नेहा बोरा को सीजेपी से अलग किया गया

राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी की उनकी टीम कामयाब हो गई। सीपीआई माले के छात्र संगठन आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा को आखिरकार कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी से अलग कर दिया गया। बताया जा रहा है कि इसके लिए सीपीआई एमएल के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य से बात हुई। गौरतलब है कि पिछले कुछ समय से दीपांकर भट्टाचार्य से राहुल गांधी की अच्छी बन रही है। सीताराम येचुरी के बाद दीपांकर ही सामाजिक मुद्दों पर राहुल को सलाह दे रहे हैं। सो, उन्होंने अपनी पार्टी की नेता नेहा बोरा को समझाया और खुद भी यह फैसला किया कि मुख्यधारा के विपक्ष के साथ ही रहना चाहिए। तभी सुप्रीम कोर्ट मार्च के दौरान नेहा बोरा उस ट्रक पर सवार हुईं, जिस पर राहुल के साथ विपक्ष के तमाम नेता थे। वे अगले दिन राहुल के घर पर चाय पार्टी में भी शामिल हुईं और वहां बड़े नेताओं के साथ मीडिया को भी संबोधित किया। दीपांकर भट्टाचार्य ने इस मौके पर अपने को पीछे रखा।

गौरतलब है कि इससे पहले जंतर मंतर पर हर प्रोटेस्ट में नेहा बोरा का चेहरा होता था। पेपर लीक के मसले पर भी सोनम वांगचुक के साथ नेहा बोरा ने 20 दिन तक भूख ह़ड़ताल की थी। वे बहुत अच्छा भाषण करती हैं और राजनीति का अंदाज भी बहुत आक्रामक है। उनके साथ आइसा और लेफ्ट इकोसिस्टम के बहुत सारे युवा प्रोटेस्ट में शामिल होते थे, जिससे सीजेपी के प्रदर्शन को ज्यादा तवज्जो मिलती थी। अब राहुल गांधी उनको अपने खेमे में लाने में कामयाब हो गए हैं। राहुल गांधी ने 12 अक्टूबर को ‘चलो दिल्ली मार्च’ आह्वान किया था और विपक्षी नेताओं के साथ वे सुप्रीम कोर्ट तक गए थे। उस प्रदर्शन में नेहा बोरा उनके साथ थीं। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा दोनों के साथ नेहा का बहुत अच्छा तालमेल दिखा। एक तस्वीर तो ऐसी वायरल हुई है, जिसमें राहुल गांधी अपनी बहन प्रियंका और नेहा के कंधे पर हाथ रख कर चल रहे हैं। महात्मा गांधी की एक ऐतिहासिक तस्वीर से इसकी तुलना की जा रही है।

सीजेपी नेताओं का अच्छा है!

कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के नेताओं का बहुत अच्छा है। उनके नाम से प्रदर्शन हो रहे हैं, दिल्ली और पूरे देश में हंगामा मच रहा है, सरकार परेशान है और नौजवान सड़कों पर है, लेकिन इन नेताओं को कुछ नहीं करना होता है। ऐसा लग रहा है कि अभिजीत दीपके ने मौके को लपका और चीफ जस्टिस की कॉकरोच वाली टिप्पणी के बाद कॉकरोच जनता पार्टी नाम से एक सोशल मीडिया हैंडल बना दिया और उसके बाद से उसकी रॉयल्टी ले रहे हैं। उस सोशल मीडिया हैंडल से किसी भी मसले पर आंदोलन का ऐलान कर दिया जा रहा है और देश के लाखों युवा, जो पेपर लीक से लेकर एसआईआर या किसी अन्य मामलों में आक्रोशित हैं वे सड़क पर उतर जा रहे हैं।

सोचें, पारंपरिक रूप से किसी प्रदर्शन की तैयारी में कितनी मेहनत, कितने संसाधान, कितने नेता और कितनी ऊर्जा लगती है। कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों को कितना प्रयास करना पड़ रहा है। दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पंजाब के नेताओं को इस तैयारी में लगाया गया है। वे रात दिन मेहनत करके लोगों को जुटा रहे हैं। सरकार की इतनी सख्ती है कि दिल्ली और पड़ोसी राज्यों के कांग्रेस नेताओं को भी अपने घरों से निकल कर सेंट्रल दिल्ली पहुंचने के लिए गुरिल्ला अंदाज में कुछ उपाय करने पड़ रहे हैं। लेकिन अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को कुछ नहीं करना है। वे सिर्फ सोशल मीडिया में अपील कर रहे हैं या प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं। पहले भी ये नेता सड़कों पर नहीं उतरे। आज भी नहीं उतर रहे हैं।

पहली बार जब अभिजीत दीपके छह जून को अमेरिका से दिल्ली पहुंचे थे तो उनको बिना मांगे जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने की इजाजत दी गई थी। हवाईअड्डे पर ही पुलिस ने उनको मंजूरी दे दी। लेकिन उन्होंने क्या किया? तीन घंटे के प्रदर्शन में वे बेहोश हो गए और उनको एसी गाड़ी में बैठाना पड़ा और उसके बाद आंदोलन खत्म हो गया। जब 20 जून को फिर से आंदोलन शुरू हुआ तो सोनम वांगचुक और सीपीआई माले के छात्र संगठन आइसा की तीन छात्राओं ने भूख हड़ताल किया। दिल्ली पुलिस ने जब वांगचुक को उठाया तो दीपके ने कहा कि वे भूख हड़ताल जारी रखेंगे लेकिन दो घंटे भी भूख हड़ताल नहीं कर सके। उसके बाद भीड़ जुटाने की बारी आई तो लोग खुद ब खुद पहुंचे या भीम आर्मी के चंद्रशेखर भीड़ लेकर पहुंचे, जिसने आक्रामक तरीके से संसद की ओर मार्च किया।

इस बार भी ऐसा ही हो रहा है। दीपके एंड कंपनी ने आठ अक्टूबर को बेंगलुरू में प्रदर्शन का ऐलान किया और प्रदर्शन से एक दिन पहले शाम को बेंगलुरू पहुंचे। फिल्म अभिनेता प्रकाश राज और जर्मनी में रहने वाले इन्फ्लूएंसर ध्रुव राठी के नाम पर दो चार हजार लोग जुटे। इसके बाद 10 अक्टूबर को दिल्ली में प्रदर्शन होना था। पर दीपके, दास और रांका बेंगलुरू में ही रहे। वही से ऐलान किया कि 10 अक्टूबर की सुबह साढ़े 10 बजे की फ्लाइट से दिल्ली लैंड करेंगे।

सोचें, प्रदर्शन 10 बजे से होना था और नेता साढ़े 10 बजे लैंड करने वाले थे। कोर टीम के तीन लोग जहाज में थे औऱ चौथी सदस्य रत्ना सिंह उनको लेने के लिए एयरपोर्ट पहुंची थीं। सो, चारों लोग अपनी सुविधा के हिसाब से वही एयरपोर्ट पर ही हिरासत में ले लिए गए। बाकी जनता जंतर मंतर के इलाके में लाठियां खा रही थी और दिल्ली पुलिस व अर्धसैनिक बलों से गुरिल्ला वार कर रही थी। दूसरे दिन यानी 11 अक्टूबर का प्रदर्शन भी दूसरे लोगों ने किया। दीपके की दो दादी गुजर गईं इसलिए वे महाराष्ट्र चले गए और बाकी लोगों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके अपनी जिम्मेदारी पूरी की।

जंग का मैदान बनी दिल्ली

नई दिल्ली। शनिवार को दिन भर लगभग पूरी दिल्ली जंग का मैदान बनी रही। कॉकरोच जनता पार्टी ने सेंट्रल दिल्ली में जंतर मंतर पर प्रदर्शन का ऐलान किया था लेकिन पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने पूरी दिल्ली को कब्जे में ले रखा था। पुलिस और अर्धसैनिक बलों के 38 हजार जवान अलग अलग जगहों पर तैनात थे, जिन्होंने सात हजार के करीब प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया।

पुलिस ने जगह जगह बैरिकेडिंग कर रखी थी और जंतर मंतर पहुंचने की कोशिश कर रहे युवाओं व छात्रों को अलग अलग जगहों से पकड़ा। उनको बसों में भर कर दूरदराज के इलाकों में ले जाया गया। देर शाम प्रदर्शनकारियों को रिहा किया गया। इससे पहले सोनम वांगचुक ने ऐलान किया था कि अगर प्रदर्शनकारी रिहा नहीं होते हैं तो वे आंदोलन करेंगे। इस बीच शनिवार की शाम को सीजेपी ने रविवार को फिर से जंतर मंतर की ओर मार्च करने का ऐलान किया।

एसआईआर और वोट चोरी के आरोपों से घिरे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी, आम आदमी पार्टी और वामपंथी पार्टियों के साथ साथ सिविल सोसायटी के लोगों ने 10 अक्टूबर को जंतर मंतर पर प्रदर्शन का ऐलान किया था। पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने पूरा जोर लगा कर प्रदर्शनकारियों को जंतर मंतर पहुंचने से रोक दिया। जंतर मंतर पहुंचने का प्रयास करते हुए ममता बनर्जी को गिरफ्तार किया गया तो अरविंद केजरीवाल को भी हिरासत में लिया गया। हालांकि बाद में दोनों को छोड़ दिया गया।

सुबह की उड़ान से दिल्ली पहुंचे सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके को अन्य नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका के साथ एयरपोर्ट पर ही हिरासत में ले लिया गया। बाद में उनकी दादी के निधन की खबर आई तो पुलिस ने उनको घर जाने की इजाजत दे दी। असल में पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने जंतर मंतर के आसपास पांच लेयर की बैरिकेडिंग की थी। प्रदर्शन के लिए तय जगह तक पुलिस ने किसी को पहुंचने नहीं दिया। दीपके की गिरफ्तारी के बाद उनका एक पुराना वीडियो जारी किया गया, जिसमें उन्होंने कहा था कि उनको हिरासत में लिए जाने के बाद आजिंक्य शिंदे आंदोलन का नेतृत्व करेंगे। बाद में शिंदे ने कमान संभाली और लोगों से जंतर मंतर की ओर बढ़ने का आह्वान किया। सीजेपी ने कहा कि ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तक प्रदर्शन जारी रहेगा।

प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए सरकार ने बहुत बड़ी तैयारी की थी। आठ से 12 अक्टूबर तक के लिए केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की 221 कंपनियां यानी करीब 23 हजार जवान दिल्ली बुला कर तैनात किए गए। इनके अलावा दिल्ली पुलिस के कम से कम 15 हजार जवानों और अधिकारियों की तैनाती की गई। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अनदेखी करते हुए 45 मेट्रो स्टेशन बंद रखे गए। करीब ढाई सौ ट्रेनें रद्द कर दी गईं। कनॉट प्लेस के आसपास दुकानें बंद थीं तो जंतर मंतर के चार किलोमीटर के दायरे में इंटरनेट बंद रखा गया था। स्कूल व कॉलेज भी या तो बंद थे या ऑनलाइन पढ़ाई हो रही थी।

सीजेपी का रविवार को भी जंतर-मंतर कूच

नई दिल्ली। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने शनिवार को दिल्ली में व्यापक पुलिस कार्रवाई और हजारों प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने के बावजूद रविवार को फिर जंतर-मंतर कूच करने की घोषणा की है। पार्टी के नेता अजिंक्य शिंदे ने कहा कि प्रदर्शनकारी रविवार सुबह 10 बजे जंतर-मंतर पहुंचेंगे और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे सहित अपनी मांगें पूरी होने तक आंदोलन जारी रखेंगे।

इस बीच संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने दिल्ली में प्रदर्शनकारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों और पत्रकारों को बड़े पैमाने पर हिरासत में लिए जाने की खबरों पर चिंता जताई है।

सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को दिल्ली हवाई अड्डे पर ही हिरासत में ले लिया गया था। अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, पिनराई विजयन, नेहा बोरा, योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण सहित कई विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी हिरासत में लिए जाने की खबर है।

अजिंक्य शिंदे ने सोशल मीडिया पर जारी वीडियो में कहा कि सरकार को लगा होगा कि नेताओं और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेकर आंदोलन समाप्त किया जा सकता है, लेकिन यह लड़ाई की शुरुआत है। उन्होंने कहा कि ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा लिए बिना प्रदर्शनकारी घर नहीं लौटेंगे। शनिवार शाम नेहा बोरा सहित कुछ प्रदर्शनकारियों को मैदानगढ़ी थाने से रिहा कर दिया गया।

जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने चेतावनी दी कि रविवार तक हिरासत में लिए गए लोगों को रिहा नहीं किया गया तो वे अनशन या पदयात्रा शुरू करने के लिए मजबूर हो सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय की चिंता के बाद दिल्ली में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई का मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा में आ गया है।

Delhi Protest: रात के अंधेरे में भी रिकॉर्डिंग करने वाले बॉडी कैमरों से लैस हुए दिल्ली पुलिस के जवान, समझिए क्या है तैयारी

जंतर-मंतर पर मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रस्तावित विरोध-प्रदर्शन को देखते हुए शनिवार 10 अक्टूबर को पूरी राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था के कड़े और हाई-टेक इंतजाम किए गए हैं। इस बार प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए तैनात दिल्ली पुलिस के जवान आधुनिक नाइट-विजन बॉडी-वॉर्न कैमरों (BWCs) से लैस नजर आ रहे हैं। यह विशेष बॉडी कैमरे जवानों की यूनिफॉर्म पर लगाए गए हैं, जो दिन के उजाले के साथ-साथ रात के घने अंधेरे में भी हाई क्वॉलिटी की वीडियो और ऑडियो रिकॉर्डिंग करने में सक्षम हैं।

यह कैमरे हमारी और जनता दोनों की सुरक्षा के लिए हैं: जवान ने समझाई उपयोगिता

ANI की एक एक्स पोस्ट में दिल्ली में तैनात पुलिस जवान अपनी यूनिफॉर्म पर यह कैमरे पहने हुए दिखाई दिए। सुरक्षा में तैनात दिल्ली पुलिस के जवान दीपक चौधरी ने इन कैमरों की कार्यप्रणाली और उपयोगिता के बारे में बताते हुए कहा कि यह बॉडी कैमरे जवानों के साथ-साथ आम जनता और प्रदर्शनकारियों दोनों की सुरक्षा के लिए लगाए गए हैं। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन या हाथापाई की स्थितियों में अक्सर दिल्ली पुलिस के ऊपर एकतरफा आरोप लगा दिए जाते हैं। ऐसे में यह बॉडी कैमरे निष्पक्ष सबूत के तौर पर काम करेंगे और यह साबित करेंगे कि पुलिस ने किसी के साथ कुछ गलत किया है या नहीं। यह कैमरे मौके पर होने वाली हर एक गतिविधि को लगातार रिकॉर्ड करेंगे।

दिल्ली हाईकोर्ट ने खारिज की थी अनिवार्य बॉडी कैमरे लगाने वाली याचिका

बॉडी कैमरों की यह तैनाती ऐसे समय में देखने को मिली है, जब कुछ ही दिन पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रदर्शनों के दौरान पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के जवानों के लिए बॉडी-वॉर्न कैमरों का अनिवार्य और लगातार इस्तेमाल करने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई से इनकार कर दिया था। 7 अक्टूबर को एक्टिंग चीफ जस्टिस नितिन सांबरे की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस याचिका को केंद्र सरकार के समक्ष एक प्रतिवेदन के रूप में विचार करने को कहा था। अदालत ने न्यायिक हस्तक्षेप की जरूरत पर सवाल उठाते हुए टिप्पणी की थी कि इस मामले में ऐसा कोई कानूनी पेंच नहीं है जहां कोर्ट को निर्देश जारी करने की जरूरत पड़े। अदालत ने कहा था कि जब भी विधायिका की कोई मंशा होती है, वे वैधानिक प्रावधानों में नियम तय कर देते हैं।

जुलाई में हुए प्रदर्शन का हवाला देकर दायर की गई थी याचिका

यह याचिका एडवोकेट चाहत राघव द्वारा भारत सरकार, दिल्ली पुलिस आयुक्त, सीआरपीएफ के महानिदेशक और बीपीआरएंडडी के खिलाफ दायर की गई थी। इस याचिका में मांग की गई थी कि प्रदर्शनों और भीड़ नियंत्रण में तैनात अधिकारियों के लिए कैमरे पहनना और उन्हें चालू रखना अनिवार्य किया जाए। साथ ही रिकॉर्डिंग को सुरक्षित रखने, डेटा सुरक्षा और सबूत के तौर पर उसके इस्तेमाल के लिए सख्त मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनाई जाए।

याचिका में जुलाई 2026 में जंतर-मंतर पर CJP और एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक के प्रदर्शनों का जिक्र किया गया था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि उस दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़प के अधिकांश वीडियो आम जनता या राहगीरों के मोबाइल फोन से सामने आए थे, न कि किसी आधिकारिक पुलिस रिकॉर्डिंग सिस्टम से। याचिका में कहा गया था कि 21 जुलाई की घटनाओं में पुलिसकर्मियों और प्रदर्शनकारियों दोनों को चोटें आई थीं, जबकि 23 जुलाई की समीक्षा बैठक में आरएएफ के महानिरीक्षक (IG) ने कथित तौर पर माना था कि इस्तेमाल किए गए बल के कुछ तरीके तय मानकों के अनुरूप नहीं थे।

1,500 कैमरों के लिए टेंडर और कानूनी प्रावधानों की मांग

याचिका में कहा गया था कि वर्ष 2020 की बॉडी-वॉर्न कैमरों से जुड़ी एडवाइजरी सिर्फ एक सिफारिश थी, जो अधिकारियों के लिए कैमरे चालू रखना अनिवार्य नहीं बनाती। याचिकाकर्ता ने दिल्ली पुलिस द्वारा गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM) के जरिए लगभग ₹7.4 करोड़ की अनुमानित लागत से 1500 बॉडी कैमरों की खरीद के लिए निकाले गए टेंडर का भी जिक्र किया था, जिसमें प्रति कैमरा लागत करीब ₹49333 बैठती है।

याचिका में मांग की गई थी कि कैमरों की रिकॉर्डिंग को सुरक्षित सर्वर पर अपलोड किया जाए जिसे कोई जवान बदल न सके, साथ ही भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 63 के तहत प्रमाणीकरण और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के प्रावधानों का पालन हो। याचिकाकर्ता का कहना था कि यह कैमरे किसी भीड़ पर चेहरा पहचानने वाला जाल नहीं, बल्कि पुलिस और नागरिकों के बीच संवाद का एक पारदर्शी रिकॉर्ड हैं जो बैरिकेड के दोनों तरफ मौजूद लोगों की सुरक्षा करते हैं।

छावनी में तब्दील हुई दिल्ली: 25,000 जवान, मेट्रो पाबंदी और इंटरनेट बंद

शनिवार को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के आह्वान को देखते हुए दिल्ली पुलिस ने पहले ही अनुमति देने से इनकार कर दिया था। इसके बावजूद कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पूरी दिल्ली में कड़े सुरक्षा इंतजाम किए गए हैं। दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था संभालने के लिए पुलिस और पैरामिलिट्री के लगभग 25,000 जवानों को तैनात किया गया है। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) की 120 से अधिक कंपनियां सुरक्षा में लगाई गई हैं। शनिवार सुबह 6:00 बजे से ही कनॉट प्लेस, मंडी हाउस, जंतर-मंतर, पटेल चौक समेत 30 से ज्यादा पॉइंट्स पर सख्त ट्रैफिक डायवर्जन लागू किया गया है। दिल्ली की सभी सीमाओं पर गाड़ियों की सघन चेकिंग की जा रही है।

पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर असर

सुरक्षा कारणों से दिल्ली मेट्रो के 45 स्टेशनों पर एंट्री और एग्जिट बैन लागू है, नमो भारत के दो स्टेशन बंद हैं और ट्रेन सेवाओं पर भी असर पड़ा है। राजधानी के संवेदनशील इलाकों में एहतियात के तौर पर 24 घंटे के लिए मोबाइल इंटरनेट सेवाएं निलंबित कर दी गई हैं। आपको बता दें कि यह पूरा विवाद मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में अनियमितताओं के आरोपों से जुड़ा है, जिसके विरोध में मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर यह प्रदर्शन बुलाया गया है।

मतदाताओं का नहीं पार्टियों का प्रदर्शन है

असल में कुछ प्रक्रियागत मामलों में चुनाव आयुक्तों की असहमति थी, जिसे उन्होंने जाहिर किया और आयोग ने उसे ठीक किया। जब इसकी रिपोर्ट मीडिया में आई तो विपक्ष ने इसको अपने लिए अवसर मान कर प्रदर्शन शुरू कर दिया। यह विशुद्ध रूप से एक राजनीतिक आंदोलन है, जो राजनीतिक दलों द्वारा प्रायोजित है और विपक्षी राजनीतिक दलों के फायदे के लिए है। आम मतदाता भी इस बात को समझ रहा है।

महात्मा गांधी की जयंती यानी दो अक्टूबर पर देश के कई हिस्सों में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन हुए। हाल के महीनों में दूसरी बार राजनीतिक दलों और गैर राजनीतिक संगठनों ने सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन किया। दिल्ली से मुंबई तक खूब शोरगुल हुआ। लेकिन जून और जुलाई में दिल्ली के जंतर मंतर पर चले 36 दिन के आंदोलन और गांधी जयंती पर हुए इस आंदोलन में एक बुनियादी अंतर है, जो अलग अलग जगहों पर प्रदर्शनों में दिख भी रहा है। 20 जून से शुरू होकर 25 जुलाई तक जंतर मंतर पर चला आंदोलन पेपर लीक से प्रभावित हुए छात्रों और उनके समर्थन में उतरे एक नए संगठन कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी का था। बाद में लेफ्ट पार्टियों और समाजवादी पार्टी के अलावा शरद पवार की एनसीपी और उद्धव ठाकरे की शिव सेना के नेता भी इसमें शामिल हुए थे। लेकिन बुनियादी रूप से वह आंदोलन प्रभावित छात्रों का था, जिनकी संख्या बहुत बड़ी थी।

गौरतलब है कि 2026 की नीट परीक्षा करीब 24 लाख छात्रों ने दी थी, जो पेपर लीक होने और दोबारा परीक्षा होने से प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुए थे। उसी समय कई और परीक्षाओं में गड़बड़ी की खबरें आई थीं, जिनसे प्रभावितों की संख्या बहुत बड़ी हो गई थी। तभी उस आंदोलन का आयाम बहुत बड़ा हो गया था। हजारों लोग हर दिन प्रदर्शन में शामिल हो रहे थे और लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों लोग हर दिन डिजिटल माध्यम से उस आंदोलन से जुड़ रहे थे। लोगों का एक भावनात्मक लगाव आंदोलन से दिख रहा था। आंदोलन की जगह पर मीडिया और सोशल मीडिया के लोग जब किसी से बात करते थे तो वह प्रभावित परिवार का हिस्सा निकलता था। प्रभावित छात्र या उसके परिजन आंदोलन में शामिल थे इसलिए उसकी तीव्रता बहुत ज्यादा थी। उसमें आक्रोश भी बहुत ज्यादा था।

तभी सरकार ने छात्रों व युवाओं की भावनाओं को समझा और उस हिसाब से कार्रवाई की। सरकार ने दो बड़े मंत्रियों को भेज कर बात कराई, सोनम वांगचुक का अनशन समाप्त कराया और छात्रों की सारी मांगें मान कर आंदोलन खत्म कराया।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए अभी जो आंदोलन हो रहा है वह बुनियादी रूप से छात्रों व युवाओं को आंदोलन से भिन्न है। यह प्रभावित पक्ष का आंदोलन नहीं है। इसमें ऐसे लोग नहीं दिख रहे हैं, जिनके वोट कट गए हैं। याद करें कैसे जंतर मंतर पर आंदोलन के दौरान उन छात्रों की तस्वीरें रखी गई थीं, जिन्होंने पेपर लीक के बाद सुसाइड किया था। उनके परिजनों को आंदोलन में आमंत्रित किया गया था। इस बार का आंदोलन चाहे दिल्ली का जंतर मंतर हो या मुंबई का शिवाजी पार्क कहीं भी प्रभावित लोग नहीं दिखे।

प्रदर्शनकारियों ने ऐसे लोगों को मंच पर नहीं प्रस्तुत किया, जिनका नाम कट गया है। अगर यह आंदोलन मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में नाम काटे जाने के खिलाफ है तो इसमें अनिवार्य रूप से उन लोगों को शामिल होना चाहिए, जिनके नाम कटे हैं। हालांकि यह जरूरी नहीं है कि हर बार प्रभावित पक्ष ही आंदोलन करे। कई बार प्रभावित पक्ष ऐसा करने में सक्षम नहीं होता है तो उसकी लड़ाई सिविल सोसायटी या राजनीतिक दल लड़ते हैं। लेकिन जब प्रभावितों की संख्या करोड़ों में हो और मुद्दा राजनीतिक अधिकार का हो तब निश्चित रूप से प्रभावित लोग इसमें शामिल होते हैं।

मिसाल के तौर पर राजधानी दिल्ली में 47 लाख लोगों के नाम कटे हैं। दिल्ली में एसआईआर से पहले 1.45 करोड़ मतदाता थे, जिनमें से अब 97 लाख ही मतदाता बचे हैं। अगर दिल्ली के साथ एनसीआर मिला लें यानी नोएडा, गाजियाबाद और गुरुग्राम को जोड़ दें तो नाम कटने वालों की संख्या एक करोड़ के करीब पहुंच जाएगी। अगर इनमें से एक फीसदी आदमी भी आंदोलन करने उतरे तो वह संख्या एक लाख होगी। लेकिन दो अक्टूबर को दिल्ली के आंदोलन में 10 हजार लोग नहीं जुटे, जबकि आम आदमी पार्टी और लेफ्ट की तीनों पार्टियों ने भीड़ जुटाने के लिए पूरा जोर लगाया था। लेफ्ट की तीन पार्टियों के छात्र संगठन लगे हुए थे और परदे के पीछे से कांग्रेस के छात्र संगठन के लोग भी जुटे थे। फिर भी भीड़ नहीं जुटी, जबकि जून और जुलाई में हुए आंदोलन में बिना किसी प्रयास के लोग जुट रहे थे।

जाहिर है वोट कटने वाले आंदोलन से आम आदमी का जुड़ाव नहीं बन रहा है। जबकि यह एक राजनीतिक मुद्दा है। यह महंगाई या बेरोजगारी की तरह कोई सार्वभौमिक मुद्दा नहीं है, बल्कि व्यक्ति के राजनीतिक अधिकार से जुड़ा मुद्दा है और व्यापक रूप से वैयक्तिक है। तभी इस मुद्दे को लेकर हो रहे आंदोलन में प्रभावितों को शामिल होना चाहिए था, जो नहीं हो रहे हैं। इसका अर्थ है कि यह कोई वास्तविक मुद्दा नहीं है, बल्कि राजनीतिक दलों द्वारा गढ़ा गया एक मुद्दा है, जिसका मकसद धारणा को प्रभावित करना है।

पहले दिन से यह स्पष्ट दिख रहा है कि एसआईआर के खिलाफ आंदोलन स्वंयस्फूर्त नहीं है, बल्कि राजनीतिक दलों द्वारा प्रायोजित है, जिसका उद्देश्य देश में एक झूठा नैरेटिव स्थापित करना है। राहुल गांधी ने पिछले साल जून में बिहार में एसआईआर शुरू होने के बाद इसके खिलाफ 16 दिन तक यात्रा की थी। उसी समय उनको लग गया था कि इससे जनता का कनेक्ट नहीं है। बाद में नतीजों से यह प्रमाणित भी हुआ। तभी उन्होंने यह मुद्दा छोड़ दिया था। कॉकरोच जनता पार्टी के दिल्ली के सफल आंदोलन के बाद राहुल गांधी को यह चिंता सताने लगी है कि राजनीति में नई शक्तियों का उदय हो रहा है।

जिस तरह से आम आदमी पार्टी ने दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस को रिप्लेस किया और टीवीके ने तमिलनाडु में डीएमके व अन्ना डीएमके दोनों को रिप्लेस किया उस तरह किसी नई शक्ति के उभरने और किसी अन्य राज्य में कांग्रेस को रिप्लेस करने का खतरा भी कांग्रेस को दिख रहा है। इसलिए भी वह ऐसे गढ़े हुए मुद्दों पर आंदोलन कर रही है या उसमें शामिल हो रही है ताकि प्रासंगिकता बनी रहे।

वास्तविकता यह है कि एसआईआर का मुद्दा आम आदमी का मुद्दा है ही नहीं। यह राजनीतिक दलों का मुद्दा है, जो अपनी लगातार हो हार का ठीकरा चुनाव आयोग पर फोड़ना चाहती हैं। विपक्षी पार्टियों की हार राजनीतिक कारणों से है। उनकी संगठनात्मक क्षमता कमजोर होने और नेतृत्व की कमी से उनकी हार हो रही है। लेकिन अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने और खुद को दिलासा देने के लिए वे चुनाव आयोग को निशाना बना रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि एसआईआर की प्रक्रिया में कानूनी और तकनीकी वजहों से कुछ ऐसे लोगों के नाम कटे होंगे, जो वास्तव में मतदाता हैं। लेकिन उनकी संख्या बहुत कम है और उनके पास नाम जुड़वाने के विकल्प हैं। जितनी संख्या में विपक्ष दावा कर रहा है अगर उतनी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम कटे होते तो अब तक देश में क्रांति हो गई होती।

चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर एक अंग्रेजी अखबार की जिस रिपोर्ट के बाद से नए सिरे से आंदोलन शुरू हुए हैं वह रिपोर्ट भी तकनीकी और कानूनी असंगति को ज्यादा दिखाती है। उसमें भी यह कहीं नहीं कहा गया है कि दोनों चुनाव आयुक्त एसआईआऱ के फैसले से सहमत नहीं हैं। एसआईआर का फैसला पूर्ण चुनाव आयोग का संपूर्ण सहमति से किया गया फैसला है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट की भी मुहर है। चुनाव आय़ोग संविधान से मिले अधिकार के तहत ही यह काम कर रहा है। असल में कुछ प्रक्रियागत मामलों में चुनाव आयुक्तों की असहमति थी, जिसे उन्होंने जाहिर किया और आयोग ने उसे ठीक किया। जब इसकी रिपोर्ट मीडिया में आई तो विपक्ष ने इसको अपने लिए अवसर मान कर प्रदर्शन शुरू कर दिया। यह विशुद्ध रूप से एक राजनीतिक आंदोलन है, जो राजनीतिक दलों द्वारा प्रायोजित है और विपक्षी राजनीतिक दलों के फायदे के लिए है। आम मतदाता भी इस बात को समझ रहा है। इसलिए वह इन प्रदर्शनों में शामिल नहीं हो रहा है।  (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)

सोनम वांगचुक बनेंगे लद्दाख के सीएम!

सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के अच्छे दिन आने वाले हैं। खबर है कि केंद्र सरकार लद्दाख में एक निर्वाचित निकाय बनाने पर सिद्धांत रूप से सहमत हो गई है। दिल्ली में लद्दाख के नेताओं के साथ बातचीत में इस पर सहमति बनी है। हालांकि अभी इसकी घोषणा नहीं की गई है। सोनम वांगचुक ने केंद्र सरकार को आगाह किया है कि वह जल्दी फैसला करे नहीं तो 19 सितंबर से फिर से लेह में प्रदर्शन शुरू हो सकता है। कहा जा रहा है कि सरकार संविधान के अनुच्छेद 371 में एक नई धारा ‘के’ जोड़ने जा रही है, जिसमें राज्य के लिए एकक निर्वाचित निकाय की व्यवस्था होगी।

सवाल है कि क्या जम्मू कश्मीर की तरह लद्दाख में भी विधानसभा बनाई जा सकती है या वहां स्थानीय निकाय या स्वायत्त निकाय जैसी किसी संस्था का गठन होगा? गौरतलब है कि दिल्ली, पुडुचेरी आदि केंद्र शासित प्रदेशों में भी विधानसभा है। तभी कहा जा रहा है कि लद्दाख का दर्जा केंद्र शासित प्रदेश का ही रहेगा लेकिन वहां विधानसभा का गठन किया जा सकता है। अगर ऐसा होता है तो पहले चुनाव के बाद सोनम वांगचुक वहां के मुख्यमंत्री बन सकते हैं। हालांकि एक बार विधानसभा बनने और चुनाव की प्रक्रिया शुरू होने के बाद कई पार्टियां चुनाव लड़ेंगी, फिर भी माना जा रहा है कि अगर विधानसभा बनती है तो पहले मुख्यमंत्री वांगचुक होंगे। दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के साथ उनके अच्छे संबंध हैं और इस समय जम्मू कश्मीर व लद्दाख दोनों के उप राज्यपाल की भूमिका निभा रहे वीके सक्सेना से भी उनके बहुत अच्छे संबंध हैं।

अमेरिका में पढ़ाई पर घिरे अभिजीत दीपके ने PM मोदी को दी चुनौती, जानिए क्या कहा…

अमेरिका में पढ़ाई पर घिरे अभिजीत दीपके ने PM मोदी को दी चुनौती, जानिए क्या कहा...

Abhijeet Dipke Degree Controversy

Abhijeet Dipke News: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने अपनी शैक्षणिक योग्यता पर उठ रहे सवालों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक अनोखी चुनौती दी है। अमेरिका की बोस्टन यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई के रिकॉर्ड पर हाल ही में शुरू हुए विवाद के बाद दीपके ने पीएम मोदी से कहा कि चलिए दोनों अपनी-अपनी डिग्री सार्वजनिक करते हैं। 

 

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट में अभिजीत दीपके ने लिखा कि लोग मेरी डिग्री देखने का इंतजार करते-करते अपना सब्र खो रहे हैं। मुझे हैरानी होती है कि वे 12 साल से प्रधानमंत्री की डिग्री देखे बिना कैसे रह रहे हैं। इसके आगे उन्होंने पीएम मोदी को टैग करते हुए इनवाइट किया और कहा कि चलो हम दोनों अपनी डिग्री दिखाते हैं और इस मामले को यहीं खत्म करते हैं। ALSO READ: ‘कॉकरोच’ कहने पर हिला दी सरकार! पढ़िए CJP आंदोलन से अभिजीत दीपके को मिले 3 सबसे बड़े सबक

क्या है दीपके के सवाल?

दीपके ने एक्स पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की डिग्री साझा करते हुए कई सवाल उठाए हैं। उन्होंने लिखा- 1976 में, मोदी के मार्क्स कंप्यूटर से जेनरेट किए गए थे, जबकि दूसरे छात्रों के मार्क्स हाथ से लिखे गए थे। उन्होंने आगे लिखा- मोदी की मार्कशीट में 'यूनिवर्सिटी ऑफ़ दिल्ली' गोथिक फ़ॉन्ट में लिखा हुआ है, जबकि DU ने 1983 के बाद गोथिक फ़ॉन्ट का इस्तेमाल करना शुरू किया था। ALSO READ: NEET प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, दिल्ली समेत 5 राज्यों में FIR रद्द; CJP नहीं करेगी प्रोटेस्ट

पॉडकास्ट से शुरू हुआ विवाद

गौरतलब है कि अभिजीत दीपके की अमेरिकी डिग्री पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। यह विवाद तब और बढ़ गया जब हाल ही में प्रखर गुप्ता के एक पॉडकास्ट में (जिसमें एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक मेहमान थे) दीपके की बोस्टन यूनिवर्सिटी की शिक्षा पर खुले तौर पर सवाल खड़े किए गए। इसके जवाब में दीपके ने साफ किया कि वे अपनी डिग्री दिखाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं, बशर्ते प्रधानमंत्री भी अपनी डिग्री सार्वजनिक करें।

 

हालांकि पीएम मोदी की शैक्षणिक योग्यता पर सवाल उठना कोई नया मामला नहीं है, विपक्षी दल भी समय-समय पर यह मुद्दा उठाते रहे हैं। हालांकि, भाजपा पहले ही पीएम मोदी की डिग्री सार्वजनिक कर चुकी है और उसका कहना है कि यह मामला बहुत पहले ही सुलझ चुका है।

Shashi Tharoor: ‘जाति-वर्ग से ऊपर उठे कांग्रेस’, शशि थरूर ने CJP के आंदोलन से पार्टी को सीख लेने को कहा

Shashi Tharoor: कांग्रेस लीडरशिप जब OBC तक पहुंचने और जाति-आधारित प्रतिनिधित्व पर अपना ध्यान बढ़ा रही है, तब तिरुवनंतपुरम के सांसद शशि थरूर ने शनिवार को कहा कि पार्टी को ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) से सीख लेनी चाहिए और जाति-वर्ग से ऊपर उठना चाहिए।

News 18 के साथ एक इंटरव्यू में थरूर ने कहा, “मैं कुछ समय से यह बात कह रहा हूं कि हमें जाति, धर्म, पंथ, आदिवासी या किसी खास ग्रुप जैसे सीमित हितों से ऊपर उठने की जरूरत है। और इसके साथ ही, हमें उस क्षेत्र पर भी बहुत ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है जिसे हम नजरअंदाज करते रहे हैं – यानी आम भारतीयों, मिडिल क्लास भारतीयों, शहरी भारतीयों और प्रोफेशनल्स से उन मुद्दों पर बात करना जो जाति और धर्म से परे सभी भारतीयों को प्रभावित करते हैं।”

उन्होंने कहा, “चाहे परीक्षाओं का मुद्दा हो, जो हर किसी को प्रभावित करता है, महंगाई और बढ़ती कीमतें हों या शहरों की खराब होती नागरिक सुविधाएं, इन समस्याओं का सामना हर कोई रोज करता है। राहुल गांधी ने सही कहा है कि मिडिल क्लास के लिए शिक्षा अब महंगी होती जा रही है। हमें ऐसे मुद्दों को भी उठाना होगा, जो हर व्यक्ति को प्रभावित करते हैं, चाहे उसका धर्म या जाति कुछ भी हो।”

CJP के विरोध प्रदर्शनों पर थरूर ने News 18 से कहा, “CJP ने जंतर-मंतर पर क्या किया? उन्होंने एक ऐसा मुद्दा उठाया जिसका जाति, धर्म, भाषा, राज्य या पंथ से कोई लेना-देना नहीं था। और यही वजह है कि उन्हें हर तरफ से समर्थन मिला। सभी राजनीतिक पार्टियों को यही सीखने की जरूरत है। मेरा मानना ​​है – और यह मेरी निजी राय है, मैं किसी पार्टी की तरफ से या किसी पार्टी के खिलाफ नहीं बोल रहा – कि यह एक ऐसा सबक है जिसे हम सीख सकते हैं।”

CJI सूर्यकांत की एक टिप्पणी के बाद अभिजीत दिपके ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) नाम का एक व्यंग्यात्मक आंदोलन शुरू किया था। इस पार्टी ने NEET पेपर लीक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन की अगुवाई की, जिससे देश भर में विरोध प्रदर्शन हुए और आखिरकार शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा।

जब थरूर से पूछा गया कि क्या उन्हें लगता है कि कांग्रेस को आधिकारिक तौर पर CJP के विरोध प्रदर्शन में शामिल होना चाहिए था, तो उन्होंने कहा, “मैंने वकालत की थी कि हमें इसमें शामिल होना चाहिए। CJP के विरोध प्रदर्शन और सोनम वांगचुक के अनशन ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा था।”

थरूर ने News18 से कहा, “मुझे बताया गया था कि कांग्रेस के इसमें शामिल नहीं होने की वजह एक बेहद आपत्तिजनक पत्र था, जिसे CJP के नेतृत्व ने कांग्रेस पार्टी को लिखा था। उस पत्र में कुछ ऐसी बातें कही गई थीं, जिन्हें कांग्रेस ने अपमानजनक माना। इसलिए पार्टी ने खुद को इस प्रदर्शन से अलग रखना बेहतर समझा।”

उन्होंने आगे कहा, “आप इसे समझ सकते हैं, क्योंकि हर संस्था अपने हितों को ध्यान में रखती है। अगर कांग्रेस को लगा कि CJP एक संस्था के तौर पर उसके खिलाफ है या उसके प्रति उसका रवैया विरोधी है, तो कांग्रेस अपना नाम उनके आंदोलन के साथ क्यों जोड़ेगी? शायद यही इसकी वजह थी।”

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रांची JPSC-JSSC धांधली, वांगचुक की अपील पर देवेन्द्र ने तोड़ा अनशन, जानिए कौन हैं छात्र नेता महतो

Devendra Nath Mahato Protest

Devendra Nath Mahato Protest: राजधानी रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में जेपीएससी (JPSC) और जेएसएससी (JSSC) परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी और धांधली के खिलाफ पिछले चार दिनों से आमरण अनशन पर बैठे छात्र नेता देवेंद्रनाथ महतो ने अपना अनशन समाप्त कर दिया है। प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक से वीडियो कॉल पर हुई बातचीत और उनकी अपील के बाद देवेंद्र ने अन्न-जल ग्रहण किया। हालांकि, अनशन समाप्त होने के बावजूद छात्रों का आंदोलन जारी है। इस बीच, खबर है कि सीजेपी नेता अभिजीत दीपके भी रांची पहुंचने वाले हैं। 

 

झारखंड की राजधानी रांची में राज्य लोक सेवा आयोग (JPSC) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) की परीक्षा प्रणालियों में धांधली और भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर छात्रों का प्रदर्शन उग्र रूप ले चुका है। बुधवार को लद्दाख के प्रसिद्ध पर्यावरण व सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने वीडियो कॉल के माध्यम से देवेंद्र महतो से बात की। वार्ता के दौरान वांगचुक ने आंदोलन के मुद्दों पर चर्चा की और देवेंद्र की लगातार गिरती सेहत पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए उनसे अनशन वापस लेने का आग्रह किया। 

 

सोनम वांगचुक की अपील और छात्रों के भारी दबाव के बाद देवेंद्र महतो ने अपना अनशन समाप्त करने का निर्णय लिया। लगातार चार दिनों के उपवास के कारण उनकी स्थिति बिगड़ रही थी। रांची सदर अस्पताल के डॉक्टरों के अनुसार उनका ब्लड प्रेशर और शुगर लेवल काफी घट गया था, साथ ही वे गंभीर डिहाइड्रेशन और थकान से जूझ रहे थे। ALSO READ: CJP Protest : हिंसा करने वालों पर दिल्ली पुलिस का एक्शन, रद्द हो सकते हैं पासपोर्ट, CCTV से हो रही पहचान, सीजेपी का कल देशभर में आंदोलन का ऐलान

विवाद का पूरा घटनाक्रम

इस पूरे आंदोलन की शुरुआत बीती 2 जुलाई को जेपीएससी 14वीं की प्रारंभिक परीक्षा (PT) का परिणाम आने के बाद हुई। मुख्य परीक्षा के लिए कुल 2204 अभ्यर्थियों को योग्य घोषित किया गया था और परीक्षा की तिथि 18 से 20 जुलाई तय की गई थी। लेकिन परिणाम जारी होते ही धांधली के आरोप लगने शुरू हो गए। रिजल्ट में कैटेगरी-वाइज कट-ऑफ जारी नहीं किया गया। इसके अलावा जारी परिणाम पत्र पर जेपीएससी अध्यक्ष, सचिव या किसी सदस्य के हस्ताक्षर नहीं थे।

क्या है छात्रों की मांग? 

सोशल मीडिया पर एक अभ्यर्थी की OMR शीट वायरल हुई, जिसमें केवल 48 प्रश्न हल करने के बावजूद उसे मुख्य परीक्षा के लिए सफल घोषित किया गया था। व्यापक विरोध के बाद मुख्य परीक्षा को तो रद्द कर दिया गया, लेकिन छात्र इस निर्णय से संतुष्ट नहीं हैं। अभ्यर्थियों का सीधा आरोप है कि पेपर लीक किए गए और सीटें बेची गईं। छात्रों ने सीआईडी (CID) जांच को नकारते हुए पूरे मामले की जांच ईडी (ED) या सीबीआई (CBI) से कराने की मांग की है। ALSO READ: बड़ा धमाका! अब यूपी के भाजपा नेता की बेटी ने किया CJP का समर्थन, जानिए कौन हैं यशस्विनी राजे सिंह?

आंदोलन का बढ़ता दायरा, दीपके भी जाएंगे रांची

झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLKM) से जुड़े देवेंद्र महतो ने 25 जुलाई को मोराबादी मैदान में गांधी प्रतिमा के समक्ष धरना शुरू किया था। शुरुआती दिनों में कम संख्या के बावजूद सोशल मीडिया के जरिए छात्रों का भारी समर्थन मिला। खबर है कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने वाले कॉकरोच जनता पार्टी के प्रमुख अभिजीत दीपके भी आंदोलनकारियों को समर्थन देने के लिए रांची जाएंगे। 

कौन हैं छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो?

झारखंड के छात्र आंदोलनों का एक प्रमुख चेहरा बन चुके देवेंद्र नाथ महतो का जीवन संघर्षों और सार्वजनिक मुद्दों से भरा रहा है। देवेंद्र रांची जिले के राहे प्रखंड स्थित कापीडीह गांव के रहने वाले हैं। उनके पिता विशंभर महतो एक सेवानिवृत्त सरकारी शिक्षक हैं। देवेंद्र ने साल 2006 में मैट्रिक, 2008 में साइंस से इंटरमीडिएट, 2017 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय से संस्कृत में स्नातक और बाद में कुरमाली भाषा में स्नातकोत्तर (PG) व B.Ed की डिग्री हासिल की। 

 

कॉलेज के दिनों से ही छात्र हित के मुद्दों पर मुखर रहे महतो ने 2015 में तत्कालीन रघुवर दास सरकार की नियोजन नीति का विरोध किया। 2016 में छात्रवृत्ति में कटौती के खिलाफ सड़क पर उतरे।

 

छात्र आंदोलनों के कारण जेल में रहने के बावजूद उन्होंने रांची सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में लोकसभा चुनाव लड़ा और 1.48 लाख वोट हासिल कर तीसरे स्थान पर रहे। सिल्ली विधानसभा सीट से JLKM प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़कर 44 हजार वोट प्राप्त किए और पुनः तीसरे स्थान पर रहे। छात्रों की मांगों को लेकर लगातार आंदोलनरत रहने के कारण देवेंद्र महतो पर वर्तमान में 30 से अधिक मुकदमे दर्ज हैं।