पानी की भारी किल्लत, पिछले साल के मुकाबले आधे रह गए जलाशय, क्या प्यासा रहेगा देश?

देश के कई राज्यों में कम बारिश का असर अब जलाशयों पर दिख रहा है। 1 अक्टूबर तक देश के प्रमुख जलाशयों में 71.84% पानी था। पिछले साल इसी समय यह 90.31% था, जबकि सामान्य स्तर 81.79% है। यानी इस बार जलाशयों में पानी पिछले साल के मुकाबले काफी कम है।

पानी की कमी का असर महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, राजस्थान और तमिलनाडु में ज्यादा दिख रहा है। कई इलाकों में खेती के लिए पानी कम पड़ रहा है और फसलों को भी नुकसान हो रहा है।

आंध्र प्रदेश में तेजी से घटा पानी का लेवल

आंध्र प्रदेश में जलाशयों का पानी काफी कम हो गया है। 1 अक्टूबर तक यहां सिर्फ 35.14% पानी बचा था। पिछले साल इसी समय यह 88.60% था, जबकि सामान्य स्तर 71.85% है। कम बारिश और फसल खराब होने से राज्य के आधे से ज्यादा हिस्से में सूखा घोषित किया गया है।

कर्नाटक में सूखे जैसे हालात

1 अक्टूबर तक कर्नाटक के जलाशयों में 59.98% पानी था। पिछले साल इसी समय यह 89.16% और सामान्य स्तर 80.42% था।

पानी का स्तर कम होने से राज्य में सिंचाई और खेती को लेकर चिंता बढ़ रही है। सूखे जैसे हालात का असर किसानों पर भी दिखाई दे रहा है।

महाराष्ट्र में मराठवाड़ा और विदर्भ की हालत खराब

5 अक्टूबर तक महाराष्ट्र के जलाशयों में 74.29% पानी था। पिछले साल इसी तारीख को यह 89.22% था। मराठवाड़ा और विदर्भ में कई जलाशयों की स्थिति इससे भी ज्यादा खराब है।

• छत्रपति संभाजीनगर में पानी का भंडार 43.55% था, जबकि पिछले साल 82.96% था।

• अमरावती में इस बार 62.92% पानी रहा, जो पिछले साल 85.87% था।

• नागपुर में पानी का स्तर 72.02% रहा, जबकि पिछले साल यह 89.08% था।

कई इलाकों में फसलें खराब हुई हैं। अगर अगले फसल सीजन तक पानी की स्थिति नहीं सुधरी, तो किसानों और गांवों में रहने वाले परिवारों की मुश्किल बढ़ सकती है।

राजस्थान में कई इलाकों में सूखे का असर

5 अक्टूबर तक राजस्थान के जलाशयों में 61.93% पानी था। जोधपुर में हालात ज्यादा खराब हैं। यहां सिर्फ 15.72% पानी बचा है, जबकि पिछले साल इसी समय 80.25% पानी था।

पाली, जालौर और जैसलमेर में सूखे की स्थिति का जायजा लिया जा रहा है। जोधपुर, बांसवाड़ा, भीलवाड़ा, बालोतरा, राजसमंद, उदयपुर और सिरोही भी प्रभावित इलाकों में शामिल हैं।

कम बारिश का असर बाजरा, मोठ, सोयाबीन, मूंग और दूसरी खरीफ फसलों पर भी पड़ा है। राज्य सरकार ने कुछ इलाकों में सूखे से राहत के लिए कदम उठाए हैं।

तेलंगाना में सूखा घोषित करने की मांग

तेलंगाना के जलाशयों में भी पानी काफी कम है। 1 अक्टूबर तक यहां 40.75% पानी था, जबकि पिछले साल इसी समय 86.10% था। सामान्य स्तर 78.95% है।

कम बारिश और फसल के नुकसान को देखते हुए विपक्षी दल सूखा घोषित करने की मांग कर रहे हैं। पानी का स्तर कम होने से आने वाले समय में खेती और पीने के पानी को लेकर चिंता बढ़ सकती है।

तमिलनाडु में भी बड़ा अंतर

तमिलनाडु में 1 अक्टूबर तक जलाशयों में 37.27% पानी था। पिछले साल इसी समय यह 91.96% था। राज्य का सामान्य स्तर 66% है।

यानी इस बार पानी का भंडार पिछले साल के मुकाबले काफी नीचे है। इससे सिंचाई और आने वाले फसल सीजन को लेकर चिंता बढ़ सकती है।

केरल की स्थिति सामान्य से नीचे

केरल में जलाशयों का स्टोरेज 59.88% था। पिछले साल यह 76.06% और सामान्य स्तर 69.75% था। यहां भी पानी का भंडार पिछले साल और सामान्य स्तर दोनों से कम है।

कम पानी से बढ़ सकती है ये परेशानियां

• जलाशयों में पानी कम होने का सीधा असर सिंचाई और पीने के पानी पर पड़ सकता है। इसके साथ ही पनबिजली उत्पादन पर भी दबाव आ सकता है।

• सूखे की स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो किसानों की फसल और कमाई प्रभावित हो सकती है। ग्रामीण इलाकों में काम के मौके घटने से लोगों के दूसरे जगहों पर जाने का खतरा भी बढ़ सकता है।

• महाराष्ट्र की महिला एवं बाल विकास मंत्री अदिति तटकरे ने यह भी चेतावनी दी है कि सूखे के दौरान बाल विवाह के मामले बढ़ सकते हैं।

आने वाले कुछ हफ्ते काफी अहम हैं। अच्छी बारिश हुई तो जलाशयों में पानी बढ़ सकता है और खेती की परेशानी कुछ कम हो सकती है। लेकिन बारिश कम हुई तो पानी की कमी और फसल के नुकसान से किसानों और ग्रामीण परिवारों की मुश्किल बढ़ सकती है।

बड़ी खबर, आंध्र प्रदेश के 21 जिलों में सूखा घोषित! जानिए कितने मंडलों पर पड़ा असर

आंध्र प्रदेश में बारिश की कमी और फसल खराब होने के बाद सरकार ने राज्य के आधे से ज्यादा हिस्से को सूखाग्रस्त घोषित किया है। सरकार के मुताबिक, 21 जिलों के 388 मंडलों में सूखे की स्थिति है। इससे किसानों के सामने फसल और पानी दोनों का संकट खड़ा हो गया है।

राज्य में कुल 688 मंडल हैं। इनमें से 388 मंडलों को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है। यानी करीब 56 फीसदी मंडल अब सूखे से प्रभावित माने जा रहे हैं।

सरकार ने सूखे की स्थिति को दो श्रेणियों में बांटा है:

1. 283 मंडलों को गंभीर सूखे की श्रेणी में रखा गया है।

2. 105 मंडलों में मध्यम सूखे की स्थिति बताई गई है।

रायलसीमा और दक्षिण आंध्र में ज्यादा असर

रायलसीमा और दक्षिण आंध्र के इलाके सूखे से सबसे ज्यादा प्रभावित बताए जा रहे हैं। बारिश कम होने से कई इलाकों में खेती पर सीधा असर पड़ा है।

इन फसलों का हुआ नुकसान

• धान

• मक्का

• नारियल

• मूंगफली

• अरहर

• कपास

इन फसलों के नुकसान के साथ किसानों को पानी की कमी का भी सामना करना पड़ रहा है।

विपक्ष ने मांगा इन सवालों का जवाब

सरकार की ओर से सूखे की घोषणा के बाद विपक्ष ने इसके आकलन पर सवाल उठाए हैं। विपक्ष का कहना है कि कुछ ऐसे मंडलों को भी सूखाग्रस्त सूची में शामिल किया जाना चाहिए, जहां हालात गंभीर हैं।

विपक्ष ने खास तौर पर नेल्लोर के कुछ इलाकों का जिक्र करते हुए कहा है कि वहां सूखे का असर होने के बावजूद कई मंडलों को सूची में शामिल नहीं किया गया।

कर्नाटक और महाराष्ट्र के बाद आंध्र में भी सूखा

आंध्र प्रदेश में यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब कर्नाटक और महाराष्ट्र भी बारिश की कमी और फसल के नुकसान के चलते सूखे की घोषणा कर चुके हैं। इससे कई राज्यों में किसानों और खेती पर कम बारिश का असर साफ दिखाई दे रहा है।

El Nino Impact: 2 दशकों में सबसे कमजोर मानसून का खतरा! अल नीनो ने बढ़ाई चिंता, जानिए अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर

El Nino Impact: भारत में इस साल करीब दो दशकों का सबसे कमजोर मानसून रह सकता है। मौसम विभाग के दो वरिष्ठ सूत्रों के मुताबिक, इस साल मानसून सीजन खत्म होने तक बारिश लंबी अवधि के औसत से करीब 15 फीसदी कम रहने का अनुमान है। अगर ऐसा होता है तो 2009 के बाद यह सबसे कम बारिश वाला मानसून होगा।

वहीं, कमजोर मानसून का सीधा असर देश की खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। फसलों की पैदावार घट सकती है, खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ सकते हैं और गांवों में लोगों की आमदनी पर भी दबाव पड़ सकता है। बता दें कि भारत में सालभर होने वाली कुल बारिश का करीब 70 फीसदी हिस्सा मानसून से ही मिलता है, इसलिए अच्छी बारिश खेती के लिए बेहद जरूरी है।

कपास-सोयाबीन की पैदावार पर पड़ेगा असर

अब अगर सितंबर के महत्वपूर्ण महीने में अच्छी बारिश नहीं हुई तो कपास, सोयाबीन, मक्का और दालों जैसी ग्रीष्म ऋतु में बोई जाने वाली फसलों की पैदावार कम हो सकती है, साथ ही गेहूं और रेपसीड जैसी शीतकालीन ऋतु में बोई जाने वाली फसलों के लिए आवश्यक मिट्टी की नमी भी कम हो सकती है।

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “हम मानसून की बारिश पर अल नीनो का प्रभाव देख रहे हैं। सितंबर में यह प्रभाव गंभीर होने की संभावना है और बारिश में दो अंकों की कमी देखने को मिल सकती है।”

उन्होंने कहा कि जून-सितंबर के मौसम में भारत में औसत से 15% कम, यानी सामान्य से 85% कम बारिश हो सकती है, जो 2009 के बाद सबसे कम बारिश होगी। यह मौसम विभाग के शुरुआती पूर्वानुमान में अनुमानित 8% की कमी से लगभग दोगुनी होगी।

उन्होंने आगे कहा कि कुछ पूर्वी राज्यों को छोड़कर, देश के अधिकांश हिस्सों में सितंबर में औसत से कम बारिश होने की संभावना है, जिससे मौसमी कमी और बढ़ जाएगी।

हालांकि, IMD इस महीने के अंत तक सितंबर की बारिश को लेकर अपना आधिकारिक पूर्वानुमान जारी कर सकता है।

समय से पहले लौट सकता है मानसून

मौसम विभाग के एक अन्य सूत्र ने आधिकारिक नियमों के अनुसार नाम न बताने की शर्त पर कहा कि यदि कोई नई मौसम प्रणाली विकसित नहीं होती है, तो इस साल मानसून अगले महीने देश के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों से सामान्य से कुछ दिन पहले ही लौटना शुरू कर सकता है।

गौरतलब है कि आमतौर पर मानसून जून में दस्तक देता है और 17 सितंबर के आसपास उत्तर-पश्चिमी हिस्सों से वापस लौटना शुरू करता है। इसके बाद अक्टूबर के मध्य तक पूरे देश से मानसून की विदाई हो जाती है।

उन्होंने बताया कि अल नीनो मजबूत हो रहा है और सितंबर में इसके और तीव्र होने की संभावना है, जिससे भारत में वर्षा कम हो सकती है।

अल नीनो क्या है?

अल नीनो एक जलवायु पैटर्न है जिसमें मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान असामान्य रूप से गर्म रहता है। यह वैश्विक मौसम पैटर्न को बाधित करता है और दक्षिण-पूर्व एशिया और अन्य क्षेत्रों में शुष्क परिस्थितियां ला सकता है।

पिछले वर्षों में भारत में अल नीनो वाले ज्यादातर सालों में सामान्य से कम बारिश हुई है। कई बार स्थिति इतनी गंभीर रही कि सूखे की वजह से फसलें बर्बाद हो गईं और सरकार को कुछ अनाज के निर्यात पर रोक या प्रतिबंध लगाने जैसे कदम उठाने पड़े।

इस साल भी मानसून की शुरुआत से अब तक भारत में सामान्य से 13 फीसदी कम बारिश हुई है। 1 जून से शुरू हुए मानसून सीजन में जून में बारिश 35.4 फीसदी कम रही। इसके बाद जुलाई में बारिश सामान्य से 1 फीसदी ज्यादा हुई, जिससे थोड़ी राहत मिली। हालांकि अगस्त में मानसून एक बार फिर कमजोर पड़ गया और अब तक इस महीने में सामान्य से 15 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है।

यह भी पढ़ें: मॉस्को में विदेश मंत्री जयशंकर को देखते ही पुतिन ने पीएम मोदी के लिए कही ये बात फिर भारत संग दोस्ती पर दिया बड़ा बयान

Monsoon 2026: मौसम विभाग ने बताया किन 5 बड़े कारण से थमी मानसून की रफ्तार, क्या किसानों के लिए है ये चिंता की बात?

Monsoon 2026: इस साल मानसून की शुरुआत तो अच्छी रही, लेकिन अब इसकी रफ्तार धीमी पड़ गई है। मौसम विभाग (IMD) के मुताबिक, 22 जून तक देश में सामान्य से करीब 43% कम बारिश हुई है। मानसून फिलहाल दक्षिण महाराष्ट्र के आसपास अटका हुआ है। इसका असर मध्य भारत, पूर्वोत्तर, दक्षिण भारत और उत्तर-पश्चिम भारत के कई इलाकों में दिख रहा है, जहां बारिश उम्मीद से काफी कम हुई है।

यह स्थिति किसानों के लिए चिंता बढ़ाने वाली है, क्योंकि खरीफ फसलों की बुआई का यही सबसे अहम समय होता है। अगर बारिश में ज्यादा देरी होती है, तो खेती और पानी की उपलब्धता दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

कितनी कम हुई है बारिश?

IMD के मुताबिक, 20 जून तक देश में सिर्फ 45.6 मिमी बारिश दर्ज की गई थी। इस समय तक सामान्य तौर पर 84.4 मिमी बारिश होनी चाहिए थी। यानी बारिश करीब 46% कम रही। 22 जून तक यह कमी थोड़ी घटकर 43% पर पहुंची।

यह तुलना लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) से की जाती है। आसान भाषा में कहें तो यह कई दशकों की औसत बारिश का आंकड़ा होता है।

आखिर मानसून आगे क्यों नहीं बढ़ रहा?

मौसम विभाग का कहना है कि फिलहाल मानसून के लिए जरूरी सही हालात नहीं बन रहे हैं। इसी वजह से मानसून की चाल धीमी पड़ गई है। IMD ने इसके पीछे पांच बड़ी वजहें बताई हैं।

1. अरब सागर से नमी कम आ रही है

मानसून को आगे बढ़ाने में अरब सागर की बड़ी भूमिका होती है। यहां से आने वाली नम हवाएं देश के अलग-अलग हिस्सों तक पानी पहुंचाती हैं और बारिश कराती हैं।

लेकिन इस समय अरब सागर से वैसी मजबूत नम हवाएं नहीं आ रही हैं। नतीजा यह है कि बादल कम बन रहे हैं और बारिश की गतिविधियां कमजोर पड़ गई हैं।

2. मानसूनी हवाएं कमजोर हो गई हैं

मौसम विभाग के मुताबिक, अरब सागर के ऊपर चलने वाली दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी हवाओं की ताकत कम हो गई है।

इसी वजह से महाराष्ट्र और उसके आसपास के अंदरूनी इलाकों तक पर्याप्त नमी नहीं पहुंच रही। जब नमी कम पहुंचेगी तो बादल भी कम बनेंगे और बारिश भी कम होगी।

3. हिंद महासागर से भी कम मिल रही मदद

मानसून को नमी पहुंचाने में हिंद महासागर की भी अहम भूमिका होती है। भूमध्य रेखा पार करके आने वाली हवाएं काफी मात्रा में नमी लेकर आती हैं।

लेकिन पिछले कुछ हफ्तों में ये हवाएं भी कमजोर पड़ गई हैं। इसका असर पूरे देश की मानसूनी गतिविधियों पर दिखाई दे रहा है।

4. बारिश कराने वाले बड़े सिस्टम नहीं बन रहे

आमतौर पर कम दबाव का क्षेत्र, चक्रवाती परिसंचरण और दूसरे मौसमीय सिस्टम बनते हैं, जो मानसून को आगे बढ़ाने और अच्छी बारिश कराने में मदद करते हैं।

लेकिन फिलहाल अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में ऐसा कोई मजबूत सिस्टम नहीं बना है। यही वजह है कि मानसून की चाल थम सी गई है।

5. MJO भी कमजोर पड़ गया है

मेडन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO) नाम का एक मौसमीय सिस्टम भी बारिश को प्रभावित करता है। जब यह सक्रिय रहता है तो दक्षिण भारत के ऊपर ज्यादा बादल बनते हैं और बाद में ये बादल मानसूनी हवाओं के साथ उत्तर भारत की तरफ बढ़ते हैं।

लेकिन फिलहाल MJO कमजोर स्थिति में है। इसका असर भी बारिश पर पड़ रहा है।

क्या अल नीनो भी बारिश कम कर रहा है?

मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि इसका असर भी दिख रहा है। IMD ने कहा है कि प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति बनी हुई है और मानसून के दौरान इसके और मजबूत होने की संभावना है।

अल नीनो के दौरान समुद्र का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। इतिहास बताता है कि ऐसे समय भारत में मानसून अक्सर कमजोर पड़ जाता है। इसी वजह से बारिश कम होने की आशंका बढ़ जाती है।

IOD से भी नहीं मिल रही मदद

भारतीय महासागर द्विध्रुव यानी IOD फिलहाल तटस्थ स्थिति में है। इसका मतलब है कि यह न तो मानसून को मजबूत कर रहा है और न ही उसे कमजोर कर रहा है।

कई बार सकारात्मक IOD, अल नीनो के असर को कुछ हद तक कम कर देता है। लेकिन इस बार फिलहाल ऐसी कोई मदद नहीं मिल रही है।

किसानों की क्यों बढ़ रही परेशानी?

मानसून का रुकना ऐसे समय हुआ है, जब किसान धान, सोयाबीन, कपास, मक्का जैसी खरीफ फसलों की बुआई कर रहे हैं। इन फसलों को शुरुआती दौर में अच्छी बारिश की जरूरत होती है।

अगर आने वाले दिनों में बारिश नहीं बढ़ती, तो बुआई प्रभावित हो सकती है। जलाशयों में पानी कम जमा होगा और आगे चलकर सिंचाई पर भी असर पड़ सकता है। यही वजह है कि किसान, मौसम वैज्ञानिक और सरकार सभी आने वाले हफ्तों की बारिश पर नजर बनाए हुए हैं।

कल का मौसम 24 जून: IMD ने इन 9 राज्यों में भारी बारिश और बिहार समेत 16 राज्यों में आंधी-तूफान का अलर्ट दिया, चेक करें India Weather

Monsoon: इन 5 कारणों से महाराष्ट्र में फंसा मानसून, खरीफ फसलों पर पड़ सकता है असर

Monsoon: दक्षिण-पश्चिम मानसून के दक्षिण महाराष्ट्र में रुके रहने के कारण देश में 4 जून से 18 जून के बीच बारिश में 41 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। भारत मौसम विभाग (IMD) के अनुसार, इस दौरान देश में सामान्य 72.2mm बारिश के मुकाबले केवल 42.6mm बारिश हुई है। IMD के क्षेत्रवार आंकड़ों के मुताबिक, मध्य भारत में 67%, पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में 42%, दक्षिणी प्रायद्वीप में 22%  और उत्तर-पश्चिम भारत में 6% बारिश की कमी दर्ज की गई है।

मौसम विभाग ने गुरुवार को बताया कि “बड़े पैमाने पर अनुकूल मौसमी परिस्थितियों की कमी” ही मुख्य वजह है, जिसके कारण पिछले कुछ दिनों में दक्षिण-पश्चिम मानसून महाराष्ट्र के बाकी हिस्सों में आगे नहीं बढ़ पाया है।

मानसून के उत्तर की ओर बढ़ने में देरी के पीछे कुल 5 प्रमुख कारण हैं:

पहला कारण यह है कि वर्तमान मानसून प्रवाह को अरब सागर से मजबूत “सर्ज” यानी तेज और स्थिर हवाओं का सपोर्ट नहीं मिल रहा है। मौसम विभाग के अनुसार, “आम तौर पर ऐसी तेज हवाएं ही नमी को बढ़ाने और बड़े पैमाने पर बारिश कराने के लिए जिम्मेदार होती हैं, जिससे मानसून आगे बढ़ता है।”

दूसरा कारण यह है कि अरब सागर में मानसून से जुड़ी निचले स्तर की दक्षिण-पश्चिमी हवाएं कमजोर पड़ गई हैं। इसके चलते महाराष्ट्र के तटीय और अंदरूनी इलाकों तक नमी (moisture) का प्रवाह कम हो गया है।

तीसरा कारण पश्चिमी हिंद महासागर और अरब सागर में क्रॉस-इक्वेटोरियल फ्लो का कमजोर होना है, जो दक्षिण-पश्चिम मानसून के लिए मुख्य नमी स्रोत माना जाता है। आईएमडी के अनुसार, इस प्रवाह के कमजोर होने से मानसून की गतिविधि भी प्रभावित हुई है।

चौथा कारण यह है कि अभी अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में कोई मजबूत मौसमीय सिस्टम नहीं है, जैसे निम्न दबाव क्षेत्र (Low Pressure Area), चक्रवाती परिसंचरण या पश्चिमी तट के साथ सक्रिय ऑफशोर ट्रफ। ये सिस्टम सामान्यतः मानसून को आगे बढ़ाने में मदद करते हैं, लेकिन फिलहाल इनकी कमी है।

आखिरी वजह मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO) का कमजोर दौर है। यह हवा, बादलों और दबाव का एक चलता-फिरता सिस्टम है जो भूमध्य रेखा के चारों ओर घूमते हुए बारिश लाता है। जब यह सक्रिय होता है, तो दक्षिण भारत में अधिक बादल बनते हैं, जो मानसून हवाओं के साथ उत्तर की ओर बढ़कर ज्यादा बारिश कराते हैं। लेकिन अभी यह कमजोर स्थिति में है।

IMD के अनुसार, इसी वजह से अगले 4-5 दिनों तक महाराष्ट्र के अधिकतर हिस्सों में बारिश सीमित और केवल छिटपुट रहने की संभावना है।

अल नीनो से खरीफ फसलों पर पड़ेगा असर

दक्षिण-पश्चिम मानसून की उत्तर दिशा में धीमी गति और हाल ही में उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में उत्पन्न हुई अल नीनो की स्थिति, जिसके कारण भारत में कम बारिश हुई है, खरीफ फसलों के लिए गंभीर परिणाम ला सकती है, क्योंकि इन फसलों के फलने-फूलने के लिए समय पर बारिश जरूरी है।

शिवराज सिंह चौहान ने अधिकारियों को दिया निर्देश

इसी को देखते हुए मंगलवार को केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने निर्देश दिया कि ऐसे जिलों की पहचान की जाए जहां कम या असमान बारिश की संभावना है। साथ ही राज्यों के साथ मिलकर फसल-वार आपातकालीन (contingency) योजनाएं तैयार करने को कहा गया है, ताकि संभावित नुकसान को कम किया जा सके।

मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि जल संरक्षण, नमी प्रबंधन, अंतर-फसल खेती और वैकल्पिक फसल पैटर्न पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

चौहान ने निर्देश दिया कि हर जोखिम वाले जिले के लिए एक अलग और व्यावहारिक रणनीति बनाई जानी चाहिए ताकि खरीफ के मौसम में किसानों को कोई परेशानी न हो।

यह भी पढ़ें: आज का मौसम 19 June: IMD ने बिहार समेत इन 12 राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट दिया, राजस्थान से दिल्ली-NCR तक आंधी-तूफान का तांडव