नोएडा-ग्रेटर नोएडा में विकास की रफ्तार तेज! 8,000 हेक्टेयर में बनेगा इंडस्ट्रियल नोड, रोजगार और निवेश को मिलेगा बड़ा बूस्ट

Development in Noida-Greater Noida: यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (YEIDA) क्षेत्र में औद्योगिक विकास को नई रफ्तार देने की तैयारी तेज हो गई है। नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के दक्षिणी क्षेत्र में करीब 8,000 हेक्टेयर क्षेत्रफल में इंडस्ट्रियल नोड विकसित करने की दिशा में काम किया जा रहा है। प्राधिकरण की ओर से तैयार की जा रही महायोजना और औद्योगिक विकास की योजनाओं में इसे महत्वपूर्ण परियोजना के तौर पर आगे बढ़ाया जा रहा है। इंडस्ट्रियल नोड के विकसित होने से क्षेत्र में औद्योगिक निवेश, रोजगार और लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

एयरपोर्ट के आसपास औद्योगिक विकास को मिलेगी गति

YEIDA की ओर से नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के दक्षिणी क्षेत्र में करीब 8,000 हेक्टेयर में इंडस्ट्रियल नोड विकसित करने की दिशा में काम किया जा रहा है। प्राधिकरण के निदेशक मंडल की ओर से भी इस प्रस्ताव का अवलोकन किया गया है। इसके लिए महायोजना तैयार करने की दिशा में कंसल्टेंट के चयन की कार्रवाई की जा रही है।

प्राधिकरण के मुताबिक, इंडस्ट्रियल नोड के विकसित होने से क्षेत्र में औद्योगिक निवेश और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। इसके साथ ही लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है। एयरपोर्ट के आसपास योजनाबद्ध तरीके से औद्योगिक गतिविधियां विकसित होने से क्षेत्र में कारोबार के लिए बेहतर माहौल तैयार करने का प्रयास किया जा रहा है।

इंटरनेशनल ट्रेड सिटी की भी तैयारी

YEIDA क्षेत्र में औद्योगिक विकास के साथ-साथ इंटरनेशनल ट्रेड सिटी विकसित करने की दिशा में भी पहल की जा रही है। प्राधिकरण की योजना Yiwu International Trade City की तर्ज पर अंतरराष्ट्रीय व्यापार केंद्र विकसित करने की है। प्रस्तावित ट्रेड सिटी में क्षेत्र के औद्योगिक उत्पादों की प्रदर्शनी, बिक्री और निर्यात के लिए बाजार उपलब्ध कराने की परिकल्पना की गई है।

इससे स्थानीय उद्योगों को नए बाजारों तक पहुंच बनाने और वैश्विक व्यापार के अवसर हासिल करने में मदद मिल सकती है। एयरपोर्ट, औद्योगिक क्षेत्र और लॉजिस्टिक्स सुविधाओं के साथ ट्रेड सिटी को जोड़ने की योजना क्षेत्र के कारोबारी ढांचे को विस्तार देने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

295 औद्योगिक भूखंडों में तेजी से बढ़ रहा काम

YEIDA क्षेत्र में औद्योगिक निवेश को जमीन पर उतारने के लिए भूखंड आवंटन के बाद निर्माण और उत्पादन की प्रक्रिया को भी तेज किया जा रहा है। प्राधिकरण के मुताबिक 4,000 वर्गमीटर से अधिक आकार के 295 औद्योगिक भूखंडों में 181 भूखंडों के लीज डीड का निपटारा हो चुका है। इनमें 152 आवंटियों को कब्जा दिया जा चुका है। जबकि 69 भूखंडों पर निर्माण कार्य शुरू हो गया है। वहीं 13 इकाइयों में उत्पादन भी शुरू हो चुका है।

सेक्टर-28 के मेडिकल डिवाइस पार्क में भी औद्योगिक गतिविधियों को आगे बढ़ाया जा रहा है। यहां 203 भूखंडों के सापेक्ष 123 भूखंड आवंटित किए गए हैं। इनमें 75 भूखंडों पर कब्जा दिया जा चुका है और 28 पर निर्माण शुरू हो गया है।

आधुनिक सुविधाओं पर भी जोर

मेडिकल डिवाइस पार्क में 3D Prototype Lab, Electronics Assembly Facility, IoMT, Biomaterial, Common IT Facility और Tooling Room जैसी आधुनिक सुविधाओं के विकास पर भी काम चल रहा है। इसका उद्देश्य औद्योगिक इकाइयों को जरूरी तकनीकी और साझा सुविधाएं उपलब्ध कराना है।

इसके अलावा सेक्टर-29 के अपैरल पार्क में 159, एमएसएमई पार्क में 503 और हैंडीक्राफ्ट पार्क में 188 भूखंडों का आवंटन हो चुका है। अपैरल पार्क में 110 और हैंडीक्राफ्ट पार्क में 83 आवंटियों को कब्जा भी मिल चुका है। सेक्टर-33 के टॉय पार्क में 148 भूखंड आवंटित किए गए हैं।

महायोजना से तय होगी भविष्य की दिशा

YEIDA की ओर से आगरा-अर्बन सेंटर की महायोजना-2041 को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया भी जारी है। संशोधित महायोजना रिपोर्ट प्राधिकरण की 88वीं बोर्ड बैठक में प्रस्तुत की गई थी, जिसके बाद आम लोगों से आपत्तियां और सुझाव मांगे गए। प्राप्त सुझावों की जांच के बाद उनके निस्तारण की संस्तुति की गई है। संशोधित ड्राफ्ट महायोजना तैयार की जा रही है, जो क्षेत्र के भविष्य के भूमि उपयोग और विकास की दिशा तय करेगी।

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साथ ही औद्योगिक भूखंडों पर निर्माण और उत्पादन की गति बढ़ाने के लिए साप्ताहिक समीक्षा व्यवस्था के माध्यम से लीज डीड, कब्जा, मानचित्र स्वीकृति, निर्माण और पूर्णता प्रमाण-पत्र से जुड़े लंबित मामलों का समयबद्ध निस्तारण किया जा रहा है।

(ग्रेटर नोएडा से पवन गुप्ता की रिपोर्ट)

ग्रेटर नोएडा के अवैध कमर्शियल निर्माणों पर NGT की सख्त रुख! GNIDA को दिया 10 दिनों का अल्टीमेटम

Greater Noida News: दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन कर किए जा रहे कथित अवैध व्यावसायिक निर्माण के मामलों में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने सख्त रुख अपनाया है। ट्रिब्यूनल ने ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण (GNIDA) को ऐसे सभी अवैध व्यावसायिक निर्माणों की पूरी लिस्ट और उनसे संबंधित कार्रवाई का डिटेल्स 10 दिनों के भीतर रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया है। यह आदेश पूर्व गाजियाबाद पार्षद राजेंद्र त्यागी की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान आया। मामले की सुनवाई 24 सितंबर को NGT की प्रिंसिपल बेंच के चेयरपर्सन जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव और एक्सपर्ट मेंबर अफरोज अहमद ने की।

GNIDA को नोटिस और कोर्ट के आदेशों का देना होगा ब्योरा

टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) के मुताबिक, सुनवाई के दौरान ट्रिब्यूनल ने कहा कि GNIDA को अपनी कार्रवाई से जुड़े पूरे डिटेल्स के साथ उन उल्लंघनकर्ताओं को जारी किए गए नोटिस और अदालतों द्वारा पारित आदेशों की जानकारी भी उपलब्ध करानी होगी। NGT ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 10 दिसंबर की तारीख तय की है।

मामले में GNIDA की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने जुलाई में जवाब दाखिल करने के लिए और समय मांगा था। अब ट्रिब्यूनल ने ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण को 10 दिनों के भीतर आवश्यक जानकारी रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया है।

पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन का आरोप

  • याचिका में ग्रेटर नोएडा में पर्यावरणीय मानकों का उल्लंघन करते हुए निर्माण परियोजनाएं चलाए जाने का आरोप लगाया गया है।
  • इसमें पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment) संबंधी अधिसूचना के प्रावधानों का पालन नहीं करने तथा उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UPPCB) से आवश्यक सहमति प्राप्त किए बिना संचालन करने जैसे आरोप शामिल हैं।
  • मामले में NGT ने पहले जुलाई में UPPCB को ग्रेटर नोएडा में पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन में शुरू की गई कथित अवैध निर्माण परियोजनाओं के आरोपों की जांच और सत्यापन करने का निर्देश दिया था।

UPPCB ने कहा- GNIDA ने नहीं दी परियोजनाओं की जानकारी

  • 23 सितंबर को UPPCB की ओर से दाखिल रिपोर्ट में NGT को बताया गया कि GNIDA ने संबंधित परियोजनाओं का विवरण साझा नहीं किया।
  • बोर्ड के मुताबिक, इस संबंध में GNIDA को 17 अगस्त और 16 सितंबर को पत्र भेजे गए थे। लेकिन इसके बावजूद परियोजनाओं की जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई।
  • इसके बाद NGT ने GNIDA से कहा कि वह कथित अवैध निर्माणों से संबंधित पूरी जानकारी उपलब्ध कराए।
  • इसमें प्राधिकरण की ओर से अब तक जारी किए गए नोटिस, उल्लंघनकर्ताओं के खिलाफ की गई कार्रवाई और संबंधित अदालतों के आदेशों का विवरण भी शामिल होगा।

10 दिसंबर को होगी अगली सुनवाई

NGT के इस आदेश के बाद GNIDA को निर्धारित समयसीमा में कथित अवैध व्यावसायिक निर्माणों की सूची और उनसे जुड़ी कार्रवाई का रिकॉर्ड पेश करना होगा। इस मामले की अगली सुनवाई अब 10 दिसंबर को तय की गई है।

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हाथी के बच्चे बराबर वजन, इंसानों को जिंदा निगलती है:सड़ा-गला मांस खाती है, नेपाल से बहकर बिहार आईं खतरनाक मछलियों की कहानी

26 अगस्त को नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ का मलबा अब बिहार पहुंच रहा है और उसके साथ बहकर आ रही हैं- थाई मांगुर, गोइता (गूंछ फिश) जैसी खतरनाक मछलियां, जो इंसानी शव खाती हैं। जिनको खाने से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी हो सकती है। नेपाल से बिहार बहकर आई इन मछलियों की कहानी क्या है, क्या यह भारत में प्रतिबंधित है, इन्हें खाना कितना जानलेवा है; जानेंगे बूझे की नाही में… सबसे पहले जानिए, नेपाल से बहकर कौन-कौन सी मछली बिहार आई नेपाल में आई तबाही के तीसरे दिन यानी 29 अगस्त की सुबह गोपालगंज में मछुआरों ने गंडक नदी से भारी मात्रा में मछलियों का पकड़ा। गोपालगंज के मंगलपुर घाट से कई क्विंटल मछलियों के पकड़ने और उन्हें पश्चिम बंगाल के बाजारों में भेजने की खबर है। बिहार सरकार के मत्स्य निदेशालय ने लोगों से बाढ़ के पानी में आई मछलियों को नहीं खाने की अपील की है। निदेशालय ने कहा है, ‘बाढ़ के पानी से सीधे पकड़ी गई मछलियों की खरीद-बिक्री में सावधानी बरतें। बिना जांच के मछली नहीं खाएं। एक-एक कर जानिए, बिहार आईं मछलियों की कहानी… 1. गूंछ कैटफिशः इंसानों को नदी में खींचकर खाती हैं गूंछ कैटफिश यानी गोइता, जिसे ‘आदमखोर कैटफिश’ के नाम से भी जाना जाता है। नुकीले जबड़ों और बड़ी आंखों वाली एक बेहद भयानक मछली है। यह आम मछलियों जैसी नहीं होती, क्योंकि इसका शरीर काफी लंबा और सिर चौड़ा व चपटा होता है, जिस पर मूंछों के तीन जोड़े होते हैं। इन्हें कहा जाता है- ‘नदी का शैतान’ अलग-अलग रिपोर्ट में इन्हें नदी का शैतान यानी रिवर मॉन्स्टर भी कहा जाता है। ‘द हिमालयन आउटबैक’ मैगजीन के मुताबिक, 1988 और 2007 के बीच नेपाल की काली नदी के किनारे तीन अलग-अलग घटनाएं हुईं। इनमें से किसी का भी शव बाद में नहीं मिला। तीनों घटनाएं नेपाल में काली नदी और भारत के निकटवर्ती हिस्से के पास हुई थीं। इस घटना के बाद लोगों ने दावा किया कि किसी विशाल जीव ने आदमी को खींच लिया है। इन दावों के बाद दुनियाभर की नजर इधर गई। भारत में प्रतिबंधित नहीं 2. थाई मांगुरः भारत में प्रतिबंधित, खाने से हो सकता है कैंसर थाई मांगुर मछली कैटफिश समूह में आती है। यह अलग-अलग तरह की रे-फिन्ड यानी पंखों वाली मछलियों का एक समूह है। इनका नाम इनके खास बार्बेल्स (मूंछों) के कारण पड़ा है, जो बिल्ली की मूंछों जैसी दिखती है। थाई मांगुर को वैज्ञानिक रूप से ‘क्लैरियस गैरीपिनस’ नाम से जाना जाता है। यह 3-5 फ़ीट लंबी हवा में सांस लेने वाली मछली है, जो अपने खास रेस्पिरेटरी सिस्टम (ARS) की वजह से सूखी जमीन पर चल सकती है। कीचड़ में भी जीवित रह सकती है। यह तेजी से बढ़ती है। अगर इसे पाला जाए तो उत्पादन तीन गुना तक बढ़ सकता है। इसलिए इसे कम समय में ज्यादा मुनाफा देने वाली मछली भी कहा जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक, अन्य प्रजाति की मछलियां छह महीने में 300 ग्राम बढ़ती है, तो थाई मांगुर उतने ही समय में लगभग एक किलो तक बढ़ जाती है। 2000 में NGT ने लगाया प्रतिबंध भारत में ‘थाई मांगुर’ के पालने, खाने और बेचने पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने 2000 में रोक लगा दी थी। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि यह मांसाहारी मछली पानी में रहने वाली दूसरी मछलियों के लिए खतरा पैदा करती थी। 3. वल्लागो कैटफिश यानी मीठे पानी का शार्क वल्लागो कैटफिश, जिसे बाराली, बोआल, पठान या हेलीकॉप्टर कैटफिश के नाम से जाना जाता है। मीठे पानी में पाई जाने वाली एक विशाल और आक्रामक शिकारी मछली है। यह ‘सिलुरिडे’ परिवार से संबंधित है। यह दक्षिण एशिया (जिसमें नेपाल भी शामिल है) के प्रमुख नदियों में रहती है।

यमुना के बाढ़ क्षेत्र को पर्यावरणीय क्षति पहुंचाने के सभी आरोपों से आर्ट ऑफ लिविंग मुक्त, सुप्रीम कोर्ट का फैसला

यमुना के बाढ़ क्षेत्र को पर्यावरणीय क्षति पहुंचाने के सभी आरोपों से आर्ट ऑफ लिविंग मुक्त, सुप्रीम कोर्ट का फैसला

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नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय के एक महत्त्वपूर्ण एवं निर्णायक निर्णय के साथ आर्ट ऑफ लिविंग के प्रतिष्ठित 2016 वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल को लेकर लगभग एक दशक से चले आ रहे मीडिया ट्रायल और निराधार आरोपों का पटाक्षेप हो गया है। न्यायालय ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के पूर्व निर्णय को निरस्त करते हुए उससे संबंधित सभी परिणामी अंतरिम कार्रवाइयों को भी समाप्त कर दिया है।

निर्णय का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से माना कि अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्यों से यह सिद्ध होता है कि आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा आयोजित वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल से यमुना के बाढ़ क्षेत्र को किसी प्रकार की पर्यावरणीय क्षति नहीं हुई थी।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा जमा की गई 5 करोड़ की राशि उसे पूर्णतः वापस की जानी चाहिए। इस राशि को अनुचित रूप से ‘जुर्माना’ के रूप में प्रचारित किया गया था, जिसका उद्देश्य संस्था की प्रतिष्ठा को धूमिल करना था।

2016 का वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल एक ऐतिहासिक वैश्विक आयोजन था, जिसमें 155 से अधिक देशों की सहभागिता रही और लगभग 35 लाख लोग प्रत्यक्ष रूप से इसमें सम्मिलित हुए। इस विराट आयोजन की अध्यक्षता भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर. सी. लाहोटी ने की थी। संयुक्त राष्ट्र के छठे महासचिव दिवंगत डॉ. बुतरस बुतरस-घाली भी इस आयोजन के सह-अध्यक्ष बनने वाले थे, किंतु दुर्भाग्यवश आयोजन से एक माह पूर्व ही उनका निधन हो गया।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के पश्चात आर्ट ऑफ लिविंग के आधिकारिक प्रवक्ता ने कहा: “निहित स्वार्थों से प्रेरित कुछ लोगों द्वारा उस संस्था पर निराधार आरोप लगाने का यह दुर्भाग्यपूर्ण और हास्यास्पद प्रयास अब पूरी तरह उजागर हो गया है, जो स्वयं लंबे समय से पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति के संवर्धन के लिए समर्पित भाव से कार्य करती आ रही है।”

Shashi Tharoor: ‘जाति-वर्ग से ऊपर उठे कांग्रेस’, शशि थरूर ने CJP के आंदोलन से पार्टी को सीख लेने को कहा

Shashi Tharoor: कांग्रेस लीडरशिप जब OBC तक पहुंचने और जाति-आधारित प्रतिनिधित्व पर अपना ध्यान बढ़ा रही है, तब तिरुवनंतपुरम के सांसद शशि थरूर ने शनिवार को कहा कि पार्टी को ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) से सीख लेनी चाहिए और जाति-वर्ग से ऊपर उठना चाहिए।

News 18 के साथ एक इंटरव्यू में थरूर ने कहा, “मैं कुछ समय से यह बात कह रहा हूं कि हमें जाति, धर्म, पंथ, आदिवासी या किसी खास ग्रुप जैसे सीमित हितों से ऊपर उठने की जरूरत है। और इसके साथ ही, हमें उस क्षेत्र पर भी बहुत ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है जिसे हम नजरअंदाज करते रहे हैं – यानी आम भारतीयों, मिडिल क्लास भारतीयों, शहरी भारतीयों और प्रोफेशनल्स से उन मुद्दों पर बात करना जो जाति और धर्म से परे सभी भारतीयों को प्रभावित करते हैं।”

उन्होंने कहा, “चाहे परीक्षाओं का मुद्दा हो, जो हर किसी को प्रभावित करता है, महंगाई और बढ़ती कीमतें हों या शहरों की खराब होती नागरिक सुविधाएं, इन समस्याओं का सामना हर कोई रोज करता है। राहुल गांधी ने सही कहा है कि मिडिल क्लास के लिए शिक्षा अब महंगी होती जा रही है। हमें ऐसे मुद्दों को भी उठाना होगा, जो हर व्यक्ति को प्रभावित करते हैं, चाहे उसका धर्म या जाति कुछ भी हो।”

CJP के विरोध प्रदर्शनों पर थरूर ने News 18 से कहा, “CJP ने जंतर-मंतर पर क्या किया? उन्होंने एक ऐसा मुद्दा उठाया जिसका जाति, धर्म, भाषा, राज्य या पंथ से कोई लेना-देना नहीं था। और यही वजह है कि उन्हें हर तरफ से समर्थन मिला। सभी राजनीतिक पार्टियों को यही सीखने की जरूरत है। मेरा मानना ​​है – और यह मेरी निजी राय है, मैं किसी पार्टी की तरफ से या किसी पार्टी के खिलाफ नहीं बोल रहा – कि यह एक ऐसा सबक है जिसे हम सीख सकते हैं।”

CJI सूर्यकांत की एक टिप्पणी के बाद अभिजीत दिपके ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) नाम का एक व्यंग्यात्मक आंदोलन शुरू किया था। इस पार्टी ने NEET पेपर लीक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन की अगुवाई की, जिससे देश भर में विरोध प्रदर्शन हुए और आखिरकार शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा।

जब थरूर से पूछा गया कि क्या उन्हें लगता है कि कांग्रेस को आधिकारिक तौर पर CJP के विरोध प्रदर्शन में शामिल होना चाहिए था, तो उन्होंने कहा, “मैंने वकालत की थी कि हमें इसमें शामिल होना चाहिए। CJP के विरोध प्रदर्शन और सोनम वांगचुक के अनशन ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा था।”

थरूर ने News18 से कहा, “मुझे बताया गया था कि कांग्रेस के इसमें शामिल नहीं होने की वजह एक बेहद आपत्तिजनक पत्र था, जिसे CJP के नेतृत्व ने कांग्रेस पार्टी को लिखा था। उस पत्र में कुछ ऐसी बातें कही गई थीं, जिन्हें कांग्रेस ने अपमानजनक माना। इसलिए पार्टी ने खुद को इस प्रदर्शन से अलग रखना बेहतर समझा।”

उन्होंने आगे कहा, “आप इसे समझ सकते हैं, क्योंकि हर संस्था अपने हितों को ध्यान में रखती है। अगर कांग्रेस को लगा कि CJP एक संस्था के तौर पर उसके खिलाफ है या उसके प्रति उसका रवैया विरोधी है, तो कांग्रेस अपना नाम उनके आंदोलन के साथ क्यों जोड़ेगी? शायद यही इसकी वजह थी।”

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सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के 2017 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें ‘आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन’ को दिल्ली में 2016 में हुए ‘वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल’ के दौरान यमुना के बाढ़ वाले इलाके (फ्लडप्लेन) को हुए नुकसान के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था। साथ ही, कोर्ट ने दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी (DDA) को निर्देश दिया कि वह संगठन द्वारा जमा किए गए 5 करोड़ रुपये के पर्यावरण मुआवजे की रकम वापस करे।

सुनवाई के दौरान जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने ‘व्यक्ति विकास केंद्र इंडिया’ की अपील को मंजूरी दे दी। यह ‘आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन’ से जुड़ा एक रजिस्टर्ड पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई सीधा सबूत नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल और यमुना के बाढ़ क्षेत्र को हुए नुकसान के बीच सीधा संबंध था। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति या संस्था को पर्यावरण को हुए नुकसान के लिए पूरी तरह जिम्मेदार तभी ठहराया जा सकता है, जब उसके कथित काम और पर्यावरण को हुए नुकसान के बीच सीधा और स्पष्ट संबंध साबित हो।

कोर्ट ने यह भी पाया कि NGT ने अपील करने वाले को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त मौका नहीं दिया था और जरूरी जानकारी को नजरअंदाज किया था। कोर्ट ने ध्यान दिया कि कार्यक्रम स्थल पहले से ही जर्जर हालत में था।

सुप्रीम कोर्ट ने DDA की आलोचना की

‘आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन’ को राहत देते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने यमुना के सक्रिय बाढ़-मैदान (फ्लडप्लेन) पर कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति देने के लिए DDA की आलोचना की।

कोर्ट ने कहा, “जिस तरह से DDA ने यमुना के सक्रिय बाढ़-मैदान पर कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति दी, वह गलत था।”

कोर्ट ने पाया कि DDA बाढ़-मैदान की सुरक्षा की अपनी कानूनी जिम्मेदारी निभाने में नाकाम रहा और उस इलाके के लिए जिम्मेदार अथॉरिटी के तौर पर उस पर किए गए भरोसे का उल्लंघन किया।

हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि अपील में DDA द्वारा दी गई अनुमति की वैधता कोई मुद्दा नहीं थी।

सुप्रीम कोर्ट ने DDA को NGT के निर्देशों के अनुसार यमुना बाढ़-मैदान के पुनर्वास का काम जारी रखने का निर्देश दिया। कोर्ट ने देखा कि पुनर्वास का काम पहले ही शुरू हो चुका था और इसे जारी रखने का आदेश दिया।

5 करोड़ रुपये का मुआवजा कैसे तय हुआ

NGT ने दिसंबर 2017 में ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ पर 5 करोड़ रुपये का पर्यावरण मुआवजा लगाया था। यह मुआवजा 11 से 13 मार्च, 2016 तक हुए ‘वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल’ की तैयारियों के दौरान फ्लडप्लेन (नदी के किनारे की जमीन) को हुए नुकसान के लिए लगाया गया था।

फेस्टिवल के पहले दिन, यानी 11 मार्च को, आयोजकों ने NGT से पूरी रकम जमा करने के लिए चार हफ्ते का समय मांगा। ट्रिब्यूनल ने उस दिन शुरुआती तौर पर 25 लाख रुपये जमा करने की इजाजत दी और बाकी बचे 4.75 करोड़ रुपये जमा करने के लिए तीन हफ्ते का समय दिया।

संगठन ने 25 लाख रुपये जमा कर दिए। इसके बाद उसने NGT से अनुरोध किया कि बाकी 4.75 करोड़ रुपये को भुगतान के बजाय बैंक गारंटी के रूप में स्वीकार किया जाए। संगठन ने यह भी प्रस्ताव दिया कि इस रकम का इस्तेमाल इलाके में बायोडायवर्सिटी पार्क बनाने के लिए किया जाए।

बाद में पूरी 5 करोड़ रुपये की मुआवजा राशि जमा कर दी गई। इसके बाद व्यक्ति विकास केंद्र ने NGT के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

कर्नाटक जमीन अतिक्रमण मामला

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कर्नाटक हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगाने के कुछ हफ्ते बाद आया है, जिसमें ‘आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन’, उससे जुड़ी संस्थाओं और अन्य लोगों पर बड़े पैमाने पर जमीन पर कब्जा करने के आरोपों की जांच के लिए एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) बनाने का सरकारी आदेश दिया गया था।

3 अगस्त को जस्टिस ई.एस. इंदिरेश ने ‘वेद विज्ञान महा विद्या पीठ ट्रस्ट’ (जो ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ से जुड़ी संस्था है) की याचिका पर एक अंतरिम आदेश पारित किया। इस ट्रस्ट ने SIT बनाने के 17 जुलाई, 2026 के सरकारी आदेश को चुनौती दी थी।

SIT को कग्गलिपुरा गांव के सर्वे नंबर 46 और आस-पास के इलाकों में कथित कब्जे की जांच का काम सौंपा गया था। इसमें कई अधिकारी शामिल थे, जिनमें बेंगलुरु डिवीजन के रीजनल कमिश्नर और रेवेन्यू डिपार्टमेंट के कानूनी सलाहकार के तौर पर काम कर रहे एक रिटायर्ड जिला जज शामिल थे।

SIT के खिलाफ तर्क

याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट श्रीरंगा एस. ने तर्क दिया कि ट्रस्ट और ‘आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन’ ने अपनी जमीन की ‘पोडी’ और ‘हुदबस्त’ (यानी सीमा तय करने और सर्वे) के लिए कई बार रेवेन्यू अधिकारियों से संपर्क किया था, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

याचिकाकर्ता ने कहा कि बिना जमीन की सीमाएं तय किए और कानून के मुताबिक संयुक्त सर्वे कराए सरकार यह नहीं कह सकती कि सरकारी जमीन पर अतिक्रमण हुआ है।

एडवोकेट सुमना नागानंद के जरिए दायर याचिका में SIT बनाने के कानूनी आधार को चुनौती दी गई। इसमें तर्क दिया गया कि कर्नाटक लैंड रेवेन्यू एक्ट, 1964 की धारा 195 सरकारी अधिकारियों को अपनी शक्तियां दूसरों को सौंपने की इजाजत तो देती है, लेकिन SIT बनाने का अधिकार नहीं देती।

याचिका में ‘कर्नाटक लैंड ग्रैबिंग प्रोहिबिशन एक्ट, 2011’ की धारा 8 का भी हवाला दिया गया। इसमें कहा गया कि यह कानून को लागू करने और उसका कामकाज देखने के लिए तहसीलदार के पद से नीचे के अधिकारी की नियुक्ति की इजाजत तो देता है, लेकिन सरकार को कोई जांच एजेंसी बनाने का अधिकार नहीं देता।

याचिकाकर्ता ने SIT में ‘शिरास्तेदारों’ (Shirastedars) को शामिल करने पर भी आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि कानून तहसीलदार के पद से नीचे के अधिकारियों की नियुक्ति की इजाजत नहीं देता। साथ ही, एक रिटायर्ड जिला जज को “लिटिगेशन मैनेजमेंट कंसल्टेंट” के तौर पर नियुक्त करने पर भी सवाल उठाए गए।

उचित प्रक्रिया पर सवाल

याचिका में दलील दी गई कि कर्नाटक लैंड ग्रैबिंग प्रोहिबिशन एक्ट के तहत बनाई गई विशेष अदालत के पास जमीन अतिक्रमण के मामलों पर सुनवाई शुरू करने का अधिकार है। इसके बावजूद सरकार ने उस अदालत में कार्रवाई शुरू किए बिना ही SIT का गठन कर दिया।

याचिका में रीजनल कमिश्नर अमलान आदित्य बिस्वास को SIT का प्रमुख बनाए जाने पर भी सवाल उठाया गया। सरकार के आदेश में बिस्वास की एक रिपोर्ट का हवाला दिया गया था। उन्होंने 7 जुलाई को सरकार को पत्र लिखकर कहा था कि ट्रस्ट और अन्य लोगों ने प्रथम दृष्टया सरकारी जमीन पर अतिक्रमण किया है।

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि जिस अधिकारी ने पहले ही अतिक्रमण की बात कही है, उसी को SIT का प्रमुख बनाना पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण है।

सरकार के आदेश में सितंबर 2025 में हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच के एक आदेश का भी हवाला दिया गया था। इस आदेश में अधिकारियों को कथित अतिक्रमण के मामले में कानून के मुताबिक कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया था। हालांकि, याचिकाकर्ता ने दलील दी कि इसके बाद की कार्रवाई में कानूनी प्रक्रिया का ठीक से पालन नहीं किया गया।

कर्नाटक हाई कोर्ट को यह भी बताया गया कि कथित जमीन अतिक्रमण के मामले में ट्रस्ट के एक पदाधिकारी के खिलाफ आपराधिक मामला पहले से अदालत में लंबित है।

कर्नाटक का यह मामला SIT के गठन की वैधता और जमीन से जुड़े आरोपों की जांच में राज्य सरकार की ओर से अपनाई गई प्रक्रिया से जुड़ा है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट में दायर अपील का मामला 2016 के वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल के दौरान यमुना के बाढ़ क्षेत्र को कथित नुकसान के लिए आर्ट ऑफ लिविंग की जिम्मेदारी से जुड़ा था।

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