वोट बंटवारे का नगांव व रेजिनगर मॉडल

एसआईआर, परिसीमन और महिला आरक्षण के बाद भाजपा को यह उम्मीद है कि विपक्ष का वोट बंटेगा, जिसका लाभ उसको मिलेगा। भाजपा के इस भरोसे को समझने के लिए पश्चिम बंगाल की रेजीनगर विधानसभा सीट और असम की नगांव लोकसभा सीट के उपचुनाव को मॉडल की तरह देखा जा सकता है। पिछले लोकसभा चुनाव में नगांव सीट कांग्रेस ने जीती थी। लेकिन उसके सांसद प्रद्योत बोरदोलोई पार्टी छोड़ कर भाजपा में चले गए और लोकसभा से इस्तीफा दे दिया। इसलिए वहां उपचुनाव हुआ। ऐसे ही रेजिनगर की सीट हुमायूं कबीर ने जीती थी। वे दो सीटों से जीते थे इसलिए उन्होंने रेजीनगर से इस्तीफा दिया। नगांव में 55 से 60 फीसदी औऱ रेजिनगर में करीब 70 फीसदी मतदाता मुस्लिम हैं। इसके बावजूद दोनों सीटों पर भाजपा जीती।

नगांव लोकसभा सीट पर भाजपा उम्मीदवार को करीब 50 फीसदी वोट मिले और रेजिनगर में करीब 60 फीसदी वोट मिला। भाजपा ने हुमायूं कबीर के बेटे को 75 हजार वोट से हराया। नगांव लोकसभा सीट पर वोट बंटवारा एक बड़ा फैक्टर रहा। वहां ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के नेता बदरूद्दीन अजमल चुनाव लड़े थे। मुस्लिम मतदाता उनके पक्ष में एकजुट हुए फिर भी कांग्रेस को सवा लाख के करीब वोट मिला। जीत हार का अंतर डेढ़ लाख के करीब वोट का था। तभी माना जा रहा है कि अगर सभी विपक्षी पार्टियां एकजुट होकर लड़तीं तो शायद भाजपा नहीं जीत पाती। रेजिनगर का मामला अलग है। वहां विपक्ष के सभी उम्मीदवारों को मिला कर भी उतना वोट नहीं आया, जितने वोट से भाजपा जीती।

सो, ये दोनों मॉडल हैं। रेजिनगर में कहा गया कि राज्य के मुस्लिम मतदाता भी लेफ्ट और तृणमूल के शासन से ऊबे हुए थे और उनको भी विकास, रोजगार वाली राजनीति पसंद आ रही है। इसलिए मुसलमानों ने भी भाजपा को वोट दिया। नगांव का मॉडल विपक्ष के वोट बंटवारे का है। भाजपा को उम्मीद है कि विपक्ष एकजुट होकर चुनाव नहीं लड़ेगा। पिछली बार यानी 2024 में विपक्ष एकजुट होकर लड़ा था तो संगठन और नैरेटिव दोनों की साझा ताकत के दम पर उसने भाजपा को बहुमत से नीचे ला दिया था। आजादी के बाद पहली बार इतना मजबूत विपक्ष जीत कर आया। लेकिन उसके बाद अलग अलग कारणों से बिखराव है। आम आदमी पार्टी, डीएमके आदि अलग रास्ते पर चल रहे हैं। अगर ये सभी पार्टियां साथ नहीं आती हैं तो भाजपा विरोधी वोट बंटेगा। विपक्ष के अंदर विभाजन बढ़ाने के लिए भाजपा की ओर से भी साम, दाम, दंड और भेद सारे उपाय किए जाते हैं।

इस बीच मुस्लिम नेताओं की पार्टियां भी चुनाव लड़ेंगी। मुस्लिम नेताओं ने अपनी जिस तरह की छवि बनाई है या विपक्षी पार्टियों ने उनके बारे में जिस तरह के प्रचार किए हैं उसके बाद यह संभावना कम है कि विपक्ष के साथ उनका तालमेल होगा। चाहे असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी हो या बदरूद्दीन अजमल की पार्टी हो या हुमायूं कबीर और नौशाद सिद्दीकी पार्टी हो। इनका तालमेल मुख्यधारा की विपक्षी पार्टियों के साथ नहीं होगा। ऐसे में ये पार्टियां अलग चुनाव लड़ेंगी। इनकी वजह से भी वोट का बंटवारा होगा, जिस लाभ भाजपा को मिल सकता है।

कांग्रेस के लिए उपचुनाव का संदेश

पश्चिम बंगाल की दो विधानसभा सीटों और असम की एक लोकसभा सीट के नतीजों का संदेश यह है कि अब मुस्लिम भी भाजपा को वोट दे रहे हैं और साथ ही अपने नेता की तलाश भी कर रहे हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो भाजपा किसी स्थिति में रेजीनगर विधानसभा सीट नहीं जीत सकती थी और नगांव लोकसभा सीट पर भी उसका जीतना मुमकिन नहीं था। लेकिन नगांव सीट पर भाजपा न सिर्फ जीती, बल्कि दूसरे स्थान पर रहे एआईयूडीएफ के नेता बदरूद्दीन अजमल और कांग्रेस की शिबोमणी बोरा दोनों को मिला कर जीतने वोट मिले उससे ज्यादा वोट भाजपा के देबाशीष शर्मा को मिले। इसी तरह की स्थिति रेजीनगर सीट पर भी रही। वहां तो सभी विपक्षी पार्टियां मिल कर भी भाजपा उम्मीदवार को मिले वोट से बहुत पीछे रहीं। यह बहुत दिलचस्प परिघटना है, जिस पर विचार करने की जरुरत है।

गौरतलब है कि असम में मुस्लिम मतदाताओं ने पहले कांग्रेस को छोड़ कर अजमल की पार्टी का साथ दिया था लेकिन पिछले दो चुनावों में उसने अजमल को छोड़ा और कांग्रेस के साथ खड़े हुए तभी इस बार कांग्रेस के 19 में से 18 विधायक मुस्लिम जीते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में धुबरी सीट पर कांग्रेस के हाथ अजमल 10 लाख से ज्यादा वोट से हारे थे। लेकिन अब फिर ऐसा लग रहा है कि मुस्लिम अजमल के साथ जा रहे हैं। अजमल साढ़े पांच लाख से ज्यादा वोट लेकर दूसरे स्थान पर रहे, जबकि कांग्रेस सवा लाख वोट के साथ बहुत पीछे तीसरे स्थान पर रही।

ध्यान रहे कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस या लेफ्ट किसी ने भी यह नहीं कहा है कि असम की नगांव या पश्चिम बंगाल की रेजीनगर और नंदीग्राम सीट पर वोट चोरी करके भाजपा जीती है। दबी जुबान में कुछ नेता बोल रहे हैं लेकिन पार्टियों ने नतीजे को स्वीकार किया है। असम की नगांव सीट कांग्रेस के प्रद्योत बोरदोलोई के इस्तीफे से खाली हुई थी। वहां से भाजपा ने पूर्व आईएएस अधिकारी देबाशीष शर्मा को टिकट दिया। वे नगांव के कलेक्टर रह चुके हैं और निजी तौर पर बहुत लोकप्रिय हैं। कहा जा रहा है कि इस वजह से मुस्लिम वोट उनको मिले। ध्यान रहे नगांव में मुस्लिम आबादी 60 फीसदी के करीब है। वहां से असम के सबसे बड़े मुस्लिम नेता बदरूद्दीन अजमल खुद लड़ने पहुंचे थे। लेकिन वे जीत नही सके। उन्होंने कांग्रेस को तो तीसरे स्थान पर पहुंचा दिया पर देबाशीष शर्मा को हरा नहीं पाए। शर्मा डेढ़ लाख वोट से जीते। उनको 50 फीसदी से ज्यादा वोट मिली। जाहिर है मुस्लिम समर्थन के बगैर वे इतना वोट नहीं ले सकते थे।

जहां तक रेजीनगर की बात है तो वहां हिंदू आबादी 30 फीसदी के करीब है। लेकिन भाजपा के उम्मीदवार को 50 फीसदी के करीब वोट मिले। अगर यह मान लिया जाए कि एक एक हिंदू वोट उन्हीं को मिला तब भी कम से कम 20 फीसदी मुस्लिम वोट उनको मिला है। यह बहुत दिलचस्प परिघटना है। यह मुर्शिदाबाद जिला है, जहां बेलडांगा में हुमायूं कबीर ने बाबरी मस्जिद की नींव रखी और मई के चुनाव में रेजीनगर सीट पर 65 हजार वोट से जीते, उस सीट पर उनके बेटे गुलाम नबी आजाद को भाजपा ने 75 हजार वोट से हराया। हुमायूं कबीर की पार्टी दूसरे स्थान पर रही। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और लेफ्ट तीनों के लिए यह बहुत ज्यादा चिंता की बात होनी चाहिए। तीनों को मिला कर भी 10 हजार वोट नहीं आए। असम की नगांव और पश्चिम बंगाल की रेजिनगर सीट का मैसेज कांग्रेस और दूसरी सेकुलर पार्टियों के लिए बहुत खराब है। कट्टरपंथी मुस्लिम नेताओं की पार्टियों को अब मुस्लिम बहुल इलाकों में ज्यादा समर्थन मिलेगा। पहले मुस्लिम सेकुलर पार्टियों को इसलिए वोट देता था क्योंकि उसको लगता था कि ये पार्टियां कुछ हिंदू वोट लेकर भाजपा को हरा सकती हैं। लेकिन अगर हिंदू इन पार्टियों को वोट नहीं दे रहा है तो फिर मुस्लिम भी अपनी पार्टी और अपना नेता खोज कर उसे वोट देंगे।

सुवेंदु सरकार को शत प्रतिशत अंक

नंदीग्राम से ज्यादा महत्वपूर्ण चुनाव नतीजा रेजिनगर विधानसभा सीट का है, जहां से भाजपा के सखारव सरकार ने आम जनता उन्नयन पार्टी यानी एजेयूपी के उम्मीदवार गुलाम नबी आजाद को 75 हजार से अधिक वोट से हराया। रेजिनगर का परिणाम पश्चिम बंगाल के साथ साथ देश की राजनीति पर गंभीर असर डालने वाला है। यह चुनाव परिणाम विपक्ष की राजनीति को भी नए सिरे से व्याख्यायित करेगा।

यदि नंदीग्राम और रेजिनगर विधानसभा सीट के उपचुनाव को पांच महीने पुरानी सुवेंदु अधिकारी सरकार की परीक्षा मानें तो कह सकते हैं कि सुवेंदु शत प्रतिशत अंक के साथ उतीर्ण हुए हैं। नंदीग्राम सीट जीतने का जो रिकॉर्ड उन्होंने खुद बनाया था वह रिकॉर्ड उनकी उम्मीदवार हसीरानी रथ ने तोड़ दिया। इस रिकॉर्ड का टूटना सुवेंदु अधिकारी की अपनी उपलब्धि में शुमार होगा। सुवेंदु ने 2016 के चुनाव में एक रिकॉड बनाया था, जब उन्होंने सीपीआई के अब्दुल कबीर शेख को 81 हजार से ज्यादा वोट से हराया था। उसके 10 साल बाद 2026 के उपचुनाव में उनकी चुनी हुई उम्मीदवार हसीरानी रथ ने कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के साझा उम्मीदवार मिलन प्रधान को एक लाख 22 हजार से ज्यादा वोट से हराया। यह निजी तौर पर सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व और उनकी सरकार के कामकाज पर सिर्फ नंदीग्राम की जनता की नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की जनता की स्वीकृति की मुहर है।

नंदीग्राम से ज्यादा महत्वपूर्ण चुनाव नतीजा रेजिनगर विधानसभा सीट का है, जहां से भाजपा के सखारव सरकार ने आम जनता उन्नयन पार्टी यानी एजेयूपी के उम्मीदवार गुलाम नबी आजाद को 75 हजार से अधिक वोट से हराया। रेजिनगर का परिणाम पश्चिम बंगाल के साथ साथ देश की राजनीति पर गंभीर असर डालने वाला है। यह चुनाव परिणाम विपक्ष की राजनीति को भी नए सिरे से व्याख्यायित करेगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह चुनाव परिणाम दशकों से स्थापित कई राजनीतिक मान्यताओं और धारणाओं को तोड़ने वाला है।

रेजिनगर विधानसभा सीट मुर्शिदाबाद जिले में आती है, जहां पूरे जिले में औसत मुस्लिम आबादी 55 से 60 फीसदी के करीब है। उसमें भी रेजिनगर विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग 70 फीसदी है। मुर्शिदाबाद जिले के ही बेलडांगा में हुमायूं कबीर ने बाबरी मस्जिद की नींव रखी है। बाबरी मस्जिद की नींव रखने के बाद उन्होंने एजेयूपी नाम से पार्टी का गठन किया और दो सीटों से चुनाव लड़े। तमाम निगेटिव प्रचार के बावजूद वे दोनों सीटों से जीते। रेजिनगर सीट पर हुमायूं कबीर 58 हजार से ज्यादा वोट से जीते थे। लेकिन उनके इस्तीफे से खाली हुई इस सीट पर उनके बेटे गुलाम नबी आजाद 75 हजार से ज्यादा वोट से हारे। हुमायूं कबीर जितने वोट से जीते थे उतना वोट भी उनके बेटे को नहीं मिला। रेजिनगर सीट के चुनाव परिणाम की एक विशेष बात यह भी रही कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की पारंपरिक प्रतिद्वंद्री पार्टियों यानी कांग्रेस, तृणमूल और वामपंथी तीनों को मिला कर सिर्फ 13 हजार वोट मिले। लगातार 15 साल पश्चिम बंगाल में राज करने वाली ममता बनर्जी की पार्टी के उम्मीदवार और पूर्व विधायक रबीउल आलम चौधरी को सिर्फ 3,797 वोट मिले।

जिस विधानसभा सीट पर 70 फीसदी मुस्लिम आबादी हो उस सीट पर भाजपा के हिंदू उम्मीदवार को 63 फीसदी से ज्यादा वोट मिले। अगर तर्क के लिए यह मान लिया जाए कि सभी 30 फीसदी हिंदुओं ने भाजपा उम्मीदवार को वोट किया तब भी कम से कम 33 फीसदी मुस्लिम वोट भाजपा को मिले हैं। हर तीन में से एक मुस्लिम मतदाता ने भाजपा को वोट किया है। यह बहुत बड़ा और पश्चिम बंगाल के साथ साथ देश की राजनीति को प्रभावित करने वाला घटनाक्रम इसलिए है क्योंकि पांच महीने पहले के चुनाव में इसी सीट पर भाजपा के हिंदू उम्मीदवार को सिर्फ 27 प्रतिशत वोट मिले थे। पांच महीने के अंदर 36 फीसदी वोट का स्विंग अभूतपूर्व है। यह मुस्लिम मतदाताओं के मतदान व्यवहार में आए एक बड़े बदलाव का संकेत है।

इस चुनाव परिणाम के अलग अलग आयामों को समझने की आवश्यकता है। सबसे पहला और स्पष्ट आय़ाम यह है कि सुवेंदु अधिकारी ने अपने पांच महीने के छोटे से कार्यकाल में जो काम किया है उससे उन्होंने समाज के सभी वर्गों का भरोसा जीता है। इसमें समान रूप से मुस्लिम भी शामिल हैं। आंकड़े इसकी कहानी खुद बता रहे हैं। रेजिनगर में भाजपा के उम्मीदवार को जितना वोट हिंदुओं का मिला है उससे ज्यादा वोट मुसलमानों का मिला है। यह किसी भय या दबाव का नतीजा नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि मुसलमानों ने सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व को स्वीकार किया है। यह उनके व्यक्तित्व का कमाल है कि उन्होंने मुस्लिमों का आह्वान किया और दोस्ती का मौका दिया तो मुस्लिम समाज ने इसे दिल खोल कर स्वीकार किया। उन्होंने भाजपा के प्रति अपने पूर्वाग्रह को छोड़ दिया। सुवेंदु अधिकारी उनको यह भरोसा दिलाने में सफल रहे हैं कि उनका हिंदुत्व किसी दूसरे धर्म को मानने वाले को नुकसान पहुंचाने या प्रताड़ित करने वाला नहीं है। उनका हिंदुत्व समावेशी है। मुसलमानों के मन में यह भरोसा इसलिए भी बना क्योंकि सुवेंदु सरकार ने सरकार की समस्त लोक कल्याणकारी योजनाओं को प्रभावी ढंग से जारी रखा, किसी के साथ भेदभाव नहीं किया।

ऐसे ही कानून व्यवस्था बहाल करने और राज्य में हिंसा, वसूली, तोलाबाजी, कट-मनी आदि की संस्कृति को समाप्त करने के लिए भी सुवेंदु अधिकारी की सरकार ने जो काम किया वह किसी जाति या धर्म को ध्यान में रख कर नहीं किया। असामाजिक तत्वों के खिलाफ कार्रवाई हुई, जिससे समाज में शांति बहाल हुई है। समाज में शांति बहाली का लाभ हर धर्म व जाति के लोगों को मिलता है। दशकों तक लेफ्ट और फिर डेढ़ दशक तक तृणमूल कांग्रेस के शासन में अराजकता, हिंसा और लूट से हर जाति व धर्म के लोग त्रस्त थे। उनको लेफ्ट व तृणमूल शासन में हुए शोषण का अहसास हुआ है। तभी उनके लिए सुवेंदु का शासन ताजा हवा के झोंके की तरह है। कह सकते हैं कि सरकार ने पांच महीने की छोटी सी अवधि में जिस तरह से शांति और सौहार्द्र स्थापित किया है उसी का परिणाम है कि भाजपा रेजिनगर जैसी सीट पर जीती और नंदीग्राम में जीत का रिकॉर्ड स्थापित किया।

यहां इस बात का जिक्र करना भी आवश्यक है कि रेजिनगर जैसी ही सामाजिक संरचना वाली असम की नगांव लोकसभा सीट पर भी भारतीय जनता पार्टी जीती है। नगांव में लगभग 60 फीसदी आबादी मुस्लिम है। इसके बावजूद इस सीट पर भाजपा के देबाशीष शर्मा डेढ़ लाख वोट से चुनाव जीते। असम में मुसलमानों के मसीहा माने जाने वाले जमात और एआईयूडीएफ के नेता बदरूद्दीन अजमल खुद उस सीट पर चुनाव लड़े थे। इसके बावजूद 40 फीसदी हिंदू आबादी वाली सीट पर भाजपा उम्मीदवार को 50 प्रतिशत वोट मिले। कांग्रेस की शिबोमणी बसु को सवा लाख से भी कम वोट मिले और वे तीसरे स्थान पर रहीं। नगांव सीट की जीत भी समावेशी और लोक कल्याण की राजनीति की जीत है। यह भी मुस्लिम मतदाताओं के बदलते व्यवहार का संकेत है। ध्यान रहे जब बदरूद्दीन अजमल ने पार्टी बनाई थी, तब राज्य के बड़े हिस्से में मुस्लिम कांग्रेस को छोड़ कर उनके साथ गए थे। पिछले दो चुनावों में दिखा कि मुस्लिम अजमल को छोड़ कर कांग्रेस की ओर लौटे। लेकिन इस साल मई में आए विधानसभा चुनाव नतीजों से सबक लेकर मुस्लिम मतदाता अब अपनी नई पोजिशनिंग करते दिख रहे हैं। कुछ मुस्लिम मतदाता कांग्रेस और एआईयूडीएफ की बाइनरी से निकल कर भाजपा को भी एक विकल्प के तौर पर देख रहे हैं। यह दोनों की राजनीति के लिए चिंता की बात होगी।

अगर रेजिनगर व नंदीग्राम विधानसभा और नगांव लोकसभा सीट के चुनाव परिणामों के व्यापक असर की बात करें तो राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी इसका एक बड़ा संदेश है। इससे यह धारणा निर्णायक रूप से टूटी है कि मुस्लिम किसी हाल में भाजपा को वोट दे ही नहीं सकता है। अगर सरकार समावेशी हो, लोक कल्याणकारी हो और कानून व्यवस्था सुनिश्चित करने वाली हो तो मुस्लिम भी उसको वोट कर सकते हैं। वैसे भी तीन तलाक समाप्त होने और उसे अवैध बनाए जाने के बाद से मुस्लिम महिलाओं का एक हिस्सा नरेंद्र मोदी के नेतृत्व का समर्थन करता है और उनकी पार्टी को वोट करता है। चुनाव बाद जुटाए गए कई राज्यों के आंकड़े इसकी गवाही देते हैं। धीरे धीरे ही सही लेकिन इस तरह का बदलाव अगर मुस्लिम मतदाताओं के व्यवहार में दिखता है तो उससे सामाजिक व राजनीतिक विभाजन कम होगा। भारत का समाज भी समावेशी बनेगा और तुष्टिकरण की राजनीति भी समाप्त होगी।

जहां तक विपक्ष की बात है तो मुख्य विपक्षी कांग्रेस और उसकी सहयोगी तृणमूल कांग्रेस के लिए इन नतीजों में दो बड़े संकेत छिपे हैं। पहला, मुसलमानों के मन में भाजपा के प्रति नफरत का भाव भरने के तमाम प्रयासों के बावजूद मुसलमान पूर्वाग्रह छोड़ कर भाजपा के साथ जा सकते हैं। दूसरा, तुष्टिकरण के तमाम प्रयासों के बावजूद कांग्रेस और तृणमूल जैसी पार्टियों से मुसलमानों का मोहभंग हो रहा है। कम से कम पश्चिम बंगाल और असम जैसी 30 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले राज्यों में मुस्लिम अब पारंपरिक सेकुलर पार्टियों की बजाय मुस्लिम नेताओं वाली पार्टियों की ओर देख रहे हैं। तभी नगांव में बदरूद्दीन अजमल और रेजिनगर में गुलाम नबी आजाद दूसरे स्थान पर रहे। दोनों सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं ने कांग्रेस को ठुकराया।  (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)

मुस्लिम बहुल सीटों पर भी जीती भाजपा!

नई दिल्ली। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में कथित गड़बड़ियों और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के मनमाने रवैए के खिलाफ चल रहे विपक्ष के प्रदर्शन के बीच भाजपा को बड़ी जीत मिली है। उसने पश्चिम बंगाल की दो विधानसभा सीटों और असम की लोकसभा सीट पर उपचुनाव जीत लिया है। पुडुचेरी के सीट भी एनडीए के खाते में गई है, जबकि तमिलनाडु की दोनों सीटें सत्तारूढ़ टीवीके ने जीती है।

असम की नगांव लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भाजपा के देबाशीष शर्मा ने एआईयूडीएफ के बदरूद्दीन अजमल को चुनाव हराया। करीब 60 फीसदी मुस्लिम आबादी वाली इस सीट पर भाजपा डेढ़ लाख से ज्यादा वोट से जीती। उसे 50 फीसदी के करीब वोट मिले। कांग्रेस की शिबोमणी बसु तीसरे स्थान पर रहीं। 2024 के लोकसभा चुनाव में यह सीट कांग्रेस के प्रद्योत बोरदोलोई ने जीती थी, जो विधानसभा चुनाव के समय पाला बदल कर भाजपा में चले गए। उनके इस्तीफे से यह सीट खाली हुई थी।

सबसे ज्यादा चौंकाना वाला नतीजा पश्चिम बंगाल की रेजीनगर सीट से आया, जहां 60 हजार से ज्यादा वोट से जीते हुमायूं कबीर के बेटे गुलाम नबी आजाद बुरी तरह से चुनाव हार गए हैं। करीब 65 फीसदी मुस्लिम आबादी वाली इस सीट पर भाजपा के शंखरव सरकार ने आजाद को 75 हजार से ज्यादा वोट से हराया। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और लेफ्ट उम्मीदवार की जमानत जब्त हो गई। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के इस्तीफे से खाली हुई नंदीग्राम सीट पर भाजपा की हसीरानी रथ ने सारे रिकॉर्ड़ तोड़ दिए। वे 1,22,753 वोटों से जीतीं। उन्हें कुल 1,64,427 वोट मिले। यह 1967 के सीट के अस्तित्व में आने के बाद जीत का सबसे बड़ा अंतर है।

उधर तमिलनाडु की दो सीटों पर उपचुनाव हुए थे। धारापुरम सीट पर टीवीके की सत्यभामा ने और मदुरंतकम सीट पर के कुमारवेल ने जीत हासिल की। दोनों सीटें पिछली बार इन्हीं दो महिलाओं ने अन्ना डीएमके की टिकट पर जीती थीं। बाद में दोनों विजय की पार्टी टीवीके में शामिल हो गई थीं। टीवीके ने उन्हें फिर से टिकट देकर उपचुनाव में उतारा। दोनों सीटों पर डीएमके दूसरे स्थान पर रही।

उपचुनाव के नतीजों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनता को धन्यवाद दिया। शुक्रवार को असम, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी के उपचुनावों में भाजपा और एनडीए को चार सीटों पर मिली जीत को लेकर मोदी ने लोगों का आभार जताया और कहा कि यह जीत एक बार फिर दिखाती है कि लोगों का गठबंधन के सुशासन के एजेंडे से “गहरा जुड़ाव” है।

उपचुनाव में रिकॉर्ड वोट पड़े

नई दिल्ली। चार राज्यों की पांच विधानसभा और एक लोकसभा सीट पर शांतिपूर्ण तरीके से उपचुनाव संपन्न हो गया। सभी सीटों पर रिकॉर्ड मतदान हुआ। पश्चिम बंगाल में प्रतिष्ठा का मुद्दा बनी नंदीग्राम और रेजिनगर सीट पर शांतिपूर्ण ढंग से मतदान हुआ। हालांकि मतदान को प्रभावित करने के आरोप में एजेपी के नेता और रेजिनगर के पूर्व विधायक हुमायूं करीब को गिरफ्तार कर लिया गया। तमिलनाडु में मतदान से पहले चुनाव अधिकारी को भी बदला गया।

चुनाव आयोग की ओर से जारी शाम पांच बजे तक के आंकड़ों के मुताबिक सबसे अधिक मतदान तमिलनाडु की मदुरंतकम सीट पर हुआ। इस सीट पर 83 फीसदी से ज्यादा वोट पड़े। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के इस्तीफे से खाली हुई नंदीग्राम सीट पर 80 फीसदी मतदान हुआ। उधर बंगाल में रेजिनगर सीट खाली करने वाले विधायक हुमायूं कबीर को मुर्शिदाबाद में उनके पार्टी कार्यालय से पुलिस ने गिरफ्तार किया। पुलिस ने उन पर चुनाव में अनियमितताओं का आरोप लगाया है। उनके बेटे गुलाम नबी आजाद रेजीनगर से उम्मीदवार हैं। रेजिनगर में भी 80 फीसदी के करीब वोट पड़े।

उधर नंदीग्राम से मीडिया से बात करते हुए कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान ने आरोप लगाया है कि उनके पोलिंग एजेंट्स को जबरन उठाया जा रहा है। बहरहाल, मंगलवार को जिन सीटों पर मतदान हुआ, उनमें पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर, तमिलनाडु की मदुरंतकम और धारापुरम, पुडुचेरी की थट्टानचावडी विधानसभा सीट और असम की नगांव लोकसभा सीट शामिल हैं। सभी सीटों के नतीजे नौ अक्टूबर को आएंगे।

Rejinagar Bypolls election voting: रेजीनगर उपचुनाव में वोटिंग के दौरान भारी हंगामा, पश्चिम बंगाल पुलिस ने हुमायूं कबीर को किया गिरफ्तार

Rejinagar Bypolls election voting: आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के प्रमुख और विधायक हुमायूं कबीर को मंगलवार (6 अक्टूबर) को पश्चिम बंगाल के रेजीनगर विधानसभा उपचुनाव में वोट डालने के बाद हिरासत में ले लिया गया। उन्होंने कई बूथों पर वोटिंग प्रक्रिया में पुलिस के दखल का आरोप लगाया था। वोटिंग के बाद कबीर ने आरोप लगाया कि पुलिसकर्मी मतदान प्रक्रिया में बाधा डाल रहे थे। उन्होंने सवाल उठाया कि जब सरकार पहले से ही सत्ता में है, तो ऐसी दखलअंदाजी की क्या जरूरत है।

इस दौरान उन्होंने काफी हंगामा किया। फिर कुछ देर बाद पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया। हुमायूं कबीर को पुलिस ने उनके रेजीनगर पार्टी ऑफिस से हिरासत में लिया और फिर रेजीनगर पुलिस स्टेशन ले गई। आम जनता उन्नयन पार्टी ने रेजीनगर उपचुनाव में कबीर के बेटे गुलाम नबी आजाद को चुनावी मैदान में उतारा है।

उपचुनाव के लिए मतदान जारी

पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीट पर उपचुनाव के लिए मंगलवार सुबह सात बजे कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच मतदान शुरू हुआ। मुर्शिदाबाद की रेजीनगर सीट उस समय खाली हुई जब 2026 के विधानसभा चुनाव में रेजीनगर और नवादा दोनों सीटों से जीतने वाले हुमायूं कबीर ने नवादा सीट बरकरार रखी।

कबीर ने अपने बेटे को बनाया उम्मीदवार

हुमायूं कबीर की पार्टी आम जनता उन्नयन पार्टी (एजेयूपी) ने उनके बेटे गुलाम नबी आजाद को उम्मीदवार बनाया है। चुनाव मैदान में BJP के उम्मीदवार और मुर्शिदाबाद जिले के पूर्व अध्यक्ष सखराव सरकार, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल धड़े के उम्मीदवार रबीउल आलम चौधरी, तृणमूल के प्रतिद्वंद्वी धड़े के उम्मीदवार सफीउज्जमान शेख, कांग्रेस उम्मीदवार मोहम्मद अब्दुल्लाहिल काफी और माकपा के सैयद असद अली शामिल हैं। अधिकारियों ने बताया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने और शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित करने के लिए प्रशासन ने कई स्तरों वाली सुरक्षा व्यवस्था की है।

नंदीग्राम में भी वोटिंग जारी, 71 कंपनियां तैनात

अधिकारियों ने बताया कि उपचुनाव के लिए केंद्रीय बलों की कुल 71 कंपनियां तैनात की गई हैं। मतदान शाम छह बजे तक चलेगा। शुभेंदु अधिकारी ने 2026 के विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम और भवानीपुर दोनों सीट से जीत हासिल की थी। लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद भवानीपुर सीट बरकरार रखी, जिसके कारण नंदीग्राम में उपचुनाव की जरूरत पड़ी।

भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने चंद्रनाथ रथ की मां हासिरानी रथ को उम्मीदवार बनाया है। चंद्रनाथ, मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के करीबी सहयोगी थे। विधानसभा चुनाव में BJP की जीत के दो दिन बाद छह मई को चंद्रनाथ की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल धड़े की उम्मीदवार संचित प्रधानी डे ने शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात के बाद अपना नाम वापस ले लिया। इसके बाद बनर्जी के पास अपना कोई उम्मीदवार नहीं बचा और उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान का समर्थन किया। उन्होंने इसे इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस (इंडिया) को मजबूत करने की कोशिश बताया।

ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल के प्रतिद्वंद्वी धड़े ने मोहम्मद एतेशामुल हक को लिफाफा चुनाव चिह्न और एक अलग अस्थायी पार्टी पहचान के साथ मैदान में उतारा है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) ने शांतिगोपाल गिरि को उम्मीदवार बनाया है। वहीं,

मतगणना नौ अक्टूबर को होगी।

उपचुनाव नए मुख्यमंत्रियों की परीक्षा

मंगलवार, छह अक्टूबर को एक लोकसभा और सात विधानसभा सीटों के उपचुनाव हैं। हालांकि इनके नतीजों से किसी भी सरकार की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा लेकिन कम से कम दो राज्यों के उपचुनावों के नतीजे मुख्यमंत्रियों के लिए बहुत अहम होंगे। पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी और तमिलनाडु के सी जोसेफ विजय की परीक्षा उपचुनावों में होने वाली है। दोनों राज्यों में दो दो सीटों के उपचुनाव हो रहे हैं। बंगाल में एक सीट तो मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की अपनी है। वे नंदीग्राम और भबानीपुर दोनों सीटों से जीते थे और नंदीग्राम खाली कर दी थी। दूसरी सीट रेजिनगर की है। एजेपी नाम से पार्टी बना कर चुनाव लड़े हुमायूं कबीर रेजिनगर और नौदा से जीते थे। उन्होंने रेजीनगर सीट पर अपने बेटे को लड़ाया है। वहां एजेपी, कांग्रेस, तृणमूल के दोनों गुट और लेफ्ट से पांच मुस्लिम उम्मीदवार लड़ रहे हैं।

हालांकि फिर भी भाजपा के हिंदू उम्मीदवार के जीतने के चांस कम हैं। तभी शुभेंदु अधिकारी का पूरा फोकस नंदीग्राम पर है। वे बड़े अंतर से इस सीट को जीतना चाहते हैं। उधर तमिलनाडु की दो सीटों मदुरंतकम और धारापुरम में उपचुनाव हो रहा है। दोनों सीटें पिछले चुनाव में अन्ना डीएमके ने जीती थी। उसके विधायक पाला बदल कर विजय की पार्टी टीवीके में शामिल हो गए विजय ने दोनों को टिकट देकर मैदान में उतारा है। गौरतलब है कि विजय की पार्टी के पास अकेले बहुमत नहीं है। वे दूसरी पार्टियों के विधायकों के इस्तीफे करा कर उन्हें अपनी पार्टी से लड़ा रहे हैं और बहुमत हासिल करना चाहते हैं। अगर ये दोनों सीटें उनकी पार्टी जीतती है तो विजय की स्थिति मजबूत होगी। दिलचस्प यह है कि विजय की सरकार को समर्थन देने वाली लेफ्ट पार्टियों के उम्मीदवार इन दोनों सीटों पर लड़ रहे हैं।

क्या नया विपक्ष उभर सकता है

यह बड़ा सवाल है कि क्या देश में नया विपक्ष उभर सकता है? कांग्रेस के नेता इस सवाल को भाजपा की साजिश थ्योरी का हिस्सा मान रहे हैं लेकिन उस राजनीतिक पहलू को छोड़ दें तब भी यह स्पष्ट दिख रहा है कि देश में एक नए किस्म का विमर्श चल रहा है, जिसमें न तो भाजपा फिट हो रही है और न कांग्रेस। यह सिर्फ ‘जेन जी’ का विमर्श नहीं है, बल्कि आम आदमी का विमर्श है, जिसमें वह रोजमर्रा की समस्याओं के लिए भाजपा और कांग्रेस दोनों को समान रूप से जिम्मेदार मान रहा है।

यह एक व्यापक नैरेटिव का भी हिस्सा है, जिसके दम पर भाजपा ने बरसों तक कांग्रेस को किनारे किए रखा। आम लोग कांग्रेस के विपक्ष में होने के बावजूद यह मानते रहे कि उनकी और देश की समस्याओं के लिए कांग्रेस ही जिम्मेदार है। तभी भाजपा द्वारा स्थापित किया हुआ यह नैरेटिव चला कि मोदी या भाजपा को नहीं वोट दें तो क्या राहुल और अखिलेश या तेजस्वी को दे दें?

अब इस प्रश्न में नए आयाम जुड़ गए हैं। अगर लोग केंद्र और राज्यों की भाजपा सरकारों से उबे हैं या उनको लग रहा है कि भाजपा का कांग्रेसीकरण हो रहा है या उनको धीरे धीरे यह यकीन होता जा रहा है कि भाजपा के पास भी उनकी समस्याओं का समाधान नहीं है लेकिन वे राहुल, अखिलेश या तेजस्वी को भी वोट नहीं देना चाहते, तो उनके सामने क्या विकल्प है? यह सवाल इसलिए प्रासंगिक हो गया है क्योंकि अलग अलग राज्यों में लोगों ने नए विकल्प आजमाने शुरू कर दिए हैं। दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी का जीतना इसका एक उदाहरण है।

ऐसा नहीं है कि दोनों राज्यों में कांग्रेस का विकल्प नहीं था। दिल्ली में भाजपा और पंजाब में अकाली दल के रूप में मजबूत विकल्प था लेकिन लोगों ने आम आदमी पार्टी को चुना। ऐसे ही तमिलनाडु में डीएमके और अन्ना डीएमके एक दूसरे के विकल्प के रूप में करीब सात दशक से थे। लेकिन उन्हें ठुकरा कर लोगों ने सी जोसेफ विजय की पार्टी टीवीके को चुना। इससे पहले 2019 में आंध्र प्रदेश में कांग्रेस को हराने के लिए लोगों ने टीडीपी का विकल्प नहीं चुना, बल्कि जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस को चुना। नए बने राज्य तेलंगाना में भी के चंद्रशेखर राव की पार्टी लगातार दो बार जीती।

तर्क के नाते कहा जा सकता है कि पहले भी अलग अलग राज्यों में प्रादेशिक पार्टियों का उदय हुआ और उन्होंने चुनाव भी जीते। बिहार में राजद, उत्तर प्रदेश में सपा व बसपा, पश्चिम बंगाल में टीएमसी, आंध्र प्रदेश में टीडीपी आदि। इनके अलावा भी कई राज्यों में प्रादेशिक पार्टियां मजबूत रहीं और चुनाव जीत कर सरकार बनाई। इसलिए अभी अगर राज्यों में नई पार्टियों का उदय हो रहा है तो यह कहना जल्दबाजी होगी कि राष्ट्रीय स्तर पर कोई नया विपक्ष उभर रहा है। लेकिन यहां दोनों परिघटनाओं के बीच के अंतर को समझना होगा।

इससे पहले जितनी भी प्रादेशिक पार्टियां बनीं उनमें से किसी के नेता की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा नहीं रही। प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा भले रही हो लेकिन किसी ने पार्टी का विस्तार दूसरे राज्यों में करने के बारे में गंभीरता से नहीं सोचा। कुछ पार्टियों ने एक से ज्यादा राज्यों में विस्तार किया लेकिन उनका विस्तार बहुत सीमित रहा। बहुजन समाज पार्टी इसका अपवाद है। लेकिन अब वह पार्टी भी अंतिम सांसें गिन रही है। एक दूसरा अंतर यह था कि पहले बनी ज्यादातर प्रादेशिक पार्टियां किसी स्थानीय मुद्दे या क्षेत्रीय पहचान के आधार पर बनी थीं।

पहली बार ऐसा हो रहा है कि अखिल भारतीय मुद्दों पर नई ताकतें आंदोलन कर रही हैं। आम आदमी पार्टी का उभरना किसी स्थानीय मुद्दे या प्रादेशिक पहचान का मामला नहीं है। उसने राजकाज को राजनीतिक विचारधारा बना कर राजनीति की और अपनी स्थापना के एक दशक बाद ही राष्ट्रीय पार्टी बन गई। इसी तरह कॉकरोच जनता पार्टी अभी एक राजनीतक दल नहीं बनी है फिर भी उसके मुद्दे अखिल भारतीय महत्व के हैं और किसी दूसरी पार्टी के मुकाबले देश के नौजवान उसकी बातों पर ज्यादा यकीन कर रहे हैं। आम आदमी पार्टी और कॉकरोच जनता पार्टी ने कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए मुश्किल खड़ी की है।

दोनों इस धारणा को जनता के बीच पहुंचा रहे हैं कि अगर भाजपा से नाराजगी है और लोग उसे बदलना चाहते हैं तो उसका स्वाभाविक विकल्प कांग्रेस नहीं है। यह बहुत बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम है और इसे इसी रूप में देखने की जरुरत है। कांग्रेस इस बात को समझ रही है कि भाजपा ने पहले उसे सत्ता से बेदखल किया और अब उसे स्वाभाविक विपक्ष की जगह से भी खिसकाने का अभियान चल रहा है। कांग्रेस इसके पीछे भाजपा की साजिश भी देख रही है। हो सकता है कि भाजपा धारणा के स्तर पर इस विचार को बढ़ावा दे रही हो और यह भी संभव है कि संसाधन से भी मदद मुहैया करा रही हो लेकिन अंततः यह उसके लिए भी घातक हो सकता है।

कांग्रेस पार्टी ने पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन को इस रूप में नहीं देखा था। उसके नेता मानते रहे कि चीफ जस्टिस की टिप्पणी से त्वरित रूप में बने एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से युवा जुड़े हैं और उसने युवाओं का मुद्दा उठाया है। लेकिन मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के प्रदर्शन ने कांग्रेस को अलर्ट कर दिया है। इस मुद्दे पर आम आदमी पार्टी को लेफ्ट और सिविल सोसायटी का साथ मिल रहा है तो कॉकरोच जनता पार्टी को आप का सपोर्ट मिल रहा है। कुछ और प्रादेशिक पार्टियां उनको समर्थन दे रही हैं। तभी कांग्रेस के साथ सीजेपी का विवाद शुरू हो गया है। कांग्रेस नेता सीजेपी को आम आदमी पार्टी का फ्रंट और आप को भाजपा का फ्रंट बता रहे हैं।

कांग्रेस की इस बात को लेकर सीजेपी ने उसके ऊपर तीखा हमला किया है। सीजेपी के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने ‘सेल्फ स्टाइल लिबरल इकोसिस्टम’ पर निशाना साधा है और कहा है, ‘यह सिस्टम अभिजीत दीपके को खारिज कर रहा है, जबकि हकीकत यह है कि बहुत अरसे बाद ऐसा हुआ है कि किसी ने आम लोगों के इमेजिवनेशन को कैप्चर किया है’। विवाद की शुरुआत कांग्रेस के एक प्रवक्ता के बयान से हुई थी, जिन्होंने कहा था कि आशुतोष रांका असम गए तो वहां कांग्रेस नेताओं से नहीं मिले, जबकि कांग्रेस ने सीजेपी के लोगों को पुलिस के बचाया था।

इसके बाद रांका ने एक पोस्ट लिखा और उस पोस्ट को सीजेपी के मुख्य प्रवक्ता सौरव दास ने भी पोस्ट किया। उन्होंने कहा कि, एक खास तबका, सिर्फ भाजपा नहीं, बल्कि दूसरी पार्टी भी सोचती है कि ‘सेविंग इंडिया, सेविंग कांस्टीट्यूशन’ उन्हीं का काम है। उन्होंने आगे कहा कि ये लोग, ‘सेल्फ डिक्लेयर्ड लिबरल्स’ औऱ ‘सेल्फ डिक्लेयर्ड ठेकेदार ऑफ कांस्टीट्यूशन’ हैं। सौरव दास का कहना है कि ‘य़ह भाजपा से खराब काम करने वाला इकोसिस्टम है’।

रांका और दास का सीधा हमला कांग्रेस और उसके इकोसिस्टम पर है।

यह एक शुरुआत है, नया विपक्ष बनाने की। इसमें कितनी कामयाबी मिलेगी और कब मिलेगी यह नहीं कहा जा सकता है। लेकिन भाजपा और कांग्रेस से अलग नए विपक्ष के बारे में विचार शुरू हो गया है। आम आदमी पार्टी के साथ साथ कॉकरोच जनता पार्टी पर नजर रखने की जरुरत है। इनके अलावा बिहार में प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी, उत्तर प्रदेश में चंद्रशेखर की भीम आर्मी, तमिलनाडु में सी जोसेफ विजय की टीवीके, पंजाब में अमृतपाल की अकाली दल वारिस पंजाब दे, असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम, हुमायूं कबीर की एजेपी, बदरूद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ जैसी पार्टियों पर भी नजर ऱखने की जरुरत है।