Amitabh Bachchan: दिल्ली HC ने अमिताभ बच्चन के पर्सनैलिटी राइट्स मामले में दिया बड़ा निर्देश, कहा- व्यक्तिगत रूप से पेश हों एक्टर

Amitabh Bachchan: अमिताभ बच्चन के पर्सनैलिटी राइट्स (व्यक्तित्व अधिकारों) से जुड़े मामले में एक नया मोड़ आया है। दिल्ली हाई कोर्ट ने बिग बी से कहा है कि अगर वह इस केस को आगे बढ़ाना चाहते हैं तो उन्हें खुद कोर्ट में पेश होना होगा। जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव की बेंच ने अमिताभ बच्चन और दूसरे पक्षों को 16 नवंबर तक अपना समझौता फाइनल करने का समय दिया है।

यह निर्देश तब दिया गया जब उन्होंने कोर्ट को बताया कि वे कुछ प्रतिवादियों (डिफेंडेंट्स) के साथ किसी समझौते पर पहुंच गए हैं। 2022 में कोर्ट ने एक ‘एक्स-पार्टे’ (एकतरफा) आदेश के जरिए अमिताभ बच्चन के पर्सनैलिटी राइट्स की सुरक्षा की थी। उनके वकील ने जरूरी औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए और समय मांगा था, लेकिन अब कोर्ट ने निर्देश दिया है कि अगर समझौता फाइनल नहीं होता है और अमिताभ बच्चन केस को आगे बढ़ाना चाहते हैं तो उन्हें खुद कोर्ट में पेश होना होगा।

HT की रिपोर्ट के अनुसार कोर्ट ने अपने आदेश में कहा- “समय दे दिया गया है। मामले को 16.11.2026 को लिस्ट किया जाए। अगर समझौता नहीं होता है या समझौता अधूरा रहता है और वादी किसी भी दावे या मुद्दे पर मुकदमा आगे बढ़ाना चाहता है तो उसे सुनवाई की अगली तारीख पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहना होगा। इससे कोर्ट को ‘कोड ऑफ सिविल प्रोसीजर, 1908’ के ‘ऑर्डर X नियम 2’ और ‘ऑर्डर V नियम 3’, तथा ‘भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023’ की धारा 168 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करने में मदद मिलेगी।”

बिग बी के पर्सनैलिटी राइट्स (व्यक्तित्व अधिकारों) के मामले के बारे में

2022 में, मशहूर वकील हरीश साल्वे ने बच्चन की ओर से हाई कोर्ट में मुकदमा दायर किया था, जिसमें उन्होंने अपने नाम, तस्वीर, आवाज़ और व्यक्तित्व से जुड़ी विशेषताओं की सुरक्षा की मांग की थी। जस्टिस नवीन चावला ने कहा, “वादी को अपूरणीय नुकसान और क्षति होने की संभावना है। कुछ गतिविधियां उन्हें बदनाम भी कर सकती हैं। इन बातों को ध्यान में रखते हुए एकतरफा अंतरिम आदेश (ex parte ad interim order) पारित किया जाता है।”

जस्टिस चावला ने आगे कहा-“इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि वादी (बच्चन) एक मशहूर हस्ती हैं और कई विज्ञापनों में भी दिखाई देते हैं। वादी इस बात से नाराज हैं कि प्रतिवादी उनकी अनुमति या अधिकार के बिना अपने सामान और सेवाओं को बढ़ावा देने के लिए उनकी सेलिब्रिटी हैसियत का इस्तेमाल कर रहे हैं। शिकायत पर विचार करने के बाद मेरी राय है कि प्रथम दृष्टया (prima facie) मामला बनता है और सुविधा का संतुलन भी उनके पक्ष में है।”

मुकदमे में कहा गया था कि मोबाइल एप्लिकेशन डेवलपर्स अमिताभ बच्चन के नाम का इस्तेमाल गैर-कानूनी तरीके से लॉटरी चलाने के लिए कर रहे थे, जबकि अन्य लोग उनकी तस्वीर वाली टी-शर्ट बेच रहे हैं।

अमिताभ बच्चन के बारे में और जानकारी

अमिताभ बच्चन ने 1969 में ‘सात हिंदुस्तानी’ फिल्म से एक्टिंग की दुनिया में कदम रखा, जिसमें उन्होंने कवि अनवर अली की भूमिका निभाई थी। इसके बाद के वर्षों में वे ‘रेशमा और शेरा’, ‘परवाना’, ‘संयोग’ और ‘बंसी बिरजू’ जैसी फिल्मों में नजर आए, जिनमें से कई व्यावसायिक रूप से असफल रहीं। ‘आनंद’ (1971) और ‘बॉम्बे टू गोवा’ (1972) में उनके अभिनय ने उन्हें एक ऐसे अभिनेता के रूप में स्थापित किया जिन पर नजर रखी जानी चाहिए।

National Herald Case: सोनिया और राहुल गांधी ने दिल्ली HC में ED की याचिका को दी चुनौती, बताया ‘कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग’

National Herald Case: नेशनल हेराल्ड मनी लॉन्ड्रिंग मामले में कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया है। दोनों नेताओं ने कोर्ट में अलग-अलग याचिकाएं दाखिल कर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की उस चुनौती का विरोध किया है, जिसमें एजेंसी ने ट्रायल कोर्ट के एक आदेश को चुनौती दी है।

18 सितंबर को दाखिल अलग-अलग लेकिन काफी हद तक एक जैसे जवाबों में, कांग्रेस नेताओं ने ED की कार्रवाई के कानूनी आधार पर सवाल उठाए। उन्होंने तर्क दिया कि एजेंसी, बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी की निजी शिकायत के आधार पर प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) का केस नहीं बना सकती।

यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट में 12 अक्टूबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है।

गांधी परिवार ने ED की कार्रवाई के कानूनी आधार पर उठाए सवाल

दाखिल किए गए जवाबों के मुताबिक, गांधी परिवार का कहना है कि ED की कार्रवाई को सही नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि यह मामला पुलिस में दर्ज FIR के बजाय सुब्रमण्यम स्वामी की 2013 की निजी शिकायत के आधार पर शुरू हुई थी।

गांधी परिवार का तर्क है कि PMLA में ED की कार्रवाई का आधार “निजी शिकायत” बनाने का कोई प्रावधान नहीं है। उनका कहना है कि स्वामी की शिकायत उन कानूनी शर्तों को पूरा नहीं करती जो एजेंसी के लिए मनी लॉन्ड्रिंग की कार्रवाई शुरू करने के लिए जरूरी हैं।

उनकी दलीलें PMLA की धारा 5(1) पर केंद्रित हैं। जवाबों में कहा गया है कि यह प्रावधान उन स्थितियों में कार्रवाई की इजाजत देता है जिनमें CrPC की धारा 173 के तहत पुलिस की अंतिम रिपोर्ट शामिल हो, या फिर किसी अधिकृत अधिकारी की शिकायत हो जो ‘शेड्यूल्ड ऑफेंस’ (सूचीबद्ध अपराध) की जांच कर रहा हो।

बचाव पक्ष का कहना है कि कोई निजी व्यक्ति ऐसी जांच नहीं कर सकता और जांच करने के लिए मजिस्ट्रेट को मिली शक्तियां इस कानूनी जरूरत को दरकिनार नहीं कर सकतीं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र

गांधी परिवार ने ‘विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ’ मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2023 के फैसले का भी हवाला दिया है।

उनका तर्क है कि इस फैसले के अनुसार, PMLA के तहत कार्रवाई शुरू करने के लिए ‘शेड्यूल्ड ऑफेंस’ (अनुसूचित अपराध) का रजिस्ट्रेशन जरूरी है। जवाब में यह भी आरोप लगाया गया है कि ED ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले में ‘निजी शिकायत’ के जिक्र का इस्तेमाल तो किया है, लेकिन उसके व्यापक संदर्भ पर ध्यान नहीं दिया है।

बचाव पक्ष ने उस लंबी अवधि की ओर भी इशारा किया है, जिसके दौरान स्वामी ने कथित तौर पर अदालत के सामने सबूत पेश नहीं किए। जवाबों के अनुसार, इसे इस बात के संकेत के तौर पर बताया गया कि निजी शिकायत को कार्यवाही का आधार मानने में क्या मुश्किलें आती हैं।

ED के अपने पुराने रिकॉर्ड का दिया हवाला

गांधी परिवार ने ED के पुराने रिकॉर्ड और बातचीत का हवाला देकर अपनी बात को सही ठहराने की कोशिश की है।

उनके जवाबों में जनवरी और अगस्त 2015 में जारी एजेंसी के टेक्निकल सर्कुलर, 2013 में सेंट्रल इन्फॉर्मेशन कमीशन के सामने दी गई जानकारी और 2024 में राइट टू इन्फॉर्मेशन (RTI) के तहत मिले जवाब का जिक्र है।

बचाव पक्ष का कहना है कि इन रिकॉर्ड्स से पता चलता है कि ED ने पहले यह रुख अपनाया था कि PMLA के तहत कार्रवाई शुरू करने से पहले FIR जरूरी है।

जवाबों में ED द्वारा जून 2021 में दर्ज ECIR का भी जिक्र है, जो स्वामी की शिकायत के सात साल बाद दर्ज की गई थी। बचाव पक्ष ने कहा कि ECIR को ट्रायल कोर्ट के सामने सितंबर 2025 में ही पेश किया गया, जब कोर्ट ने एजेंसी को इसे रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया था।

नई FIR और ट्रायल कोर्ट का आदेश

जवाबों में 3 अक्टूबर, 2025 को दिल्ली पुलिस की इकोनॉमिक ऑफेंस विंग द्वारा दर्ज की गई FIR का भी जिक्र है। हालांकि, गांधी परिवार की दलीलों के अनुसार, ED ने ट्रायल कोर्ट को बताया था कि वह इस FIR पर निर्भर नहीं है।

हाई कोर्ट के सामने यह विवाद ट्रायल कोर्ट के उस फैसले से पैदा हुआ है जिसमें उसने ED की प्रॉसिक्यूशन कंप्लेंट (अभियोजन शिकायत) पर संज्ञान लेने से इनकार कर दिया था। दलीलों के मुताबिक, दिसंबर के आदेश में कहा गया था कि इस शिकायत पर कानूनी तौर पर आगे नहीं बढ़ा जा सकता।

गांधी परिवार ने इस बात पर जोर दिया है कि ट्रायल कोर्ट का फैसला कानूनी और अधिकार-क्षेत्र से जुड़े उन मुद्दों पर आधारित था, जो ‘प्रेडिकेट-ऑफेंस’ (मूल अपराध) के लिए FIR न होने से संबंधित थे। उनका कहना है कि निचली अदालत ने मुख्य आरोपों पर उनके गुण-दोष के आधार पर कोई फैसला नहीं सुनाया।

ED 24 घंटे के अंदर हाई कोर्ट पहुंची

बचाव पक्ष ने उस तेजी पर भी सवाल उठाए हैं जिसके साथ ED हाई कोर्ट पहुंची।

जवाबों के मुताबिक, एजेंसी ने ट्रायल कोर्ट के आदेश के 24 घंटे के अंदर अपनी रिविजन याचिका दायर की। गांधी परिवार ने इस रफ्तार को “बिजली की गति” बताया और तर्क दिया कि ऐसा लगता है कि इस कार्रवाई में एजेंसी पर आम तौर पर लागू होने वाली आंतरिक मंज़ूरी की प्रक्रियाओं को नजरअंदाज किया गया है।

उन्होंने हाई कोर्ट से ED की रिविजन याचिका को खारिज करने का भी आग्रह किया है और इसे “कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग” बताया है।

क्या है नेशनल हेराल्ड केस?

नेशनल हेराल्ड केस की शुरुआत बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी की ओर से 2013 में की गई एक शिकायत से हुई थी। इस शिकायत में Associated Journals Ltd (AJL) के अधिग्रहण को लेकर कथित साजिश के आरोप लगाए गए थे। बता दें कि AJL ही नेशनल हेराल्ड अखबार का प्रकाशन करती है।

यह शिकायत ‘यंग इंडियन’ से भी जुड़ा है, जिसमें सोनिया गांधी और राहुल गांधी के पास सबसे ज्यादा शेयर हैं। आरोप AJL की उन संपत्तियों से जुड़े हैं जिनकी कीमत 2,000 करोड़ रुपये से ज्यादा बताई गई है, और साथ ही ‘यंग इंडियन’ के जरिए किए गए 50 लाख रुपये के लेन-देन से भी जुड़े हैं।

वहीं, इस मामले में ED ने अप्रैल 2025 में मनी लॉन्ड्रिंग की शिकायत दर्ज की। ट्रायल कोर्ट ने दिसंबर 2025 में इसे खारिज कर दिया, जिसके बाद एजेंसी दिल्ली हाई कोर्ट गई।

इस मामले में शामिल अन्य लोगों और संस्थाओं में सैम पित्रोदा, सुमन दुबे, सुनील भंडारी, यंग इंडियन और डोटेक्स मर्चेंडाइज प्राइवेट लिमिटेड शामिल हैं।

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Urban Company का Kent RO पर मानहानि केस, हाई कोर्ट में विज्ञापन हटाने पर बनी बात

Urban Company ने Kent RO Systems के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में मानहानि और ब्रांड को बदनाम करने का मुकदमा दायर किया है। कंपनी का आरोप है कि Kent RO ने अपने विज्ञापनों और सोशल मीडिया पोस्ट में उसके Native वॉटर प्यूरीफायर को लेकर गलत और भ्रामक दावे किए।

कंपनी ने रविवार को शेयर बाजार को दी जानकारी में बताया कि यह मुकदमा 11 अगस्त 2026 को दायर किया गया था।

किस बात पर हुआ विवाद?

Urban Company का कहना है कि Kent RO की विज्ञापन मुहिम में उसके Native M0, M1, M2, M1 Pro और M2 Pro वॉटर प्यूरीफायर के दो साल की फिल्टर लाइफ और दो साल तक सर्विसिंग की जरूरत नहीं वाले फीचर को निशाना बनाया गया।

कंपनी के मुताबिक Kent RO ने इन दावों को ‘मार्केटिंग गिमिक’ बताया और कहा कि Native वॉटर प्यूरीफायर का इस्तेमाल करना उपभोक्ताओं के लिए ‘असुरक्षित’ और ‘जोखिम भरा’ है।

Kent RO ने क्या कहा?

मामले की सुनवाई 12 अगस्त को दिल्ली हाई कोर्ट में हुई। सुनवाई के दौरान Kent RO ने अदालत से कहा कि वह विवादित विज्ञापन हटा देगा। साथ ही भविष्य में ऐसे विज्ञापन या प्रचार सामग्री भी नहीं चलाएगा, जिसमें दो साल की फिल्टर लाइफ या दो साल तक बिना सर्विसिंग वाले फीचर को लेकर Urban Company के खिलाफ इसी तरह के दावे किए जाएं।

Urban Company के मुताबिक अदालत ने Kent RO को 12 अगस्त से 15 दिनों के भीतर विवादित विज्ञापन और सोशल मीडिया पोस्ट हटाने का निर्देश दिया। अदालत का आदेश 12 अगस्त को पारित हुआ था, जबकि इसे 22 अगस्त को हाई कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड किया गया।

दोनों कंपनियों के बीच और भी कानूनी मामले

Urban Company ने बताया कि दोनों कंपनियों के बीच अन्य कानूनी मामले अभी भी अदालत में लंबित हैं। इनमें Kent RO की ओर से दायर पेटेंट उल्लंघन का मुकदमा, उस पेटेंट को चुनौती देने वाला Urban Company का जवाबी दावा और Kent RO के खिलाफ दायर टॉर्टियस इंटरफेरेंस का मामला शामिल है।

शेयरों में कैसी रही चाल?

Urban Company का शेयर शुक्रवार को 8.19% चढ़कर ₹157.41 पर बंद हुआ था। इस साल अब तक शेयर करीब 20% चढ़ चुका है। वहीं पिछले 12 महीनों में इसमें करीब 6% की गिरावट रही है।

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Rajpal Yadav Case: अभिनेता राजपाल यादव को दिल्ली हाईकोर्ट से बड़ा झटका, चेक बाउंस मामले फिर जाएंगे जेल

Rajpal Yadav Cheque Bounce Case: दिल्ली हाईकोर्ट से बॉलीवुड एक्टर राजपाल यादव को बहुत बड़ा झटका लगा है। दरअसल, कोर्ट ने शुक्रवार को चेक बाउंस मामले में सुनवाई करते हुए उनकी सजा को बरकरार रखा और उनके व्यवहार को संदिग्ध बताया। इसके साथ ही कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि उन्हें दोबारा जेल भेज जाए।

राजपाल यादव के खिलाफ क्या मामला है?

बता दें कि 2010 में, राजपाल यादव ने अपनी पहली डायरेक्टोरियल फिल्म ‘अता पता लापता’ के लिए M/s मुरली प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड से 5 करोड़ रुपये उधार लिए थे, लेकिन फिल्म बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हो गई। पैसे न चुका पाने के आरोपों के बाद, यह मामला एक लंबी कानूनी लड़ाई में बदल गया।

अप्रैल 2018 में, एक मजिस्ट्रेट कोर्ट ने चेक बाउंस मामले में राजपाल यादव और उनकी पत्नी राधा को दोषी ठहराया और उन्हें छह महीने की जेल की सजा सुनाई। 2019 की शुरुआत में सेशंस कोर्ट ने इस सजा को बरकरार रखा, जिसके बाद यादव ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपील की। ​​जून 2024 में, हाई कोर्ट ने उनकी सजा पर कुछ समय के लिए रोक लगा दी और उनसे लगभग 9 करोड़ रुपये का बकाया चुकाने के लिए “ईमानदार और सच्चे कदम” उठाने को कहा। हालांकि, इस साल 2 फरवरी को कोर्ट ने उन्हें सरेंडर करने का आदेश दिया, क्योंकि वे पैसे चुकाने के अपने वादों को पूरा करने में बार-बार नाकाम रहे थे।

सरेंडर करने से पहले अभिनेता राजपाल ने बॉलीवुड हंगामा से बात की और एक इमोशनल टिप्पणी की। उन्होंने कहा, “सर, क्या करूं? मेरे पास पैसे नहीं हैं। और कोई उपाय नहीं दिखता।” एक्टर के सरेंडर करने के बाद उन्हें दिल्ली की तिहाड़ जेल में डाल दिया गया।

इंडस्ट्री राजपाल यादव के समर्थन में आई

वहीं, राजपाल यादव के मुश्किल समय में, कई एक्टर्स ने उन्हें आर्थिक मदद देने का फैसला किया और इंडस्ट्री के दूसरे लोगों से भी इस मुश्किल घड़ी में उनकी मदद करने की अपील की। ​​सोनू सूद, अजय देवगन और सलमान खान से लेकर गुरमीत चौधरी तक, कई लोगों ने उन्हें सपोर्ट किया। साथ ही, कई सिंगर्स और फिल्ममेकर्स ने उन्हें एडवांस पेमेंट दिया और अपने आने वाले प्रोजेक्ट्स में उन्हें कास्ट किया। बता दें कि राजपाल यादव को इस मामले में 16 फरवरी को जमानत मिल गई थी।

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Abhishek Sharma: इंग्लैंड सीरीज के बीच दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचे अभिषेक शर्मा, AI फोटोज से जुड़ा है मामला

भारत के ओपनर बल्लेबाज अभिषेक शर्मा ने हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। अभिषेक शर्मा ने अपने पर्सनैलिटी राइट्स की सुरक्षा के लिए दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की है। इसका मतलब है कि उनकी अनुमति के बिना कोई भी उनका नाम, फोटो या उनसे मिलती-जुलती तस्वीर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म या एआई (AI) से बने कंटेंट में इस्तेमाल नहीं कर सकता। इस मामले में भारतीय क्रिकेटर अभिषेक शर्मा ने सोशल मीडिया और एआई की मदद से तैयार किए गए कथित आपत्तिजनक कंटेंट को हटाने की मांग की है।

सुनवाई के दौरान वरुण पाठक ने अदालत को बताया कि क्रिकेटर की ओर से बताए गए आठ यूआरएल में से दो लिंक फिलहाल खुल नहीं रहे थे। अभिषेक शर्मा फिलहाल भारतीय टीम के साथ इंग्लैंड दौरे पर हैं। 5 मैचों की टी20 सीरीज में इंग्लैंड 1-0 से आगे हैं।

कोर्ट में हुई सुनवाई

क्रिकेटर अभिषेक का मामला जस्टिस ज्योति सिंह की अदालत में सुना गया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने अभिषेक शर्मा की ओर से बताए गए कई वेब लिंक पर गौर किया, जिनमें उनके पर्सनैलिटी राइट्स के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था। विरोधी पक्ष की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस ज्योति सिंह ने कहा कि इंटरनेट पर प्रकाशित सामग्री से जुड़े मामलों में मानहानि और पर्सनैलिटी राइट्स के बीच अंतर करना कई बार मुश्किल हो जाता है। अदालत ने ये भी स्पष्ट किया कि संबंधित सामग्री की पूरी जांच किए बिना कोई अंतरिम आदेश जारी नहीं किया जा सकता।

जज ने नहीं दिया आदेश

जज ने अभिषेक के वकील से कहा, “यहां सच में गड़बड़ है। आप अपने याचिका से मिलते-जुलते स्क्रीनशॉट के साथ एक एफिडेविट दाखिल करें। आपने जो स्क्रीनशॉट अदालत को दिखाए हैं, वे रिकॉर्ड में मौजूद स्क्रीनशॉट से काफी अलग हैं। ऐसे में मैं इस तरह का आदेश पारित नहीं कर सकती।” कोर्ट ने भारतीय क्रिकेटर को निर्देश दिया कि वह याचिका के एनेक्सर में दी गई टेबल से मेल खाते स्क्रीनशॉट रिकॉर्ड पर पेश करते हुए एक नया एफिडेविट दाखिल करें। सुनवाई के दौरान जज ने कहा, “मैं यह नहीं कह रही कि मेरा ऐसा करने का मन नहीं है, लेकिन मौजूदा स्थिति में मैं इस तरह का आदेश पारित नहीं कर सकता।”

गलत तरीके से पेश की गई तस्वीर

सुनवाई के दौरान वरुण पाठक ने दलील दी कि एक यूआरएल पर मौजूद वीडियो पैपराजी अकाउंट से शेयर किया गया था, इसलिए उसमें पर्सनैलिटी राइट्स के उल्लंघन का मामला नहीं बनता। वहीं, अभिषेक शर्मा के वकील ने इसका विरोध करते हुए कहा कि संबंधित सामग्री एआई की मदद से तैयार की गई थी।

अभिषेक के वकील ने कहा, “इसका क्या मतलब है? क्या ये दिखाया जा रहा है कि वह किसी और के कंधे पर रो रहे हैं, जबकि ये एआई से बनाई गई तस्वीर है। यह पैपराजी का मामला नहीं है। मैनेजर के साथ उनकी फोटो ली गई थी और बाद में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करके उसे अलग रूप दे दिया गया।” उन्होंने ये भी बताया कि एक पोस्ट में क्रिकेटर के मैनेजर को गलत तरीके से उनकी गर्लफ्रेंड बताया गया, जिससे गलत जानकारी फैली।