Nifty ऑल-टाइम हाई से 15% फिसला, लेकिन 18% चढ़ने पर होगी लॉस की भरपाई, जानिए क्यों

इंडेक्स में 20 फीसदी गिरावट के बाद पूरी रिकवरी तभी आएगी जब सूचकांक 25 फीसदी चढ़ेगा। 30 फीसदी गिरावट की भरपाई तभी होगी, जब सूचकांक करीब 43 फीसदी चढ़ेगा। इसकी वजह यह है कि लॉस और रिकवरी का प्रोसेस एक जैसा नहीं होता है।

2 जनवरी को निफ्टी ऑल-टाइम हाई पर पहुंचा था

मार्च के निचले स्तर से निफ्टी में रिकवरी आई है। लेकिन, लॉस की पूरी भरपाई के लिए इसमें ज्यादा तेजी जरूरी है। निफ्टी 2 जनवरी को 26,329 के लेवल पर पहुंचा था। यह इसका ऑल-टाइम हाई है। फिर यह मार्च में गिरकर 22,331 के लेवल पर आ गया। यह जानकारी Abakkus Mutual Fund के एनालिसिस पर आधारित है। तब निफ्टी अपने ऑल-टाइम हाई से करीब 15.2 फीसदी गिरा था।

31 अगस्त तक गिरकर यह 24,080 पर आ गया था

31 अगस्त तक निफ्टी चढ़कर 24,080 पर पहुंच गया था। यह मार्च के निचले स्तर से 7.8 फीसदी की रिकवरी थी। लेकिन, लॉस की पूरी भरपाई के लिए निफ्टी में और 9.3 फीसदी तेजी जरूरी थी। तभी यह 26,329 के लेवल पर पहुंच पाता। तब से निफ्टी और गिरा है। 11 सितंबर को यह 23,398 पर क्लोज हुआ।

ऐसे समझें निफ्टी में रिकवरी का कैलकुलेशन

सवाल है कि गिरावट के बाद पूरी रिकवरी के लिए निफ्टी को क्यों ज्यादा तेजी की जरूरत पड़ती है? इसे हम एक उदाहरण की मदद से समझ सकते है। मान लीजिए आपके 100 रुपये के निवेश की वैल्यू 20 फीसदी गिर जाती है। इसका मतलब है कि आपके निवेश की वैल्यू गिरकर 80 रुपये पर आ जाती है।

20 फीसदी गिरने पर लॉस की भरपाई के लिए 25% तेजी जरूरी

अगर फिर से आपके निवेश की वैल्यू 20 फीसदी बढ़ती है तो यह 100 रुपये के लेवल पर नहीं आएगा। 80 रुपये पर 20 फीसदी की तेजी का मतलब है कि यह 96 रुपये हो जाएगा यानी सिर्फ 16 रुपये का इजाफा होगा। 80 रुपये को फिर से 100 रुपये तक पहुंचने के लिए 20 रुपये का गेन जरूरी होगा। इसका मतलब है कि 80 रुपये की वैल्यू तभी 100 रुपये होगी, जब वैल्यू 25 फीसदी बढ़ेगी।

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लॉस जितना ज्यादा होगा, रिकवरी के लिए तेजी की उतनी ज्यादा जरूरत

लॉस जितना ज्यादा होगा, यह फर्क उतना ज्यादा बढ़ेगा। 30 फीसदी गिरावट की रिकवरी के लिए इंडेक्स को करीब 43 फीसदी चढ़ना होगा। 40 फीसदी गिरावट की रिकवरी तभी होगी, जब इंडेक्स 66.7 फीसदी चढ़ेगा। अगर इंडेक्स की वैल्यू गिरकर आधी रह जाती है तो उसे पूरी तरह से रिकवर होने के लिए दोगुना चढ़ना होगा। इसका मतलब है कि अगर आपकी पोर्टफोलियो की वैल्यू ऑल-टाइम हाई से 20 फीसदी नीचे आ गई है तो लॉस की भरपाई के लिए पोर्टफोलियो की वैल्यू 25 फीसदी बढ़नी चाहिए।

nifty fall

Multi Cap vs Flexi Cap: मल्टीकैप या फ्लेक्सी कैप… जानिए कौन-सा म्यूचुअल फंड आपके लिए रहेगा बेहतर?

Multi Cap vs Flexi Cap: जब हम अपनी गाढ़ी कमाई निवेश करने की सोचते हैं, तो चाहते हैं कि पैसा सुरक्षित रहे और अच्छा रिटर्न भी मिले। ऐसे निवेशकों के लिए म्यूचुअल फंड काफी लोकप्रिय विकल्प है। लेकिन यहां भी अक्सर लोग मल्टी-कैप (Multi Cap) और फ्लेक्सी-कैप (Flexi Cap) फंड को लेकर उलझ जाते हैं।

नाम सुनने में दोनों एक जैसे लगते हैं, लेकिन निवेश का तरीका और रणनीति अलग है। मनीफ्रंट के को-फाउंडर और CEO मोहित गांग ने आसान शब्दों में समझाया कि दोनों फंड कैसे काम करते हैं और किस तरह के निवेशक के लिए कौन-सा विकल्प बेहतर हो सकता है।

मल्टी-कैप फंड कैसे काम करता है?

मल्टी-कैप फंड को आप ऐसे परिवार की तरह समझ सकते हैं, जहां हर खर्च पहले से तय होता है। SEBI के नियमों के मुताबिक, इस फंड को अपनी कुल रकम का कम से कम 75% शेयर बाजार में निवेश करना होता है।

इसके अलावा फंड मैनेजर को 25% लार्ज-कैप, 25% मिड-कैप और 25% स्मॉल-कैप कंपनियों में निवेश करना ही पड़ता है। बाकी 25% रकम वह अपनी रणनीति के हिसाब से कहीं भी लगा सकता है।

मोहित गांग के मुताबिक, यही इसकी सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे बड़ी सीमा भी। फायदा यह है कि आपका पैसा हर तरह की कंपनियों में बंटा रहता है। लेकिन अगर बाजार में गिरावट आए और स्मॉल-कैप शेयर लगातार कमजोर चल रहे हों, तब भी फंड मैनेजर वहां से पूरा पैसा नहीं निकाल सकता। उसे नियमों के मुताबिक निवेश बनाए रखना पड़ता है। इससे जोखिम बढ़ सकता है।

फ्लेक्सी-कैप फंड में क्या खास है?

फ्लेक्सी-कैप फंड में फंड मैनेजर के पास ज्यादा आजादी होती है। इसे सिर्फ अपनी कुल रकम का कम से कम 65% शेयरों में निवेश करना होता है। इसके बाद वह बाजार की स्थिति के हिसाब से निवेश का फैसला ले सकता है।

अगर उसे लगता है कि आने वाले समय में स्मॉल-कैप कंपनियां बेहतर प्रदर्शन करेंगी, तो वह वहां ज्यादा पैसा लगा सकता है। अगर बाजार में जोखिम बढ़ता दिखे, तो वह निवेश का बड़ा हिस्सा लार्ज-कैप कंपनियों में शिफ्ट कर सकता है। जरूरत पड़ने पर वह स्मॉल-कैप में निवेश शून्य भी कर सकता है।

मोहित गांग का कहना है कि फ्लेक्सी-कैप की सबसे बड़ी ताकत यही लचीलापन है। फंड मैनेजर बाजार के हिसाब से रणनीति बदल सकता है। इससे गिरावट के दौर में जोखिम को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।

आपके लिए कौन-सा फंड सही रहेगा?

यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि आप कितना जोखिम उठा सकते हैं। मोहित गांग के मुताबिक, अगर आप लंबी अवधि के लिए निवेश कर रहे हैं और बाजार के उतार-चढ़ाव से ज्यादा परेशान नहीं होते, तो मल्टी-कैप फंड आपके लिए बेहतर हो सकता है। इसमें मिड और स्मॉल-कैप का हिस्सा तय होने की वजह से लंबे समय में बेहतर रिटर्न मिलने की संभावना रहती है। हालांकि, इसमें जोखिम भी ज्यादा होता है।

अगर आप चाहते हैं कि बाजार की स्थिति के हिसाब से आपका पोर्टफोलियो बदलता रहे और जोखिम कुछ कम रहे, तो फ्लेक्सी-कैप फंड बेहतर विकल्प हो सकता है। इसमें फंड मैनेजर बाजार के हिसाब से निवेश का अनुपात बदल सकता है।

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