नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में भोटेकोशी-त्रिशूली बाढ़ के बाद मदद के लिए भारत और चीन को धन्यवाद कहा। उन्होंने कहा कि हिमालय में बढ़ते खतरे से निपटने के लिए नेपाल, भारत और चीन को साथ आना होगा। शाह ने भोटेकोशी की बाढ़ को सिर्फ नेपाल की आपदा नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए जलवायु परिवर्तन की चेतावनी बताया। शाह ने कहा कि ग्लेशियर से आई इस बाढ़ ने सड़कें, पुल, स्कूल, घर और लोगों के काम-धंधे तबाह कर दिए। उन्होंने दुनिया से अपील की कि जलवायु आपदा से प्रभावित गरीब देशों को दोबारा खड़ा करने के लिए कर्ज नहीं, ग्रांट यानी ऐसी मदद दी जाए जिसे वापस न करना पड़े। भारत-चीन के साथ हिमालय के लिए साझा सिस्टम बनाने का प्रस्ताव शाह ने कहा कि हिमालय की निगरानी और आपदा से बचाव के लिए नेपाल, भारत और चीन को मिलकर काम करना चाहिए। उन्होंने एक साझा सिस्टम बनाने का प्रस्ताव दिया, जिसमें: शाह ने कहा कि हिमालय को ऐसा क्षेत्र बनाना चाहिए जहां देश आपदा से जुड़ी जानकारी और विशेषज्ञता एक-दूसरे के साथ साझा करें। शाह बोले- भोटेकोशी की बाढ़ सिर्फ नेपाल की समस्या नहीं नेपाल PM ने कहा कि भोटेकोशी-त्रिशूली की आपदा को सिर्फ एक देश की समस्या के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन का असर पूरे हिमालयी क्षेत्र पर पड़ रहा है। शाह ने कहा, “यह सिर्फ नेपाल की निजी मुसीबत नहीं है। बांग्लादेश से पूछिए, भूटान से पूछिए, भारत से पूछिए, मालदीव से पूछिए, पाकिस्तान से पूछिए, श्रीलंका से पूछिए।” उन्होंने कहा कि इस आपदा से नेपाल के विकास का काम भी प्रभावित हुआ है। उनके मुताबिक, जलवायु आपदा अब सिर्फ पर्यावरण की समस्या नहीं, बल्कि विकास और लोगों की जिंदगी से जुड़ा बड़ा संकट बन गई है। ग्लेशियर टूटने के बाद आई थी अचानक बाढ़ अगस्त के आखिर में नेपाल और चीन के तिब्बत इलाके की सीमा के पास एक ग्लेशियर टूट गया था। इसके बाद भूस्खलन हुआ और अचानक बाढ़ आ गई। पानी और मलबे ने नीचे की घाटियों में भारी तबाही मचाई। इस आपदा में कम से कम 1,450 लोगों की मौत हुई है। कई हफ्ते बाद भी राहत और लोगों की तलाश का काम जारी है। इलाके में 6,000 से ज्यादा लोग लापता हैं। शाह ने कहा कि इनमें से कई लोग शायद कभी नहीं मिल पाएंगे। शाह बोले- जंग के लिए सिस्टम मजबूत, खाना पहुंचाने में कमजोर नेपाल PM ने दुनिया की प्राथमिकताओं पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा, “हमने युद्ध के लिए बेहतरीन लॉजिस्टिक्स वाला सिस्टम बना लिया है, लेकिन भोजन पहुंचाने के लिए हमारी व्यवस्था कमजोर है।” उन्होंने कहा कि जब जलवायु आपदा किसी गरीब देश में सड़कें, पुल और घर तबाह कर देती है, तो उसे दोबारा खड़ा करने के लिए सिर्फ कर्ज देना सही तरीका नहीं है। नेपाल को GDP के 10% के बराबर मदद की जरूरत शाह के मुताबिक, इस आपदा के बाद नेपाल को सड़क, पुल, घर और दूसरी जरूरी चीजें दोबारा बनाने के लिए अपनी GDP के करीब 10% के बराबर मदद की जरूरत है। उन्होंने दुनिया से ग्रांट आधारित मदद देने की अपील की। उनका कहना है कि गरीब देशों को आपदा से उबरने के लिए नया कर्ज लेने पर मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।
Project Cheetah: भारत में चीतों का नामोनिशान 1952 में पूरी तरह से समाप्त होने की घोषणा के बाद आज एक ऐसी खबर आई है, जिससे प्रोजेक्ट चीता से जुड़ा हर एक शख्स बेहद खुश है। मध्य प्रदेश के कुनो नेशनल पार्क में भारत में जन्मी एक मादा चीता ने चार बच्चों को जन्म दिया है। यह खबर प्रोजेक्ट चीता के चार पूरा होने के ठीक एक दिन बाद मिली है। इससे भारत में चीतों की आबादी फिर से शुरू करने के प्रयासों को प्रोत्साहन मिला है।
केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने सोशल मीडिया पर एक तस्वीर और वीडियो के साथ इस उपलब्धि की जानकारी साझा की। उन्होंने इसे प्रोजेक्ट चीता के लिए “सच में ऐतिहासिक और खुशी का पल” बताया। यादव ने कुनो नेशनल पार्क और प्रोजेक्ट चीता टीमों को बधाई देते हुए कहा, “चार साल, चार नई जिंदगी — उम्मीद, हिम्मत और भारत में चीता संरक्षण की बढ़ती सफलता का एक सुंदर प्रतीक।”
A truly historic and joyous moment for Project Cheetah!
A day after India’s Cheetah Project completed four years, KGP12, an Indian-born female cheetah, has given birth to four cubs in Kuno.
Four years, four new lives—a beautiful symbol of hope, resilience and the growing… pic.twitter.com/f1zbqSvx1b
— Bhupender Yadav (@byadavbjp) September 18, 2026
चार शावकों को जन्म देने वाली मादा चीता का नाम KGP12 बताया जा रहा है। यह कुनो में पैदा हुए उन भारतीय चीतों में से एक है, जो इस प्रजाति को देश में फिर से लाए जाने के बाद पैदा हुए थे। बता दें, प्रोजेक्ट चीता को भारत में चीतों की आबादी फिर से शुरू करने के मकसद से 17 सितंबर 2022 को लॉन्च किया गया था। इसके लिए नामीबिया से आठ अफ्रीकी चीतों को कुनो नेशनल पार्क लाया गया था। बाद में दक्षिण अफ्रीका से और चीतों के आने के साथ प्रोग्राम को और विस्तार मिला।
1952 में भारत में चीता की प्रजाति के खत्म होने की घोषणा की गई थी। इसके बाद जंगली चीतों की नस्ल को बनाने की भारत की कोशिशों में यह जन्म एक और अहम पड़ाव है। इसके बाद भारत स्थानीय तौर पर खत्म होने के बाद चीतों को जंगल में फिर से लाने वाला एकमात्र देश बन गया। चार स्वस्थ शावकों का जन्म खास तौर पर अहम है क्योंकि दूसरी पीढ़ी का जन्म इस बात का संकेत देते हैं कि फिर से लाई गई आबादी भारतीय हालात के हिसाब से ढलने लगी है।
वाइल्डलाइफ बायोलॉजिस्ट जंगल में सफल ब्रीडिंग को एक कामयाब कंजर्वेशन प्रोग्राम के सबसे मजबूत संकेतों में से एक मानते हैं। इससे पहले सीएनबीसी नेटवर्क 18 की रिपोर्ट में बताया गया था कि देश में प्रोजेक्ट चीता के चार साल पूरे होने पर देश में चीतों की आबादी बढ़कर 52 हो गई है, जिसमें 32 देश में पैदा हुए हैं। पिछले चार सालों में, प्रोजेक्ट चीता को कामयाबी और नाकामी दोनों का सामना करना पड़ा है, जिसमें बीमारी, चोट और पर्यावरण की चुनौतियों के कारण कई बड़े चीतों और शावकों की मौत शामिल है।
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यूरोपीय यूनियन (EU) भीषण गर्मी को आपदा मानते हुए इससे निपटने के लिए नया हीटवेव प्लान बनाएगा। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने बुधवार को कहा कि इस साल की गर्मी ने यूरोप को बड़ा सबक दिया है। उन्होंने बताया कि हीटवेव के दौरान यूरोप में 35 हजार से ज्यादा मौतें हुईं। तेज गर्मी से नदियों सूख गई और कई देशों में जंगलों में भयानक आग लगी। अब जंगलों की आग पर जल्दी काबू पाने के लिए EU आग बुझाने वाले विमानों का अपना बड़ा बेड़ा तैयार करेगा। गर्मी के कारण डेन्यूब, राइन जैसी नदियों का पानी कम हुआ भीषण गर्मी के कारण यूरोप की कई बड़ी नदियों में पानी कम हो गया। इनमें डेन्यूब, राइन और फ्रांस की गारोन नदी भी शामिल हैं। वॉन डेर लेयेन ने कहा कि कई अस्पताल और बुजुर्गों के केयर होम इतनी ज्यादा गर्मी की चपेट में आ गए कि वहां रहना मुश्किल हो गया। उनके मुताबिक, गर्मी का असर शुरुआती अनुमान से कहीं ज्यादा रहा। खतरे वाले 100 इलाकों की पहचान करेगा EU इस साल यूरोप के कई देशों में जंगलों में भयानक आग लगी। इससे करीब 6.60 लाख हेक्टेयर जमीन जल गई और करीब 1.2 करोड़ टन फसलें बर्बाद हो गईं। उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने कहा कि EU अब आग के सबसे ज्यादा खतरे वाले 100 इलाकों की पहचान करेगा। इन इलाकों में आग लगने के खतरे और उससे बचने की तैयारी की जांच की जाएगी। अभी EU के पास आग बुझाने वाले विमानों का छोटा बेड़ा है। आग लगने पर EU सदस्य देशों के बीच विमान, पानी के टैंकर और राहतकर्मी भेजने की व्यवस्था भी करता है। अब इस पूरी व्यवस्था को और बड़ा किया जाएगा। इस योजना को बेहतर बनाने के लिए अनुभवी फायरफाइटर्स और राहत टीमों से भी सुझाव लिए जा रहे हैं। जंगल की आग बुझाते समय जान गंवाने वाले पायलट को याद किया EU कमीशन की अध्यक्ष वॉन डेर लेयेन ने ग्रीस में आग बुझाते समय जान गंवाने वाले डेनमार्क के हेलिकॉप्टर पायलट रूने किंडल को भी याद किया। अगस्त में जंगल की आग बुझाने के दौरान उनकी मौत हो गई थी। वॉन डेर लेयेन ने कहा कि रूने ने दूसरों की जान बचाने के लिए अपनी जान दे दी। उनके नाम का जिक्र होते ही यूरोपीय संसद में लोगों ने तालियां बजाईं। जलवायु परिवर्तन की वजह से यूरोप में गर्मी और बढ़ेगी वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन की एक स्टडी के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन की वजह से यूरोप में इस साल इतनी ज्यादा गर्मी देखने को मिली। वॉन डेर लेयेन ने कहा कि यूरोप दुनिया के औसत तापमान के मुकाबले करीब दोगुनी तेजी से गर्म हो रहा है। उनके मुताबिक आने वाले सालों में यूरोप को तेज गर्मी और ज्यादा झेलनी पड़ सकती है। यूरोप दुनिया के औसत से दोगुनी तेजी से क्यों गर्म हो रहा है? आर्कटिक का असर यूरोप आर्कटिक के काफी करीब है। आर्कटिक दुनिया के बाकी हिस्सों के मुकाबले ज्यादा तेजी से गर्म हो रहा है। इसका असर यूरोप के मौसम और तापमान पर भी पड़ रहा है। जमीन समुद्र से जल्दी गर्म होती है जमीन समुद्र के मुकाबले जल्दी गर्म होती है। यूरोप का बड़ा हिस्सा जमीन पर है, इसलिए यहां तापमान तेजी से बढ़ रहा है। हवाओं का बदलता पैटर्न यूरोप में हवा और जेट स्ट्रीम के रास्ते में बदलाव भी गर्मी बढ़ा रहा है। कई बार गर्म हवा एक जगह लंबे समय तक फंस जाती है। इससे हीटवेव ज्यादा तेज और लंबे समय तक चलती है। ————————— ये खबर भी पढ़ें… जंगली कुत्ते मादा की तलाश में 4000 km घूमे: 9 महीने तक जोड़ीदार तलाशते रहे जाम्बिया के काफ्यू नेशनल पार्क से निकले तीन अफ्रीकी जंगली कुत्तों ने साथी और नया इलाका तलाशने के लिए करीब 4,126 किमी का सफर तय किया। पूरी खबर यहां पढ़ें…
India Net Zero Portal: केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने विश्व ओजोन दिवस 2026 के मौके पर मुंबई में भारत का नेट जीरो पोर्टल और राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC) डैशबोर्ड लॉन्च किया है। ये दोनों डिजिटल इनिशिएटिव्स देश में लिए जा रहे क्लाइमेट एक्शंस में ट्रांसपेरेंसी, कोऑर्डिनेशन के साथ इसे एविंडेस आधारित बनाने में खास भूमिका निभाएंगी।
आपको बता दें कि नेट जीरो पोर्टल अलग अलग संस्थाओं की ओर से वॉलेंट्री लिए गए नेट जीरो संकल्पों को दर्ज करने के लिए एक राष्ट्रीय मंच प्रदान देगा। इसके अलावा NAPCC डैशबोर्ड जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय मिशनों की प्रगति की निगरानी करेगा।
नेट जीरो पोर्टल बताएगा कि क्लाइेट ऐक्शन में कितना हो रहा काम
नेट जीरो पोर्टल विभिन्न क्षेत्रों की भारतीय संस्थाओं द्वारा स्वैच्छिक पंजीकरण और नेट जीरो प्रतिबद्धताओं के डिस्क्लोजर के लिए एक सेंट्रलाइज्ड डिजिटल प्लेटफॉर्म है। इसपर मौजूद संस्थाएं अपने ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन की जानकारी दे सकती हैं, अपने नेट जीरो टारगेट्स का ऐलान करने के अलावा एनुअल रिपोर्ट अपडेट्स भी दे सकती हैं।
कंपनियों को अपने सीधे (Scope 1) और अप्रत्यक्ष (Scope 2) उत्सर्जन का ब्योरा देने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। वहीं सप्लाई चेन से जुड़े (Scope 3) उत्सर्जन की जानकारी देना पूरी तरह से उनकी मर्जी पर निर्भर होगा। कंपनियां इस पोर्टल पर यह भी बता सकती हैं कि वे नेट जीरो का लक्ष्य कैसे हासिल करेंगी। इसमें साफ-सुथरी ऊर्जा को अपनाना, ऊर्जा की बचत, नई तकनीकों का इस्तेमाल और कार्बन हटाने जैसे उपाय शामिल हैं।
जो भी कंपनियां अपने नेट जीरो लक्ष्य सफलतापूर्वक घोषित करेंगी, उन्हें पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की तरफ से आधिकारिक तौर पर एकनॉलेजमेंट दिया जाएगा।
सबके लिए उपलब्ध रहेगा डेटा
कंपनियों की इन घोषणाओं को आम जनता भी देख सकेगी। इससे देश में जलवायु सुधार के लिए हो रहे कामों का एक बड़ा और पारदर्शी रिकॉर्ड तैयार होगा। इस पोर्टल को [https://netzeroindia.moef.gov.in/](https://netzeroindia.moef.gov.in/) पर एक्सेस किया जा सकता है।
NAPCC डैशबोर्ड: एक ही जगह दिखेगा सरकारी मिशनों का पूरा रिपोर्ट कार्ड
राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना यानी NAPCC डैशबोर्ड के जरिए सरकार के अलग-अलग जलवायु मिशनों की प्रगति को एक जगह ट्रैक किया जा सकेगा। यह डैशबोर्ड जलवायु परिवर्तन से जुड़े राष्ट्रीय मिशनों के आंकड़ों को एक साथ लाएगा जिससे संबंधित मंत्रालयों और विभागों को उनकी प्रगति पर निगरानी रखना आसान हो जाएगा। इस डैशबोर्ड से अलग-अलग सरकारी विभागों के बीच बेहतर तालमेल बनेगा। साथ ही यह समझने में मदद मिलेगी कि किस क्षेत्र में कितना काम हुआ है और कहां सुधार की जरूरत है. यह पहल भारत के घरेलू प्रयासों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए गए जलवायु वादों से जोड़ने में भी मदद करेगी। इस डैशबोर्ड को (https://napccindia.moef.gov.in/](https://napccindia.moef.gov.in/) पर देखा जा सकता है।
सरकार की इस पहल का सीधा मकसद टेक्नोलॉजी के जरिए कामकाज में पारदर्शिता लाना और देश को कम-कार्बन वाले भविष्य की ओर ले जाना है, ताकि इस बदलाव में हर किसी की भागीदारी तय की जा सके।
A significant step towards India’s #NetZero journey!
On #WorldOzoneDay, HMoS Shri @KVSinghMPGonda launched India’s Net Zero Portal – a centralised digital platform for voluntary registration and disclosure of Net Zero commitments by Indian entities across sectors.
(1/2) pic.twitter.com/F4G9683pN4
— MoEF&CC (@moefcc) September 16, 2026
26 अगस्त की सुबह नेपाल के रसुवा में आसमान साफ था। अचानक भोटेकोशी नदी में मलबा, पत्थर और पानी का ऐसा सैलाब आया कि सब बहता चला गया। 1300 से ज्यादा मौतें हुईं और 5 हजार से ज्यादा लोग लापता हैं। ये तबाही चीन की तरफ बनी झील फटने से हुई थी। सवाल उठा कि क्या चीन को इस तबाही की पहले से खबर थी और क्या उसने नेपाल को इस बारे में चेतावनी दी थी। चीन के विदेश विभाग के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने दावा किया कि चीन ने नेपाल को समय-समय पर मौसम का डेटा और चेतावनियां दी थीं। ब्रिटिश न्यूज एजेंसी रायटर्स की रिपोर्ट में भी दावा किया गया कि आपदा से करीब 12 दिन पहले चीन ने नेपाल को ईमेल भेजकर भारी बारिश की जानकारी दी थी। इससे लगता है कि नेपाल के पास खबर थी कि तबाही हो सकती है, लेकिन कहानी इतनी सीधी नहीं है। पढ़िए रिपोर्ट… चीन-नेपाल के एक्सपर्ट चार महीने में तीन बार मिले
अप्रैल से जुलाई के बीच चीन और नेपाल के पर्यावरण, मौसम और आपदा प्रबंधन से जुड़े अधिकारी और वैज्ञानिक कम से कम तीन अलग-अलग मंचों पर मिले। इस दौरान ग्लेशियर, ग्लेशियल झील, जलवायु से जुड़े जोखिम और अर्ली वार्निंग पर बात हुई। पहली बैठक: 22 अप्रैल–5 मई, बीजिंग
चीन की नेशनल अकैडमी ऑफ फॉरेस्टी एंड ग्रासलैंड एडमिनिस्ट्रेशन ने पर्यावरण संरक्षण और ग्रीन ट्रांसफॉर्मेशन पर सेमिनार किया। नेपाल के प्रतिनिधियों ने इसमें हिस्सा लिया। दूसरी बैठक: 27 मई, काठमांडू
नेपाल के 10 और चीन-तिब्बत के 12 अधिकारियों के बीच बैठक हुई। इसमें ग्लेशियल झीलों की मैपिंग और ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी अचानक जलस्तर बढ़ने या ग्लेशियर झील फटने के खतरे को कम करने पर चर्चा हुई। तीसरी बैठक: जुलाई, तिब्बत
तिब्बत के निंगची में 5th ट्रांस हिमालय इंटरनेशनल कोऑपरेशन फोरम हुआ। इसमें 29 देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए। नेपाल भी इनमें शामिल था। इसी दौरान चीन ने अपना मल्टी हेजार्ड अर्ली वार्निंग सिस्टम भी पेश किया। 12 दिन पहले चीन ने क्या चेतावनी दी थी
रायटर्स के मुताबिक, 14 अगस्त के आसपास चीन के विश्व मौसम विज्ञान केंद्र ने नेपाल को ईमेल भेजा था। इसमें 14 से 19 अगस्त के बीच भारी बारिश और मानसूनी दबाव की आशंका जताई गई थी। हालांकि, यह भी 26 अगस्त के लिए नहीं था। यहां एक अहम फर्क है। भारी बारिश का पूर्वानुमान और किसी खास ग्लेशियर के टूटने की चेतावनी एक बात नहीं है। नेपाल के सबसे बड़े आपदा अधिकारी बोले- स्पेसिफिक वार्निंग नहीं मिली
नेपाल की नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी के कार्यकारी प्रमुख डॉ. धरम उप्रेती ने चीन के दावे पर सीधे आधिकारिक टिप्पणी करने से परहेज किया। उनके मुताबिक पानी इतनी तेजी से नीचे आया कि सीमा क्षेत्र में लगा रिवर मॉनिटरिंग सिस्टम भी प्रभावित हुआ। नीचे की तरफ अलर्ट जारी करने का समय मिला, लेकिन ऊपरी इलाके में लोगों के पास बचने के लिए पर्याप्त समय नहीं था। डॉ. उप्रेती बताते हैं कि नेपाल में नदियों पर रिवर गेज स्टेशन लगे हैं। पानी के तय सीमा से ऊपर जाते ही प्रभावित इलाकों में SMS अलर्ट भेजे जाते हैं। यह व्यवस्था 2015 से चल रहे फ्लड अर्ली वार्निंग सिस्टम का हिस्सा है। नदी और जगह के हिसाब से सामान्य स्थिति में करीब 6 मिनट से 6 घंटे तक का लीड टाइम मिल सकता है। 26 अगस्त को खतरे की जानकारी मिलते ही 1-2 मिनट में निचले इलाकों के लिए SMS अलर्ट जारी किए गए। पहला अलर्ट करीब 9:15 बजे और दूसरा 11:50 बजे भेजा गया। इसके बाद भी स्थिति के हिसाब से अलर्ट जारी होते रहे। सोशल मीडिया, टीवी और रेडियो से भी चेतावनी दी गई। डॉ. उप्रेती के मुताबिक करीब 4 हजार लोगों के फोन पर अलर्ट भेजा गया था। कितने लोगों ने उसे देखा, इसका डेटा नहीं है। डॉ. उप्रेती के मुताबिक, पानी करीब 180 किमी प्रति घंटे या उससे ज्यादा की रफ्तार से नीचे आया। इससे अलर्ट जारी करने और उसके लोगों तक पहुंचने के बीच का समय बहुत कम रह गया। ‘सिर्फ ईमेल भेजना चेतावनी नहीं, सही एजेंसी को, सही वक्त पर मिलना जरूरी’ चीन की तरफ से भेजे गए ईमेल पर डॉ. उप्रेती कहते हैं, ‘मुझे नहीं पता कि 26 अगस्त से पहले किस अधिकारी को, कब और किस स्तर की चेतावनी भेजी गई थी। सिर्फ ईमेल भेज देना पर्याप्त नहीं है। सूचना सही एजेंसी तक सही समय पर पहुंचे और उस पर कार्रवाई हो, तभी वह वास्तविक चेतावनी बनती है।’ यहीं चीन के दावे पर सवाल खड़ा होता है। अगर 12 दिन पहले इतनी अहम जानकारी थी, तो वह नेपाल की किस एजेंसी तक पहुंची, किस अधिकारी ने उसे देखा और उसके आधार पर क्या कदम उठाए गए। बैठकों में ग्लेशियर पर चर्चा हुई, लेकिन खास चेतावनी नहीं डॉ. उप्रेती के मुताबिक, चीन और नेपाल के वैज्ञानिक हिमालय में बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों के पिघलने और एवलॉन्च जैसे खतरों पर लगातार चर्चा करते रहे हैं। 27 मई की बैठक में भी इसके जोखिमों पर बात हुई थी। किसी खास ग्लेशियर के टूटने की स्पेसिफिक वार्निंग नहीं मिली थी। दो अलग-अलग बातें हैं। पहली- हिमालय में ग्लेशियर और जलवायु परिवर्तन से खतरा बढ़ रहा है। दूसरी- किसी खास ग्लेशियर के टूटने और उससे अचानक बाढ़ आने की पहले से चेतावनी। दूसरी तरह की चेतावनी का कोई स्पष्ट प्रमाण सामने नहीं आया। मौजूदा सिस्टम क्यों वॉर्निंग नहीं दे पाया सामान्य GLOF यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड में ग्लेशियर के पास बनी झील का पानी अचानक बाहर निकलता है। 26 अगस्त की घटना में ग्लेशियल झील के फटने की प्रक्रिया सामने नहीं आई। शुरुआती वैज्ञानिक आकलन के मुताबिक, यहां मुख्य ट्रिगर रॉक-आइस एवलॉन्च और ग्लेशियर का हिस्सा टूटना था। यही सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती है। नदी का पानी बढ़ने पर गेज स्टेशन पकड़ सकता है। ग्लेशियल झील में पानी बढ़े, तो उसकी निगरानी की जा सकती है। पहाड़ पर ग्लेशियर का एक हिस्सा किस दिन, किस समय टूटेगा, इसे पहले से पकड़ना मुश्किल है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट के सीनियर रिसोर्स एसोसिएट श्रवण स्विफ्ट बताते हैं, ‘यह नहीं कहा जा सकता कि चीन ने कोई जानकारी दी ही नहीं थी। घटना के समय हमारी टीम चीन के वैज्ञानिकों के संपर्क में थी और दोनों पक्षों ने सूचनाएं साझा की थीं।’ हालांकि, वे स्पष्ट नहीं कर सके कि 26 अगस्त से पहले नेपाल को किसी खास ग्लेशियर के टूटने या बाढ़ की स्पेसिफिक चेतावनी दी गई थी या नहीं। उनके मुताबिक उस इलाके में ग्लेशियर की निगरानी के लिए कोई स्टेशन नहीं था। हाईरिस्क कंसोर्टियम की रिपोर्ट के मुताबिक, 26 अगस्त की सुबह लांगटांग लिरुंग इलाके में ग्लेशियर और उसके नीचे की चट्टान का हिस्सा टूट गया। इससे पहले इसके संकेत मिलने लगे थे। ग्लेशियर की सतह की गति बढ़ गई थी और 24 अगस्त तक पिघला पानी भूरा दिखाई देने लगा। ग्लेशियर और चट्टानों के टूटने से 5.2 तीव्रता का भूकंप दर्ज हुआ, लेकिन इन संकेतों को चेतावनी में बदलने वाला सिस्टम मौजूद नहीं था। टूरिज्म बोर्ड का दावा- हमें कोई अलर्ट नहीं मिला इस आपदा में विदेशी नागरिकों की भी मौत हुई है। नेपाल सरकार के 6 सितंबर के आंकड़ों के मुताबिक करीब 600 विदेशी नागरिक अब भी लापता हैं। इनमें 35 देशों के नागरिक शामिल हैं। हमने नेपाल टूरिज्म बोर्ड से पूछा कि क्या पर्यटकों को कोई चेतावनी मिली थी? बोर्ड के प्रवक्ता सुनील शर्मा ने जवाब दिया- 26 अगस्त से पहले चीन की ओर से बोर्ड को ऐसा कोई अलर्ट नहीं मिला, जिसे पर्यटकों के लिए चेतावनी के तौर पर जारी किया जा सके। इसलिए बोर्ड ने भी पर्यटकों के लिए कोई अलर्ट जारी नहीं किया। उन्हें चीन की चेतावनी के बारे में जानकारी बाद में मीडिया से मिली। सुनील शर्मा उनके मुताबिक घटना इतनी तेजी से हुई कि पर्यटकों को अलर्ट करने या उन्हें निकालने का समय ही नहीं मिला। नेपाल में मौसम और जलस्तर बढ़ने की चेतावनी देने वाला सिस्टम है, लेकिन इस पैमाने की आपदा के सामने बेबस साबित हुआ। चश्मदीदों तक चीन का अलर्ट तो दूर, सरकारी SMS भी नहीं पहुंचा भास्कर की टीम त्रिशूली घाटी के प्रभावित इलाकों में पहुंची। चश्मदीदों से पूछा कि बाढ़ आने से पहले आपको अलर्ट मिला था? ज्यादातर लोगों ने कहा कि मैसेज नहीं आया, पुलिस के सायरन या चेतावनी से खतरे की जानकारी मिली। त्रिशूली बाजार में मिले दुकानदार सुजन ने बताया कि पुलिस लोगों से सुरक्षित जगह जाने के लिए कह रही थी। ज्यादातर लोगों ने यही बात कही। सिर्फ एक केस: स्विट्जरलैंड में समय रहते गांव खाली कराया
ग्लेशियर के टूटने की अर्ली वार्निंग का सिर्फ एक प्रमाण 2025 में मिलता है। स्विट्जरलैंड के आल्प्स में ग्लेशियर की गतिविधियों पर एक रिसर्च टीम की समय रहते नजर पड़ गई थी। इसके बाद ब्लाटेन गांव को खाली कराया गया और बड़े एवलॉन्च से पहले लोगों को सुरक्षित निकाल लिया गया। वर्जीनिया टेक के भू-विज्ञानी फिलिप प्रिंस के मुताबिक आल्प्स जैसी व्यवस्था हिमालय में लागू करना बहुत मुश्किल है। आल्प्स के कई इलाकों में आसानी से पहुंचा जा सकता। हिमालय बहुत बड़ा, ऊंचा और दुर्गम है। सैकड़ों ऐसी जगहें हो सकती हैं, जहां ग्लेशियर या चट्टान टूटने का खतरा हो। हर जगह लगातार निगरानी के लिए जरूरी सेंसर, तकनीकी टीम और संचार व्यवस्था खड़ी करना बड़ी चुनौती है। नेपाल से ग्राउंड रिपोर्ट यहां पढ़ें… 1. सायरन बजा, बचने के लिए मिले सिर्फ 30 मिनट ‘पानी आया, और सब ले गया, अब और क्या बोलूं।’ नेपाल के त्रिशूली में रहने वाले सुजन की इस एक लाइन में तबाही, बर्बादी और बेबसी की पूरी कहानी है। 26 अगस्त को ग्लेशियर टूटने के बाद अचानक आई बाढ़ से तबाह होने वाली बस्तियों में नुवाकोट जिले का त्रिशूली सबसे प्रमुख है। पढ़िए पूरी खबर… 2. बाढ़ आई… बाढ़ आई, जान बचाकर दोबारा भागे लोग 30 अगस्त की सुबह हम नेपाल के देवीघाट पहुंचे। हर तरफ मलबा था, जिसमें लोग सामान और अपनों को तलाशते मिले। सब सामान्य था, तभी अचानक बाढ़ का अलर्ट आया और हड़कंप मच गया। लोग बदहवास होकर सेफ जगह तलाशने के लिए भागने लगे। कुछ ही मिनट में कस्बा खाली हो गया। देवीघाट नेपाल के नुवाकोट जिले में त्रिशूली और ताड़ी नदी के संगम पर बसा है। पढ़िए पूरी खबर…
El Nino effect: भारत के पड़ोसी देश श्रीलंका में जलवायु परिवर्तन और मौसमी बदलावों के बीच पीने के पानी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। मजबूत होते अल नीनो, रिकॉर्ड हाई टेंप्रेचर और बारिश की भारी कमी की वजह से श्रीलंका के कई हिस्सों में सूखा और ड्राई मौसम बेहद भीषण रूप ले चुका है। अधिकारियों द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक इस मौसमी आपदा की वजह से देश भर में 1 लाख 15 से अधिक लोग पीने के पानी के गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं।
अल नीनो का श्रीलंका पर असर
श्रीलंका के मौसम विज्ञान विभाग के महानिदेशक अजीत विजेमन्ना ने जानकारी दी है कि क्षेत्र में अल नीनो का असर रंग दिखा रहा है। ये गर्म मौसम के पैटर्न के लिए जिम्मेदार हो सकता है। आपको बता दें कि अल नीनो एक ऐसी मौसमी गतिविधि है जो मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के पानी का के गर्म होने से पैदा होती है। ये पूरे क्षेत्र के तापमान पैटर्न को पूरी तरह से बदल देता है।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि चारों तरफ से हिंद महासागर से घिरा होने की वजह से श्रीलंका पर इस अल नीनो का असर अधिक तेज देखने को मिल सकता है। लगातार जारी सूखे के बीच अधिकारी इसके संभावित प्रभावों पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।
7 जिलों के 115000 से अधिक लोग प्रभावित, जलाशय सूखे
आपदा प्रबंधन केंद्र (DMC) द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक अल नीनो मौसम पैटर्न की वजह से श्रीलंका के 25 प्रशासनिक जिलों में से 7 जिलों में 115586 लोग सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं। भीषण गर्मी और बारिश न होने से कई इलाकों में पानी की उपलब्धता को लेकर गंभीर चुनौतियां पैदा हो गई हैं। डीएमसी अधिकारी प्रगीत दनांसुरिया के मुताबिक मौजूदा समय में देश के 1 लाख 15 हजार से ज्यादा लोग पीने के पानी की कमी से जूझ रहे हैं।
उत्तर-मध्य अनुराधापुरा जिले में सिंचाई अधिकारियों ने बताया कि लगभग 3500 एकड़-फिट की क्षमता वाले एरुवेवा जलाशय का जलस्तर घटकर अब मात्र 1000 एकड़-फिट रह गया है। मध्य क्षेत्र के माटले और उत्तर-पूर्व के नंदीकडाल सहित कई क्षेत्रों में वॉटर बॉडी के स्तर में भारी गिरावट दर्ज की गई है।
वन्यजीवों, समुद्री जीवन और खेती पर पड़ा बुरा असर
इस लंबे शुष्क मौसम और जल संकट ने श्रीलंका के पारितंत्र और कृषि को भारी नुकसान पहुंचाया है। उत्तर-पूर्व के मुल्लैथिवु लैगून में हजारों की संख्या में छोटी मछलियां मृत पाई गई हैं। अधिकारियों ने इन मौतों का कारण समुद्री पानी और मीठे पानी के आपस में मिलने को बताया है। कई क्षेत्रों में प्राकृतिक जल स्रोत पूरी तरह सूख रहे हैं। इसकी वजह से जंगली जानवर पानी के वैकल्पिक स्रोतों की तलाश में भटकने के लिए मजबूर हो गए हैं। पानी की कमी की वजह से कृषि क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हुआ है। धान, नारियल, केला और अमरूद जैसी प्रमुख फसलें पानी न मिलने से नष्ट होने के कगार पर हैं।
सितंबर के अंत से राहत की उम्मीद
मौसम विज्ञान विभाग के महानिदेशक अजीत विजेमन्ना ने उम्मीद जताई है कि सितंबर के अंत से देश में कुछ बारिश होने की संभावना है। ऐसे में अगर बारिश होती ह तो श्रीलंका को इस भीषण गर्म मौसम, जल संकट और अल नीनो के प्रभाव से राहत मिल सकती है।

Swachh Vayu Sarvekshan 2026 Lucknow First: उत्तर प्रदेश में स्वच्छ हवा को लेकर किए जा रहे लगातार प्रयासों ने राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी उपलब्धि हासिल की है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मार्गदर्शन में प्रदेश ने स्वच्छ वायु सर्वेक्षण-2026 में शानदार प्रदर्शन करते हुए देश में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ओर से कराए गए सर्वेक्षण में 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की श्रेणी में लखनऊ ने पहली बार इंदौर को पीछे छोड़ते हुए देश में पहला स्थान प्राप्त किया है।
लखनऊ ने 198 अंक के साथ प्रथम स्थान जबकि इंदौर 197 और जबलपुर 195 अंकों के साथ दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे हैं। यह उपलब्धि केवल राजधानी लखनऊ तक सीमित नहीं है। प्रदेश के 16 शहरों ने अलग-अलग आबादी वर्गों में राष्ट्रीय स्तर पर बेहतर प्रदर्शन किया है। इससे स्पष्ट है कि प्रदेश में स्वच्छ वायु को लेकर शहर स्तर से लेकर वार्ड स्तर तक योजनाबद्ध तरीके से काम किया जा रहा है।
यूपी के दूसरे शहरों ने भी दिखाया दम
10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की श्रेणी में उत्तर प्रदेश के कई शहरों ने भी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई। आगरा 192 अंकों के साथ चौथे, गाजियाबाद 184 अंकों के साथ नौवें, कानपुर 183.2 अंकों के साथ 11वें और प्रयागराज 180 अंकों के साथ 13वें स्थान पर रहा। मेरठ 22वें और वाराणसी 34वें स्थान पर रहे। इस रैंकिंग से यह संकेत मिलता है कि स्वच्छ हवा को लेकर प्रदेश के बड़े शहरों में किए जा रहे प्रयासों का असर व्यापक स्तर पर दिखाई दे रहा है।
3 से 10 लाख आबादी वाले शहरों में भी यूपी का दबदबा
मध्यम आबादी वाले शहरों की श्रेणी में भी उत्तर प्रदेश ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। फिरोजाबाद ने 195 अंक हासिल कर देश में दूसरा स्थान प्राप्त किया। शहर में कांच उद्योगों को स्वच्छ प्राकृतिक गैस ईंधन की ओर तेजी से स्थानांतरित करने को अहम उपलब्धि माना गया। झांसी 192.5 अंकों के साथ पांचवें, जबकि मुरादाबाद और नोएडा 187.5-187.5 अंकों के साथ संयुक्त रूप से आठवें स्थान पर रहे। गोरखपुर 22वें और बरेली 26वें स्थान पर रहा।
छोटे शहरों में भी बेहतर प्रदर्शन
तीन लाख से कम आबादी वाले शहरों की श्रेणी में भी यूपी के शहरों ने प्रभावी प्रदर्शन किया। रायबरेली 180.5 अंकों के साथ 17वें स्थान पर रहा। अनपरा 29वें, खुर्जा 30वें और गजरौला 31वें स्थान पर रहे। इन शहरों में धूल नियंत्रण और वाहनों से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए किए गए प्रयासों को प्रमुखता मिली।
वार्ड स्तर पर भी यूपी की बड़ी उपलब्धि
स्वच्छ वायु प्रबंधन को शहरों तक सीमित रखने के बजाय स्थानीय स्तर पर भी प्रभावी कदम उठाए गए। 30 हजार से अधिक आबादी वाले शहरी वार्डों की राष्ट्रीय श्रेणी में लखनऊ के जोन-4 स्थित वार्ड-70 ने पहला स्थान हासिल किया। वहीं 10 हजार से 30 हजार आबादी वाले वार्डों की श्रेणी में प्रयागराज के वार्ड-31 ने तीसरा स्थान प्राप्त किया। राज्य स्तरीय वार्ड पुरस्कारों में कानपुर के वार्ड केएनपी078, प्रयागराज के वार्ड-33 और बरेली के गांधी उद्यान वार्ड-32 को उत्कृष्ट कार्य के लिए सम्मानित किया गया। खुले में कूड़ा जलाने पर प्रभावी रोक और स्थानीय स्तर पर धूल नियंत्रण जैसे उपायों को इसमें महत्वपूर्ण माना गया।
समन्वित रणनीति का परिणाम
प्रदेश में स्वच्छ हवा के लिए नगर विकास विभाग, स्थानीय नगरीय निकायों और उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के समन्वय से विभिन्न स्तरों पर कार्रवाई की गई। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत तैयार और लागू की गई समन्वित रणनीति का असर लखनऊ के देश में पहले स्थान समेत यूपी के कई शहरों और वार्डों की राष्ट्रीय रैंकिंग में दिखाई दिया है।
पुरस्कार के साथ बढ़ा स्थानीय निकायों का उत्साह
स्वच्छ वायु सर्वेक्षण-2026 में उत्तर प्रदेश ने शानदार प्रदर्शन किया है। श्रेणी-1 में लखनऊ नगर निगम को प्रथम पुरस्कार हासिल करने के साथ ही 1.5 करोड़ रुपये की पुरस्कार राशि मिली है। वहीं श्रेणी-2 में फिरोजाबाद नगर निगम को प्रथम पुरस्कार के साथ 25 लाख रुपये की पुरस्कार राशि प्रदान की गई है। वार्ड स्तर पर भी प्रदेश को महत्वपूर्ण सफलता मिली। लखनऊ नगर निगम के वार्ड-70 को प्रथम पुरस्कार के साथ 50 लाख रुपये, प्रयागराज नगर निगम के वार्ड-31 ने तृतीय पुरस्कार के साथ 20 लाख रुपये की पुरस्कार राशि दी गई है।
स्वच्छ वायु के क्षेत्र में लखनऊ की उपलब्धि प्रदेश के लिए नई प्रेरणा- नगर विकास मंत्री
नगर विकास एवं ऊर्जा मंत्री अरविंद कुमार शर्मा ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कुशल नेतृत्व में उत्तर प्रदेश के शहरों की तस्वीर तेजी से बदल रही है। लखनऊ ने स्वच्छ वायु संरक्षण के क्षेत्र में पहली बार इंदौर को पीछे छोड़कर देश में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। यह उपलब्धि प्रदेश के लिए एक नई प्रेरणा है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि जिस प्रकार स्वच्छ वायु के क्षेत्र में लखनऊ ने देश में पहला स्थान हासिल किया है, उसी प्रकार स्वच्छता सर्वेक्षण में भी लखनऊ को देश का नंबर-वन शहर बनाने के लिए सरकार, नगर निगम और नागरिक मिलकर पूरी प्रतिबद्धता से कार्य करेंगे।
लखनऊ की नंबर-1 उपलब्धि ने बढ़ाया यूपी का गौरव
लखनऊ को 198 अंकों के साथ देश में पहला स्थान मिलना प्रदेश के लिए विशेष उपलब्धि है। राजधानी में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए इलेक्ट्रिक परिवहन, सड़क की धूल नियंत्रण, वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन, हरियाली बढ़ाने और यातायात व्यवस्था को बेहतर करने जैसे क्षेत्रों में लगातार काम किया गया। नगर निगम की ओर से डोर-टू-डोर कूड़ा संग्रहण के लिए करीब 1,100 इलेक्ट्रिक वाहनों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए शहर में 12 चार्जिंग स्टेशन और 916 चार्जिंग प्वाइंट बनाए गए हैं। स्वच्छ परिवहन की दिशा में 140 इलेक्ट्रिक बसों का संचालन भी किया जा रहा है। सड़क की धूल को नियंत्रित करने के लिए 97 इलेक्ट्रिक मैकेनाइज्ड स्वीपिंग मशीनें संचालित हैं। इसके साथ ही 559.85 किलोमीटर सड़कों को एंड-टू-एंड पक्का किया गया है, जिससे धूल के कारण होने वाले प्रदूषण को कम करने में मदद मिली है।
कचरा प्रबंधन और हरियाली पर भी विशेष जोर
स्वच्छ वायु की रणनीति में वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया। लखनऊ में 2,550 टीपीडी क्षमता से 100 प्रतिशत वैज्ञानिक कचरा प्रसंस्करण की व्यवस्था की गई है। खुले में कूड़ा जलाने की समस्या को नियंत्रित करने के साथ ही शहर में कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण पर जोर दिया गया। शहर में हरियाली बढ़ाने के लिए वर्टिकल गार्डन और मियावाकी पौधरोपण जैसे प्रयास किए गए।
इस तरह स्वच्छ वायु के लिए परिवहन, सड़क, कचरा प्रबंधन और हरित क्षेत्र सभी प्रमुख क्षेत्रों को एक साथ जोड़कर काम किया गया। लखनऊ की महापौर सुषमा खर्कवाल ने इस उपलब्धि का श्रेय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व, जनता, पार्षदों और नगर निगम कर्मियों के सामूहिक प्रयासों को दिया है। राजधानी की यह सफलता अब प्रदेश के दूसरे शहरों के लिए भी स्वच्छ वायु प्रबंधन के क्षेत्र में एक प्रभावी मॉडल के रूप में सामने आई है।

प्रभाकर मणि तिवारी
भारत में खासकर पूर्वी हिमालय क्षेत्र में बड़े पैमाने पर बनने वाली पनबिजली परियोजनाएं, इनके तहत बनने वाले बांध और सुरंगों से पैदा होने वाले खतरे अक्सर सुर्खियां बटोरते रहे हैं। लेकिन अब नेपाल के भयावह हादसे में बड़े पैमाने पर जान-माल के नुकसान ने विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। उनको आशंका है कि जम्मू-कश्मीर के अलावा उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में कभी भी नेपाल जैसे हादसे का खतरा मंडरा रहा है। ALSO READ: जलवायु न्याय की मांग कर रहा है आपदा प्रभावित नेपाल
हाल के वर्षों में इन राज्यों में भूस्खलन और सुरंग धंसने की अलग-अलग घटनाओं में कई लोग मारे जा चुके हैं। लेकिन इसके बावजूद पहाड़ों की कटाई करके ऐसी परियोजनाएं बनाने का काम जारी है। इनमें खासकर सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश की स्थिति सबसे चिंताजनक है।
अरुणाचल का संकट
चीन सरकार अरुणाचल प्रदेश से सटे इलाके में एक विशालकाय बांध बना रही है। बीते साल इसका निर्माण कार्य शुरू हुआ था। करीब डेढ़ सौ अरब अमेरिकी डॉलर की लागत वाली इस परियोजना के वर्ष 2033 तक पूरा होने का लक्ष्य है। विशेषज्ञ इसे वाटर बम बताते हैं। लेकिन भूवैज्ञानिकों की असली चिंता इस परियोजना का आकार नहीं बल्कि इसकी लोकेशन है। यह मेडॉग परियोजना उस फॉल्ट जोन के पास स्थित है, जहां भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटें मिलती हैं। इसकी वजह से यह इलाका भूकंप के प्रति बेहद संवेदनशील है। बीते साल भी तिब्बत के शिगात्से इलाके में रिक्टर स्केल पर 7.1 की तीव्रता वाले एक भूकंप के कारण वहां 120 से ज्यादा लोगों की मौत के अलावा कुछ बांधों को नुकसान पहुंचने की खबरें आई थी।
विशेषज्ञों का कहना है कि चीनी परियोजना के तहत बनने वाले बांध को भूकंपरोधी तकनीक से बनाने के बावजूद किसी बड़े भूकंप की स्थिति में जमीन धंसने और चट्टानों के टूटने का खतरा पैदा हो सकता है। इससे बांध पर तो खास असर नहीं होगा। लेकिन नदी के निचले हिस्से में स्थित भारतीय इलाकों को नेपाल जैसी आपदा झेलनी पड़ सकती है। इससे नदी का बहाव बदल सकता है। इससे पहले भी ऐसी कुछ घटनाएं हो चुकी हैं। वर्ष 2000 में तिब्बत में एक बांध टूटने से पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों में बाढ़ आ गई थी। इससे पहले वर्ष 2017 में अरुणाचल प्रदेश की सियांग नदी का पानी अचानक काला पड़ गया था। तब इसके लिए तिब्बत में खनन गतिविधियों को जिम्मेदार ठहराया गया था। यही सियांग नदी असम में प्रवेश करने के बाद ब्रह्मपुत्र कहलाती है।
विशेषज्ञों ने चेताया है कि चीनी परियोजना के तहत बनने वाला विशालकाय बांध पूर्वोत्तर भारत में बड़े पैमाने पर तबाही ला सकता है। ALSO READ: मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों पर जलवायु के गंभीर खतरे का डर
भारत की जवाबी रणनीति
इसके असर की काट के लिए भारत सरकार ने भी राज्य के अपर सियांग में 11 हजार मेगावाट क्षमता वाली एक बहुउद्देशीय परियोजना बनाने का फैसला किया है। लेकिन स्थानीय लोग और संगठन इसका विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि इससे डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों के सामने विस्थापन का खतरा पैदा हो जाएगा। अरुणाचल प्रदेश में आधा दर्जन पनबिजली परियोजनाएं चल रही हैं जबकि करीब तीन दर्जन छोटी-बड़ी परियोजनाओं का काम चल रहा है। इनमें दिबांग, अपर सियांग, लोअर सुबनसिरी और इटालीन जैसी बड़ी परियोजनाएं शामिल हैं। राज्य सरकार ने 2025-35 को 'पनबिजली का दशक' घोषित किया है।
भूवैज्ञानिकों का कहना है कि अरुणाचल प्रदेश में हिमालय की संरचना भी उस नेपाल-तिब्बत सीमा जैसी है जो हाल में प्राकृतिक हादसे का शिकार हुआ है। खासकर इटालीन परियोजना तो भूकंप के प्रति बेहद संवेदनशील इलाके में है। वहां ग्लेशियल झीलों के फटने का खतरा भी बना हुआ है।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने देश भर में ऐसे 195 ग्लेशियल झीलों की पहचान की है जिनके फटने से बाढ़ आने का खतरा है। किसी ग्लेशियर के पिघलने से बनी झील को रोकने वाली बर्फ, चट्टान या मलबे जैसी प्राकृतिक दीवार के अचानक टूटने के बाद आने वाली बाढ़ को 'ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड' या 'ग्लोफ' कहा जाता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इनमें से 32 झीलें अकेले अरुणाचल में ही हैं।
क्या है विशेषज्ञों का आकलन?
पूर्वोत्तर के मशहूर भूवैज्ञानिक डा. प्रमोद चंद्र सरमा डीडब्ल्यू से कहते हैं, “हिमालय प्राकृतिक रूप से एक नाजुक पर्वतीय प्रणाली है।इसका पूर्वी क्षेत्र अभी युवा है। इस इलाके में हमेशा भूकंप, भूस्खलन, हिमस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा बना रहता है। जलवायु परिवर्तन इस खतरे को और बढ़ा रहा है। इसके साथ ही पनबिजली परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर बनने वाले बांधों ने इस जोखिम को कई गुना बढ़ा दिया है।”
पर्यावरणविद डीके अपांग डीडब्ल्यू से कहते हैं, “राज्य में प्रस्तावित तमाम बड़ी परियोजनाएं भूकंप के लिहाज बेहद संवेदनशील इलाकों में स्थित हैं। चीनी बांध परियोजना ने प्राकृतिक विपदा के खतरे को काफी बढ़ा दिया है।”
सियांग बहुउद्देशीय परियोजना का लंबे समय से विरोध कर रहे सियांग इंडीजीनस फार्म्स फोरम (एसआईएफएफ) के प्रमुख जेजांग डीडब्ल्यू से कहते हैं, “अपर सियांग इलाका चीनी सीमा से सटा है। इसका निर्माण पूरा होने पर यहां भी नेपाल जैसा हादसा होने का खतरा बढ़ जाएगा।” ALSO READ: हिमालय क्षेत्र में भविष्य में भी ग्लेशियर फ्लड आने का गंभीर खतरा
क्या हैं बचाव के उपाय?
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को अर्ली-वार्निंग सिस्टम पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए ताकि ऐसे हादसे के बारे में समय रहते जानकारी मिल सके। इसके साथ ही इलाके में मौसम और हिमालय की ऊंचाई पर बने ग्लेशियरों और झीलों की स्थिति पर चौबीसों घंटे निगरानी का तंत्र विकसित करना होगा।
केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर डीडब्ल्यू को बताते हैं, “सरकार अर्ली वार्निंग सिस्टम पर काम कर रही है। पहले चरण में 46 बेहद संवेदनशील बांधों में से 40 में यह प्रणाली लागू की जा चुकी है। चरणबद्ध तरीके से दूसरी परियोजनाओं में भी इसे लागू किया जाएगा।
संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2023 में कहा था कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से बीते करीब तीन दशकों के दौरान कार्बन का सबसे ज्यादा उत्सर्जन करने वाले दो देशों, भारत और चीन के बीच स्थित नेपाल के ग्लेशियरों में जमा बर्फ की मात्रा एक-तिहाई कम हो गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इसे ध्यान में रखते हुए इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है कि भौगोलिक रूप से अस्थिर हिमालयी क्षेत्र में सियांग और उसके जैसे बड़े बांधों का निर्माण उचित है या नहीं?

प्रभाकर मणि तिवारी
संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट ने पर्यावरणविदों और मौसम वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिण एशिया के मुंबई, कोलकाता और ढाका समेत निचले इलाको में बसे कई शहरों में 1.40 करोड़ लोगों पर निकट भविष्य में विस्थापन का खतरा है। विशेषज्ञों का कहना है कि वर्ष 2024 में समुद्री जलस्तर में रिकार्ड छह मिलीमीटर की वृद्धि ने इस खतरे को कई गुना बढ़ा दिया है। ALSO READ: हिमालय क्षेत्र में भविष्य में भी ग्लेशियर फ्लड आने का गंभीर खतरा
क्या-क्या कहा गया है यूएन की रिपोर्ट में?
संयुक्त राष्ट्र की उप-महासचिव अमीना मोहम्मद ने 55वीं पैसिफिक आइलैंड्स फोरम लीडर्स मीटिंग में सोमवार को यह रिपोर्ट जारी की। संयुक्त राष्ट्र के सहायक महासचिव नवीद हनीफ ने भी न्यूयार्क में पत्रकारों को विस्तार से इसकी जानकारी दी।
रिपोर्ट में विस्थापन के खतरे की समयसीमा के बारे में तो कुछ नहीं कहा गया है। हालांकि इसके मुताबिक, दुनिया भर के करीब 77 करोड़ लोग इस खतरे की चपेट में आ सकते हैं। इसमें कहा गया है कि समुद्र का बढ़ता जलस्तर आगे चल कर खाद्य सुरक्षा, पूर्वजों की जमीन और हमारी पहचान के लिए भी खतरा बन सकता है। ऐसे में सरकारों को इस मुद्दे को अपनी योजना प्रक्रिया का हिस्सा बनाने के लिए एक बहुत ही व्यापक दृष्टिकोण अपनाना होगा।
रिपोर्ट में हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने से बाढ़ और सूखे के बढ़ने की चेतावनी भी दी गई है। इसमें कहा गया है कि ग्लेशियरों की तादाद ज्यादा होने के कारण दक्षिण एशिया दुनिया का 'तीसरा ध्रुव' बन गया है।
अब तक मिले संकेतों से अनुमान लगाए जा रहे हैं कि अगले 15-20 वर्षों में दक्षिण एशिया में ग्लेशियरों के पिघलने के कारण बाढ़ की समस्या गंभीर हो सकती है। उसके बाद पैदा होने वाली सूखे की स्थिति के कारण खेती और खाद्य सुरक्षा पर बेहद प्रतिकूल असर पड़ सकता है। ऐसे बदलाव हिमालयी नदी प्रणाली और खेती पर निर्भर समुदायों को के लिए बड़ा खतरा बनेंगे।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियरों के पिघलने की प्रक्रिया तेज होती है और पानी गर्म होता है। इसका असर कई स्तरों पर नजर आता है। समुद्र का जलस्तर बढ़ने से शहरी बुनियादी ढांचे, जल प्रणालियों, परिवहन, ऊर्जा ग्रिड, इमारतों और भूजल संसाधनों को पहले ही नुकसान पहुंच रहा है। इसके दूरगामी नतीजे सामने आ रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि समुद्र का जलस्तर बढ़ने का सबसे ज्यादा असर कम ऊंचाई वाले द्वीपीय देशों पर होगा। हालांकि यह उन तक ही सीमित नहीं रहेगा।समुद्र का बढ़ता जलस्तर विकसित और विकासशील, दोनों वर्ग के देशों को प्रभावित कर सकता है। अमेरिका के न्यूयार्क और मियामी के अलावा ग्वांझू जैसे ज्यादा आय वाले शहरों में तटवर्ती इलाके के बुनियादी ढांचे पर भी खतरे की आशंका है। ALSO READ: भारत के विमानन क्षेत्र पर संकट के बादल
एशिया के किन शहरों पर खतरा ज्यादा?
रिपोर्ट में कहा गया है कि एशिया में खासकर भारतीय शहरों कोलकाता और मुंबई के अलावा बांग्लादेश की राजधानी ढाका पर समुद्री जलस्तर में वृद्धि से पैदा होने वाले खतरे गंभीर हैं। दूसरे इलाकों की तुलना में यहां खतरा ज्यादा होने की क्या वजह है?
पर्यावरणविदों का कहना है कि इन शहरों में समुद्री जमीन पर तेजी से बुनियादी ढांचे के साथ ही इंसानी बस्तियां बसाई जा रही हैं। लगातार बढ़ती आबादी के कारण जमीन की कमी हो रही है। ऐसे में टाउन प्लानरों के सामने समुद्री जमीन हासिल करने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं है।
उनके मुताबिक, सबसे ज्यादा खतरा इन शहरों के उन तटीय इलाकों में हैं जहां बीते 15-20 साल में समुद्री जमीन पर बड़े पैमाने पर बस्तियां बसाई गई हैं।
कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय में सामुद्रिक विज्ञान संस्थान के प्रमुख डा। सुगत हाजरा डीडब्ल्यू से कहते हैं, “समुद्री जमीन पर बुनियादी ढांचा और इंसानी बस्तियां बसाने की योजना बनाते समय पर्यावरणया भविष्य में पैदा होने खतरों की अनदेखी की जा रही है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण समुद्री जलस्तर में वृद्धि से पैदा होने वाले खतरे को ध्यान में रखते हुए इससे निपटने के लिए दीर्घकालीन रणनीति बनाने और उस पर अमल करने की जरूरत है।”
हाजरा कहते हैं, “बंगाल के सुंदरबन इलाके में बसे द्वीपों पर बीते कई सालों से ग्लोबल वार्मिंग के कारण होने वाले बदलाव का असर नजर आ रहा है। बंगाल की खाड़ी के बढ़ते जलस्तर के कारण इलाके के कई द्वीप पानी में डूब चुके हैं और कई डूबने की कगार पर हैं। उन इलाकों में रहने वाले लाखों लोगों पर विस्थापन की तलवार लटक रही है।” ALSO READ: शहरों को ठंडा रखने वाले पेड़ों को भी अब चाहिए सहारा
जादवपुर विश्वविद्यालय में ही जलवायु परिवर्तनकार्यक्रम की प्रमुख जयश्री राय डीडब्ल्यू से कहती हैं, “संयुक्त राष्ट्र पहले से इस खतरे की चेतावनी देता रहा है। अफसोस की बात यह है कि सरकार ने इसे कभी गंभीरता से नहीं लिया है। शायद इस खतरे से बचने की दिशा में ठोस पहल करने से पहले हम सिक्किम, धराली और नेपाल जैसी किसी आपदा का इंतजार कर रहे हैं।”
कोलकाता में मौसम विज्ञानी डा. प्रणवेश कुंडू डीडब्ल्यू से कहते हैं, “संयुक्त राष्ट्र समेत तमाम एजेंसियां समय-समय पर इस खतरे से आगाह करती रही हैं। लेकिन अखबारों में सुर्खियां बनने के बाद लोग इसे भूल जाते हैं।” वो बताते हैं, “वर्ष 2019 में अमेरिका स्थित शोध समूह क्लाइमेट सेंट्रल की रिपोर्ट ने जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान की गंभीर तस्वीर पेश की थी। उसमें में कहा गया था कि वर्ष 2050 तक भारत में बाढ़ और समुद्र का जलस्तर बढ़ने की वजह से 3।60 करोड़ लोग प्रभावित होंगे।”
कुंडू ने यह भी कहा कि रिपोर्ट में सूरत, मुंबई, कोलकाता, केरल, ओडीशा और चेन्नई जैसी तटवर्ती इलाकों पर भी भारी खतरा मंडराने की चेतावनी दी गई थी। लेकिन उसका गंभीरता से संज्ञान तक नहीं लिया गया। अब ताजा रिपोर्ट में भी वही चेतावनी दोहराई गई है।
Nepal Floods: नेपाल ने विनाशकारी बाढ़ के बाद अब इंटरनेशनल मदद की मांग का अपना रुख बदलते हुए ‘क्लाइमेट मुआवजे’ की मांग उठाई है। नेपाल का कहना है कि जलवायु संकट पैदा करने में उसका योगदान बेहद कम है। लेकिन ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और चरम मौसम की घटनाओं का सबसे ज्यादा खामियाजा हिमालयी देश को भुगतना पड़ रहा है। ‘द काठमांडू पोस्ट’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल ने मानवीय सहायता मांगने के बजाय विनाशकारी अचानक आई बाढ़ के लिए ‘क्लाइमेट मुआवजे’ की मांग करने का अपना कूटनीतिक रुख बदल लिया है।
नेपाल का तर्क है कि यह हिमालयी देश उस जलवायु संकट का खामियाजा भुगत रहा है, जिसे पैदा करने में उसकी भूमिका बहुत कम थी ‘द काठमांडू पोस्ट’ के मुताबिक, नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा कि उनका देश अब सहायता को महज मानवीय मदद के तौर पर नहीं देख रहा, बल्कि इसे जलवायु जिम्मेदारी और मुआवजे के मुद्दे से जोड़ रहा है। यह विनाशकारी बाढ़ 26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा के पास बर्फ और चट्टानों के गिरने या हिमस्खलन के कारण आई थी।
‘यह दान नहीं, न्याय और मुआवजे का मामला’
विदेश मंत्री ने कहा कि वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में नेपाल का योगदान लगभग नगण्य है। इसके बावजूद जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और हिमालयी आपदाओं का सामना नेपाल को करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि नेपाल अपनी कूटनीतिक रणनीति को ‘मदद’ से ‘न्याय और मुआवजे’ की ओर ले जा रहा है। उनके मुताबिक यह किसी देश की ओर से दी जाने वाली चैरिटी नहीं, बल्कि जलवायु संकट के लिए जिम्मेदारी और मुआवजे का सवाल है।
भारत, चीन और अमेरिका को बताया बड़ा प्रदूषक
नेपाल के विदेश मंत्री ने चीन, अमेरिका और भारत को दुनिया के प्रमुख इंडस्ट्रियल एमिटर्स में शामिल बताते हुए कहा कि इन देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी है कि वे नेपाल जैसे जलवायु संवेदनशील देशों को मुआवजा दें। खनाल ने कहा कि चीन दुनिया का सबसे बड़ा एमिटर्स है, उसके बाद अमेरिका और भारत का स्थान आता है। उन्होंने दावा किया कि नेपाल ने इस संबंध में अंतरराष्ट्रीय साझेदारों को औपचारिक क्लाइमेट कंपेंसेशन क्लेम लेटर भी भेजा है।
‘यह बाढ़ नहीं, हिमालयी सुनामी थी’
विदेश मंत्री ने हालिया आपदा की भयावहता बताते हुए इसे सामान्य बाढ़ मानने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि पानी की लहरें 20 से 30 मीटर तक ऊंची थीं। उनकी रफ्तार करीब 180 किलोमीटर प्रति घंटे तक बताई गई। इसी वजह से उन्होंने इसे ‘हिमालयी सुनामी’ करार दिया। बाढ़ के पानी ने घरों, गाड़ियों, सड़कों और पुलों को बहा दिया। जबकि कई हाइड्रोपावर परियोजनाओं को भी भारी नुकसान पहुंचा।
नेपाल ने UN से मांगी 5 अरब डॉलर की मदद
आपदा के बाद नेपाल ने पुनर्निर्माण और रिकवरी की लागत करीब 5 अरब डॉलर आंकी है। साथ ही, देश ने जलवायु आपदाओं से उबरने के लिए संयुक्त राष्ट्र (UN) से जुड़े विशेष फंड से तत्काल वित्तीय सहायता की मांग की है। नेपाल के जलवायु अधिकारियों का कहना है कि मानव जनित जलवायु परिवर्तन ने उन परिस्थितियों को और गंभीर बनाया, जिनके बीच यह भयावह आपदा सामने आई।
नेपाल का तर्क है कि जो देश जलवायु परिवर्तन के लिए सबसे कम जिम्मेदार हैं, वे ही अक्सर इसकी सबसे बड़ी कीमत चुका रहे हैं। विदेश मंत्री ने चेतावनी दी है कि यदि हिमालय के ग्लेशियर लगातार पिघलते रहे तो गंगा और त्रिशूली जैसी नदियों पर निर्भर दक्षिण एशिया के अरबों लोगों की जल सुरक्षा भी गंभीर खतरे में पड़ सकती है।
नेपाल में मौतों का आंकड़ा 1,000 के करीब
नेपाल में अचानक आई विनाशकारी बाढ़ से मरने वालों की संख्या बढ़कर मंगलवार को 987 हो गई> सुरक्षा बल देश के अलग-अलग हिस्सों में तलाश एवं बचाव अभियान के दौरान और शव बरामद कर रहे हैं। अधिकारियों के अनुमान के मुताबिक, 3,916 लोग अब भी लापता हैं, जिनमें 583 विदेशी नागरिक शामिल हैं। प्रभावित इलाकों में नेपाल सेना समेत सुरक्षा बलों ने तलाश और बचाव अभियान तेज कर दिया है।
नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेमेंट अथॉरिटी (NDRRMA) के अनुसार, चितवन से 321 शव, नवलपरासी पूर्व से 216, नवलपरासी पश्चिम से 170 और नुवाकोट से 95 शव बरामद किए गए हैं।इसी तरह, गोरखा से 65, धादिंग से 55, तनहूं से 38 और रसुवा से 27 शव बरामद किए गए हैं। NDRRMAए ने बताया कि अचानक आई बाढ़ से आठ जिले प्रभावित हुए हैं।




