आज आपकी मंथली सैलरी 50 हजार रुपये है तो रिटायरमेंट के लिए कितना फंड पर्याप्त होगा?

कई लोग रिटायरमेंट के लिए सेविंग्स और इनवेस्टमेंट तो करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि उनका रिटायरमेंट फंड कितना बड़ा होना चाहिए। एक्सपर्ट का कहना है रिटायरमेंट फंड का साइज इस बात पर निर्भर करता है कि आज आपका हर महीने का खर्च कितना है।

रिटायरमेंट फंड के कैलकुलेशन का फॉर्मूला

डीएसपी पेंशन फंड के चीफ इनवेस्टमेंट अफसर रमनीक कुंदरा के मुताबिक, रिटायरमेंट फंड आपके सालाना खर्च का करीब 25-30 गुना होना चाहिए। इसे एक उदाहरण की मदद से आसानी से समझ सकते हैं। मान लीजिए अगर किसी व्यक्ति का मंथली खर्च रिटायरमेंट से ठीक पहले 50,000 रुपये है तो इसका मतलब है कि उसका सालाना खर्च 6 लाख रुपये होगा। 6 लाख का 25 से 30 गुना 1.5 से 1.8 करोड़ होगा।

निवेश का एक बड़ा हिस्सा इक्विटी में लगाना होगा

कुंदरा ने कहा कि रिटायरमेंट फंड बनाने के लिए निवेश की जल्द शुरुआत करना सबसे जरूरी है। दूसरा, आपको निवेश में अनुशासन बरतना होगा। लंबी अवधि में बड़ा रिटायरमेंट फंड तैयार करने लिए निवेश का एक बड़ा हिस्सा इक्विटी यानी शेयरों में लगाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि छोटे-छोटे टारगेट तय करने से बड़ा रिटायरमेंट फंड तैयार करना आसान हो जाता है।

छोटे-छोटे टारगेट तय करने से होगी आसानी 

उन्होंने बताया कि 30 साल की उम्र में आपका रिटायरमेंट फंड आपकी एक साल की इनकम के बराबर होना चाहिए। 40 की उम्र तक यह आपकी सालाना इनकम का तीन गुना होना चाहिए। 50 की उम्र तक यह आपकी सालाना इनकम का पांच से छह गुना तक होना चाहिए। उन्होंने कहा कि रिटायरमेंट फंड पर मार्केट के उतार-चढ़ाव से ज्यादा निगेटिव असर इनफ्लेशन का पड़ता है।

शेयरों का सालाना रिटर्न 12-13 फीसदी के बीच 

भारत में शेयर बाजारों का लंबी अवधि का रिटर्न उतार-चढ़ाव के बावजूद सालाना 12-13 फीसदी रहा है। नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) अभी सब्सक्राइबर को शेयरों में 75 फीसदी तक ऐलोकेशन की इजाजत देता है। मल्टीपल स्कीम फ्रेमवर्क के तहत नए इनवेस्टमेंट ऑप्शंस तो इक्विटी में 100 फीसदी तक ऐलोकेशन की इजाजत देते हैं।

रिटायरमेंट करीब आने पर पैसा डेट में शिफ्ट करना जरूरी

कुंदरा ने कहा कि रिटायरमेंट जैसे-जैसे नजदीक आता है इनवेस्टर को अपनी इनवेस्टमेंट स्ट्रेटेजी में बदलाव करना जरूरी हो जाता है। रिटायरमेंट से पहले के कुछ सालों में फोकस वेल्थ बढ़ाने की जगह उसके प्रोटेक्शन पर होना चाहिए। इसकी वजह यह है कि अचानक शेयर बाजार में तेज गिरावट से आपका रिटायरमेंट फंड का एक बड़ा हिस्सा डूब सकता है।

दो-तीन साल के खर्च का पैसा लिक्विड फंड में रखने की सलाह

ऐसी स्थिति से बचने के लिए इनवेस्टर को धीरे-धीरे अपना निवेश इक्विटी की जगह डेट या लिक्विड एसेट्स में शिफ्ट करना पड़ता है। इसकी प्रक्रिया रिटायरमेंट के 5 से 10 पहले शुरू की जा सकती है। इसके अलावा दो से तीन साल की जरूरत का पैसा लिक्विड इनवेस्टमेंट में डाल देना समझदारी है। इसका फायदा यह होता है कि बाजार में गिरावट की स्थिति में इनवेस्टर को अपने जरूरी खर्च के लिए इक्विटी कम कीमत पर बेचने को मजबूर नहीं होना पड़ता है।

SBI Schemes: जीरो रिस्क के साथ FD से बेहतर रिटर्न! गिरते मार्केट के बीच SBI की ये स्कीम्स कराएंगी बढ़िया मुनाफा

SBI Mutual Fund Schemes: शेयर बाजार में जब गिरावट या मंदी का दौर चल रहा होता है, तब नए और पुराने दोनों तरह के निवेशकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह होता है कि ऐसे समय में क्या करें? इस मौके का फायदा उठाकर आने वाले 1 से 2 सालों में अपना पैसा सुरक्षित तरीके से कैसे बढ़ाया जाए। अक्सर निवेशक गिरावट देखकर पैनिक में आ जाते हैं या फिर जल्दबाजी में बड़े रिटर्न के लालच में स्मॉलकैप जैसे जोखिम भरे फंड्स में एकमुश्त पैसा लगा बैठते हैं।

हालांकि, बाजार के दिग्गज और पोर्टफोलियो मैनेजर्स इस रणनीति से सख्त बचने की सलाह देते हैं। विशेषज्ञों का साफ मानना है कि जब मार्केट में करेक्शन चल रहा हो, तो 3 साल से कम (1-2 साल) की कम अवधि के लिए स्मॉलकैप फंड्स में बड़ा दांव लगाना खतरनाक हो सकता है।

‘दुनिया से मजबूत है भारत की इकोनॉमी!’ वैश्विक अनिश्चितता के बीच पूर्व ECB चीफ ट्रिसेट का बड़ा दावा

पोर्टफोलियो रणनीतिकार बताते हैं कि, ‘बाजार की अनिश्चितता के दौर में कम अवधि जैसे 1-2 साल के लिए केवल ज्यादा रिटर्न तलाशने से कहीं ज्यादा जरूरी ‘कैपिटल प्रोटेक्शन’ होता है। ऐसे समय में डायवर्सिफाइड एसेट एलोकेशन या हाइब्रिड फंड्स के जरिए चरणबद्ध तरीके से निवेश करना ही वेल्थ प्रोटेक्शन और ग्रोथ का सबसे समझदारी भरा फॉर्मूला है।’

1 से 2 साल के नजरिए के लिए SBI Mutual Fund की 3 सबसे मुफीद स्कीम्स

अगर आपका नजरिया केवल अगले 12 से 24 महीनों का है और आप बाजार की रिकवरी का फायदा भी उठाना चाहते हैं, तो SBI की ये स्कीम्स सबसे बढ़िया साबित हो सकती हैं:

1. SBI Multi Asset Allocation Fund (जोखिम: कम से मध्यम)

यह फंड आपकी पूंजी को सिर्फ शेयर बाजार के भरोसे नहीं छोड़ता। यह पैसे को मुख्य रूप से इक्विटी, डेट (बॉन्ड/एफडी) और गोल्ड/सिल्वर में बांटकर निवेश करता है।

1-2 साल के लिए क्यों बेस्ट? इतिहास गवाह है कि जब शेयर बाजार में गिरावट या सुस्ती होती है, तब सोना और डेट एसेट्स पोर्टफोलियो को मजबूती देते हैं। 1-2 साल की अवधि में यह फंड बाजार की गिरावट के झटकों से पूरी सुरक्षा देते हुए आपको 10% से 12% तक का स्थिर और संतुलित रिटर्न देने की क्षमता रखता है।

2. SBI Equity Hybrid Fund (जोखिम: मध्यम)

यह एक कंजर्वेटिव हाइब्रिड मॉडल पर काम करता है, जहां कुल फंड का लगभग 65% से 80% हिस्सा इक्विटी में और बाकी 20% से 35% हिस्सा डेट प्रतिभूतियों (G-Secs, बॉन्ड्स) में लगाया जाता है।

बाजार के निचले स्तर पर होने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसका इक्विटी पोर्शन सस्ते वैल्युएशन पर मजबूत शेयर खरीद लेता है। जब अगले 1-2 साल में मार्केट रिकवर करेगा, तो इक्विटी हिस्सा तेजी से रिटर्न बढ़ाएगा और डेट हिस्सा गिरावट के समय पोर्टफोलियो को संभाल कर रखेगा।

3. SBI Arbitrage Opportunities Fund (जोखिम: बेहद कम / एफडी जैसा सुरक्षित)

यह फंड शेयर बाजार की तेजी या मंदी पर बिल्कुल निर्भर नहीं रहता। यह कैश मार्केट और डेरिवेटिव्स मार्केट के बीच कीमतों के अंतर का फायदा उठाकर जोखिम-रहित रिटर्न निकालता है।

अगर आपका मुख्य लक्ष्य जीरो-रिस्क है और आप बैंक एफडी (FD) से बेहतर और टैक्स-इफिशिएंट रिटर्न चाहते हैं, तो यह फंड सबसे सुरक्षित जरिया है। 1 से 2 साल की अवधि में इसमें पैसा डूबने का खतरा न के बराबर होता है।

अगर आप थोड़ा रिस्क ले सकते हैं तो ‘STP’ रूट से बनाएं रणनीति

अगर आप बाजार की गिरावट का फायदा उठाकर 1-2 साल में आने वाली तेजी का लाभ उठाना चाहते हैं, तो एकमुश्त पैसा लगाने के बजाय STP का तरीका अपनाएं। सबसे पहले अपना पूरा पैसा SBI Arbitrage Fund या SBI Liquid Fund में एकमुश्त जमा करें। वहां से हर महीने एक निश्चित राशि (STP के जरिए) SBI Flexicap Fund या SBI Bluechip Fund में ट्रांसफर होने दें। इससे अगले 12 से 18 महीनों में आपको बाजार की हर गिरावट में ‘कॉस्ट एवरेजिंग’ का बड़ा फायदा मिलेगा।

इन स्कीम्स में 1-2 साल के लिए पैसा लगाने से बचें!

SBI Small Cap Fund: स्मॉलकैप कंपनियों में गिरावट के समय बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव होता है। इनमें रिकवरी आने में 3 से 5 साल तक का समय लग सकता है।

SBI Contra Fund & SBI Focused Equity Fund: ये फंड्स खास रणनीतियों पर काम करते हैं और इन्हें अपना प्रदर्शन दिखाने के लिए कम से कम 5 से 7 साल का लंबा समय चाहिए होता है।

कुल मिलाकर 1 से 2 साल के शॉर्ट-टू-मीडियम टर्म के लिए SBI Multi Asset Allocation Fund या STP के जरिए SBI Flexicap Fund सबसे स्मार्ट और सुरक्षित विकल्प साबित होंगे।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

इक्विटी, डेट और गोल्ड? ₹1 करोड़ का पोर्टफोलियो कैसे बनाए, एक्सपर्ट से समझें स्ट्रेटेजी

Asset Allocation Strategy: जब आपका निवेश का दायरा या कॉर्पस ₹1 करोड़ जैसे बड़े आंकड़े पर पहुंच जाता है, तब केवल ‘ज्यादा रिटर्न’ का पीछा करना काफी नहीं होता। बाजार के उतार-चढ़ाव, आपकी जोखिम लेने की क्षमता और पैसों की जरूरत की टाइमलाइन सबसे बड़े कारक बन जाते हैं।

ऐसे में मौजूदा बाजार की चाल को देखते हुए इक्विटी, डेट और गोल्ड में कितना पैसा लगाना चाहिए? प्रूडेंट इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स के सीईओ प्रशस्त सेठ के अनुसार, एक बैलेंस पोर्टफोलियो के लिए आदर्श रणनीति क्या होनी चाहिए, आइए बेहद आसान भाषा में समझते हैं।

₹1 करोड़ के पोर्टफोलियो का आइडियल बंटवारा

प्रशस्त सेठ का मानना है कि निवेशक अपने रिस्क प्रोफाइल और वित्तीय लक्ष्यों के आधार पर अपने पोर्टफोलियो को तीन हिस्सों में बांट सकते हैं:

1. एसेट क्लास: इक्विटी

हिस्सा (%): 65% – 75%

₹1 करोड़ पर निवेश: ₹65 लाख – ₹75 लाख

मुख्य भूमिका: लंबी अवधि में कैपिटल ग्रोथ

2. एसेट क्लास: डेट

हिस्सा (%): 15% – 25%

₹1 करोड़ पर निवेश: ₹15 लाख – ₹25 लाख

मुख्य भूमिका: पोर्टफोलियो में स्थिरता व लिक्विडिटी

3. एसेट क्लास: गोल्ड

हिस्सा (%): 5% – 10%

₹1 करोड़ पर निवेश: ₹5 लाख – ₹10 लाख

मुख्य भूमिका: रिस्क घटाने के लिए डायवर्सिफिकेशन

क्या इक्विटी में 70% पैसा लगाना सही है?

लंबी अवधि में वेल्थ क्रिएशन के लिए इक्विटी सबसे बड़ा जरिया है, इसलिए यह पोर्टफोलियो का सबसे बड़ा हिस्सा बना रहेगा। लेकिन बाजार में तेजी देखकर अंधाधुंध पैसा लगाना सही नहीं है। निवेश करते समय कंपनी की ग्रोथ क्षमता (15–20% लॉन्ग टर्म ग्रोथ) और शेयर के सही भाव यानी वैल्यूएशन पर ध्यान देना बेहद जरूरी है।

₹70 लाख के इक्विटी फंड में से 60–70% हिस्सा (लगभग ₹42 से ₹49 लाख) मजबूत लार्ज-कैप कंपनियों में होना चाहिए। बाकी हिस्सा मिड और स्मॉल-कैप में उनके वैल्यूएशन के हिसाब से बांटा जा सकता है। वैसे 70% इक्विटी में होने का मतलब यह नहीं है कि आप जोखिम भरी छोटी कंपनियों में दांव लगा रहे हैं, बल्कि बड़ा हिस्सा स्थापित कंपनियों में सुरक्षित रहता है।

डेट क्यों जरूरी है?

डेट को आमतौर पर कम रिटर्न वाला विकल्प माना जाता है, लेकिन इसका रोल केवल रिटर्न देना नहीं है। यह बाजार के झटकों से बचाव करता है। जब शेयर बाजार में बड़ी गिरावट आती है, तो डेट पोर्टफोलियो को संभालता है।

अगर आपको अगले 1–3 सालों में किसी बड़े काम के लिए पैसे चाहिए, तो उस रकम को शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव में नहीं डाला जा सकता। ऐसे में ₹15 से ₹25 लाख का डेट बकेट लिक्विडिटी और सुरक्षा दोनों देता है।

गोल्ड: रिटर्न के पीछे भागने के लिए नहीं, सेफ्टी के लिए

सोने ने हाल के दिनों में शानदार रिटर्न दिया है, लेकिन केवल हालिया प्रदर्शन देखकर गोल्ड आवंटन नहीं बढ़ाना चाहिए। सोना और शेयर बाजार अक्सर एक-दूसरे के विपरीत दिशा में चलते हैं। जब इक्विटी पर दबाव होता है, तब सोना पोर्टफोलियो के नुकसान को कम करता है। यह डायवर्सिफिकेशन का बेस्ट जरिया है। ₹1 करोड़ के पोर्टफोलियो में ₹5 से ₹10 लाख (5–10%) की सोने में हिस्सेदारी पर्याप्त मानी जाती है।

न करें ये भूल

₹1 करोड़ का पोर्टफोलियो बनाकर छोड़ देने से काम नहीं चलेगा। जैसे-जैसे आपकी उम्र बढ़ती है, आपके वित्तीय लक्ष्य करीब आते हैं या बाजार के भाव बदलते हैं, आपको समय-समय पर इसमें जरूरी बदलाव करते रहना चाहिए।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

बाजार में गिरावट से एसेट एलोकशन नहीं करने वाले इनवेस्टर्स को तगड़ी चोट, जानिए पूरा मामला

शेयर बाजारों में गिरावट थमने का नाम नहीं ले रही। 29 सितंबर को भी बाजार के प्रमुख सूचकांक गिरकर बंद हुए। इससे लंबी अवधि के लिए शेयरों में निवेश करने वाले लोग चिंतित हैं। खासकर ऐसे लोग ज्यादा चिंतित हैं, जिन्हें अभी पैसे की जरूरत है। अगर अभी वे शेयर या म्यूचुअल फंड की इक्विटी स्कीम से पैसे निकालते हैं तो उन्हें बड़ा नुकसान उठाना होगा।

पूरा पैसा शेयरों में निवेश करना ठीक नहीं

एक्सपर्ट्स का कहना है कि बाजार की गिरावट ने उन लोगों को बड़ी चोट पहुंचाई है, जो अपना ज्यादातर पैसा शेयरों या म्यूचुअल फंड की इक्विटी स्कीम में निवेश कर रहे थे। अब उन्हें एसेट एसेट ऐलोकेशन का मतलब समझ में आ रहा है। इनवेस्टमेंट एडवाइजर्स हमेशा निवेशकों को एसेट ऐलोकशन का खास ख्याल रखने की सलाह देते हैं। यह बाजार में ज्यादा गिरावट की स्थिति में इनवेस्टर के पोर्टफोलियो को सुरक्षा देता है।

पोर्टफोलियो में डेट और गोल्ड भी होने चाहिए

प्रूडेंट इनवेस्टमेंट मैनेजर्स के सीईओ प्रशांत सेठ ने कहा, “इनवेस्टर्स को करीब 65-75 फीसदी पैसा शेयरों में रखना चाहिए। 15-25 फीसदी पैसा डेट में रखा जा सकता है। 5-10 फीसदी गोल्ड में रखा जा सकता है।” उन्होंने कहा कि हालांकि यह इनवेस्टर के रिस्क लेने की कपैसिटी और इनवेस्टमेंट के गोल पर निर्भर करता है। इसका मतलब है कि अगर किसी को एक लाख रुपये का निवेश करना है तो वह 65-75 हजार शेयरों में लगा सकता है। 15-25 फीसदी डेट में लगा सकता है। बाकी गोल्ड में।

शेयरों में ज्यादा निवेश करने में खराबी नहीं 

शेयर बाजार की स्थिति बीते दो साल से डांवाडोल बनी हुई है। इस दौरान बाजार ने निवेशकों को निराश किया है। लेकिन, यह सिर्फ दो साल की बात है। लंबी अवधि में मार्केट का रिटर्न दूसरे एसेट क्लास से ज्यादा रहता है। इसलिए पोर्टफोलियो का बड़ा हिस्सा शेयरों में निवेश करने में कोई खराबी नहीं है। लेकिन, शेयरों में 100 फीसदी निवेश ठीक नहीं है। इसका मतलब है कि आपको अपना पूरा पैसा सिर्फ शेयरों या म्चूअल फंड की इक्विटी स्कीम में नहीं लगाना चाहिए।

लार्जकैप शेयरों में ज्यादा निवेश सुरक्षित

सेठ ने कहा कि इनवेस्टर 60-70 फीसदी लार्जकैप शेयरों में निवेश कर सकता है। बाकी मिडकैप और स्मॉलकैप में निवेश किया जाल सकता है। लार्जकैप शेयरों में ज्यादा निवेश से पोर्टफोलियो को सुरक्षा मिलती है। स्मॉलकैप और मिडकैप शेयरों के मुकाबले लार्जकैप शेयरों पर गिरावट का असर कम पड़ता है। इनवेस्टर रिस्क लेने की अपनी क्षमता के हिसाब से निवेश में संतुलन बना सकता है।

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आगे पैसे की जरूरत पड़ने वाली है तो डेट में करें निवेश

सेठ ने कहा कि अगर किसी इनवेस्टर को अगले अगले कुछ सालों के बाद पैसे की जरूरत पड़ने वाली है तो उसे ज्यादा पैसा मार्केट से जुड़े ऑप्शंस में निवेश नहीं करना चाहिए। वह डेट में अपना निवेश बढ़ा सकता है। इससे पैसे की जरूरत पड़ने पर उसे कम भाव पर अपने शेयर बेचने को मजबूर नहीं होना पड़ेगा। जहां तक गोल्ड की बात है तो यह पोर्टफोलियो के डायवर्सिफिकेशन के लिए जरूरी है। गोल्ड को दुनिया में निवेश का सबसे सुरक्षित विकल्प माना जाता है।

सोने में निवेश रोकने की नहीं करें भूल, कोटक म्यूचुअल फंड ने बताई इसकी वजह

सोने ने 2026 में निवेशकों को 63 फीसदी रिटर्न दिया था। लेकिन, इस साल सोने की चाल सुस्त पड़ गई है। इस साल अगस्त तक सोने का रिटर्न सिर्फ 2 फीसदी है। इससे इनवेस्टर्स निराश हैं। लेकिन, कोटक महिंद्रा म्यूचुअल फंड का कहना है कि इसके बावजूद पोर्टफोलियो में गोल्ड को शामिल करना जरूरी है। उसने सितंबर 2026 एसेट ऐलोकेशन आउटलुक में इस बारे में बताया है।

कोटक का इक्विटी पर न्यूट्रल रुख

कोटक ने शेयरों पर अपना रुख न्यूट्रल रखा है। म्यूचुअल फंड हाउस का यह भी मानना है कि आगे सोने में 2026 जैसी तेजी लौटने को लेकर संशय है। जहां तक निवेशकों की बात है तो कोटक की रिपोर्ट का मतलब यह नहीं है कि सोना शेयर की जगह ले लेगा। इसका मतलब सिर्फ यह है कि एसेट ऐलोकेशन में इक्विटी और डेट के साथ सोने की भी जगह है।

मल्टी एसेट पोर्टफोलियो का फायदा

कोटक ने एक ऐसे पोर्टफोलियो के बारे में बताया है, जिसमें निफ्टी टीआरआई 55 फीसदी, निफ्टी शॉर्ट ड्यूरेशन डेट इंडेक्स 30 फीसदी और डोमेस्टिक गोल्ड 15 फीसदी है। इस पोर्टफोलियो ने पांच सालों के दौरान 12.23 फीसदी रिटर्न दिया है। इस दौरान निफ्टी 50 टीआरआई का रिटर्न 10.93 फीसदी रहा है।

डायवर्सिफिकेशन के लिए सोने में निवेश

अगर तीन सालों की बात की जाए तो इस पोर्टफोलियो ने 11.20 फीसदी रिटर्न दिया है, जबकि निफ्टी 50 टीआरआई का रिटर्न 7.33 फीसदी रहा है। 7 साल में दोनों का रिटर्न 13.50 फीसदी रहा है। 10 साल में पोर्टफोलियो का रिटर्न 11.96 रहा है, जबकि निफ्टी 50 टीआरआई का रिटर्न 11.95 फीसदी रहा है।

सिर्फ इक्विटी में निवेश में ज्यादा रिस्क

इससे डायवर्सिफायड पोर्टफोलियो और सिर्फ इक्विटी वाले पोर्टफोलियो के रिटर्न के बीच फर्क का पता चलता है। मंथली 10,000 रुपये SIP की हिस्सेदारी 55 फीसदी, शॉर्ट ड्यूरेशन डेट की हिस्सेदारी 30 फीसदी और सोने की हिस्सेदारी 15 फीसदी वाले पोर्टफोलियो ने एक साल में 3.98 फीसदी रिटर्न दिया है, जबकि निफ्टी 50 टीआरआई का रिटर्न इस दौरान मानइस 3.01 फीसदी है।

बैलेंस्ड पोर्टफोलियो में सोने की भी जगह

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि सिर्फ गोल्ड का प्रदर्शन शेयरों से अच्छा रहा है। पोर्टफोलियो में 30 फीसदी हिस्सेदारी शॉर्ट ड्यूरेशन डेट की भी है। पोर्टफोलियो तीनों एसेट क्लास का प्रदर्शन दिखाता है। कोटक के आउटलुक में सोने से जुड़ी कुछ खास बातों के बारे में बताया गया है।

सोने में इन वजहों से जारी रहेगी तेजी 

पहला, कई देशों के केंद्रीय बैंकों ने सोने की खरीदारी बढ़ाई है। दूसरा, चीन भी गोल्ड में काफी निवेश कर रहा है। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं है कि इनवेस्टर्स को शेयरों की जगह सोने में निवेश शुरू कर देना चाहिए। सोने का रिटर्न 2025 में 63 फीसदी रहने का मतलब यह नहीं है कि आगे भी उसका रिटर्न इतना रहेगा। इसका मतलब सिर्फ यह है कि पोर्टफोलियो में शेयर और डेट के साथ गोल्ड को भी शामिल करना जरूरी है।

Gold ने बीते एक साल में 35% रिटर्न दिया, अभी गोल्ड और शेयर में से किसमें निवेश करने पर ज्यादा रिटर्न मिलेगा?

सोना ने बीते एक साल में 35.3 फीसदी रिटर्न दिया है। इस दौरान निफ्टी 50 टोटल रिटर्न इंडेक्स (टीआरआई) ने 5.4 फीसदी निगेटिव रिटर्न दिया है। इस लिहाज से बीते एक साल में गोल्ड के निवेशकों को अच्छा मुनाफा हुआ है, जबकि शेयरों के निवेशकों को लॉस उठाना पड़ा है। सवाल है कि क्या शेयरों की जगह गोल्ड में निवेश करना ज्यादा फायदेमंद है?

छोटे टाइम फ्रेम में कई बार सोने ने दिया ज्यादा रिटर्न

इस सवाल का जवाब पाने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। फंड्सइंडिया के वेल्थ कनवर्सेशंस अगस्त 2026 की रिपोर्ट बताती है कि छोटे-छोटे टाइम फ्रेम में गोल्ड ने शेयरों से ज्यादा रिटर्न दिया है। लेकिन, जब हम लंबे टाइम फ्रेम में देखते हैं तो शेयरों ने सोने के मुकाबले निवेशकों को ज्यादा रिटर्न दिए हैं।

सालाना आधार पर गोल्ड कभी आगे तो कभी पीछे रहा है

फंडसइंडिया ने साल 2000 से लेकर अब तक गोल्ड और Nifty 50 TRI के रिटर्न की तुलना की है। डेटा बताते हैं कि सालान आधार पर रिटर्न की तुलना करने पर गोल्ड कई बार रिटर्न के मामले में शेयरों से आगे रहा है तो कई बार पीछे रहा है। कई बार किसी साल इसने शेयरों के मुकाबले 79 फीसदी रिटर्न दिया है तो कभी इसका रिटर्न शेयरों के मुकाबले 65 फीसदी तक कम रहा है।

लंबी अवधि में शेयरों का रिटर्न गोल्ड से ज्यादा 

निवेश की अवधि बढ़ाने पर हमें दूसरे तरह के नतीजे मिलते हैं। 10 साल की अवधि में गोल्ड का सालाना रिटर्न Nifty 50 TRI के मुकाबले करीब 2 पर्सेंटेज प्वाइंट कम रहा है। 15 साल की अवधि में भी औसत रिटर्न सालाना आधार पर शेयरों के मुकाबले 2 पर्सेंटेज प्वाइंट कम रहा है। 20 साल की अवधि में भी देखने पर सालाना आधार पर गोल्ड का औसत रिटर्न शेयरों के मुकाबले करीब 2 पर्सेंटेज प्वाइंट कम रहा है।

रिटर्न में थोड़ा अंतर भी लंबी अवधि में बड़ा फर्क पैदा करता है

रिटर्न में 2 पर्सेंटेज प्वाइंट का फर्क पहली नजर में ज्यादा नहीं लगता है। लेकिन, जब हम 10, 15 और 20 साल की अवधि में रिटर्न की बात करते हैं तो यह छोटा फर्क काफी बड़ा बन जाता है। सवाल है कि क्या इसका मतलब है कि गोल्ड की जगह शेयरों में निवेश करने पर ज्यादा पैसा बनेगा? इस सवाल का जवाब बहुत आसान नहीं है। इसकी वजह यह है कि आपके निवेश (पोर्टफोलियो) में सोने और शेयरों की भूमिका अलग-अलग होती है।

लंबी अवधि में वेल्थ क्रिएशन के लिए शेयरों में निवेश समझदारी

एक्सपर्ट्स का कहना है कि लंबी अवधि में वेल्थ क्रिएशन यानी पैसा बनाने के लिए शेयर सही हैं। गोल्ड का काम पोर्टफोलियो को डायवर्सिफाई करना है। इसका फायदा यह है कि कई बार जब शेयर बाजार में दबाव दिखता है तो गोल्ड पोर्टफोलियो को नुकसान से बचाता है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण है बीता एक साल है। बीते एक साल में जब शेयरों ने निगेटिव रिटर्न दिया है तो गोल्ड ने बंपर 35 फीसदी का रिटर्न दिया है।

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इनवेस्टमेंट पोर्टफोलियो में गोल्ड और शेयर की भूमिका अलग-अलग है

जब आप निवेश का प्लान बनाते हैं तो आपके दिमाग में गोल्ड और शेयर की भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए। ज्यादातर इनवेस्टर्स दूसरी तरह से सोचते हैं। वे सिर्फ यह देखते हैं कि किसी एसेट में निवेश करने पर ज्यादा रिटर्न मिलेगा। ऐसा सोचना गलत है। 10, 15, 20, 30 साल के पीरियड में रिटर्न की तुलना से यह स्पष्ट हो चुका है कि शेयरों में निवेश करने पर ज्यादा वेल्थ क्रिएशन होता है। इसका मतलब है कि आपका ज्यादा निवेश शेयरों में होना चाहिए और कुछ निवेश गोल्ड में होना चाहिए। इससे लंबी अवधि में आपके पोर्टफोलियो का रिटर्न बेहतर रहेगा।

डिसक्लेमर: मनीकंट्रोल पर एक्सपर्ट्स की तरफ से व्यक्त विचार उनके अपने विचार होते हैं। ये वेबसाइट या इसके मैनेजमेंट के विचार नहीं होते। मनीकंट्रोल की यूजर्स को सलाह है कि उन्हें निवेश का फैसला लेने से पहले सर्टिफायड एक्सपर्ट्स की राय लेनी चाहिए।

99.9% निवेशक यहां करते हैं गलती! 2 करोड़ से 10 करोड़ का सफर कैसे होगा आसान, जानें एक्सपर्ट की रणनीति

हर निवेशक चाहता है कि उसका पैसा समय के साथ तेजी से बढ़े। आम धारणा है कि नियमित निवेश करते रहें, बाजार में टिके रहें और कंपाउंडिंग को अपना काम करने दें। लेकिन जैसे-जैसे पोर्टफोलियो बड़ा होता है, कहानी बदलने लगती है। फाइनेंशियल एडवाइजर कपिल जैन ने 45 साल के एक ऐसे निवेशक का उदाहरण दिया, जिसके पास 2 करोड़ रुपये हैं और वह 10 साल में इसे 10 करोड़ करना चाहता है। उनके मुताबिक, लक्ष्य हासिल करना संभव है, लेकिन रास्ते में निवेश की रणनीति बदलना बेहद जरूरी है।

शुरुआत में SIP बनाती है रफ्तार

जैन के अनुसार, शुरुआती दौर में नियमित निवेश और बाजार की ग्रोथ से पोर्टफोलियो तेजी से बढ़ सकता है। लेकिन जब रकम करोड़ों में पहुंचने लगती है, तब बाजार की छोटी गिरावट भी बड़ा नुकसान दिखाने लगती है। यही वजह है कि शुरुआत में काम करने वाली रणनीति को पूरी यात्रा में जारी रखना समझदारी नहीं हो सकती।

5 करोड़ पर 25% गिरावट का मतलब?

मान लीजिए पोर्टफोलियो 5 करोड़ रुपये का है और बाजार 25 फीसदी गिर जाता है। रकम के हिसाब से करीब 1.25 करोड़ रुपये की गिरावट आ सकती है। यानी अब नुकसान की भरपाई सिर्फ कुछ महीनों की SIP से नहीं होगी। बड़े कॉर्पस के साथ बाजार का हर उतार-चढ़ाव ज्यादा बड़ा असर डालता है।

10 करोड़ के करीब पहुंचते ही असली चुनौती

अगर पोर्टफोलियो 10 करोड़ रुपये तक पहुंच गया और बाजार 25 फीसदी गिरा, तो करीब 2.5 करोड़ रुपये की वैल्यू कम हो सकती है। इसीलिए जैन का कहना है कि बड़े पोर्टफोलियो के साथ सिर्फ रिटर्न के पीछे भागना सही रणनीति नहीं है। इस चरण में कमाए हुए पैसे को बचाना भी उतना ही जरूरी है।

‘एक ही रणनीति हमेशा काम नहीं करती’

कपिल जैन के मुताबिक निवेशक अक्सर सबसे बड़ी गलती यही करते हैं कि पोर्टफोलियो छोटा हो या बड़ा, रणनीति वही रखते हैं। उनका सुझाव है कि समय-समय पर पोर्टफोलियो की समीक्षा, रीबैलेंसिंग और सही एसेट एलोकेशन पर ध्यान देना चाहिए। आखिरकार, 2 करोड़ से 10 करोड़ तक पहुंचना सिर्फ कंपाउंडिंग का खेल नहीं है; जैसे-जैसे पैसा बढ़ता है, उसे संभालने का तरीका भी बदलना पड़ता है।

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