जिस काम को पूरा करने के लिए किसी कॉलेज स्टूडेंट को 7 से 10 दिन लग सकते थे, उसे AI ने महज 3 घंटे में कर दिखाया। इतना ही नहीं, इस काम के लिए मिलने वाले 4,000 रुपये भी बच गए। Anthropic के Claude AI से जुड़ा यह अनुभव रेडिट पर चर्चा का विषय बन गया है। एक यूजर की इस कहानी ने सवाल खड़ा कर दिया है कि अगर AI कम समय और कम खर्च में काम करने लगे, तो करियर की शुरुआत करने वाले युवाओं के लिए नौकरियों के अवसर कितने बचेंगे?
स्टूडेंट को देना चाहते थे ₹4,000, AI ने कर दिया काम
रेडिट के r/TwentiesIndia फोरम पर एक यूजर ने बताया कि वह स्टॉक एनालिसिस से जुड़ा एक काम करवाना चाहता था। इसके लिए उसने एक खास तरीका तैयार किया था, जिसके आधार पर Screener पर मौजूद कंपनियों के शेयरों की जांच करनी थी। यूजर के मुताबिक, इस काम में काफी समय लग सकता था। इसलिए उसने किसी कॉलेज स्टूडेंट को यह जिम्मेदारी सौंपने और बदले में 4,000 रुपये देने का विचार किया। यह ऐसा काम था, जिसे कोई शुरुआती स्तर का व्यक्ति भी निर्देशों के आधार पर पूरा कर सकता था।
दोस्त की सलाह पर आजमाया Claude AI
यूजर ने बताया कि उसने पहले भी इस काम को ऑटोमेट करने की कोशिश की थी, लेकिन उसकी प्रक्रिया में मानवीय समझ और निर्णय की जरूरत पड़ती थी। इस वजह से वह अपने आइडिया को सही तरीके से कोड में नहीं बदल पा रहा था। बाद में एक दोस्त की सलाह पर उसने दोबारा कोशिश की। रविवार को उसने Claude AI के साथ करीब तीन घंटे बिताए। इस दौरान उसने निर्देशों और लॉजिक में सुधार किया और सामने आई समस्याओं को ठीक किया। आखिरकार AI उसकी जरूरत के मुताबिक काम पूरा करने में सफल रहा। इस तरह यूजर के 4,000 रुपये बच गए। उसका कहना था कि सामान्य API कीमतों पर भी यह काम कुछ सौ रुपये में हो सकता था।
क्या फ्रेशर्स के काम AI की भेंट चढ़ जाएंगे?
इस अनुभव के बाद यूजर ने सवाल उठाया कि अगर AI छोटे और शुरुआती स्तर के काम आसानी से कर सकता है, तो एंट्री-लेवल नौकरियों का भविष्य क्या होगा? दरअसल, ऐसे काम ही अक्सर फ्रेशर्स को अनुभव हासिल करने और काम सीखने का मौका देते हैं।
रेडिट पर लोगों ने जताई चिंता
पोस्ट पर कई यूजर्स ने कहा कि AI की मदद लेना उपयोगी है, लेकिन जहां पूरी सटीकता जरूरी हो, वहां उसके नतीजों की जांच करना भी जरूरी है। कुछ लोगों ने चिंता जताई कि कंपनियां जूनियर कर्मचारियों को जो सामान्य काम देकर ट्रेनिंग देती थीं, अब उन्हीं कामों को AI से करवा सकती हैं। हालांकि, एक उदाहरण के आधार पर सभी शुरुआती नौकरियों के खत्म होने का दावा नहीं किया जा सकता। फिर भी यह घटना बताती है कि बदलती तकनीक के दौर में युवाओं के लिए AI को समझना, नई स्किल सीखना और अपनी क्षमताओं को लगातार बेहतर बनाना पहले से ज्यादा जरूरी होता जा रहा है।
डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर यूज़र द्वारा शेयर किए गए कंटेंट पर आधारित है। मनीकंट्रोल इन दावों की न तो स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है और न ही इनका समर्थन करता है।
अमेरिका में टेक्नोलॉजी स्टॉक्स में आई बड़ी गिरावट ने कई एशियाई शेयर बाजारों के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। अमेरिका में सेमीकंडक्टर्स शेयरों में लगातार 8 सत्रों में बिकवाली देखने को मिली। यह 2008 के बाद बिकवाली का सबसे लंबा सिलसिला था। इसका असर नैस्डेक 100 पर भी पड़ा। अप्रैल 2005 के बाद इसमें सबसे बड़ी गिरावट आई।
आईआई शेयरों की बदौलत अमेरिकी शेयर बाजारों में तेजी
पिछले 1.5-2 सालों में अमेरिका में एआई और सेमीकंडक्टर कंपनियों के शेयरों में जबर्दस्त तेजी आई है। इस सेक्टर को चिप और दूसरे हार्डवेयर सप्लाई करने वाली एशियाई कंपनियों के शेयरों में भी खूब तेजी आई है। इनमें दक्षिण कोरिया और ताइवान की कई कंपनियां शामिल हैं। अमेरिका में एआई बूम जारी रखने के लिए नए निवेश की जरूरत है। पहले ही इस सेक्टर में काफी ज्यादा निवेश हो चुका है।
एआई में निवेश घटा तो एशियाई शेयर बाजारों में मच सकता है कोहराम
अगर अमेरिका में एआई में निवेश की रफ्तार सुस्त पड़ती है तो इसका असर इस सेक्टर से जुड़ी एशियाई कंपनियों पर भी पड़ेगा। इसका संकेत दिखने लगा है। नियोक्लाउड ऑफर करने वाली कंपनी CoreWeave के बॉन्ड्स की कीमतों में बड़ी गिरावट देखने को मिली है। इससे इस सेक्टर पर बढ़ते दबाव का संकेत मिलता है। इनवेस्टर्स सवाल पूछ रहे है कि एआई और सेमीकंडक्टर्स कंपनियों ने जो निवेश किया है, क्या उसका रिटर्न मिलने जा रहा है? क्या AI की डिमांड इतनी है, जिससे इन कंपनियों के रेवेन्यू को सपोर्ट मिलेगा?
इंटरेस्ट रेट बढ़ने से एआई कंपनियों के लिए बढ़ रही इनवेस्टमेंट कॉस्ट
CoreWeave के शेयरों में 16 अक्तूबर को 12 फीसदी गिरावट आई। क्रूड की बढ़ती कीमतों ने एआई और सेमीकंडक्टर्स कंपनियों के लिए चिंता और बढ़ा दी है। क्रूड में उछाल से महंगाई बढ़ रही है, जिससे काबू में करने के लिए केंद्रीय बैंक इंटरेस्ट रेट्स बढ़ा रहे हैं। इससे इससे एआई कंपनियों के लिए नए निवेश की लागत भी बढ़ रही है। पिछले महीने अमेरिकी केंद्रीय बैंक इंटरेस्ट रेट 25 बेसिस प्वाइंट बढ़ा चुका है। अब नजरें इस महीने की फेड की पॉलिसी पर लगी हैं।
ताइवान और दक्षिण कोरिया की चिप कंपनियों को हो सकती है दिक्कत
ताइवान की TSMC, दक्षिण कोरिया की SK Hynix और Samsung Electronics जैसी कंपनियां AI कंप्यूटिंग के लिए जरूरी चिप और मेमोरी की सप्लाई करती हैं। इन कंपनियों की कमाई एआई इंफ्रास्ट्रक्चर में होने वाले इनवेस्टमेंटम पर निर्भर है। अगर एआई इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश घटता है तो इन कंपनियों की कमाई पर सीधा असर पड़ेगा। Gartner ने चेतावनी दी है कि एआई इंफ्रास्ट्रक्चर में 3.5 ट्रिलियन डॉलर के इनवेस्टमेंट को 2030 तक बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। इसकी वजह यह है कि इनवेस्टमेंट के अनुपात में रेवेन्यू नहीं दिख रहा।
कंपोनेंट्स बनाने वाली कंपनियों के शेयरों में 236% तक उछाल
Union Bancaire Privee में मैनेजिंग डायरेक्टर वी-सेर्न लिंग ने कहा, “अगर हायरपरस्केलर्स और नियोक्लाउड्स को निवेश जारी रखने के लिए फंड नहीं मिलता है तो इसका असर टीएसएमसी, सैमसंग और SK Hynix जैसी एशियाई कंपनियों पर पड़ेगा। उन्हें मिलने वाले ऑर्डर्स घट जाएंगे।” इस साल MSCI Asia-Pacific Index की सबसे ज्यादा चढ़ने वाली 10 कंपनियों से 8 कंपोनेंट्स बनाने वाली कंपनियां हैं। इनमें से हर कंपनी का शेयर कम से कम 236 फीसदी चढ़ा है।
जहां तक भारत की बात है तो इसका असर भारतीय शेयर बाजारों पर नहीं पड़ेगा। इसकी वजह यह है कि भारत में एआई और सेमीकंडक्टर्स बनाने वाली कंपनियां नहीं हैं। यहीं वजह है कि पिछले 1-2 सालों में जब अमेरिका, दक्षिण कोरिया और ताइवान के शेयर बाजारों में तेजी आई तब भारतीय शेयर बाजारों में गिरावट देखने को मिली है। यहां तक की एआई बूम का निगेटिव असर भारतीय आईटी कंपनियों पर पड़ा है। अब जब एआई और चिप शेयर गिर रहे हैं तो भारतीय आईटी शेयरों में तेजी दिख रही है।
AI Boom in Stock Market: हॉन्ग कॉन्ग में एआई से जुड़ी कंपनियों ने इस बार रिकॉर्डतोड़ पैसे जुटाए। यह तेजी ऐसे समय में आई, जब हॉन्ग कॉन्ग के शेयर बाजार में भारी गिरावट देखने को मिली। कंपनियों ने आईपीओ, प्लेसमेंट्स और ब्लॉक ट्रेड्स के जरिए जुलाई-सितंबर में $47.5 अरब जुटाए, जोकि ब्लूमबर्ग के मुताबिक किसी साल की तीसरी तिमाही में अब तक की सबसे बड़ी रकम है।
इसके साथ ही इस साल अब तक हॉन्ग कॉन्ग में कुल $92 अरब से अधिक फंड जुटाए गए जोकि साल 2021 में $112.5 अरब के रिकॉर्ड के काफी करीब है। यह ऐसे समय में हुआ, जब बॉन्ड यील्ड में तेजी और कई नए शेयरों के खराब परफॉरमेंस के कारण निवेशक और कंपनियां अब पहले की तुलना में अधिक सतर्कता बरत रही हैं।
AI ने भरा जोश
हॉन्ग कॉन्ग में रौनक के पीछे एआई रही है लेकिन इस गर्मी तो इसने तगड़ा जोश दिखा दिया। चीन की कंपनियों ने तेजी से बढ़ रही एआई इंडस्ट्री में विस्तार के लिए ताबड़तोड़ पैसे जुटाए और पहले की तुलना में मार्केट में बहुत जल्द दोबारा एंट्री की। सबसे तगड़ा सौदा तो अलीबाबा ग्रुप की $10.2 अरब का फॉलो-ऑन ऑफर रहा तो Zhongji Innolight ने करीब $8 अरब जुटाए जोकि लगभग सात वर्षों में हॉन्ग कॉन्ग की सबसे बड़ी लिस्टिंग रही। अन्य कंपनियों ने भी बार-बार निवेशकों से पैसे जुटाए। एआई मॉडल बनाने वाली Z.AI ने इस साल IPO, प्लेसमेंट और कन्वर्टिबल बॉन्ड के जरिए कुल $9.6 अरब जुटाए।
गोल्डमैन में एशिया (एक्स-जापान) इक्विटी कैपिटल मार्केट्स के प्रमुख जेम्स वांग का कहना है कि पहले कंपनियां एक बार पैसे जुटाने के बाद फिर एक-दो साल बाद ही दोबारा ऐसी कोशिश करती थी लेकिन अब लॉकअप पीरियड समाप्त होते ही पूंजी जुटाने लगी हैं। उनका कहना है कि AI की वजह से यह सिलसिला अगले कुछ वर्षों तक जारी रहेगा और इसकी रफ्तार जल्द धीमे होने के कोई संकेत नहीं हैं।
Z.AI के अलावा एक और एआई मॉडल कंपनी मिनीमैक्स ग्रुप, चिप बनाने वाली कंपनी शंघाई एलुवेटर कोरएक्स सेमीकंडक्टर और शंघाई बिरेन टेक्नोलॉजी भी अपने IPO लॉकअप की अवधि खत्म होने के तुरंत बाद जुलाई में दोबारा बाजार में लौट आईं।
यह तेजी सिर्फ चीन या हॉन्ग कॉन्ग तक ही नहीं रही, पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में देखने को मिली। तीसरी तिमाही में इस क्षेत्र में शेयर बिक्री के जरिए रिकॉर्ड $120 अरब से अधिक जुटाए गए, जो छह वर्षों में इस अवधि के लिए सबसे अधिक है। चीन में भी इस दौरान मेमोरी चिप बनाने वाली Corp का 66.6 अरब युआन (लगभग $9.9 अरब) का IPO आया, जो चीन में अब तक का दूसरा सबसे बड़ा IPO रहा।
भारत में भी दिखी रौनक
साल की शुरुआत में अमेरिका-ईरान युद्ध, शेयर बाजार में हाहाकार और विदेशी निवेशकों की ताबड़तोड़ बिकवाली के दबाव में रहने के बाद भारतीय बाजार ने भी जोरदार वापसी की। जुलाई से अब तक यहां शेयरों की बिक्री के जरिए कंपनियों ने रिकॉर्ड $26 अरब जुटाए, जिसके साथ भारतीय मार्केट के लिए यह अब तक की सबसे अच्छी तिमाही साबित हुई।
इस दौरान सबसे बड़े डील्स की बात करें तो एलआईसी में $3.2 अरब की सरकारी हिस्सेदारी की बिक्री शामिल थी तो एनएसई ने $2.4 अरब का दूसरा सबसे बड़ा आईपीओ पेश किया। यह ऐसे समय में हुआ जब निफ्टी 50 अगस्त की शुरुआत के अपने हाई लेवल से लगभग 9.5% नीचे आ गया था। घरेलू बाजार में पर्याप्त लिक्विडिटी ने नए शेयर ऑफरिंग की मांग को मजबूत बनाए रखा।
आगे भी आईपीओ का पाइपलाइन काफी मजबूत है। मुकेश अंबानी की जियो प्लेटफॉर्म्स नवंबर में संभावित लिस्टिंग से पहले निवेशकों से मुलाकात कर रही है। ब्लूमबर्ग न्यूज के अनुसार यह भारत के सबसे बड़े IPO में से एक हो सकता है। सिटीग्रुप में इक्विटी कैपिटल मार्केट्स के प्रमुख हरीश रमन का कहना है कि इस साल अभी और आईपीओ आ सकते हैं और वैश्विक निवेशकों की दिलचस्पी भी बनी हुई है।
आगे कैसा है रुझान
एआई पर होने वाले भारी खर्च भविष्य में पर्याप्त रिटर्न दे पाएगा या नहीं, इसे लेकर सवाल उठने लगे हैं लेकिन इसके बावजूद एआई से जुड़ी कंपनियां ताबड़तोड़ पैसा जुटा रही हैं और निवेशकों की दिलचस्पी भी बनी हुई है। हालांकि HSBC के ग्लोबल हेड ऑफ इक्विटी कैपिटल मार्केट्स मार्टिन जोल (Martin Zoll) का कहना है कि कई कंपनियों के शेयर आईपीओ प्राइस से नीचे आ गए हैं, जिसके चलते निवेशक सावधानी भी बरतने लगे हैं। बता दें कि जुलाई की शुरुआत से हांगकांग में हुए 10 सबसे बड़े सौदों में से केवल दो ही अपने ऑफर प्राइस से ऊपर हैं। फास्ट-फैशन रिटेलर शेन ग्लोबल होल्डिंग्स (Shein Global Holdings) और चिपमेकर लॉन्गसिस इलेक्ट्रॉनिक्स (chipmaker Longsys Electronics) के शेयर तो पहले ही दिन इश्यू प्राइस के नीचे आ गए।
आगे की बात करें तो आईपीओ और अन्य सौदों की पाइपलाइन काफी बड़ी है। फिलीपींस के सबसे लोकप्रिय मोबाइल पेमेंट ऐप GCash की पैरेंट कंपनी Mynt Inc ने आईपीओ का भाव फिक्स कर दिया है और यह फिलीपींस का सबसे बड़ा आईपीओ बनने वाला है। ऑस्ट्रेलिया भी एआई से जुड़ी इस तेजी का एक हिस्सा बनने वाला है। वहां डेटा सेंटर ऑपरेटर Firmus Grid $5 अरब का IPO देश में अब तक के सबसे बड़े लिस्टिंग में से एक होगा।
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नई दिल्ली। दिल्ली अब रोज सड़क पर लगने वाले जाम और बढ़ते ट्रैफिक को संभालने के लिए नई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करने जा रहा है। केंद्रीय कैबिनेट ने राजधानी के लिए 1,789.52 करोड़ रुपये के इंटेलिजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम (ITMS) को मंजूरी दी है। इस सिस्टम में AI और रियल टाइम ट्रैफिक डेटा की मदद से सड़कों पर ट्रैफिक को बेहतर तरीके से संभालने की कोशिश होगी।
यह प्रोजेक्ट दिल्ली पुलिस लागू करेगी। इसके तहत 42 बड़े ट्रैफिक कॉरिडोर को शामिल किया गया है। काम तीन चरणों में पूरा किया जाएगा।
ट्रैफिक के हिसाब से खुद बदलेंगे सिग्नल
ITMS में ट्रैफिक सिग्नल सड़क पर गाड़ियों की संख्या के हिसाब से खुद बदलेंगे। ज्यादा ट्रैफिक होने पर सिग्नल की टाइमिंग अपने आप एडजस्ट होगी। बड़े रास्तों के सिग्नल आपस में जुड़े रहेंगे, जिससे बार-बार रुकने और देरी को कम किया जा सकेगा। सिस्टम जाम, धीमी रफ्तार और हादसों का भी तुरंत पता लगाएगा। इसके बाद ट्रैफिक पुलिस जरूरत के अनुसार डायवर्जन कर सकेगी। एंबुलेंस और दूसरी इमरजेंसी गाड़ियों के लिए जरूरत के समय ग्रीन कॉरिडोर बनाने में ITMS मदद करेगा।
स्मार्ट सिस्टम से ट्रैफिक पर रहेगी नजर
AI कैमरों से रेड लाइट तोड़ने, तेज रफ्तार और गलत दिशा में गाड़ी चलाने वालों की पहचान होगी।
बिना हेलमेट या सीट बेल्ट के वाहन चलाने वालों पर भी नजर रखी जाएगी।
ड्राइविंग के दौरान मोबाइल इस्तेमाल और गलत पार्किंग का भी पता चलेगा।
सिस्टम चोरी और ब्लैकलिस्टेड वाहनों की पहचान करने में मदद करेगा।
लोगों को डिजिटल प्लेटफॉर्म और सड़कों पर लगे वेरिएबल मैसेज साइन से जाम, डायवर्जन और पार्किंग की जानकारी मिलेगी।
ट्रैफिक से जुड़ी ताजा जानकारी नेविगेशन सर्विस के साथ भी शेयर की जाएगी, जिससे लोग बेहतर रास्ता चुन सकेंगे।
1,092 सिग्नल और 1,029 एनफोर्समेंट लोकेशन
इस प्रोजेक्ट के तहत दिल्ली में 1,092 जगहों पर स्मार्ट ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम और 1,029 जगहों पर ट्रैफिक नियमों की निगरानी के लिए सिस्टम लगाया जाएगा। इसके साथ ट्रैफिक कमांड और कंट्रोल सेंटर भी बनाया जाएगा। डेटा सिक्योरिटी के लिए डेटा सेंटर और डिजास्टर रिकवरी सिस्टम होगा। जरूरत के हिसाब से आगे इसमें नई टेक्नोलॉजी और फीचर भी जोड़े जा सकेंगे।
ITMS को पूरी दिल्ली में एक साथ लागू नहीं किया जाएगा। इसे तीन चरणों में शुरू किया जाएगा। हर चरण में टेस्टिंग और जांच के बाद ही आगे का काम किया जाएगा। इसका मकसद ट्रैफिक व्यवस्था को बेहतर बनाना, जाम कम करना और सड़क सुरक्षा बढ़ाना है।
A Hyundai Venue N Line runs down a well-lined access road, its sensors alive. Off to the left overhead, an Akasa Boeing 737 Max makes its way down gracefully, flaps extended, ready to land. Both machines are bristling with technology that allows them to operate with a degree of independence once unthinkable. The car can keep itself within a lane, regulate speed in relation to the car ahead, and brake in emergencies. The aircraft can fly itself across continents, execute complex routes, and even land in zero visibility. Welcome to the new world where machines are self-aware and can operate for long stretches on their own.
Today, we dive deep into tech and compare how Advanced Driver Assistance Systems (ADAS), found in modern cars like the Hyundai Venue work, and juxtapose them against how advanced autopilot systems on airliners like the Boeing 737 Max function. Want to know how this Hyundai Venue senses lane markings, what it picks up, how it processes the data, makes a decision and executes a steering manoeuvre to keep the car within the lane, or how aircraft like the Boeing 737 Max are programmed to fly themselves and how they can even land automatically? Read on; there’s plenty of fascinating tech ahead.
Sensor fusion
Walk around the attractive-looking Akasa 737 Max, now one of forty-three, and you notice the nose of the aircraft bristling with sensors. It’s from where a vast majority of the data for the Autopilot is collected. Showing me around and explaining things is Captain Svetlana from Akasa. First up, the speed sensors – elbow-shaped pitot tubes that stick out at an angle. This tube helps measure the airflow and, hence, the speed of the aircraft. For accuracy, this speed data is correlated with the static port, mounted flush on the side of the aircraft, which measures the real atmospheric pressure at the height the aircraft is flying.
Then there’s the AOA or Angle Of Attack sensor that basically tells you how the air is hitting the wings or how much the wing is tilted into the oncoming airflow. This is essential to know just how much lift the wing is making and how close the aircraft is to stall.
Then, inside the nose cone, apart from the weather radar, are antennas for the localiser and glideslope. Both pick up radio beams sent from transmitters positioned near the runway. The localiser tells the aircraft how far left or right of the runway centreline it is, and the glideslope tells if the aircraft is too high or too low. Together, they give the aircraft a complete three-dimensional picture of the ideal path to the runway. They feed data to the Instrument Landing System (ILS) and are what lets a 737 Max line up and descend precisely even when visibility is poor.
Further back are a pair of TCAS antennas, one on the belly and one on the top. They listen for nearby transponders (that also help flightradar24 funtion) to keep the aircraft clear of traffic.
Capt. Svetlana and Capt. Sanaya help us get to grips with how the autopilot on the 737 Max functions.
Positioning is done with the help of a GPS antenna on the roof. Another system, known as the Inertial Reference System, uses laser gyroscopes bolted to the airframe to sense every turn the aircraft makes. It uses accelerometers that sense every change in speed. A computer fuses the two, continuously tracking exactly how far and in which direction it’s travelled from a known starting point, which is set by the pilots at the gate.
Road and track
Though this is a high-tech and complex system, functionality is slick and smooth.
Now swap the open skies for chaotic tarmac. Here, the Venue N Line’s ADAS Level 2 suite runs off far fewer sensors or data points. The difference, however, is that the car actually ‘sees’ what is ahead, correlating data from the radar and the high-resolution camera into a single picture. Sensor fusion is essential on both the 737 and the Venue. What’s different is that the reactions of the car have to be immediate, and that means Smart Sense on the Venue not only has to process gigabytes of data every second, it also has to be ready with, say, a braking solution in milliseconds, just in case that petulant biker cuts across the Venue’s nose.
One of the primary sensors is the radar. Located behind the black square plastic panel under the number plate up front, it acts as a measuring tape, constantly tracking the exact distance and closing speed of the car ahead. Similar to a fruit bat, the radar sends out bursts of high-frequency radio waves (or chirps) that vary between 10,000-50,000 bursts per second. Just as important is how quickly the data is processed and passed on, which provides enough sharpness and resolution to differentiate between shapes ahead. This data is used by the Forward Collision-Avoidance Assist (FCA) to stop the Venue often before human reflexes can even respond to danger. In addition, the system uses a pair of rear-mounted radars, ultrasonic sensors and parking and proximity cameras for a more secure 360-degree ‘picture’.
Captain Sanaya adjusts the heading knob in the sim, the aircraft reacts in real time without disengaging the system.
The other important data source is a high-resolution, high-speed camera at the top of the windshield. While its primary job is to look for lane markings and obstacles, it also works along with the radar up front, sharing the workload. The camera, for example, sees every detail but lacks depth perception (or 3D vision), and a radar tracks distance but cannot see the same amount of detail as the camera. The camera sends data via a special, automotive application-optimised CMOS sensor, similar to the one on your Sony mirrorless camera that also has a high dynamic range (for bright lights). Hyundai’s system can even detect faded lines with its edge-detection, texture-tracking, and colour-reading systems. Hyundai’s SmartSense also integrates Artificial Intelligence (AI) and Machine Learning. So, instead of using rigid “if-then” decision-making software, it uses embedded neural networking to interpret real-time sensor data.
Together, these systems form a nervous system that feeds into the car’s brain, which then nudges the steering, modulates throttle, or applies brakes. Unlike aviation, redundancy is limited. A sensor failure usually hands control back to the driver, who remains the ultimate fallback.
Steering wheels and yokes
Hit ‘A/P Engage’ on mode control panel to activate autopilot; course, speed, heading and altitude are also adjustable here.
Once behind the wheel of the Venue, engaging the ADAS is seamless. You need to be above 30kph and on a well-lined road. To engage the system, you have to zoom into the left spoke of the steering wheel. Here you find the four buttons that help activate and operate the system. The first activates the Smart Cruise Control, the second allows you to increase or decrease the speed you want to run at, the third helps you set the desired safe distance to the car ahead and the fourth activates Lane Keep Assist (LKA).
Tyre pressure essential here too.
Activating LKA for me comes first, and you do this when you are running in a lane on a well-marked road. You know the system is engaged when the green steering icon lights up on the instrument panel and the car icon shows it running between the lines. Then you engage the smart cruise control and set the speed you want to run at, stepping off the accelerator simultaneously. The display on the instrument cluster lights up with the speed set, and you also get a horizontal bar showing the distance to the car ahead; which can be adjusted by the button with the distance icon.
Unseen by the driver and passengers in the car, the camera immediately begins scanning lane markings, and radar modules measure the distance to the vehicle ahead. The steering wheel then nudges itself gently to follow curves, while the throttle and brakes modulate to maintain speed and distance. The system makes split‑second decisions to help keep you out of harm’s way.
We took the assistance of the full-fledged 737 Max simulator that pilots train on to help us understand the systems better.
Climbing into the Akasa Boeing 737 Max cockpit is an immediate sensory overload. Hundreds of buttons, switches, levers and dials just overwhelm you. They are ahead of you, to your left, your right, and even above. There are, in fact, so many switches, buttons and dials above, I have to duck-walk in. And I’m not exactly Joel Garner or Kareem Abdul-Jabbar. Once seated, I slide the seat to the left and forward by depressing a lever, no powered seats here. And forget about comparing screen size, this is a proper ‘glass cockpit’ with wall-to-wall screens. My feet rest on the pedals that work the rudder in the tail, and ahead of me is Boeing’s famous yoke; unlike a regular joystick, you bank by turning the semi-circular bit of the ‘wheel’.
In contrast to our chaotic driving environment, the autopilot in the 737 Max operates on different principles. The environment is structured and regulated. There are no sudden jaywalkers or rogue bikers at thirty‑five thousand feet. So, unlike the Venue, the 737 doesn’t use optical cameras to see where it’s going. It doesn’t need to look for lanes or lines at 800kph. Instead, it relies on a combination of GPS, Inertial Reference Systems, antennas and sensors in the aircraft’s nose and cheek to get a fix on the exact heading, speed and altitude.
Driver’s display shows detailed ADAS information.
After taking a good look at the real cockpit and understanding some of the controls that help initiate the autopilot sequence, we shift to a full-scale moving platform simulator used to train airline pilots around the world. The cockpit is identical, down to the last detail, and here we have Captain Sanaya Chothia to help us conduct a simulated flight. Can’t help noticing, the 737 also has a tyre pressure monitor; of course, it does.
First up, a full-bore take off in the sim, Capt. Sanaya working the rudder pedals to keep the aircraft running down the centre line. Wow, this feels real, the sound, the visuals, the motion all combined. What a thing! After climbing out, we take a quick look at the sequence used to initiate the autopilot, most of the steps done on the long horizontal panel that sits between the pilots, directly in their line of vision. The first step involves checking if the auto throttle is engaged, and then all the pilot needs to do is press a single button on the autopilot panel. Unlike ADAS, the route the aircraft has to take is already pre-programmed into the navigation computer, a fairly long and detailed process. The speed, the height, the course, the heading, everything. And the autopilot just follows this.
The buttons that initiate ADAS are all placed here.
Once the system is initiated, the throttles move on their own, adjusting thrust; the yoke makes deliberate corrections and the screens display the aircraft banking smoothly along its GPS track. As the flight progresses, pilots can keep the aircraft on autopilot and make plenty of alterations to the route, either to avoid weather, get a more direct route or as directed by Air Traffic Control. There are knobs on the panel to alter course, speed, heading and altitude, with even the rate of descent and ascent adjustable.
We even execute an autoland, where the aircraft lands itself. The Instrument Landing System frequency is first inputted into the Multi-Mode navigation panel, the final approach course is set for the runway on the Mode Control or autopilot panel (272 for runway 27 in this case), and then the APP or approach mode is selected once the aircraft is positioned correctly. Doing this arms the localiser and glideslope systems that, as we’ve mentioned earlier, have their sensors in the nose cone. Seeing the aircraft adjust, manoeuvre, manage its path, height and distance, and land itself is an eye-opener. What an incredible piece of technology!
Level 2 ADAS on the Hyundai Venue N Line integrates data from all its sensors for a smooth, seamless drive.
What’s fascinating is that both systems have boundaries. In aviation, autopilot is trusted to fly for hours, even land. Pilots monitor, manage and intervene when necessary, but the system is designed to shoulder the bulk of the workload. Take offs, however, are always manual. In cars, ADAS is an assistant with a much narrower scope. It reduces fatigue, takes a load off the driver and adds a safety net, but ultimately the driver is always on call at short notice and is the one in control.
Sharing the workload
Modern aircraft like this Akasa 737 Max can get onto autopilot soon after take off.
Similar in execution but very different in how they function, ADAS and Autopilot both overlap but also exist in isolation. One is designed to keep you from bumping into a hatchback on the Western Express Highway, while the other is designed to guide an 80-tonne metal tube across oceans. Both are glimpses into a future where machines will shoulder more of the burden of control and blow us away with the technology on offer. But for now, if you step into an aircraft, know that while autopilot may be doing a bulk of the flying, a pilot is always watching, and when you engage ADAS to ease your commute, keep your eyes on the road, your hands on the wheel.
आज के समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) केवल कॉर्पोरेट कंपनियों तक सिमित नहीं है बल्कि इसका इस्तेमाल इंडियन डिफेंस फोर्स में भी बढ़ता जा रहा है, जो युद्ध के दौरान सैनिकों की मदद के लिए रामबाण साबित हो सकता है। लेकिन ऐसे में सवाल उठता है कि क्या AI के ज्यादा इस्तेमाल से मशीनें सैनिकों की जगह तो नहीं ले लेंगी? इन्हीं सवालों का जवाबों का देते हुए आर्मी हेडक्वार्टर में स्ट्रैटेजिक प्लानिंग के डायरेक्टर जनरल, लेफ्टिनेंट जनरल पुनीत आहूजा (AVSM, SM, VSM) ने कहा कि AI सैनिकों की जगह नहीं लेगा, बल्कि उनके लड़ने के तरीके और उनकी क्षमताओं में बुनियादी बदलाव लाएगा।
उन्होंने यह बात News18 के DEFCON 2026 कार्यक्रम में कही। लेफ्टिनेंट जनरल आहूजा ने कहा कि भारत भविष्य की लड़ाइयों में अचानक किसी हमले या स्थिति से हैरान नहीं रह सकता। उन्होंने भविष्य की जंगों के लिए भारतीय सेना को तैयार करने के मकसद से उसमें बदलाव लाने की जरूरत पर जोर दिया।
उन्होंने कहा, “हम जिन सबसे अहम बदलावों का फायदा उठाना चाहते हैं, उनमें से एक है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस: जैसे टारगेट का पता लगाना, निगरानी, टारगेट की पहचान, लॉजिस्टिक्स और प्रेडिक्टिव मेंटेनेंस, सटीक सपोर्ट, बहुत बड़े डेटा को प्रोसेस करना और निश्चित रूप से साइबर डिफेंस।”
“लेकिन हमें यह याद रखना चाहिए कि AI सैनिक की जगह नहीं लेगा। बल्कि यह सैनिक के लड़ने के तरीके और उसकी क्षमताओं को बदल देगा।”
उन्होंने कहा कि भविष्य के युद्धक्षेत्र में सैनिक एक साथ कई मानवरहित सिस्टम को कंट्रोल करते नजर आ सकते हैं। वहीं, निगरानी और दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए ऑटोनॉमस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल पहले से शुरू हो चुका है। लॉजिस्टिक्स से जुड़े कामों में रोबोट का भी इस्तेमाल किया जा रहा है।
लेफ्टिनेंट जनरल आहूजा ने कहा, “AI पहले से ही ऐसे पैटर्न या पैटर्न में बदलाव की पहचान कर रहा है, जिन्हें पहचानने और पता लगाने में हमें पहले शायद कई दिन या महीने लग जाते। भविष्य में यही ‘ह्यूमन-मशीन टीमिंग’ (इंसान और मशीन की मिलकर काम करने की प्रक्रिया) होगी।”
‘तैयारी कोई एक घटना नहीं हो सकती, इसे एक संस्कृति बनना होगा’
लेफ्टिनेंट जनरल आहूजा ने कहा कि दुनिया लगातार संघर्षों के दौर से गुजर रही है और चेतावनी दी कि भविष्य की लड़ाइयां जरूरी नहीं कि पारंपरिक तरीकों से ही लड़ी जाएं।
उन्होंने कहा, “हम भविष्य में अचानक सामने आने वाली किसी भी चुनौती के लिए तैयार न होने का जोखिम नहीं उठा सकते। यह जरूरी नहीं कि चुनौती सिर्फ सेना की गतिविधियों से जुड़ी हो; यह टेक्नोलॉजी और बदलते रणनीतिक माहौल से भी पैदा हो सकती है।”
उन्होंने कहा कि आज सतर्कता का मतलब सिर्फ सीमाओं पर हो रही गतिविधियों पर नजर रखना नहीं है, बल्कि भारत को नई उभरती टेक्नोलॉजी और बदलते खतरों पर भी नजर रखने की जरूरत है।
आहूजा ने कहा, “इसलिए आज हमारे लिए सतर्कता का मतलब सिर्फ सीमाओं पर नजर रखना नहीं है। इसका मतलब टेक्नोलॉजी के ट्रेंड्स, साइबर खतरों, अंतरिक्ष में हो रहे विकास, नई उभरती टेक्नोलॉजी और ऑटोनॉमस सिस्टम पर भी नजर रखना है। साथ ही, इसका मतलब जरूरत पड़ने पर तुरंत जवाब देने की क्षमता बनाए रखना भी है।”
उन्होंने जोर देकर कहा, “हमारे लिए तैयारी कोई एक दिन का काम नहीं हो सकती, इसे हमारी कार्य संस्कृति का हिस्सा बनाना होगा।”
‘भविष्य की लड़ाइयां शायद पारंपरिक मिसाइल हमले से शुरू न हों’
लेफ्टिनेंट जनरल आहूजा ने कहा कि भविष्य की लड़ाइयां पारंपरिक काइनेटिक युद्ध (हथियारों से लड़े जाने वाले युद्ध) के अलावा दूसरे क्षेत्रों में भी शुरू हो सकती हैं।
उन्होंने कहा, “भविष्य की लड़ाई शायद पारंपरिक मिसाइल हमले से शुरू न हो। यह साइबर हमले, सैटेलाइट को बाधित करने, हमारे कम्युनिकेशन सिस्टम को ठप करने और निश्चित रूप से कॉग्निटिव डोमेन (सोच-समझ और जानकारी के दायरे) में हेरफेर करने से शुरू हो सकती है।”
उन्होंने आगे कहा कि भविष्य की लड़ाइयों में सैनिकों को एक ही समय में कई क्षेत्रों में खतरों का सामना करना पड़ सकता है।
लेफ्टिनेंट जनरल आहूजा ने कहा, “भविष्य के सैनिक को एक ही समय में काइनेटिक हमलों, ड्रोन से निगरानी, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, GPS में रुकावट, साइबर हमलों और निश्चित रूप से ऑटोनॉमस सिस्टम का सामना करना होगा।”
उन्होंने अंत में कहा कि “युद्ध का मैदान अब मल्टी-डोमेन वाला, तकनीक से जुड़ा और बेहद तेज होता जा रहा है। जो पक्ष तेज़ी से चीजों को भांप सकेगा, समझ सकेगा, फैसला ले सकेगा और कार्रवाई कर सकेगा, उसे दुश्मन पर साफ बढ़त हासिल होगी।”
एक सोशल मीडिया क्रिएटर का OpenAI के GPT-6 Astra के साथ किया गया एक्सपेरिमेंट वायरल हो गया है। क्रिएटर ने दिखाया कि कैसे यह AI असिस्टेंट बहुत कम निर्देशों के साथ IRCTC टिकट-बुकिंग प्रोसेस को पूरा कर सकता है। वहीं, इस वीडियो के सामने आने के बाद यह चर्चा शुरू हो गई है कि AI-पावर्ड ऑटोमेशन कितनी तरक्की कर चुका है।
वीडियो में देखें पूरा मामला
शुरू में उन्हें शक था क्योंकि IRCTC एक सरकारी वेबसाइट है, इसलिए क्रिएटर ने खुद उस दावे को आजमाने का फैसला किया। उनके मुताबिक, उन्होंने ChatGPT Astra खोला और एक आसान सा प्रॉम्प्ट डाला। “मुझे 20 सितंबर को रात 9 बजे से 11 बजे के बीच मुंबई से राजकोट के लिए दो लोगों के लिए AC क्लास में ट्रेन टिकट बुक करना है। ब्राउजर का इस्तेमाल करें।”
उन्होंने बताया कि इसके बाद AI ने अपने आप बुकिंग प्रोसेस को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। इसने निकलने (Departure) और पहुंचने (Destination) वाले स्टेशन चुने, यात्रा की तारीख और समय की जानकारी डाली, उपलब्ध ट्रेनें खोजीं और अलग-अलग विकल्पों में टिकट की उपलब्धता जांची।
क्रिएटर ने दावा किया कि AI ने जरूरतों के हिसाब से ट्रेनें ढूंढ लीं और उन्हें बताया कि उपलब्ध विकल्प वेटिंग लिस्ट में हैं। जब ChatGPT ने पूछा कि वे आगे कैसे बढ़ना चाहते हैं, तो उन्होंने उसे अगले दिन के लिए टिकट खोजने का निर्देश दिया।
क्रिएटर ने कहा, “मेरे लिए सिर्फ पेमेंट करना बाकी रह गया था।” उसने बताया कि टिकट बुकिंग के दौरान ट्रेन सर्च करने, ट्रेन चुनने और जरूरी फॉर्म भरने जैसे ज्यादातर काम AI ने खुद ही कर दिए। इस डेमो ने ऑनलाइन लोगों का ध्यान खींचा और कई यूजर्स इस बात पर बहस करने लगे कि क्या ऐसी क्षमताएं रोजमर्रा के डिजिटल कामों के ऑटोमेट होने के तरीके में कोई बड़ा बदलाव लाएंगी।
एक यूजर ने कमेंट कर लिखा, “इसे ‘तत्काल’ में आजमाकर देखो, तब मैं मानूंगा कि AI हम सबकी जगह ले लेगा।” उन्होंने IRCTC के बहुत ज्यादा कॉम्पिटिटिव ‘तत्काल’ टिकट-बुकिंग सिस्टम का जिक्र किया, जहां टिकट अक्सर कुछ ही मिनटों में बिक जाते हैं।
वहीं, एक अन्य यूजर ने एक अलग टेस्ट का सुझाव दिया: “इसे एक रिज्यूमे दो और इसके जरिए असल नौकरियों के लिए अप्लाई करने की कोशिश करो।”
OpanAI vs SpaceX: चैटजीपीटी (ChatGPT) की पैरेंट कंपनी ओपनएआई और एलॉन मस्क (Elon Musk) के स्पेसएक्स (SpaceX) के बीच की साझेदारी खत्म हो सकती है। न्यूज एजेंसी रायटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक ओपनएआई स्पेसएक्स के कोडिंग-टूल कंपनी कर्सर (Cursor) को एआई मॉडल की उपलब्धता बंद करने की योजना बना रही है। इस कदम से ओपनएआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन और एलॉन मस्क के बीच लंबे समय से चल रही कड़वाहट भरी टक्कर और बढ़ गई है। बता दें कि जून में स्पेसएक्स ने कर्सर बनाने वाले स्टार्टअप एनीस्फीयर (Anysphere) को $6 हजार करोड़ की ऑल-स्टॉक डील में खरीदने का ऐलान किया था और इस महीने की शुरुआत में यह अधिग्रहण पूरा हो गया।
OpanAI vs SpaceX: Cusror को क्यों बंद होगी सर्विसेज?
ओपनएआई ने एक ब्लॉग पोस्ट में कहा कि कर्सर को एआई मॉडल नहीं देने का फैसला इसलिए लिया जा रहा है क्योंकि उन्हें भरोसा नहीं है कि स्पेसएक्स उनकी तकनीक का इस्तेमाल तय शर्तों के अनुसार करेगा। ओपनएआई ने यह भरोसा नहीं होने की वजह एलॉन मस्क की कंपनियों का ओपनएआई के साथ हुए कॉन्ट्रैक्ट्स की शर्तों के उल्लंघन के लंबे अनुभव को बताया। वहीं इस मामले को लेकर कर्सर के को-फाउंडर माइकल ट्रुएल (Michael Truell) का कहना है कि वह ओपनएआई के शुरुआती यूजर्स में से एक है और अब इसके साथ मौजूदा मुद्दे को सुलझाने के लिए वहीं ओपनएआई की टीम से बातचीत कर रहे हैं।
ओपनएआई का कहना है कि स्पेसएक्स जैसी बड़ी कंपनियों के साथ काम करने के लिए खास कॉन्ट्रैक्ट्स होता है और इसमें यह तय किया जाता है कि तकनीक का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर सुरक्षा के साथ किया जाए। ओपनएआई के मुताबिक कर्सर को उसकी सर्विसेज 12 नवंबर 2026 तक बंद की जा सकती है। ओपनएआई का कहना है कि कर्सर के साथ कॉन्ट्रैक्ट में स्वामित्व में बदलाव के बादसीमित समय में कॉन्ट्रैक्ट रद्द करने का अधिकार मिल गया है।
Elon Musk vs Sam Altman: लंबा है टकराव
एलॉन मस्क और सैम ऑल्टमैन के बीच कई वर्षों से टकराव चल रही है, और यह कोर्ट केस तक पहुंच गया। सुनवाई के दौरान मस्क के वकील ने कहा था कि मस्क और दूसरे गवाहों ने ऑल्टमैन के झूठे होने की गवाही दी है तो ओपनएआई का कहना था कि मस्क कंपनी पर कंट्रोल चाहते थे।
दुनिया के सबसे अमीर शख्स एलॉन मस्क ने ओपनएआई पर $15 हजार करोड़ का मुकदमा किया था। मस्क ने कंपनी और ऑल्टमैन पर आरोप लगाया था कि उन्होंने अपने फायदे के लिए कंपनी के मूल नॉन-प्रॉफिट मिशन से धोखाधड़ी करके एक चैरिटी को हड़प लिया। इस साल की शुरुआत में एक फेडरल जूरी ने मस्क के खिलाफ फैसला सुनाया और कहा कि उन्होंने बहुत देर से केस फाइल किया था।
अमेरिकी फेडरल रिजर्व के चेयरमैन केविन वार्श का कहना है कि अमेरिका का लेबर मार्केट अब भी मजबूत बना हुआ है और बेरोजगारी की मौजूदा रफ्तार लगभग फुल एंप्लॉयमेंट की स्थिति के हिसाब से है। उनका कहना है कि रोजगार के मोर्चे पर दोनों तरफ से अमेरिकी अर्थव्यवस्था अच्छा परफॉर्म कर रही है। अमेरिका में बेरोजगारी दर अभी 4.1% है जोकि फुल एंप्लॉयमेंट से जुड़ी परिस्थितियों के मुताबिक ही है। हालांकि उन्होंने चेतावनी दी है कि महंगाई अभी भी पॉलिसीमेकर्स के लिए चिंता की बात बनी हुई है। उन्होंने ये बातें शुक्रवार को फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ कैनसस सिटी के एनुअल जैक्सन होल सिम्पोजियम में कही।
महंगाई को लेकर क्या है आशंका
अमेरिकी फेडरल रिजर्व के प्रमुख ने रोजगार के मोर्चे पर इकॉनमी की सेहत को बेहतर तो बताया है लेकिन महंगाई को लेकर सतर्क भी किया है। उन्होंने कहा कि कीमतों का दबाव अभी भी ऊंचे लेवल पर बना हुआ है। उन्होंने महंगाई के आंकड़ों को और अधिक चिंताजनक बताया और कहा कि मौजूदा वित्तीय परिस्थितियां काफी हद तक सख्त है या नहीं, इस पर कु कहना उनके लिए मुश्किल होगा। ऐसे में इस बात के आसार बढ़ गए हैं कि लेबर मार्केट में स्थिरता के संकेतों के बावजूद फेडरल रिजर्व की महंगाई की रफ्तार पर कड़ी नजर बनी रहेगी।
अर्थव्यवस्था पर AI को बढ़ते असर पर भी जोर
केविन वार्श ने अर्थव्यवस्था पर AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के बढ़ते असर पर भी जोर दिया। उन्होंने अभी के समय को इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ बताया। केविन के मुताबिक एआई आने वाले वर्षों में प्रोडक्टिविटी, आर्थिक विकास और काम की प्रकृति को बड़े स्तर पर बदल सकती है। बता दें कि इस साल की शुरुआत में केविन वार्श के प्रमुख बनने के बाद से फेड ने अर्थव्यवस्था पर एआई के आर्थिक असर की स्टडी तेज कर दी है। इसके लिए एक खास टास्क फोर्स बनाई गई है, जो यह जांच रही है कि यह प्रोडक्टिविटी में बढ़ोतरी, रोजगार के रुझानों और व्यापक आर्थिक गतिविधियों पर किस तरह असर डाल सकता है।
संस्कृत को विश्व की पहली भाषा और वह भी पहली व्याकरणबद्ध भाषा माना जाता है। कहते हैं कि इसी भाषा के कारण देश और दुनिया की अन्य भाषाओं का जन्म हुआ। विश्व संस्कृत दिवस के अवसर पर जानिए दुनिया की सबसे प्राचीन, वैज्ञानिक और समृद्ध भाषाओं में से एक 'संस्कृत' से जुड़े 5 अद्भुत रहस्य:-
कंप्यूटर और AI के लिए सबसे उपयुक्त भाषा: नासा (NASA) के शोध के अनुसार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) और प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण (NLP) के लिए संस्कृत दुनिया की सबसे स्पष्ट और सटीक भाषा है, क्योंकि इसमें व्याकरण के नियम पूरी तरह से स्पष्ट और गणितीय हैं।
अद्भुत शब्द भंडार और एक शब्द के अनेक पर्यायवाची: संस्कृत में केवल एक ही वस्तु या भाव के लिए सैकड़ों शब्द उपलब्ध हैं। उदाहरण के लिए, संस्कृत में 'पानी' (जल) के लिए 70 से अधिक और 'हाथी' के लिए 100 से भी अधिक पर्यायवाची शब्द हैं।
स्मरण शक्ति और स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव: अनुसंधान से पता चला है कि संस्कृत के मंत्रों और अक्षरों का उच्चारण करने से गले और मस्तिष्क में विशेष कंपन (vibrations) उत्पन्न होते हैं। यह तंत्रिका तंत्र को सक्रिय कर ध्यान केंद्रित करने और स्मरण शक्ति (Memory Power) बढ़ाने में मदद करता है।
अद्वितीय व्याकरणिक संरचना (अव्यय शब्द क्रम): संस्कृत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें वाक्यों में शब्दों का क्रम (word order) बदलने से वाक्य का अर्थ नहीं बदलता। जैसे- “रामः गृहं गच्छति” और “गच्छति गृहं रामः” दोनों का अर्थ एक ही रहता है, जो किसी अन्य भाषा में संभव नहीं है।
संसार की अधिकांश भाषाओं की जननी: संस्कृत को इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की मूल भाषाओं में से एक माना जाता है। अंग्रेजी, जर्मन, लैटिन, रूसी और सभी भारतीय भाषाओं के अनगिनत शब्द (जैसे- Mother/मातृ, Brother/भ्रातृ, Geometry/ज्यामिति) सीधे संस्कृत से विकसित हुए हैं।