El Nino: मजबूत अल नीनो का असर, जुलाई में राहत के बाद फिर गहराया सूखा संकट! 14% की गिरावट के साथ सितंबर में भी कम बारिश का अलर्ट

भारत में इस साल का मॉनसून अब कमजोर पड़ता नजर आ रहा है। मौसम विभाग (IMD) के मुताबिक, मॉनसून सीजन के आखिरी महीने सितंबर में देश के ज्यादातर हिस्सों में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है। मॉनसून के दौरान बारिश की कमी पहले ही चिंता का कारण बनी हुई है। 1 जून से 31 अगस्त तक देश में सामान्य के मुकाबले 14 फीसदी कम बारिश हुई है। अब सितंबर में भी कम बारिश का अनुमान है, ऐसे में पूरे मॉनसून सीजन में बारिश की कमी और बढ़ सकती है। मौसम विभाग ने इस दौरान अल नीनो के असर की संभावना भी जताई थी, जिसे मॉनसून की बारिश को प्रभावित करने वाली अहम वजहों में से एक माना जाता है।

जून से सितंबर तक चलने वाले चार महीने के मॉनसून में सितंबर का महीना काफी अहम माना जाता है, लेकिन इस बार कम बारिश का अनुमान किसानों और जल संसाधनों को लेकर चिंता बढ़ा सकता है। हालांकि, बारिश का असर अलग-अलग राज्यों और इलाकों में अलग रह सकता है।

1901 के बाद दूसरा सबसे गर्म रहा अगस्त

अगस्त के दौरान देश के कई क्षेत्रों में गर्मी का असर काफी ज्यादा देखने को मिला। अगस्त में देश के कई हिस्सों में तापमान ने पुराने रिकॉर्ड के करीब पहुंचकर चिंता बढ़ाई। दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत में यह महीना 1901 के बाद दूसरा सबसे गर्म अगस्त रहा। वहीं, पूर्वी और पूर्वोत्तर इलाकों में अगस्त तीसरा सबसे गर्म रहा। उत्तर-पश्चिम भारत में भी तापमान काफी ज्यादा रहा और यहां 126 साल के रिकॉर्ड में पांचवां सबसे गर्म अगस्त दर्ज किया गया। इससे साफ है कि इस साल अगस्त में देश के अलग-अलग हिस्सों में गर्मी का असर काफी ज्यादा रहा।

सितंबर में कब होगी बारिश

IMD चीफ मृत्युंजय महापात्रा ने कहा, “देश के कई हिस्सों में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है। हालांकि, उत्तर-पश्चिम, उत्तर-पूर्व, पूर्व, पूर्व-मध्य और दक्षिण-पूर्वी प्रायद्वीपीय भारत के कुछ इलाकों में सामान्य से ज्यादा बारिश हो सकती है।” उन्होंने कहा कि फिलहाल भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में “मजबूत अल नीनो की स्थिति” बनी हुई है, जिसके चलते मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक है। महापात्रा ने कहा, “आने वाले महीनों में इन स्थितियों के और मजबूत होने की संभावना है।” उन्होंने संकेत दिया कि इसका सितंबर की बारिश पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।

IOD की स्थिति नॉर्मल

अल नीनो की स्थिति को आमतौर पर भारत में कमजोर मॉनसून और ज्यादा गर्मी से जोड़कर देखा जाता है। वहीं, हिंद महासागर में फिलहाल इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) की स्थिति सामान्य है और इसके सितंबर तक ऐसी ही रहने की संभावना है। सकारात्मक IOD मॉनसून को मजबूत करने और बारिश बढ़ाने में मदद कर सकता है, लेकिन मौजूदा समय में ऐसी स्थिति नहीं है। ऐसे में मॉनसून को हिंद महासागर से बारिश बढ़ाने के लिए कोई खास मदद मिलने की उम्मीद नहीं है।

बारिश का रिकॉर्ड

इस साल मॉनसून की बारिश का असर देशभर में एक जैसा नहीं रहा। मौसम विभाग के मुताबिक, जून में बारिश की कमी 35% तक पहुंच गई थी। मॉनसून बारिश के वितरण का आकलन किए गए कुल 741 जिलों में से 312 जिलों (42%) में 31 अगस्त तक सामान्य से कम बारिश हुई, जबकि 38 जिलों (5%) में बहुत कम बारिश दर्ज की गई।

फसलों पर पड़ेगा असर

सितंबर में अगर बारिश उम्मीद के मुताबिक नहीं हुई तो इसका सीधा असर किसानों और खरीफ फसलों पर पड़ सकता है। भले ही ज्यादातर खरीफ फसलों की बुवाई लगभग पूरी हो चुकी है, लेकिन इस साल फसल का कुल रकबा पिछले साल के मुकाबले करीब 2 फीसदी कम है। ऐसे में बारिश की कमी किसानों की मुश्किलें और बढ़ा सकती है। खेतों में नमी बनाए रखने के लिए उन्हें सिंचाई का सहारा लेना पड़ सकता है, जिससे डीजल, बिजली और पानी पर खर्च बढ़ेगा और खेती की लागत पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।

El Nino impact: भारत में अल नीनो और कमजोर मानसून का दोहरा वार! क्या बढ़ेंगे दाल, चावल और सब्जियों के दाम?

El Nino Impact on India: प्रशांत महासागर में मजबूत होता अल नीनो का प्रभाव भारत की फूड इकॉनमी के लिए एक बड़ा खतरा बनता जा रहा है। जलवायु की यह स्थिति खेती की पैदावार पर असर डाल सकती है जिससे फूड सप्लाई चेन पर भी असर पड़ेगा। ऐसा हुआ तो खाने-पीने के सामान पर महंगाई का असर भी देखने को मिल सकता है। हालांकि भारत सरकार ने इस वित्त वर्ष में खरीफ की फसल को कम नुकसान का अनुमान दिया है पर भारत के विकास आउटलुक में पहले से ही महंगाई के जोखिम ने अपनी जगह बना रखी है।

रेटिंग एजेंसी इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च (Ind-Ra) पहले ही चेतावनी जारी कर चुका है कि वित्त वर्ष 2026-27 में फूड और फ्यूल इंफ्लेशन भारत के आथिर्क विकास पर असर डाल सकते हैं। एजेंसी ने चालू वित्त वर्ष के लिए जीडीपी वृद्धि दर 6.8 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है, जो पिछले वित्त वर्ष के 7.6 फीसदी से कम है। Ind-Ra के मुताबिक FY27 में रिटेल इंफ्लेशन औसतन 4.9 प्रतिशत रह सकता है। पिछले वित्त वर्ष में यह सिर्फ 2 फीसदी था। अल नीनो की वजह से फूड इंफ्लेशन बढ़ने के जोखिम को आर्थिक विकास में रुकावट डालने वाले प्रमुख कारकों में से एक माना गया है।

कृषि क्षेत्र की मौजूदा तस्वीर और खरीफ की स्थिति

वैसे अल नीनो के खतरे के बावजूद मौजूदा खेती की तस्वीर बहुत अधिक चिंताजनक नजर नहीं आ रहा है। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 18 अगस्त को स्पष्ट किया था कि इस साल के खरीफ उत्पादन पर अल नीनो का कोई बड़ा असर पड़ने की संभावना नहीं है। हालांकि कुछ जगहों पर स्थानीय स्तर पर नुकसान हो सकता है। उन्होंने कहा कि कुछ इलाकों को छोड़कर अल नीनो का बड़ा असर नहीं दिख रहा है और स्थिति कुल मिलाकर अच्छी बनी हुई है। अधिकांश हिस्सों में फसलों की पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त बारिश हुई है।

देश के कृषि क्षेत्र ने कुछ इलाकों में कम बारिश के बावजूद व्यापक नुकसान से बचाव किया है। 14 अगस्त तक 1016.57 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुआई हो चुकी थी, जो इस अवधि तक सामान्य रूप से कवर होने वाले औसत क्षेत्र का 92 प्रतिशत है। यह रकबा पिछले साल के स्तर से सिर्फ 2 फीसदी ही कम है। कृषि मंत्री के मुताबिक बुआई का अंतर काफी कम हुआ है और संवेदनशील माने जाने वाले जिलों की संख्या 262 से घटकर लगभग 100 रह गई है।

हालांकि क्षेत्रीय स्तर पर स्थिति असमान बनी हुई है। कर्नाटक और तेलंगाना में जल संकट का सामना करना पड़ा है जबकि पूर्वी, उत्तर-पूर्वी और दक्षिणी क्षेत्रों में बारिश की कमी अधिक देखी गई है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के मुताबिक 12 अगस्त तक कुल मानसूनी घाटा 12 प्रतिशत था। पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत में 26 प्रतिशत, दक्षिण प्रायद्वीप में 19 प्रतिशत और उत्तर-पश्चिम भारत में 11 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज की गई है। आपको बता दें कि अल नीनो का असर हर जगह एक जैसा नहीं होता। इसमें कुछ हिस्से सूखे रह जाते हैं जबकि अन्य हिस्सों में सामान्य या अधिक बारिश होती है।

खाद्य कीमतों और अर्थव्यवस्था पर अल नीनो का प्रभाव

अल नीनो प्रशांत महासागर के उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में समुद्र की सतह के गर्म होने से होने वाला एक मौसमी बदलाव है। ये वैश्विक स्तर पर वायुमंडलीय परिसंचरण, बारिश और तापमान को बदल देता है। भारत के लिए इसका सबसे बड़ा असर मानसून और कृषि पर देखा जाता है। कमजोर या असमान मानसून उन फसलों की उपज को घटा सकता है जो सिंचाई के बिना पूरी तरह बारिश पर निर्भर हैं। उत्पादन में गिरावट से आपूर्ति कम होती है, जिससे थोक और खुदरा कीमतें बढ़ने लगती हैं।

फसल की यह कमी सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहती बल्कि पूरी फूड सप्लाई चेन (प्रॉक्यूरमेंट, स्टोरेज, ट्रांसपोर्ट, प्रोसेसिंग और रिटेल) पर भी असल डालती है। मुख्य फसलों की कम उपलब्धता से आयात की मांग बढ़ती है, जिससे भारतीय उपभोक्ताओं पर अंतरराष्ट्रीय कीमतों का बोझ पड़ता है और देश के आयात बिल पर दबाव बढ़ता है। Ind-Ra के मुख्य अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अल नीनो की वजह से पैदा हुई महंगाई कच्चे तेल की कम कीमतों से भारत को मिलने वाले फायदे को भी खत्म कर सकती है।

जब अनाज, दालें, तिलहन, सब्जियां या अन्य फसलें कम पैदा होती हैं, तो बाजार में उनकी उपलब्धता घट जाती है। मांग समान रहने पर कीमतें बढ़ने लगती हैं। इसके सीधे असर से खरीद लागत बढ़ जाती है। आखिरकार यह बढ़ी हुई लागत उपभोक्ताओं तक पहुंचती है जिससे घरेलू बजट बिगड़ता है। सरकार को भी कीमतें नियंत्रित करने के लिए अपने स्टॉक से अनाज छोड़ने, आयात बढ़ाने या निर्यात पर प्रतिबंध लगाने जैसे कदम उठाने पड़ते हैं। लगातार खाद्य मुद्रास्फीति बने रहने से भारतीय रिजर्व बैंक के लिए ब्याज दरों में कटौती की गुंजाइश भी कम हो जाती है।

दुनिया भर में रिकॉर्ड तोड़ अल नीनो का खतरा

मौजूदा अल नीनो एक बड़े वैश्विक जलवायु संकट का रूप ले रहा है। क्लाइमेट ब्रिंक डैशबोर्ड के मुताबिक प्रशांत महासागर के नीनो 3.4 क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान 30 साल के औसत से लगभग 2.6°C अधिक हो चुका है। पूर्वानुमानों के अनुसार नवंबर तक यह अंतर 3.9°C तक पहुंच सकता है। ऐसा हुआ तो ये 2015 के शक्तिशाली अल नीनो के करीब 3°C के रिकॉर्ड को भी पार कर जाएगा।

अमेरिकी राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) का अनुमान है कि 69 प्रतिशत संभावना है कि यह 1950 के बाद का सबसे मजबूत अल नीनो बन जाएगा। इस वजह से दुनिया के कुछ हिस्से अत्यधिक गर्म और सूखे हो रहे हैं जबकि अन्य इलाकों में मूसलाधार बारिश और बाढ़ आ रही है। उदाहरण के लिए इंडोनेशिया में लंबे सूखे के कारण भीषण जंगलों की आग देखी गई है।

जलवायु वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह अल नीनो वर्ष 2027 में वैश्विक तापमान में करीब 0.3°C और बढ़ा सकता है। इस वजह से ग्लोबल टेंप्रेचर औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तर से 1.76°C ऊपर पहुंच सकता है, जिससे 2027 अब तक का सबसे गर्म साल बन सकता है।

मैन मेड ग्लोबल वार्मिंग भी अल नीनो के असर को और घातक बना रही है। गर्म हवा अधिक नमी सोखती है जिससे अति-बारिश की तीव्रता बढ़ती है, वहीं दूसरी तरफ उच्च तापमान मिट्टी की नमी सुखाकर सूखे को और भीषण बना देता है। ऐतिहासिक रिकॉर्ड और कोरल डेटा बताते हैं कि पिछली एक सदी में अल नीनो की तीव्रता में करीब 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। भारत के लिए तात्कालिक निष्कर्ष यही है कि भले ही कृषि क्षति अभी व्यापक न हुई हो, लेकिन मानसून के घाटे और अल नीनो के मजबूत होने से खाद्य आपूर्ति श्रृंखला पर जोखिम लगातार मंडरा रहा है।

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El Nino Impact On Monsoon: अल-नीनो के साये में मानसून, समझिए कम बारिश से इकॉनमी पर पड़ सकता है कैसा असर

भारत में मानसून पर मंडराते अल-नीनो के खतरे ने आम लोगों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। ग्लोबल रेटिंग एजेंसी एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स ने चेतावनी दी है कि अल-नीनो के मजबूत होने की वजह से मानसूनी बारिश कमजोर पड़ सकती है। इसका सीधा असर कृषि उत्पादन पर पड़ेगा। इससे खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं और हाइड्रोपावर उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है। वसे एजेंसी का यह भी मानना है कि अगर मौसम का यह झटका बहुत ज्यादा गंभीर नहीं होता है तो भारत की समग्र अर्थव्यवस्था पर इसका असर सीमित रहने की उम्मीद है।

एसएंडपी के मुताबिक भारत एशिया-प्रशांत क्षेत्र की उन इकॉनमी (जैसे वियतनाम, इंडोनेशिया और फिलीपींस) में शामिल है, जहां के लोग कीमतों में होने वाले उछाल के प्रति बेहद संवेदनशील हैं। इसकी बड़ी वजह यह है कि इन देशों में घरेलू बजट का एक बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च होता है और कृषि काफी हद तक मौसम की स्थितियों पर निर्भर करती है।

12% कम हुई बारिश, अगस्त में भी सुस्त रह सकता है मानसून

भारत के मानसूनी बारिश की स्थिति फिलहाल अच्छी नजर नहीं आ रही है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक 11 अगस्त तक 2026 के मानसून सीजन के दौरान बारिश औसत से 12 प्रतिशत कम दर्ज की गई है। इसके अलावा भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) का अनुमान है कि आने वाले हफ्तों में पश्चिमी, मध्य और दक्षिणी क्षेत्रों में मानसून और कमजोर हो सकता है।

भारत में सालाना होने वाली कुल बारिश का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा मानसून से ही मिलता है। ये खेती-किसानी के लिए बेहद जरूरी है। देश की लगभग आधी कृषि भूमि में सिंचाई की उचित व्यवस्था नहीं है, जिससे अधिकांश फसलें नियमित बारिश पर ही निर्भर रहती हैं।

दालों, सोयाबीन और मक्के की पैदावार पर पड़ सकता है असर

अगर बारिश में कमी का यह दौर लंबा खींचता है तो इससे दालों, सोयाबीन, कपास और मक्के जैसी फसलों की पैदावार में गिरावट आ सकती है। इस सीजन में किसानों को पहले से ही असमान बारिश का सामना करना पड़ा है। हालांकि जुलाई में हुई बेहतर बारिश ने शुरुआती सुस्त मानसून से हुए नुकसान की कुछ हद तक भरपाई की थी, लेकिन अब फिर से जोखिम बढ़ गया है।

मौसम विभाग के ताजा पूर्वानुमानों ने इन चिंताओं को और गहरा कर दिया है। विभाग ने अगस्त महीने में औसत से कम बारिश होने का अंदेशा जताया है जबकि इसी दौरान अल-नीनो की स्थिति और मजबूत होने की संभावना है। ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो भारत में अल-नीनो का संबंध कमजोर या अनिश्चित मानसूनी बारिश से रहा है।

बिजली आपूर्ति और जलाशयों पर भी पड़ेगा प्रभाव

कम बारिश का असर सिर्फ भोजन और फसलों तक ही सीमित नहीं रहेगा। बारिश कम होने से देश के प्रमुख जलाशय खाली रह सकते हैं, जिससे हाइड्रो पावर प्रोडक्शन में कमी आ सकती है। इसका सीधा असर बारिश पर निर्भर रहने वाले क्षेत्रों में बिजली की आपूर्ति पर पड़ेगा और ऊर्जा संकट की स्थिति खड़ी हो सकती है।

सबसे बड़ा जोखिम आम परिवारों के बजट पर है। कृषि उत्पादन में कमी आने से बाजार में खाद्य पदार्थों की आपूर्ति घट जाएगी और कीमतें ऊपर चढ़ जाएंगी। इसका सीधा असर उपभोक्ताओं पर पड़ेगा, खासकर तब जब रोजमर्रा की जरूरी चीजें महंगी हो जाएंगी।

भारत के पास चावल का पर्याप्त स्टॉक, लेकिन चुनौतियां बरकरार

तमाम जोखिमों के बावजूद भारत के पास खाद्य आपूर्ति के बड़े झटके से निपटने के लिए कुछ मजबूत सुरक्षा चक्र मौजूद हैं। देश के पास वर्तमान में चावल का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है। इसके अलावा पिछले अल-नीनो दौर की तुलना में भारत की खेती के तरीकों, सिंचाई सुविधाओं और फसल तकनीकों में काफी सुधार हुआ है। इससे भी देश की खाद्य उत्पादन क्षमता मजबूत हुई है।

एसएंडपी का कहना है कि मौसम से जुड़ी अस्थायी रुकावट का मतलब यह नहीं है कि इकॉनमी को तुरंत कोई बड़ा नुकसान पहुंचेगा। नुकसान का पैमाना इस बात पर निर्भर करेगा कि मौसम कितना प्रतिकूल होता है और सरकार इससे निपटने के लिए कितनी प्रभावी कार्रवाई करती है। भारतीय उपभोक्ताओं के लिए तत्काल चिंता यही है कि अगर बारिश और कमजोर होती है तो रोजमर्रा के खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ सकते हैं। यह दबाव कितने समय तक रहेगा, यह काफी हद तक मानसून, फसल उत्पादन और आने वाले महीनों में अल-नीनो की ताकत पर निर्भर करेगा।

El Nino Effect on Monsoon Rain: किसानों पर अल नीनो का प्रहार! इन इलाकों में 50% से ज्यादा बारिश की कमी, कई राज्यों में सूखे जैसे हालात का खतरा

El-Nino Effect on Monsoon Rain: देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून की धीमी प्रगति के कारण बारिश का संकट गहराता जा रहा है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार, शनिवार तक देश में सामान्य से 43 से 50 फीसदी तक कम बारिश दर्ज की गई है। हालांकि अगले महीने तक मानसून के पूरे देश में फैलने के बाद यह कमी कुछ हद तक कम हो सकती है। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए पूरे मानसून सीजन के अंत तक 10 फीसदी से अधिक बारिश की कमी रहने की आशंका जताई जा रही है।

मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बार अल नीनो (El Nino) का प्रभाव मानसून पर साफ दिखाई दे रहा है। आमतौर पर इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) की सकारात्मक स्थिति अल नीनो के असर को कुछ हद तक कम कर देती है। लेकिन इस साल ऐसी स्थिति बनने की संभावना कम है। ऐसे में मानसून के कमजोर रहने का खतरा बढ़ गया है।

अल नीनो बढ़ा रहा किसानों की चिंता

विशेषज्ञों के मुताबिक, सकारात्मक IOD अच्छी बारिश की गारंटी नहीं देता। लेकिन यह अल नीनो से होने वाले नुकसान को कम करने में मदद करता है। अतीत में कई अल नीनो वाले वर्षों में सकारात्मक IOD की वजह से सामान्य के करीब बारिश दर्ज की गई थी। हालांकि, इस बार ऐसी राहत मिलने की संभावना कम मानी जा रही है। यदि बारिश में कमी बनी रहती है तो इसका असर खरीफ फसलों, जलाशयों के जलस्तर और पेयजल उपलब्धता पर पड़ सकता है। इसके अलावा कई राज्यों में गर्मी और उमस का दौर भी लंबा खिंच सकता है।

दिल्ली में गर्मी का रिकॉर्ड, ‘फील्स लाइक’ तापमान 51.3 डिग्री

बारिश की कमी का असर राजधानी दिल्ली में भी देखने को मिल रहा है। शनिवार को दिल्ली में अत्यधिक गर्मी और उमस के कारण ‘फील्स लाइक’ (हीट इंडेक्स) तापमान 51.3 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो इस सीजन का सबसे अधिक है।

मौसम विभाग के अनुसार, शनिवार को दिल्ली का अधिकतम तापमान 41.3 डिग्री सेल्सियस रहा, जो सामान्य से करीब 4 डिग्री अधिक था। वहीं, दोपहर 2:30 बजे सापेक्षिक आर्द्रता (Relative Humidity) 45 फीसदी दर्ज की गई। अधिक नमी के कारण लोगों को वास्तविक तापमान से कहीं अधिक गर्मी महसूस हुई।

मानसून की रफ्तार पर टिकी उम्मीदें

मौसम विभाग का कहना है कि अगले कुछ दिनों में मानसून के आगे बढ़ने के साथ बारिश की गतिविधियों में तेजी आ सकती है। यदि जुलाई में अच्छी बारिश होती है तो मौजूदा बारिश की कमी कुछ हद तक कम हो सकती है। हालांकि, फिलहाल मौसम के संकेत बताते हैं कि पूरे सीजन में सामान्य से कम बारिश रहने की संभावना बनी हुई है।

मौसम विभाग के अनुसार, 1 से 27 जून के बीच देशभर में सामान्य से 43 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। हालांकि जुलाई में मानसून पूरे देश में सक्रिय होने के बाद यह कमी कुछ कम हो सकती है। लेकिन मौजूदा संकेत बताते हैं कि पूरे मानसून सीजन (जून-सितंबर) के अंत तक 10 प्रतिशत से अधिक वर्षा घाटा रह सकता है।

क्या है इंडियन ओशन डाइपोल (IOD)?

इंडियन ओशन डाइपोल हिंद महासागर के पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों के समुद्री सतह के तापमान में अंतर को दर्शाने वाली जलवायु सिस्टम है। सामान्य तौर पर यदि IOD सकारात्मक रहता है तो यह भारतीय मानसून को मजबूत करने में मदद करता है। साथ ही अल नीनो के नकारात्मक प्रभाव को काफी हद तक कम कर देता है। लेकिन इस बार IOD के तटस्थ (Neutral) रहने की संभावना है। इसका मतलब है कि यह मानसून को अतिरिक्त मजबूती नहीं दे पाएगा और अल नीनो का प्रभाव अधिक हावी रहेगा।

अल नीनो क्यों बढ़ा रहा चिंता?

मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक, अल नीनो के दौरान प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इससे भारतीय मानसून कमजोर पड़ता है। पिछले कई सालों में जब भी अल नीनो सक्रिय रहा और IOD सकारात्मक नहीं रहा, तब देश में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई। IMD ने भी कहा है कि इस बार अल नीनो के कारण मानसून के कमजोर रहने की आशंका अधिक है।

कई राज्यों में 50% से ज्यादा बारिश की कमी

बारिश के आंकड़ों के अनुसार कई राज्यों में हालात चिंताजनक हैं।

  • बिहार में करीब 82% बारिश की कमी दर्ज की गई।
  • गुजरात में लगभग 68% वर्षा घाटा रहा।
  • छत्तीसगढ़ में 68% कम बारिश हुई।
  • झारखंड में 66% कम बारिश हुई।
  • उत्तर प्रदेश में 65% कम बारिश हुई है।
  • ओडिशा में 63% और मध्य प्रदेश में भी सामान्य से काफी कम वर्षा रिकॉर्ड की गई है।
  • इसके अलावा महाराष्ट्र, तेलंगाना और तमिलनाडु के कई हिस्सों में भी 30 प्रतिशत से अधिक बारिश की कमी दर्ज हुई है।

कृषि और जल संकट बढ़ने की आशंका

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जुलाई और अगस्त में अच्छी बारिश नहीं हुई तो खरीफ फसलों की बुआई प्रभावित हो सकती है। जलाशयों का जलस्तर घटने, पेयजल संकट बढ़ने और बिजली उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्यान्न उत्पादन पर भी इसका प्रभाव देखने को मिल सकता है।

आगे क्या कहता है मौसम विभाग?

IMD का कहना है कि जुलाई में मानसून के पूरे देश में सक्रिय होने के बाद बारिश की स्थिति में कुछ सुधार हो सकता है। हालांकि फिलहाल मौसम के वैश्विक संकेत बताते हैं कि इस बार अल नीनो का असर पूरे मानसून सीजन पर बना रह सकता है। ऐसे में सामान्य से कम बारिश की संभावना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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