SIP में नुकसान हो रहा है तो क्या बंद कर दें? म्यूचुअल फंड एक्सपर्ट ने दी ये खास सलाह

Mutual Fund SIP Investment Rules: शेयर बाजार में गिरावट आते ही म्यूचुअल फंड निवेशक अक्सर घबरा जाते हैं। खासकर जब SIP का रिटर्न 3 से 5 साल तक निगेटिव या बेहद मामूली दिखता है, तो मन में पहला सवाल यही आता है कि, क्या फंड में कोई खराबी आ गई है या यह सिर्फ बाजार की सुस्ती है?

म्यूचुअल फंड में शेयर, सोना और एफडी के जरिए आखिर निवेशक संपत्ति क्यों बनाते हैं और इस सफर में किन गलतियों से बचना चाहिए? Moneycontrol के साथ खास बातचीत में DSP म्यूचुअल फंड के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट साहिल कपूर ने एसआईपी, पोर्टफोलियो ओवरलैप, फंड मैनेजर के बदलने और फंड से निकलने के सही समय पर खुलकर बात की है।

3-5 साल तक SIP का रिटर्न खराब रहे, तो क्या फंड बेकार है?

साहिल कपूर के मुताबिक, सिर्फ कुछ सालों का खराब रिटर्न इस बात का सबूत नहीं है कि फंड खराब है। सबसे पहले आपको ‘बाजार की सुस्ती’ और ‘फंड की खराबी’ में फर्क समझना होगा।

DSP के एक ऐतिहासिक अध्ययन में पाया गया कि 10 साल की SIP चलाने वाले 95% निवेशकों को शुरुआती 5 सालों में कभी न कभी बुरे दौर का सामना करना पड़ा। वहीं 81% एसआईपी का रिटर्न किसी न किसी मोड़ पर निगेटिव भी हुआ। लेकिन राहत की बात यह है कि पूरे 10 साल का समय पूरा होने पर 99% एसआईपी ने डेट फंड्स (FDs) को पछाड़कर शानदार रिटर्न दिया।

खुद से ये सवाल पूछें कि क्या फंड अपने बेंचमार्क से लगातार पिछड़ रहा है? क्या फंड मैनेजर या निवेश का तरीका बदल गया है? अगर फंड की रणनीति सही है और सुस्ती केवल बाजार के चक्र की वजह से है, तो धैर्य बनाए रखना ही समझदारी है।

पैसों की तंगी हो तो क्या करें? SIP रोकें या पैसा निकालें

अगर अचानक आपकी आमदनी कम हो जाए या पैसों की जरूरत पड़े, तो साहिल कपूर का कहना है कि पहला मकसद वित्तीय रूप से सुरक्षित रहना है, न कि हर हाल में एसआईपी जारी रखना।

पहले से जमा पैसों को निकालने से कंपाउंडिंग का चक्र टूट जाता है। इसलिए पैसा निकालने के बजाय नई एसआईपी को कुछ समय के लिए रोकना ज्यादा बेहतर विकल्प है। अपने लॉन्ग-टर्म इक्विटी पोर्टफोलियो को इमरजेंसी के भरोसे न छोड़ें। हालांकि, अगर सच में पैसों की सख्त जरूरत है, तो पोर्टफोलियो आपके काम आने के लिए ही बना है।

हाल में तगड़ा रिटर्न देने वाले फंड्स में तुरंत पैसा लगाना सही है?

किसी फंड ने पिछले 1-2 सालों में 100% या 200% का रिटर्न दिया है, तो आंख मूंदकर उसमें पैसा न लगाएं। अमेरिका के इस फंड ने 1998 में 196% का रिटर्न दिया, जिसे देखकर 1999 में निवेशकों ने 731 मिलियन डॉलर उसमें झोंक दिए। नतीजा? 1998 से 2003 के बीच फंड ने तो 8.3% सालाना रिटर्न दिया, लेकिन देरी से घुसे आम निवेशकों को औसतन -11.9% का नुकसान उठाना पड़ा।

रिटर्न कहां से आया है कंपनी की कमाई से या सिर्फ बाजार की तेजी से? साथ ही हमेशा वैल्यूएशन देखकर ही एंट्री लें।

फ्लेक्सीकैप फंड के साथ दूसरे फंड लेना कितना सही?

अगर आपके पास पहले से फ्लेक्सीकैप फंड है, तो नया फंड लेने से पहले सावधान रहें। DSP के अध्ययन के अनुसार, एक औसत फ्लेक्सीकैप फंड का पोर्टफोलियो:

  • लार्जकैप फंड से: 63.8% मैच करता है।
  • लार्ज एंड मिडकैप से: 71.5% मैच करता है।
  • बैलेंस्ड एडवांटेज से: 75.3% मैच करता है।

यानी नया फंड खरीदने पर आपको सिर्फ 25 से 36% ही नए शेयर मिलते हैं। अलग नाम के फंड खरीदने के बजाय ऐसा फंड चुनें जो सच में आपके पोर्टफोलियो में विविधता लाए।

फंड मैनेजर बदल जाए तो किस ट्रैक रिकॉर्ड पर भरोसा करें?

अध्ययन के मुताबिक, अलग-अलग कैटेगरी में मौजूदा फंड मैनेजर्स का औसत कार्यकाल अभी भी 3 साल से कम है। फंड का 10 साल का इतिहास आपको म्यूचुअल फंड हाउस और उसकी प्रक्रिया के बारे में बताता है, मौजूदा मैनेजर के बारे में नहीं। नए मैनेजर के आने के बाद पोर्टफोलियो में क्या बदलाव हुए और उनका पुराना ट्रैक रिकॉर्ड कैसा रहा है, इस पर नजर रखें।

म्यूचुअल फंड से बाहर निकलने का सही समय क्या है?

किसी फंड में 1 साल का खराब प्रदर्शन उसे बेचने की वजह नहीं होना चाहिए। आपको फंड से तब बाहर निकलना चाहिए जब:

  • फंड का मूल मकसद या निवेश का तरीका बदल जाए।
  • कोई प्रमुख फंड मैनेजर चला जाए जिस पर पूरी रणनीति टिकी थी।
  • फंड लगातार खराब फैसलों की वजह से पिछड़ रहा हो, न कि बाजार के चक्र की वजह से।
  • आपके पोर्टफोलियो में एक ही तरह के शेयरों की हिस्सेदारी बहुत ज्यादा बढ़ जाए।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

न म्यूचुअल फंड, न शेयर… 50 लाख कमाने वाला प्रोफेशनल आखिर कहां लगा रहा पैसा

आज के दौर में अच्छी सैलरी मिलने पर ज्यादातर लोग अपनी बचत को शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड या SIP के जरिए बढ़ाने की कोशिश करते हैं। इसे लंबे समय में संपत्ति बनाने का सबसे लोकप्रिय तरीका माना जाता है। लेकिन सोशल मीडिया पर सामने आई एक कहानी ने इस सोच को नई बहस में बदल दिया है। 50 लाख रुपये सालाना कमाने वाले एक प्रोफेशनल ने पारंपरिक निवेश के बजाय अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा खुद का कारोबार खड़ा करने में लगाने का फैसला किया। उसकी यह रणनीति अब इंटरनेट पर चर्चा का विषय बन गई है।

कुछ लोग इसे भविष्य के लिए साहसिक और समझदारी भरा कदम बता रहे हैं, जबकि कुछ का मानना है कि शेयर बाजार की कंपाउंडिंग ताकत को नजरअंदाज करना जोखिम भरा हो सकता है। इसी को लेकर सोशल मीडिया पर अलग-अलग राय सामने आ रही हैं।

आधी सैलरी, आधे कंपनी के शेयर

X पर राम नाम के एक यूजर ने अपने दोस्त की फाइनेंशियल प्लानिंग शेयर की। उन्होंने बताया कि उनके दोस्त का सालाना CTC 50 लाख रुपये है। इसमें 25 लाख रुपये सैलरी के रूप में मिलते हैं, जबकि बाकी 25 लाख रुपये कंपनी के शेयर हैं, जो चार साल में धीरे-धीरे मिलते हैं।

SIP छोड़ बिजनेस पर लगाया दांव

राम के मुताबिक, उनके दोस्त ने अतिरिक्त पैसे को म्यूचुअल फंड या शेयर बाजार में लगाने के बजाय अपना बिजनेस शुरू करने का फैसला किया। पिछले साल उसने बैग्स का कारोबार शुरू किया और इस साल पुरुषों के कपड़ों का बिजनेस भी लॉन्च कर दिया।

हालांकि, वह पूरी तरह पारंपरिक निवेश से दूर नहीं है। वह PPF में निवेश करता है और हर साल करीब 1.2 लाख रुपये का LIC प्रीमियम भी भरता है। लेकिन उसका सबसे बड़ा फोकस अपने कारोबार को आगे बढ़ाने पर है।

SIP या अपना बिजनेस?

राम ने अपनी पोस्ट में सवाल उठाया कि क्या उनका दोस्त शेयर बाजार और म्यूचुअल फंड में मिलने वाले लंबे समय के कंपाउंडिंग रिटर्न से चूक रहा है? या फिर अपना सफल बिजनेस खड़ा करना भविष्य में इससे भी बड़ा फायदा दे सकता है?

यही सवाल सोशल मीडिया पर बहस की वजह बन गया।

लोगों ने क्या दी राय?

कई यूजर्स का मानना था कि निवेश और बिजनेस, दोनों के बीच संतुलन बनाकर चलना सबसे अच्छा तरीका है। उनका कहना था कि शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव रहता है, जबकि अपने बिजनेस में फैसलों पर खुद का नियंत्रण होता है।

वहीं कुछ लोगों ने कहा कि अगर किसी को अपने बिजनेस और उसकी संभावनाओं पर भरोसा है, तो अपने काम में निवेश करना ज्यादा समझदारी हो सकती है। उनका मानना है कि जब व्यक्ति खुद अपने कारोबार को संभालता है, तो उसके पास बेहतर फैसले लेने और मुनाफा बढ़ाने का मौका होता है।

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