि स्थानीय बाजार में कीमतें कम हैं और लोगों के जीवन यापन का खर्च भी बहुत कम है।

इन आंकड़ों का हवाला देने वाले इस सामान्य बात की भी अनदेखी कर देते हैं कि ब्रिक्स में से चीन की अर्थव्यवस्था को निकाल दें तो कुछ नहीं बचता है। अगर ब्रिक्स की ऩॉमिनल जीडीपी 30 से 35 ट्रिलियन डॉलर की है तो उसमें अकेले चीन की जीडीपी करीब 21 ट्रिलियन की है। एक आंकड़ा यह भी दिया गया कि ब्रिक्स देशों की साझा आय़ 2011 में 21.9 फीसदी थी, जो 2025 में बढ़ कर 28.9 फीसदी हो गई। यानी करीब डेढ़ दशक में इसमें सात फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। लेकिन इसमें से चीन को निकाल दें तो बाकी दस देशों की साझा आय इसी अवधि में 11.9 से घट कर 11.5 फीसदी हो गई है। असल में विश्व की आय में चीन की हिस्सेदारी 2011 में 10 फीसदी थी, जो 2025 में बढ़ कर 17.4 फीसदी हुई है। जीडीपी, आय और व्यापार के आंकड़ों के बीच इस बात को भी छिपा दिया गया कि ब्रिक्स के देश आपस में सात से आठ सौ बिलियन डॉलर का कारोबार करते हैं, जबकि पश्चिमी देशों खास कर जी 7 देशों के साथ उनका व्यापार सात से आठ ट्रिलियन डॉलर का है। यानी आपसी व्यापार से दस गुने के बराबर। इसलिए आधे अधूरे आंकड़ों के आधार पर ब्रिक्स देशों को महान अर्थव्यवस्था या महान सामरिक ताकत वाला बताने की जरुरत नहीं है। उसकी असल ताकत चीन है।

ब्रिक्स देशों ने कुछ समय पहले बहुत जोर शोर से प्रचार किया था कि डॉलर का वर्चस्व खत्म करने के लिए ब्रिक्स की नई मुद्रा लाई जाएगी। कई देशों ने मिल कर चीन की मुद्रा को आपसी लेन देन का माध्यम बनाने का प्रयास भी किया था। लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति की एक घुड़की के बाद सारे प्रयास बंद हो गए। डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अगर किसी ने कोई वैकल्पिक मुद्रा बनाने का प्रयास किया तो सौ फीसदी टैरिफ लगाएंगे। उसके बाद सारे देश पीछे हट गए। अब बात स्थानीय मुद्रा में कारोबार की हो रही है। कुल मिला कर ब्रिक्स एक ऐसा मंच है, जिस पर व्यापार की बातें हो सकती हैं और कुछ सामरिक चर्चा भी संभव है। लेकिन सभी देशों को चीन की विस्तारवादी नीतियों से सावधान रहते हुए काम करना होगा। उनको ध्यान रखना होगा कि चीन और रूस मिल कर इस मंच को अमेरिका और पश्चिमी दुनिया के विरोध में न खड़ा कर दें। इससे उन दोनों को कोई खास नुकसान नहीं होगा लेकिन बाकी देशों के लिए मुश्किल होगी। पुतिन और जिनपिंग दोनों भी राष्ट्रपति ट्रंप के साथ दोस्ताना बढ़ा रहे हैं। इसी महीने जिनपिंग अमेरिका जाएंगे और नवंबर में राष्ट्रपति ट्रंप चीन का दौरा करेंगे, जहां पुतिन भी मौजूद रहेंगे।

बहरहाल, इसमें कोई संदेह नहीं है कि ब्रिक्स का नई दिल्ली में आयोजन सफल रहा। इस सफल आयोजन से भारत का वजन भी कुछ बढ़ा है लेकिन असल में क्या हासिल हुआ है या क्या हासिल होगा? ‘नई दिल्ली घोषणा’ के हवाले से कहा गया कि चीन और रूस संयुक्त राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद में सीट के लिए भारत का समर्थन करेंगे। हालांकि उसमें सिर्फ इतना लिखा हुआ है कि भारत की बड़ी भूमिका का समर्थन किया जाएगा। लेकिन सबको पता है कि 2024 में संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक से इतर ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों का सम्मेलन हुआ था, जिसमें यह मुद्दा उठा था और तब कहा गया था कि सुरक्षा परिषद में अफ्रीकी देशों का प्रतिनिधित्व कौन करेगा, यह तय नहीं है और इस आधार पर मामले को टाल दिया गया था। उसके पीछे चीन का हाथ था। चीन कतई नहीं चाहेगा कि भारत सुरक्षा परिषद का सदस्य बने।

चीन के साथ भारत के संबंध कैसे रहते हें इस पर भी ब्रिक्स का भविष्य टिका हुआ है। जहां तक चीन और भारत के संबंधों की बात है तो वह तीन मुद्दों से जुड़ा है। पहला, पाकिस्तान के प्रति चीन का क्या रुख रहता है। दूसरा, हिमालय में भारत व चीन के नियंत्रण वाली रेखा को लेकर उसका क्या रुख रहता है और तीसरा, व्यापार को लेकर वह भारत को छूट देता है या नहीं। गौरतलब है कि पाकिस्तान उसका ऑल वेदर फ्रेंड है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन ने उसकी मदद की थी। अगर उसका यही रवैया रहा तो भारत का विश्वास नहीं बहाल होगा। जहां तक सीमा की बात है तो चीन लगातार भारतीय सीमा में अतिक्रमण कर रहा है और अफसोस की बात है कि भारत सरकार उसके हिसाब से समझौते कर रही है। व्यापार के मामले में भी चीन दुर्लभ खनिज और प्रौद्योगिकी भारत को देने में हिचकता है। गौरतलब है कि भारत और चीन के व्यापार में भारत का घाटा बहुत बड़ा है। भारत के पास अपना विनिर्माण का इकोसिस्टम बहुत मजबूत नहीं है। चीन इसका फायदा उठाता है। सो, अगर चीन की शर्तों पर भारत उसके साथ संबंध रखे तब तो सारी चीजें ठीक चलेंगी, जिस दिन भारत ने अपनी शर्तें रखनी शुरू की उसी दिन से सब बिगड़ने लगेगा।