प्राथमिकता का प्रश्न है

हालिया अनुभवों है कि ओलिंपिक आयोजन मेजबान देश में जितना उल्लास एवं गर्व का भाव भरते हैं, उससे कहीं अधिक ये विवादों से घिरते रहे हैं। ओलिंपिक्स अपने पीछे अक्सर कई गंभीर समस्याएं छोड़ जाते हैं।

अंतरराष्ट्रीय ओलिंपिक समिति (आईओसी) ने पुष्टि कर दी है कि भारत 2036 के ओलिंपिक खेलों की मेजबानी के लिए दावा पेश करने वाले देशों में शामिल है। इसके अलावा कतर, दक्षिण अफ्रीका, जर्मनी, हंगरी, तुर्किये और दक्षिण कोरिया ने भी अपना दावा रखा है। इनमें आईओसी किन्हें सक्षम दावेदार मानती है, उसकी सूची वह मार्च 2027 में जारी करेगी। फिर उस सूची में शामिल देशों के साथ उसकी वार्ता होगी। आईओसी के मुताबिक फैसला धन जुटाने की क्षमता और खेल के लिए मौजूद राजनीतिक एवं जन समर्थन की कसौटी पर होगा। 2028 के मध्य में आईओसी 2036 के मेजबान की अपनी प्राथमिकता सूची जारी करेगी। 2029 के मध्य तक अंतिम निर्णय का एलान किया जाएगा।

भारत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य के प्रमुख शहर अहमदाबाद में ओलिंपिक्स आयोजन का इरादा जताया है। नीता अंबानी भारत के दावेदारी अभियान का नेतृत्व कर रही हैं। इसलिए राजनीतिक समर्थन और फंडिंग क्षमता को लेकर शायद ही कोई संदेह उठे। जन समर्थन का मुद्दा पेचीदा है, जिस पर अभी कुछ कहना ठीक नहीं होगा। हालिया अनुभवों पर गौर करें, तो ओलिंपिक आयोजन अब मेजबान देश में जितना उत्सव एवं गर्व का भाव भरते हैं, उससे कहीं अधिक ये विवादों से घिरते रहे हैं। इसकी बड़ी वजह है कि मेजबानी अपने पीछे अक्सर शहर और देश पर भारी आर्थिक बोझ, कर्ज संकट, और रखरखाव के लिए बेकार पड़े महंगे स्टेडियम (सफेद हाथी) जैसी गंभीर समस्याएं छोड़ जाती है।

2004 में ग्रीस और 2026 में ब्राजील में इस आयोजन के कारण नागरिक सेवाओं के बजट में कटौती करनी पड़ी थी। 2020 में टोक्यो ओलिंपिक के आयोजन का कुल खर्च शुरुआती बजट से दोगुने से भी ज्यादा हो गया। उससे सबक लेकर 2024 में पेरिस में मौजूदा और अस्थायी इन्फ्रास्ट्रक्चर के उपयोग की रणनीति अपनाई गई। फिर भी खर्च अनुमानित बजट से कई अरब यूरो ऊपर चला गया। निर्माण कार्यों के लिए गरीबों का होने वाला विस्थापन हर जगह एक अलग समस्या रही है। जब धनी देशों की भी यही कहानी है, तो सवाल है कि क्या भारत जैसे विकासशील देश को ऐसे आयोजन को प्राथमिकता देनी चाहिए?