मतदाताओं का नहीं पार्टियों का प्रदर्शन है

असल में कुछ प्रक्रियागत मामलों में चुनाव आयुक्तों की असहमति थी, जिसे उन्होंने जाहिर किया और आयोग ने उसे ठीक किया। जब इसकी रिपोर्ट मीडिया में आई तो विपक्ष ने इसको अपने लिए अवसर मान कर प्रदर्शन शुरू कर दिया। यह विशुद्ध रूप से एक राजनीतिक आंदोलन है, जो राजनीतिक दलों द्वारा प्रायोजित है और विपक्षी राजनीतिक दलों के फायदे के लिए है। आम मतदाता भी इस बात को समझ रहा है।

महात्मा गांधी की जयंती यानी दो अक्टूबर पर देश के कई हिस्सों में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन हुए। हाल के महीनों में दूसरी बार राजनीतिक दलों और गैर राजनीतिक संगठनों ने सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन किया। दिल्ली से मुंबई तक खूब शोरगुल हुआ। लेकिन जून और जुलाई में दिल्ली के जंतर मंतर पर चले 36 दिन के आंदोलन और गांधी जयंती पर हुए इस आंदोलन में एक बुनियादी अंतर है, जो अलग अलग जगहों पर प्रदर्शनों में दिख भी रहा है। 20 जून से शुरू होकर 25 जुलाई तक जंतर मंतर पर चला आंदोलन पेपर लीक से प्रभावित हुए छात्रों और उनके समर्थन में उतरे एक नए संगठन कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी का था। बाद में लेफ्ट पार्टियों और समाजवादी पार्टी के अलावा शरद पवार की एनसीपी और उद्धव ठाकरे की शिव सेना के नेता भी इसमें शामिल हुए थे। लेकिन बुनियादी रूप से वह आंदोलन प्रभावित छात्रों का था, जिनकी संख्या बहुत बड़ी थी।

गौरतलब है कि 2026 की नीट परीक्षा करीब 24 लाख छात्रों ने दी थी, जो पेपर लीक होने और दोबारा परीक्षा होने से प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुए थे। उसी समय कई और परीक्षाओं में गड़बड़ी की खबरें आई थीं, जिनसे प्रभावितों की संख्या बहुत बड़ी हो गई थी। तभी उस आंदोलन का आयाम बहुत बड़ा हो गया था। हजारों लोग हर दिन प्रदर्शन में शामिल हो रहे थे और लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों लोग हर दिन डिजिटल माध्यम से उस आंदोलन से जुड़ रहे थे। लोगों का एक भावनात्मक लगाव आंदोलन से दिख रहा था। आंदोलन की जगह पर मीडिया और सोशल मीडिया के लोग जब किसी से बात करते थे तो वह प्रभावित परिवार का हिस्सा निकलता था। प्रभावित छात्र या उसके परिजन आंदोलन में शामिल थे इसलिए उसकी तीव्रता बहुत ज्यादा थी। उसमें आक्रोश भी बहुत ज्यादा था।

तभी सरकार ने छात्रों व युवाओं की भावनाओं को समझा और उस हिसाब से कार्रवाई की। सरकार ने दो बड़े मंत्रियों को भेज कर बात कराई, सोनम वांगचुक का अनशन समाप्त कराया और छात्रों की सारी मांगें मान कर आंदोलन खत्म कराया।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए अभी जो आंदोलन हो रहा है वह बुनियादी रूप से छात्रों व युवाओं को आंदोलन से भिन्न है। यह प्रभावित पक्ष का आंदोलन नहीं है। इसमें ऐसे लोग नहीं दिख रहे हैं, जिनके वोट कट गए हैं। याद करें कैसे जंतर मंतर पर आंदोलन के दौरान उन छात्रों की तस्वीरें रखी गई थीं, जिन्होंने पेपर लीक के बाद सुसाइड किया था। उनके परिजनों को आंदोलन में आमंत्रित किया गया था। इस बार का आंदोलन चाहे दिल्ली का जंतर मंतर हो या मुंबई का शिवाजी पार्क कहीं भी प्रभावित लोग नहीं दिखे।

प्रदर्शनकारियों ने ऐसे लोगों को मंच पर नहीं प्रस्तुत किया, जिनका नाम कट गया है। अगर यह आंदोलन मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में नाम काटे जाने के खिलाफ है तो इसमें अनिवार्य रूप से उन लोगों को शामिल होना चाहिए, जिनके नाम कटे हैं। हालांकि यह जरूरी नहीं है कि हर बार प्रभावित पक्ष ही आंदोलन करे। कई बार प्रभावित पक्ष ऐसा करने में सक्षम नहीं होता है तो उसकी लड़ाई सिविल सोसायटी या राजनीतिक दल लड़ते हैं। लेकिन जब प्रभावितों की संख्या करोड़ों में हो और मुद्दा राजनीतिक अधिकार का हो तब निश्चित रूप से प्रभावित लोग इसमें शामिल होते हैं।

मिसाल के तौर पर राजधानी दिल्ली में 47 लाख लोगों के नाम कटे हैं। दिल्ली में एसआईआर से पहले 1.45 करोड़ मतदाता थे, जिनमें से अब 97 लाख ही मतदाता बचे हैं। अगर दिल्ली के साथ एनसीआर मिला लें यानी नोएडा, गाजियाबाद और गुरुग्राम को जोड़ दें तो नाम कटने वालों की संख्या एक करोड़ के करीब पहुंच जाएगी। अगर इनमें से एक फीसदी आदमी भी आंदोलन करने उतरे तो वह संख्या एक लाख होगी। लेकिन दो अक्टूबर को दिल्ली के आंदोलन में 10 हजार लोग नहीं जुटे, जबकि आम आदमी पार्टी और लेफ्ट की तीनों पार्टियों ने भीड़ जुटाने के लिए पूरा जोर लगाया था। लेफ्ट की तीन पार्टियों के छात्र संगठन लगे हुए थे और परदे के पीछे से कांग्रेस के छात्र संगठन के लोग भी जुटे थे। फिर भी भीड़ नहीं जुटी, जबकि जून और जुलाई में हुए आंदोलन में बिना किसी प्रयास के लोग जुट रहे थे।

जाहिर है वोट कटने वाले आंदोलन से आम आदमी का जुड़ाव नहीं बन रहा है। जबकि यह एक राजनीतिक मुद्दा है। यह महंगाई या बेरोजगारी की तरह कोई सार्वभौमिक मुद्दा नहीं है, बल्कि व्यक्ति के राजनीतिक अधिकार से जुड़ा मुद्दा है और व्यापक रूप से वैयक्तिक है। तभी इस मुद्दे को लेकर हो रहे आंदोलन में प्रभावितों को शामिल होना चाहिए था, जो नहीं हो रहे हैं। इसका अर्थ है कि यह कोई वास्तविक मुद्दा नहीं है, बल्कि राजनीतिक दलों द्वारा गढ़ा गया एक मुद्दा है, जिसका मकसद धारणा को प्रभावित करना है।

पहले दिन से यह स्पष्ट दिख रहा है कि एसआईआर के खिलाफ आंदोलन स्वंयस्फूर्त नहीं है, बल्कि राजनीतिक दलों द्वारा प्रायोजित है, जिसका उद्देश्य देश में एक झूठा नैरेटिव स्थापित करना है। राहुल गांधी ने पिछले साल जून में बिहार में एसआईआर शुरू होने के बाद इसके खिलाफ 16 दिन तक यात्रा की थी। उसी समय उनको लग गया था कि इससे जनता का कनेक्ट नहीं है। बाद में नतीजों से यह प्रमाणित भी हुआ। तभी उन्होंने यह मुद्दा छोड़ दिया था। कॉकरोच जनता पार्टी के दिल्ली के सफल आंदोलन के बाद राहुल गांधी को यह चिंता सताने लगी है कि राजनीति में नई शक्तियों का उदय हो रहा है।

जिस तरह से आम आदमी पार्टी ने दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस को रिप्लेस किया और टीवीके ने तमिलनाडु में डीएमके व अन्ना डीएमके दोनों को रिप्लेस किया उस तरह किसी नई शक्ति के उभरने और किसी अन्य राज्य में कांग्रेस को रिप्लेस करने का खतरा भी कांग्रेस को दिख रहा है। इसलिए भी वह ऐसे गढ़े हुए मुद्दों पर आंदोलन कर रही है या उसमें शामिल हो रही है ताकि प्रासंगिकता बनी रहे।

वास्तविकता यह है कि एसआईआर का मुद्दा आम आदमी का मुद्दा है ही नहीं। यह राजनीतिक दलों का मुद्दा है, जो अपनी लगातार हो हार का ठीकरा चुनाव आयोग पर फोड़ना चाहती हैं। विपक्षी पार्टियों की हार राजनीतिक कारणों से है। उनकी संगठनात्मक क्षमता कमजोर होने और नेतृत्व की कमी से उनकी हार हो रही है। लेकिन अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने और खुद को दिलासा देने के लिए वे चुनाव आयोग को निशाना बना रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि एसआईआर की प्रक्रिया में कानूनी और तकनीकी वजहों से कुछ ऐसे लोगों के नाम कटे होंगे, जो वास्तव में मतदाता हैं। लेकिन उनकी संख्या बहुत कम है और उनके पास नाम जुड़वाने के विकल्प हैं। जितनी संख्या में विपक्ष दावा कर रहा है अगर उतनी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम कटे होते तो अब तक देश में क्रांति हो गई होती।

चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर एक अंग्रेजी अखबार की जिस रिपोर्ट के बाद से नए सिरे से आंदोलन शुरू हुए हैं वह रिपोर्ट भी तकनीकी और कानूनी असंगति को ज्यादा दिखाती है। उसमें भी यह कहीं नहीं कहा गया है कि दोनों चुनाव आयुक्त एसआईआऱ के फैसले से सहमत नहीं हैं। एसआईआर का फैसला पूर्ण चुनाव आयोग का संपूर्ण सहमति से किया गया फैसला है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट की भी मुहर है। चुनाव आय़ोग संविधान से मिले अधिकार के तहत ही यह काम कर रहा है। असल में कुछ प्रक्रियागत मामलों में चुनाव आयुक्तों की असहमति थी, जिसे उन्होंने जाहिर किया और आयोग ने उसे ठीक किया। जब इसकी रिपोर्ट मीडिया में आई तो विपक्ष ने इसको अपने लिए अवसर मान कर प्रदर्शन शुरू कर दिया। यह विशुद्ध रूप से एक राजनीतिक आंदोलन है, जो राजनीतिक दलों द्वारा प्रायोजित है और विपक्षी राजनीतिक दलों के फायदे के लिए है। आम मतदाता भी इस बात को समझ रहा है। इसलिए वह इन प्रदर्शनों में शामिल नहीं हो रहा है।  (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)

अस्पताल से डिस्चार्ज होकर राजघाट पहुंचे सोनम वांगचुक, बोले- बापू का शांति का रास्ता आज भी सबसे प्रासंगिक

sonam wangchuk on rajghat

एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक सोमवार को गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद अपनी पत्नी गीतांजलि आंग्मो के साथ सीधे दिल्ली के राजघाट पहुंचे और महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि दी। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि शांति के रास्ते हर हल मुमकिन है। बापू का रास्ता आज भी प्रासंगिक है। ALSO READ: बिहार छात्र आंदोलन पर AK-47 से फायरिंग करने वाला सिपाही सस्पेंड, भाजपा सांसद संबित पात्रा घिरे

 

वांगचुक ने कहा कि 26 दिन के अनशन और इस आंदोलन के अंत पर मैं सबसे पहले बापू को याद करने के लिए राजघाट आना चाहता था। मैं देश को बताना चाहता था कि उनका बताया गया रास्ता आज भी उतना ही उपयुक्त है जितना 100 साल पहले था।

उन्होंने कहा कि मेरी समझ है कि ये तरीके जनता के दिल तक संदेश पहुंचाते हैं। इस बार मुझे यह तसल्ली हुई कि यह देश के स्तर पर प्रासंगिक है। मैं लोगों से कहता हूं कि वे बापू द्वारा शांति के मार्ग पर चलकर ही अपनी बात रखें। मैं सभी नागरिकों को बधाई देता हूं। ALSO READ: जंतर-मंतर प्रदर्शन के बाद CJP का पार्टी वीडियो वायरल, फंडिंग पर उठे सवाल; क्या बोले तवलीन सिंह और सौरव दास?

 

वीडियो संदेश में क्या बोले सोनम वांगचुक

अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद वांगचुक ने एक वीडियो संदेश जारी कर अपनी सेहत की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वह अब काफी बेहतर महसूस कर रहे हैं। वह धीरे-धीरे भोजन कर रहे हैं और उनके शरीर में ताकत लौट रही है। उन्होंने अपने स्वास्थ्य लाभ के लिए डॉक्टरों और अस्पताल स्टाफ को भी धन्यवाद दिया।

वांगचुक ने लद्दाख के आंदोलन को मिले व्यापक समर्थन के लिए जनता का धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि यह सभी के सामूहिक प्रयासों का परिणाम है। उन्होंने लोगों की एकजुटता और अपनी आवाज उठाने की सराहना की। वांगचुक ने अपने संदेश में आंदोलन की सफलता का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि यह जीत उन सभी की है जिन्होंने इस मुहिम में साथ दिया।

 

गौरतलब है कि सीजेपी के आंदोलन की सबसे अहम कड़ी सोनम वांगचुक का अनशन ही था। सोनम वांगचुक की 26 दिनों की भूख हड़ताल ने बड़ी संख्या में युवाओं को जंतर मंतर की ओर आने के लिए प्रेरित किया। वांगचुक आ अनशन समाप्त होने के बाद धर्मेंद्र प्रधान ने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया।

क्या अब जंतर-मंतर पर नहीं दिखेंगे अभिजीत दिपके? अस्पताल से बोले- ‘सुबह-शाम चढ़ रही है आईवी ड्रिप, फिर भी धर्मेंद्र प्रधान…’

Abhijeet Dipke Diagnosed With Typhoid: ‘रोजाना सुबह-शाम ड्रिप चढ़ रही है, पर हौसला अभी भी फुल चार्ज है…’ देशव्यापी नीट प्रदर्शन की कमान संभाल रहे अभिजीत दिपके ने जब X पर अपनी ब्लड रिपोर्ट शेयर की है। उन्हें टाइफाइड हो गया है। हालांकि, इसके बावजूद CJP संस्थापक ने हुंकार भरी है कि बीमारी उनके आंदोलन की रफ्तार नहीं धीमी कर सकती। उन्होंने सोशल मीडिया पर अपना हेल्थ अपडेट देते हुए साफ कर दिया है कि जब तक केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान अपने पद से इस्तीफा नहीं दे देते, तब तक उनका यह छात्र आंदोलन बिना रुके जारी रहेगा।

X पर वीडियो मैसेज शेयर कर बताया हेल्थ अपडेट

अभिजीत दिपके ने आज शनिवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक वीडियो पोस्ट कर अपने समर्थकों और छात्रों को अपनी सेहत की जानकारी दी। उन्होंने कहा, ‘जैसा कि आप सभी जानते हैं, पिछले कुछ दिनों से मेरी तबीयत ठीक नहीं थी। अब मेरी ब्लड रिपोर्ट आ गई है और मुझे टाइफाइड की पुष्टि हुई है। मेरा इलाज चल रहा है और मुझे रोजाना सुबह और शाम आईवी ड्रिप चढ़ाई जा रही है।’

दिपके ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के लिए देश भर के छात्रों का धन्यवाद किया। उन्होंने कहा, ‘मैं देश भर में शांतिपूर्वक विरोध-प्रदर्शन कर रहे सभी ‘कॉकरोचों’ का दिल से शुक्रिया अदा करता हूं। आप लोगों ने इस आंदोलन को इतना सफल बनाया है।’

उन्होंने उम्मीद जताई कि अगर प्रदर्शन इसी तरह शांतिपूर्ण ढंग से जारी रहा, तो केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना ही पड़ेगा।

सोनम वांगचुक का अनशन खत्म, पर CJP का आंदोलन रहेगा जारी

सोनम वांगचुक द्वारा अपना 26 दिनों का भूख हड़ताल समाप्त करने पर दिपके ने राहत जताई। उन्होंने कहा, ‘हम अब बेहद खुश और टेंशन फ्री हैं कि सोनम सर ने अपनी भूख हड़ताल खत्म कर दी है। उनका जीवन इस देश के लिए बेहद कीमती है।’

वैसे उन्होंने स्पष्ट किया कि सोनम वांगचुक का अनशन भले ही खत्म हो गया हो, लेकिन जब तक शिक्षा मंत्री इस्तीफा नहीं देते, तब तक CJP का आंदोलन पूरे देश में पूरी ताकत के साथ चलता रहेगा।

‘इस्तीफा नॉन-नेगोशिएबल’- आशुतोष रांका

इस आंदोलन के नीतिगत रणनीति बनाने वाले CJP प्रवक्ता आशुतोष रांका ने भी सरकार को कड़ा संदेश दिया है। आशुतोष रांका ने X पर पोस्ट करते हुए लिखा, ‘धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा नॉन-नेगोशिएबल यानी जिस पर कोई समझौता नहीं होने वाला है। अगर सरकार इस पर ‘ना’ कहती है, तो आगे की बातचीत का कोई मतलब नहीं रह जाता।’

CJP की सरकार के सामने 3 मुख्य मांगें

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ ने केंद्र सरकार के सामने अपनी शर्तें पूरी तरह स्पष्ट कर दी हैं:

  1. शिक्षा मंत्री का इस्तीफा: केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान तुरंत अपने पद से इस्तीफा दें।
  2. कानूनी कार्रवाई न करने का लिखित भरोसा: शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों और आंदोलनकारियों पर कोई कानूनी कार्रवाई (FIR/केस) न किए जाने का लिखित आश्वासन मिले।
  3. मुआवजे की मांग: नीट पेपर लीक विवाद के बाद कथित तौर पर आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को ₹1-1 करोड़ का मुआवजा दिया जाए।

कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में कल हुई थी बैठक, आज फिर चर्चा की उम्मीद

शुक्रवार दोपहर नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह ने CJP के प्रतिनिधियों के साथ हाई-लेवल बैठक की थी। केंद्रीय मंत्रियों ने पार्टी की मांगों का अध्ययन करने और सरकार का रुख तय करने का भरोसा दिया था, जिसके बाद दोनों पक्षों के बीच आगे की वार्ता प्रस्तावित है।

आखिर किन 3 शर्तों पर मान गए सोनम वांगचुक? 26 दिन बाद अनशन खत्म करने की असल वजह तो अब सामने आई

CJP Protest update: NEET-UG 2026 परीक्षा में कथित धांधली और पेपर लीक के विरोध में 26 दिनों से अनशन पर बैठे मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने 24 जुलाई की आधी रात के बाद अपना अनशन समाप्त कर दिया है। अनशन खत्म करने के बाद वांगचुक ने अपने एक्स हैंडल पर एक वीडियो जारी कर उन तीन प्रमुख शर्तों और वजहों का खुलासा किया है जिनके आधार पर उन्होंने अपना 26 दिनों का उपवास तोड़ा है। अस्पताल के बेड से जारी 3 मिनट के इस वीडियो में वांगचुक ने बताया कि केंद्रीय मंत्रियों जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह के साथ हुई मुलाकात के बाद उन्होंने अनशन खत्म करने का फैसला लिया।

किन 3 शर्तों पर खत्म हुआ 26 दिन लंबा अनशन?

सोनम वांगचुक के मुताबिक सरकार की ओर से मिली तीन मुख्य गारंटियों के बाद ही उन्होंने अपना अनशन वापस लिया है। पहला है परीक्षा प्रणाली में जवाबदेही पर संसद में चर्चा। केंद्रीय मंत्रियों ने वांगचुक को आश्वासन दिया है कि सरकार और सभी राजनीतिक दलों के सांसद संसद में असफल हो रही परीक्षा प्रणाली और जवाबदेही के मुद्दे पर विस्तृत चर्चा करेंगे। दूसरा पीड़ित परिवारों को मुआवजा। वांगचुक के मुताबिक सरकार ने NEET परीक्षा पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले अभ्यर्थियों के पीड़ित परिवारों को पर्याप्त मुआवजा देने का आश्वासन दिया है। तीसरा शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर केस दर्ज न करना। सरकार ने वादा किया है कि जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण ढंग से विरोध प्रदर्शन कर रहे छात्रों और लोगों के खिलाफ कोई भी कानूनी मामला या केस दर्ज नहीं किया जाएगा।

पीएम मोदी ने रात में वीडियो जारी कर किया कड़े कानून का ऐलान

सोनम वांगचुक के अनशन समाप्त करने और नीट-यूजी 2026 परीक्षा में कथित अनियमितताओं को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी और युवाओं के विरोध प्रदर्शन के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी गुरुवार देर रात एक सेल्फ-रिकॉर्डेड वीडियो संदेश जारी किया। पीएम मोदी ने एक्स पर वीडियो शेयर करते हुए लिखा कि पेपर लीक करने वालों के खिलाफ 24 जुलाई की कैबिनेट बैठक में और सख्त कार्रवाई आएगी। प्रधानमंत्री ने कहा कि केंद्रीय मंत्रिमंडल एक ड्राफ्ट बिल लाएगा जिसमें दोषियों के लिए सख्त सजा और मामलों के त्वरित निपटारे के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट गठित करने का प्रावधान होगा। इसके लिए संबंधित विभागों को निर्देश जारी कर दिए गए हैं। दूसरी ओर विपक्ष संसद के जारी मानसून सत्र के भीतर और बाहर लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहा है और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तथा नीट पेपर लीक मामले पर विस्तृत चर्चा की मांग पर अड़ा हुआ है।

कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में आज सरकार और CJP के बीच वार्ता

पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक केंद्र सरकार द्वारा तटस्थ स्थल की मांग स्वीकार किए जाने के बाद शुक्रवार को दोपहर करीब 12:30 बजे दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में सरकार और CJP के बीच बातचीत तय हुई है। सीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सौरभ दास ने बताया कि वे सरकार द्वारा न्यूट्रल वेन्यू की मांग मानने के फैसले का स्वागत करते हैं। इससे पहले 20 जुलाई को सीजेपी प्रवक्ताओं (सौरभ दास और आशुतोष रंका) की केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा के आवास पर मुलाकात हुई थी। इसके बाद सीजेपी नेताओं ने आरोप लगाया था कि उन्हें वर्चुअल डिटेंशन में रखा गया था। इसके बाद से ही सीजेपी किसी मंत्री के घर या दफ्तर के बजाय केवल न्यूट्रल वेन्यू पर ही वार्ता करने की शर्त पर अड़ी थी। सीजेपी ने स्पष्ट किया है कि जब तक केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान अपना इस्तीफा नहीं दे देते, तब तक जंतर-मंतर पर उनका प्रदर्शन जारी रहेगा।

CJP की मुख्य मांगें

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा।

प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी पर जवाबदेही तय करना और शिक्षा प्रणाली में सुधार।

नीट पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को ₹1 करोड़ का मुआवजा।

आंदोलन में शामिल शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज सभी एफआईआर (FIR) और कानूनी कार्रवाई को वापस लेना।