Parag Parikh Flexi Cap Fund: पराग पारिख में पैसा लगाना बंद कर रहे निवेशक? 6 महीने में 77% घटा निवेश

Parag Parikh Flexi Cap Fund: पराग पारिख फ्लेक्सी कैप फंड में हर महीने आने वाला अनुमानित निवेश तेजी से घटा है। मार्च 2026 में यह करीब ₹3,950 करोड़ था। सितंबर में घटकर सिर्फ ₹900 करोड़ रह गया। यानी 6 महीने में करीब 77% की गिरावट आई। हालांकि, फंड में पैसा आना बंद नहीं हुआ है। इसके बावजूद फंड मैनेजर ने नए शेयरों और दूसरे निवेश विकल्पों में पैसा लगाना जारी रखा है।

फंड की कैश होल्डिंग भी काफी घटी है। मार्च में कुल संपत्ति का 18.94% पैसा कैश में था। सितंबर में यह घटकर 9.77% रह गया। इस दौरान फंड को रियल एस्टेट, REITs और चुनिंदा ऑयल एंड गैस कंपनियों में निवेश के मौके मिले।

फंड में निवेश क्यों घटा?

PPFAS Mutual Fund के फंड मैनेजर राज मेहता ने Moneycontrol को बताया कि निवेश में कमी से फंड की रणनीति नहीं बदली है। उनके मुताबिक, फंड में अब भी नया पैसा आ रहा है।

उन्होंने कहा कि हाल के दिनों में मिडकैप और स्मॉलकैप फंडों का प्रदर्शन बेहतर रहा है। ऐसे में निवेशकों का रुझान भी उनकी तरफ बढ़ा है। अक्सर निवेशक हालिया रिटर्न देखकर अपना पैसा लगाने का फैसला करते हैं।

कैश में पैसा रखने के बजाय कहां निवेश किया?

राज मेहता के मुताबिक, फंड कितना पैसा कैश में रखेगा, यह बाजार के स्तर से ज्यादा निवेश के मौकों पर निर्भर करता है। बाजार में लंबे समय तक खास तेजी न आने और कुछ शेयरों की कीमत घटने से फंड को खरीदारी के मौके मिले। इसलिए उसने कैश घटाकर शेयरों में निवेश बढ़ाया।

सितंबर की फैक्टशीट के मुताबिक, फंड की कुल संपत्ति का 72.06% हिस्सा भारतीय कोर इक्विटी में था। वहीं, 11.90% विदेशी सिक्योरिटीज, IDR और ADR में लगा था। REITs और InvITs में निवेश 6.27% था।

सितंबर में किन शेयरों में बढ़ाया निवेश?

अगस्त के मुकाबले सितंबर में DLF में सबसे ज्यादा नया निवेश किया गया। फंड की कुल संपत्ति का 1.81% हिस्सा इसमें लगाया गया। इसके अलावा Mahindra & Mahindra, Indus Towers, Bharti Airtel और कुछ ऑयल एंड गैस कंपनियों में भी निवेश बढ़ाया गया।

दूसरी तरफ, फंड ने Great Eastern Shipping Company से अपना निवेश निकाल लिया। अगस्त में इस शेयर में फंड की संपत्ति का 0.11% हिस्सा लगा था।

फंड के पास Embassy Office Parks REIT में 2.49%, Knowledge Realty Trust में 2.18% और Brookfield India Real Estate Trust में 1.60% निवेश था।

फंड का रिटर्न कैसा रहा?

हाल के प्रदर्शन की बात करें तो फंड का रिटर्न कमजोर रहा है। इसके रेगुलर प्लान ने एक साल में 4.14% निगेटिव रिटर्न दिया। वहीं, बेंचमार्क Nifty 500 TRI में 2.03% की गिरावट आई।

हालांकि, तीन, पांच और दस साल की अवधि में फंड ने अपने बेंचमार्क से बेहतर प्रदर्शन किया।

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Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।

Jio Platforms IPO: एंकर बुक 30 गुना से ज्यादा सब्सक्राइब, ब्लैकरॉक और जेपी मॉर्गन जैसे बड़े नामों ने दिखाई दिलचस्पी

Jio Platforms IPO: रिलायंस ग्रुप की Jio Platforms के IPO को लेकर बड़े निवेशकों में जबरदस्त उत्साह है। कंपनी के ₹8,110 करोड़ के एंकर बुक के मुकाबले 30 गुना से ज्यादा मांग आई है। संस्थागत निवेशकों की कुल बोलियां करीब ₹2.5 लाख करोड़ तक पहुंच गई हैं। इस मामले से जुड़े लोगों के मुताबिक, भारतीय IPO बाजार में इतनी बड़ी मांग पहली बार देखने को मिली है।

इस इश्यू में दुनिया की कई बड़ी निवेश कंपनियों और सरकारी निवेश फंड ने दिलचस्पी दिखाई है। इनमें BlackRock, Fidelity Investments, JPMorgan Asset Management, Franklin Templeton, Invesco और Capital Group जैसे नाम शामिल हैं।

दुनिया के बड़े निवेशक लगा रहे दांव

Jio Platforms के IPO में सिंगापुर के GIC, नॉर्वे के Norges Bank Investment Management, Abu Dhabi Investment Authority और Qatar Investment Authority जैसे बड़े सरकारी निवेश फंड भी दिलचस्पी दिखा रहे हैं।

विदेशी निवेशकों के अलावा भारतीय म्यूचुअल फंड कंपनियां भी पीछे नहीं हैं। देश के टॉप 10 म्यूचुअल फंड हाउस ने इस इश्यू में दिलचस्पी दिखाई है। इनमें SBI Mutual Fund, HDFC Mutual Fund, ICICI Prudential Mutual Fund, Nippon India Mutual Fund और Kotak Mahindra Mutual Fund शामिल हैं।

LIC और बड़ी बीमा कंपनियां भी कतार में

इस IPO में देश की बड़ी बीमा और पेंशन कंपनियां भी निवेश करना चाहती हैं। इनमें LIC, HDFC Life, SBI Life, SBI Pension, HDFC Pension और ICICI Prudential के नाम शामिल हैं।

मामले से जुड़े एक व्यक्ति के मुताबिक, इस इश्यू के लिए कई अरब डॉलर की बोलियां मिली हैं। विदेशी लॉन्ग-टर्म निवेशकों, सरकारी निवेश फंड और पेंशन फंड से बड़ी मांग आई है। टेक्नोलॉजी पर फोकस करने वाले वैश्विक फंड और बड़े फैमिली ऑफिस भी इसमें दिलचस्पी दिखा रहे हैं।

सिर्फ टेलीकॉम कंपनी नहीं है Jio

Jio का कारोबार अब मोबाइल कनेक्टिविटी से आगे बढ़ चुका है। कंपनी ब्रॉडबैंड, क्लाउड, एंटरटेनमेंट और एंटरप्राइज सर्विसेज में भी काम कर रही है।

IPO के बाद निवेशकों को Jio Platforms में सीधे निवेश करने का मौका मिलेगा। अभी यह Reliance Industries की सब्सिडियरी है। करीब ₹2.5 लाख करोड़ की मांग और बड़े निवेशकों की दिलचस्पी से बाजार में उतरने से पहले कंपनी को लेकर मजबूत उत्साह दिख रहा है।

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Disclaimer: मनीकंट्रोल, नेटवर्क18 ग्रुप का हिस्सा है। नेटवर्क18 का नियंत्रण इंडिपेंडेट मीडिया ट्रस्ट करता है, जिसकी एकमात्र लाभार्थी रिलायंस इंडस्ट्रीज है।

Axis Mutual Fund का नया फंड लॉन्च, EV और ऑटो सेक्टर की कंपनियों पर लगेगा पैसा; ₹100 से कर सकेंगे निवेश

Axis Mutual Fund ने इलेक्ट्रिक गाड़ियों और नई ऑटोमोटिव टेक्नोलॉजी से जुड़ी कंपनियों में निवेश का नया विकल्प पेश किया है। कंपनी ने Axis Nifty EV & New Age Automotive Index Fund लॉन्च किया है। यह एक इंडेक्स फंड है, जो इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और नए जमाने की ऑटो इंडस्ट्री से जुड़ी कंपनियों में निवेश करेगा।

इस फंड का न्यू फंड ऑफर (NFO) 16 अक्टूबर को खुल गया है। इसमें 30 अक्टूबर 2026 तक निवेश किया जा सकता है। निवेश की शुरुआत सिर्फ ₹100 से होगी। इसके बाद ₹1 के गुणक में रकम बढ़ाई जा सकती है।

फंड की खास बातें

फंड को नंदिक मलिक और रोहित गौतम मैनेज करेंगे। यह एक ओपन-एंडेड इंडेक्स फंड है। इसका मतलब है कि निवेशक तय नियमों के मुताबिक इसमें निवेश कर सकते हैं और यूनिट बेचकर पैसा निकाल भी सकते हैं। हालांकि, जल्दी पैसा निकालने पर एग्जिट लोड देना पड़ सकता है।

अगर निवेशक यूनिट खरीदने के 15 दिन के भीतर पैसा निकालते हैं, तो 0.25% एग्जिट लोड लगेगा। 15 दिन के बाद पैसा निकालने पर

एग्जिट लोड नहीं लगेगा।

फंड का बेंचमार्क Nifty EV & New Age Automotive TRI होगा। इसका मकसद इस इंडेक्स के प्रदर्शन के मुताबिक रिटर्न देना है। हालांकि, इंडेक्स के रिटर्न और फंड के रिटर्न में थोड़ा अंतर हो सकता है।

किन कंपनियों में लगेगा पैसा?

यह फंड इलेक्ट्रिक गाड़ियों और नई ऑटोमोटिव टेक्नोलॉजी से जुड़ी कंपनियों में निवेश करेगा। इसमें गाड़ी बनाने वाली कंपनियों के साथ बैटरी, ऑटो पार्ट्स, कच्चे माल और आधुनिक ऑटो टेक्नोलॉजी से जुड़ी कंपनियां भी शामिल हो सकती हैं।

इसका आधार Nifty EV & New Age Automotive Index होगा। इस इंडेक्स में Nifty 500 से तय शर्तों को पूरा करने वाली कंपनियों को चुना जाता है। इनमें कारोबार और शेयरों में खरीद-बिक्री से जुड़ी शर्तें भी शामिल हैं।

30 सितंबर 2026 तक इस इंडेक्स में बड़ी कंपनियों की हिस्सेदारी 44% थी। मिडकैप कंपनियों की हिस्सेदारी 29% और स्मॉलकैप कंपनियों की 27% थी। इंडेक्स की समीक्षा और बदलाव साल में दो बार, मार्च और सितंबर में किए जाते हैं।

EV बाजार में बढ़ती हिस्सेदारी पर नजर

Axis Mutual Fund के मुताबिक, भारत में इलेक्ट्रिक गाड़ियों की हिस्सेदारी FY21 में 1% से भी कम थी। FY26 में यह बढ़कर 9.4% हो गई।

कंपनी का मानना है कि बैटरी की लागत, टेक्नोलॉजी और चार्जिंग की सुविधा में सुधार से इस सेक्टर को आगे बढ़ने में मदद मिल सकती है। इलेक्ट्रिक गाड़ियों का असर सिर्फ ऑटो कंपनियों तक सीमित नहीं है। इससे बैटरी, ऑटो पार्ट्स और दूसरे संबंधित कारोबार को भी फायदा मिल सकता है।

Axis AMC के MD और CEO बी. गोपकुमार ने कहा कि इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की ओर बढ़ता रुझान ऑटो इंडस्ट्री को बदल रहा है। कंपनी का कहना है कि यह फंड निवेशकों को इस बदलाव से जुड़ी अलग-अलग तरह की कंपनियों में एक साथ निवेश का मौका देगा।

निवेश से पहले इन बातों को समझें

इस फंड के जरिए निवेशकों को अलग-अलग कंपनियों के शेयर खुद चुनने की जरूरत नहीं होगी। फंड इंडेक्स में शामिल कंपनियों के मुताबिक निवेश करेगा। हालांकि, यह थीमैटिक इक्विटी फंड है। इसलिए इसका प्रदर्शन EV और ऑटो सेक्टर की स्थिति से प्रभावित हो सकता है।

अगर इस सेक्टर की कंपनियों के शेयर गिरते हैं, तो फंड की वैल्यू भी घट सकती है। इंडेक्स को ट्रैक करने के बावजूद फंड का रिटर्न बिल्कुल उसके बराबर रहने की गारंटी नहीं है। कंपनी ने भी साफ किया है कि निवेश का उद्देश्य पूरा होने की कोई गारंटी नहीं है।

इसलिए अपनी जोखिम उठाने की क्षमता, निवेश की अवधि और वित्तीय लक्ष्य को ध्यान में रखकर ही फैसला लें। जरूरत पड़ने पर वित्तीय सलाहकार से भी बात कर सकते हैं।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Parag Parikh MF: पराग पारिख फ्लेक्सी कैप फंड ने कैश होल्डिंग घटाई, इन दो कंपनियों पर लगाया बड़ा दांव

Parag Parikh MF: पराग पारिख फ्लेक्सी कैप फंड ने अपने पास रखी नकदी में बड़ी कटौती की है। एक साल पहले फंड की कैश होल्डिंग करीब 24% थी। अब यह घटकर 9.7% रह गई है। शेयरों की कीमतों में गिरावट के बाद फंड को निवेश के नए मौके दिख रहे हैं। इसलिए उसने बाजार में पैसा लगाना बढ़ा दिया है।

PPFAS Mutual Fund के को-फंड मैनेजर (इक्विटी) और हेड ऑफ रिसर्च रौनक ओंकार ने CNBC-TV18 को एक इंटरव्यू में यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि शेयरों की वैल्यूएशन अब पहले के मुकाबले आकर्षक हो रही है। फंड को कुछ कंपनियों के शेयर कम कीमत पर मिल रहे हैं। इसलिए उसने इन कंपनियों में अच्छी-खासी रकम लगाई है।

ओंकार ने बताया कि फंड ऐसी कंपनियों पर भी नजर रख रहा है, जिनके कारोबार से लगातार कैश आता है। फिलहाल बाजार का ज्यादा ध्यान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डेटा सेंटर और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों पर है। इस वजह से कई दूसरी कंपनियों पर निवेशकों का ध्यान कम गया है।

उनके मुताबिक, ऐसी कुछ कंपनियों के शेयर उनकी कमाई और कैश फ्लो के मुकाबले कम वैल्यूएशन पर मिल रहे हैं। इससे मजबूत कारोबार वाली कंपनियों में निवेश का मौका बन रहा है।

DLF में PPFAS क्यों लगा रहा है पैसा?

PPFAS Mutual Fund ने अपने पोर्टफोलियो में रियल एस्टेट कंपनी DLF के शेयर भी शामिल किए हैं। ओंकार ने बताया कि DLF के पास काफी बड़ी जमीन है। कंपनी के पास प्रोजेक्ट पूरे करने की अच्छी क्षमता भी है। इसके अलावा, उसने अपना कर्ज कम किया है। इससे कंपनी की वित्तीय स्थिति मजबूत हुई है।

ओंकार के मुताबिक, अब DLF में निवेश का मौका इस बात में है कि कंपनी अपनी जमीन का इस्तेमाल किस तरह करती है। वह नए प्रोजेक्ट बनाकर कारोबार बढ़ा सकती है। साथ ही, उसके कमर्शियल प्रॉपर्टी से किराये के रूप में लगातार कैश भी आता है।

उन्होंने यह भी कहा कि DLF की बैलेंस शीट पहले से मजबूत है। कर्ज कम होने के कारण कंपनी के पास विस्तार के लिए ज्यादा गुंजाइश है। इससे वह उत्तर भारत के अपने पारंपरिक बाजार से आगे दूसरे क्षेत्रों में भी कारोबार बढ़ा सकती है।

CMS Info Systems पर क्यों है PPFAS की नजर?

PPFAS Mutual Fund ने CMS Info Systems में भी निवेश किया है। इस कंपनी के कारोबार का एक बड़ा हिस्सा कैश से जुड़ा है। ओंकार के मुताबिक, देश की अर्थव्यवस्था में आज भी नकदी का इस्तेमाल हो रहा है। इसलिए बैंकों और दूसरे कैश एक्सेस पॉइंट्स के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत बनी हुई है।

उन्होंने कहा कि देश में चलन में मौजूद नकदी का स्तर नोटबंदी के समय के मुकाबले ज्यादा है। अर्थव्यवस्था में कई तरह के लेनदेन अब भी कैश से होते हैं। ऐसे में बैंकों और दूसरी जगहों पर नकदी पहुंचाने और उसे संभालने के लिए भरोसेमंद ऑपरेटर जरूरी हैं।

CMS Info Systems इसी तरह के काम से जुड़ी कंपनी है। वह कैश लेनदेन के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर संभालती है। हालांकि, ओंकार ने यह भी माना कि कंपनी के मुख्य कारोबार में ऑर्गेनिक ग्रोथ बहुत मजबूत नहीं है। इसी वजह से उसके शेयर की वैल्यूएशन भी ज्यादा ऊंची नहीं है।

इसके बावजूद कंपनी का कैश फ्लो मजबूत है। यानी कारोबार से उसके पास लगातार पैसा आता है। कंपनी अपने मौजूदा कारोबार से जुड़े दूसरे क्षेत्रों में भी विस्तार के मौके तलाश रही है।

प्राइवेट बैंकों में 20% निवेश से संतुष्ट है PPFAS

PPFAS Mutual Fund के पोर्टफोलियो का करीब 20% हिस्सा प्राइवेट सेक्टर के बैंकों में लगा है। इसमें HDFC Bank, ICICI Bank, Axis Bank और Kotak Mahindra Bank जैसे शेयर शामिल हैं।

ओंकार ने कहा कि फंड बैंकिंग शेयरों में अपने मौजूदा निवेश से संतुष्ट है। उसे इस सेक्टर में लगातार अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की जरूरत नहीं दिखती। उन्होंने कहा, ‘मुझे नहीं लगता कि इसमें इससे आगे निवेश बढ़ाते रहना सही होगा। आखिर यह बैंकिंग फंड नहीं है। हमने अपने पोर्टफोलियो में बैंकिंग सेक्टर को एक तय हिस्सेदारी दी है।’

ओंकार ने फंड की मौजूदा पसंद के हिसाब से बैंकों की रैंकिंग भी बताई। इसमें HDFC Bank पहले नंबर पर है। इसके बाद ICICI Bank, Axis Bank और Kotak Mahindra Bank का स्थान है।

हालांकि, यह रैंकिंग हमेशा एक जैसी रहेगी, ऐसा नहीं है। ओंकार के मुताबिक, समय के साथ इन बैंकों में निवेश का अनुपात बदल सकता है। यह बाजार की चाल, शेयरों के प्रदर्शन और संबंधित बैंकों के कारोबार की स्थिति पर निर्भर करेगा।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

लाल मार्केट में इक्विटी म्यूचु्अल फंडों पर निवेशकों का दांव, SIP में आया रिकॉर्ड निवेश, Gold ETF की बढ़ी चमक

Mutual Fund Data: शेयर मार्केट में मचे तूफान के बीच पिछले महीने सितंबर में इक्विटी म्यूचुअल फंड में निवेश तेजी से बढ़ा। हालांकि डेट फंडों से ताबड़तोड़ निकासी से ओवरऑल म्यूचुअल फंड में निवेश निगेटिव रहा। म्यूचुअल फंड बॉडी AMFI (एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया) के लेटेस्ट आंकड़ों से यह बात सामने आई है। पिछले महीने सितंबर में इक्विटी फंड्स में निवेश करीब ₹9000 करोड़ बढ़ गया तो डेट फंड्स से निकासी मासिक आधार पर तीन गुना से अधिक बढ़ गई। वहीं सितंबर में SIP में कॉन्ट्रिब्यूशन रिकॉर्ड हाई लेवल पर पहुंच गया लेकिन खातों की संख्या में कमी आई।

Equity Funds में सबसे अधिक क्रेज दिखा SmallCap Funds का

अगस्त महीने में इक्विटी फंडों में निवेश लगभग 19% बढ़ा था और फिर सितंबर महीने में नेट इनफ्लो में और बढ़ोतरी हुई। मासिक आधार पर ₹8,977.93 करोड़ की बढ़ोतरी मासिक निवेश में बड़ी तेजी है। AMFI के आंकड़ों के हिसाब से पिछले महीने इक्विटी-ओरिएंटेड स्कीमों में ₹38,306.55 करोड़ का निवेश आया जोकि अगस्त महीने में ₹29,328.62 करोड़ के निवेश की तुलना में करीब 31% अधिक रहा।

कैटेगरीवाइज बात करें तो सबसे अधिक ₹9,038.57 करोड़ का निवेश स्मॉल-कैप फंडों में आया। इसके बाद मिड-कैप फंडों में ₹7,834.84 करोड़ का निवेश हुआ। इन दोनों में कुल ₹16,873.41 करोड़ का निवेश आया, जो सभी इक्विटी फंडों में हुए कुल निवेश का लगभग 44% है।

सितंबर महीने में फ्लेक्सी-कैप फंडों में भी निवेश बढ़कर ₹6,701.80 करोड़ हो गया, जबकि अगस्त में यह ₹5,059.42 करोड़ था।

लॉर्ज-कैप फंड के भी निवेशक सितंबर में लौटे और लगातार दो महीने तक शुद्ध निकासी के बाद सितंबर में निकासी से अधिक निवेश किया। लॉर्ज कैप फंडों में पिछले महीने ₹859.47 करोड़ का शुद्ध निवेश आया।

इक्विटी इनफ्लो में उछाल के बावजूद इक्विटी म्यूचुअल फंड्स का AUM सितंबर में घटकर ₹37.54 लाख करोड़ रह गई। अगस्त में यह ₹39.21 लाख करोड़ थी यानी इसमें लगभग 4.3% की गिरावट आई।

डेट फंडों से ताबड़तोड़ निकासी

सितंबर में डेट म्यूचुअल फंडों में सबसे बड़ा बदलाव दिखा। इन फंडों से शुद्ध निकासी बढ़कर ₹1.83 लाख करोड़ हो गई, जबकि अगस्त में यह ₹8,127 करोड़ थी।

सबसे अधिक निकासी लिक्विड फंडों से हुई। सितंबर में इनसे ₹95,743.20 करोड़ निकाले गए, जबकि अगस्त में इनमें ₹19,934.29 करोड़ का निवेश आया था। सितंबर में मनी मार्केट फंडों से भी ₹50,846.21 करोड़ की निकासी हुई, जबकि अगस्त में इन फंडों में ₹11,734.71 करोड़ का निवेश आया था। इन दोनों फंडों से कुल मिलाकर से लगभग ₹1.47 लाख करोड़ की शुद्ध निकासी हुई और इन्होंने डेट फंडों पर ओवरऑल दबाव डाला।

डेट फंड्स का एयूएम मासिक आधार पर अगस्त में ₹19.33 लाख करोड़ से 8.8% फिसलकर सितंबर में ₹17.64 लाख करोड़ पर आ गया।

हाइब्रिड फंड्स हुआ निगेटिव, ईटीएफ इनफ्लो में उछाल

पिछले महीने सितंबर में हाइब्रिड म्यूचुअल फंडों में भी काफी बदलाव देखने को मिला। पिछले महीने इससे ₹456.68 करोड़ की शुद्ध निकासी हुई, जबकि अगस्त में इसमें ₹10,045.34 करोड़ का शुद्ध निवेश आया था। इसकी बड़ी वजह ऑर्बिट्रेज फंड्स रहे, जिनसे सितंबर महीने में ₹3,956.38 करोड़ निकाले गए, जबकि अगस्त में इनमें ₹3,789.02 करोड़ का निवेश आया था।

पिछले महीने बैलेंस्ड-एडवांटेज फंडों से भी ₹912.43 करोड़ की निकासी हुई। वहीं मल्टी-एसेट एलोकेशन फंडों में निवेश का सिलसिला जारी रहा और इनमें ₹3,666.98 करोड़ आए।

पिछले महीने एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ETF) में ₹15,501.40 करोड़ का निवेश आया, जो अगस्त के ₹10,160.87 करोड़ से लगभग 53% अधिक है।

सितंबर महीने में गोल्ड ईटीएफ में निवेश लगभग 71% बढ़कर ₹4,450.61 करोड़ हो गया, जबकि अगस्त में यह ₹2,596.70 करोड़ था तो सिल्वर ETF में भी इस दौरान निवेश भी ₹9,959.96 करोड़ से बढ़कर ₹1,974.32 करोड़ हो गया।

इंडेक्स फंडों की बात करें तो अगस्त महीने में इसमें ₹787.49 करोड़ का निवेश आया था, जबति पिछले महीने इससे ₹3,614.03 करोड़ की शुद्ध निकासी हुई थी।

विदेशी बाजारों में निवेश करने वाले ओवरसीज फंडों से निकासी जारी रही। सितंबर में इनसे ₹159.18 करोड़ निकाले गए, जबकि अगस्त में निकासी ₹72.19 करोड़ थी।

सितंबर महीने में लाइफ साइकिल फंडों में ₹143.75 करोड़ और सॉल्यूशन-ओरिएंटेड स्कीमों में ₹373.90 करोड़ का निवेश आया।

SIP में निवेश पहुंचा रिकॉर्ड हाई पर

सितंबर में मासिक SIP कॉन्ट्रिब्यूशन बढ़कर ₹32,490 करोड़ के रिकॉर्ड लेवल पर पहुंच गया। अगस्त में यह ₹32,297 करोड़ था। इस बढ़ोतरी के साथ सितंबर 2026 में एसआईपी का एयूएम ₹17.86 लाख करोड़ हो गया। हालांकि एक खास बात ये है कि सितंबर में लगभग 63 लाख नए एसआईपी रजिस्टर हुए, जबकि 73 लाख एसआईपी या तो मेच्योर हो गए या उन्हें बंद कर दिया गया। सितंबर की शुरुआत से लेकर आखिरी तक एसआईपी अकाउंट्स की संख्या 10.75 करोड़ से 10.06 करोड़ पर आ गई।

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डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

SBI Schemes: जीरो रिस्क के साथ FD से बेहतर रिटर्न! गिरते मार्केट के बीच SBI की ये स्कीम्स कराएंगी बढ़िया मुनाफा

SBI Mutual Fund Schemes: शेयर बाजार में जब गिरावट या मंदी का दौर चल रहा होता है, तब नए और पुराने दोनों तरह के निवेशकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह होता है कि ऐसे समय में क्या करें? इस मौके का फायदा उठाकर आने वाले 1 से 2 सालों में अपना पैसा सुरक्षित तरीके से कैसे बढ़ाया जाए। अक्सर निवेशक गिरावट देखकर पैनिक में आ जाते हैं या फिर जल्दबाजी में बड़े रिटर्न के लालच में स्मॉलकैप जैसे जोखिम भरे फंड्स में एकमुश्त पैसा लगा बैठते हैं।

हालांकि, बाजार के दिग्गज और पोर्टफोलियो मैनेजर्स इस रणनीति से सख्त बचने की सलाह देते हैं। विशेषज्ञों का साफ मानना है कि जब मार्केट में करेक्शन चल रहा हो, तो 3 साल से कम (1-2 साल) की कम अवधि के लिए स्मॉलकैप फंड्स में बड़ा दांव लगाना खतरनाक हो सकता है।

‘दुनिया से मजबूत है भारत की इकोनॉमी!’ वैश्विक अनिश्चितता के बीच पूर्व ECB चीफ ट्रिसेट का बड़ा दावा

पोर्टफोलियो रणनीतिकार बताते हैं कि, ‘बाजार की अनिश्चितता के दौर में कम अवधि जैसे 1-2 साल के लिए केवल ज्यादा रिटर्न तलाशने से कहीं ज्यादा जरूरी ‘कैपिटल प्रोटेक्शन’ होता है। ऐसे समय में डायवर्सिफाइड एसेट एलोकेशन या हाइब्रिड फंड्स के जरिए चरणबद्ध तरीके से निवेश करना ही वेल्थ प्रोटेक्शन और ग्रोथ का सबसे समझदारी भरा फॉर्मूला है।’

1 से 2 साल के नजरिए के लिए SBI Mutual Fund की 3 सबसे मुफीद स्कीम्स

अगर आपका नजरिया केवल अगले 12 से 24 महीनों का है और आप बाजार की रिकवरी का फायदा भी उठाना चाहते हैं, तो SBI की ये स्कीम्स सबसे बढ़िया साबित हो सकती हैं:

1. SBI Multi Asset Allocation Fund (जोखिम: कम से मध्यम)

यह फंड आपकी पूंजी को सिर्फ शेयर बाजार के भरोसे नहीं छोड़ता। यह पैसे को मुख्य रूप से इक्विटी, डेट (बॉन्ड/एफडी) और गोल्ड/सिल्वर में बांटकर निवेश करता है।

1-2 साल के लिए क्यों बेस्ट? इतिहास गवाह है कि जब शेयर बाजार में गिरावट या सुस्ती होती है, तब सोना और डेट एसेट्स पोर्टफोलियो को मजबूती देते हैं। 1-2 साल की अवधि में यह फंड बाजार की गिरावट के झटकों से पूरी सुरक्षा देते हुए आपको 10% से 12% तक का स्थिर और संतुलित रिटर्न देने की क्षमता रखता है।

2. SBI Equity Hybrid Fund (जोखिम: मध्यम)

यह एक कंजर्वेटिव हाइब्रिड मॉडल पर काम करता है, जहां कुल फंड का लगभग 65% से 80% हिस्सा इक्विटी में और बाकी 20% से 35% हिस्सा डेट प्रतिभूतियों (G-Secs, बॉन्ड्स) में लगाया जाता है।

बाजार के निचले स्तर पर होने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसका इक्विटी पोर्शन सस्ते वैल्युएशन पर मजबूत शेयर खरीद लेता है। जब अगले 1-2 साल में मार्केट रिकवर करेगा, तो इक्विटी हिस्सा तेजी से रिटर्न बढ़ाएगा और डेट हिस्सा गिरावट के समय पोर्टफोलियो को संभाल कर रखेगा।

3. SBI Arbitrage Opportunities Fund (जोखिम: बेहद कम / एफडी जैसा सुरक्षित)

यह फंड शेयर बाजार की तेजी या मंदी पर बिल्कुल निर्भर नहीं रहता। यह कैश मार्केट और डेरिवेटिव्स मार्केट के बीच कीमतों के अंतर का फायदा उठाकर जोखिम-रहित रिटर्न निकालता है।

अगर आपका मुख्य लक्ष्य जीरो-रिस्क है और आप बैंक एफडी (FD) से बेहतर और टैक्स-इफिशिएंट रिटर्न चाहते हैं, तो यह फंड सबसे सुरक्षित जरिया है। 1 से 2 साल की अवधि में इसमें पैसा डूबने का खतरा न के बराबर होता है।

अगर आप थोड़ा रिस्क ले सकते हैं तो ‘STP’ रूट से बनाएं रणनीति

अगर आप बाजार की गिरावट का फायदा उठाकर 1-2 साल में आने वाली तेजी का लाभ उठाना चाहते हैं, तो एकमुश्त पैसा लगाने के बजाय STP का तरीका अपनाएं। सबसे पहले अपना पूरा पैसा SBI Arbitrage Fund या SBI Liquid Fund में एकमुश्त जमा करें। वहां से हर महीने एक निश्चित राशि (STP के जरिए) SBI Flexicap Fund या SBI Bluechip Fund में ट्रांसफर होने दें। इससे अगले 12 से 18 महीनों में आपको बाजार की हर गिरावट में ‘कॉस्ट एवरेजिंग’ का बड़ा फायदा मिलेगा।

इन स्कीम्स में 1-2 साल के लिए पैसा लगाने से बचें!

SBI Small Cap Fund: स्मॉलकैप कंपनियों में गिरावट के समय बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव होता है। इनमें रिकवरी आने में 3 से 5 साल तक का समय लग सकता है।

SBI Contra Fund & SBI Focused Equity Fund: ये फंड्स खास रणनीतियों पर काम करते हैं और इन्हें अपना प्रदर्शन दिखाने के लिए कम से कम 5 से 7 साल का लंबा समय चाहिए होता है।

कुल मिलाकर 1 से 2 साल के शॉर्ट-टू-मीडियम टर्म के लिए SBI Multi Asset Allocation Fund या STP के जरिए SBI Flexicap Fund सबसे स्मार्ट और सुरक्षित विकल्प साबित होंगे।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

SIP में नुकसान हो रहा है तो क्या बंद कर दें? म्यूचुअल फंड एक्सपर्ट ने दी ये खास सलाह

Mutual Fund SIP Investment Rules: शेयर बाजार में गिरावट आते ही म्यूचुअल फंड निवेशक अक्सर घबरा जाते हैं। खासकर जब SIP का रिटर्न 3 से 5 साल तक निगेटिव या बेहद मामूली दिखता है, तो मन में पहला सवाल यही आता है कि, क्या फंड में कोई खराबी आ गई है या यह सिर्फ बाजार की सुस्ती है?

म्यूचुअल फंड में शेयर, सोना और एफडी के जरिए आखिर निवेशक संपत्ति क्यों बनाते हैं और इस सफर में किन गलतियों से बचना चाहिए? Moneycontrol के साथ खास बातचीत में DSP म्यूचुअल फंड के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट साहिल कपूर ने एसआईपी, पोर्टफोलियो ओवरलैप, फंड मैनेजर के बदलने और फंड से निकलने के सही समय पर खुलकर बात की है।

3-5 साल तक SIP का रिटर्न खराब रहे, तो क्या फंड बेकार है?

साहिल कपूर के मुताबिक, सिर्फ कुछ सालों का खराब रिटर्न इस बात का सबूत नहीं है कि फंड खराब है। सबसे पहले आपको ‘बाजार की सुस्ती’ और ‘फंड की खराबी’ में फर्क समझना होगा।

DSP के एक ऐतिहासिक अध्ययन में पाया गया कि 10 साल की SIP चलाने वाले 95% निवेशकों को शुरुआती 5 सालों में कभी न कभी बुरे दौर का सामना करना पड़ा। वहीं 81% एसआईपी का रिटर्न किसी न किसी मोड़ पर निगेटिव भी हुआ। लेकिन राहत की बात यह है कि पूरे 10 साल का समय पूरा होने पर 99% एसआईपी ने डेट फंड्स (FDs) को पछाड़कर शानदार रिटर्न दिया।

खुद से ये सवाल पूछें कि क्या फंड अपने बेंचमार्क से लगातार पिछड़ रहा है? क्या फंड मैनेजर या निवेश का तरीका बदल गया है? अगर फंड की रणनीति सही है और सुस्ती केवल बाजार के चक्र की वजह से है, तो धैर्य बनाए रखना ही समझदारी है।

पैसों की तंगी हो तो क्या करें? SIP रोकें या पैसा निकालें

अगर अचानक आपकी आमदनी कम हो जाए या पैसों की जरूरत पड़े, तो साहिल कपूर का कहना है कि पहला मकसद वित्तीय रूप से सुरक्षित रहना है, न कि हर हाल में एसआईपी जारी रखना।

पहले से जमा पैसों को निकालने से कंपाउंडिंग का चक्र टूट जाता है। इसलिए पैसा निकालने के बजाय नई एसआईपी को कुछ समय के लिए रोकना ज्यादा बेहतर विकल्प है। अपने लॉन्ग-टर्म इक्विटी पोर्टफोलियो को इमरजेंसी के भरोसे न छोड़ें। हालांकि, अगर सच में पैसों की सख्त जरूरत है, तो पोर्टफोलियो आपके काम आने के लिए ही बना है।

हाल में तगड़ा रिटर्न देने वाले फंड्स में तुरंत पैसा लगाना सही है?

किसी फंड ने पिछले 1-2 सालों में 100% या 200% का रिटर्न दिया है, तो आंख मूंदकर उसमें पैसा न लगाएं। अमेरिका के इस फंड ने 1998 में 196% का रिटर्न दिया, जिसे देखकर 1999 में निवेशकों ने 731 मिलियन डॉलर उसमें झोंक दिए। नतीजा? 1998 से 2003 के बीच फंड ने तो 8.3% सालाना रिटर्न दिया, लेकिन देरी से घुसे आम निवेशकों को औसतन -11.9% का नुकसान उठाना पड़ा।

रिटर्न कहां से आया है कंपनी की कमाई से या सिर्फ बाजार की तेजी से? साथ ही हमेशा वैल्यूएशन देखकर ही एंट्री लें।

फ्लेक्सीकैप फंड के साथ दूसरे फंड लेना कितना सही?

अगर आपके पास पहले से फ्लेक्सीकैप फंड है, तो नया फंड लेने से पहले सावधान रहें। DSP के अध्ययन के अनुसार, एक औसत फ्लेक्सीकैप फंड का पोर्टफोलियो:

  • लार्जकैप फंड से: 63.8% मैच करता है।
  • लार्ज एंड मिडकैप से: 71.5% मैच करता है।
  • बैलेंस्ड एडवांटेज से: 75.3% मैच करता है।

यानी नया फंड खरीदने पर आपको सिर्फ 25 से 36% ही नए शेयर मिलते हैं। अलग नाम के फंड खरीदने के बजाय ऐसा फंड चुनें जो सच में आपके पोर्टफोलियो में विविधता लाए।

फंड मैनेजर बदल जाए तो किस ट्रैक रिकॉर्ड पर भरोसा करें?

अध्ययन के मुताबिक, अलग-अलग कैटेगरी में मौजूदा फंड मैनेजर्स का औसत कार्यकाल अभी भी 3 साल से कम है। फंड का 10 साल का इतिहास आपको म्यूचुअल फंड हाउस और उसकी प्रक्रिया के बारे में बताता है, मौजूदा मैनेजर के बारे में नहीं। नए मैनेजर के आने के बाद पोर्टफोलियो में क्या बदलाव हुए और उनका पुराना ट्रैक रिकॉर्ड कैसा रहा है, इस पर नजर रखें।

म्यूचुअल फंड से बाहर निकलने का सही समय क्या है?

किसी फंड में 1 साल का खराब प्रदर्शन उसे बेचने की वजह नहीं होना चाहिए। आपको फंड से तब बाहर निकलना चाहिए जब:

  • फंड का मूल मकसद या निवेश का तरीका बदल जाए।
  • कोई प्रमुख फंड मैनेजर चला जाए जिस पर पूरी रणनीति टिकी थी।
  • फंड लगातार खराब फैसलों की वजह से पिछड़ रहा हो, न कि बाजार के चक्र की वजह से।
  • आपके पोर्टफोलियो में एक ही तरह के शेयरों की हिस्सेदारी बहुत ज्यादा बढ़ जाए।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Nifty ऑल-टाइम हाई से 15% फिसला, लेकिन 18% चढ़ने पर होगी लॉस की भरपाई, जानिए क्यों

इंडेक्स में 20 फीसदी गिरावट के बाद पूरी रिकवरी तभी आएगी जब सूचकांक 25 फीसदी चढ़ेगा। 30 फीसदी गिरावट की भरपाई तभी होगी, जब सूचकांक करीब 43 फीसदी चढ़ेगा। इसकी वजह यह है कि लॉस और रिकवरी का प्रोसेस एक जैसा नहीं होता है।

2 जनवरी को निफ्टी ऑल-टाइम हाई पर पहुंचा था

मार्च के निचले स्तर से निफ्टी में रिकवरी आई है। लेकिन, लॉस की पूरी भरपाई के लिए इसमें ज्यादा तेजी जरूरी है। निफ्टी 2 जनवरी को 26,329 के लेवल पर पहुंचा था। यह इसका ऑल-टाइम हाई है। फिर यह मार्च में गिरकर 22,331 के लेवल पर आ गया। यह जानकारी Abakkus Mutual Fund के एनालिसिस पर आधारित है। तब निफ्टी अपने ऑल-टाइम हाई से करीब 15.2 फीसदी गिरा था।

31 अगस्त तक गिरकर यह 24,080 पर आ गया था

31 अगस्त तक निफ्टी चढ़कर 24,080 पर पहुंच गया था। यह मार्च के निचले स्तर से 7.8 फीसदी की रिकवरी थी। लेकिन, लॉस की पूरी भरपाई के लिए निफ्टी में और 9.3 फीसदी तेजी जरूरी थी। तभी यह 26,329 के लेवल पर पहुंच पाता। तब से निफ्टी और गिरा है। 11 सितंबर को यह 23,398 पर क्लोज हुआ।

ऐसे समझें निफ्टी में रिकवरी का कैलकुलेशन

सवाल है कि गिरावट के बाद पूरी रिकवरी के लिए निफ्टी को क्यों ज्यादा तेजी की जरूरत पड़ती है? इसे हम एक उदाहरण की मदद से समझ सकते है। मान लीजिए आपके 100 रुपये के निवेश की वैल्यू 20 फीसदी गिर जाती है। इसका मतलब है कि आपके निवेश की वैल्यू गिरकर 80 रुपये पर आ जाती है।

20 फीसदी गिरने पर लॉस की भरपाई के लिए 25% तेजी जरूरी

अगर फिर से आपके निवेश की वैल्यू 20 फीसदी बढ़ती है तो यह 100 रुपये के लेवल पर नहीं आएगा। 80 रुपये पर 20 फीसदी की तेजी का मतलब है कि यह 96 रुपये हो जाएगा यानी सिर्फ 16 रुपये का इजाफा होगा। 80 रुपये को फिर से 100 रुपये तक पहुंचने के लिए 20 रुपये का गेन जरूरी होगा। इसका मतलब है कि 80 रुपये की वैल्यू तभी 100 रुपये होगी, जब वैल्यू 25 फीसदी बढ़ेगी।

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लॉस जितना ज्यादा होगा, रिकवरी के लिए तेजी की उतनी ज्यादा जरूरत

लॉस जितना ज्यादा होगा, यह फर्क उतना ज्यादा बढ़ेगा। 30 फीसदी गिरावट की रिकवरी के लिए इंडेक्स को करीब 43 फीसदी चढ़ना होगा। 40 फीसदी गिरावट की रिकवरी तभी होगी, जब इंडेक्स 66.7 फीसदी चढ़ेगा। अगर इंडेक्स की वैल्यू गिरकर आधी रह जाती है तो उसे पूरी तरह से रिकवर होने के लिए दोगुना चढ़ना होगा। इसका मतलब है कि अगर आपकी पोर्टफोलियो की वैल्यू ऑल-टाइम हाई से 20 फीसदी नीचे आ गई है तो लॉस की भरपाई के लिए पोर्टफोलियो की वैल्यू 25 फीसदी बढ़नी चाहिए।

nifty fall