El Nino: मजबूत अल नीनो का असर, जुलाई में राहत के बाद फिर गहराया सूखा संकट! 14% की गिरावट के साथ सितंबर में भी कम बारिश का अलर्ट

भारत में इस साल का मॉनसून अब कमजोर पड़ता नजर आ रहा है। मौसम विभाग (IMD) के मुताबिक, मॉनसून सीजन के आखिरी महीने सितंबर में देश के ज्यादातर हिस्सों में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है। मॉनसून के दौरान बारिश की कमी पहले ही चिंता का कारण बनी हुई है। 1 जून से 31 अगस्त तक देश में सामान्य के मुकाबले 14 फीसदी कम बारिश हुई है। अब सितंबर में भी कम बारिश का अनुमान है, ऐसे में पूरे मॉनसून सीजन में बारिश की कमी और बढ़ सकती है। मौसम विभाग ने इस दौरान अल नीनो के असर की संभावना भी जताई थी, जिसे मॉनसून की बारिश को प्रभावित करने वाली अहम वजहों में से एक माना जाता है।

जून से सितंबर तक चलने वाले चार महीने के मॉनसून में सितंबर का महीना काफी अहम माना जाता है, लेकिन इस बार कम बारिश का अनुमान किसानों और जल संसाधनों को लेकर चिंता बढ़ा सकता है। हालांकि, बारिश का असर अलग-अलग राज्यों और इलाकों में अलग रह सकता है।

1901 के बाद दूसरा सबसे गर्म रहा अगस्त

अगस्त के दौरान देश के कई क्षेत्रों में गर्मी का असर काफी ज्यादा देखने को मिला। अगस्त में देश के कई हिस्सों में तापमान ने पुराने रिकॉर्ड के करीब पहुंचकर चिंता बढ़ाई। दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत में यह महीना 1901 के बाद दूसरा सबसे गर्म अगस्त रहा। वहीं, पूर्वी और पूर्वोत्तर इलाकों में अगस्त तीसरा सबसे गर्म रहा। उत्तर-पश्चिम भारत में भी तापमान काफी ज्यादा रहा और यहां 126 साल के रिकॉर्ड में पांचवां सबसे गर्म अगस्त दर्ज किया गया। इससे साफ है कि इस साल अगस्त में देश के अलग-अलग हिस्सों में गर्मी का असर काफी ज्यादा रहा।

सितंबर में कब होगी बारिश

IMD चीफ मृत्युंजय महापात्रा ने कहा, “देश के कई हिस्सों में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है। हालांकि, उत्तर-पश्चिम, उत्तर-पूर्व, पूर्व, पूर्व-मध्य और दक्षिण-पूर्वी प्रायद्वीपीय भारत के कुछ इलाकों में सामान्य से ज्यादा बारिश हो सकती है।” उन्होंने कहा कि फिलहाल भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में “मजबूत अल नीनो की स्थिति” बनी हुई है, जिसके चलते मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक है। महापात्रा ने कहा, “आने वाले महीनों में इन स्थितियों के और मजबूत होने की संभावना है।” उन्होंने संकेत दिया कि इसका सितंबर की बारिश पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।

IOD की स्थिति नॉर्मल

अल नीनो की स्थिति को आमतौर पर भारत में कमजोर मॉनसून और ज्यादा गर्मी से जोड़कर देखा जाता है। वहीं, हिंद महासागर में फिलहाल इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) की स्थिति सामान्य है और इसके सितंबर तक ऐसी ही रहने की संभावना है। सकारात्मक IOD मॉनसून को मजबूत करने और बारिश बढ़ाने में मदद कर सकता है, लेकिन मौजूदा समय में ऐसी स्थिति नहीं है। ऐसे में मॉनसून को हिंद महासागर से बारिश बढ़ाने के लिए कोई खास मदद मिलने की उम्मीद नहीं है।

बारिश का रिकॉर्ड

इस साल मॉनसून की बारिश का असर देशभर में एक जैसा नहीं रहा। मौसम विभाग के मुताबिक, जून में बारिश की कमी 35% तक पहुंच गई थी। मॉनसून बारिश के वितरण का आकलन किए गए कुल 741 जिलों में से 312 जिलों (42%) में 31 अगस्त तक सामान्य से कम बारिश हुई, जबकि 38 जिलों (5%) में बहुत कम बारिश दर्ज की गई।

फसलों पर पड़ेगा असर

सितंबर में अगर बारिश उम्मीद के मुताबिक नहीं हुई तो इसका सीधा असर किसानों और खरीफ फसलों पर पड़ सकता है। भले ही ज्यादातर खरीफ फसलों की बुवाई लगभग पूरी हो चुकी है, लेकिन इस साल फसल का कुल रकबा पिछले साल के मुकाबले करीब 2 फीसदी कम है। ऐसे में बारिश की कमी किसानों की मुश्किलें और बढ़ा सकती है। खेतों में नमी बनाए रखने के लिए उन्हें सिंचाई का सहारा लेना पड़ सकता है, जिससे डीजल, बिजली और पानी पर खर्च बढ़ेगा और खेती की लागत पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।

RBI के अनुमान को भी पीछे छोड़ सकती है भारत की GDP ग्रोथ, डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने दिए ये बड़े संकेत

आरबीआई की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने गुरुवार को कहा कि मार्च में खत्म होने वाले फाइनेंशियल ईयर में भारत की ग्रोथ रेट 7% के करीब रह सकती है,जो सेंट्रल बैंक के 6.7% के अनुमान से बेहतर है। इस रफ्तार के साथ भारत दुनिया की सबसे तेजी से ग्रोथ करने वाली बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल रहेगा। फाइनेंशियल एक्सप्रेस में आई अखबार के आधार पर ब्लूमबर्ग ने बताया कि चेन्नई में मद्रास स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में एक कार्यक्रम में बोलते हुए पूनम गुप्ता ने कहा कि उनका यह अनुमान अप्रैल-जून तिमाही के मजबूत रहने की उम्मीदों पर आधारित है। इस अवधि के आधिकारिक आंकड़े इस महीने के आखिर में आने वाले हैं। अर्थशास्त्रियों का अनुमान आम तौर पर 6.9% से 8% के बीच है। इसका मतलब है कि पूरे साल की ग्रोथ रेट काफी ज़्यादा,यानी 7% के करीब रह सकती है।

तमाम चुनौतियों के बावजूद कायम रही रफ्तार

इकोनॉमी की तेज रफ्तार से पता चलता है कि कमजोर मॉनसून और एनर्जी की बढ़ी लागत जैसे झटकों के बावजूद अर्थव्यवस्था में मजबूती बनी हुई है। इससे यह भी पता चलता है कि गुप्ता का रुख हाल ही में काफी सख्त क्यों हो गया है। इस हफ्ते जारी RBI की अगस्त पॉलिसी मीटिंग के मिनट्स से पता चला कि गुप्ता ने इस साल के आखिर में ब्याज दरें बढ़ाने की संभावना जताई थी।

पूनम गुप्ता ने कहा “इन झटकों के बावजूद,आगे के लिए मैं कहूंगी कि 7.5% ग्रोथ तो तय है और हमें इससे बेहतर करने की कोशिश करनी चाहिए।”

बाहरी खातों को लेकर भी जताया भरोसा 

पूनम गुप्ता ने भारत के बाहरी खातों (external accounts) को लेकर भी भरोसा जताया और कहा कि आगे स्थिति काफी बेहतर होगी। अर्थशास्त्रियों को उम्मीद है कि पहले घाटे के अनुमान के बावजूद,इस फाइनेंशियल ईयर में देश का बैलेंस ऑफ पेमेंट पॉजिटिव हो जाएगा। इसकी मुख्य वजह विदेशी मुद्रा में गिरावट को रोकने के उपायों के बाद 80 अरब डॉलर तक विदेशी फंड आने की उम्मीद है। इन उपायों में विदेशी मुद्रा डिपॉजिट को आकर्षित करने के लिए खास इंसेंटिव भी शामिल हैं।

भारत को एक विकसित देश बनाने के लिए 8% से ज्यादा की ग्रोथ रेट की जरूरत 

पूनम गुप्ता का यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारतीय अधिकारी देश की अर्थव्यवस्था को लेकर ज्यादा उम्मीदें जता रहे हैं,क्योंकि ईरान युद्ध के चलते जितने बुरे हालात का डर था,वे सच साबित नहीं हुए। मजबूत ग्रोथ को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले हफ्ते 2047 तक भारत को एक विकसित देश बनाने के अपने लक्ष्य को फिर से दोहराया। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए हमें कम से कम दो दशकों तक लगातार 8% से ज्यादा की ग्रोथ रेट की जरूरत हो सकती है।

 

 

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Market Mantra : 3-6 महीने के नजरिए से निवेश करना रहेगा अच्छा, US-ईरान युद्ध को लेकर ज्यादा टेंशन नहीं

Market Mantra : बाजार के सामने संकट के बादल फिर खड़े हो गए हैं। एक तरफ जहां अमेरिका-ईरान फिर लड़ पड़े हैं तो वहीं क्रूड की बिगड़ी चाल ने बाजार में फिर डर का माहौल बना दिया है। इसके अलावा भी बाजार के सामने कई और बड़ी चुनौतियां अब भी खड़ी हैं। कमजोर मॉनसून और पहली तिमाही के नतीजों पर बाजार नजर बनाए बैठा है। इन सभी मुद्दों से अब आगे बाजार की दिशा तय होनी है। ऐसे में निवेशक कंफ्यूज है कि निवेश को लेकर क्या रणनीति बनाएं,अभी निवेश करें या कुछ महीने पहले देख लें कि हालात क्या करवट लेते हैं। इसी कंफ्यूजन को दूर करने के लिए आज हमारे साथ हैं खास मेहमान LIC म्यूचुअल फंड (LIC Mutual Fund) के CIO इक्विटी सुधांशु अस्थाना

US-ईरान युद्ध को लेकर ज्यादा टेंशन नहीं

बाजार की चाल पर बात करते हुए सुधांशु अस्थाना ने कहा कि US-ईरान युद्ध को लेकर ज्यादा टेंशन नहीं है। US-ईरान फिर शांति की तरफ बढ़ेंगे। सरकार के कदमों से इकोनॉमी में डिमांड बढ़ी है। प्राइवेट कैपेक्स और क्रेडिट ग्रोथ में भी सुधार देखने को मिल रहा है। कॉर्पोरेट क्रेडिट ग्रोथ में 15% का उछाल आया है। देश में डॉलर का फ्लो आगे सुधरेगा। US-ईरान युद्ध आगे बढ़ा तो FY28 नतीजों पर असर दिखेगा। कच्चा तेल 85-90 डॉलर प्रति बैरल पर रहे तो इकोनॉमी पर असर नहीं होगा।

3-6 महीने के नजरिए से निवेश करना अच्छा

उन्होंने आगे कहा कि 3-6 महीने के नजरिए से निवेश करना अच्छा रहेगा। कंपनियों के मुताबिक युद्ध का असर अभी डिमांड पर नहीं दिखा है। दिसंबर नतीजों के बाद अर्निंग अपग्रेड संभव है। अगले साल से 8वें वेतन आयोग का पैसा भी आने लगेगा। 8वें वेतन आयोग के पैसे से डिमांड को बूस्ट मिलेगा। कच्चे माल की कीमतें बढ़ने का असर Q1 नतीजों पर दिखेगा।नतीजों के साथ कंपनियों की कमेंट्री और आउटलुक पर बाजार की नजर रहेगी।

बैंकिंग और फाइनेंशियल शेयरों में एक्सपोजर बढ़ा

सुधांशु अस्थाना ने बताया कि उन्होंनें बैंकिंग और फाइनेंशियल शेयरों में एक्सपोजर बढ़ाया है। प्राइवेट बैंक,NBFC और कैपिटल मार्केट शेयरों पर फोकस बढ़ा है। हेल्थकेयर शेयरों में भी एक्सपोजर बढ़ाया है। प्रीसिजन इंजीनियरिंग और डाटा सेंटर पर भी फोकस बढ़ा है। दिसंबर नतीजों के बाद अर्निंग अपग्रेड संभव है।

कम रिस्क चाहते हैं तो मल्टिकैप फंड में डालें पैसा

उन्होंने आगे कहा कि अगर आप कम रिस्क चाहते हैं तो मल्टिकैप फंड में पैसा डालें। फ्लैक्सीकैप फंड में भी निवेश किया जा सकता है। पिछले कुछ महीनों में मिडकैप और स्मॉलकैप में निवेश बढ़ा है। मिडकैप और स्मॉलकैप आगे अच्छा कर सकते हैं।

 

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डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

ICICI प्रूडेंशियल के चिंतन हरिया से जानें वेल्थ क्रिएशन के मंत्र, बाजार में अब कहां से निकलें और कहां बढ़ाएं निवेश

बाजार में आज तेजी का मोमेंटम बढ़ा है,निफ्टी 150 अंक से ज्यादा चढ़कर 7 मई के बाद पहली बार 24300 के पार निकला है। ICICI BANK, HDFC BANK, BHARTI और टाटा स्टील ने जोश भरा है। आज बैंक निफ्टी भी चला है। लेकिन मिडकैप-स्मॉलकैप में हल्की बढ़त है। वोलैटिलिटी इंडेक्स INDIA VIX 3% से ज्यादा फिसलकर 12 के नीचे आ गया है। रियल्टी,मेटल और फार्मा में आज सबसे ज्यादा खरीदारी आई है। तीनों सेक्टर इंडेक्स 1.5 फीसदी से ज्यादा चढ़े हैं। साथ ही IT में लगातार दूसरे दिन तेजी है। आईटी इंडेक्स 1.5 फीसदी चढ़ा। वहीं दूसरी ओर सरकारी बैंकों में आज दबाव है। पीएसयू बैंक इंडेक्स करीब 1 फीसदी फिसला है। बैंक ऑफ बड़ौदा और यूनियन बैंक 3 फीसदी से ज्यादा गिरे हैं।

निवेशक चाहें तो कर सकते हैं लार्जकैप में एकमुश्त निवेश

ऐसे में बाजार की आगे की दशा और दिशा पर बात करते हुए ICICI प्रूडेंशियल AMC के प्रिंसिपल इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट चिंतन हरिया ने कहा कि 2 साल से भारतीय बाजार और रुपये ने अंडरपरफॉर्म किया है। RBI के कदमों से रुपया काफी संभला है। कच्चे तेल के दाम युद्ध से पहले के भाव पर आ गए हैं। कमजोर मॉनसून से भी ज्यादा चिंता नहीं है। ऐसे में लार्जकैप में अच्छे मौके बन रहे हैं। निवेशक चाहें तो लार्जकैप में एकमुश्त निवेश कर सकते हैं।

मिडकैप और स्मॉलकैप में एक्टिव फंड चुनें, लार्जकैप में पैसिव फंड्स में निवेश करें

चिंतन हरिया ने आगे कहा कि लार्जकैप के मुकाबले मिडकैप और स्मॉलकैप ने आउटपरफॉर्म किया है। मिडकैप और स्मॉलकैप के वैल्युएशन अभी भी सस्ते नहीं हैं। मिडकैप और स्मॉलकैप की ग्रोथ का अनुमान लगाना मुश्किल है। मिडकैप और स्मॉलकैप में एक्टिव फंड चुनें। लार्जकैप में पैसिव फंड्स में निवेश करें।

हालात स्थिर रहे तो दीवाली तक लार्जकैप में उछाल संभव

उन्होंने आगे कहा कि जून तिमाही के नतीजों में कमजोरी देखने को मिल सकती है। हालात स्थिर रहे तो दीवाली तक लार्जकैप में उछाल संभव है। FCNB डिपॉजिट का फायदा बैंकों को मिलेगा। बैंकिंग सेक्टर अच्छा लग रहा है। एनर्जी सेक्टर भी पसंद है। इस सेक्टर कोकच्चे तेल की कीमतें घटने का फायदा मिलेगा। वहीं, डिफेंस और मेटल शेयर काफी चल चुके हैं। अब इनमें मुनाफावसूली संभव है।

चिंतन हरिया का मानना है कि लंबी अवधि में ऑटो सेक्टर अच्छा कर सकता है। ऑटो सेक्टर को एक्सपोर्ट में बढ़ोतरी का भी फायदा मिलेगा। निवेशकों के लिए लार्जकैप एक्टिव और पैसिव फंड्स में निवेश करने का मौका है। मल्टी एसेट बैलेंस्ड एडवांटेज फंड में निवेश कर सकते हैं। किसी भी फ्लैक्सीकैप फंड्स में SIP कर सकते हैं। आज जो निवेश करेंगे उसका फायदा 3-5 साल में मिलेगा।

 

 

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डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

Weekly monsoon tracker: बारिश की बढ़ती कमी और जलाशयों का घटता लेवल बढ़ा रहा चिंता, 22.7% गिरी खरीफ फसलों की बुआई

Weekly monsoon tracker:  बारिश की बढ़ती कमी, मॉनसून की धीमी रफ़्तार और जलाशयों के कम लेवल की वजह से खेती-बाड़ी वाले खास राज्यों में चावल और कपास जैसी गर्मियों की फसलों की बुआई पर असर पड़ा है। 25 जून तक खरीफ की बुआई पिछले साल के मुकाबले 22.7 फीसदी कम हुई है।

खरीफ फसलों का रकबा 182.72 लाख हेक्टेयर रहा, जो एक साल पहले के 236.46 लाख हेक्टेयर से कम है यानी 53.74 लाख हेक्टेयर की कमी आई। यह कमी सभी मुख्य फसलों की कैटेगरी में थी, जिसमें तिलहन, कपास, चावल और दालों का रकबा कम रहा।

तिलहन में सबसे ज़्यादा गिरावट देखी गई, जिसका रकबा एक साल पहले के 36.41 लाख हेक्टेयर से 19.42 लाख हेक्टेयर घटकर 16.99 लाख हेक्टेयर रह गया। तिलहन में, सोयाबीन की बुआई सबसे ज़्यादा प्रभावित हुई है, जो 13.05 लाख हेक्टेयर कम हुई है, इसके बाद मूंगफली की बुआई 6.42 लाख हेक्टेयर कम हुई है।

भारत का सोयाबीन इंपोर्ट बढ़ रहा है, देश चीन समेत कुछ सप्लायर्स पर निर्भर है। मई तक, भारत के कच्चे सोयाबीन तेल के इंपोर्ट में चीन का 8.1 फीसदी हिस्सा था।

कपास का रकबा 15.70 लाख हेक्टेयर घटकर 29.66 लाख हेक्टेयर रह गया, जबकि चावल की बुआई 8.65 लाख हेक्टेयर घटकर 25.75 लाख हेक्टेयर रह गई। दालों का रकबा भी कमज़ोर हुआ है, जो 6.53 लाख हेक्टेयर कम हुआ है, जिसमें अरहर और उड़द सबसे आगे हैं।

बारिश और जलाशयों की चिंताए

बारिश का डिस्ट्रीब्यूशन अभी भी अनियमित है। इंडिया मेटियोरोलॉजिकल डिपार्टमेंट (IMD) ने अगले कुछ दिनों में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, ओडिशा और विदर्भ में भारी बारिश का अनुमान लगाया है, लेकिन बिहार, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश में हीटवेव की स्थिति बनी हुई है, जिससे कुछ उत्तरी इलाकों में बुआई में देरी हो रही है।

29 जून को बारिश में कमी 43 फीसदी के हाई लेवल पर पहुंच गई थी। बुआई कमजोर इसलिए है क्योंकि मॉनसून की तरक्की एक जैसी नहीं है, देश के 48 फीसदी हिस्से में कमी है और 26 फीसदी हिस्से में बड़ी कमी है।

रिजर्वॉयर का लेवल चिंता को और बढ़ा देता है। 166 बड़े रिज़र्वॉयर में लाइव स्टोरेज पिछले साल के लेवल से कम था। रिज़र्वॉयर अपनी कैपेसिटी के 26.4 फीसदी तक भरे हुए हैं, जबकि पिछले साल इसी समय में यह 36 फीसदी था, लेकिन यह पांच साल के एवरेज से 5 फीसदी ज़्यादा है।

खास तौर पर दक्षिणी और पूर्वी इलाकों में दबाव दिख रहा है, जो खरीफ की खेती के लिए ज़रूरी हैं। दक्षिणी इलाके के रिज़र्वॉयर 20.8 फीसदी पर हैं, जो पिछले साल के 44.7 फीसदी के आधे से भी कम हैं। कर्नाटक के जलाशय एक साल पहले के 48.6 फीसदी के मुकाबले सिर्फ़ 14.7 फीसदी भरे हैं, जबकि तमिलनाडु का स्टोरेज 81 फीसदी से घटकर 34.3 फीसदी हो गया है। पूर्व में, ओडिशा के जलाशय सिर्फ़ 15.3 फीसदी भरे हैं, जो पिछले साल के 22.4 फीसदी से कम है।

जलाशय का लेवल कम होने से धान, कपास और दालों जैसी फसलों के लिए सिंचाई में मदद कम हो जाती है, जिससे बुवाई समय पर बारिश पर ज़्यादा निर्भर हो जाती है। अगर जुलाई में बारिश कमज़ोर रहती है, तो फसल उत्पादन, ग्रामीण आय और खाने की चीज़ों की महंगाई, खासकर दालों और खाने के तेलों को लेकर चिंताएं बढ़ सकती हैं।

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