सीजेपी नेताओं का अच्छा है!

कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के नेताओं का बहुत अच्छा है। उनके नाम से प्रदर्शन हो रहे हैं, दिल्ली और पूरे देश में हंगामा मच रहा है, सरकार परेशान है और नौजवान सड़कों पर है, लेकिन इन नेताओं को कुछ नहीं करना होता है। ऐसा लग रहा है कि अभिजीत दीपके ने मौके को लपका और चीफ जस्टिस की कॉकरोच वाली टिप्पणी के बाद कॉकरोच जनता पार्टी नाम से एक सोशल मीडिया हैंडल बना दिया और उसके बाद से उसकी रॉयल्टी ले रहे हैं। उस सोशल मीडिया हैंडल से किसी भी मसले पर आंदोलन का ऐलान कर दिया जा रहा है और देश के लाखों युवा, जो पेपर लीक से लेकर एसआईआर या किसी अन्य मामलों में आक्रोशित हैं वे सड़क पर उतर जा रहे हैं।

सोचें, पारंपरिक रूप से किसी प्रदर्शन की तैयारी में कितनी मेहनत, कितने संसाधान, कितने नेता और कितनी ऊर्जा लगती है। कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों को कितना प्रयास करना पड़ रहा है। दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पंजाब के नेताओं को इस तैयारी में लगाया गया है। वे रात दिन मेहनत करके लोगों को जुटा रहे हैं। सरकार की इतनी सख्ती है कि दिल्ली और पड़ोसी राज्यों के कांग्रेस नेताओं को भी अपने घरों से निकल कर सेंट्रल दिल्ली पहुंचने के लिए गुरिल्ला अंदाज में कुछ उपाय करने पड़ रहे हैं। लेकिन अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को कुछ नहीं करना है। वे सिर्फ सोशल मीडिया में अपील कर रहे हैं या प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं। पहले भी ये नेता सड़कों पर नहीं उतरे। आज भी नहीं उतर रहे हैं।

पहली बार जब अभिजीत दीपके छह जून को अमेरिका से दिल्ली पहुंचे थे तो उनको बिना मांगे जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने की इजाजत दी गई थी। हवाईअड्डे पर ही पुलिस ने उनको मंजूरी दे दी। लेकिन उन्होंने क्या किया? तीन घंटे के प्रदर्शन में वे बेहोश हो गए और उनको एसी गाड़ी में बैठाना पड़ा और उसके बाद आंदोलन खत्म हो गया। जब 20 जून को फिर से आंदोलन शुरू हुआ तो सोनम वांगचुक और सीपीआई माले के छात्र संगठन आइसा की तीन छात्राओं ने भूख हड़ताल किया। दिल्ली पुलिस ने जब वांगचुक को उठाया तो दीपके ने कहा कि वे भूख हड़ताल जारी रखेंगे लेकिन दो घंटे भी भूख हड़ताल नहीं कर सके। उसके बाद भीड़ जुटाने की बारी आई तो लोग खुद ब खुद पहुंचे या भीम आर्मी के चंद्रशेखर भीड़ लेकर पहुंचे, जिसने आक्रामक तरीके से संसद की ओर मार्च किया।

इस बार भी ऐसा ही हो रहा है। दीपके एंड कंपनी ने आठ अक्टूबर को बेंगलुरू में प्रदर्शन का ऐलान किया और प्रदर्शन से एक दिन पहले शाम को बेंगलुरू पहुंचे। फिल्म अभिनेता प्रकाश राज और जर्मनी में रहने वाले इन्फ्लूएंसर ध्रुव राठी के नाम पर दो चार हजार लोग जुटे। इसके बाद 10 अक्टूबर को दिल्ली में प्रदर्शन होना था। पर दीपके, दास और रांका बेंगलुरू में ही रहे। वही से ऐलान किया कि 10 अक्टूबर की सुबह साढ़े 10 बजे की फ्लाइट से दिल्ली लैंड करेंगे।

सोचें, प्रदर्शन 10 बजे से होना था और नेता साढ़े 10 बजे लैंड करने वाले थे। कोर टीम के तीन लोग जहाज में थे औऱ चौथी सदस्य रत्ना सिंह उनको लेने के लिए एयरपोर्ट पहुंची थीं। सो, चारों लोग अपनी सुविधा के हिसाब से वही एयरपोर्ट पर ही हिरासत में ले लिए गए। बाकी जनता जंतर मंतर के इलाके में लाठियां खा रही थी और दिल्ली पुलिस व अर्धसैनिक बलों से गुरिल्ला वार कर रही थी। दूसरे दिन यानी 11 अक्टूबर का प्रदर्शन भी दूसरे लोगों ने किया। दीपके की दो दादी गुजर गईं इसलिए वे महाराष्ट्र चले गए और बाकी लोगों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके अपनी जिम्मेदारी पूरी की।

क्या नया विपक्ष उभर सकता है

यह बड़ा सवाल है कि क्या देश में नया विपक्ष उभर सकता है? कांग्रेस के नेता इस सवाल को भाजपा की साजिश थ्योरी का हिस्सा मान रहे हैं लेकिन उस राजनीतिक पहलू को छोड़ दें तब भी यह स्पष्ट दिख रहा है कि देश में एक नए किस्म का विमर्श चल रहा है, जिसमें न तो भाजपा फिट हो रही है और न कांग्रेस। यह सिर्फ ‘जेन जी’ का विमर्श नहीं है, बल्कि आम आदमी का विमर्श है, जिसमें वह रोजमर्रा की समस्याओं के लिए भाजपा और कांग्रेस दोनों को समान रूप से जिम्मेदार मान रहा है।

यह एक व्यापक नैरेटिव का भी हिस्सा है, जिसके दम पर भाजपा ने बरसों तक कांग्रेस को किनारे किए रखा। आम लोग कांग्रेस के विपक्ष में होने के बावजूद यह मानते रहे कि उनकी और देश की समस्याओं के लिए कांग्रेस ही जिम्मेदार है। तभी भाजपा द्वारा स्थापित किया हुआ यह नैरेटिव चला कि मोदी या भाजपा को नहीं वोट दें तो क्या राहुल और अखिलेश या तेजस्वी को दे दें?

अब इस प्रश्न में नए आयाम जुड़ गए हैं। अगर लोग केंद्र और राज्यों की भाजपा सरकारों से उबे हैं या उनको लग रहा है कि भाजपा का कांग्रेसीकरण हो रहा है या उनको धीरे धीरे यह यकीन होता जा रहा है कि भाजपा के पास भी उनकी समस्याओं का समाधान नहीं है लेकिन वे राहुल, अखिलेश या तेजस्वी को भी वोट नहीं देना चाहते, तो उनके सामने क्या विकल्प है? यह सवाल इसलिए प्रासंगिक हो गया है क्योंकि अलग अलग राज्यों में लोगों ने नए विकल्प आजमाने शुरू कर दिए हैं। दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी का जीतना इसका एक उदाहरण है।

ऐसा नहीं है कि दोनों राज्यों में कांग्रेस का विकल्प नहीं था। दिल्ली में भाजपा और पंजाब में अकाली दल के रूप में मजबूत विकल्प था लेकिन लोगों ने आम आदमी पार्टी को चुना। ऐसे ही तमिलनाडु में डीएमके और अन्ना डीएमके एक दूसरे के विकल्प के रूप में करीब सात दशक से थे। लेकिन उन्हें ठुकरा कर लोगों ने सी जोसेफ विजय की पार्टी टीवीके को चुना। इससे पहले 2019 में आंध्र प्रदेश में कांग्रेस को हराने के लिए लोगों ने टीडीपी का विकल्प नहीं चुना, बल्कि जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस को चुना। नए बने राज्य तेलंगाना में भी के चंद्रशेखर राव की पार्टी लगातार दो बार जीती।

तर्क के नाते कहा जा सकता है कि पहले भी अलग अलग राज्यों में प्रादेशिक पार्टियों का उदय हुआ और उन्होंने चुनाव भी जीते। बिहार में राजद, उत्तर प्रदेश में सपा व बसपा, पश्चिम बंगाल में टीएमसी, आंध्र प्रदेश में टीडीपी आदि। इनके अलावा भी कई राज्यों में प्रादेशिक पार्टियां मजबूत रहीं और चुनाव जीत कर सरकार बनाई। इसलिए अभी अगर राज्यों में नई पार्टियों का उदय हो रहा है तो यह कहना जल्दबाजी होगी कि राष्ट्रीय स्तर पर कोई नया विपक्ष उभर रहा है। लेकिन यहां दोनों परिघटनाओं के बीच के अंतर को समझना होगा।

इससे पहले जितनी भी प्रादेशिक पार्टियां बनीं उनमें से किसी के नेता की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा नहीं रही। प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा भले रही हो लेकिन किसी ने पार्टी का विस्तार दूसरे राज्यों में करने के बारे में गंभीरता से नहीं सोचा। कुछ पार्टियों ने एक से ज्यादा राज्यों में विस्तार किया लेकिन उनका विस्तार बहुत सीमित रहा। बहुजन समाज पार्टी इसका अपवाद है। लेकिन अब वह पार्टी भी अंतिम सांसें गिन रही है। एक दूसरा अंतर यह था कि पहले बनी ज्यादातर प्रादेशिक पार्टियां किसी स्थानीय मुद्दे या क्षेत्रीय पहचान के आधार पर बनी थीं।

पहली बार ऐसा हो रहा है कि अखिल भारतीय मुद्दों पर नई ताकतें आंदोलन कर रही हैं। आम आदमी पार्टी का उभरना किसी स्थानीय मुद्दे या प्रादेशिक पहचान का मामला नहीं है। उसने राजकाज को राजनीतिक विचारधारा बना कर राजनीति की और अपनी स्थापना के एक दशक बाद ही राष्ट्रीय पार्टी बन गई। इसी तरह कॉकरोच जनता पार्टी अभी एक राजनीतक दल नहीं बनी है फिर भी उसके मुद्दे अखिल भारतीय महत्व के हैं और किसी दूसरी पार्टी के मुकाबले देश के नौजवान उसकी बातों पर ज्यादा यकीन कर रहे हैं। आम आदमी पार्टी और कॉकरोच जनता पार्टी ने कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए मुश्किल खड़ी की है।

दोनों इस धारणा को जनता के बीच पहुंचा रहे हैं कि अगर भाजपा से नाराजगी है और लोग उसे बदलना चाहते हैं तो उसका स्वाभाविक विकल्प कांग्रेस नहीं है। यह बहुत बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम है और इसे इसी रूप में देखने की जरुरत है। कांग्रेस इस बात को समझ रही है कि भाजपा ने पहले उसे सत्ता से बेदखल किया और अब उसे स्वाभाविक विपक्ष की जगह से भी खिसकाने का अभियान चल रहा है। कांग्रेस इसके पीछे भाजपा की साजिश भी देख रही है। हो सकता है कि भाजपा धारणा के स्तर पर इस विचार को बढ़ावा दे रही हो और यह भी संभव है कि संसाधन से भी मदद मुहैया करा रही हो लेकिन अंततः यह उसके लिए भी घातक हो सकता है।

कांग्रेस पार्टी ने पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन को इस रूप में नहीं देखा था। उसके नेता मानते रहे कि चीफ जस्टिस की टिप्पणी से त्वरित रूप में बने एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से युवा जुड़े हैं और उसने युवाओं का मुद्दा उठाया है। लेकिन मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के प्रदर्शन ने कांग्रेस को अलर्ट कर दिया है। इस मुद्दे पर आम आदमी पार्टी को लेफ्ट और सिविल सोसायटी का साथ मिल रहा है तो कॉकरोच जनता पार्टी को आप का सपोर्ट मिल रहा है। कुछ और प्रादेशिक पार्टियां उनको समर्थन दे रही हैं। तभी कांग्रेस के साथ सीजेपी का विवाद शुरू हो गया है। कांग्रेस नेता सीजेपी को आम आदमी पार्टी का फ्रंट और आप को भाजपा का फ्रंट बता रहे हैं।

कांग्रेस की इस बात को लेकर सीजेपी ने उसके ऊपर तीखा हमला किया है। सीजेपी के प्रवक्ता आशुतोष रांका ने ‘सेल्फ स्टाइल लिबरल इकोसिस्टम’ पर निशाना साधा है और कहा है, ‘यह सिस्टम अभिजीत दीपके को खारिज कर रहा है, जबकि हकीकत यह है कि बहुत अरसे बाद ऐसा हुआ है कि किसी ने आम लोगों के इमेजिवनेशन को कैप्चर किया है’। विवाद की शुरुआत कांग्रेस के एक प्रवक्ता के बयान से हुई थी, जिन्होंने कहा था कि आशुतोष रांका असम गए तो वहां कांग्रेस नेताओं से नहीं मिले, जबकि कांग्रेस ने सीजेपी के लोगों को पुलिस के बचाया था।

इसके बाद रांका ने एक पोस्ट लिखा और उस पोस्ट को सीजेपी के मुख्य प्रवक्ता सौरव दास ने भी पोस्ट किया। उन्होंने कहा कि, एक खास तबका, सिर्फ भाजपा नहीं, बल्कि दूसरी पार्टी भी सोचती है कि ‘सेविंग इंडिया, सेविंग कांस्टीट्यूशन’ उन्हीं का काम है। उन्होंने आगे कहा कि ये लोग, ‘सेल्फ डिक्लेयर्ड लिबरल्स’ औऱ ‘सेल्फ डिक्लेयर्ड ठेकेदार ऑफ कांस्टीट्यूशन’ हैं। सौरव दास का कहना है कि ‘य़ह भाजपा से खराब काम करने वाला इकोसिस्टम है’।

रांका और दास का सीधा हमला कांग्रेस और उसके इकोसिस्टम पर है।

यह एक शुरुआत है, नया विपक्ष बनाने की। इसमें कितनी कामयाबी मिलेगी और कब मिलेगी यह नहीं कहा जा सकता है। लेकिन भाजपा और कांग्रेस से अलग नए विपक्ष के बारे में विचार शुरू हो गया है। आम आदमी पार्टी के साथ साथ कॉकरोच जनता पार्टी पर नजर रखने की जरुरत है। इनके अलावा बिहार में प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी, उत्तर प्रदेश में चंद्रशेखर की भीम आर्मी, तमिलनाडु में सी जोसेफ विजय की टीवीके, पंजाब में अमृतपाल की अकाली दल वारिस पंजाब दे, असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम, हुमायूं कबीर की एजेपी, बदरूद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ जैसी पार्टियों पर भी नजर ऱखने की जरुरत है।

विपक्ष बनाम सीजेपी का आंदोलन

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर विपक्षी पार्टियों के गठबंधन यानी ‘इंडिया’ ब्लॉक की बैठक 30 सितंबर को दिल्ली में होने वाली है। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ साझा आंदोलन की रूपरेखा बनेगी। ममता बनर्जी बहुत गंभीरता से इस पर विचार कर रही हैं। तभी उन्होंने करीब 30 साल के बाद सीपीएम के महासचिव एमए बेबी से बात की और राहुल गांधी को भी विपक्षी गठबंधन की मीटिंग के लिए तैयार किया। हालांकि कांग्रेस अपना प्रदर्शन कर रही है। 25 सितंबर को कांग्रेस ने प्रदेश की राजधानियों में प्रदर्शन किया तो 28 सितंबर को जिलों में प्रदर्शन करेगी। दूसरी ओर कॉकरोच जनता पार्टी भी आंदोलन की तैयारी कर रही है।

ध्यान रहे पिछली बार पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी पर जब सीजेपी ने जंतर मंतर पर प्रदर्शन किया था, तब विपक्ष एकदम अंधेरे में था और उसकी कोई तैयारी नहीं थी। तभी लेफ्ट और सपा जैसी पार्टियों ने उस आंदोलन का समर्थन किया। अब सपा हो या लेफ्ट या कांग्रेस और टीएमसी सब अपने आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं। तब सीजेपी के आंदोलन का क्या होगा? सीजेपी ने ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देने के लिए 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया था, जो शनिवार को समाप्त हो गया। लेकिन उससे पहले ही उसने अल्टीमेटम की सीमा दो अक्टूबर तक बढ़ा दी। अब अगर सीजेपी का आंदोलन हुआ तो उसे कौन समर्थन देगा? क्या भीम आर्मी फिर से अपने लोगों को लेकर उतरेगी? अगर भीम आर्मी या किसी पार्टी ने समर्थन नहीं दिया तो सीजेपी के आंदोलन कामयाब होने के आसार नहीं हैं। हां, भाजपा जरूर उसका महत्व बढ़वा सकती है ताकि विपक्ष के आंदोलन की मैसेजिंग को कमतर किया जा सके। जेपी नड्डा को फिर से तो सीजेपी से बात करने में नहीं लगाया जाएगा?

Gorakhpur Rain Alert: गोरखपुर में मूसलाधार बारिश का कहर! 4 लोगों की मौत, सांसद रवि किशन के आवास में भी घुसा पानी

Gorakhpur Rain Alert: उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में शनिवार (26 सितंबर) को तेज हवा और भारी बारिश के कारण अलग-अलग स्थानों पर पेड़ गिरने से चार लोगों की मौत हो गई। वहीं, बारिश से जुड़ी अलग-अलग घटनाओं में 14 अन्य लोग घायल हो गए हैं। अधिकारियों ने बताया कि जिले के कैंपियरगंज थाना क्षेत्र के लक्ष्मीपुर गांव के गजरहिया टोला में शाम करीब चार बजे एक पेड़ झोपड़ी पर गिर गया। इस हादसे में सुभाष (55), महानंद की पत्नी ज्ञानमती देवी (45) और किशन प्रजापति (13) की मौत हो गई। जबकि राममिलन एवं सिरजावती नाम की महिला गंभीर रूप से घायल हो गए।

अधिकारियों के अनुसार, तेज हवा के दौरान कई ग्रामीण गांव के बाहरी हिस्से में बनी इस झोपड़ी में शरण लिए हुए थे। उन्होंने बताया कि पेड़ गिरने के बाद स्थानीय लोगों ने मलबा हटाकर घायलों को बाहर निकाला। कैंपियरगंज के उपजिलाधिकारी (SDM) और पुलिस अधिकारी मौके पर पहुंचे तथा राहत एवं बचाव कार्यों की निगरानी की। एक अन्य घटना में गगहा थाना क्षेत्र के गजपुर पुलिस चौकी के पास महुआ का पेड़ गिरने से एक व्यक्ति की मौत हो गई।

80 साल पुराना पेड़ गिरा, पूरा परिवार चपेट में आया

पुलिस ने बताया कि मृतक की पहचान गगहा निवासी भीम कुमार विश्वकर्मा के रूप में हुई। पुलिस के मुताबिक, करीब साढ़े तीन बजे धर्मशाला क्षेत्र के जटेपुर दक्षिणी मोहल्ले की काली मंदिर गली में करीब 80 वर्ष पुराना एक पेड़ एक मकान पर गिर गया। पुलिस ने बताया कि इस हादसे के समय घर में करीब 12 लोग मौजूद थे। पुलिस के मुताबिक, पेड़ गिरने से सुरेश, सुभाष, मुन्नी और चुन्नी गंभीर रूप से घायल हो गए, जिन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया।

पुलिस ने बताया कि पेड़ गिरने से बिजली के कई खंभे भी क्षतिग्रस्त हो गए, जिससे क्षेत्र में बिजली आपूर्ति बाधित रही। जिलाधिकारी दीपक मीणा और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SP) कौस्तुभ ने जिला अस्पताल पहुंचकर घायलों का हाल जाना। अधिकारियों ने बताया कि प्रभावित क्षेत्रों में राहत और सहायता कार्य जारी है। मौसम विभाग (IMD) के अनुसार अगले कुछ दिनों तक गोरखपुर में मूसलाधार बारिश और गरज-चमक का दौर जारी रहने की आशंका है।

सांसद रवि किशन के आवास में घुसा पानी

लगातार हो रही मूसलाधार बारिश के कारण गोरखपुर शहर में कई स्थानों पर जलभराव की स्थिति पैदा हो गई। इसी दौरान बीजेपी सांसद रवि किशन के आवास में भी बारिश का पानी पहुंच गया। इसके बाद रवि किशन खुद बाहर निकले और शहर में जलभराव की स्थिति तथा जल निकासी व्यवस्था का जायजा लिया। गोरखपुर में लगातार बारिश के बीच प्रशासन और नगर निगम की टीमें जल निकासी व्यवस्था को दुरुस्त रखने में जुटी हैं। मंडलायुक्त इंद्र विक्रम सिंह ने शनिवार को शहर के प्रमुख नाले का स्थलीय निरीक्षण किया। उन्होंने अधिकारियों को आपसी समन्वय के साथ जल निकासी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।

भारी बारिश के कारण शहर के निचले इलाकों में भी जलभराव की समस्या सामने आई है। इससे पहले लगातार बारिश को देखते हुए प्रशासन ने 26 सितंबर को क्लास 1 से 12वीं तक के सभी स्कूल बंद रखने का आदेश जारी किया था। जलभराव की समस्या को लेकर स्थानीय लोगों ने भी नगर निगम के अधिकारियों से शिकायतें की हैं। विभिन्न इलाकों में जल निकासी की व्यवस्था की निगरानी की जा रही है। लोगों को जलभराव की वजह से काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

रवि किशन ने जलभराव का निरीक्षण किया

भारी बारिश के बाद गोरखपुर के सांसद रवि किशन ने शहर के जलभराव वाले इलाकों का निरीक्षण किया। रवि किशन ने कहा, “15 से 19 साल में कभी किसी ने ऐसी बरसात नहीं देखी… पूरे शहर में काफी पानी भर गया। अब पानी काफी जगह से उतर रहा है… प्रशासन की तैयारी हमेशा रहती है… महादेव से प्रार्थना है कि बरसात न हो और अगर बरसात नहीं होती है तो यह कल-परसों तक स्थिति सामान्य हो जाएगी।”

अभिनेता से नेता बने बीजेपी सांसद ने आगे कहा, “अगर बरसात होती है तो आप सभी लोग कृपया बचें और घर से न निकलें…आकाशीय बिजली भी गिर रही है। कैंपियरगंज में पेड़ गिरने से 3 लोगों की मौत हुई है। उनके परिवार के प्रति संवेदना है… हम लोग 24 घंटा मुस्तैद हैं, प्रशासन मुस्तैद है तो पैनिक होने की जरूरत नहीं है।”

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आंध्र प्रदेश में हॉस्टल में सोई कक्षा 9 और 10 छात्राओं की कटी चोटी, खौफ से सहमी छात्राएं

आंध्र प्रदेश के भीतिली के एक आवासीय स्कूल में हुई घटना की सुर्खियों में छाई हुई है। यहां हॉस्टल में सो रही छात्राओं की चोटी काटने की हैरान करने वाली घटना का पता चला है। यह छात्राएं कक्षा 9 और 10 की बताई जा रही हैं, जो हॉस्टल के दो कमरों में सो रही थीं। इस घटना ने हॉस्टल में छात्राओं की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। पुलिस और स्कूल प्रशासन बारीकी से मामले की जांच कर रहा है।

यह घटना आंध्र प्रदेश के भीमिली के कृष्णापुरम स्थित कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय की है। कई मीडिया स्रोतों में आ रही खबर के अनुसार, यह घटना 16 सितंबर को देर रात हुई थी। उस समय छात्राएं दो कमरों में सो रही थींऍ एक कमरे में छह और दूसरे कमरे में चार छात्राएं थीं। सुबह उन्होंने देखा कि उनके बाल कटे हुए हैंऍ स्कूल के इन दो कमरों में कक्षा नौ की करीब 38 छात्राएं रहती हैं।

बाहरी व्यक्ति के हॉस्टल में घुसने की आशंका

पुलिस और स्कूल प्रशासन इस घटना की जांच में जुटे हुए हैं। पहले यह माना जा रहा था कि हॉस्टल में घुसे किसी बाहरी व्यक्ति से इस घटना को अंजाम दिया होगा। लेकिन पुलिस और स्कूल प्रशासन अब इस संभावना की भी जांच कर रहे हैं कि इस घटना में हॉस्टल की ही कुछ छात्राएं शामिल हो सकती हैं। पुलिस ने छात्राओं से बात की है और सीसीटीवी फुटेज की जांच कर रही है। भीमिली के इंस्पेक्टर जी दिवाकर ने बताया कि पुलिस और स्कूल प्रशासन ने छात्राओं की काउंसलिंग की है और घटना की परिस्थितियों की जांच की जा रही है।

विधायक ने की छात्राओं, माता-पिता और स्कूल से बात

रविवार को भीमिली के विधायक घंटा श्रीनिवास राव स्कूल पहुंचे। उन्होंने छात्राओं, उनके माता-पिता और स्कूल प्रबंधन से बातचीत की। उन्होंने घटना की विस्तृत जांच की मांग की। उन्होंने कहा कि किसी बाहरी व्यक्ति के हॉस्टल में घुसने की संभावना बहुत कम है। उनका कहना था कि सीसीटीवी फुटेज से घटना के बारे में ज्यादा जानकारी मिल सकती है।

शिक्षा विभाग ने की प्रशासनिक कार्रवाई

इस मामले की गंभीरता को देखते हुए शिक्षा विभाग ने भी प्रशासनिक कार्रवाई शुरू कर दी है। घटना और हॉस्टल की निगरानी में लापरवाही को लेकर चार लोगों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। इनमें स्कूल की प्रिंसिपल, ड्यूटी पर मौजूद शिक्षक और रात की सुरक्षा में तैनात महिला कर्मचारी शामिल हैं।

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Janmashtami Bank Holiday: 4 सितंबर को जन्माष्टमी पर बैंक बंद रहेंगे या खुलेंगे? देखिए RBI की पूरी बैंक हॉलिडे लिस्ट

Janmashtami Bank Holiday 2026: देशभर में श्री कृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है। इस साल 4 सितंबर, शुक्रवार को जन्माष्टमी के पावन अवसर पर देश के कई राज्यों में बैंकों की छुट्टी रहने वाली है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा जारी की गई आधिकारिक बैंक हॉलिडे लिस्ट के मुताबिक, कई सर्किलों में सरकारी और प्राइवेट दोनों तरह के बैंकों की शाखाओं में कामकाज नहीं होगा।

अगर आपको इस हफ्ते बैंक जाकर चेक क्लियरिंग, कैश डिपॉजिट या अन्य जरूरी काम निपटाने हैं, तो अपने शहर की हॉलिडे लिस्ट चेक करके ही घर से निकलें।

4 सितंबर को किन-किन राज्यों में बंद रहेंगे बैंक?

RBI की ‘नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट’ के तहत 4 सितंबर को देश के प्रमुख शहरों और सर्किलों में बैंक बंद रहेंगे:

  • उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड: लखनऊ, कानपुर, वाराणसी, देहरादून और नोएडा।
  • राजस्थान और मध्य प्रदेश: जयपुर, भोपाल और इंदौर।
  • गुजरात और महाराष्ट्र: अहमदाबाद और मुंबई (कुछ क्षेत्रों में स्थानीय मान्यताओं के अनुसार)।
  • पूर्वी भारत: कोलकाता, पटना, गंगटोक और रांची।
  • दक्षिण भारत: चेन्नई, हैदराबाद और बेंगलुरु (चुनिंदा सर्किल)।

(नोट: जिन राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों में जन्माष्टमी का आधिकारिक अवकाश अधिसूचित नहीं है, वहां बैंक शाखाएं अपने सामान्य समय के अनुसार खुली रहेंगी।)

सितंबर 2026: बैंकों की छुट्टियों का कैलेंडर

4 सितंबर, शुक्रवार: श्री कृष्ण जन्माष्टमी- उत्तर प्रदेश, राजस्थान, एमपी, दिल्ली NCR आदि

12 सितंबर, शनिवार: दूसरा शनिवार- पूरे भारत में बैंक बंद रहेंगे

13 सितंबर, रविवार: साप्ताहिक अवकाश- पूरे भारत में बैंक बंद रहेंगे

26 सितंबर, शनिवार: चौथा शनिवार- पूरे भारत में बैंक बंद रहेंगे

बैंक बंद रहने पर भी चालू रहेंगी ये डिजिटल सेवाएं

बैंक शाखाएं बंद रहने के बावजूद ग्राहकों को वित्तीय लेनदेन में कोई परेशानी नहीं होगी। आप घर बैठे ऑनलाइन सेवाओं का लाभ उठा सकते हैं। Google Pay, PhonePe, Paytm और भीम ऐप से पैसों का लेनदेन 24 घंटे चालू रहेगा। कैश निकालने और जमा करने के लिए एटीएम सेवाएं चालू रहेंगी। NEFT और RTGS के जरिए ऑनलाइन फंड ट्रांसफर आसानी से किया जा सकेगा।

UPI Payment पर 6 साल बाद फिर लगेगा MDR! क्यों हो रही वापसी, किनमें बंटेगा इसका पैसा

UPI Payment Charges: लगभग छह साल बाद यूपीआई से लेन-देन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) वापस आ सकता है। दुकानदार को ₹2,000 या उससे अधिक के यूपीआई पेमेंट पर 0.3% का चार्ज लग सकता है। इसके लागू होने का कानूनी रास्ता तब साफ हुआ, जब सरकार ने अगस्त में पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट में बदलाव किया और जीरो-एमडीआर प्रोटेक्शन को हटा दिया। 21 अगस्त की फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक अब यूपीआई से पेमेंट पर जीरो की बजाय 0.3% के शुल्क का नियम अगले दो हफ्ते के भीतर लागू किया जा सकता है। हालांकि केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने साफ कर दिया है कि ग्राहकों और छोटे कारोबारियों पर इसका भार नहीं डाला जाएगा। सरकार की कोशिश इस पेमेंट सिस्टम से जुड़ी एंटिटीज को डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर बनाए रखने पर होने वाले खर्च के कुछ हिस्से की भरपाई है। ₹2,000 या इससे अधिक के लेन-देन पर MDR लागू होने से इलेक्ट्रॉनिक्स, सिक्योरिटीज, कपड़े और अधिक दाम वाली खरीदारी प्रभावित हो सकती है।

किसे मिलेगा UPI Payment में MDR का पैसा

एमडीआर का पैसा किसी एक को नहीं मिलेगा बल्कि बैंक, फिनटेक कंपनियां और इस लेन-देन में शामिल अन्य एंटिटीज में बंटेगा। साल 2019 तक एमडीआर वाली व्यवस्था लागू थी लेकिन फिर डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने के लिए इसे जीरो कर दिया गया। इसे हटाए जाने से पहले ₹100 से अधिक मूल्य वाले ऑफलाइन क्यूआर कोड के जरिए किए गए P2M (पर्सन-टू-मर्चेंट) पेमेंट पर 0.3% शुल्क लगता था, जिसे इश्यूअर (Issuer) और एक्वायरर (Acquirer) बैंकों के बीच बराबर बांटा जाता था। एमडीआर की अधिकतम सीमा भी ₹100 थी, जिसे साल 2020 में पूरी तरह समाप्त कर दिया गया।

अब इसे फिर लाया जा रहा है। इसका पैसा पेमेंट चेन में चार प्लेयर्स के बीच बंटेगा। एक हिस्सा ग्राहक के बैंक को, दूसरा हिस्सा पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर और ट्रांजैक्शन हैंडल करने वाले इसके बैंक को, तीसरा हिस्सा दुकानदार की तरफ से यानी एक्वायरिंग बैंकों और उसके पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर को तो चौथा हिस्सा यूपीआई नेटवर्क चलाने और लेन-देन का निपटारा करने वाली NPCI को मिलेगा। एमडीआर में सबसे अधिक हिस्सा इंटरचेंज शुल्क के रूप में इश्यूइंग बैंक यानी ग्राहकों के बैंक को तो सबसे कम हिस्सा एनपीसीआई को मिलेगा।

क्यों हुई वापसी

भर्तृहरि महताब के नेतृत्व में फाइनेंस से जुड़ी संसदीय स्थायी समिति ने 12 अगस्त को अपनी रिपोर्ट में जिक्र किया कि यूपीआई को बढ़ावा देने और जीरो-MDR के कारण इंडस्ट्री के रेवेन्यू लॉस की भरपाई के लिए सरकार ने सिर्फ ₹2,000 करोड़ एलॉट किए हैं जोकि डिजिटल पेमेंट इंडस्ट्री की अनुमानित सालाना लागत ₹20,700 करोड़ से बहुत ही कम है। कमेटी ने आगाह किया है कि इसके चलते साइबर सिक्योरिटी, फर्जीवाड़े की रोकथाम और पेमेंट नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर में जरूरी निवेश प्रभावित हो सकता है। चूंकि अब एआई का इस्तेमाल बढ़ा है तो साइबर खतरे भी बढ़े हैं, जिससे चिंता और गंभीर हो गई है। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा भी कह चुके हैं कि यूपीआई हमेशा फ्री नहीं रह सकता है और कोई न कोई इसका खर्च चुका रहा है।

हालांकि सिर्फ एमडीआर ही इन खर्चों की भरपाई के लिए पर्याप्त नहीं है। डिपार्टमेंट ऑफ फाइनेंशियल सर्विसेज ने संसदीय समिति को बताया कि फंडिंग के बोझ को कम करने के लिए दो विकल्पों पर विचार किया जा रहा है- अधिक वैल्यू वाले यूपीआई पेमेंट पर एमडीआर को दोबारा लागू करना या आने वाले वषों में सरकारी सहायता को धीरे-धीरे कम करना। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में देश में करीब ₹314 लाख करोड़ के 24,000 करोड़ से अधिक UPI लेनदेन हुए। इसमें से 71% P2P (पर्सन-टू-पर्सन) और बाकी P2M (पर्सन-टू-मर्चेंट) थे। पी2एम में सिर्फ 4% की वैल्यू ही ₹2,000 या उससे अधिक थी यानी कि अधिकतर यूपीआई पेमेंट एमडीआर के दायरे से बाहर रहेगा तो छोटे कारोबारियों को बाहर रखने से इसका दायरा और सीमित हो जाता है।

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