आज आपकी मंथली सैलरी 50 हजार रुपये है तो रिटायरमेंट के लिए कितना फंड पर्याप्त होगा?

कई लोग रिटायरमेंट के लिए सेविंग्स और इनवेस्टमेंट तो करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि उनका रिटायरमेंट फंड कितना बड़ा होना चाहिए। एक्सपर्ट का कहना है रिटायरमेंट फंड का साइज इस बात पर निर्भर करता है कि आज आपका हर महीने का खर्च कितना है।

रिटायरमेंट फंड के कैलकुलेशन का फॉर्मूला

डीएसपी पेंशन फंड के चीफ इनवेस्टमेंट अफसर रमनीक कुंदरा के मुताबिक, रिटायरमेंट फंड आपके सालाना खर्च का करीब 25-30 गुना होना चाहिए। इसे एक उदाहरण की मदद से आसानी से समझ सकते हैं। मान लीजिए अगर किसी व्यक्ति का मंथली खर्च रिटायरमेंट से ठीक पहले 50,000 रुपये है तो इसका मतलब है कि उसका सालाना खर्च 6 लाख रुपये होगा। 6 लाख का 25 से 30 गुना 1.5 से 1.8 करोड़ होगा।

निवेश का एक बड़ा हिस्सा इक्विटी में लगाना होगा

कुंदरा ने कहा कि रिटायरमेंट फंड बनाने के लिए निवेश की जल्द शुरुआत करना सबसे जरूरी है। दूसरा, आपको निवेश में अनुशासन बरतना होगा। लंबी अवधि में बड़ा रिटायरमेंट फंड तैयार करने लिए निवेश का एक बड़ा हिस्सा इक्विटी यानी शेयरों में लगाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि छोटे-छोटे टारगेट तय करने से बड़ा रिटायरमेंट फंड तैयार करना आसान हो जाता है।

छोटे-छोटे टारगेट तय करने से होगी आसानी 

उन्होंने बताया कि 30 साल की उम्र में आपका रिटायरमेंट फंड आपकी एक साल की इनकम के बराबर होना चाहिए। 40 की उम्र तक यह आपकी सालाना इनकम का तीन गुना होना चाहिए। 50 की उम्र तक यह आपकी सालाना इनकम का पांच से छह गुना तक होना चाहिए। उन्होंने कहा कि रिटायरमेंट फंड पर मार्केट के उतार-चढ़ाव से ज्यादा निगेटिव असर इनफ्लेशन का पड़ता है।

शेयरों का सालाना रिटर्न 12-13 फीसदी के बीच 

भारत में शेयर बाजारों का लंबी अवधि का रिटर्न उतार-चढ़ाव के बावजूद सालाना 12-13 फीसदी रहा है। नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) अभी सब्सक्राइबर को शेयरों में 75 फीसदी तक ऐलोकेशन की इजाजत देता है। मल्टीपल स्कीम फ्रेमवर्क के तहत नए इनवेस्टमेंट ऑप्शंस तो इक्विटी में 100 फीसदी तक ऐलोकेशन की इजाजत देते हैं।

रिटायरमेंट करीब आने पर पैसा डेट में शिफ्ट करना जरूरी

कुंदरा ने कहा कि रिटायरमेंट जैसे-जैसे नजदीक आता है इनवेस्टर को अपनी इनवेस्टमेंट स्ट्रेटेजी में बदलाव करना जरूरी हो जाता है। रिटायरमेंट से पहले के कुछ सालों में फोकस वेल्थ बढ़ाने की जगह उसके प्रोटेक्शन पर होना चाहिए। इसकी वजह यह है कि अचानक शेयर बाजार में तेज गिरावट से आपका रिटायरमेंट फंड का एक बड़ा हिस्सा डूब सकता है।

दो-तीन साल के खर्च का पैसा लिक्विड फंड में रखने की सलाह

ऐसी स्थिति से बचने के लिए इनवेस्टर को धीरे-धीरे अपना निवेश इक्विटी की जगह डेट या लिक्विड एसेट्स में शिफ्ट करना पड़ता है। इसकी प्रक्रिया रिटायरमेंट के 5 से 10 पहले शुरू की जा सकती है। इसके अलावा दो से तीन साल की जरूरत का पैसा लिक्विड इनवेस्टमेंट में डाल देना समझदारी है। इसका फायदा यह होता है कि बाजार में गिरावट की स्थिति में इनवेस्टर को अपने जरूरी खर्च के लिए इक्विटी कम कीमत पर बेचने को मजबूर नहीं होना पड़ता है।

EPF Retirement Investment: रिटायरमेंट के बाद नियमित कमाई के लिए EPF का पैसा कहां लगाएं? एक्सपर्ट्स से जानिए

EPF Retirement Investment: कई सैलरीड कर्मचारी रिटायरमेंट के समय Employees’ Provident Fund (EPF) में काफी अच्छा खासा पासा जमा कर लेते हैं। लेकिन जैसे ही सैलरी बंद होती है, असली चुनौती शुरू होती है। सवाल यह होता है कि इस पैसे को लंबे समय तक कैसे चलाया जाए। क्या पूरा पैसा EPF में ही रखा जाए या महंगाई से बचने के लिए कुछ हिस्सा बाजार से जुड़े निवेश में लगाया जाए? कितना जोखिम लेना सही होगा? और एकमुश्त रकम से नियमित आय कैसे बनाई जाए?

अगर आपके पास EPF में बड़ा कॉर्पस है, तो रिटायरमेंट के बाद लक्ष्य सिर्फ पैसे को सुरक्षित रखना नहीं होता। जरूरी यह भी है कि यह पैसा आने वाले वर्षों में आपके खर्चों को पूरा करने के लिए काम करता रहे।

रिटायरमेंट के बाद EPF पर ब्याज कैसे मिलता है

रिटायरमेंट के बाद EPF पर मिलने वाले ब्याज को लेकर अक्सर उलझन रहती है। Kustodian Life के फाउंडर कुणाल काबरा बताते हैं कि EPF नियमों के मुताबिक- 58 साल को आधिकारिक रिटायरमेंट उम्र माना जाता है। रिटायरमेंट के बाद EPF में योगदान बंद हो जाता है, लेकिन बैलेंस पर कुछ समय तक ब्याज मिलता रहता है।

नियम दो तरह से लागू होते हैं। अगर कोई व्यक्ति 58 साल की उम्र में रिटायर होता है, तो उसके EPF बैलेंस पर तीन साल तक यानी 61 साल की उम्र तक ब्याज मिलता है। लेकिन अगर कोई 58 साल से पहले रिटायर होता है, तो उसे ब्याज सिर्फ 58 साल की उम्र तक ही मिलेगा। इसका मतलब है कि 58 साल एक तरह से कट-ऑफ उम्र है। तीन साल तक ब्याज मिलने का फायदा तभी मिलता है, जब रिटायरमेंट आधिकारिक उम्र यानी 58 साल पर हो।

इसे उदाहरण से समझिए

अब मान लीजिए कि अगर कोई 57 साल में रिटायर होता है, तो उसे ब्याज 60 साल तक मिलेगा। अगर कोई 55 साल में रिटायर होता है, तो ब्याज 58 साल तक मिलेगा। यहां तक कि अगर कोई 45 साल में रिटायर होता है, तब भी ब्याज केवल 58 साल तक ही मिलेगा।

आमतौर पर EPF पर मिलने वाली ब्याज दर करीब 8 प्रतिशत के आसपास रहती है, लेकिन यह ब्याज इन्हीं तय सीमाओं के भीतर मिलता है। यहां तक कि अगर कोई व्यक्ति 58 के बाद भी काम करता रहे, तब भी नए EPF योगदान आम तौर पर बंद हो जाते हैं। ब्याज 61 साल की उम्र तक ही सीमित रहता है। इसी वजह से एक्सपर्ट मानते हैं कि रिटायरमेंट के बाद केवल EPF पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होता।

फिक्स्ड इनकम का इंतजाम जरूरी

रिटायरमेंट के बाद सुरक्षित निवेश वाले हिस्से में भी केवल एक साधन पर निर्भर रहना सही नहीं माना जाता। Master Capital Services में वेल्थ मैनेजमेंट की AVP आकांक्षा शुक्ला कहती हैं कि EPF मुख्य रूप से बचत जमा करने का साधन है, न कि रिटायरमेंट में नियमित आय देने वाला साधन।

इसलिए रिटायरमेंट के बाद बचत को इस तरह व्यवस्थित करना जरूरी होता है कि उससे नियमित आय मिलती रहे। उदाहरण के तौर पर Senior Citizens’ Savings Scheme (SCSS) अपेक्षाकृत ज्यादा और स्थिर आय दे सकती है। वहीं बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट भी अपनी सादगी और तय रिटर्न की वजह से कई लोगों की पसंद बने रहते हैं, खासकर उन लोगों के लिए जो मासिक आय चाहते हैं।

इसके अलावा डेट म्यूचुअल फंड पोर्टफोलियो में लचीलापन और लिक्विडिटी जोड़ सकते हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इनके जरिए जरूरत के मुताबिक समय-समय पर पैसे निकालना आसान हो सकता है।

रिटायरमेंट में भी इक्विटी की भूमिका

कई रिटायर्ड लोगों को लगता है कि इक्विटी से पूरी तरह दूर रहना सुरक्षित रहेगा। लेकिन ऐसा करने से एक और जोखिम पैदा हो सकता है। समय के साथ महंगाई आपकी खरीद क्षमता को कम कर सकती है।

आकांक्षा शुक्ला के मुताबिक, बढ़ती औसत उम्र और महंगाई को देखते हुए रिटायरमेंट पोर्टफोलियो में इक्विटी की भूमिका अब धीरे धीरे जरूरी होती जा रही है।

आमतौर पर 15 से 20 प्रतिशत तक इक्विटी निवेश, खासकर लार्ज-कैप, इंडेक्स या हाइब्रिड फंड के जरिए, पोर्टफोलियो को लंबे समय में बढ़ने में मदद कर सकता है। यहां मकसद बहुत ज्यादा रिटर्न कमाना नहीं होता, बल्कि यह सुनिश्चित करना होता है कि आपका कॉर्पस समय के साथ खत्म न हो।

सही एसेट एलोकेशन क्यों जरूरी है

रिटायरमेंट के बाद पोर्टफोलियो का संतुलन बहुत महत्वपूर्ण होता है। इससे एक तरफ नियमित आय मिलती रहती है और दूसरी तरफ महंगाई से भी बचाव होता है।

आकांक्षा शुक्ला के अनुसार अगर किसी के पास करीब 3 करोड़ रुपये का कॉर्पस है, तो निवेश को चार हिस्सों में बांटना एक सामान्य रणनीति हो सकती है। इसमें EPF और अन्य फिक्स्ड इनकम साधन, डेट निवेश, इक्विटी और एक छोटा इमरजेंसी फंड शामिल हो सकता है। असल में यह डिस्ट्रीब्यूशन कुछ इस तरह हो सकता है:

  • 40 से 50 प्रतिशत फिक्स्ड इनकम
  • 30 से 35 प्रतिशत डेट निवेश
  • 15 से 20 प्रतिशत इक्विटी
  • और एक छोटा इमरजेंसी फंड

एकमुश्त रकम से नियमित आय कैसे बनाएं

रिटायरमेंट के समय मिलने वाली बड़ी रकम को सही तरीके से निवेश करना जरूरी होता है। Arihant Capital Markets की CEO Wealth स्वाति जैन के अनुसार, पूरी रकम एक साथ निवेश करने की बजाय Systematic Transfer Plan (STP) का इस्तेमाल किया जा सकता है।

इसमें पैसा पहले कम जोखिम वाले डेट या लिक्विड फंड में रखा जाता है और फिर 6 से 12 महीनों के दौरान धीरे धीरे इक्विटी या हाइब्रिड फंड में ट्रांसफर किया जाता है। इससे बाजार के उतार चढ़ाव का जोखिम कम हो जाता है।

नियमित आय के लिए Systematic Withdrawal Plan (SWP) भी बेहतर तरीका हो सकता है। इसमें निवेश से तय अंतराल पर एक निश्चित रकम निकाली जाती है, जिससे नियमित कैश फ्लो बना रहता है।

एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि एक से दो साल के खर्च के बराबर रकम सुरक्षित निवेश में रखी जाए, ताकि बाजार गिरने के समय मजबूरी में पैसे निकालने की जरूरत न पड़े। इसके बाद SWP के जरिए नियमित आय बनाई जा सकती है।

रिटायरमेंट में सुरक्षित निकासी कितनी हो

स्वाति जैन के मुताबिक, इसके लिए बकेट रणनीति अपनाना इस्तेमाल हो सकता है। इसमें छोटे समय की जरूरतों के लिए डेट निवेश से SWP किया जाता है और लंबी अवधि की ग्रोथ के लिए इक्विटी में निवेश रखा जाता है।

एक्सपर्ट्स आम तौर पर 4 से 5 प्रतिशत सालाना निकासी को सुरक्षित मानते हैं। यानी अगर किसी के पास 3 करोड़ रुपये का कॉर्पस है, तो वह सालाना लगभग 12 से 15 लाख रुपये निकाल सकता है। यह दर आम तौर पर 20 से 25 साल तक टिकाऊ मानी जाती है, बशर्ते पोर्टफोलियो संतुलित बना रहे। अगर शुरुआती वर्षों में इससे ज्यादा पैसा निकाला जाए, तो भविष्य में कॉर्पस जल्दी खत्म होने का खतरा बढ़ सकता है।

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