Monsoon : 315 जिलों में कम बारिश की आशंका ने खरीफ की फसलों को लेकर बढ़ाई चिंता! कमजोर मानसून की ये तैयारियां शुरू

देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून की सुस्त रफ्तार ने कृषि क्षेत्र के सामने चिंता खड़ी कर दी है। देश के 315 जिलों में कम बारिश होने की आशंका जताई जा रही है। इसका सीधा असर खरीफ फसलों की बुवाई पर पड़ सकता है। हालांकि कमजोर मानसून के इस अनुमान को देखते हुए सरकार ने पहले से ही अपनी एडवांस तैयारियां शुरू कर दी हैं। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और कृषि आयुक्त पीके सिंह ने इसे लेकर विस्तार से जानकारी साझा की है।

40 से 43 फीसदी तक कम हुई बारिश, 111 जिले सबसे ज्यादा संवेदनशील

पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कहा कि मानसून में देरी हुई है और अब तक 43 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के पूर्वानुमान के मुताबिक 2 जुलाई को समाप्त होने वाले सप्ताह तक मानसून के कमजोर रहने की संभावना है। सरकार ने 111 जिलों को सबसे ज्यादा संवेदनशील के रूप में चिह्नित किया है, क्योंकि इन जिलों में सिंचाई की सुविधा 25 प्रतिशत से भी कम है। चिंता की बात यह है कि इन 111 सबसे संवेदनशील जिलों में से अकेले 20 जिले महाराष्ट्र में हैं।

जिला स्तर पर मानसून आकस्मिक योजनाएं तैयार

वहीं कृषि आयुक्त पीके सिंह ने बताया कि IMD से मिले इनपुट्स के आधार पर जिला स्तर पर मानसून आकस्मिक योजनाएं तैयार कर ली गई हैं। इन योजनाओं को वहां और तब लागू किया जाएगा जहां भी और जब भी बारिश की स्थिति के कारण इनकी आवश्यकता होगी। कृषि आयुक्त ने यह भी स्पष्ट किया कि देश में मौजूदा स्थितियां साल 2015 के सुपर अल नीनो जैसी ही दिख रही हैं। हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि साल 2015 की तुलना में आज देश की स्थिति बहुत बेहतर और कम संवेदनशील है क्योंकि तब से लेकर अब तक देश में सिंचाई के बुनियादी ढांचे और सुविधाओं का काफी विस्तार हुआ है।

गेहूं और चावल के भंडार मजबूत

खाद्य सुरक्षा और अनाज के संकट पर कृषि आयुक्त ने देशवासियों को आश्वस्त करते हुए कहा कि भारत के पास अनाज का बफर स्टॉक बिल्कुल सुरक्षित और आरामदायक स्थिति में है। देश में चावल और गेहूं का भंडार बहुत मजबूत स्थिति में है। इस बार चने की फसल भी बहुत अच्छी हुई है और इसका भंडार भी बेहतरीन है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि अगर कहीं कोई कमी आती है तो उसे देखा जाएगा। अगर जरूरत पड़ी तो अनाज या दालों का आयात भी किया जाएगा। अरहर का आयात पहले भी किया गया है और जरूरत पड़ने पर इस बार भी किया जाएगा।

कम पानी वाली फसलों की तरफ बढ़ रहे किसान, मूंग का रकबा बढ़ा

मानसून में देरी या सूखे जैसी स्थिति का एक सकारात्मक पहलू यह देखा जा रहा है कि देश के किसान अब कम पानी की खपत वाली फसलों की तरफ रुख कर रहे हैं। किसान अब उन दालों और तिलहन की बुवाई की ओर बढ़ रहे हैं जिन्हें कम पानी की आवश्यकता होती है और जो कम समय में तैयार हो जाती हैं। पिछले साल की तुलना में इस साल दालों और तिलहन का रकबा बढ़ा है। विशेषकर मूंग का रकबा इस बार काफी ज्यादा बढ़ गया है।

अब तक कुल खरीफ क्षेत्र के 10 प्रतिशत हिस्से को कवर किया जा चुका है। 22 जून 2026 तक सभी खरीफ फसलों का कुल रकबा 11.79 मिलियन हेक्टेयर रहा है, जो पिछले साल की इसी अवधि के 11.3 मिलियन हेक्टेयर से अधिक है। पश्चिम एशिया संकट के बीच उर्वरकों की उपलब्धता पर कृषि आयुक्त ने कहा कि सरकार का ध्यान एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन और उर्वरकों के अत्यधिक डायवर्जन को रोकने पर है। सॉइल हेल्थ कार्ड के जरिए किसानों को मिट्टी की जांच के आधार पर ही उर्वरकों का सीमित और सही इस्तेमाल करने की सलाह दी जा रही है।

फसलों के विविधीकरण से उर्वरकों की मांग अपने आप कम हो जाती है। जैसे अगर मक्के में 125 किलोग्राम नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है तो वहीं सोयाबीन में केवल 12.5 या 25 किलोग्राम की ही जरूरत होती है। सरकार दालों, तिलहन और कपास के विशेष मिशनों के जरिए किसानों को कम लागत और कम इनपुट वाली फसलों की ओर प्रोत्साहित कर रही है। अत्यधिक पानी और पोषक तत्वों की मांग करने वाले चावल (धान) के क्षेत्रों की समीक्षा की जा रही है ताकि वहां फसलों को डायवर्ट किया जा सके।

Monsoon: इन 5 कारणों से महाराष्ट्र में फंसा मानसून, खरीफ फसलों पर पड़ सकता है असर

Monsoon: दक्षिण-पश्चिम मानसून के दक्षिण महाराष्ट्र में रुके रहने के कारण देश में 4 जून से 18 जून के बीच बारिश में 41 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। भारत मौसम विभाग (IMD) के अनुसार, इस दौरान देश में सामान्य 72.2mm बारिश के मुकाबले केवल 42.6mm बारिश हुई है। IMD के क्षेत्रवार आंकड़ों के मुताबिक, मध्य भारत में 67%, पूर्व और पूर्वोत्तर भारत में 42%, दक्षिणी प्रायद्वीप में 22%  और उत्तर-पश्चिम भारत में 6% बारिश की कमी दर्ज की गई है।

मौसम विभाग ने गुरुवार को बताया कि “बड़े पैमाने पर अनुकूल मौसमी परिस्थितियों की कमी” ही मुख्य वजह है, जिसके कारण पिछले कुछ दिनों में दक्षिण-पश्चिम मानसून महाराष्ट्र के बाकी हिस्सों में आगे नहीं बढ़ पाया है।

मानसून के उत्तर की ओर बढ़ने में देरी के पीछे कुल 5 प्रमुख कारण हैं:

पहला कारण यह है कि वर्तमान मानसून प्रवाह को अरब सागर से मजबूत “सर्ज” यानी तेज और स्थिर हवाओं का सपोर्ट नहीं मिल रहा है। मौसम विभाग के अनुसार, “आम तौर पर ऐसी तेज हवाएं ही नमी को बढ़ाने और बड़े पैमाने पर बारिश कराने के लिए जिम्मेदार होती हैं, जिससे मानसून आगे बढ़ता है।”

दूसरा कारण यह है कि अरब सागर में मानसून से जुड़ी निचले स्तर की दक्षिण-पश्चिमी हवाएं कमजोर पड़ गई हैं। इसके चलते महाराष्ट्र के तटीय और अंदरूनी इलाकों तक नमी (moisture) का प्रवाह कम हो गया है।

तीसरा कारण पश्चिमी हिंद महासागर और अरब सागर में क्रॉस-इक्वेटोरियल फ्लो का कमजोर होना है, जो दक्षिण-पश्चिम मानसून के लिए मुख्य नमी स्रोत माना जाता है। आईएमडी के अनुसार, इस प्रवाह के कमजोर होने से मानसून की गतिविधि भी प्रभावित हुई है।

चौथा कारण यह है कि अभी अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में कोई मजबूत मौसमीय सिस्टम नहीं है, जैसे निम्न दबाव क्षेत्र (Low Pressure Area), चक्रवाती परिसंचरण या पश्चिमी तट के साथ सक्रिय ऑफशोर ट्रफ। ये सिस्टम सामान्यतः मानसून को आगे बढ़ाने में मदद करते हैं, लेकिन फिलहाल इनकी कमी है।

आखिरी वजह मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO) का कमजोर दौर है। यह हवा, बादलों और दबाव का एक चलता-फिरता सिस्टम है जो भूमध्य रेखा के चारों ओर घूमते हुए बारिश लाता है। जब यह सक्रिय होता है, तो दक्षिण भारत में अधिक बादल बनते हैं, जो मानसून हवाओं के साथ उत्तर की ओर बढ़कर ज्यादा बारिश कराते हैं। लेकिन अभी यह कमजोर स्थिति में है।

IMD के अनुसार, इसी वजह से अगले 4-5 दिनों तक महाराष्ट्र के अधिकतर हिस्सों में बारिश सीमित और केवल छिटपुट रहने की संभावना है।

अल नीनो से खरीफ फसलों पर पड़ेगा असर

दक्षिण-पश्चिम मानसून की उत्तर दिशा में धीमी गति और हाल ही में उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में उत्पन्न हुई अल नीनो की स्थिति, जिसके कारण भारत में कम बारिश हुई है, खरीफ फसलों के लिए गंभीर परिणाम ला सकती है, क्योंकि इन फसलों के फलने-फूलने के लिए समय पर बारिश जरूरी है।

शिवराज सिंह चौहान ने अधिकारियों को दिया निर्देश

इसी को देखते हुए मंगलवार को केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने निर्देश दिया कि ऐसे जिलों की पहचान की जाए जहां कम या असमान बारिश की संभावना है। साथ ही राज्यों के साथ मिलकर फसल-वार आपातकालीन (contingency) योजनाएं तैयार करने को कहा गया है, ताकि संभावित नुकसान को कम किया जा सके।

मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि जल संरक्षण, नमी प्रबंधन, अंतर-फसल खेती और वैकल्पिक फसल पैटर्न पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

चौहान ने निर्देश दिया कि हर जोखिम वाले जिले के लिए एक अलग और व्यावहारिक रणनीति बनाई जानी चाहिए ताकि खरीफ के मौसम में किसानों को कोई परेशानी न हो।

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