अमेरिका से पैसा निकालने लगे दुनिया के बड़े निवेशक:40 ट्रिलियन डॉलर के कर्ज से बढ़ी चिंता, सोना खरीद रहे, चीन में निवेश बढ़ा रहे

अमेरिका पर 40 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा का कर्ज है। इसके साथ ब्याज दरें, टैरिफ और दूसरे देशों पर लगाए जा रहे आर्थिक प्रतिबंध भी बढ़ रहे हैं। इससे दुनिया के कुछ निवेशक अब सोच रहे हैं कि अपना पैसा अमेरिका के अलावा कहां लगाया जाए। कुछ बड़े सरकारी फंड अमेरिकी बॉन्ड में निवेश घटा रहे हैं। कई देशों के केंद्रीय बैंक सोना खरीदकर अपना भंडार बढ़ा रहे हैं। वहीं, जर्मनी की कंपनियों ने 2026 की पहली छमाही में अमेरिका में निवेश कम किया और चीन में निवेश बढ़ाया। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि दुनिया अमेरिका से पूरी तरह दूर हो रही है। डॉलर अभी भी दुनिया की सबसे बड़ी रिजर्व करेंसी है और अमेरिकी शेयर बाजार व बॉन्ड में अब भी बड़ी मात्रा में पैसा लगा हुआ है। अमेरिका को कर्ज लेने के लिए ज्यादा ब्याज देना पड़ रहा अमेरिकी बॉन्ड बाजार में निवेशकों की चिंता अब साफ दिखने लगी है। 10 साल के अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड सितंबर में करीब 5% तक पहुंच गई। 11 सितंबर को यह 4.93% थी, जबकि इससे पहले 4.979% तक पहुंच चुकी थी। आसान भाषा में समझें तो यील्ड बढ़ने का मतलब है कि अमेरिका को कर्ज लेने के लिए निवेशकों को ज्यादा ब्याज देना पड़ रहा है। यानी सरकार के लिए कर्ज लेना महंगा होता जा रहा है। इसका असर आगे चलकर सरकारी खर्च पर भी पड़ सकता है। बॉन्ड में निवेशकों की दिलचस्पी बनाए रखने के लिए अमेरिकी ट्रेजरी पुराने बॉन्ड की खरीद बढ़ा रहा है। हालांकि, ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट का कहना है कि अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था मजबूत है और बॉन्ड की हाल की नीलामियां अच्छी रही हैं। नॉर्वे अमेरिकी बॉन्ड में निवेश घटा सकता है अमेरिका से निवेश कम करने वालों में नॉर्वे का सरकारी फंड भी शामिल है। करीब 2.3 ट्रिलियन डॉलर (₹218.5 लाख करोड़) का यह फंड अमेरिकी सरकारी बॉन्ड में अपना पैसा कम करने की योजना बना रहा है। नॉर्वे के फंड में सरकारी बॉन्ड का हिस्सा 70% से घटाकर 50% करने का प्रस्ताव है। इसमें सबसे बड़ी कटौती अमेरिकी बॉन्ड में होने की संभावना है। इससे अमेरिका के बॉन्ड में नॉर्वे का निवेश करीब 80 अरब डॉलर तक कम हो सकता है। हालांकि, नॉर्वे सिर्फ अमेरिका से दूरी बनाने के लिए यह बदलाव नहीं कर रहा। वह जापान के सरकारी बॉन्ड और दूसरे तरह के बॉन्ड में पैसा लगाने पर भी विचार कर रहा है। इसका मकसद अपना पैसा अलग-अलग जगह लगाना और बेहतर कमाई के मौके तलाशना है। जर्मन कंपनियों का अमेरिका में निवेश 65% घटा, चीन में एक-तिहाई बढ़ा अमेरिका और चीन में जर्मन कंपनियों के निवेश के आंकड़ों में इस साल बड़ा फर्क दिखा है। 2026 की पहली छमाही में अमेरिका में उनका निवेश 65% घटकर 4.3 अरब यूरो रह गया। वहीं, चीन में निवेश करीब एक-तिहाई बढ़कर 5.6 अरब यूरो पहुंच गया। जर्मन इकोनॉमिक इंस्टीट्यूट की स्टडी के मुताबिक, अमेरिका में जर्मन कंपनियों का निवेश ऐसे समय घटा है, जब ट्रम्प की टैरिफ और व्यापार नीतियों को लेकर कारोबार में अनिश्चितता बनी हुई है। वहीं, चीन में पहले से काम कर रही जर्मन कंपनियां अपने कारोबार में लगातार पैसा लगा रही हैं। डॉलर की हिस्सेदारी धीरे-धीरे घट रही डॉलर अभी भी दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली रिजर्व करेंसी है। लेकिन दुनिया के केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर का हिस्सा धीरे-धीरे कम कर रहे हैं। आईएमएफ के मुताबिक, 2025 की आखिरी तिमाही में दुनिया के विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी 56.77% थी। इससे पिछली तिमाही में यह 56.93% थी। वहीं, चीन की मुद्रा रेनमिन्बी की हिस्सेदारी सिर्फ 1.95% थी। इसका मतलब यह नहीं है कि चीन की मुद्रा अभी डॉलर की जगह लेने वाली है। डॉलर की पकड़ अब भी बहुत मजबूत है। बस कुछ देश अपने पैसे को अलग-अलग जगह रख रहे हैं। वे डॉलर के साथ दूसरी मुद्राओं और सोने में भी अपना भंडार बढ़ा रहे हैं। केंद्रीय बैंक लगातार सोना खरीद रहे डॉलर के साथ अब सोना भी केंद्रीय बैंकों के लिए अहम रिजर्व बनता जा रहा है। कई देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने का हिस्सा बढ़ा रहे हैं। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक, दुनिया के केंद्रीय बैंकों ने 2025 में कुल 863 टन सोना खरीदा। यह 2024 के मुकाबले कम था, लेकिन लंबे समय के औसत से अब भी काफी ज्यादा रहा। 2022 से 2025 के बीच केंद्रीय बैंकों ने हर साल औसतन करीब 1,000 टन सोना खरीदा। यानी सोने को रिजर्व में शामिल करने का चलन पिछले कुछ सालों से लगातार बना हुआ है। 2026 में भी खरीद जारी चीन-भारत में भी सोने की मांग बढ़ी सोने की बढ़ती मांग सिर्फ केंद्रीय बैंकों तक सीमित नहीं है। आम निवेशक भी सोने में ज्यादा पैसा लगा रहे हैं। 2025 में चीन में सोने की निवेश मांग 28% बढ़ी। भारत में भी सोने में निवेश की मांग 17% बढ़ी। दोनों देशों के बाजारों ने मिलकर दुनिया में सोने की छड़ों और सिक्कों की कुल मांग का आधे से ज्यादा हिस्सा अपने नाम किया। यानी सोने की मांग दो तरफ से बढ़ रही है। एक ओर केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोना बढ़ा रहे हैं, तो दूसरी ओर चीन और भारत जैसे बड़े बाजारों में आम निवेशक भी सोने को निवेश का विकल्प मान रहे हैं। अमेरिका की आर्थिक ताकत अभी भी बरकरार इन बदलावों के बावजूद अमेरिका की आर्थिक ताकत अभी खत्म नहीं हुई है। दुनिया के विदेशी मुद्रा भंडार में आज भी डॉलर की हिस्सेदारी 56% से ज्यादा है। अमेरिकी शेयर बाजार और सरकारी बॉन्ड में भी दूसरे देशों का पैसा लगा हुआ है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट का कहना है कि अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था पर लोगों का भरोसा बना हुआ है और सरकारी बॉन्ड की नीलामी भी अच्छी चल रही है। ——————– यह खबर भी पढ़ें… अमेरिका में AI को लेकर तीन खेमे: मस्क को सभ्यता मिटने का डर, ट्रम्प को चीन से पिछड़ने की चिंता अमेरिका में AI के विकास की रफ्तार को लेकर बहस तेज है। इसे लेकर तीन अलग-अलग खेमे बन गए हैं। पूरी खबर पढ़ें…

Gold Investment: आज सोने में लगाए ₹50,000 तो 2036 में कितने हो जाएंगे? समझिए 10 साल के रिटर्न का पूरा गणित

Gold Price Return Projection 2026 to 2036: भारतीय परिवारों में सोना हमेशा से सिर्फ गहने के तौर पर ही नहीं, बल्कि सबसे भरोसेमंद वेल्थ के रूप में पसंद किया जाता रहा है। रिकॉर्ड ऊंचाइयों को छूने के बाद आज हर निवेशक के मन में एक ही सवाल है अगर आज सोने में ₹50,000 लगाए जाएं, तो अगले 10 साल में यानी 2036 तक इसकी वैल्यू कितनी हो सकती है?

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के आंकड़ों और ऐतिहासिक रिटर्न को आधार बनाकर आइए आसान भाषा में समझते हैं कि अलग-अलग सालाना रिटर्न (CAGR) के हिसाब से आपका ₹50,000 का निवेश 2036 तक कितना बन सकता है।

पिछले 10 सालों में सोने ने दिया बंपर रिटर्न

भविष्य के अनुमान से पहले यह देखना जरूरी है कि पिछले एक दशक में सोने की कीमतें कितनी तेजी से बढ़ी हैं। साल 2016 में कीमत 10 ग्राम (24 कैरेट) सोने का औसत भाव करीब ₹28,623 था। 2026 में यह बढ़कर लगभग ₹1,53,250 प्रति 10 ग्राम हो चुका है।

पिछले 10 सालों में सोने की कीमतें करीब 5.35 गुना बढ़ी हैं, यानी लगभग 18.6% का सालाना रिटर्न दर्ज किया गया है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक अकेले 2025 में ही सोने ने 60% से ज्यादा का रिटर्न दिया था। आपको बता दें कि मौजूदा दरों पर ₹50,000 में करीब 3.26 ग्राम सोना मिलेगा।

आज सोने में लगाया गया ₹50,000 साल 2036 में कितने का होगा?

वैसे इतिहास का 18.6% वाला रिटर्न हर साल मिले, यह जरूरी नहीं है। इसलिए अलग-अलग सालाना रिटर्न के हिसाब से 2036 की संभावित वैल्यू नीचे दी गई है:

2036 में कितना होगा ₹50,000? अलग-अलग सिनेरियो का गणित

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के GLTER मॉडल के मुताबिक 2025 से 2040 के बीच सोने का औसत अनुमानित रिटर्न 5.2% प्रति वर्ष रहने का अनुमान है।

किन वजहों से घटती-बढ़ती हैं सोने की कीमतें?

सोने के दाम कभी भी एक सीधी रेखा में नहीं बढ़ते। इसमें उतार-चढ़ाव बना रहता है। सोने की चाल को मुख्य रूप से ये कारक तय करते हैं:

  • अमेरिकी फेडरल रिजर्व (US Fed) के ब्याज दर संबंधी फैसले।
  • अमेरिकी डॉलर (USD) की मजबूती या कमजोरी।
  • वैश्विक स्तर पर महंगाई और जियोपॉलिटिकल तनाव (युद्ध/विवाद)।
  • दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों द्वारा सोने की खरीदारी।

फिजिकल गोल्ड खरीदने से पहले रखें इन खर्चों का ध्यान

अगर आप केवल निवेश के मकसद से फिजिकल सोना (गहने या सिक्के) खरीद रहे हैं, तो वास्तविक रिटर्न कम हो सकता है। क्योंकि इसमें:

  • 3% GST लागू होता है।
  • मेकिंग चार्ज और वेस्टेज का खर्च जुड़ता है।
  • बाय-सेल स्प्रेड यानी खरीदते और बेचते वक्त की कीमतों में अंतर होता है।

स्मार्ट इनवेस्टमेंट टिप: अगर आपका उद्देश्य केवल निवेश से रिटर्न कमाना है, तो फिजिकल गोल्ड के बजाय Gold ETF, डिजिटल गोल्ड या गोल्ड म्युचुअल फंड्स जैसे पेपर/डिजिटल विकल्पों पर विचार करना अधिक फायदेमंद हो सकता है।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Gold Silver Price: 10 हफ्ते के हाई पर सोना, 1 हफ्ते में 11% चढ़ी चांदी, जानिए इस तेजी के पीछे क्या है वजह

Gold – Silver Price: सोने और चांदी की कीमतों में हालिया तेजी जारी है। सोना 10 हफ्ते के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है जबकि चांदी में पिछले हफ्ते 11% से ज़्यादा की बढ़त हुई है। इस हफ्ते स्पॉट गोल्ड की कीमत लगभग USD 4,435 प्रति औंस तक पहुंच गई, जो जून के मध्य के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। खबर लिखे जाने के समय USD 4,375 के आसपास थी।

Comex सिल्वर में इस हफ्ते 11% से ज्याजा की तेजी आई। स्पॉट सिल्वर की कीमत लगभग USD 64 प्रति औंस हो गई। भारत में, सोना 10 ग्राम के लिए लगभग 1,55,000 रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास ट्रेड कर रहा था, जबकि MCX सिल्वर में हफ्ते भर में लगभग 6.58% की बढ़त हुई और यह प्रति किलोग्राम लगभग 2,31,804 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास ट्रेड कर रहा था।

सोने-चांदी की कीमतों के पीछे तेजी के एक नहीं बल्कि कई वजह है। इनमें से US में कमजोर रोजगार डेटा, फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की कम होती उम्मीदें, सेंट्रल बैंक द्वारा लगातार सोने की खरीद, ETF में फिर से निवेश आना और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर जियोपॉलिटिकल अनिश्चितता – इन सभी ने मिलकर कीमती धातुओं की मांग को मजबूत किया है।

US में कमजोर जॉब्स डेटा से कम हुई ब्याज दरें बढ़ाने की उम्मीदें

हालिया तेजी की एक मुख्य वजह US जॉब मार्केट से आई। US ब्यूरो ऑफ लेबर स्टैटिस्टिक्स ने 7 अगस्त, 2026 को रिपोर्ट दी कि जुलाई में नॉन-फ़ार्म पेरोल में 23,000 की गिरावट आई, जबकि बाजार को लगभग 80,000 नई नौकरियों की उम्मीद थी। जून के आंकड़ों को भी नीचे की ओर संशोधित किया गया, जबकि मई और जून के संयुक्त संशोधनों से पहले के अनुमानों में लगभग 103,000 नौकरियों की कमी आई।

इस रिपोर्ट के आने के बाद, स्पॉट गोल्ड 2.67% बढ़कर USD 4,352.60 हो गया, जबकि चांदी 4.20% बढ़कर USD 63.97 हो गई, क्योंकि ट्रेडर्स ने सितंबर में फ़ेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की उम्मीदें कम कर दीं।

बाजार अब सितंबर में 25 बेसिस पॉइंट की ब्याज दर बढ़ोतरी की संभावना लगभग 44% मान रहा है, जबकि एक हफ्ते पहले यह संभावना 67% थी। सोने पर कोई ब्याज या डिविडेंड नहीं मिलता है, इसलिए ब्याज दरें कम रहने की उम्मीद से इस मेटल को रखने की ‘अपॉर्चुनिटी कॉस्ट’ कम हो सकती है और इसकी मांग को बढ़ावा मिल सकता है।

फेडरल रिजर्व के ब्याज दर पर फैसले पर नजर

फेडरल ओपन मार्केट कमेटी ने 29 जुलाई को अपनी बेंचमार्क ब्याज दर को 3.50% से 3.75% के दायरे में बनाए रखने के लिए 9-3 से वोट किया। हालांकि फेडरल रिजर्व ने पॉलिसी में किसी बड़े बदलाव का साफ संकेत नहीं दिया है, लेकिन कमजोर रोजगार डेटा और दरों को स्थिर रखने के फैसले ने निकट भविष्य में ब्याज दरें बढ़ने की उम्मीदों को कम कर दिया है।

कीमती धातुओं के लिए अगला बड़ा ट्रिगर इस सप्ताह के आखिर में आने वाला अमेरिकी महंगाई का डेटा है। कमजोर पेरोल रिपोर्ट से सितंबर में ब्याज दरें बढ़ाने के लिए फेडरल रिजर्व पर दबाव कम हो सकता है, हालांकि उम्मीद से ज्यादा महंगाई दर बढ़ने की उम्मीदों को फिर से जगा सकती है और सोने-चांदी पर दबाव डाल सकती है।

सेंट्रल बैंक की रिकॉर्ड खरीदारी से सोने को मिला सहारा

कीमतों में अल्पकालिक उतार-चढ़ाव के अलावा, सेंट्रल बैंक की मजबूत मांग ने सोने को एक मजबूत आधार दिया है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की ‘गोल्ड डिमांड ट्रेंड्स Q2 2026’ रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल-जून तिमाही के दौरान सेंट्रल बैंकों की शुद्ध सोने की खरीदारी 289 टन ​​तक पहुंच गई। यह Q1 2026 के स्तर से पांच गुना अधिक और रिकॉर्ड पर दूसरी तिमाही का सबसे अधिक आंकड़ा था।

सेंट्रल बैंक की खरीदारी एक साल पहले की इसी अवधि की तुलना में 62% अधिक थी। पोलैंड के नेशनल बैंक ने Q2 के दौरान 51 टन सोना जोड़ा, जिससे उसका भंडार 632 टन हो गया, जबकि पीपल्स बैंक ऑफ चाइना ने 33 टन सोना जोड़ा, जो Q4 2023 के बाद से उसकी सबसे बड़ी तिमाही खरीदारी थी।

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के नवीनतम सर्वेक्षण में भी सेंट्रल बैंक की मांग जारी रहने की मजबूत उम्मीदें दिखाई दीं। लगभग 89% उत्तरदाताओं को उम्मीद थी कि अगले वर्ष वैश्विक स्वर्ण भंडार में वृद्धि होगी, जबकि रिकॉर्ड 45% लोगों को उम्मीद थी कि वे अपने स्वयं के स्वर्ण भंडार में वृद्धि करेंगे।

ETF में फिर से निवेश बढ़ा

सोने को ETF की खरीदारी से भी सहारा मिला है। 20 जुलाई के बाद से एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड (ETF) में कुल बुलियन होल्डिंग में 24 टन की वृद्धि हुई है, जो अप्रैल की शुरुआत के बाद से निवेश के प्रवाह की सबसे तेज गति है।

ETF की मांग में यह वापसी ऐसे समय में हुई है जब सेंट्रल बैंक की खरीदारी अधिक बनी हुई है, जिससे इस पीली धातु के लिए निवेश की मांग का एक और स्रोत मिल रहा है। संस्थागत खरीदारी और ETF में फिर से निवेश बढ़ने से कीमतों को सहारा मिला है, भले ही ऊंची कीमतों के कारण गहनों की मांग पर दबाव बना हुआ है।

ब्रोकरेज हाउस क्या दे रहे अनुमान

जेपी मॉर्गन को उम्मीद है कि सोने की कीमतें $6,000 प्रति औंस तक पहुंच सकती है। गोल्डमैन सैक्स का अनुमान है कि इस साल के आखिर तक कीमते $5,400 के स्तर पर पहुंच सकती है। वहीं मेटल फोकस का अनुमान है कि कीमतें $6,000 प्रति औंस तक पहुंच सकती है। वहीं डॉयचे बैंक, एचएसबीसी और ING जैसे कई बैंक इस कैलेंडर साल की चौथी तिमाही तक सोने की कीमत $4,600 से $4,900 के बीच रहने का अनुमान लगा रहे है।

 

MCX पर सोना ₹1.53 लाख के पार, चांदी ₹2.36 के नीचे फिसली, जानें किस कारण बढ़ी मांग

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Gold Outlook: सोने में अगली तेजी में Gen Z का होगा बड़ा हाथ, जानिए WGC की रिपोर्ट क्या कहती है

Gold Outlook: गोल्ड के साथ रिश्ता बदल रहा है। इसमें जेनजी का बड़ा हाथ है। इस बारे में वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (डब्ल्यूजीसी) की नई रिपोर्ट में बताया गया है। इसमें कहा गया है कि इंडिया में गोल्ड में अगली बड़ी तेजी में सिर्फ ज्वेलरी की खरीदारी नहीं बल्कि टेक्नोलॉजी, डिजिटल फाइनेंस और न्यू-एज इनवेस्टमेंट प्रोडक्ट्स का हाथ होगा।

गोल्ड में निवेश के तरीके में आ रहा है बदलाव

WGC की स्वर्णिम उड़ान 20247 में कई दिलचस्प बातें बताई गई हैं। यह रिपोर्ट तब आई है, जब सोने की कीमतों में पिछले कुछ सालों में बड़ी तेजी से लोगों की खरीदारी की आदत में बदलाव आ रहा है। हालांकि, अब भी भारत में लोग ज्वेलरी पर काफी पैसे खर्च कर रहे हैं।

भारत में लोगों के पास 31000 टन सोना

इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में लोगों के पास 31,000 टन सोना है। इसकी कीमत करीब 315 लाख करोड़ रुपये (3.4 ट्रिलियन डॉलर) है। इसमें से ज्यादातर सोना घरों में बेकार पड़ा है। इस वजह से भारत में यह सबसे ज्यादा अंडरयूटिलाइज्ड एसेट है। हालांकि, इसके पीछे सोने को लेकर लोगों की पारंपरिक सोच है।

Gen Z गोल्ड को अलग नजरिए से देख रहे

WGC के मुताबिक, 1997 से 2012 के बीच जन्म लेने वाले लोग सोने को सिर्फ विरासत में मिले एसेट के रूप में नहीं देखते हैं। उनका जोर सोने की लिक्विडिटी और डिजिटल एक्सेस जैसी चीजों पर भी है। यही वजह है कि सिर्फ फिजिकल ज्वेलरी के बजाय वे डिजिटल गोल्ड और टेक्नोलॉजी आधारित इनवेस्टमेंट प्रोडक्ट्स में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं।

ज्वेलर्स युवा खरीदारों को अट्रैक्ट करने के तरीके तलाश रहे

इस रिपोर्ट में बताया गया है कि युवा इनवेस्टर्स गोल्ड में निवेश करने से पहले ऑनलाइन रिसर्च करते हैं। इस वजह से ज्वेलर्स इन नए कस्टमर्स को अट्रैक्ट करने के तरीके तलाश रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक, 2035 तक जेनजी की कंज्यूमर स्पेंडिंग करीब 2 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच सकती है। इसका असर भविष्य में इंडिया के गोल्ड मार्केट पर दिखेगा।

फाइनेंशियल ईकोसिस्टम का हिस्सा बना रहा गोल्ड

डब्ल्यूजीसी के मुताबिक, इंडिया में गोल्ड की डिमांड अब सिर्फ ज्वेलरी तक सीमित रहने वाली नहीं है। गोल्ड अब फाइनेंशियल ईकोसिस्टम का हिस्सा बन रहा है। इसमें गोल्ड मॉनेटाइजेशन स्कीम, रिसाइक्लिंग नेटवर्क, इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स, डिजिटल गोल्ड और बुलियन बैंकिंग का बड़ा हाथ हो सकता है। इस इंटिग्रेशन से घरों में पड़ा सोना भी इकोनॉमी का हिस्सा बन सकता है।

देश में सुस्त पड़ी गोल्ड की डिमांड लेकिन, खर्च ₹1.98 लाख करोड़ के रिकॉर्ड हाई पर

Gold Report: गोल्ड की बढ़ती चमक ने इसकी मांग सुस्त की लेकिन बिक्री वैल्यू रिकॉर्ड हाई लेवल पर पहुंच गई। इसका खुलासा वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के आंकड़ों से हुआ है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (World Gold Council- WGC) की भारत पर बनी ताजा रिपोर्ट के अनुसार इस साल 2026 की दूसरी तिमाही अप्रैल-जून 2026 में भारतीयों ने वॉल्यूम के हिसाब से कम सोना खरीदा लेकिन रिकॉर्ड ऊंची कीमतों के कारण सोने पर अब तक का सबसे अधिक खर्च किया। जून 2026 तिमाही में देश में गोल्ड की मांग सालाना आधार पर 6% घटकर 131 टन रह गई, जो हालिया वर्षों में साल की सबसे कमजोर जून तिमाही में से एक रही।। हालांकि जितनी भी डिमांड रही, उसकी वैल्यू 50% बढ़कर रिकॉर्ड ₹1.98 लाख करोड़ पर पहुंच गई, क्योंकि घरेलू बाजार में गोल्ड के भाव इस दौरान करीब 59% मजबूत हुए।

इस कारण कमजोर हुई गोल्ड की मांग

गोल्ड के सेल्स वॉल्यूम में गिरावट की मुख्य वजह इसके भाव में दो साल में ताबड़तोड़ तेजी रही। इसके अलावा मई के मध्य में आयात शुल्क में बढ़ोतरी, रुपये की कमजोरी और खरीदारी के लिए शुभ नहीं समझे जाने वाले महीने ने भी दबाव बनाया। इंटरनेशनल मार्केट में इसकी कीमतें कुछ नरम हुईं लेकिन आयात शुल्क और रुपये की कमजोरी के कारण भारत में इसके भाव ऊंचे बने रहे। हालांकि मार्च तिमाही की तुलना में जून तिमाही में अक्षय तृतीया और शादी-ब्याह के मौसम की खरीदारी के चलते ज्वेलरी की मांग 14% बढ़कर 75 टन हो गई लेकिन फिर भी सालाना आधार पर यह 15% कम रही और साल 2000 के बाद दूसरी सबसे कमजोर जून तिमाही रही।

बदला खरीदारी का तरीका

ऊंची कीमतों के बावजूद लोगों ने सोना खरीदना बंद नहीं किया, बल्कि अपनी खरीदारी का तरीका बदल दिया। ज्वेलर्स के मुताबिक हल्के वजन, कम कैरेट और स्टडेड (रत्न जड़ी) ज्वेलरी की मांग बढ़ी। पुराने गहने बदलकर नए खरीदने का चलन भी तेज हुआ और कुछ ज्वेलर्स के मुताबिक उनकी कुल बिक्री का 70% तक हिस्सा इसी के जरिए आया और जून तिमाही में इसमें 10–20% की तेजी आई। जून तिमाही में ज्वेलरी की खरीदारी वॉल्यूम के हिसाब से भले ही कम हुई लेकिन वैल्यू 34% बढ़कर ₹1.13 लाख करोड़ हो गई। इस दौरान भारत दुनिया का सबसे बड़ा ज्वेलरी मार्केट बना रहा और ग्लोबल ज्वेलरी डिमांड में उसकी हिस्सेदारी 27% रही।

बार, कॉइन्स और गोल्ड ईटीएफ मिलाकर इंवेस्टमेंट डिमांड तीन धमाकेदार तिमाही के बाद जून तिमाही में कमजोर हुई। निवेश की मांग घटकर 54 टन रह गई जबकि इससे पहले की तीन तिमाहियों में औसतन मांग 100 टन की थी। हालांकि जून तिमाही में मांग घटने के बावजूद यह लॉन्ग टर्म एवरेज से ऊपर बनी रही।

बार और सिक्कों की खरीदारी मार्च तिमाही की तुलना में 19% घटकर जून तिमाही में 50 टन रह गई, क्योंकि कीमतों में तेज उछाल के बाद निवेशकों ने कुछ समय के लिए इंतजार करना उचित समझा। फिर भी सालाना आधार पर यह 9% अधिक रहा और इस साल की पहली छमाही में बार और सिक्कों की खरीद 13 साल के रिकॉर्ड हाई लेवल पर पहुंच गई।

गोल्ड ईटीएफ की बात करें तो मार्च तिमाही में रिकॉर्ड निवेश के बाद जून तिमाही में इसकी मांग घटकर लगभग 4 टन रह गई। इसके बावजूद भारत उन देशों में शुमार रहा, जहां गोल्ड ईटीएफ में निवेश आया, जबकि अमेरिका और चीन जैसे देशों में निवेशकों ने पैसे निकाले। जून के अंत तक भारत में गोल्ड ईटीएफ की कुल होल्डिंग 119 टन और AUM (एसेट अंडर मैनेजमेंट) ₹1.7 लाख करोड़ तक पहुंच गईं।

सप्लाई की बात करें तो देश में गोल्ड की उपलब्धता घटकर 120 टन रह गई, जो पिछले छह साल का रिकॉर्ड निचला स्तर है। इसकी मुख्य वजह आयात शुल्क बढ़ने के बाद सोने के आयात में भारी गिरावट रही। तिमाही आधार पर इसमें 53% और सालाना आधार पर 22% की गिरावट आई। हालांकि वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की रिपोर्ट में इस बात का जिक्र किया गया है कि घरेलू बाजार में गोल्ड की कोई कमी नहीं थी। पहले से मौजूद स्टॉक और रिसाइकल्ड गोल्ड मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त रहा।

रिपोर्ट के मुताबिक ऊंची कीमतों के बावजूद लोगों ने पुराने गहने बेचने की बजाय उन्हें गिरवी रखकर कर्ज लेना अधिक पसंद किया। बैंकों में बकाया गोल्ड लोन सालाना आधार पर दोगुना होकर ₹5.1 लाख करोड़ पहुंच गया, जबकि एनबीएफसी कंपनियों का गोल्ड लोन पोर्टफोलियो 70% बढ़कर यह ₹3.3 लाख करोड़ तक पहुंच गया।

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सोना गिरकर ₹1.42 पर आया, चांदी ₹2400 हुई सस्ती, आखिर भारतीय खरीदारों के लिए कीमतों में उतार-चढ़ाव क्या दे रहा संकेत

Gold Silver Price Today: भारत में सोने- चांदी की कीमतों में गिरावट देखने को मिली। इस गिरावट की बड़ी वजह ग्लोबल मार्केट में कमजोरी रही। डॉलर में निचले स्तर से रिकवरी के कारण सोने-चांदी की हालिया तेजी को ब्रेक लगा है।

मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर, 5 अगस्त की डिलीवरी के लिए सोने का वायदा भाव 0.79% गिरकर ₹1.42 लाख प्रति 10 ग्राम हो गया, जबकि 4 सितंबर की डिलीवरी के लिए चांदी का वायदा भाव 2400 रुपये यानी 1% गिरकर ₹2.18 लाख प्रति किलोग्राम के नीचे फिसल गया है।

वहीं इंटरनेशनल मार्केट में COMEX गोल्ड फ्यूचर्स 0.39% गिरकर $4,144.40 प्रति औंस पर आ गया, जबकि COMEX सिल्वर फ्यूचर्स 0.22% गिरकर $58.89 प्रति औंस पर आ गया। पिछले सेशन में एक हफ्ते के उच्चतम स्तर पर पहुंचने के बाद स्पॉट गोल्ड की कीमत में भी थोड़ी गिरावट आई।

कीमतों में गिरावट क्यों?

घरेलू कीमतों में गिरावट काफी हद तक ग्लोबल ट्रेंड्स को दिखाती है। इस हफ्ते की शुरुआत में तेजी के बाद, सोने और चांदी पर दबाव बना क्योंकि अमेरिकी डॉलर जनवरी 2023 के बाद अपनी सबसे बड़ी एक-दिवसीय गिरावट से उबर गया। मजबूत डॉलर आमतौर पर कीमती धातुओं पर दबाव डालता है क्योंकि यह दूसरी करेंसी रखने वालों के लिए इन्हें महंगा बना देता है।

अमेरिकी फेडरल रिजर्व के ब्याज दरों को अपरिवर्तित रखने के फैसले के बाद बुलियन की कीमतों में बढ़ोतरी के बाद मुनाफावसूली ने भी गिरावट में योगदान दिया।

गिरावट के बावजूद सोने को क्यों मिल रहा सपोर्ट

हालांकि शुक्रवार 31 जुलाई की गिरावट के बावजूद, सोना 5 महीनों में अपनी पहली मासिक बढ़त दर्ज करने की राह पर है। इसे अमेरिकी मौद्रिक सख्ती (monetary tightening) की उम्मीदों में कमी और मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव से सपोर्ट मिल रहा है, जिससे सुरक्षित निवेश (safe-haven assets) के तौर पर सोने की मांग बढ़ी है।

हालिया अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों ने भी इन उम्मीदों को मजबूत किया है कि फेडरल रिजर्व भविष्य में ब्याज दरों के फैसलों पर सावधानी से आगे बढ़ सकता है। महंगाई के नरम आंकड़ों और आर्थिक विकास में नरमी के संकेतों ने बुलियन को सपोर्ट दिया है, हालांकि बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और मजबूत डॉलर ने बढ़त को सीमित रखा है।

अब क्या होनी चाहिए निवेश रणनीति

कोटक सिक्योरिटीज में कमोडिटी रिसर्च की AVP कायनात चेनवाला ने कहा, “कीमती धातुएं एक दायरे में बनी हुई हैं। अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों में नरमी से सपोर्ट मिल रहा है, जबकि मजबूत डॉलर, ऊंची बॉन्ड यील्ड और फेडरल रिजर्व के सख्त रुख (hawkish stance) से तेज बढ़त सीमित हो रही है। सोना और चांदी दोनों ही कई महीनों में अपनी पहली मासिक बढ़त की राह पर हैं।”

भारतीय खरीदारों के लिए इसका क्या मतलब है?

देश में सोने और चांदी की कीमतें इंटरनेशनल बुलियन की कीमतों, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये की चाल और इंपोर्ट से जुड़ी लागतों से प्रभावित होती हैं। नतीजतन, लोकल कीमतें अक्सर ग्लोबल ट्रेंड्स के हिसाब से चलती हैं, हालांकि घरेलू मांग और करेंसी में उतार-चढ़ाव इन बदलावों को बढ़ा या घटा सकते हैं।

अप्रैल-जून तिमाही के दौरान भारत में सोने की फिजिकल मांग पर दबाव बना रहा। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार, सोने की मांग में सालाना आधार पर 6% की गिरावट आई क्योंकि ऊंची कीमतों ने खरीदारी पर असर डाला। हालांकि, सोने पर कुल कंज्यूमर खर्च वैल्यू के हिसाब से रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया, जबकि त्योहारों और शादियों से जुड़ी खरीदारी के कारण पिछली तिमाही के मुकाबले ज्वैलरी की मांग में सुधार हुआ।

इन्वेस्टर्स को आगे किस पर नज़र रखनी चाहिए?

मार्केट आज बाद में यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन के कंज्यूमर सेंटीमेंट और महंगाई की उम्मीदों (इन्फ्लेशन एक्सपेक्टेशन्स) के डेटा पर बारीकी से नज़र रखेगा, ताकि अमेरिकी महंगाई के आउटलुक और फेडरल रिजर्व की पॉलिसी की दिशा के बारे में नए संकेत मिल सकें।

एनालिस्ट्स को यह भी उम्मीद है कि अमेरिकी डॉलर में उतार-चढ़ाव, ट्रेजरी यील्ड और वेस्ट एशिया में घटनाक्रम निकट भविष्य में सोने और चांदी की कीमतों के लिए मुख्य कारक बने रहेंगे।

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Gold Silver Rates Today: सोने और चांदी में बड़ी गिरावट, चांदी एक दिन में 6700 रुपये फिसली

Gold Silver Rates Today: सोने और चांदी में 8 जुलाई को बड़ी गिरावट आई। देश और विदेश में बुलियन में गिरावट की वजह क्रूड ऑयल की कीमतों में उछाल और डॉलर में मजबूती रही। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को कहा कि ईरान के साथ सीजफायर खत्म हो गया है। इस खबर का असर सोने और चांदी की कीमतों पर पड़ा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्पॉट गोल्ड 1.1 फीसदी गिरकर 4,061.32 डॉलर प्रति औंस पर आ गया। यूएस गोल्ड फ्यूचर्स में भी 2 फीसदी की गिरावट आई।

गोल्ड फ्यूचर्स और सिल्वर फ्यूचर्स में गिरावट

भारत में कमोडिटी एक्सचेंज एमएसीएक्स में गोल्ड फ्यूचर्स और सिल्वर फ्यूचर्स में गिरावट आई। गोल्ड फ्यूचर्स 1.16 फीसदी यानी 1,692 रुपये गिरकर 1,43,710 रुपये प्रति 10 ग्राम पर चल रहा था। सिल्वर फ्यूचर्स 2.93 फीसदी यानी 6,763 रुपये गिरकर 2,24,201 रुपये प्रति किलोग्राम पर चल रहा था। ट्रेडर्स का कहना है कि पश्चिम एशिया में तनाव फिर से बढ़ने से क्रूड ऑयल की कीमतों में उछाल आया है। इससे महंगाई बढ़ने का खतरा बढ़ा है।

बुलियन पर क्रूड ऑयल की कीमतों में उछाल का असर

ट्रंप ने बुधवार को कहा कि ईरान के साथ सीजफायर खत्म हो गया है। इसका मतलब है कि अमेरिका और ईरान के बीच स्थायी युद्धविराम को लेकर बातचीत की संभावना फिलहाल खत्म हो गई है। इस खबर से क्रूड ऑयल की कीमतें 6 फीसदी से ज्यादा चढ़ गईं। इससे महंगाई बढ़ेंगी। महंगाई को कंट्रोल में करने के लिए अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व इंटरेस्ट रेट बढ़ाएगा। इसका निगेटिव असर सोने की कीमतों पर पड़ेगा। फेड की मीटिंग के मिनट्स आज देर रात जारी होंगे। इससे पता चलेगा कि महंगाई को लेकर फेड की क्या सोच है।

फिर से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने का खतरा बढ़ा

लेमन मार्केट्स डेस्क में रिसर्च एनालिस्ट गौरव गर्ग ने कहा, “घरेलू बाजार में गोल्ड की कीमतों में नरमी आई। इसकी वजह मध्यपूर्व में जियोपॉलिटिकल टेंशन का बढ़ना है। फिर से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से ऑयल और गैस सहित दूसरी चीजों का आवागमन बाधित होगा। इस वजह से ऑयल की कीमतों में उछाल आया।” आज लगातार तीसरा दिन है जब सोने में गिरावट आई है।

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गोल्ड की कीमतों में ज्यादा गिरावट की उम्मीद नहीं

एक्सपर्ट्स का कहना है कि गोल्ड की कीमतों पर आगे दबाव दिख सकता है। हालांकि, दुनिया के केंद्रीय बैंकों की खरीदारी से सोने में बड़ी गिरावट की उम्मीद नहीं है। कुछ समय तक इसकी कीमतें सीमित दायरे में ऊपर-नीचे जा सकती हैं। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की रिपोर्ट के मुताबिक, मई में केंद्रीय बैंकों ने गोल्ड में निवेश बढ़ाया। खबर है कि तंजानिया के केंद्रीय बैंक ने बीते 18 महीनों में करीब 28 टन सोना खरीदा है।

Gold Outlook: 2026 की दूसरी छमाही में घटेंगे या बढ़ेंगे सोने के दाम? वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की रिपोर्ट ने बताए बड़े ट्रिगर

Gold Outlook: 2026 की दूसरी छमाही में सोने की चाल कई बड़े फैक्टर्स पर निर्भर करेगी। इनमें सबसे अहम हैं भू-राजनीतिक तनाव, ब्याज दरें और निवेशकों का रुख। यह बात वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (WGC) ने अपनी Gold Mid-Year Outlook 2026 रिपोर्ट में कही है।

इस साल की पहली छमाही सोने के लिए काफी उतार-चढ़ाव वाली रही। जनवरी के आखिर में सोना 5,405 डॉलर प्रति औंस के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। इसके बाद जून में कीमत गिरकर 4,002 डॉलर प्रति औंस तक आ गई। यानी रिकॉर्ड हाई से 26% की गिरावट। इसके बावजूद पिछले एक साल में सोना सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले एसेट्स में शामिल है। इसकी कीमतों में उतार-चढ़ाव भी बढ़ा है और वोलैटिलिटी 30% तक पहुंच गई है।

सबसे बड़ा असर किसका रहा?

WGC का कहना है कि पहली छमाही में अमेरिका-ईरान तनाव जैसे भू-राजनीतिक घटनाक्रमों ने सोने को सबसे ज्यादा सपोर्ट दिया। इसके अलावा निवेशकों की खरीद-बिक्री और मुनाफावसूली का भी असर दिखा।

रिपोर्ट के मुताबिक, सोने की कीमतों में सबसे ज्यादा हलचल एशिया और अमेरिका के ट्रेडिंग घंटों के दौरान हुई। इससे साफ है कि अब एशियाई निवेशकों की भूमिका पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है।

आगे क्या हो सकता है?

WGC का मानना है कि मौजूदा कीमतें इस उम्मीद को दिखाती हैं कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व इस साल अक्टूबर तक कम से कम एक बार ब्याज दर बढ़ा सकता है। इसके अलावा Bank of England, Bank of Japan और European Central Bank भी सख्त मौद्रिक नीति जारी रख सकते हैं।

अगर ऐसा होता है तो साल के आखिर तक सोना करीब 4,100 डॉलर प्रति औंस के आसपास रह सकता है। इसमें करीब 5% ऊपर या नीचे का उतार-चढ़ाव संभव है।

किन वजहों से बढ़ सकती हैं कीमतें?

अगर दुनिया में तनाव बढ़ता है, अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ती है या ब्याज दरों को लेकर बाजार की सोच बदलती है, तो सोना फिर से तेजी पकड़ सकता है। हालांकि 4,500 डॉलर प्रति औंस से ऊपर जाने के लिए दुनिया की अर्थव्यवस्था में बड़ी सुस्ती जैसी स्थिति बननी होगी।

दूसरी तरफ, अगर अमेरिकी डॉलर मजबूत होता है, ब्याज दरें उम्मीद से ज्यादा बढ़ती हैं और निवेशक शेयर जैसे जोखिम वाले एसेट्स की तरफ लौटते हैं, तो सोने पर दबाव बन सकता है।

WGC का कहना है कि अगर सोना 4,000 डॉलर प्रति औंस से नीचे टिकता है तो बिकवाली बढ़ सकती है। लेकिन इतिहास बताता है कि बड़ी गिरावट के बाद केंद्रीय बैंक, बड़े निवेशक और आम खरीदार फिर से खरीदारी शुरू कर देते हैं। इससे कीमतों को सहारा मिल सकता है।

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