Stocks to Watch: 6 अक्टूबर को फोकस में रहेंगे ये 10 स्टॉक्स, वेदांता से लेकर ट्रेंट तक शामिल

Stocks to Watch: मंगलवार 6 अक्टूबर के कारोबार में कई शेयरों पर खास नजर रहेगी। इन कंपनियों से जुड़ी ताजा खबरें और बिजनेस अपडेट सामने आए हैं। इनमें बैंकिंग, मेटल, रिटेल और हेल्थकेयर सेक्टर के स्टॉक्स शामिल हैं। वेदांता से लेकर Trent तक कुल 10 शेयर फोकस में रहेंगे।

Axis Bank

बैंकिंग सेक्टर की Axis Bank ने दूसरी तिमाही में मजबूत ग्रोथ दर्ज की है। बैंक का ग्रॉस एडवांस तिमाही आधार पर 8.8% और साला आधार पर 22.7% बढ़कर ₹13.84 लाख करोड़ हो गया। कुल डिपॉजिट 5.8% तिमाही आधार पर और 20.7% सालाना आधार पर बढ़कर ₹14.52 लाख करोड़ रहा।

Vedanta

माइनिंग और मेटल कंपनी Vedanta के बोर्ड की बैठक 8 अक्टूबर को होगी। इसमें वित्त वर्ष 2026-27 के पहले अंतरिम डिविडेंड पर विचार किया जाएगा। कंपनी ने डिविडेंड के लिए 14 अक्टूबर को रिकॉर्ड डेट तय की है।

Godrej Consumer Products

कंज्यूमर गुड्स सेक्टर की Godrej Consumer Products को Q2FY27 में मजबूत प्रदर्शन की उम्मीद है। कंपनी ने कंसॉलिडेटेड रेवेन्यू में हाई-टीन्स ग्रोथ, वॉल्यूम में हाई-सिंगल डिजिट और EBITDA में डबल डिजिट ग्रोथ का अनुमान दिया है। कंपनी ने कहा कि कमजोर मानसून और महंगाई का खपत पर असर पड़ा।

Kotak Mahindra Bank

प्राइवेट सेक्टर के Kotak Mahindra Bank के नेट एडवांस दूसरी तिमाही के अंत में 24.7% YoY बढ़कर ₹5.77 लाख करोड़ हो गए। CASA डिपॉजिट 11.3% बढ़कर ₹2.49 लाख करोड़ रहा। कुल डिपॉजिट 23.2% बढ़कर ₹6.51 लाख करोड़ हो गया।

IndusInd Bank

इंडसइंड बैंक ने सितंबर तिमाही का मिलाजुला बिजनेस अपडेट जारी किया है। बैंक के नेट एडवांसेज 11.2% बढ़कर ₹3.62 लाख करोड़ हो गए। डिपॉजिट 10.1% बढ़कर ₹4.29 लाख करोड़ रहा, जबकि CASA रेशियो 29.4% से घटकर 28% हो गया।

IDFC FIRST Bank

IDFC फर्स्ट बैंक ने सितंबर तिमाही में लोन और एडवांस 20.4% बढ़कर ₹3,13,864 करोड़ होने की जानकारी दी है। कुल डिपॉजिट 17% बढ़कर ₹3,23,697 करोड़ रहा। CASA रेशियो 51.3% रहा, जो एक साल पहले 50.1% था।

Trent

टाटा ग्रुप की रिटेल कंपनी Trent का सितंबर तिमाही में स्टैंडअलोन रेवेन्यू 23% YoY बढ़कर ₹5,788 करोड़ हो गया। तिमाही के दौरान कंपनी ने 10 Westside और 17 Zudio स्टोर खोले। 30 सितंबर 2026 तक कुल स्टोर की संख्या 1,342 हो गई।

Juniper Hotels

हॉस्पिटैलिटी कंपनी Juniper Hotels ने Imagicaaworld Entertainment के साथ बाध्यकारी MoU किया है। इसके तहत कंपनी महाराष्ट्र के खोपोली में Novotel Imagicaa होटल का ऑपरेशन हासिल करेगी। 287 कमरों वाला यह होटल करीब 11 एकड़ में फैला है और सौदे की कीमत ₹248 करोड़ है।

Narayana Hrudayalaya

हेल्थकेयर कंपनी Narayana Hrudayalaya ने Mission of Mercy Hospital & Research Centre और The Assemblies of God of North India के साथ समझौता किया है। कंपनी कोलकाता के पार्क स्ट्रीट स्थित अस्पताल का लंबे समय के लिए ऑपरेशन और मैनेजमेंट संभालेगी। अस्पताल में 100 बेड हैं और यह करीब 63,240 वर्ग फुट में फैला है।

GAIL

सरकारी गैस कंपनी GAIL ने राजीव कुमार को नॉन-एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर नियुक्त किया है। उनकी नियुक्ति 1 अक्टूबर 2026 से प्रभावी हो गई है।

Trent Q2 Update: टाटा की कंपनी का रेवेन्यू 23% बढ़कर ₹5788 करोड़ पहुंचा, Zudio के स्टोर 1000 के पार

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

चुनाव बहिष्कार से क्यों डरना?

संवैधानिक संस्थाएं चुनाव की पवित्रता की रक्षा करने में विफल साबित हुई हैं। इस बीच वोट चोरी और चुनाव चोरी जैसे कथानकों को खुद विपक्षी दलों ने प्रचारित किया है। उसके साथ उम्मीदवार और दल चोरी, तथा सांसद- विधायक खरीदारी के कथानकों को जोड़ दें, तो लोकतंत्र की बात एक भद्दा मजाक बनी दिखने लगती है। इन्हीं हालात ने जागरूक नागरिकों में लाचारी की भावना भरी है।  तो प्रश्न है कि क्या विपक्षी दलों की साथ-साथ प्रतिरोध एवं चुनाव लड़ने की सोच से इस भावना को दूर किया जा सकता है?

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया पर दो निर्वाचन आयुक्तों के दस महीने में कम-से-कम 14 बार गंभीर एतराज जताने की खबर सामने आने के बाद से भारत में हो रहे चुनावों पर संदेह का साया और गहराया है। इसी सिलसिले में यह बहस खड़ी हुई है कि क्या अब विपक्ष को चुनाव बहिष्कार का फैसला करना चाहिए? या इसे इस रूप में भी पूछा जा रहा है कि क्या अब विपक्षी दलों के सामने चुनाव बहिष्कार के अलावा भी कोई और विकल्प रह गया है?

वैसे तो यह सवाल काफी समय से आपसी चर्चाओं में उठता रहा है या दबी ज़ुबान में इसे सार्वजनिक रूप से भी इसे कहा गया, लेकिन अब यह राजनीतिक बहस का एक प्रमुख मुद्दा बन चुका है। संभवतः इसे सबसे सटीक और दो-टूक अभिव्यक्ति हाल में कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजित दीपके ने दी। दरअसल, इस संबंध में उनके सोशल मीडिया पोस्ट के बाद ही इस पर खुलेआम सार्वजनिक बहस खड़ी हुई है। विपक्ष को संबोधित करते हुए दीपके ने कहा,

“हां, चुनावों में धांधली हो रही है। लेकिन जब आप धांधली वाले चुनावों में भाग लेना जारी रखते हैं, तो आप इन चुनावों को वैधता प्रदान करते हैं। आप यह भ्रम बनाए रखने में मददगार बनते हैं कि ये चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष हैं।…

शायद आप चुनाव लड़ना जारी रखते हैं, क्योंकि आपको डर है कि अगर आप ऐसा नहीं करेंगे, तो आपका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। लेकिन जब वोट चुराए जा रहे हों, आपके विधायकों और सांसदों को खरीद लिया जा रहा हो, और आपकी पार्टियों को तोड़ा जा रहा हो, तो आप किस तरह से अपने अस्तित्व की रक्षा करने की कोशिश कर रहे हैं?….

यह राजनीतिक अस्तित्व को बचाना नहीं है। आप बस एक ऐसी व्यवस्था में जीवित रहने की कोशिश कर रहे हैं, जो जब चाहे आपको कमजोर कर सकती है, आपकी पार्टी को विभाजित कर सकती है या आपके निर्वाचित प्रतिनिधियों को आपसे छीन सकती है। इस तरह आप कब तक टिके रह सकते हैं?….

और आप चुनावों में धांधली के बारे में केवल तभी बात नहीं कर सकते, जब यह उन राज्यों में हो, जो आपके लिए मायने रखते हैं, और जब यह कहीं और हो तो आप चुप रहें! अगर चुनावों में धांधली हो रही है, तो इससे फर्क पड़ना चाहिए- चाहे राज्य कोई भी हो या कोई भी पार्टी प्रभावित हो रही हो…

आप खेल जारी रखते हुए यह नहीं कह सकते कि खेल में धांधली हुई है। आपकी भागीदारी ही एकमात्र ऐसी चीज है, जो इन धांधली वाले चुनावों को वैधता देती है।

अपने राजनीतिक अस्तित्व के बारे में सोचने से पहले देश और इसके लोकतंत्र के बारे में सोचें। एक रुख तय करें और धांधली वाले चुनावों में भाग लेना बंद करें।”

बेशक, भारत में मौजूदा परिस्थितियों के बीच चुनाव बहिष्कार की यह एक ठोस और बेलाग वकालत है। लेकिन यह बात संभवतः विपक्षी दलों को रास नहीं आई। चूंकि सभी विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया इस स्तंभकार से पास नहीं है, इसलिए सबके बारे में कुछ कहना उचित नहीं होगा। लेकिन कम-से-कम दो दलों के रुख का अनुमान उनके प्रमुख नेताओं की टिप्पणी से लगाया जा सकता है। और उनमें एक पार्टी तृणमूल कांग्रेस है, जिसके बारे में समझा जाता है कि एसआईआर प्रक्रिया की गड़बड़ियों की वह सबसे बड़ी भुक्तभोगी है। दरअसल, वह उन सभी तौर-तरीकों की भुक्तभोगी है, जिसका जिक्र दीपके ने किया है।

उसके नेता डेरेक ओ’ब्रायन ने कहाः

“विपक्ष का चुनावों का बहिष्कार करना = भाजपा का सभी सीटों पर जीत जाना। एक बार जब ऐसा हो जाएगा, तो वे अपने सभी अपराधों को कानूनी रूप देने के लिए संविधान में संशोधन कर देंगे…

इसके अलावा चुनाव ना लड़ने का अर्थ है जमीन पर मौजूद उन लाखों कार्यकर्ताओं के साथ विश्वासघात, जो अपनी जान जोखिम में डाल कर लड़ रहे हैं।… इसीलिए लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए चुनाव लड़ना महत्त्वपूर्ण है, और इसके साथ ही स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए संघर्ष करना भी उतना ही आवश्यक है।”

इसी से मिलती-जुलती सोच कांग्रेस कार्यसमिति के स्थायी विशेष आमंत्रित सदस्य गुरदीप सिंह सप्पल ने अपने एक लेख में जताई। उन्होंने कहा,

“निर्वाचन आयोग के कामकाज को लेकर गुस्सा बढ़ रहा है और कुछ लोग अब कहने लगे हैं कि कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों को चुनाव लड़ना ही बंद कर देना चाहिए। उनका सवाल है कि अगर रेफरी ही बेईमान है, तो मैच क्यों खेलें? उनका तर्क है कि चुनाव लड़ना सिर्फ एक धांधली ग्रस्त प्रक्रिया को वैधता देना है…

गुस्सा जायज है। लेकिन निष्कर्ष गलत है। बहिष्कार पलायन है, और पलायन प्रतिरोध नहीं है। चुनावों का बहिष्कार भारतीय लोकतंत्र की रक्षा नहीं करेगा। बल्कि उसे पूरी तरह खत्म करने के रास्ते खोल देगा।।।।।

अब सोचिए कि विपक्ष मैदान छोड़ दे। तब नई पार्टियां गढ़ी जाएंगी। झूठे प्रचार से असली विपक्ष को बदनाम कर एक नया, आज्ञाकारी विपक्ष तैयार किया जाएगा। लोकतांत्रिक असहमति की जगह कठपुतलियों से भर दी जाएगी। और जिन चुनावों का कुछ लोग बहिष्कार करना चाहते हैं, उन्हीं चुनावों से धांधली वाले चुनावों को वैधता दी जाएगी। सत्ता पर पकड़ पूरी हो जाएगी, और वह कानूनी भी दिखेगी…

इसकी एक व्यावहारिक क़ीमत भी है। जो पार्टी चुनाव लड़ती है, उसके पोलिंग एजेंट हर बूथ पर होते हैं। उसके पास फॉर्म 17-C की कॉपियां होती हैं। उसके उम्मीदवार अदालत में नतीजों को चुनौती दे सकते हैं। वे पूरी मशीनरी को करीब से देखते हैं। राहुल गांधी ने देश के सामने जो भी सबूत रखे हैं, वे इसी प्रक्रिया के भीतर रह कर जुटाए गए। बहिष्कार चोरी को नहीं रोकता। वह गवाहों को ही हटा देता है।”

चुनाव बहिष्कार पलायन है या नहीं, इस प्रश्न पर हम बाद में आएंगे। लेकिन “बहिष्कार से गवाहों के हट जाने” के मुद्दे पर फिलहाल यह सवाल उठाना उचित होगा कि राहुल गांधी ने “जो सबूत रखे”, उसका परिणाम क्या हुआ है? उन “साक्ष्यों” का यह महत्त्व निर्विवाद है कि उनसे भारतीय चुनावों में हो रही धांधली का तर्क और मजबूत हुआ। यह जाहिर हुआ कि धांधली की शिकायत महज एक धारणा नहीं, बल्कि इसके ठोस और परिस्थितिजन्य साक्ष्य मौजूद हैं। लेकिन सवाल है कि क्या “साक्ष्यों” से सुनियोजित धांधलियों को रोकने की कोई राह भी निकली है? दरअसल, कांग्रेस सहित कुछ दलों एवं संगठनों ने प्रतीकात्मक प्रतिरोध जरूर आयोजित किए हैं, लेकिन उनके अलावा क्या जमीनी या आम जन के स्तर पर किसी बड़ी हलचल की सूरत बनी है?

चुनाव स्वतंत्र एवं निष्पक्ष नहीं रह गए हैं, इस धारणा की पृष्ठभूमि लंबी है। इस संबंध में जन सुराज पार्टी के नेता प्रशांत किशोर का यह आकलन गौरतलब हैः

     चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट से प्रभावित नहीं हुई है। ऐसा घटनाओं के एक लंबे सिलसिले के कारण हुआ है।

     दरअसल, देश भर में इस पर चर्चा होनी चाहिए कि एक पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त (राजीव कुमार) देश के सबसे बड़े निजी बैंक (एचडीएफसी) का चेयरमैन कैसे बन गया?

     पिछले कई वर्षों में चुनाव आयोग की कार्य शैली- विशेषकर चुनावों और अन्य मामलों में जिम्मेदारियों के निर्वहन के तरीकों- के कारण उसकी साख धूमिल हुई है। यह शिकायत पिछले 10 वर्ष से जारी है। इस दरम्यान चुनाव तारीखों के निर्धारण से लेकर चुनाव कितने चरणों में होंगे- हर चीज भाजपा की सुविधा से तय होती मालूम पड़ी है। (इस सिलसिले में आदर्श चुनाव आचार संहिता पर अमल में भेदभाव का उल्लेख भी किया जा सकता है।)

     चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति या चुनावों के व्यापक संचालन में विपक्ष की कोई भूमिका नहीं है। (इसे कानून बदल कर सरकार ने सुनिश्चित किया।)

     आज स्थिति यह है कि विपक्षी दल केवल वहीं चुनाव जीत पाते हैं, जहां भाजपा के खिलाफ आंधी चले। जहां जीत का अंतर थोड़ा हो, वहां विपक्षी उम्मीदवारों की हार तय कर दी जाती है।

यानी शिकायतों का सिलसिला लंबा है। एसआईआर में हुई गड़बड़ियां उस सिलसिले का ही हिस्सा बन कर सामने आई हैं। इस दौरान जिस पैमाने पर और जिस खुल्लमखुल्ला अंदाज में गड़बड़ियां की गईं, उसके बाद जनमत का एक बड़ा हिस्सा यह मानने लगा कि बात सिर्फ चुनावी धांधली की नहीं रह गई है, बल्कि अब चुनावों को नियंत्रित एवं नियोजित कर लिया गया है। इस धारणा ने लोगों में लाचारी की भावना भरी है। इस अहसास से ये भावना और गहरी हुई कि फरियाद का कोई मंच नहीं बचा है।

इसीलिए ये सवाल सबसे अहम हो गया है कि अब किया क्या जाए? इस सिलसिले में बहिष्कार, चुनाव लड़ने के साथ-साथ प्रतिरोध, और न्यायपालिका की शरण में जाने के विकल्प चर्चा में आए हैं। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की गुजारिश करती कुछ याचिकाएं दायर भी की गई हैं।   इस पर कॉकरोच जनता पार्टी के नेता सौरव दास की ये टिप्पणी महत्त्वपूर्ण हैः

“…। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पिछली बार जब नागरिकों ने न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाया, तब क्या हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने यह “सुनिश्चित” किया कि चुनाव से महज कुछ महीने पहले बंगाल में जैसे-तैसे एसआईआर हो जाए। जब बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने के परिणामों को नजरअंदाज़ करना असंभव हो गया, तो उस पीठ में शामिल न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची ने एक असाधारण टिप्पणी कर दी। उन्होंने कहा कि जो लोग “इस बार” वोट देने में असमर्थ हैं, वे “अगली बार” वोट दे सकते हैं…

उन्हें कौन बताए कि संभवतः चुराए जा चुके चुनाव के बाद कोई “अगली बार” नहीं होता? इसलिए, चूंकि अदालतें संवैधानिक संस्थाएं हैं, अतः ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इन नई याचिकाओं पर वे जितनी बार चाहें, उन्हें सुनवाई करने दें। वे जो चाहें, आदेश पारित करने दें। लेकिन ज्ञानेश कुमार की जवाबदेही तय करने की अपनी लोकतांत्रिक मांग को हम अदालतों को “आउटसोर्स” नहीं करेंगे।

यह जनता तय करेगी। क्योंकि आखिरकार, ना तो कोई चुनाव आयुक्त और न ही कोई न्यायाधीश भारतीय लोकतंत्र का मालिक है। इसके मालिक हम, भारत के लोग हैं।”

इस सोशल मीडिया पोस्ट का सार है कि संवैधानिक संस्थाएं चुनाव की पवित्रता की रक्षा करने में विफल साबित हुई हैं। इस बीच वोट चोरी और चुनाव चोरी जैसे कथानकों को खुद विपक्षी दलों ने प्रचारित किया है। उसके साथ उम्मीदवार और दल चोरी, तथा सांसद- विधायक खरीदारी के कथानकों को जोड़ दें, तो लोकतंत्र की बात एक भद्दा मजाक बनी दिखने लगती है। इन्हीं हालात ने जागरूक नागरिकों में लाचारी की भावना भरी है।

तो प्रश्न है कि क्या विपक्षी दलों की साथ-साथ प्रतिरोध एवं चुनाव लड़ने की सोच से इस भावना को दूर किया जा सकता है? आखिर कितनी बार अपनी हार को ये दल वोट चोरी का परिणाम बताएंगे, कुछ रोज प्रतीकात्मक विरोध जताएंगे, और फिर अगले चुनाव की तैयारी में जुट जाएंगे? इन्हीं सवालों के क्रम में चुनाव बहिष्कार का मुद्दा उठा है।

इस सुझाव को सहज स्वीकार करना सियासी पार्टियों के लिए आसान नहीं है। इसकी वजह उनका दायरा और ढांचा है। आजादी के बाद की भारतीय राजनीति का सार यह रहा है कि (एक हद तक आरएसएस समर्थित भाजपा को छोड़ कर) तमाम दलों के लिए राजनीति का अर्थ ही चुनाव हो चुका है। वे चुनावी चक्र में सोचते हैं, उसी के मुताबिक मुद्दे और उम्मीदवार चुनते हैं, और उसी के इर्द-गिर्द उनकी तमाम गतिविधियां सीमित रहती हैं। उनके कथित कार्यकर्ता दरअसल इस उम्मीद में उनसे जुड़े लोग हैं कि कभी किसी स्तर पर चुनाव लड़ने का मौका मिल जाएगा। उन्हें फंडिंग चुनाव जीत सकने की उनकी संभावना के आधार पर होती है। गुजरे वक्त के साथ पार्टी की टिकट बिक्री एक बड़ा धंधा- यानी पार्टियों या नेताओं के लिए आमदनी का जरिया बन गई है। स्वाभाविकतः चुनाव ना लड़ना उनके सोच के दायरे से बाहर की बात है। चुनाव उनके लिए किसी लक्ष्य को पाने का माध्यम नहीं, बल्कि अपने आप में लक्ष्य हैं!

वैसे, राजनीति अगर किसी ऊंचे लक्ष्य और संकल्प से प्रेरित ना हो, तो चुनाव बहिष्कार सचमुच कोई समाधान नहीं है। यह निर्णय सिर्फ तब समाधान बन सकता है, जब राजनीति का अर्थ जनता के बीच जाना, उसकी अपेक्षाओं को समझना, उससे संवाद कायम करना, आम जन चेतना के विस्तार के प्रयास में जुटना और उस आधार पर जन गोलबंदी करना समझा जाए। इसी अर्थ में कहा जाता है कि भारत को आजादी चुनाव लड़ कर नहीं मिली थी। तब स्वतंत्रता सेनानियों ने राजनीति को व्यापक अर्थ में देखा था।

चुनाव में भाग लें या नहीं, इस बहस में उलझते हुए दक्षिण अफ्रीका की कम्युनिस्ट पार्टी ने ‘राज्य के साथ, राज्य के विरुद्ध, राज्य से आगे’ नाम की माकूल रणनीति तय की थी। इसका अर्थ था, चुनाव में शामिल होकर राज्य-तंत्र में अधिकतम भागीदारी बनाना, साथ-साथ अपनी मांगें पूरी कराने के लिए राज्य के खिलाफ लगातार संघर्षरत रहना, और आम जन को संगठित करते हुए उनकी शक्ति निर्मित करना, ताकि वे अपने उद्देश्य को हासिल करने के संघर्ष के लिए तैयार हो सकें। लेकिन ये सब बड़ी बातें हैं। फिलहाल, हम जिन राजनीतिक दलों के संबंध में बात कर रहे हैं, संभव है कि वे इसे बेकार की बातें कहें या यह भी संभव है कि यह उनके सिर के ऊपर से गुजर जाए।

इसीलिए फिलहाल, भारत में बात कहीं आगे बढ़ने की संभावना नहीं दिखती। फिलहाल, यही अनुमान लगाया जा सकता है कि विपक्षी दल चुनाव के मामले ‘तुम्हीं से मोहब्बत- तुम्हीं से लड़ाई’ जैसी सीमित सोच के दायरे में बंधे रहेंगे!

‘इंडियन एक्सप्रेस’ का क्या मकसद?

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज पर लंबे समय से सवाल उठ रहे थे। उनसे पहले के मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार भी सवालों के घेरे में थे। लेकिन ज्ञानेश कुमार की ज्यादा बदनामी हुई। तभी इस समय उनके बारे में इतने विस्तार से रिपोर्ट के प्रकाशन का क्या मकसद हो सकता है? गौरतलब है कि ‘इंडियन एक्सप्रेस’ पहले भी इस तरह की रिपोर्ट्स करता रहा है लेकिन पिछले कुछ समय से उसका स्पष्ट रूझान सरकार की ओर है। तभी इस रिपोर्ट और इसकी टाइमिंग को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। संदेह इसलिए पैदा हो रहा है क्योंकि ‘इंडियन एक्सप्रेस’ बीच बीच में कुछ ऐसी रिपोर्ट छापता है, जो दिखती सरकार के खिलाफ है लेकिन उनका असल मकसद कुछ और होता है। सो, यह देखना दिलचस्प होगा कि इसका क्या मकसद है।

दो बातों की संभावना इसमें देखी जा रही है। पहली तो यह कि ज्ञानेश कुमार के कारण चुनाव आयोग और सरकार की जो बदनामी हुई है उसका ठीकरा उनके ऊपर ही फोड़ कर उनको हटाया जाए। गौरतलब है कि उनकी आईएएस बेटी, नोएडा की कलेक्टर हैं उनको लेकर भी अदालतों की बड़ी सख्त टिप्पणियां आ रही हैं। दूसरी संभावना यह भी है कि ज्ञानेश कुमार के मुकाबले दोनों चुनाव आयुक्तों की छवि चमकाई जा रही हो ताकि आगे उनमें से कोई मुख्य चुनाव आयुक्त बने तो उसकी साख बनी रहे। यही दो संभावनाएं इसलिए दिख रही हैं क्योंकि एसआईआर के जरिए वोट काटने और वोट जोड़ने का जो खेल हुआ है उसे रोकने की कोई मंशा सरकार की नहीं है। एसआईआर और परिसीमन ये दो ऐसी चीजें हैं, जिनसे भारतीय जनता पार्टी 2029 का लोकसभा चुनाव जीतने की उम्मीद कर रही है।

HDFC Bank एक साल के निचले स्तर पर, रिकवरी में ₹1172 तक जाएगा शेयर, मैक्वेरी ने सीईओ को लेकर जताई दो संभावनाएं

HDFC Bank Share Price: प्राइवेट सेक्टर लेंडर एचडीएफसी बैंक के शेयरों में आज काफी सुस्ती है। टूटकर यह एक साल के रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया था, जिससे यह रिकवर होकर हल्का ग्रीन हुआ। वैश्विक ब्रोकरेज फर्म मैक्वेरी के रुझानों के हिसाब से इसकी सुस्ती खरीदारी के मौके के तौर पर देख सकते हैं। ब्रोकरेज फर्म ने इसे फिर आउटपरफॉर्म रेटिंग ऐसे समय में दी है, जब बैंक के अगले सीईओ को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है और मैक्वेरी ने इसे लेकर दो संभावनाएं जाहिर की हैं। शेयरों की बात करें तो फिलहाल बीएसई पर यह 0.32% की बढ़त के साथ ₹714.30 पर है। इंट्रा-डे में यह 0.47% उछलकर ₹715.25 तक पहुंच गया था। इंट्रा-डे में यह 0.79% टूटकर ₹706.35 तक आ गया था। मैक्वेरी ने इसके शेयरों का टारगेट प्राइस ₹1,150 फिक्स किया है।

HDFC Bank के सीईओ को लेकर क्या है Macquarie का कैलकुलेशन

बैंक का अगला सीईओ कौन, इसे लेकर अनिश्चितता शेयरों पर दबाव बनाए हुए है। बैंक के वर्तमान सीईओ शशि जगदीशन का मौजूदा कार्यकाल 26 अक्टूहर 2026 को समाप्त हो रहा है यानी बैंक के पास अगले सीईओ के नाम पर फैसला करने के लिए लगभग दो महीने ही बचे हैं। ब्रोकरेज फर्म के अनुसार इसके चलते ही शेयरों पर दबाव बना हुआ है।

अब मैक्वेरी के मुताबिक सबसे पहले बैंक की NRC (नॉमिनेशन एंड रेम्यूनेरेशन कमेटी) कुछ कैंडिडेट्स के नाम पर विचार करेगी और एक नाम चुनेगी जिसे बोर्ड को भेजा जाएगा। राजीव कुमार की अध्यक्षता में बोर्ड से मंजूरी मिलने के बाद आरबीआई के पास इसे आखिरी मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। मैक्वेरी के मुताबिक बोर्ड से भेजे गए नाम पर आरबीआई ने हाल-फिलहाल में 30-45 दिनों का समय लिया है। ऐसे में मैक्वेरी ने दो संभावनाएं जताई हैं।

पहला विकल्प- 6 महीने का एक्सटेंशन: अगर शशि जगदीशन को सिर्फ छह महीने का विस्तार मिलता है, तो यह संकेत हो सकता है कि बैंक का बोर्ड किसी दूसरे व्यक्ति को अगला सीईओ बनाने पर विचार कर रहा है और नए कैंडिडेट की तलाश और आरबीआई की मंजूरी के लिए उसे अतिरिक्त समय चाहिए। मैक्वेरी के मुताबिक ऐसी स्थिति में अगले सीईओ को लेकर अनिश्चितता और लंबे समय तक बनी रह सकती है। इसके अलावा नए सीईओ को बैंक की जिम्मेदारी संभालने और अपनी रणनीति लागू करने में समय लग सकता है यानी बैंक के शेयरों पर आगे भी दबाव बना रह सकता है।

दूसरा विकल्प- पूरे तीन साल का विस्तार: मैक्वेरी के मुताबिक दूसरी संभावना ये है कि शशि जगदीशन को पूरे तीन साल का नया कार्यकाल दे दिया जाए। ब्रोकरेज फर्म का मानना है कि ऐसा होने पर अगले सीईओ को लेकर तत्काल बनी अनिश्चितता खत्म हो जाएगी, जिससे मौजूदा लेवल्स के आसपास शेयरों को सपोर्ट मिल सकता है। मैक्वेरी के मुताबिक इसके बाद शेयरों की चाल मुख्य रूप से बैंक के फंडामेंटल्स में सुधार पर निर्भर करेगा।

कुछ दिनों पहले एक साल के निचले स्तर पर था शेयर

एचडीएफसी बैंक के शेयरों ने निवेशकों को तगड़ा शॉक दिया है। पिछले साल 23 अक्टूबर 2025 को यह एक साल के रिकॉर्ड हाई लेवल ₹1,020.35 पर था। इस हाई लेवल से 10 महीने में यह 30.77% टूटकर आज 28 अगस्त 2025 को एक साल के रिकॉर्ड निचले स्तर ₹706.35 पर आ गया।

Tempsens IPO Listing: लिस्टिंग पर पैसे डबल, ₹300 का शेयर ₹634 पर लिस्ट

डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए सलाह या विचार एक्सपर्ट/ब्रोकरेज फर्म के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदायी नहीं है। यूजर्स को मनीकंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले हमेशा सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

HDFC Bank में CEO पद को लेकर हलचल बढ़ी, RBI गवर्नर से मिले चेयरमैन राजीव कुमार

HDFC Bank CEO Appointment: देश के सबसे बड़े प्राइवेट बैंक HDFC Bank के एमडी और सीईओ शशिधर जगदीशन का मौजूदा कार्यकाल 26 अक्टूबर 2026 को खत्म हो रहा है। अब इसमें दो महीने से थोड़ा ज्यादा समय बचा है। इसी बीच बैंक के चेयरमैन राजीव कुमार ने पिछले हफ्ते RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा से मुलाकात की है।

सूत्रों के मुताबिक, इस बैठक में सबसे अहम बात जगदीशन के अगले कार्यकाल को लेकर हुई। RBI यह समझना चाहता है कि बैंक बोर्ड जगदीशन को दोबारा एमडी और सीईओ बनाने के पक्ष में है या नहीं।

बोर्ड में जगदीशन के नाम पर कितनी सहमति?

RBI यह भी जानना चाहता था कि राजीव कुमार के चेयरमैन बनने के बाद बोर्ड में किसी दूसरे नाम पर भी चर्चा हुई है या नहीं। एक वरिष्ठ सूत्र ने कहा कि अभी तक HDFC Bank बोर्ड ने एमडी और सीईओ की नियुक्ति को लेकर RBI को कोई सिफारिश नहीं भेजी है।

RBI अब जल्द फैसला चाहता है

राजीव कुमार 30 जून 2026 को HDFC Bank के बोर्ड में शामिल हुए थे। इसके बाद से RBI अधिकारियों के साथ उनकी यह चौथी औपचारिक बातचीत बताई जा रही है।

शुरुआत में RBI ने बोर्ड को कुछ समय दिया। इसकी वजह यह थी कि राजीव कुमार ने 15 जुलाई को औपचारिक रूप से चेयरमैन का पद संभाला था। अब उन्हें पद संभाले करीब एक महीना हो चुका है। ऐसे में RBI चाहता है कि बैंक के नेतृत्व को लेकर तस्वीर जल्द साफ हो।

आमतौर पर छह महीने पहले शुरू हो जाती है प्रक्रिया

बैंकों में आम तौर पर एमडी और सीईओ का कार्यकाल खत्म होने से करीब छह महीने पहले दोबारा नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। बोर्ड अपनी सिफारिश RBI को भेजता है।

अगर नया सीईओ चुनना हो, तो पसंदीदा उम्मीदवारों के नाम आम तौर पर कार्यकाल खत्म होने से कम से कम चार महीने पहले RBI को भेजे जाते हैं।

HDFC Bank का मामला इसलिए अलग दिख रहा है। जगदीशन का कार्यकाल खत्म होने में अब करीब दो महीने बचे हैं। लेकिन बोर्ड ने अभी तक RBI को कोई नाम नहीं भेजा है।

जगदीशन के सामने क्या संभावनाएं?

पहले की रिपोर्टों के मुताबिक, इस पद को लेकर चार संभावनाएं हैं। जगदीशन को फिर से तीन साल का कार्यकाल मिल सकता है। उन्हें इससे छोटा कार्यकाल भी दिया जा सकता है। बैंक बोर्ड किसी दूसरे आंतरिक उम्मीदवार का नाम भी भेज सकता है।

इसके अलावा किसी बाहरी उम्मीदवार के नाम पर भी विचार हो सकता है। यानी फिलहाल यह तय नहीं है कि अक्टूबर के बाद HDFC Bank की कमान किसके हाथ में होगी।

AT-1 बॉन्ड मामले पर भी बात

RBI गवर्नर और राजीव कुमार की बातचीत सिर्फ सीईओ की नियुक्ति तक सीमित नहीं रही। सूत्रों के मुताबिक, AT-1 बॉन्ड की मिस-सेलिंग से जुड़े मामले पर भी चर्चा हुई।

कुछ नाराज बॉन्डधारक इस मामले को लेकर बहरीन में कानूनी कार्रवाई कर रहे हैं। RBI इस मामले को लेकर भी बैंक की स्थिति समझना चाहता है।

कुछ महीनों में बदला बैंक का नेतृत्व

HDFC Bank में पिछले कुछ महीनों में नेतृत्व स्तर पर काफी बदलाव हुए हैं। पूर्व चेयरमैन अतनु चक्रवर्ती ने मार्च में अचानक बोर्ड छोड़ दिया था।

इसके बाद नॉन-एग्जीक्यूटिव बोर्ड सदस्य केकी मिस्त्री को अंतरिम चेयरमैन बनाया गया। करीब तीन महीने की तलाश के बाद राजीव कुमार को नया नॉन-एग्जीक्यूटिव चेयरमैन चुना गया। उन्हें पहले अतिरिक्त निदेशक बनाया गया था। RBI की मंजूरी के बाद 15 जुलाई को उन्होंने चेयरमैन का पद संभाला।

HDFC Bank का शेयर बुधवार को 0.02% की मामूली गिरावट के साथ 727.35 रुपये पर बंद हुआ। हालांकि, पिछले 1 साल में यह 25.28% टूट चुका है।

AI डेटा सेंटर से बिजली की मांग बढ़ेगी, इन 3 शेयरों पर एक्सपर्ट की नजर

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।