Delhi Protest: रात के अंधेरे में भी रिकॉर्डिंग करने वाले बॉडी कैमरों से लैस हुए दिल्ली पुलिस के जवान, समझिए क्या है तैयारी

जंतर-मंतर पर मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रस्तावित विरोध-प्रदर्शन को देखते हुए शनिवार 10 अक्टूबर को पूरी राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था के कड़े और हाई-टेक इंतजाम किए गए हैं। इस बार प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए तैनात दिल्ली पुलिस के जवान आधुनिक नाइट-विजन बॉडी-वॉर्न कैमरों (BWCs) से लैस नजर आ रहे हैं। यह विशेष बॉडी कैमरे जवानों की यूनिफॉर्म पर लगाए गए हैं, जो दिन के उजाले के साथ-साथ रात के घने अंधेरे में भी हाई क्वॉलिटी की वीडियो और ऑडियो रिकॉर्डिंग करने में सक्षम हैं।

यह कैमरे हमारी और जनता दोनों की सुरक्षा के लिए हैं: जवान ने समझाई उपयोगिता

ANI की एक एक्स पोस्ट में दिल्ली में तैनात पुलिस जवान अपनी यूनिफॉर्म पर यह कैमरे पहने हुए दिखाई दिए। सुरक्षा में तैनात दिल्ली पुलिस के जवान दीपक चौधरी ने इन कैमरों की कार्यप्रणाली और उपयोगिता के बारे में बताते हुए कहा कि यह बॉडी कैमरे जवानों के साथ-साथ आम जनता और प्रदर्शनकारियों दोनों की सुरक्षा के लिए लगाए गए हैं। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन या हाथापाई की स्थितियों में अक्सर दिल्ली पुलिस के ऊपर एकतरफा आरोप लगा दिए जाते हैं। ऐसे में यह बॉडी कैमरे निष्पक्ष सबूत के तौर पर काम करेंगे और यह साबित करेंगे कि पुलिस ने किसी के साथ कुछ गलत किया है या नहीं। यह कैमरे मौके पर होने वाली हर एक गतिविधि को लगातार रिकॉर्ड करेंगे।

दिल्ली हाईकोर्ट ने खारिज की थी अनिवार्य बॉडी कैमरे लगाने वाली याचिका

बॉडी कैमरों की यह तैनाती ऐसे समय में देखने को मिली है, जब कुछ ही दिन पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रदर्शनों के दौरान पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के जवानों के लिए बॉडी-वॉर्न कैमरों का अनिवार्य और लगातार इस्तेमाल करने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई से इनकार कर दिया था। 7 अक्टूबर को एक्टिंग चीफ जस्टिस नितिन सांबरे की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस याचिका को केंद्र सरकार के समक्ष एक प्रतिवेदन के रूप में विचार करने को कहा था। अदालत ने न्यायिक हस्तक्षेप की जरूरत पर सवाल उठाते हुए टिप्पणी की थी कि इस मामले में ऐसा कोई कानूनी पेंच नहीं है जहां कोर्ट को निर्देश जारी करने की जरूरत पड़े। अदालत ने कहा था कि जब भी विधायिका की कोई मंशा होती है, वे वैधानिक प्रावधानों में नियम तय कर देते हैं।

जुलाई में हुए प्रदर्शन का हवाला देकर दायर की गई थी याचिका

यह याचिका एडवोकेट चाहत राघव द्वारा भारत सरकार, दिल्ली पुलिस आयुक्त, सीआरपीएफ के महानिदेशक और बीपीआरएंडडी के खिलाफ दायर की गई थी। इस याचिका में मांग की गई थी कि प्रदर्शनों और भीड़ नियंत्रण में तैनात अधिकारियों के लिए कैमरे पहनना और उन्हें चालू रखना अनिवार्य किया जाए। साथ ही रिकॉर्डिंग को सुरक्षित रखने, डेटा सुरक्षा और सबूत के तौर पर उसके इस्तेमाल के लिए सख्त मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनाई जाए।

याचिका में जुलाई 2026 में जंतर-मंतर पर CJP और एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक के प्रदर्शनों का जिक्र किया गया था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि उस दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़प के अधिकांश वीडियो आम जनता या राहगीरों के मोबाइल फोन से सामने आए थे, न कि किसी आधिकारिक पुलिस रिकॉर्डिंग सिस्टम से। याचिका में कहा गया था कि 21 जुलाई की घटनाओं में पुलिसकर्मियों और प्रदर्शनकारियों दोनों को चोटें आई थीं, जबकि 23 जुलाई की समीक्षा बैठक में आरएएफ के महानिरीक्षक (IG) ने कथित तौर पर माना था कि इस्तेमाल किए गए बल के कुछ तरीके तय मानकों के अनुरूप नहीं थे।

1,500 कैमरों के लिए टेंडर और कानूनी प्रावधानों की मांग

याचिका में कहा गया था कि वर्ष 2020 की बॉडी-वॉर्न कैमरों से जुड़ी एडवाइजरी सिर्फ एक सिफारिश थी, जो अधिकारियों के लिए कैमरे चालू रखना अनिवार्य नहीं बनाती। याचिकाकर्ता ने दिल्ली पुलिस द्वारा गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM) के जरिए लगभग ₹7.4 करोड़ की अनुमानित लागत से 1500 बॉडी कैमरों की खरीद के लिए निकाले गए टेंडर का भी जिक्र किया था, जिसमें प्रति कैमरा लागत करीब ₹49333 बैठती है।

याचिका में मांग की गई थी कि कैमरों की रिकॉर्डिंग को सुरक्षित सर्वर पर अपलोड किया जाए जिसे कोई जवान बदल न सके, साथ ही भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 63 के तहत प्रमाणीकरण और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के प्रावधानों का पालन हो। याचिकाकर्ता का कहना था कि यह कैमरे किसी भीड़ पर चेहरा पहचानने वाला जाल नहीं, बल्कि पुलिस और नागरिकों के बीच संवाद का एक पारदर्शी रिकॉर्ड हैं जो बैरिकेड के दोनों तरफ मौजूद लोगों की सुरक्षा करते हैं।

छावनी में तब्दील हुई दिल्ली: 25,000 जवान, मेट्रो पाबंदी और इंटरनेट बंद

शनिवार को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के आह्वान को देखते हुए दिल्ली पुलिस ने पहले ही अनुमति देने से इनकार कर दिया था। इसके बावजूद कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पूरी दिल्ली में कड़े सुरक्षा इंतजाम किए गए हैं। दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था संभालने के लिए पुलिस और पैरामिलिट्री के लगभग 25,000 जवानों को तैनात किया गया है। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) की 120 से अधिक कंपनियां सुरक्षा में लगाई गई हैं। शनिवार सुबह 6:00 बजे से ही कनॉट प्लेस, मंडी हाउस, जंतर-मंतर, पटेल चौक समेत 30 से ज्यादा पॉइंट्स पर सख्त ट्रैफिक डायवर्जन लागू किया गया है। दिल्ली की सभी सीमाओं पर गाड़ियों की सघन चेकिंग की जा रही है।

पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर असर

सुरक्षा कारणों से दिल्ली मेट्रो के 45 स्टेशनों पर एंट्री और एग्जिट बैन लागू है, नमो भारत के दो स्टेशन बंद हैं और ट्रेन सेवाओं पर भी असर पड़ा है। राजधानी के संवेदनशील इलाकों में एहतियात के तौर पर 24 घंटे के लिए मोबाइल इंटरनेट सेवाएं निलंबित कर दी गई हैं। आपको बता दें कि यह पूरा विवाद मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में अनियमितताओं के आरोपों से जुड़ा है, जिसके विरोध में मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर यह प्रदर्शन बुलाया गया है।

Rajpal Yadav: राजपाल यादव को सुप्रीम कोर्ट से फटकार! पुश्तैनी संपत्ति बेचकर चुकाना होगा करोड़ों का कर्ज, अभिनेता का प्रस्ताव स्वीकार

Rajpal Yadav cheque bounce case: बॉलीवुड अभिनेता राजपाल यादव की मुश्किलें कम होती नजर नहीं आ रही हैं। चेक बाउंस मामले में बकाया रकम चुकाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने उनकी पुश्तैनी संपत्ति बेचने के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है। कोर्ट ने तत्काल ₹2 करोड़ जमा कराने की व्यवस्था पर भी गौर किया। शीर्ष अदालत ने चेक बाउंस के मामले में तत्काल 1.15 करोड़ रुपये जमा करने का आदेश दिया। इसके बाद राजपाल यादव ने कोर्ट में 1.15 करोड़ रुपये का डिमांड ड्राफ्ट जमा किया। इस दौरान राजपाल यादव के वकील ने कहा कि 85 लाख रुपए सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में जमा कर देंगे। कोर्ट ने 13 अक्टूबर तक 2 करोड़ रुपए जमा करने का निर्देश दिया।

शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि यादव ने 2010 में एक फिल्म के लिए उन्हें दी गई पांच करोड़ रुपये की वित्तीय मदद के निपटारे के लिए 2013 में 1.05 करोड़ रुपये के सात चेक दिए थे। कंपनी ने आरोप लगाया कि उक्त चेक बाउंस हो गए। शिकायतकर्ता के अनुसार, 2012 में दोनों पक्षों के बीच हुए एक समझौते में यादव, उनकी पत्नी और उनकी कंपनी ने ब्याज समेत करीब 11 करोड़ रुपये चुकाने पर सहमति जताई थी। शीर्ष अदालत ने 15 सितंबर को यादव को आत्मसमर्पण करने से मिली छूट को पांच अक्टूबर तक बढ़ा दिया था।

क्या है पूरा मामला?

सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने राजपाल यादव की याचिका पर सुनवाई की। यह मामला उनकी 2012 की फिल्म ‘अता पता लापता’ से जुड़े लोन और चेक बाउंस का है। राजपाल यादव और उनकी पत्नी को फिल्म के लिए निजी कंपनी ‘मुरली प्रोजेक्ट्स (Murli Projects)’ प्राइवेट लिमिटेड से करीब ₹5 करोड़ मिले थे। फिल्म तय समय पर पूरी नहीं हो सकी, जिसके बाद दोनों पक्षों के बीच कई समझौते हुए। इसी दौरान दिए गए सुरक्षा चेक बाद में विवाद की वजह बन गए।

₹2 करोड़ अभी देने की तैयारी

‘बार एंड बेंच’ के मुताबिक, सुनवाई के दौरान राजपाल यादव की ओर से बताया गया कि उनके पास ₹1.15 करोड़ की डिमांड ड्राफ्ट तैयार है। वहीं, उनकी पुश्तैनी संपत्ति के संभावित खरीदार ने ₹85 लाख देने की बात कही है। इस तरह तत्काल ₹2 करोड़ का भुगतान करने की व्यवस्था बताई गई। राजपाल यादव के वकील ने कोर्ट को बताया कि पुश्तैनी संपत्ति की कीमत ₹30 करोड़ से ज्यादा है। खरीदार भुगतान करने में सक्षम है। हालांकि, पितृ पक्ष के कारण फिलहाल संपत्ति की रजिस्ट्री नहीं हो पा रही है।

कोर्ट ने दी कड़ी चेतावनी

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि राजपाल यादव की देनदारी ₹2 करोड़ से कहीं ज्यादा है। शिकायतकर्ता की ओर से कहा गया कि यदि अभी ₹2 करोड़ मिल जाते हैं तो बाकी रकम चुकाने के लिए तीन महीने का समय दिया जा सकता है। वहीं, जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने राजपाल यादव के अब तक के रवैये पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि कोर्ट उनकी नीयत या मामले के गुण-दोष से प्रभावित नहीं है। यहां राहत सिर्फ इसलिए दी जा रही है ताकि शिकायतकर्ता को उसका पैसा वापस मिल सके। कोर्ट ने यह तक चेतावनी दी कि राजपाल यादव की तीन महीने की सजा बढ़ाकर दो साल तक की जा सकती है।

कब हुई थी सजा?

मई 2024 में सेशन कोर्ट ने चेक बाउंस मामले में राजपाल यादव को छह महीने की जेल की सजा सुनाई थी। बाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने उनकी सजा पर रोक लगाई। लेकिन भुगतान को लेकर कई बार दिए गए आश्वासनों के बावजूद रकम जमा न होने पर मामला फिर बिगड़ गया। फरवरी 2026 में हाईकोर्ट ने उन्हें जेल अधिकारियों के सामने सरेंडर करने का निर्देश दिया था। राजपाल यादव ने 5 फरवरी को सरेंडर किया और बाद में ₹1.5 करोड़ जमा करने के बाद उन्हें अंतरिम राहत मिली। इसके बावजूद बाकी रकम का भुगतान न होने पर हाईकोर्ट ने उन्हें तीन महीने की कैद की सजा सुनाई। अब इसी आदेश को राजपाल यादव ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। मामले की अगली सुनवाई दो दिन बाद होगी।

‘आपकी जगह जेल में है’

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट पांच अक्तूबर को चेक बाउंस के लंबे समय से जारी कई मामलों में राजपाल यादव को कड़ी फटकार लगाई थी। CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने 15 सितंबर को यादव को दो सप्ताह का आखिरी मौका देते हुए निजी कंपनी को बकाया रकम चुकाने के लिए ठोस प्रस्ताव देने और शीर्ष अदालत की रजिस्ट्री में दो करोड़ रुपये जमा करने का निर्देश दिया था। सोमवार को अदालत ने इस बात पर नाराजगी जताई कि दो सप्ताह की अवधि खत्म होने के बावजूद पांच अक्टूबर तक कोई भुगतान नहीं किया गया है।

सुनवाई के दौरान यादव के वकील ने कहा, “वे (शिकायतकर्ता) गरीब नहीं हैं।” इस पर जस्टिस बागची नाराज हो गए और कहा, “हो सकता है कि वे आपसे अधिक अमीर हों, लेकिन आपने रकम उनसे हड़पी है… इस अहंकार को सही जगह दिखानी होगी। आपको पता होना चाहिए कि कब मुंह खोलना है। आपकी जगह जेल में है।” पीठ ने कहा कि वह यादव की अपील खारिज कर सकती है। लेकिन ऐसा करने से शिकायतकर्ता के लिए रकम वसूलने की संभावना प्रभावित हो सकती है। इसलिए वह ऐसा करने से हिचक रही है।

पीठ ने कहा कि यादव को सोमवार तक भुगतान करने का निर्देश दिया गया था। लेकिन उन्होंने इसका पालन नहीं किया। यादव के वकील ने 50 लाख रुपये के डिमांड ड्राफ्ट की एक प्रति पेश की और कहा कि बैंक में ड्राफ्ट की प्रक्रिया जारी है। पीठ ने कहा, “यह असली है या नहीं? हमें नहीं पता।” वकील ने जब कहा कि डिमांड ड्राफ्ट बैंक के पास है। उसकी प्रक्रिया जारी है, तो शिकायतकर्ता के वकील ने अभिनेता पर अदालत के निर्देशों का बार-बार पालन नहीं करने का आरोप लगाया।

दिल्ली, गुजरात और तेलंगाना के चीफ जस्टिस अब होंगे सुप्रीम कोर्ट में जज, केंद्र ने जारी किया तीनों की नियुक्ति का नोटिफिकेशन

नई दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय, गुजरात हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस जस्टिस सुनीता अग्रवाल और तेलंगाना हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जस्टिस अपरेश कुमार सिंह को सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में जज के तौर पर नियुक्त किया गया है। इस संबंध में सोमवार को केंद्र सरकार ने आधिकारिक नोटिफिकेशन जारी किया। यह अधिसूचना न्याय विभाग की तरफ से जारी की गई थी।

राष्ट्रपति डॉ द्रौपदी मुर्मू ने भारत के संविधान के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए ये नियुक्तियां की हैं। इस कदम से शीर्ष अदालत और मजबूत होगा, जिसकी मंजूर संख्या 38 है। इनकी नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा 28 सितंबर को हुई मीटिंग में पदोन्नति की सिफारिश के कुछ दिनों बाद हुई हैं। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के प्रमुख भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत हैं। उन्होंने कॉलेजियम की बैठक में तीनों की पदोन्नति की सिफारिश की थी।

अभी सुप्रीम कोर्ट में 34 जजों की वर्किंग स्ट्रेंथ है, नए जजों के शपथ लेने के बाद इन नियुक्तियों से इसकी प्रभावी स्ट्रेंथ 37 हो जाएगी। सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया समेत जजों की मंजूरी वाली संख्या 38 है। सुप्रीम कोर्ट अमेंडमेंट एक्ट, 2026 के बाद हाल ही में मंजूरी वाली संख्या 34 से बढ़ाई गई थी।

नए नियुक्त जजों के बारे में

जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय : जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय जनवरी 2025 से दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रहे हैं। इससे पहले वे बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रह चुके हैं, और जुलाई 2023 में उन्होंने अपना पद संभाला था। जस्टिस उपाध्याय को 2011 में इलाहाबाद हाई कोर्ट में प्रमोट किया गया था और वे अगस्त 2013 में परमानेंट जज बने थे।

जस्टिस अपरेश कुमार सिंह : जस्टिस अपरेश कुमार सिंह झारखंड, त्रिपुरा और तेलंगाना से बहुत ज्यादा न्यायिक अनुभव लेकर आए हैं। उन्हें जनवरी 2012 में झारखंड हाई कोर्ट का जज प्रमोट किया गया था और जनवरी 2014 में उन्हें परमानेंट जज के तौर पर कन्फर्म किया गया था।

जस्टिस सुनीता अग्रवाल : सुनीता अग्रवाल सुप्रीम कोर्ट में काम करने वाली तीसरी महिला जज होंगी। उन्हें 2011 में इलाहाबाद हाई कोर्ट में पदोन्नत किया गया था और 2013 में वह परमानेंट जज बन गईं। उन्होंने जुलाई 2023 में गुजरात हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस के तौर पर शपथ ली। जस्टिस अग्रवाल ने बेंच में आने से पहले सिविल साइड में प्रैक्टिस की और 1990 में एडवोकेट के तौर पर एनरोल हुईं।

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Fortis Healthcare Share Price: 2% टूटा शेयर, फोरेंसिक ऑडिट में उलझी चाल

Fortis Healthcare Share Price: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के निर्देश के खिलाफ दायर फोर्टिस हेल्थकेयर की याचिका का निपटारा कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने फोर्टिस हेल्थकेयर की फोरेंसिक ऑडिट पर आगे बढ़ने का निर्देश दिया है, जिसकी जानकारी एक्सचेंज फाइलिंग में सामने आने के बाद आज मार्केट खुला तो शेयर लाल हो गए। हालांकि इसके शेयरों पर आज कमजोर मार्केट सेंटिमेंट से भी दबाव बना। फिलहाल बीएसई पर यह 0.84% की गिरावट के साथ ₹828.05 पर है। इंट्रा-डे में यह 2.15% फिसलकर ₹817.15 तक आ गया था।

क्यों होगा Fortis Healthcare का फोरेंसिक ऑडिट

पूरा मामला दाइची सैंक्यो (Daiichi Sankyo) और सिंह ब्रदर्स (मलविंदर और शिविंदर सिंह) के बीच चल रहे विवाद से जुड़ा है। दाइची के पुराने कानूनी मामले में सिंह ब्रदर्स की फोर्टिस में हिस्सेदारी और उससे जुड़े ट्रांजैक्शंस पर सवाल उठे हैं। हालांकि फोर्टिस का कहना है वह दोनों के बीच विवाद में किसी भी तरफ नहीं रही है। कंपनी का कहना है कि सिंह ब्रदर्स अपने शेयर के मालिक थे और उसके पास इनके लेन-देन को कंट्रोल करने की क्षमता नहीं थी।

सिंह ब्रदर्स की फोर्टिस हेल्थकेयर में हिस्सेदारी 1% से कम हो गई और उन्होंने मार्च 2018 तक बोर्ड से इस्तीफा दे दिया। कंपनी का कहना है कि शेयरों की इस बिक्री से उसे कोई पैसा नहीं मिला है। कंपनी ने कहा कि स्वतंत्र निदेशकों वाले बोर्ड ने जून 2018 में नए निवेशक की तलाश के लिए कॉम्पटीटिक बिडिंग प्रोसेस शुरू किया और नवंबर 2018 में IHH हेल्थकेयर ग्रुप की नॉर्दर्न टीके वेंचर प्राइवेट लिमिटेड ने इसमें निवेश किया। फोर्टिस का कहना है कि इसके लिए नए शेयर जारी किए गए थे, सिंह ब्रदर्स से उनके शेयर खरीदकर नहीं जारी किए गए थे। फोर्टिस का कहना है कि इसे लेकर सीसीआई, सेबी, स्टॉक एक्सचेंजों और शेयरहोल्डर्स समेत जरूरी अप्रूवल लिए गए थे।

इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने फोरेंसिक ऑडिट कराने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट ने याचिका दायर की थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 25 सितंबर को फोरेंसिक ऑडिट आगे बढ़ाने को कहा। हालांकि एक अहम स्पष्टीकरण भी दिया और कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने निर्देश में जो कुछ कहा, वह निर्णायक तथ्य नहीं हैं जिनका ऑडिट से कोई संबंध नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्वतंत्र रूप से फोरेंसिक ऑडिट का निर्देश दिया है। फोर्टिस का कहना है कि दिल्ली हाईकोर्ट ने उस पर कोई देनदारी या जुर्माना नहीं लगाया है तो ऑडिट को लेकर कहा कि इसमें उसका सच साबित होगा।

एक साल में कैसी रही शेयरों की चाल

फोर्टिस हेल्थकेयर के शेयरों ने निवेशकों को तगड़ा शॉक दिया है। पिछले साल बीएसई पर 13 अक्टूबर 2025 को यह ₹1,105.00 के भाव पर था, जो इसके शेयरों के लिए एक साल का रिकॉर्ड हाई लेवल है। इस हाई लेवल से 6 महीने में यह 30.56% टूटकर 2 अप्रैल 2026 को ₹767.30 पर आ गया था जोकि इसके शेयरों के लिए एक साल का रिकॉर्ड निचला स्तर है।

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NSE का शेयर टूटकर आया आईपीओ प्राइस के नीचे, खरीदारी का मौका या फटाफट बेच डालें होल्डिंग?

डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Fortis का दावा, Daiichi-Singh Brothers विवाद से कोई लेना-देना नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने दी ऑडिट को मंजूरी

Fortis Healthcare News: हेल्थकेयर सेक्टर की दिग्गज कंपनी फोर्टिस हेल्थकेयर का कहना है कि दाइची सैंक्यो (Daiichi Sankyo) और सिंह ब्रदर्स (मलविंदर मोहन सिंह और शिविंदर मोहन सिंह) के बीच चल रहे कानूनी विवाद में उसकी कोई भूमिका नहीं थी। फोर्टिस का अपने बचाव में मुख्य रूप से कहना है कि इस विवाद में वह पूरी तरह बाहरी पक्ष है और सिंह ब्रदर्स की फोर्टिस में अपनी हिस्सेदारी खत्म करने या इधर-उधर किए जाने में कंपनी की कोई भूमिका नहीं थी। कंपनी ने यह दलील सुप्रीम कोर्ट में दी और इसके बारे में आज 27 सितंबर को एक्सचेंज फाइलिंग में बताया।

क्या कहना है सुप्रीम कोर्ट का और वहां कैसे पहुंचा मामला

दिल्ली हाई कोर्ट ने 31 अगस्त के अपने आदेश में फोर्टिस का फोरेंसिक ऑडिट कराने का निर्देश दिया था, जिसके खिलाफ कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। हालांकि 25 सितंबर को कोर्ट ने फोर्टिस की SLP (स्पेशल लीव पिटीशन) का निपटारा करते हुए फोरेंसिक ऑडिट को आगे बढ़ाने की अनुमति दी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में जो कुछ भी कहा यानी जो भी टिप्पणी की, वह सिर्फ यह तय करने के लिए थी कि ऑडिट होना चाहिए या नहीं और अब ऑडिट स्वतंत्र रूप से किया जाएगा, जिस पर हाईकोर्ट की टिप्पणी का कोई असर नहीं होगा।।

क्या है Fortis की दलील

फोर्टिस का कहना है कि दिल्ली हाईकोर्ट ने उस पर कोई देनदारी या जुर्माना नहीं लगाया है और न ही यह दाईची सैंक्यो और सिंह ब्रदर्स के बीच चल रहे आर्बिट्रेशन प्रोसिडिंग्स यानी कानूनी मामले में कभी पक्षकार रही है। फोर्टिस का कहना है कि वह एक लिस्टेड कंपनी है और उसके पास प्रमोटर्स के शेयरों के लेन-देन को कंट्रोल करने की कोई शक्ति ही नहीं थी। फोर्टिस का यह भी कहना है कि पुराने प्रमोटर्स के शेयरों के लेन-देन से कोई पैसा भी नहीं मिला।

फोर्टिस का कहना है कि जब सिंह ब्रदर्स की शेयरहोल्डिंग 1% से कम हो गई और उन्होंने मार्च 2018 तक बोर्ड से इस्तीफा दे दिया, तो इंस्टीट्यूशनल शेयरहोल्डर्स ने इंडिपेंडेंट डायरेक्टर्स को नियुक्त किया। इसके बाद इंडिपेंडेंट बोर्ड ने जून 2018 में एक नया इन्वेस्टर खोजने और उसे शामिल करने के लिए कॉम्पिटिटिव बिडिंग प्रोसेस शुरू किया।

कंपनी के अनुसार उसके मौजूदा प्रमोटर शेयरहोल्डर और IHH हेल्थकेयर बरहाद ग्रुप की नॉर्दर्न टीके वेंचर प्राइवेट लिमिटेड ने नवंबर 2018 में इसमें इक्विटी शेयरों के नए इश्यू के जरिए निवेश किया था और इसे लेकर पहले ही CCI, SEBI, स्टॉक एक्सचेंजों और शेयरहोल्डर्स समेत सभी कानूनी और रेगुलेटरी मंजूरियां ले ली गई थीं। फोर्टिस का कहना है कि यह ट्रांजैक्शन तब हुआ जब सिंह ब्रदर्स का कंपनी के साथ कोई संबंध नहीं रह गया था और इसमें उनसे शेयरों का ट्रांसफर शामिल नहीं था। फिलहाल कंपनी ने भरोसा जताया है कि स्वतंत्र तरीके से फोरेंसिक ऑडिट में ये तथ्य सही साबित होंगे।

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National Herald Case: सोनिया और राहुल गांधी ने दिल्ली HC में ED की याचिका को दी चुनौती, बताया ‘कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग’

National Herald Case: नेशनल हेराल्ड मनी लॉन्ड्रिंग मामले में कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया है। दोनों नेताओं ने कोर्ट में अलग-अलग याचिकाएं दाखिल कर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की उस चुनौती का विरोध किया है, जिसमें एजेंसी ने ट्रायल कोर्ट के एक आदेश को चुनौती दी है।

18 सितंबर को दाखिल अलग-अलग लेकिन काफी हद तक एक जैसे जवाबों में, कांग्रेस नेताओं ने ED की कार्रवाई के कानूनी आधार पर सवाल उठाए। उन्होंने तर्क दिया कि एजेंसी, बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी की निजी शिकायत के आधार पर प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) का केस नहीं बना सकती।

यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट में 12 अक्टूबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है।

गांधी परिवार ने ED की कार्रवाई के कानूनी आधार पर उठाए सवाल

दाखिल किए गए जवाबों के मुताबिक, गांधी परिवार का कहना है कि ED की कार्रवाई को सही नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि यह मामला पुलिस में दर्ज FIR के बजाय सुब्रमण्यम स्वामी की 2013 की निजी शिकायत के आधार पर शुरू हुई थी।

गांधी परिवार का तर्क है कि PMLA में ED की कार्रवाई का आधार “निजी शिकायत” बनाने का कोई प्रावधान नहीं है। उनका कहना है कि स्वामी की शिकायत उन कानूनी शर्तों को पूरा नहीं करती जो एजेंसी के लिए मनी लॉन्ड्रिंग की कार्रवाई शुरू करने के लिए जरूरी हैं।

उनकी दलीलें PMLA की धारा 5(1) पर केंद्रित हैं। जवाबों में कहा गया है कि यह प्रावधान उन स्थितियों में कार्रवाई की इजाजत देता है जिनमें CrPC की धारा 173 के तहत पुलिस की अंतिम रिपोर्ट शामिल हो, या फिर किसी अधिकृत अधिकारी की शिकायत हो जो ‘शेड्यूल्ड ऑफेंस’ (सूचीबद्ध अपराध) की जांच कर रहा हो।

बचाव पक्ष का कहना है कि कोई निजी व्यक्ति ऐसी जांच नहीं कर सकता और जांच करने के लिए मजिस्ट्रेट को मिली शक्तियां इस कानूनी जरूरत को दरकिनार नहीं कर सकतीं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र

गांधी परिवार ने ‘विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ’ मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2023 के फैसले का भी हवाला दिया है।

उनका तर्क है कि इस फैसले के अनुसार, PMLA के तहत कार्रवाई शुरू करने के लिए ‘शेड्यूल्ड ऑफेंस’ (अनुसूचित अपराध) का रजिस्ट्रेशन जरूरी है। जवाब में यह भी आरोप लगाया गया है कि ED ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले में ‘निजी शिकायत’ के जिक्र का इस्तेमाल तो किया है, लेकिन उसके व्यापक संदर्भ पर ध्यान नहीं दिया है।

बचाव पक्ष ने उस लंबी अवधि की ओर भी इशारा किया है, जिसके दौरान स्वामी ने कथित तौर पर अदालत के सामने सबूत पेश नहीं किए। जवाबों के अनुसार, इसे इस बात के संकेत के तौर पर बताया गया कि निजी शिकायत को कार्यवाही का आधार मानने में क्या मुश्किलें आती हैं।

ED के अपने पुराने रिकॉर्ड का दिया हवाला

गांधी परिवार ने ED के पुराने रिकॉर्ड और बातचीत का हवाला देकर अपनी बात को सही ठहराने की कोशिश की है।

उनके जवाबों में जनवरी और अगस्त 2015 में जारी एजेंसी के टेक्निकल सर्कुलर, 2013 में सेंट्रल इन्फॉर्मेशन कमीशन के सामने दी गई जानकारी और 2024 में राइट टू इन्फॉर्मेशन (RTI) के तहत मिले जवाब का जिक्र है।

बचाव पक्ष का कहना है कि इन रिकॉर्ड्स से पता चलता है कि ED ने पहले यह रुख अपनाया था कि PMLA के तहत कार्रवाई शुरू करने से पहले FIR जरूरी है।

जवाबों में ED द्वारा जून 2021 में दर्ज ECIR का भी जिक्र है, जो स्वामी की शिकायत के सात साल बाद दर्ज की गई थी। बचाव पक्ष ने कहा कि ECIR को ट्रायल कोर्ट के सामने सितंबर 2025 में ही पेश किया गया, जब कोर्ट ने एजेंसी को इसे रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया था।

नई FIR और ट्रायल कोर्ट का आदेश

जवाबों में 3 अक्टूबर, 2025 को दिल्ली पुलिस की इकोनॉमिक ऑफेंस विंग द्वारा दर्ज की गई FIR का भी जिक्र है। हालांकि, गांधी परिवार की दलीलों के अनुसार, ED ने ट्रायल कोर्ट को बताया था कि वह इस FIR पर निर्भर नहीं है।

हाई कोर्ट के सामने यह विवाद ट्रायल कोर्ट के उस फैसले से पैदा हुआ है जिसमें उसने ED की प्रॉसिक्यूशन कंप्लेंट (अभियोजन शिकायत) पर संज्ञान लेने से इनकार कर दिया था। दलीलों के मुताबिक, दिसंबर के आदेश में कहा गया था कि इस शिकायत पर कानूनी तौर पर आगे नहीं बढ़ा जा सकता।

गांधी परिवार ने इस बात पर जोर दिया है कि ट्रायल कोर्ट का फैसला कानूनी और अधिकार-क्षेत्र से जुड़े उन मुद्दों पर आधारित था, जो ‘प्रेडिकेट-ऑफेंस’ (मूल अपराध) के लिए FIR न होने से संबंधित थे। उनका कहना है कि निचली अदालत ने मुख्य आरोपों पर उनके गुण-दोष के आधार पर कोई फैसला नहीं सुनाया।

ED 24 घंटे के अंदर हाई कोर्ट पहुंची

बचाव पक्ष ने उस तेजी पर भी सवाल उठाए हैं जिसके साथ ED हाई कोर्ट पहुंची।

जवाबों के मुताबिक, एजेंसी ने ट्रायल कोर्ट के आदेश के 24 घंटे के अंदर अपनी रिविजन याचिका दायर की। गांधी परिवार ने इस रफ्तार को “बिजली की गति” बताया और तर्क दिया कि ऐसा लगता है कि इस कार्रवाई में एजेंसी पर आम तौर पर लागू होने वाली आंतरिक मंज़ूरी की प्रक्रियाओं को नजरअंदाज किया गया है।

उन्होंने हाई कोर्ट से ED की रिविजन याचिका को खारिज करने का भी आग्रह किया है और इसे “कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग” बताया है।

क्या है नेशनल हेराल्ड केस?

नेशनल हेराल्ड केस की शुरुआत बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी की ओर से 2013 में की गई एक शिकायत से हुई थी। इस शिकायत में Associated Journals Ltd (AJL) के अधिग्रहण को लेकर कथित साजिश के आरोप लगाए गए थे। बता दें कि AJL ही नेशनल हेराल्ड अखबार का प्रकाशन करती है।

यह शिकायत ‘यंग इंडियन’ से भी जुड़ा है, जिसमें सोनिया गांधी और राहुल गांधी के पास सबसे ज्यादा शेयर हैं। आरोप AJL की उन संपत्तियों से जुड़े हैं जिनकी कीमत 2,000 करोड़ रुपये से ज्यादा बताई गई है, और साथ ही ‘यंग इंडियन’ के जरिए किए गए 50 लाख रुपये के लेन-देन से भी जुड़े हैं।

वहीं, इस मामले में ED ने अप्रैल 2025 में मनी लॉन्ड्रिंग की शिकायत दर्ज की। ट्रायल कोर्ट ने दिसंबर 2025 में इसे खारिज कर दिया, जिसके बाद एजेंसी दिल्ली हाई कोर्ट गई।

इस मामले में शामिल अन्य लोगों और संस्थाओं में सैम पित्रोदा, सुमन दुबे, सुनील भंडारी, यंग इंडियन और डोटेक्स मर्चेंडाइज प्राइवेट लिमिटेड शामिल हैं।

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टूथपेस्ट से लेकर नहाने के साबुन तक, हर सामान पर लगाना होगा वेज और नॉन वेज का निशान

साबुन, शैंपू और टूथपेस्ट को की पैकिंग को देखने पर पहली नजर में यह बताना मुश्किल होता है कि ये उत्पाद पूरी तरह वेज हैं या नॉन वेज। इस समस्या से अक्सर खीझने वाले उपभोक्ताओं के लिए केंद्र सरकार ने अहम फैसला लिया है। सरकार ने इस उत्पादों पर खास लेबलिंग अनिवार्य कर दी है। इससे कस्टमर अब एक नजर देखकर जा सकेंगे कि पर्सनल केयर के ये उत्पाल वेजिटेरियन हैं या नॉन वेजिटेरियन हैं।

रोजमर्रा के जीवन में इस्तेमाल होने वाले टॉयलेटरीज की पैकिंग पर नॉन वेज और वेज की पहचान बताने वाले संकेत जरूरी होगा। इसके लिए सरकार ने लीगल मेट्रोलॉजी (पैकेज्ड कमोडिटीज़) रूल्स, 2011 में बदलाव किया है। यह बदलाव सोमवार से लागू हो गया। नए नियमों के तहत, शाकाहारी उत्पादों की पैकेजिंग पर हरा डॉट होना चाहिए। वहीं मांसाहारी उत्पादों पर पर लाल या भूरा डॉट दिखना चाहिए।

यह संकेत पैकेज के मेन डिस्प्ले पैनल के सबसे ऊपर लगाना होगा। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, इस कदम का मकसद उपभोक्ताओं के लिए शॉपिंग करते समय किसी उत्पाद की पहचान करना आसान बनाना है। यह नोटिफिकेशन खास तौर पर साबुन, शैम्पू, टूथपेस्ट और दूसरे कॉस्मेटिक्स और टॉयलेटरीज पर लागू होता है। यह जरूरी मार्किंग आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले कई पर्सनल-केयर प्रोडक्ट्स पर लागू होगी। इससे कस्टमर्स खरीदने से पहले सीधे पैकेजिंग से प्रोडक्ट का शाकाहारी या मांसाहारी स्टेटस देख सकेंगे।

इस बदलाव के बाद ये उत्पाद लीगल मेट्रोलॉजी फ्रेमवर्क के तहत एक खास पैकेजिंग डिस्क्लोजर की जरूरत के तहत आ जाएंगे। कलर-कोडेड सिंबल का मकसद ग्राहकों को उत्पाद की सामग्री की पूरी जानकारी देखे बिना एक साफ दिखाई देने वाला संकेत देना है। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, अब लागू हुए बदलावों के साथ, इसके तहत आने वाले उत्पादों के विनिर्माताओं और विक्रेताओं को अपनी पैकेजिंग पर बताई गई लेबलिंग जरूरतों को फॉलो करना होगा।

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दिल्ली सत्य निकेतन बिल्डिंग हादसा: हरिराम का बेटा पुलिस कस्टडी में, अन्य को न्यायिक हिरासत

दिल्ली सत्य निकेतन बिल्डिंग हादसा: हरिराम का बेटा पुलिस कस्टडी में, अन्य को न्यायिक हिरासत

Delhi building collapse case

दिल्ली में सत्य निकेतन बिल्डिंग गिरने से 7 लोगों की मौत के मामले अदालत ने आरोपी हरिराम बंसल के बेटे को पुलिस कस्टडी में भेजा। हरिराम और उर्मिला को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया, जबकि महेश गुप्ता को 2 दिन की पुलिस हिरासत में भेजा गया।

 

सत्य निकेतन इलाके में 5 मंजिला इमारत गिरने से 7 लोग मारे गए जबकि 12 लोगों का रेसक्यू किया गया था। हादसे में गिरी इमारत को उसके मालिकों द्वारा 'Hostel Daze' नाम दिया गया था। पुलिस ने इस मामले में हरिराम समेत 3 लोगों को गिरफ्तार किया था। बिल्डिंग उर्मिला की थी, उसका बिजली कनेक्शन हरिराम के नाम पर था और उसका मैनेजमेंट बेटा संभालता था।

 

दिल्ली हाईकोर्ट मामले में सख्त

दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इस मामल में तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि हादसे के लिए सिर्फ पीजी मालिक को जिम्मेदार ठहराकर दिल्ली सरकार जवाबदेही से नहीं बच सकती। जिम्मेदारी डीयू व एमसीडी की भी है। कोर्ट ने एक पीआईएल पर एमसीडी को उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए हैं। ALSO READ: Satya Niketan building collapse : दिल्ली में 5 मंजिला इमारत भरभराकर गिरी, 7 मौतें, हाईकोर्ट ने पूछा- किसकी थी जिम्मेदारी?

 

क्या है CJP की मांग?

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने सरकार से राजनीतिक जवाबदेही तय करने और राजधानी के सभी पेइंग गेस्ट आवासों का व्यापक सेफ्टी ऑडिट कराने की मांग की है। CJP ने हादसे में जान गंवाने वाले लोगों के परिवारों को 1 करोड़ रुपये मुआवजा और घायलों को 20 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की मांग की है। ALSO READ: सत्या निकेतन बिल्डिंग हादसा : 7 मौतों के बाद CJP की बड़ी मांग, दिल्ली के सभी PG का होगा सेफ्टी ऑडिट

Satya Niketan building collapse : दिल्ली में 5 मंजिला इमारत भरभराकर गिरी, 7 मौतें, हाईकोर्ट ने पूछा- किसकी थी जिम्मेदारी?

Satya Niketan building collapse : दिल्ली में 5 मंजिला इमारत भरभराकर गिरी, 7 मौतें, हाईकोर्ट ने पूछा- किसकी थी जिम्मेदारी?

delhi building collapse

दिल्ली के सत्य निकेतन में इमारत गिरने की घटना को दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताया। इस हादसे में 7 लोगों की मौत हुई थी, जबकि कई अन्य लोग घायल हुए हैं। पुलिस ने बताया कि हादसे में सात लोगों की मौत हुई है। कोर्ट ने कहा कि इस हादसे की जिम्मेदारी केवल इमारत मालिकों तक सीमित नहीं हो सकती, बल्कि दिल्ली नगर निगम (MCD) और दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) की भूमिका पर भी सवाल उठते हैं।

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सत्य निकेतन बिल्डिंग हादसे ने राजधानी में इमारतों की सुरक्षा, अवैध या असुरक्षित निर्माण और छात्रों के लिए सुरक्षित आवास की व्यवस्था को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए अधिकारियों को राहत और बचाव अभियान तेज करने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने कहा कि मलबे में अभी भी कोई व्यक्ति फंसा हो सकता है, इसलिए संभावित लोगों को बचाने के लिए हरसंभव प्रयास किए जाने चाहिए। हाईकोर्ट ने कहा कि इस त्रासदी की जिम्मेदारी सिर्फ उस इमारत के मालिकों की नहीं है जो ढह गई। अदालत ने MCD और DU की जिम्मेदारी पर भी सवाल उठाया।  कोर्ट के मुताबिक, दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले दूसरे शहरों से आने वाले कई छात्र निजी पेइंग गेस्ट (PG) सुविधाओं पर निर्भर रहते हैं।

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अदालत ने कहा कि ऐसे छात्रों के लिए पर्याप्त आवास उपलब्ध कराने में व्यवस्था की ओर से कमी रही है।

 दिल्ली हाईकोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि बचाव अभियान में तेजी लाई जाए और मलबे के नीचे किसी व्यक्ति के फंसे होने की आशंका को देखते हुए पूरी गंभीरता से अभियान चलाया जाए। अदालत की टिप्पणी के बाद अब मामले में सिर्फ बिल्डिंग मालिकों की जिम्मेदारी ही नहीं, बल्कि MCD की निगरानी व्यवस्था और DU की छात्र आवास व्यवस्था भी जांच के दायरे में आ गई है।

 

 

एनडीआरएफ ने कहा- बचाव अभियान अभी भी जारी 

एनडीआरएफ  ने सोमवार को बताया कि दक्षिणी दिल्ली के सत्य निकेतन में एक दिन पहले इमारत ढहने की घटना के बाद बचाव एजेंसियों ने अब तक मलबे से 12 लोगों को बाहर निकाला है, जबकि मलबे के नीचे फंसे लोगों की सटीक संख्या का अभी पता नहीं चल पाया है। यह बचाव अभियान सोमवार को भी दिनभर जारी रहने की उम्मीद है।

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एनडीआरएफ के महानिरीक्षक (आईजी) नरेंद्र बुंदेला ने कहा कि केंद्रीय आपदा मोचन बल के पास मलबे के नीचे फंसे लोगों की संख्या को लेकर 'कोई निश्चित आंकड़ा' नहीं है। उन्होंने बताया कि एनडीआरएफ घटनास्थल पर लोगों के जिंदा होने के संकेतों की तलाश के लिए कटर, हाइड्रोलिक जैक और प्रशिक्षित श्वान दलों का इस्तेमाल कर रहा है। रविवार से ही एनडीआरएफ की दो तकनीकी टीम घटनास्थल पर तैनात हैं।

दिल्ली पुलिस 2022 की तरह CJP प्रदर्शन से जुड़े छात्रों से वापस लेगी केस? सामने आया बड़ा अपडेट्स

Delhi Police: संसद परिसर के हाल में और जंतर-मंतर पर आयोजित कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के विरोध-प्रदर्शन से जुड़े मामलों को वापस लेने के लिए दिल्ली पुलिस वर्ष 2022 में अपनाई गई प्रक्रिया को दोहरा सकती है। सूत्रों के अनुसार, पुलिस इस संबंध में कानूनी सलाह ले रही है। मंगलवार 28 जुलाई तक इस पर स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

जानकारी के मुताबिक, वर्ष 2022 में किसान आंदोलन से जुड़े मामलों को वापस लेने के दौरान दिल्ली पुलिस, तत्कालीन दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल (LG) कार्यालय के बीच समन्वय स्थापित कर एक प्रक्रिया अपनाई गई थी। उसी मॉडल को इस बार भी लागू करने पर विचार किया जा रहा है।

17 मामलों को वापस लेने का प्रस्ताव

सूत्रों के अनुसार, उस समय पुलिस ने 17 मामलों को वापस लेने का प्रस्ताव तत्कालीन आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार को भेजा था। इसके बाद फाइल तत्कालीन उपराज्यपाल अनिल बैजल के कार्यालय से तत्कालीन गृह मंत्री सत्येंद्र जैन के पास पहुंची। गृह मंत्री की मंजूरी मिलने के बाद फाइल मुख्यमंत्री कार्यालय भेजी गई। फिर 28 फरवरी को एलजी कार्यालय लौटने पर उसी दिन उसे मंजूरी मिल गई थी।

कानूनी विशेषज्ञों से मांगी राय 

अब संसद प्रदर्शन से जुड़े मामलों में भी दिल्ली पुलिस ने कानूनी विशेषज्ञों से राय मांगी है कि FIR वापस लेने की प्रक्रिया किस तरह अपनाई जाए। एक विकल्प यह भी माना जा रहा है कि दिल्ली पुलिस दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर इन मामलों को रद्द (Quash) कराने का अनुरोध करे।

15 FIR दर्ज

रिपोर्ट के मुताबिक, संसद प्रदर्शन के संबंध में दिल्ली पुलिस ने अब तक 15 से अधिक एफआईआर दर्ज की हैं। जांच एजेंसियों का कहना है कि प्रदर्शन के दौरान असामाजिक तत्वों की पहचान की गई है। जिन लोगों की भूमिका संदिग्ध पाई जाएगी, उनके खिलाफ जांच जारी रहेगी।

सूत्रों के अनुसार, जिन लोगों का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और जिनकी भूमिका गंभीर नहीं पाई गई है। उन्हें फिलहाल जांच के दायरे से बाहर रखा जा सकता है। इन मामलों में गैरकानूनी जमावड़ा, सरकारी कर्मचारियों पर हमला, आपराधिक साजिश, निषेधाज्ञा का उल्लंघन और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसी धाराएं लगाई गई हैं। कुछ मामलों में हत्या के प्रयास जैसी गंभीर धाराएं भी शामिल की गई हैं।

 पुलिस ने उठाकर मसूरी छोड़ दिया

टाइम्स ऑफ इंडिया की इस रिपोर्ट में एक अन्य मामले का भी उल्लेख किया गया है। प्रदर्शनकारियों को खाना देने वाले एक स्वयंसेवक जुनैद ने आरोप लगाया है कि शुक्रवार रात दिल्ली पुलिस के कुछ कर्मी उन्हें अपने साथ ले गए। उनका कहना है कि उनसे पूछताछ की गई, आंखों पर पट्टी बांधी गई और अगले दिन उन्हें उत्तराखंड के मसूरी में छोड़ दिया गया।

जुनैद के अनुसार, पुलिस ने उनसे खाना बांटने के लिए मिलने वाली आर्थिक सहायता और इतने बड़े स्तर पर भोजन की व्यवस्था के बारे में सवाल पूछे। वहीं, दिल्ली पुलिस का कहना है कि जुनैद के लगाए गए आरोपों की जांच की जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार, जुनैद ने दावा किया कि उन्हें भोजन और पानी समर्थकों से मिलने वाले दान और डिलीवरी के माध्यम से उपलब्ध कराया जाता था।

पीएम मोदी के मामले में होगी कार्रवाई?

दिल्ली पुलिस विरोध-प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य नेताओं को निशाना बनाकर सोशल मीडिया पर की गई आपत्तिजनक और अपमानजनक पोस्ट के खिलाफ कार्रवाई पर विचार कर रही है। एक सूत्र ने बताया कि पुलिस ऐसे पोस्ट, वीडियो और टिप्पणियों को हटाने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को नोटिस जारी कर सकती है।

सूत्र ने कहा, “विरोध-प्रदर्शन के दौरान और उसके बाद अपलोड की गई सामग्री की समीक्षा के बाद पुलिस अपमानजनक प्रकृति की पोस्ट हटाने के लिए नोटिस जारी करेगी।” उन्होंने कहा, “विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ऐसी सामग्री की पहचान करने का अभियान पहले ही शुरू किया जा चुका है।”

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सूत्र के मुताबिक, पुलिस यह भी जांच कर रही है कि क्या किसी सामग्री में किसी कानून का उल्लंघन हुआ है या उससे सार्वजनिक व्यवस्था भंग करने होने की आशंका थी। सूत्र ने बताया कि दिल्ली पुलिस की सोशल मीडिया निगरानी टीम पूरे दिन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर नजर रखे हुए है, ताकि विरोध-प्रदर्शन से संबंधित आपत्तिजनक सामग्री की पहचान की जा सके।