कितने भक्तों के भरोसे 2029 की जीत?

सवाल है भाजपा के पास ऐसे कितने करोड़ वोट हैं जो कुछ भी हो जाए, मोदी के नाम पर ही वोट देंगे? महंगाई बढ़े, बेरोजगारी बढ़े, रुपया गिरे, नौजवान सड़कों पर उतरें, मुसलमान नाराज हों, दलित और आदिवासी बिदकें, तब भी जिनका वोट नहीं बदलेगा। क्या ऐसे मतदाता बीस करोड़ हैं? पच्चीस करोड़ हैं? या तीस करोड़? पिछले तीन चुनावों का हिसाब देखें। 2014 में भाजपा को 31.34 प्रतिशत वोट मिले थे। 2019 में यह बढ़कर 37.7 प्रतिशत हुआ। फिर 2024 में घटकर 36.56 प्रतिशत रह गया। एनडीए को इन तीन चुनावों में क्रमशः लगभग 38.5, 45.4 और 43.8 प्रतिशत वोट मिले। मतलब 2019 के मुकाबले 2024 में भाजपा और एनडीए, दोनों का वोट प्रतिशत घटा। भाजपा की सीटें 303 से घटकर 240 हो गईं। बावजूद इस ट्रेंड के अमित शाह को 2029 में जीत का पक्का भरोसा है!

सवाल है क्या उन्हें लगता है कि भाजपा के 2024 के लगभग 23.6 करोड़ मतदाता अब स्थायी मोदी भक्त बन चुके हैं? या एनडीए के लगभग 28.3 करोड़ वोटों में कोई कमी संभव नहीं? लेकिन इन संख्याओं में तो सब तरह के मतदाता हैं। हिंदुत्व के पक्के समर्थक हैं तो सरकारी योजनाओं के लाभार्थी भी। जाति के हिसाब से वोट देने वाले हैं तो स्थानीय उम्मीदवार के कारण भाजपा को चुनने वाले भी। कुछ मोदी के नाम पर वोट देते हैं तो कुछ विपक्ष को पसंद नहीं करने के कारण। इनमें से कितने ऐसे हैं जो हर परिस्थिति में भाजपा को ही वोट देंगे?

ऐसी ही एक दूसरी गणित भी है। 2014 में भाजपा ने महज 31.34 प्रतिशत वोटों से लोकसभा में अपने दम पर बहुमत बनाया था। यानी सौ वोट डालने वालों में लगभग 69 ने भाजपा को वोट नहीं दिया, फिर भी उसे पूर्ण बहुमत मिला। 2019 में 37.7 प्रतिशत वोटों से 303 सीटें मिलीं। और 2024 में 36.56 प्रतिशत वोटों पर 240 सीटें। अंतर सिर्फ वोट प्रतिशत का नहीं था। वोट कहां पड़े, किस सीट पर विपक्ष बंटा, कहां उम्मीदवार मजबूत था, कहां गठबंधन बना, इन बातों से सीटों का गणित बदला और हमेशा बदलता है।

यहीं 2029 में मोदी-शाह की जीत का असली सूत्र याकि रहस्य है। भाजपा को देश के पचास प्रतिशत मतदाताओं का समर्थन मिलना जरूरी नहीं। उसे उन निर्वाचन क्षेत्रों में पर्याप्त वोट चाहिए जहां से लोकसभा की बहुमत वाली संख्या बनती है। इसलिए संभव है कि देश में असंतोष बढ़े, कई सामाजिक समूहों में नाराजगी हो, नौजवान आंदोलन करें, फिर भी पार्टी विशेष का चुनावी आधार बना रहे। हालांकि इसमें यह भी खतरा है कि राष्ट्रीय वोट प्रतिशत में मामूली गिरावट से दर्जनों सीटें हाथ से निकल जाएं। जैसे 2024 में भाजपा का अनुभव था।

फिलहाल जेनरेशन ज़ेड का भौकाल मुखर है। नौजवानों में आज कितने मोदी समर्थक हैं और कितने विरोधी? मुसलमानों, दलितों और आदिवासियों में कितने भाजपा को वोट देते हैं? पर इन्हें एक साथ जोड़कर कोई मोदी विरोधी आबादी नहीं बनाई जा सकती। जेनरेशन ज़ेड में भी मोदी समर्थक हैं। दलितों और आदिवासियों में भी भाजपा को वोट मिले हैं। लेकिन यह भी सच है कि एक ही मतदाता युवा भी हो सकता है, दलित भी और किसी आंदोलन का समर्थक भी। इसलिए इन समूहों की आबादी जोड़कर भाजपा विरोधी वोटों की संख्या निकालना संभव ही नहीं।

तो अमित शाह ने कैसे हिसाब लगाया हुआ होगा? मेरा मानना है कि वे भाजपा के प्रतिबद्ध वोटों पर निर्भर नहीं रहते। वह बूथवार वोट हिसाब के पारखी हैं। समर्थकों को मतदान केंद्र तक पहुंचाने से लेकर उम्मीदवार, गठबंधन और स्थानीय सामाजिक समीकरणों का हिसाब रखते हैं। अब इस सबके साथ मतदाता सूचियों के एसआईआर, परिसीमन और महिला आरक्षण की संभावनाएं भी हैं। इसलिए राहुल गांधी, कांग्रेस और विपक्ष के लिए जीवन-मरण का स्वाभाविक सवाल है कि 2029 का चुनाव आखिर किन मतदाता सूचियों, किन निर्वाचन क्षेत्रों और किन नियमों के अंतर्गत होगा?

कैसे? आखिर जब चुनावी जीत का अंतर कई जगह कुछ हजार वोटों का हो, तब मतदाताओं के नाम कटने या जुड़ने से ही चुनावी मुकाबला तय होता है। पश्चिम बंगाल उदाहरण है। दो-चार, दस लाख नहीं, लाखों (39 लाख) वैध दस्तावेजी सबूतों के बावजूद वोट डालने के अधिकार से वंचित किया गया। ऐसा चुनाव आयोग, ट्रिब्यूनल और सुप्रीम कोर्ट सभी के बावजूद हुआ।

तो नरेंद्र मोदी-अमित शाह के 2029 में चुनाव जीतने के अडिग विश्वास का कारण सत्ता का ऐसा दुरुपयोग और अहंकार क्या नहीं है? यदि 2024 के 23.6 करोड़ भाजपा वोटों को भक्तों की स्थायी संख्या भी मान लें तब भी इनके बूते जीत संभव नहीं है जब तक वोट सूची ईमानदार न हो। 2029 में कितने करोड़ नए या पुराने वोटर मतदान करने के पात्र रहेंगे? कितने कटेंगे, और कितने बंगाल की तरह लटकाए रखे जाएंगे, उससे अधिक तय होगा?

सो, भाजपा को 2029 में कितने करोड़ लोग पसंद करते हैं, से अधिक महत्त्वपूर्ण होगा कि उसने सीटवार अपने वोट कितने करवाए हुए हैं? और यह काम ज्ञानेश कुमार की कमान के चुनाव आयोग के जरिए चुटकियों में संभव बना रहेगा।

वोट बंटवारे का नगांव व रेजिनगर मॉडल

एसआईआर, परिसीमन और महिला आरक्षण के बाद भाजपा को यह उम्मीद है कि विपक्ष का वोट बंटेगा, जिसका लाभ उसको मिलेगा। भाजपा के इस भरोसे को समझने के लिए पश्चिम बंगाल की रेजीनगर विधानसभा सीट और असम की नगांव लोकसभा सीट के उपचुनाव को मॉडल की तरह देखा जा सकता है। पिछले लोकसभा चुनाव में नगांव सीट कांग्रेस ने जीती थी। लेकिन उसके सांसद प्रद्योत बोरदोलोई पार्टी छोड़ कर भाजपा में चले गए और लोकसभा से इस्तीफा दे दिया। इसलिए वहां उपचुनाव हुआ। ऐसे ही रेजिनगर की सीट हुमायूं कबीर ने जीती थी। वे दो सीटों से जीते थे इसलिए उन्होंने रेजीनगर से इस्तीफा दिया। नगांव में 55 से 60 फीसदी औऱ रेजिनगर में करीब 70 फीसदी मतदाता मुस्लिम हैं। इसके बावजूद दोनों सीटों पर भाजपा जीती।

नगांव लोकसभा सीट पर भाजपा उम्मीदवार को करीब 50 फीसदी वोट मिले और रेजिनगर में करीब 60 फीसदी वोट मिला। भाजपा ने हुमायूं कबीर के बेटे को 75 हजार वोट से हराया। नगांव लोकसभा सीट पर वोट बंटवारा एक बड़ा फैक्टर रहा। वहां ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के नेता बदरूद्दीन अजमल चुनाव लड़े थे। मुस्लिम मतदाता उनके पक्ष में एकजुट हुए फिर भी कांग्रेस को सवा लाख के करीब वोट मिला। जीत हार का अंतर डेढ़ लाख के करीब वोट का था। तभी माना जा रहा है कि अगर सभी विपक्षी पार्टियां एकजुट होकर लड़तीं तो शायद भाजपा नहीं जीत पाती। रेजिनगर का मामला अलग है। वहां विपक्ष के सभी उम्मीदवारों को मिला कर भी उतना वोट नहीं आया, जितने वोट से भाजपा जीती।

सो, ये दोनों मॉडल हैं। रेजिनगर में कहा गया कि राज्य के मुस्लिम मतदाता भी लेफ्ट और तृणमूल के शासन से ऊबे हुए थे और उनको भी विकास, रोजगार वाली राजनीति पसंद आ रही है। इसलिए मुसलमानों ने भी भाजपा को वोट दिया। नगांव का मॉडल विपक्ष के वोट बंटवारे का है। भाजपा को उम्मीद है कि विपक्ष एकजुट होकर चुनाव नहीं लड़ेगा। पिछली बार यानी 2024 में विपक्ष एकजुट होकर लड़ा था तो संगठन और नैरेटिव दोनों की साझा ताकत के दम पर उसने भाजपा को बहुमत से नीचे ला दिया था। आजादी के बाद पहली बार इतना मजबूत विपक्ष जीत कर आया। लेकिन उसके बाद अलग अलग कारणों से बिखराव है। आम आदमी पार्टी, डीएमके आदि अलग रास्ते पर चल रहे हैं। अगर ये सभी पार्टियां साथ नहीं आती हैं तो भाजपा विरोधी वोट बंटेगा। विपक्ष के अंदर विभाजन बढ़ाने के लिए भाजपा की ओर से भी साम, दाम, दंड और भेद सारे उपाय किए जाते हैं।

इस बीच मुस्लिम नेताओं की पार्टियां भी चुनाव लड़ेंगी। मुस्लिम नेताओं ने अपनी जिस तरह की छवि बनाई है या विपक्षी पार्टियों ने उनके बारे में जिस तरह के प्रचार किए हैं उसके बाद यह संभावना कम है कि विपक्ष के साथ उनका तालमेल होगा। चाहे असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी हो या बदरूद्दीन अजमल की पार्टी हो या हुमायूं कबीर और नौशाद सिद्दीकी पार्टी हो। इनका तालमेल मुख्यधारा की विपक्षी पार्टियों के साथ नहीं होगा। ऐसे में ये पार्टियां अलग चुनाव लड़ेंगी। इनकी वजह से भी वोट का बंटवारा होगा, जिस लाभ भाजपा को मिल सकता है।

सुवेंदु सरकार को शत प्रतिशत अंक

नंदीग्राम से ज्यादा महत्वपूर्ण चुनाव नतीजा रेजिनगर विधानसभा सीट का है, जहां से भाजपा के सखारव सरकार ने आम जनता उन्नयन पार्टी यानी एजेयूपी के उम्मीदवार गुलाम नबी आजाद को 75 हजार से अधिक वोट से हराया। रेजिनगर का परिणाम पश्चिम बंगाल के साथ साथ देश की राजनीति पर गंभीर असर डालने वाला है। यह चुनाव परिणाम विपक्ष की राजनीति को भी नए सिरे से व्याख्यायित करेगा।

यदि नंदीग्राम और रेजिनगर विधानसभा सीट के उपचुनाव को पांच महीने पुरानी सुवेंदु अधिकारी सरकार की परीक्षा मानें तो कह सकते हैं कि सुवेंदु शत प्रतिशत अंक के साथ उतीर्ण हुए हैं। नंदीग्राम सीट जीतने का जो रिकॉर्ड उन्होंने खुद बनाया था वह रिकॉर्ड उनकी उम्मीदवार हसीरानी रथ ने तोड़ दिया। इस रिकॉर्ड का टूटना सुवेंदु अधिकारी की अपनी उपलब्धि में शुमार होगा। सुवेंदु ने 2016 के चुनाव में एक रिकॉड बनाया था, जब उन्होंने सीपीआई के अब्दुल कबीर शेख को 81 हजार से ज्यादा वोट से हराया था। उसके 10 साल बाद 2026 के उपचुनाव में उनकी चुनी हुई उम्मीदवार हसीरानी रथ ने कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के साझा उम्मीदवार मिलन प्रधान को एक लाख 22 हजार से ज्यादा वोट से हराया। यह निजी तौर पर सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व और उनकी सरकार के कामकाज पर सिर्फ नंदीग्राम की जनता की नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की जनता की स्वीकृति की मुहर है।

नंदीग्राम से ज्यादा महत्वपूर्ण चुनाव नतीजा रेजिनगर विधानसभा सीट का है, जहां से भाजपा के सखारव सरकार ने आम जनता उन्नयन पार्टी यानी एजेयूपी के उम्मीदवार गुलाम नबी आजाद को 75 हजार से अधिक वोट से हराया। रेजिनगर का परिणाम पश्चिम बंगाल के साथ साथ देश की राजनीति पर गंभीर असर डालने वाला है। यह चुनाव परिणाम विपक्ष की राजनीति को भी नए सिरे से व्याख्यायित करेगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह चुनाव परिणाम दशकों से स्थापित कई राजनीतिक मान्यताओं और धारणाओं को तोड़ने वाला है।

रेजिनगर विधानसभा सीट मुर्शिदाबाद जिले में आती है, जहां पूरे जिले में औसत मुस्लिम आबादी 55 से 60 फीसदी के करीब है। उसमें भी रेजिनगर विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग 70 फीसदी है। मुर्शिदाबाद जिले के ही बेलडांगा में हुमायूं कबीर ने बाबरी मस्जिद की नींव रखी है। बाबरी मस्जिद की नींव रखने के बाद उन्होंने एजेयूपी नाम से पार्टी का गठन किया और दो सीटों से चुनाव लड़े। तमाम निगेटिव प्रचार के बावजूद वे दोनों सीटों से जीते। रेजिनगर सीट पर हुमायूं कबीर 58 हजार से ज्यादा वोट से जीते थे। लेकिन उनके इस्तीफे से खाली हुई इस सीट पर उनके बेटे गुलाम नबी आजाद 75 हजार से ज्यादा वोट से हारे। हुमायूं कबीर जितने वोट से जीते थे उतना वोट भी उनके बेटे को नहीं मिला। रेजिनगर सीट के चुनाव परिणाम की एक विशेष बात यह भी रही कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की पारंपरिक प्रतिद्वंद्री पार्टियों यानी कांग्रेस, तृणमूल और वामपंथी तीनों को मिला कर सिर्फ 13 हजार वोट मिले। लगातार 15 साल पश्चिम बंगाल में राज करने वाली ममता बनर्जी की पार्टी के उम्मीदवार और पूर्व विधायक रबीउल आलम चौधरी को सिर्फ 3,797 वोट मिले।

जिस विधानसभा सीट पर 70 फीसदी मुस्लिम आबादी हो उस सीट पर भाजपा के हिंदू उम्मीदवार को 63 फीसदी से ज्यादा वोट मिले। अगर तर्क के लिए यह मान लिया जाए कि सभी 30 फीसदी हिंदुओं ने भाजपा उम्मीदवार को वोट किया तब भी कम से कम 33 फीसदी मुस्लिम वोट भाजपा को मिले हैं। हर तीन में से एक मुस्लिम मतदाता ने भाजपा को वोट किया है। यह बहुत बड़ा और पश्चिम बंगाल के साथ साथ देश की राजनीति को प्रभावित करने वाला घटनाक्रम इसलिए है क्योंकि पांच महीने पहले के चुनाव में इसी सीट पर भाजपा के हिंदू उम्मीदवार को सिर्फ 27 प्रतिशत वोट मिले थे। पांच महीने के अंदर 36 फीसदी वोट का स्विंग अभूतपूर्व है। यह मुस्लिम मतदाताओं के मतदान व्यवहार में आए एक बड़े बदलाव का संकेत है।

इस चुनाव परिणाम के अलग अलग आयामों को समझने की आवश्यकता है। सबसे पहला और स्पष्ट आय़ाम यह है कि सुवेंदु अधिकारी ने अपने पांच महीने के छोटे से कार्यकाल में जो काम किया है उससे उन्होंने समाज के सभी वर्गों का भरोसा जीता है। इसमें समान रूप से मुस्लिम भी शामिल हैं। आंकड़े इसकी कहानी खुद बता रहे हैं। रेजिनगर में भाजपा के उम्मीदवार को जितना वोट हिंदुओं का मिला है उससे ज्यादा वोट मुसलमानों का मिला है। यह किसी भय या दबाव का नतीजा नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि मुसलमानों ने सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व को स्वीकार किया है। यह उनके व्यक्तित्व का कमाल है कि उन्होंने मुस्लिमों का आह्वान किया और दोस्ती का मौका दिया तो मुस्लिम समाज ने इसे दिल खोल कर स्वीकार किया। उन्होंने भाजपा के प्रति अपने पूर्वाग्रह को छोड़ दिया। सुवेंदु अधिकारी उनको यह भरोसा दिलाने में सफल रहे हैं कि उनका हिंदुत्व किसी दूसरे धर्म को मानने वाले को नुकसान पहुंचाने या प्रताड़ित करने वाला नहीं है। उनका हिंदुत्व समावेशी है। मुसलमानों के मन में यह भरोसा इसलिए भी बना क्योंकि सुवेंदु सरकार ने सरकार की समस्त लोक कल्याणकारी योजनाओं को प्रभावी ढंग से जारी रखा, किसी के साथ भेदभाव नहीं किया।

ऐसे ही कानून व्यवस्था बहाल करने और राज्य में हिंसा, वसूली, तोलाबाजी, कट-मनी आदि की संस्कृति को समाप्त करने के लिए भी सुवेंदु अधिकारी की सरकार ने जो काम किया वह किसी जाति या धर्म को ध्यान में रख कर नहीं किया। असामाजिक तत्वों के खिलाफ कार्रवाई हुई, जिससे समाज में शांति बहाल हुई है। समाज में शांति बहाली का लाभ हर धर्म व जाति के लोगों को मिलता है। दशकों तक लेफ्ट और फिर डेढ़ दशक तक तृणमूल कांग्रेस के शासन में अराजकता, हिंसा और लूट से हर जाति व धर्म के लोग त्रस्त थे। उनको लेफ्ट व तृणमूल शासन में हुए शोषण का अहसास हुआ है। तभी उनके लिए सुवेंदु का शासन ताजा हवा के झोंके की तरह है। कह सकते हैं कि सरकार ने पांच महीने की छोटी सी अवधि में जिस तरह से शांति और सौहार्द्र स्थापित किया है उसी का परिणाम है कि भाजपा रेजिनगर जैसी सीट पर जीती और नंदीग्राम में जीत का रिकॉर्ड स्थापित किया।

यहां इस बात का जिक्र करना भी आवश्यक है कि रेजिनगर जैसी ही सामाजिक संरचना वाली असम की नगांव लोकसभा सीट पर भी भारतीय जनता पार्टी जीती है। नगांव में लगभग 60 फीसदी आबादी मुस्लिम है। इसके बावजूद इस सीट पर भाजपा के देबाशीष शर्मा डेढ़ लाख वोट से चुनाव जीते। असम में मुसलमानों के मसीहा माने जाने वाले जमात और एआईयूडीएफ के नेता बदरूद्दीन अजमल खुद उस सीट पर चुनाव लड़े थे। इसके बावजूद 40 फीसदी हिंदू आबादी वाली सीट पर भाजपा उम्मीदवार को 50 प्रतिशत वोट मिले। कांग्रेस की शिबोमणी बसु को सवा लाख से भी कम वोट मिले और वे तीसरे स्थान पर रहीं। नगांव सीट की जीत भी समावेशी और लोक कल्याण की राजनीति की जीत है। यह भी मुस्लिम मतदाताओं के बदलते व्यवहार का संकेत है। ध्यान रहे जब बदरूद्दीन अजमल ने पार्टी बनाई थी, तब राज्य के बड़े हिस्से में मुस्लिम कांग्रेस को छोड़ कर उनके साथ गए थे। पिछले दो चुनावों में दिखा कि मुस्लिम अजमल को छोड़ कर कांग्रेस की ओर लौटे। लेकिन इस साल मई में आए विधानसभा चुनाव नतीजों से सबक लेकर मुस्लिम मतदाता अब अपनी नई पोजिशनिंग करते दिख रहे हैं। कुछ मुस्लिम मतदाता कांग्रेस और एआईयूडीएफ की बाइनरी से निकल कर भाजपा को भी एक विकल्प के तौर पर देख रहे हैं। यह दोनों की राजनीति के लिए चिंता की बात होगी।

अगर रेजिनगर व नंदीग्राम विधानसभा और नगांव लोकसभा सीट के चुनाव परिणामों के व्यापक असर की बात करें तो राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी इसका एक बड़ा संदेश है। इससे यह धारणा निर्णायक रूप से टूटी है कि मुस्लिम किसी हाल में भाजपा को वोट दे ही नहीं सकता है। अगर सरकार समावेशी हो, लोक कल्याणकारी हो और कानून व्यवस्था सुनिश्चित करने वाली हो तो मुस्लिम भी उसको वोट कर सकते हैं। वैसे भी तीन तलाक समाप्त होने और उसे अवैध बनाए जाने के बाद से मुस्लिम महिलाओं का एक हिस्सा नरेंद्र मोदी के नेतृत्व का समर्थन करता है और उनकी पार्टी को वोट करता है। चुनाव बाद जुटाए गए कई राज्यों के आंकड़े इसकी गवाही देते हैं। धीरे धीरे ही सही लेकिन इस तरह का बदलाव अगर मुस्लिम मतदाताओं के व्यवहार में दिखता है तो उससे सामाजिक व राजनीतिक विभाजन कम होगा। भारत का समाज भी समावेशी बनेगा और तुष्टिकरण की राजनीति भी समाप्त होगी।

जहां तक विपक्ष की बात है तो मुख्य विपक्षी कांग्रेस और उसकी सहयोगी तृणमूल कांग्रेस के लिए इन नतीजों में दो बड़े संकेत छिपे हैं। पहला, मुसलमानों के मन में भाजपा के प्रति नफरत का भाव भरने के तमाम प्रयासों के बावजूद मुसलमान पूर्वाग्रह छोड़ कर भाजपा के साथ जा सकते हैं। दूसरा, तुष्टिकरण के तमाम प्रयासों के बावजूद कांग्रेस और तृणमूल जैसी पार्टियों से मुसलमानों का मोहभंग हो रहा है। कम से कम पश्चिम बंगाल और असम जैसी 30 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले राज्यों में मुस्लिम अब पारंपरिक सेकुलर पार्टियों की बजाय मुस्लिम नेताओं वाली पार्टियों की ओर देख रहे हैं। तभी नगांव में बदरूद्दीन अजमल और रेजिनगर में गुलाम नबी आजाद दूसरे स्थान पर रहे। दोनों सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं ने कांग्रेस को ठुकराया।  (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)

कब मनाई जाती है गुरु नानक देव की पुण्यतिथि? जानें उनके प्रेरणादायी प्रसंग और अनमोल विचार

कब मनाई जाती है गुरु नानक देव की पुण्यतिथि? जानें उनके प्रेरणादायी प्रसंग और अनमोल विचार

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Guru Nanak Dev Ji Punyatithi 2026: प्रति वर्ष अनुसार सिख धर्म के संस्थापक तथा सिखों के पहले गुरु, गुरु नानक देव जी की पुण्यतिथि अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 22 सितंबर को थी, लेकिन साल 2026 में तिथिनुसार उनकी पुण्यतिथि आश्विन कृष्ण दशमी तिथि के दिन भी मनाई जा रही है, जो कि 5 अक्‍टूबर, सोमवार को आ रही है। गुरु नानक देव जी धर्मगुरु, ईश्वर के सच्चे प्रतिनिधि, राष्ट्रप्रेम, एकता और शांति के प्रेरक, महान महापुरुष तथा सिख पंथ के प्रथम गुरु एवं संस्थापक थे। आइए, जानते हैं गुरु नानक देव जी के प्रेरणादायी प्रसंग और अनमोल विचार के बारे में विस्‍तार से… 

 

गुरु नानक देव के प्रमुख उपदेश और सिद्धांत

गुरु नानक देव जी धर्मगुरु, ईश्वर के सच्चे प्रतिनिधि, राष्ट्रप्रेम, एकता और शांति के प्रेरक, महान महापुरुष तथा सिख पंथ के प्रथम गुरु एवं संस्थापक थे। जब समाज में पाखंड, अंधविश्वास व कई असामाजिक कुरीतियां सिर उठाए खड़ी थीं, हर तरफ असमानता, छुआछूत व अराजकता का वातावरण जोरों पर था, ऐसे नाजुक समय में गुरु नानक देव ने आध्यात्मिक चेतना जाग्रत कर समाज को मुख्यधारा में लाने का कार्य किया। 

 

गुरु नानक देव ने की सिख धर्म की स्थापना

गुरु नानक देव ने जहां सिख धर्म की स्थापना की, वही उदारवादी दृष्टिकोण से सभी धर्मों की अच्छाइयों को भी समाहित किया। उन्होंने अपने समय के भारतीय समाज में व्याप्त कुप्रथाओं, अंधविश्वासों, पुरानी रुढ़ियों और पाखंडों को दूर करते हुए प्रेम, सेवा, परिश्रम, परोपकार और भाईचारे की दृढ़ नींव पर सिख धर्म की स्थापना की। उनका मुख्य उपदेश था, ईश्वर एक है, हिन्दू-मुसलमान सभी एक ही ईश्वर की संतान हैं, ईश्वर के लिए सभी समान हैं और उसी ने सबको बनाया है।

 

गुरु नानक देव के अनमोल विचार

गुरु नानक देव जी कहते थे कि हमें हमेशा लोभ का त्याग करना चाहिए और मेहनत से अपना धन कमाकर जीवन जीना चाहिए। हमेशा तनाव मुक्त रहकर हमें अपने कर्म को निरंतर करते रहना चाहिए और हमेशा खुश रहना चाहिए। धन को कभी भी अपने ह्रदय से लगाकर नहीं रखना चाहिए, उसका स्थान हमेशा जेब में ही होना चाहिए। तभी आप लालच और अहंकार से दूर रह पाएंगे। 

 

गुरु नानक देव कहते हैं हर मनुष्य को सबसे पहले खुद की बुराइयों और गलत आदतों पर विजय पाने की कोशिश करनी चाहिए। हर इंसान को हमेशा अच्छे और विनम्र सेवाभाव से अपना जीवन गुजारना चाहिए, क्योंकि अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन होता है, अत: मनुष्य को अहंकार नहीं करना चाहिए।

 

गुरु नानक देव ने की 4 लंबी यात्राएं

गुरु नानक देव जी ने सत्य और मानवता के प्रचार के लिए लगभग 24 वर्षों तक चार दिशाओं में हजारों किलोमीटर की पैदल यात्राएं कीं, जिन्हें उदासी कहा जाता है। इन यात्राओं में उनके साथ उनके मुस्लिम साथी और संगीतकार भाई मरदाना (जो रबाब बजाते थे) भी रहते थे।

 

अंतिम समय और करतारपुर साहिब

अपनी यात्राओं के बाद गुरु नानक देव जी ने रावी नदी के तट पर करतारपुर (वर्तमान पाकिस्तान) नगर बसाया और एक किसान के रूप में जीवन व्यतीत किया।

सपा-कांग्रेस की मुस्लिम वोट की खींचतान

वैसे उत्तर प्रदेश के मुसलमानो के मन में कोई भ्रम नहीं है। वे अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के साथ हैं क्योंकि उनको लग रहा है कि सपा ही इस बार भाजपा से लड़ने वाली मुख्य ताकत है। पिछले लोकसभा चुनाव मे उन्होंने देखा कि भाजपा के समर्थक मतदाताओं में भी अगर भाजपा से नाराजगी होती है तो वे भाजपा को हराने के लिए सपा के साथ जाते हैं। संविधान और आरक्षण पर खतरे से जो वर्ग नाराज हुआ वह भाजपा को हराने के लिए सपा के साथ गया और तभी लोकसभा में सपा 37 सीट जीत कर उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बनी। उसके साथ तालमेल का फायदा कांग्रेस को भी हुआ।

सो, मुस्लिम मतदाताओं के मन में कोई भ्रम नहीं है। फिर भी कांग्रेस के नेता इस कोशिश में लगे हैं कि किसी तरह से समाजवादी पार्टी के मन में यह आशंका पैदा की जाए कि मुस्लिम कांग्रेस के साथ जा सकता है। इसका मकसद दबाव बना कर विधानसभा की ज्यादा सीटें हासिल करना है। हालांकि सपा को हकीकत पता है। जब लोकसभा चुनाव में मुस्लिम उसके साथ आया तो विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ क्यों जाएगा। इसके बावजूद सपा भी इस खेल में शामिल है। सपा ने पिछले दिनों कांग्रेस सांसद इमरान मसूद के दामाद को अपनी पार्टी में शामिल कराया। इसके जवाब में कांग्रेस ने बसपा और एमआईएम के कई मुस्लिम नेताओं को पार्टी में शामिल कराया है। एमआईएम के मुखर नेता आसिम वकार पिछले दिनों कांग्रेस में शामिल हुए। अब बसपा सरकार में मंत्री रहे इजहारुल हक और 2024 में बसपा की टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़े नईम अहमद को पार्टी में शामिल कराया। इससे पहले पूर्व सांसद आमिर आलम खान और उनके बेटे नवाजिश आलम खान भी कांग्रेस में शामिल हुए। नवाजिश पहले विधायक रह चुके हैं। दोनों पिता पुत्र कई पार्टियों में रहे हैं। आमिर आलम रालोद से कैराना के सांसद रहे हैं।

वोट के लालच में गिरगिट की तरह रंग बदल रही है सपा: मायावती

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) अध्यक्ष मायावती ने सोमवार को तंज कसते हुये कहा कि समाजवादी पार्टी (सपा) ने प्रचारित ‘पीडीए रथ’ में अपने लाल रंग का कम और आरएसएस/भाजपा के ‘भगवा’ रंग का ज्यादा इस्तेमाल किया है।

सुश्री मायावती ने एक्स पर लिखा यूपी के आगामी विधानसभा आमचुनाव की तैयारी के लिये सपा प्रमुख का प्रचारित ‘पीडीए रथ’ में लाल रंग का कम तथा आरएसएस/भाजपा के भगवा रंग का (भगवाकरण) ज्यादा है, तो ऐसे में लोगों में चर्चा यही है कि यह सब उनका वोटों के स्वार्थ की खातिर गिरगिट की तरह लगातार रंग बदलना है या फिर मुसलमानों पर से सपा प्रमुख का वोट पाने का भरोसा उठ जाना है।

उन्होने कहा वैसे भी यूपी के खासकर मुस्लिम समाज को इस कड़वी हकीकत का पूरी तरह से एहसास है कि पिछले चुनावों में सपा को उनके द्वारा अधिकांश एकतरफा वोट देने के बावजूद भी यह पार्टी यूपी व केन्द्र की सत्ता में भाजपा को सरकार बनाने से नहीं रोक पाती है तो इस पार्टी को बार-बार वोट देकर अपना वोट खराब क्यों किया जाये और इस मामले में अब वे अपरकास्ट में से खासकर ब्राह्मण समाज की तरह ही अपना रवैया काफी तेजी से बसपा के पक्ष में बदल रहे हैं।

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सुश्री मायावती ने कहा क्योंकि बसपा यूपी में खासकर अपराध नियंत्रण व शान्ति-व्यवस्था के मामलों में कानून द्वारा कानून के राज के साथ ही व्यापक जनहित, जनकल्याण एवं विकास के मामलों में भी बेहतरीन आयरनलेडी राज यहाँ कई बार स्थापित करके दिखा चुकी है और जिसकी सर्वसमाज के हित व कल्याण में प्रदेश को सख्त जरूरत भी है।

बसपा सुप्रीमो ने कहा इसके साथ ही सपा को यह भी जनता को जरूर बता देना चाहिये कि अब इनके ‘पीडीए’ की असली वास्तविकता क्या है क्योंकि चुनावी स्वार्थ में अब तक इन्होंने कभी ‘पीडी’ को ‘पिछड़ा, दलित’ बताया तो कभी ‘पीडी’ को ‘पण्डित’ बताया है।

उन्होंने कहा कभी अपने आपको ‘अम्बेडकरवादी’ दर्शाने के चक्कर में बसपा का ‘नीला’ रंग वाला वस्त्र धारण कर तस्वीरें खिंचवाई है, किन्तु इसको लोगों ने फौरन ही फेक अम्बेडकरवादी कहकर रिजेक्ट भी कर दिया। बसपा सर्वसमाज हेतु ‘सर्वजन हिताय व सर्वजन सुखाय’ की नीति व सिद्धान्त वाली अम्बेडकरवादी पार्टी है तथा सभी को रोटी-रोजगार-युक्त आत्म-सम्मान व स्वाभिमान आदि का जीवन जीने की पक्षधर है। इसीलिये सर्वसमाज में बीएसपी का अपना सम्मान है।

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Swara Bhasker: ‘इतनी दुखी थी कि सारे मुस्लिम दोस्तों से मांगी थी माफी’, राम जन्मभूमि पर आए फैसले पर स्वरा भास्कर ने दिया विवादित बयान

Swara Bhasker: एक्टर स्वरा भास्कर ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के 2019 के राम जन्मभूमि फैसले पर बात करते हुए कहा कि एक हिंदू होने के नाते उन्हें “बहुत शर्म” महसूस हुई। एक्ट्रेस ने आगे कहा कि उन्होंने तुरंत आमिर खान, शाहरुख खान और सलमान खान जैसे मुस्लिम दोस्तों से संपर्क किया और “माफी मांगी।”

स्वरा भास्कर ने 2019 के अयोध्या फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया के बारे में बताया

‘द मिडनाइट आवर’ पॉडकास्ट पर फ़ैसले के बारे में बात करते हुए, स्वरा ने बताया कि फैसले के बाद उन्होंने अपनी फोन बुक में मौजूद “सभी मुसलमानों” को मैसेज किया। उन्होंने कहा, “जब फैसला आया तो मैं बहुत परेशान थी, क्योंकि मुझे लगा कि यह बहुत अन्यायपूर्ण था। मैंने अपनी फोनबुक में मौजूद सभी मुसलमानों को मैसेज किया। आमिर खान, शाहरुख खान और सलमान खान से लेकर फहद अहमद तक।”

“मैं इतनी परेशान थी कि मैं उन सभी मुसलमानों से संपर्क करना चाहती थी, जिन्हें मैं जानती हूं और उनसे कहना चाहती थी कि ‘एक हिंदू होने के नाते, मैं बस इतना बताना चाहती हूं कि मुझे सच में अफसोस है, मुझे सच में शर्म आ रही है। मैं इससे सहमत नहीं हूं’।” स्वरा की इन बातों पर सोशल मीडिया पर एक बार फिर तीखी प्रतिक्रियाएं आई हैं। कई लोगों ने अयोध्या फैसले पर उनके रुख की आलोचना की है।

अयोध्या फैसले के बारे में

जानकारी के लिए बता दें कि अयोध्या विवाद उस जगह को लेकर था जहां 1992 में गिराए जाने से पहले बाबरी मस्जिद थी। 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट के आदेश में विवादित जमीन राम मंदिर के निर्माण के लिए दे दी गई। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को मस्जिद के लिए पांच एकड़ वैकल्पिक जमीन दी जाए। इस तरह सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने लंबे समय से चल रहे कानूनी विवाद को खत्म कर दिया।

उनकी बातों पर प्रतिक्रिया देते हुए X पर एक यूजर ने लिखा, “स्वरा भास्कर राम मंदिर फैसले से परेशान थीं। कभी-कभी मुझे सच में उनके लिए बुरा लगता है; वह काम पाने की उम्मीद में दिन-रात बॉलीवुड की तारीफ करती रहती हैं, लेकिन किसी तरह काम कभी नहीं मिलता।”

एक और यूजर ने लिखा, “बॉलीवुड एक्ट्रेस स्वरा भास्कर राम मंदिर फैसले से परेशान थीं। लाखों लोगों ने ऐतिहासिक अयोध्या फैसले का जश्न मनाया। लेकिन स्वरा भास्कर? राम मंदिर का मुद्दा बॉलीवुड की सबसे बड़ी बहस का कारण बना हुआ है।” यह तब हुआ है जब स्वरा को ‘पद्मावत’ पर अपनी टिप्पणियों के कारण पहले भी भारी आलोचना का सामना करना पड़ा था, जिसमें उन्होंने जौहर वाले सीन की कड़ी आलोचना की थी। कई लोगों ने उनकी इन टिप्पणियों के लिए उनकी आलोचना की थी।

मक्का पर ड्रोन हमला किसने किया? दुनिया को याद आया 47 साल पुराना भयानक मंजर

पवित्र शहर मक्का पर 15 सितंबर 2026 की शाम ड्रोन हमले की घटना हुई थी। हालांकि साउदी एयर डिफेंस ने वक्त रहते इस ड्रोन को मार गिराया। लेकिन अब सवाल ये है कि आखिर ये ड्रोन अटैक किसने किया। क्योंकि सऊदी अरब के मुताबिक, 15 सितंबर की शाम उसकी एयर डिफेंस ने मक्का के दक्षिण में एक ड्रोन को मार गिराया। सऊदी का कहना है कि यह ड्रोन हूती विद्रोहियों ने भेजा था और यह मक्का के प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र की ओर बढ़ रहा था। तो वहीं अब हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के इस आरोप को खारिज कर दिया है। हूतियों ने कहा है कि उन्होंने मक्का या किसी भी दूसरे पवित्र स्थल को निशाना नहीं बनाया।

ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यही है अगर हूतियों ने मक्का को निशाना बनाने के लिए यह ड्रोन नहीं भेजा, तो फिर यह ड्रोन किसका था? फिलहाल इस सवाल का कोई पुख्ता जवाब तो सामने नहीं आया है लेकिन सऊदी अरब की तरफ से जो दावे किये जा रहो हैं वो चौंकाने वाले हैं

सऊदी के प्रवक्ता मेजर जनरल तुर्की अल-मलिकी के मुताबिक, रॉयल सऊदी एयर डिफेंस फोर्स ने 15 सितंबर को शाम करीब 6:50 मिनट पर मक्का के दक्षिण में एक ड्रोन को इंटरसेप्ट किया। सऊदी पक्ष का कहना है कि ड्रोन मक्का के प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र में दाखिल होने से पहले ही नष्ट कर दिया गया। ड्रोन का मलबा शहर के दक्षिण में आकर गिरा।

 मक्का को निशाना बनाने की दूसरी कोशिश

सऊदी अरब ने इसे मक्का को निशाना बनाने की हूतियों की दूसरी कोशिश बताया है। गठबंधन के प्रवक्ता ने जुलाई 2017 में मक्का की दिशा में दागी गई बैलिस्टिक मिसाइल का भी हवाला दिया लेकिन इस बार मामले थोड़ा अलग है, मौजूदा घटना में हथियार के तौर पर ड्रोन का इस्तेमाल किए जाने का दावा किया जा रहा है। सऊदी पक्ष ने कहा है कि दो पवित्र मस्जिदों और जायरीनों की सुरक्षा उसके लिए रेड लाइन है। सऊदी की तरफ से आगो कहा गया कि आगे किसी ऐसे हमले को रोकने के लिए जरूरी और कड़े कदम उठाए जाएंगे

हूती विद्रोहियों ने आरोपों को बताया झूठ

सऊदी पक्ष के इस दावे के तुरंत बाद हूती विद्रोहियों की ओर से इसका खंडन किया गया। हूती सुप्रीम पॉलिटिकल काउंसिल के वरिष्ठ सदस्य हेजाम अल-असद ने मक्का को निशाना बनाने के आरोप को खारिज करते हुए कहा कि मक्का या किसी अन्य पवित्र स्थल को निशाना बनाने की बात गलत है। यही वजह है कि घटना को लेकर दोनों पक्षों के दावे बिल्कुल अलग हैं। सऊदी अरब कह रहा है कि ड्रोन हूतियों की ओर से ही लॉन्च किया गया था, जबकि हूती इस बात से इनकार कर रहे हैं।

सऊदी अधिकारियों के मुताबिक, मक्का और वहां मौजूद जायरीनों (तीर्थयात्री) की सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई। इस घटना की संवेदनशीलता इसलिए भी अधिक है क्योंकि मक्का इस्लाम का सबसे पवित्र शहर है और यहां दुनिया भर से मुसलमान उमराह और हज के लिए पहुंचते हैं।

दुनिया को याद आया 47 साल पुराना भयानक मंजर

15 सितंबर 2026 को मक्का के पास ड्रोन हमले की कोशिश ने 1979 की उस घटना की यादें ताजा कर दीं, जब करीब 200 हथियारबंद लोगों ने ग्रैंड मस्जिद पर कब्जा कर हजारों लोगों को बंधक बना लिया था। इस कब्जे की अगुवाई धार्मिक उपदेशक जुहैमान अल-उतैबी ने की थी और सुरक्षा बलों को इसे खत्म करने में करीब दो हफ्ते लग गए थे।

मौजूदा घटना में सऊदी अरब के मुताबिक एयर डिफेंस ने शाम करीब 6:50 बजे ड्रोन को मक्का के प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र में दाखिल होने से पहले ही मार गिराया। सऊदी गठबंधन के प्रवक्ता तुर्की अल-मलिकी ने दावा किया कि ड्रोन हूतियों ने लॉन्च किया था। इसके बाद मक्का में सुरक्षा अलर्ट जारी हुआ, जिसे कुछ मिनट बाद हटा लिया गया। सऊदी के मुताबिक 2017 के बाद यह पहली ऐसी चेतावनी थी। हालांकि, हूती विद्रोहियों ने सऊदी के आरोप को खारिज करते हुए कहा कि यमन की ओर से मक्का या किसी अन्य पवित्र स्थल को कोई खतरा नहीं है।

1979 में क्या हुआ था?

20 नवंबर 1979 को करीब 50 हजार लोग ग्रैंड मस्जिद में नमाज के लिए जुटे थे। इसी दौरान जुहैमान अल-उतैबी और उसके समर्थकों ने मस्जिद पर कब्जा कर लिया। उसने अपने बहनोई मोहम्मद अब्दुल्लाह अल-कहतानी को महदी बताया और सऊदी शाही परिवार के खिलाफ विद्रोह का ऐलान किया।

सुरक्षा बलों और हथियारबंद विद्रोहियों के बीच करीब दो हफ्ते तक लड़ाई चलती रही। विद्रोही मस्जिद के भूमिगत हिस्सों में छिप गए थे। फ्रांस के जानकारों की मदद से अभियान चलाया गया और 5 दिसंबर को जुहैमान समेत करीब 100 विद्रोहियों ने आत्मसमर्पण किया। 9 जनवरी 1980 को जुहैमान और 62 अन्य लोगों को सार्वजनिक रूप से फांसी दी गई थी।

यमन में हूतियों और सरकार के बीच संघर्ष लंबे समय से चला आ रहा है। 2014 में हूतियों ने राजधानी सना और देश के कई हिस्सों पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद 2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन की मान्यता प्राप्त सरकार के समर्थन में सैन्य हस्तक्षेप किया।

इसके अलावा इस मामले पर एक और अहम खबर सामने आ रही है। रिपोर्ट्स में ये दावा किया जा रहा है कि कि सऊदी ने हूती विद्रोहियों के खिलाफ इजरायल से मदद मांगी है. रिपोर्ट्स के मुताबिक पाकिस्तान के मक्का पैक्ट के तहत अपने हाथ पीछे खींच लिए जिसके बाद अब सऊदी इजरायल का रुख कर लिया है। इस मामले पर अभी तक आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है.

पिछले कुछ समय में दोनों पक्षों के बीच माहौल काफी शांत था, लेकिन जुलाई 2026 की शुरुआत के बाद संघर्ष फिर तेज हो गया। मक्का के पास ड्रोन की घटना से एक दिन पहले सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने दावा किया था कि हूती हमलों में खमीस मुशैत, अबहा और ताइफ में 13 नागरिक घायल हुए इसके अलावा सात घरों और दो वाहनों को भारी नुकसान पहुंचा है।

‘मेरी हत्या की साजिश रची गई…’ सांसद चंद्रशेखर आजाद के इस बड़े खुलासे से मची खलबली

'मेरी हत्या की साजिश रची गई...' सांसद चंद्रशेखर आजाद के इस बड़े खुलासे से मची खलबली

chandra shekhar azad

उत्तर प्रदेश के नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद ने वीडियो जारी कर अपनी हत्या की साजिश रचे जाने का दावा किया है। उन्होंने सरकार से हत्या की साजिश से लेकर बाराबंकी हिंसा तक  उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।

 

एक्स पर उन्होंने वीडियो जारी कर कहा कि एक फार्म हाउस में मेरी हत्या करने का षड्यंत्र रचा गया है। मैं यह बात बहुत जिम्मेदारी से कह रहा हूं। मेरे पास जो सूचनाएं और स्रोत हैं, वे गलत नहीं हैं। मैं सरकार से मांग करता हूं कि इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच कराई जाए और हत्या की साजिश से लेकर बाराबंकी हिंसा में शामिल लोगों की भूमिका सामने लाई जाए।

 

आजाद ने कहा कि मैं अपने विरोधियों से भी कहना चाहता हूं—मौत तो एक दिन आनी है, मौत से डरकर जिया नहीं जा सकता। अगर मेरी मौत आपके हाथों लिखी होगी तो वह भी हो जाएगी, लेकिन अगर आप अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हुए और मेरे लोगों ने मुझे ताकत, हिम्मत और मेरा साथ दे दिया, तो याद रखिए, आप जैसे गुंडों को उत्तर प्रदेश से पलायन करना पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि आज सवाल सिर्फ मेरी सुरक्षा का नहीं है। जब सुरक्षा प्राप्त एक चुने हुए जनप्रतिनिधि और सांसद के साथ दिनदहाड़े पत्थरबाजी की जाए, पेट्रोल-डीजल जैसी ज्वलनशील चीजों से भरी बोतलों के जरिए गाड़ी में आग लगाने का प्रयास किया जाए और आरोपी इतने बेखौफ हों, तो सोचिए इस प्रदेश में दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों की सुरक्षा और न्याय की स्थिति क्या होगी?
 

आजाद समाज पार्टी कांशी राम के प्रमुख ने कहा कि मैं अपने साथियों से भी कहना चाहता हूं—डरने की जरूरत नहीं है। संघर्ष जारी रहेगा। मौत से डरकर जिया नहीं जा सकता। 

UCC Row In NDA: 2029 तक 21 राज्यों में UCC के अमित शाह के दावे को मिला JDU का चैलेंज! TDP और चिराग पासवान का भी सख्त रुख

UCC Row In NDA: केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने हाल ही में कहा कि 21 राज्यों की भारतीय जनता पार्टी (BJP) की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की सरकारें 2029 से पहले समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करेंगी। शाह ने कहा, “तीन तलाक को समाप्त करके मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार दिए गए हैं। हमने कई राज्यों में यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) लागू की है। मुझे विश्वास है कि BJP-NDA शासित 21 राज्यों में 2029 से पहले यूसीसी लागू कर दिया जाएगा।”

शाह ने कहा कि सरकार ने भारतीय न्याय संहिता के माध्यम से देश की आपराधिक न्याय प्रणाली को मजबूत किया है। साथ ही दावा किया कि कई राज्यों में एक साल में दोषसिद्धि दर में 30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। उन्होंने यह भी कहा कि तीन साल के भीतर न्याय दिलाने के लिए एक व्यवस्था स्थापित की जा रही है।

राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर शाह ने कहा कि आर्टिकल 370 और 35ए को बिना एक बूंद खून बहाए या एक गोली चलाए समाप्त किया गया। उन्होंने कहा कि सरकार ने पांच दशक से जारी नक्सलवाद को समाप्त किया है। देश के पूर्वोत्तर क्षेत्र में 14 से अधिक शांति समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं।

UCC पर NDA में हलचल, JDU ने किया विरोध

अमित शाह के 2029 से पहले NDA शासित 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू किए जाने के बयान के बाद भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सहयोगी जनता दल यूनाइटेड (JDU) के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने कहा कि वह इस मुद्दे पर जल्द ही गृह मंत्री से मुलाकात करेंगे। फिर उनकी पार्टी अपना रुख तय करेगी। झा ने इस विषय पर पीटीआई से कहा कि वह जल्द ही केंद्रीय गृह मंत्री से मुलाकात करेंगे और उसके बाद पार्टी यूसीसी के मुद्दे पर अपना रुख तय करेगी।

बिहार में लागू नहीं होने देंगे: श्याम रजक

इस बीच, बिहार में सत्तारूढ़ राजग के प्रमुख घटक JDU के वरिष्ठ नेता और विधायक श्याम रजक ने कहा कि पार्टी ने संसद में यूसीसी से जुड़े विधेयक का समर्थन किया था। लेकिन बिहार में इसे लागू करने के पक्ष में नहीं है। उन्होंने कहा कि पार्टी के सर्वोच्च नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस मुद्दे पर अपना रुख पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं।

बिहार में सत्तारूढ़ गठबंधन में सहयोगी जनता दल यूनाइटेड (JDU) के वरिष्ठ नेता और विधायक श्याम रजक ने सोमवार को कहा कि उनकी पार्टी ने भले ही नागरिक संहिता से जुड़े विधेयक का संसद में समर्थन किया था। लेकिन वह इसे राज्य में लागू करने के पक्ष में नहीं है। JDU के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव रजक ने दावा किया कि इस मुद्दे पर पार्टी का रुख सर्वोच्च नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं।

JDU विधायक दल के नेता एवं बिहार सरकार के मंत्री श्रवण कुमार ने भी यूसीसी पर सीधे टिप्पणी करने से बचते हुए कहा कि इस मुद्दे पर पार्टी के प्रवक्ता बोलेंगे। उन्होंने कहा कि उनका पक्ष सुनने के बाद वह कुछ कहेंगे। JDU के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद ने भी संक्षिप्त प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यूसीसी के मुद्दे पर पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से बातचीत करेंगे। बिहार में भारतीय जनता पार्टी नीत राजग सरकार में JDU दूसरा सबसे बड़ा घटक है। अगला लोकसभा चुनाव 2029 में होना है।

चिराग ने भी जताया विरोध

बिहार में बीजेपी की प्रमुख सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने कहा कि पहले ड्राफ्ट आए। इसमें सभी पक्षों के हित शामिल रहें। पासवान ने एक पोस्ट में लिखा, “भारत का सामाजिक ताना-बाना विविधतापूर्ण है। हर वर्ग की अपनी नागरिक परंपराएँ और रीति-रिवाज हैं। संविधान ने स्वयं इसे स्वीकार किया है। पांचवीं-छठी अनुसूची, आर्टिकल 371A व 371G, और अब तक की हर संहिता में अनुसूचित जनजातियों को दी गई छूट इसका प्रमाण है। मेरी पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) समानता और विविधता- दोनों के प्रति प्रतिबद्ध है। प्रारूप सार्वजनिक हो, सभी हितधारकों के हितों का अवलोकन हो, व्यापक विचार-विमर्श हो> तत्पश्चात अवलोकन उपरांत पार्टी अपना मत रखेगी।”

TDP का मिला समर्थन

लोकसभा में TDP के नेता लावू कृष्ण देवरायालु ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ से कहा, “हम इसका समर्थन करेंगे।” कृष्ण ने कहा, “अभी तो कोई चर्चा नहीं हो रही है। लेकिन जब भी हमें इसकी जरूरत महसूस होगी, हम इस पर विचार करेंगे। इसे अपनाने से पहले हम निश्चित रूप से अलग-अलग स्टेकहोल्डर्स को इसमें शामिल करेंगे।”

ओवैसी ने यूसीसी को लेकर शाह पर साधा निशाना

देश के 21 राज्यों में भाजपा के नेतृत्व वाली NDA सरकारों के 2029 से पहले यूसीसी लागू करने के संबंध में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बयान पर कड़ी आपत्ति जताते हुए एआईएमआईएम अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने सोमवार को आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ दल मुसलमानों को निशाना बनाना चाहता है।नउन्होंने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी और शाह संविधान के आर्टिकल 25 (जो धर्म की आजादी की गारंटी देता है) और आर्टिकल 14 (जो समानता के अधिकार की गारंटी देता है) का उल्लंघन करते हुए समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने की कोशिश कर रहे हैं।

ओवैसी ने कहा कि देश की आत्मा उसकी विविधता है। यूसीसी लागू करने का मतलब गैर-हिंदुओं पर हिंदू कानून थोपना होगा। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) सरकार द्वारा नियुक्त विधि आयोग ने यह निष्कर्ष निकाला था कि यूसीसी न तो जरूरी है और न ही वांछनीय। गोवा में यूसीसी के अलग-अलग प्रावधानों का जिक्र करते हुए, उन्होंने पूछा कि क्या शाह और भाजपा पश्चिमी राज्य में भी उसी यूसीसी को लागू करेंगे, जैसा उत्तराखंड जैसे भाजपा-शासित राज्यों में लागू है।

उन्होंने यह भी पूछा कि क्या एन. चंद्रबाबू नायडू, नीतीश कुमार और चिराग पासवान जैसे NDA नेता यूसीसी के प्रावधानों का समर्थन करेंगे। दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान भारत-चीन संबंधों में आए सुधार पर ओवैसी ने सवाल उठाया कि क्या बेहतर द्विपक्षीय संबंधों का मतलब यह है कि भारत ने भारत-चीन सीमा पर अपने गश्त करने के अधिकार खो दिए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन ने पाकिस्तान को हथियार दिए थे।

‘सांप्रदायिक राजनीतिक के लिए कर रही यूसीसी का इस्तेमाल’

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) शासित 21 राज्यों में 2029 से पहले समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने की केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की घोषणा को लेकर सोमवार को आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इस मुद्दे का इस्तेमाल सांप्रदायिक और बहुसंख्यकवादी राजनीति के लिए कर रही है। माकपा ने कहा कि एकरूपता का मतलब हमेशा समानता नहीं होता और यूसीसी लागू करने की घोषणा से भाजपा का राजनीतिक इरादा स्पष्ट हो गया है।

माकपा ने आरोप लगाया कि BJP समान अधिकारों से जुड़े जटिल सवाल को सांप्रदायिक और बहुसंख्यकवादी राजनीति के हथियार में बदल रही है। अगले लोकसभा चुनाव से पहले अपने हिंदुत्व वोट बैंक को मजबूत करना चाहती है। वाम दल ने कहा कि बेरोजगारी, महंगाई, कृषि संकट और छात्रों की समस्याओं जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों से निपटने के बजाय भाजपा एक और विभाजनकारी अभियान चलाने को प्राथमिकता दे रही है।

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