पाकिस्तान के खजाने में अचानक 3 अरब डॉलर बढ़े:विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड 26 अरब डॉलर पहुंचा; इसमें कमाई कम, कर्ज ज्यादा

पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार में एक हफ्ते में 3 अरब डॉलर से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है। 11 सितंबर तक स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान के पास विदेशी मुद्रा भंडार का 21.39 अरब डॉलर पहुंच गया। यह बैंक के इतिहास का सबसे ऊंचा स्तर है। स्टेट बैंक और दूसरे बैंकों को मिलाकर पाकिस्तान का कुल विदेशी मुद्रा भंडार 26.79 अरब डॉलर हो गया है। यह सितंबर 2021 के बाद सबसे ज्यादा है। हालांकि, इस अचानक बढ़ोतरी की बड़ी वजह विदेशी कर्ज है। पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय बाजार से रकम जुटाने के लिए यूरोबॉन्ड जारी किया था। इससे उसके रिजर्व में बड़ी मात्रा में डॉलर जुड़े। यानी रिजर्व में आया यह पैसा पूरी तरह नई कमाई नहीं है। शहबाज बोले- रिजर्व बढ़ना आर्थिक नीतियों की सफलता प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने विदेशी मुद्रा भंडार के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने पर वित्त मंत्री मोहम्मद औरंगजेब, स्टेट बैंक के गवर्नर जमील अहमद और अपनी आर्थिक टीम की तारीफ की। उन्होंने विदेशों में रहने वाले पाकिस्तानियों को भी इस उपलब्धि में योगदान के लिए धन्यवाद दिया। शहबाज ने कहा कि स्टेट बैंक के पास रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा भंडार सरकार की आर्थिक टीम की लगातार मेहनत का नतीजा है। उन्होंने इसे इस बात का संकेत बताया कि सरकार की आर्थिक नीतियां सही दिशा में आगे बढ़ रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान के अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाजार में दोबारा लौटने से दुनिया के निवेशकों का भरोसा उसकी अर्थव्यवस्था पर बढ़ रहा है। यूरोबॉन्ड से मुद्रा भंडार बढ़ा 11 सितंबर को खत्म हुए हफ्ते में पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार में 3.06 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई। स्टेट बैंक के मुताबिक, इसका मुख्य कारण यूरोबॉन्ड से मिली रकम थी। यूरोबॉन्ड विदेशी बाजार से कर्ज लेने के लिए जारी किया जाने वाला एक तरह का बॉन्ड है। इसे खरीदने वाले निवेशक सरकार को पैसा देते हैं। सरकार तय समय के बाद यह रकम ब्याज के साथ वापस करती है। पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरोबॉन्ड जारी कर रकम जुटाई और उसे अपने विदेशी मुद्रा भंडार में शामिल कर लिया। इसलिए रिजर्व बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि पाकिस्तान ने एक हफ्ते में इतनी नई कमाई कर ली। डॉलर फिलहाल उसके पास जरूर हैं, लेकिन उनका एक बड़ा हिस्सा कर्ज के रूप में आया है। इससे पाकिस्तान को अभी विदेशी भुगतान करने के लिए ज्यादा गुंजाइश मिल गई है। लेकिन आगे इसी कर्ज को चुकाने के लिए उसे फिर विदेशी मुद्रा जुटानी होगी। अभी पाकिस्तान के पास कितने डॉलर हैं? एक हफ्ते पहले कुल रिजर्व 23.72 अरब डॉलर था। यानी सिर्फ सात दिन में इसमें करीब 3.08 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई। कुल रिजर्व सितंबर 2021 के करीब 27.1 अरब डॉलर के स्तर से अभी थोड़ा कम है। हालांकि, अकेले स्टेट बैंक के पास मौजूद 21.39 अरब डॉलर अब तक का सबसे ज्यादा रिजर्व है। रिजर्व बढ़ने से पाकिस्तान को क्या फायदा? विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ने का मतलब है कि पाकिस्तान के पास अब डॉलर का बड़ा बफर है। इन डॉलर का इस्तेमाल वह तेल, मशीनरी, कच्चा माल और दूसरी जरूरी चीजें खरीदने में कर सकता है। विदेशी कर्ज की किस्त और ब्याज चुकाने के लिए भी डॉलर की जरूरत होती है। पाकिस्तान का कुल 26.79 अरब डॉलर का रिजर्व करीब तीन महीने के आयात खर्च के बराबर है। इसका मतलब मौजूदा रिजर्व करीब तीन महीने के औसत आयात बिल के बराबर है। इसका यह मतलब नहीं कि पाकिस्तान तीन महीने तक बिना कोई नया डॉलर कमाए काम चला सकता है। विदेशों में काम करने वाले पाकिस्तानियों से भी मदद मिली पाकिस्तान के लिए विदेशों में काम करने वाले लोगों से आने वाला पैसा यानी रेमिटेंस भी विदेशी मुद्रा का बड़ा स्रोत है। अगस्त में पाकिस्तान को करीब 3.66 अरब डॉलर की रेमिटेंस मिली। जुलाई में यह रकम करीब 3.63 अरब डॉलर थी। इसी दौरान पाकिस्तान का बाकी दुनिया के बीच लेन-देन में घाटा भी सिर्फ 9.8 करोड़ डॉलर रहा। जुलाई में यह घाटा 44.5 करोड़ डॉलर था। यानी जुलाई के मुकाबले अगस्त में स्थिति बेहतर हुई, लेकिन घाटा अभी भी बना हुआ है। पाकिस्तान अभी भी आयात पर ज्यादा डॉलर खर्च कर रहा अगस्त में पाकिस्तान ने करीब 6.64 अरब डॉलर का सामान और सेवाएं आयात कीं, जबकि उसका निर्यात करीब 3.33 अरब डॉलर रहा। यानी पाकिस्तान विदेशों से जितने डॉलर का सामान और सेवाएं खरीद रहा है, उतने डॉलर वह बेचकर नहीं कमा पा रहा। जुलाई-अगस्त 2026 में पाकिस्तान का कुल घाटा करीब 54.3 करोड़ डॉलर रहा। पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में यह 85.3 करोड़ डॉलर था। इससे पता चलता है कि बाहरी खाते की स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन पाकिस्तान की विदेशी मुद्रा की जरूरत अभी भी काफी ज्यादा है। अब सबसे बड़ी चुनौती रिजर्व को बनाए रखना पाकिस्तान के लिए अब सिर्फ विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाना ही काफी नहीं होगा। उसे आने वाले महीनों में इसे बनाए रखना भी होगा। इसके लिए तीन चीजें अहम रहेंगी: खासकर तेल की कीमत बढ़ने पर पाकिस्तान का आयात बिल बढ़ सकता है। इससे उसके विदेशी मुद्रा भंडार पर फिर दबाव पड़ेगा। पाकिस्तान का खजाना भरा, फिर भी विदेशी कर्ज की जरूरत रिकॉर्ड रिजर्व के बावजूद पाकिस्तान को पुराने कर्ज चुकाने हैं। सितंबर से दिसंबर 2026 के बीच उसे IMF को कई भुगतान करने हैं। साथ ही, पाकिस्तान दूसरे देशों और संस्थानों से भी विदेशी मुद्रा जुटाने के रास्ते खुले रखना चाहता है। रॉयटर्स के मुताबिक, पाकिस्तान चीन के साथ 30 अरब युआन की मुद्रा स्वैप व्यवस्था को 2027 में बढ़ाने पर विचार कर रहा है। इसके तहत जरूरत पड़ने पर दोनों देशों को एक-दूसरे की मुद्रा उपलब्ध कराई जा सकती है। वहीं, पाकिस्तान अमेरिका के साथ 10 अरब डॉलर की एक्सचेंज स्टेबिलाइजेशन सुविधा को लेकर भी बातचीत कर रहा है। इसका इस्तेमाल विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ने की स्थिति में किया जा सकता है। इसके अलावा पाकिस्तान का 7 अरब डॉलर का IMF कार्यक्रम भी जारी है। ——————– यह खबर भी पढ़ें… पाकिस्तान के बाद बांग्लादेश में भी तुर्किये की ड्रोन यूनिट पाकिस्तान के बाद अब तुर्किये बांग्लादेश में भी अपनी रक्षा तकनीक का दायरा बढ़ा रहा है। दोनों देश मिलकर ड्रोन बनाने की तैयारी कर रहे हैं। पूरी खबर पढ़ें…

पाकिस्तान में आत्मघाती हमले में अब तक 31 की मौत:100 से ज्यादा लोग घायल; विस्फोटक से भरी गाड़ी मस्जिद से टकराई थी

पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा के कोहाट में मस्जिद के पास पुलिस परिसर पर हुए आत्मघाती हमले में मरने वालों की संख्या 31 हो गई है। मृतकों में 16 पुलिसकर्मी शामिल हैं। हमले में 100 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं, जिनमें कई की हालत गंभीर बताई जा रही है। हमला शुक्रवार दोपहर हुआ। उस समय पुलिसकर्मी और उनके परिवार के लोग मस्जिद में नमाज पढ़ रहे थे। आत्मघाती हमलावर विस्फोटकों से भरी कार लेकर पहुंचे थे और कार मस्जिद की दीवार से टकराकर धमाका कर दिया था। पुलिस और हमलावरों के बीच गोलीबारी हुई एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के मुताबिक, कुछ हमलावर अभी भी परिसर की स्पेशल ब्रांच की इमारत में छिपे हुए हैं। पुलिस और उनके बीच रात में गोलीबारी भी हुई। फिलहाल यह नहीं बताया गया कि कितने हमलावरों ने हमला किया था। शुक्रवार को 6 आतंकियों के मारे जाने की जानकारी सामने आई थी। धमाके से मस्जिद और दूसरी इमारतों को नुकसान पहुंचा तेज धमाके से मस्जिद और परिसर की दूसरी इमारतों को काफी नुकसान पहुंचा है। मस्जिद की दीवारें गिर गईं थी और कुछ लोग मलबे में दब गए थे। घटनास्थल से सामने आई तस्वीरों में बड़ी संख्या में ईंट-पत्थर और टूटी हुई दीवारें दिखाई दीं। पुलिस मुख्यालय में कई अहम विभागों के दफ्तर जहां हमला हुआ वह कोई सामान्य पुलिस चौकी नहीं थी। कोहाट का ओल्ड पुलिस लाइंस परिसर जिला स्तर का बड़ा पुलिस मुख्यालय है। यहां आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई करने वाला काउंटर टेररिज्म डिपार्टमेंट (CTD), स्पेशल ब्रांच और पुलिस की दूसरी इकाइयों के दफ्तर हैं। यही वजह है कि हमलावरों ने पुलिस परिसर को निशाना बनाया। हमले की जिम्मेदारी को लेकर अलग-अलग दावा हमले के बाद इत्तेहाद-उल-मुजाहिदीन पाकिस्तान नाम के संगठन ने इसकी जिम्मेदारी लेने का दावा किया है। यह संगठन हाफिज गुल बहादुर से जुड़े गुट के नेतृत्व वाला बताया जा रहा है। शुरुआती रिपोर्टों में एक अन्य संगठन की ओर से भी जिम्मेदारी लेने का दावा सामने आया था। इसलिए हमले के पीछे किस गुट की भूमिका थी, इसे लेकर अभी अलग-अलग दावे हैं। पाकिस्तान के अधिकारियों ने बढ़ रहे आतंकी हमलों के लिए अफगानिस्तान से सक्रिय आतंकियों को जिम्मेदार ठहराया है। हालांकि, अफगान की तालिबान सरकार इन आरोपों से इनकार करती रही है। पाकिस्तान में इस साल 990 आतंकी हमले हुए पाकिस्तान में इस साल आतंकी घटनाओं में तेजी आई है। पाकिस्तान इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट एंड सिक्योरिटी स्टडीज (PICSS) के मुताबिक, जनवरी से अगस्त 2026 तक पूरे पाकिस्तान में 990 मिलिटेंट हमले दर्ज किए गए। इनमें 1126 लोगों की जान चली गई। अगस्त में सबसे ज्यादा 199, जबकि जुलाई में 144 हमले दर्ज किए गए थे। यानी एक महीने में 38% बढ़ोतरी। इनमें अगस्त में 158 लोगों की मौत हुई, जबकि जुलाई में हमलों से जुड़ी 268 मौतें दर्ज की गई थीं। ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स में पाकिस्तान दूसरे नंबर पर ——————– ये खबर भी पढ़ें… पाकिस्तान के बाद बांग्लादेश में भी तुर्किये की ड्रोन यूनिट: भारत की सीमा से सिर्फ 75km दूर पाकिस्तान के बाद अब तुर्किये बांग्लादेश में भी अपनी डिफेंस इंडस्ट्री का दायरा बढ़ा रहा है। बांग्लादेश और तुर्किये अब मिलकर ड्रोन बनाने की तैयारी में हैं। पूरी खबर यहां पढ़ें…

पाकिस्तान में आत्मघाती हमले में अब तक 31 की मौत:100 से ज्यादा लोग घायल; विस्फोटक से भरी गाड़ी मस्जिद से टकराई थी

पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा के कोहाट में मस्जिद के पास पुलिस परिसर पर हुए आत्मघाती हमले में मरने वालों की संख्या 31 हो गई है। मृतकों में 16 पुलिसकर्मी शामिल हैं। हमले में 100 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं, जिनमें कई की हालत गंभीर बताई जा रही है। हमला शुक्रवार दोपहर हुआ। उस समय पुलिसकर्मी और उनके परिवार के लोग मस्जिद में नमाज पढ़ रहे थे। आत्मघाती हमलावर विस्फोटकों से भरी कार लेकर पहुंचे थे और कार मस्जिद की दीवार से टकराकर धमाका कर दिया था। पुलिस और हमलावरों के बीच गोलीबारी हुई एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के मुताबिक, कुछ हमलावर अभी भी परिसर की स्पेशल ब्रांच की इमारत में छिपे हुए हैं। पुलिस और उनके बीच रात में गोलीबारी भी हुई। फिलहाल यह नहीं बताया गया कि कितने हमलावरों ने हमला किया था। शुक्रवार को 6 आतंकियों के मारे जाने की जानकारी सामने आई थी। धमाके से मस्जिद और दूसरी इमारतों को नुकसान पहुंचा तेज धमाके से मस्जिद और परिसर की दूसरी इमारतों को काफी नुकसान पहुंचा है। मस्जिद की दीवारें गिर गईं थी और कुछ लोग मलबे में दब गए थे। घटनास्थल से सामने आई तस्वीरों में बड़ी संख्या में ईंट-पत्थर और टूटी हुई दीवारें दिखाई दीं। पुलिस मुख्यालय में कई अहम विभागों के दफ्तर जहां हमला हुआ वह कोई सामान्य पुलिस चौकी नहीं थी। कोहाट का ओल्ड पुलिस लाइंस परिसर जिला स्तर का बड़ा पुलिस मुख्यालय है। यहां आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई करने वाला काउंटर टेररिज्म डिपार्टमेंट (CTD), स्पेशल ब्रांच और पुलिस की दूसरी इकाइयों के दफ्तर हैं। यही वजह है कि हमलावरों ने पुलिस परिसर को निशाना बनाया। हमले की जिम्मेदारी को लेकर अलग-अलग दावा हमले के बाद इत्तेहाद-उल-मुजाहिदीन पाकिस्तान नाम के संगठन ने इसकी जिम्मेदारी लेने का दावा किया है। यह संगठन हाफिज गुल बहादुर से जुड़े गुट के नेतृत्व वाला बताया जा रहा है। शुरुआती रिपोर्टों में एक अन्य संगठन की ओर से भी जिम्मेदारी लेने का दावा सामने आया था। इसलिए हमले के पीछे किस गुट की भूमिका थी, इसे लेकर अभी अलग-अलग दावे हैं। पाकिस्तान के अधिकारियों ने बढ़ रहे आतंकी हमलों के लिए अफगानिस्तान से सक्रिय आतंकियों को जिम्मेदार ठहराया है। हालांकि, अफगान की तालिबान सरकार इन आरोपों से इनकार करती रही है। पाकिस्तान में इस साल 990 आतंकी हमले हुए पाकिस्तान में इस साल आतंकी घटनाओं में तेजी आई है। पाकिस्तान इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट एंड सिक्योरिटी स्टडीज (PICSS) के मुताबिक, जनवरी से अगस्त 2026 तक पूरे पाकिस्तान में 990 मिलिटेंट हमले दर्ज किए गए। इनमें 1126 लोगों की जान चली गई। अगस्त में सबसे ज्यादा 199, जबकि जुलाई में 144 हमले दर्ज किए गए थे। यानी एक महीने में 38% बढ़ोतरी। इनमें अगस्त में 158 लोगों की मौत हुई, जबकि जुलाई में हमलों से जुड़ी 268 मौतें दर्ज की गई थीं। ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स में पाकिस्तान दूसरे नंबर पर ——————– ये खबर भी पढ़ें… पाकिस्तान के बाद बांग्लादेश में भी तुर्किये की ड्रोन यूनिट: भारत की सीमा से सिर्फ 75km दूर पाकिस्तान के बाद अब तुर्किये बांग्लादेश में भी अपनी डिफेंस इंडस्ट्री का दायरा बढ़ा रहा है। बांग्लादेश और तुर्किये अब मिलकर ड्रोन बनाने की तैयारी में हैं। पूरी खबर यहां पढ़ें…

बांग्लादेश-तुर्किये मिलकर ड्रोन फैक्ट्री बनाएंगे, तकनीक भी ट्रांसफर होगी:बोगुरा में बनेगी यूनिट, यह भारत की सीमा सिर्फ 75 किमी दूर

पाकिस्तान के बाद अब तुर्किये बांग्लादेश में भी अपनी डिफेंस इंडस्ट्री का दायरा बढ़ा रहा है। बांग्लादेश और तुर्किये अब मिलकर ड्रोन बनाने की तैयारी में हैं। दोनों देशों की साझेदारी से बोगुरा में ड्रोन फैक्ट्री बनाई जाएगी। इस ड्रोन फैक्ट्री की लागत 25 हजार करोड़ रुपए है। तुर्किये बांग्लादेश को ड्रोन बनाने की तकनीक भी देगा। बोगुरा भारत की सीमा से करीब 75 किमी दूर है। फैक्ट्री के पास एयरफोर्स का नया एयरबेस भी बनेगा बोगुरा बांग्लादेश के उत्तरी हिस्से में है। यहां जिस इलाके में फैक्ट्री की योजना है, उसके पास ही बांग्लादेश एयरफोर्स का नया एयरबेस विकसित किया जा रहा है। बोगुरा एयरपोर्ट को भी अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक अपग्रेड करने की योजना है। भारत के लिहाज से इसकी अहमियत इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि बांग्लादेश की करीब 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा भारत से लगती है। भास्कर एक्सपर्ट अविनाश मोहनानी, आईबी के पूर्व संयुक्त निदेशक के मुताबिक, भारत की सबसे लंबी लगभग चार हजार किमी लंबी सीमा बांग्लादेश से लगती है। ये भारत के किसी भी पड़ोसी देश के साथ सबसे लंबी बॉर्डर है। साथ ही ये दुनिया में किन्हीं भी दो देशों के बीच की 5वीं सबसे लंबी भू-सीमा मानी जाती है। भारत के नजरिये से देखें तो बांग्लादेश के तुर्किये से डिफेंस गठजोड़ से पूर्वोत्तर के राज्यों में खतरा बढ़ेगा। बांग्लादेश का भारत से लगती सीमा पर ड्रोन की तैनाती का प्लान भी है। बांग्लादेश सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान वाले मक्का रक्षा करार में भी एंट्री चाहता है। पाक इसमें मध्यस्थ के रोल में है। तुर्किये ने ड्रोन तकनीक को कई देशों तक पहुंचाया तुर्किये की पहचान दुनिया में उसके सैन्य ड्रोन कार्यक्रम से बनी है। इनमें बायरक्तार TB2 प्रमुख है। तुर्किये ने ड्रोन तकनीक को कई देशों तक पहुंचाया है। बांग्लादेश के साथ भी ड्रोन सहयोग पिछले कुछ समय में दोनों देशों के रक्षा रिश्तों का अहम हिस्सा बना है। द डिप्लोमैट ने जून 2026 में रिपोर्ट किया था कि दोनों देशों के बीच सहयोग का केंद्र ड्रोन हैं और सैन्य उपकरणों के संयुक्त उत्पादन पर भी चर्चा चल रही है। बांग्लादेश पहले से तुर्किये के बनाए सैन्य उपकरणों का इस्तेमाल करता है। इनमें ओटोकर के COBRA सीरीज के बख्तरबंद वाहन भी शामिल हैं। ओटोकर के मुताबिक COBRA II का इस्तेमाल दुनिया के 20 से ज्यादा देशों की सेनाएं करती हैं। तुर्किये की ड्रोन बनाने वाली कंपनी पाकिस्तान में भी है तुर्किये और पाकिस्तान के बीच भी ड्रोन और रक्षा तकनीक पर सहयोग लगातार बढ़ा है। तुर्किये की ड्रोन बनाने वाली कंपनी बायकर पाकिस्तान में पहले से मौजूद है। 2023 में बायकर की पाकिस्तानी सहायक कंपनी ने नेशनल एयरोस्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी पार्क (NASTP) में रिसर्च एंड डेवलपमेंट गतिविधियों के लिए समझौता किया था। पाकिस्तान और तुर्किये ने एयरोस्पेस, ड्रोन और रक्षा उत्पादन में संयुक्त उपक्रम और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर भी बातचीत की है। बांग्लादेश में तुर्किये के 12 कल्चरल सेंटर बनें बांग्लादेश में 6 महीने के दौरान तुर्किये के 12 कल्चरल सेंटर बन गए हैं। कट्टरपंथी छात्र शिबिर और जमात-ए-इस्लामी के साथ चल रहे इन सेंटरों में भारत विरोधी एजेंडे पर जोर दिया जा रहा है। ढाका में यूनुस एम्रे इंस्टीट्यूट और एक समर्पित तुर्की कल्चरल सेंटर स्थापित करने की तैयारी चल रही है। तुर्किये की सरकार की ‘तुर्किये स्कॉलरशिप्स’ प्रोग्राम में इस साल बांग्लादेश के 3 हजार छात्रों को तुर्किये में उच्च शिक्षा के लिए भेजा जा चुका है। ————————- ये खबर भी पढ़ें… सऊदी को F-35 फाइटर जेट देगा अमेरिका: ट्रम्प की ₹2.3 लाख करोड़ की डील को मंजूरी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सऊदी अरब को 48 F-35 फाइटर जेट बेचने की मंजूरी दे दी है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

बांग्लादेश-तुर्किये मिलकर ड्रोन फैक्ट्री बनाएंगे, तकनीक भी ट्रांसफर होगी:बोगुरा में बनेगी यूनिट, यह भारत की सीमा सिर्फ 75 किमी दूर

पाकिस्तान के बाद अब तुर्किये बांग्लादेश में भी अपनी डिफेंस इंडस्ट्री का दायरा बढ़ा रहा है। बांग्लादेश और तुर्किये अब मिलकर ड्रोन बनाने की तैयारी में हैं। दोनों देशों की साझेदारी से बोगुरा में ड्रोन फैक्ट्री बनाई जाएगी। इस ड्रोन फैक्ट्री की लागत 25 हजार करोड़ रुपए है। तुर्किये बांग्लादेश को ड्रोन बनाने की तकनीक भी देगा। बोगुरा भारत की सीमा से करीब 75 किमी दूर है। फैक्ट्री के पास एयरफोर्स का नया एयरबेस भी बनेगा बोगुरा बांग्लादेश के उत्तरी हिस्से में है। यहां जिस इलाके में फैक्ट्री की योजना है, उसके पास ही बांग्लादेश एयरफोर्स का नया एयरबेस विकसित किया जा रहा है। बोगुरा एयरपोर्ट को भी अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक अपग्रेड करने की योजना है। भारत के लिहाज से इसकी अहमियत इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि बांग्लादेश की करीब 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा भारत से लगती है। भास्कर एक्सपर्ट अविनाश मोहनानी, आईबी के पूर्व संयुक्त निदेशक के मुताबिक, भारत की सबसे लंबी लगभग चार हजार किमी लंबी सीमा बांग्लादेश से लगती है। ये भारत के किसी भी पड़ोसी देश के साथ सबसे लंबी बॉर्डर है। साथ ही ये दुनिया में किन्हीं भी दो देशों के बीच की 5वीं सबसे लंबी भू-सीमा मानी जाती है। भारत के नजरिये से देखें तो बांग्लादेश के तुर्किये से डिफेंस गठजोड़ से पूर्वोत्तर के राज्यों में खतरा बढ़ेगा। बांग्लादेश का भारत से लगती सीमा पर ड्रोन की तैनाती का प्लान भी है। बांग्लादेश सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान वाले मक्का रक्षा करार में भी एंट्री चाहता है। पाक इसमें मध्यस्थ के रोल में है। तुर्किये ने ड्रोन तकनीक को कई देशों तक पहुंचाया तुर्किये की पहचान दुनिया में उसके सैन्य ड्रोन कार्यक्रम से बनी है। इनमें बायरक्तार TB2 प्रमुख है। तुर्किये ने ड्रोन तकनीक को कई देशों तक पहुंचाया है। बांग्लादेश के साथ भी ड्रोन सहयोग पिछले कुछ समय में दोनों देशों के रक्षा रिश्तों का अहम हिस्सा बना है। द डिप्लोमैट ने जून 2026 में रिपोर्ट किया था कि दोनों देशों के बीच सहयोग का केंद्र ड्रोन हैं और सैन्य उपकरणों के संयुक्त उत्पादन पर भी चर्चा चल रही है। बांग्लादेश पहले से तुर्किये के बनाए सैन्य उपकरणों का इस्तेमाल करता है। इनमें ओटोकर के COBRA सीरीज के बख्तरबंद वाहन भी शामिल हैं। ओटोकर के मुताबिक COBRA II का इस्तेमाल दुनिया के 20 से ज्यादा देशों की सेनाएं करती हैं। तुर्किये की ड्रोन बनाने वाली कंपनी पाकिस्तान में भी है तुर्किये और पाकिस्तान के बीच भी ड्रोन और रक्षा तकनीक पर सहयोग लगातार बढ़ा है। तुर्किये की ड्रोन बनाने वाली कंपनी बायकर पाकिस्तान में पहले से मौजूद है। 2023 में बायकर की पाकिस्तानी सहायक कंपनी ने नेशनल एयरोस्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी पार्क (NASTP) में रिसर्च एंड डेवलपमेंट गतिविधियों के लिए समझौता किया था। पाकिस्तान और तुर्किये ने एयरोस्पेस, ड्रोन और रक्षा उत्पादन में संयुक्त उपक्रम और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर भी बातचीत की है। बांग्लादेश में तुर्किये के 12 कल्चरल सेंटर बनें बांग्लादेश में 6 महीने के दौरान तुर्किये के 12 कल्चरल सेंटर बन गए हैं। कट्टरपंथी छात्र शिबिर और जमात-ए-इस्लामी के साथ चल रहे इन सेंटरों में भारत विरोधी एजेंडे पर जोर दिया जा रहा है। ढाका में यूनुस एम्रे इंस्टीट्यूट और एक समर्पित तुर्की कल्चरल सेंटर स्थापित करने की तैयारी चल रही है। तुर्किये की सरकार की ‘तुर्किये स्कॉलरशिप्स’ प्रोग्राम में इस साल बांग्लादेश के 3 हजार छात्रों को तुर्किये में उच्च शिक्षा के लिए भेजा जा चुका है। ————————- ये खबर भी पढ़ें… सऊदी को F-35 फाइटर जेट देगा अमेरिका: ट्रम्प की ₹2.3 लाख करोड़ की डील को मंजूरी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सऊदी अरब को 48 F-35 फाइटर जेट बेचने की मंजूरी दे दी है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

आज का एक्सप्लेनर:चप्पल-लुंगी वाले हूती लड़ाके कौन, जिन्होंने सऊदी का F-15 जेट गिरा दिया; पाक-अमेरिका तक इनसे दूर क्यों भाग रहे

पैरों में हवाई चप्पल, कमर में लुंगी, मुंह में कात दबाए हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब का F-15 फाइटर जेट गिरा दिया है। वो भी अपनी देसी बैलिस्टिक मिसाइल से। यमन की सऊदी समर्थित सेना की बख्तरबंद गाड़ियां छीन लीं और निशाना चूकी DF-15 मिसाइल भी उठा ले गए। हूतियों के हमले से इस्लाम का सबसे पवित्र शहर मक्का तक हाई अलर्ट पर है। आखिर कौन हैं ये हूती लड़ाके और चाहते क्या हैं, सऊदी जैसा अमीर और ताकतवर देश इन विद्रोहियों के आगे बेबस क्यों नजर आ रहा; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: चप्पल और लुंगी पहने ये हूती लड़ाके आखिर हैं कौन?
जवाबः यमन की कुल 4 करोड़ की आबादी में करीब 35% जैदी शिया हैं। इन्हीं शियाओं का हथियारबंद समूह और राजनीतिक ऑर्गेनाइजेशन है हूती… सवाल-2: सऊदी पर हमला क्यों कर रहे हूती, कितना नुकसान किया?
जवाबः हालिया लड़ाई की शुरुआत बीती 5 अगस्त से हुई… सऊदी अरब ने कहा कि 15-16 सितंबर की रात हूतियों ने पवित्र शहर मक्का को टारगेट करके ड्रोन अटैक किया था। इसे मक्का में घुसने से पहले ही मार गिराया गया। हालांकि हूतियों ने मक्का को निशाना बनाने से इनकार किया। 16 सितंबर को हूती सैन्य प्रवक्ता याह्या सारेया ने कहा, ‘अल्लाह की मदद से यमन की सशस्त्र सेना ने मारिब प्रांत में सऊदी अरब को अमेरिका से मिले F-15 फाइटर जेट को स्वदेशी तौर पर बनाई मिसाइल से मार गिराया है।’ हूतियों ने इसका एक वीडियो भी जारी किया है… सऊदी अरब या अमेरिका ने जेट गिराने के दावे पर अब तक कोई बयान नहीं दिया है। सवाल-3: अमीर और ताकतवर सऊदी अरब बेबस क्यों नजर आ रहा है?
जवाबः इसकी 3 बड़ी वजहें हैं- 1. सऊदी समर्थित फौजों में तालमेल नहीं, हूतियों की मजबूत तैयारी 2. सऊदी में इंटरसेप्टर मिसाइल और एयर डिफेंस की कमी 3. ईरान जंग में फंसा अमेरिका एक और जंग नहीं चाहता ट्रम्प के इनकार करने के बाद सऊदी ने इजराइल से खुफिया जानकारी और दूसरी सैन्य मदद मांगी, ताकि बाब अल-मंदेब पर हूतियों का कब्जा रोका जा सके, जबकि सऊदी और इजराइल के बीच सीधे राजनयिक संबंध नहीं हैं। वहीं, पाकिस्तान और तुर्किये, सऊदी के साथ मक्का पैक्ट होने के बावजूद उसे सीधी सैन्य मदद के बजाय हूतियों से बातचीत करवाने में मध्यस्थता करने का प्रस्ताव दे रहे हैं। सवाल-4: पाकिस्तान, सऊदी अरब की सैन्य मदद क्यों नहीं कर रहा?
जवाब: 10 सितंबर को पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सज्जाद हैदर खान ने कहा, ‘सऊदी पर हूतियों के हमले के खिलाफ मक्का पैक्ट के तहत कोई कार्रवाई करने को लेकर अब तक कोई बातचीत नहीं हुई है। जब वक्त आएगा, तब कदम उठाएंगे।’ पाकिस्तान के इस रुख के पीछे 3 वजहें हैं…
1. साझा सैन्य कमांड का कोई ढांचा नहींः तुर्किये के डिप्लोमैट रहे मुस्तफा एनेस एसेन के मुताबिक, ‘मक्का पैक्ट तब तक सिर्फ प्रतीकात्मक है, जब तक इसका एक जॉइंट सैन्य कमांड स्ट्रक्चर नहीं बनता। तुर्किये और पाकिस्तान, ईरान या भारत से सीधे टकराव में शामिल नहीं होंगे। 2. मध्यस्थ की भूमिका को खतराः पाकिस्तान अमेरिका-ईरान जंग में मध्यस्थता की भूमिका निभा रहा है। उसने ईरान से हूतियों पर लगाम कसने के लिए कहा और सऊदी पर हमलों की निंदा भी की। लेकिन इससे आगे बढ़ा, तो पाकिस्तान की मध्यस्थता वाली भूमिका खतरे में पड़ सकती है। 3. शिया-सुन्नी की लड़ाई में नहीं उलझना चाहताः पाकिस्तान भले सुन्नी बहुल मुल्क हो, लेकिन शियाओं की भी बड़ी आबादी है। 2015 में सऊदी ने यमन में हूतियों के खिलाफ जंग में मदद मांगी, तो पाकिस्तान ने सैन्य दखल से इनकार कर दिया था। तब के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा था, ‘हम किसी सांप्रदायिक जंग का हिस्सा नहीं बनना चाहते, क्योंकि इसकी दरारें पाकिस्तान के अंदर भी नजर आएंगी।’
—– ये खबर भी पढ़ें… होर्मुज के बाद अब दूसरे तेल रूट पर संकट:अल मंदेब पर हूती विद्रोहियों का कब्जा; कहा- सऊदी अरब के अलावा किसी का जहाज नहीं रोकेंगे होर्मुज स्ट्रेट के बाद अब एक और समुद्री ऑयल रूट बाब अल-मंदेब स्ट्रेट संकट में है। यमन के हूती विद्रोहियों ने यहां कब्जे का एलान किया है। पूरी खबर पढ़ें…

ट्रम्प सरकार ने हूती विद्रोहियों से सीक्रेट डील की:अमेरिकी जहाजों पर हमला नहीं करेंगे हूती लड़ाके, बदले में सऊदी की मदद नहीं करेगा अमेरिका

अमेरिकी अधिकारियों ने ओमान में हूती नेताओं से मुलाकात की। इसके बदले में ट्रम्प प्रशासन ने यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ सऊदी अरब को सैन्य मदद नहीं देने का फैसला किया है। ब्रिटिश अखबार द गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक हूतियों ने अमेरिका को भरोसा दिलाया है कि 2025 में दोनों पक्षों के बीच हुआ सीजफायर अभी कायम है और वे लाल सागर में अमेरिकी या अंतरराष्ट्रीय जहाजों को निशाना नहीं बनाएंगे। हालांकि, सऊदी अरब से जुड़े जहाजों और सऊदी तेल ले जाने वाले जहाजों को वे अपना लक्ष्य मानते हैं। उपराष्ट्रपति वेंस बोले- हम हूतियों के साथ सीधे संपर्क में अमेरिकी अधिकारियों ने पिछले हफ्ते में ओमान की राजधानी मस्कट के अमेरिकी दूतावास में हूती नेताओं के साथ बैठक की। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने सोमवार को पुष्टि की कि अमेरिका हूतियों के साथ सीधे संपर्क में है। अमेरिका ने मार्च 2025 में हूतियों को विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित किया था। इसके बावजूद हाल के महीनों में अमेरिकी अधिकारियों ने हूती नेताओं के अलावा हमास, हिजबुल्लाह और ईरान के प्रतिनिधियों से भी बातचीत की है। सऊदी अरब को अकेले लड़ना पड़ सकता है पिछले हफ्ते हूतियों ने यमन के पश्चिमी हिस्से में लाल सागर के तट से लगे बड़े इलाके पर कब्जा कर लिया। इसके बाद सऊदी अरब ने अमेरिका से मदद की उम्मीद की थी। अमेरिका ने हूती गतिविधियों को बाब अल-मंदब जलडमरूमध्य से नौवहन की स्वतंत्रता के लिए खतरा बताया है, लेकिन अभी तक सऊदी अरब के समर्थन में सीधे सैन्य कार्रवाई नहीं की है। इसकी एक वजह यह भी है कि अमेरिका पहले से ईरान के साथ महंगे और संसाधन खपाने वाले संघर्ष में उलझा हुआ है। ईरान हूतियों का समर्थन करता है। यमन में अमेरिका के पूर्व उप राजदूत नबील खौरी ने कहा कि ट्रम्प प्रशासन और हूतियों के बीच एक तरह की ‘मौन समझ’ बनी है। खौरी के मुताबिक, हूतियों ने अमेरिका को भरोसा दिलाया है कि अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय जहाजों की लाल सागर में आवाजाही प्रभावित नहीं होगी। उनके अनुसार खतरा मुख्य रूप से सऊदी जहाजों या सऊदी तेल ले जाने वाले जहाजों को है। सऊदी ने कहा- मक्का की ओर ड्रोन भेजा गया सऊदी अरब ने मंगलवार को दावा किया कि हूतियों ने पवित्र शहर मक्का की ओर ड्रोन भेजा था। सऊदी रक्षा बलों ने इसे नष्ट करने की बात कही। सऊदी गठबंधन के प्रवक्ता मेजर जनरल तुर्किये अल-मलिकी के मुताबिक, ड्रोन को स्थानीय समयानुसार शाम करीब 6:50 बजे मक्का के प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र के पास रोका गया। सऊदी अरब ने कहा कि मक्का पर किसी भी तरह का हमला ‘रेड लाइन’ है। यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार और 57 देशों के संगठन ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (OIC) ने भी इस दावे की निंदा की। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इसे ‘घिनौना और जघन्य’ हमला बताया। हूतियों ने सऊदी के आरोप को ‘सदी का सबसे बड़ा झूठ’ बताया हूती नेतृत्व ने सऊदी अरब के दावे को खारिज कर दिया। हूतियों ने इसे ‘सदी का सबसे बड़ा झूठ’ बताते हुए कहा कि इस तरह के दावों से पहले भी लोगों को गुमराह करने की कोशिश की गई है। हूती उप विदेश मंत्री अब्दुल वहीद अबू रास ने उल्टा सऊदी अरब पर मक्का और मदीना जैसे पवित्र स्थलों को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया। हूतियों ने सऊदी F-15 गिराने का भी दावा किया हूतियों ने दावा किया कि उन्होंने मारिब के पास सऊदी अरब का F-15 लड़ाकू विमान गिराया है। साथ ही लाल सागर के बंदरगाह शहर यानबू में सऊदी तेल कंपनी अरामको के एक संयंत्र पर हमला करने का दावा किया। हालांकि, हूती सैन्य प्रवक्ता ने इन दावों के समर्थन में कोई सबूत पेश नहीं किया। हूती वार्ता टीम के प्रमुख मोहम्मद अब्दुल सलाम ने कहा कि F-15 गिराने का दावा पश्चिमी देशों के लिए चेतावनी है कि वे सऊदी ‘प्रचार’ का शिकार न बनें। सऊदी अरब पाकिस्तान और तुर्किये से मदद मांग रहा हूती राजनीतिक ब्यूरो के सदस्य मोहम्मद अल-फराह ने कहा कि सऊदी अरब यमन में मुश्किल स्थिति में है। उनके मुताबिक, सऊदी अरब ने युद्ध और नाकेबंदी के बावजूद अपने लक्ष्य हासिल नहीं किए। उन्होंने दावा किया कि अब सऊदी अरब पाकिस्तान, तुर्किये, अमेरिका, इजराइल और मिस्र से समर्थन मांग रहा है और मक्का पर हमले के दावे के जरिए मुस्लिम देशों को अपने साथ लामबंद करने की कोशिश कर रहा है। अमेरिका-इजराइल समेत अरब देशों के सैन्य प्रमुखों की गुप्त बैठक इस बीच, इजराइली अधिकारियों ने अमेरिका, इजराइल और कई अरब देशों के सैन्य अधिकारियों की जर्मनी में हुई एक गुप्त बैठक की जानकारी लीक की है। एक्सिओस के पत्रकार बराक रैविड के मुताबिक, अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रमुख एडमिरल ब्रैड कूपर ने पिछले सप्ताह यह बैठक आयोजित की थी। बैठक में इजराइल, सऊदी अरब, UAE, बहरीन, कुवैत, कतर, जॉर्डन और मिस्र के सैन्य प्रमुख शामिल हुए। रिपोर्ट के मुताबिक, छह महीने से ज्यादा समय पहले अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने के बाद यह इस तरह की पहली बैठक थी। इजराइल, जिसे पहले हूती हमलों का सामना करना पड़ा था, अब सऊदी अरब की ओर से यमन में हस्तक्षेप करने की पेशकश कर रहा है। UN में लाल सागर बंद करने की कोशिश की निंदा मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक में लाल सागर को बंद करने की किसी भी कोशिश की निंदा की गई। बैठक में रूस के रुख में भी बदलाव के संकेत मिले। रूसी प्रतिनिधि ने पहले जहां यमन में अदन स्थित अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार को ही एकमात्र वैध सरकार माना था, अब उससे कुछ दूरी बनाते हुए नजर आए। चीन पहुंचा ईरान, होर्मुज पर समर्थन की कोशिश बुधवार को ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने बीजिंग में चीन के विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात की। बातचीत में होर्मुज जलडमरूमध्य के भविष्य के प्रशासन को लेकर ईरान की योजनाओं पर समर्थन हासिल करने की कोशिश की गई। ईरान और अमेरिका की अलग-अलग नाकेबंदी के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य अभी बंद है। चीन ने कहा कि वह नहीं चाहता कि क्षेत्रीय तनाव यमन और लाल सागर तक फैले। बीजिंग ने अमेरिका से जून में दोनों देशों के बीच हुए समझौते के आधार पर बातचीत फिर शुरू करने की अपील की। चीन ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है और चाहता है कि क्षेत्र में जल्द कोई समझौता हो।

रिपोर्ट- पाकिस्तान ने सऊदी की मदद करने से इनकार किया:हूती विद्रोहियों के हमले के बाद सऊदी ने इजराइल से मदद मांगी

यमन के लाल सागर तट और बाब अल-मंदेब स्ट्रेट के बड़े इलाके पर हूती विद्रोहियों के कब्जे के बाद सऊदी अरब बड़े संकट में है। यरुशलम पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब के मक्का रक्षा गठबंधन के साथी पाकिस्तान ने यमन में लड़ने के लिए अपनी सेना या सैन्य संसाधन भेजने से इनकार कर दिया है। पाकिस्तान ने कहा है कि उसकी सेना सऊदी अरब की जमीन की रक्षा के लिए तैनात की जा सकती है, लेकिन वह किसी दूसरे देश की जमीन पर युद्ध में शामिल नहीं होगी। इसके बाद सऊदी अरब ने हूती सैन्य कार्रवाई से निपटने के लिए अब इजराइल से खुफिया मदद मांगी है। यह बातचीत अमेरिका की मध्यस्थता में हुई। खास बात यह है कि सऊदी अरब इजराइल को स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता नहीं देता। उसके इजराइल के साथ राजनयिक संबंध भी नहीं हैं। इसके बावजूद रियाद ने इजराइल से मदद मांगी है। पाकिस्तान-सऊदी ने अगस्त में रक्षा समझौता साइन किया था ‘एक पर हमला, मतलब तीनों पर हमला।’ इसी सिद्धांत के साथ पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने 7 अगस्त को ‘मक्का जॉइंट डिफेंस पैक्ट’ पर साइन किया था। तीनों देशों के बीच इस समझौते को कई जानकारों ने ‘मुस्लिम नाटो’ की दिशा में एक अहम कदम माना था। इसकी वजह यह थी कि यह समझौता NATO की तरह सदस्य देशों के बीच सामूहिक सुरक्षा सहयोग बढ़ाने की बात करता है। इसके तहत जरूरत पड़ने पर तीनों देश एक-दूसरे की सैन्य मदद करेंगे, आधुनिक हथियारों की संयुक्त खरीद करेंगे, रक्षा तकनीक साझा करेंगे और सुरक्षा से जुड़े मामलों में मिलकर काम करेंगे। इसके अलावा पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच सामूहिक आत्मरक्षा की अलग संधि भी है। इसके बावजूद हूती हमले के बाद पाकिस्तान ने सऊदी को सेना मदद देने से साफ इनकार कर दिया। अमेरिका और ब्रिटेन ने भी नहीं की सऊदी की मदद यमन में हूती विद्रोहियों के हमले और तेजी से बढ़ते कब्जे ने सऊदी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब अब मदद के लिए अपने सहयोगी देशों से संपर्क कर रहा है। पाकिस्तान के अलावा अमेरिका और ब्रिटेन ने भी यमन में हूती संगठन के खिलाफ सीधे हमले करने से इनकार कर दिया है। अमेरिका ने खुफिया मदद देने की पेशकश की है, जबकि ब्रिटेन सैन्य सलाहकार देने की बात कह रहा है। इजराइली अखबार इजराइल हायोम के मुताबिक, सऊदी क्राउन प्रिंस और प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान ने हूतियों के हमलों से निपटने के लिए दूसरे खाड़ी देशों और मिस्र से भी मदद मांगी है। हूती विद्रोहियों ने लाल-सागर में दो और द्वीपों पर कब्जा किया यमन के हूती विद्रोहियों ने दक्षिणी लाल सागर में दो और अहम द्वीपों पर कब्जा कर लिया है। यमन सरकार के मुताबिक हूतियों ने ग्रेटर हनीश और लेसर हनीश द्वीपों पर अपने लड़ाके तैनात किए हैं। ये द्वीप बाब-अल मंदेब स्ट्रेट से करीब 160 किमी उत्तर में हैं। इससे पहले पिछले हफ्ते हूतियों ने लाल सागर के किनारे बसे बंदरगाह शहर मोखा और बाब-अल मंदेब में मौजूद मायून द्वीप पर भी कब्जा किया था। इन दोनों जगहों पर सऊदी अरब के समर्थन वाली यमनी सरकारी सेना का नियंत्रण था। हूतियों के इन द्वीपों पर कब्जे से लाल सागर के समुद्री रास्ते पर उनका दबदबा और मजबूत हो गया है। बाब-अल-मंदेब एशिया से यूरोप जाने वाले जहाजों के लिए शॉर्टकट रास्ता है। यहां से गुजरने के बाद जहाज स्वेज नहर के रास्ते भूमध्य सागर तक पहुंचते हैं। बाब अल-मंदेब बंद हुआ तो जहाजों को लेना पड़ेगा लंबा रास्ता अगर बाब अल-मंदेब के पास तनाव बढ़ा और जहाजों की आवाजाही बंद हुई, तो एशिया और यूरोप के बीच चलने वाले जहाजों को अफ्रीका के चारों ओर घूमकर जाना पड़ेगा। अभी जहाज लाल सागर और स्वेज नहर के रास्ते जाते हैं। यह रास्ता बंद होने पर उन्हें अफ्रीका के दक्षिणी छोर से केप ऑफ गुड होप के रास्ते जाना होगा। इससे जहाजों को हजारों किलोमीटर ज्यादा दूरी तय करनी पड़ेगी और सफर में कई दिन ज्यादा लगेंगे। इससे ईंधन और शिपिंग का खर्च बढ़ेगा। लंबे समय तक रास्ता बंद रहा तो सामान पहुंचने में देरी हो सकती है। तेल, पेट्रोल-डीजल और दूसरी आयातित चीजों की कीमतें बढ़ सकती हैं। इसका असर भारत में आयात लागत और महंगाई पर भी पड़ सकता है। 12 साल से चल रही हैं यमन में लड़ाई यमन में सरकार और हूतियों के बीच करीब 12 साल से लड़ाई चल रही है। सऊदी अरब यमन की सरकार का समर्थन करता है, जबकि हूतियों को ईरान का समर्थन मिलता है। 2022 में दोनों पक्षों के बीच सीजफायर हुआ था। इसके बाद बड़े पैमाने पर लड़ाई काफी कम हो गई थी। अब हूतियों की बढ़त के बाद यमन में फिर बड़े गृहयुद्ध का खतरा पैदा हो गया है। —————— यह खबर भी पढ़ें… हूती विद्रोहियों की पसंदीदा गाड़ी बनी टोयोटा हिलक्स: इस पर मशीनगन-रॉकेट लॉन्चर लगाना आसान, 45 साल से दुनियाभर के आतंकियों की पहचान बनी यमन के लाल सागर तट पर पिछले हफ्ते हूती लड़ाकों का बड़ा काफिला नजर आया। इसमें बड़ी संख्या में टोयोटा हिलक्स पिकअप शामिल थीं। कई गाड़ियों पर मशीनगन और रॉकेट लॉन्चर लगे थे। पूरी खबर पढ़ें…

ब्रिक्स की इकोनॉमी अमेरिका से 3 गुना बड़ी:10 साल बाद भारत में साथ दिखेंगे मोदी-पुतिन-जिनपिंग; 20 देशों के नेता भी होंगे शामिल

BRICS समिट शनिवार से नई दिल्ली में शुरू होने जा रहा है। भारत में होने वाले BRICS समिट में 10 साल बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक साथ नजर आएंगे। तीनों नेता इससे पहले 2016 में गोवा में हुए BRICS समिट में एक साथ शामिल हुए थे। समिट में BRICS के 11 सदस्य देशों के अलावा 10 पार्टनर देशों के नेता भी शामिल होंगे। BRICS की ताकत को सिर्फ सदस्य देशों की संख्या से नहीं, बल्कि उनकी आबादी और अर्थव्यवस्था से भी समझा जा सकता है। 11 सदस्य देशों में दुनिया की करीब 49.5% आबादी रहती है। यानी दुनिया के लगभग हर दो में से एक व्यक्ति BRICS देशों में रहता है। अर्थव्यवस्था की बात करें तो PPP यानी खरीदने की क्षमता के आधार पर BRICS देशों की कुल अर्थव्यवस्था दुनिया की करीब 39% है। यह अमेरिका की अर्थव्यवस्था के मुकाबले करीब 3 गुना है। PM मोदी 4 वर्ल्ड लीडर्स से मिलेंगे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार को कई विदेशी नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठक करेंगे। जिनपिंग का गलवान हिंसा के बाद पहला भारत दौरा चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग 7 साल बाद भारत आ रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी मुलाकात 2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत में पहली आमने-सामने की बैठक होगी। गलवान के बाद करीब 4 साल तक LAC पर दोनों देशों के बीच तनाव रहा। अब भारत और चीन LAC से लेकर कारोबार तक 6 बड़े मुद्दों पर काम कर रहे हैं। इनमें सीमा विवाद सबसे अहम मुद्दा है। दोनों देश सीमा विवाद पर एक विशेषज्ञ समूह बनाने पर सहमत हुए हैं। इसके अलावा सीमा पर 2 अतिरिक्त सैन्य संपर्क केंद्र और पूर्वी व मध्य सेक्टर में 2 सैन्य हॉटलाइन बनाने पर भी सहमति बनी है। अब इन फैसलों को दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व की मंजूरी मिलनी है। दूसरा बड़ा मुद्दा दोनों देशों के बीच कारोबार है। 2025-26 में भारत ने चीन से करीब 11.4 लाख करोड़ रुपए का सामान आयात किया। इससे भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा 8.6 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा रहा। पश्चिमी देशों के लिए BRICS की बढ़ती चुनौती BRICS देश अब आपस में कारोबार करते समय डॉलर का इस्तेमाल कम करने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए वे एक-दूसरे की अपनी-अपनी करेंसी में लेन-देन बढ़ाना चाहते हैं। साथ ही, अलग-अलग देशों के ऑनलाइन पेमेंट सिस्टम को आपस में जोड़ने पर भी काम हो रहा है। हालांकि, अभी BRICS का अपना कोई एक पेमेंट सिस्टम या एक साझा करेंसी नहीं है। इस साल भारत की अध्यक्षता में होने वाले BRICS समिट में भी अपनी करेंसी में कारोबार और आसान ऑनलाइन पेमेंट पर जोर दिया जाएगा। भारत चाहता है कि BRICS देशों के डिजिटल पेमेंट सिस्टम और उनकी डिजिटल करेंसी को आपस में जोड़ा जाए। इससे एक देश से दूसरे देश में पैसे भेजना आसान हो सकता है और हर बार डॉलर की जरूरत कम हो सकती है। ब्रिक्स तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं का संगठन BRICS 11 देशों का ऐसा समूह है, जिसमें दुनिया की बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं। इसमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, UAE, सऊदी अरब और इंडोनेशिया शामिल हैं। BRICS का मकसद सदस्य देशों के बीच आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक सहयोग बढ़ाना है। शुरुआत में इसमें 4 देश थे और इसे BRIC कहा जाता था। BRIC नाम 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने दिया था। बाद में दूसरे देश जुड़ते गए और इसका नाम BRICS हो गया। भारत 2026 में BRICS समिट की अध्यक्षता कर रहा है। एक बैंक की रिपोर्ट से निकला BRICS का नाम BRICS की शुरुआत किसी सरकार ने नहीं, बल्कि एक बैंक की रिपोर्ट से हुई थी। 2001 में अमेरिकी निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने अपनी रिपोर्ट में BRIC शब्द इस्तेमाल किया। उन्होंने ब्राजील, रूस, भारत और चीन को तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाएं बताया था। तब BRIC कोई संगठन नहीं था। लेकिन बाद में ये चारों देश एक साथ आने लगे। 2006 में BRIC समूह बना और 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में इसकी पहली आधिकारिक बैठक हुई। 2010 में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने के बाद BRIC का नाम BRICS हो गया। पिछले साल ईरान, मिस्र और इथियोपिया भी इसके पूर्ण सदस्य बने। इसके साथ BRICS का दायरा और बढ़ गया। आज BRICS दुनिया के बड़े आर्थिक मंचों में शामिल है। इसके सदस्य देशों की ग्लोबल GDP में हिस्सेदारी 27% से ज्यादा है, जबकि यूरोपियन यूनियन की करीब 14% है। पाकिस्तान के चाहने के बावजूद BRICS में नहीं मिली एंट्री BRICS के विस्तार के बाद कई देशों ने इसमें शामिल होने की कोशिश की। इनमें पाकिस्तान और तुर्किये भी थे। पाकिस्तान ने 2023 में सदस्यता के लिए आधिकारिक आवेदन किया था। उसे चीन और रूस का समर्थन भी मिला, लेकिन अब तक BRICS में उसकी एंट्री नहीं हो पाई है। तुर्किये ने भी सदस्यता की कोशिश की, लेकिन उसे भी सफलता नहीं मिली। इससे सवाल उठा कि दोनों देशों की एंट्री क्यों अटकी। कई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत पाकिस्तान और तुर्की को BRICS में शामिल करने के पक्ष में नहीं था। नए सदस्य को शामिल करने के लिए सभी मौजूदा सदस्यों की सहमति जरूरी होती है। यानी किसी एक देश की आपत्ति से सदस्यता रुक सकती है। हालांकि, भारत ने आधिकारिक तौर पर पाकिस्तान की सदस्यता रोकने की बात नहीं कही है। ——————- यह खबर भी पढ़ें… BRICS में पुतिन का अमेरिका-यूरोप पर तंज: कमजोर देश खुद को G7 क्यों कहते हैं; मोदी बोले- ब्रिक्स देशों में दुनिया की 40% GDP प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन समेत ब्रिक्स लीडर्स ने शुक्रवार को ब्रिक्स बिजनेस फोरम में ग्लोबल ट्रेड पर बात की। पूरी खबर पढ़ें…

हूती विद्रोहियों ने यमन के मोखा शहर पर कब्जा किया:यह बाब अल-मंदेब से सिर्फ 75km दूर, पाकिस्तान ने ईरान को चेतावनी दी

यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने लाल सागर के रणनीतिक बंदरगाह शहर मोखा पर कब्जा कर लिया है। यह शहर बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य से करीब 75 किलोमीटर दूर है। बाब अल-मंदेब लाल सागर को अदन की खाड़ी और हिंद महासागर से जोड़ता है। यह दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। मोखा पर पहले यमनी नेशनल रेजिस्टेंस फोर्स का नियंत्रण था। यह हूतियों के खिलाफ लड़ने वाला सऊदी समर्थित गुट है। दोनों के बीच पिछले 9 दिनों से लड़ाई चल रही थी। मोखा पर कब्जे के बाद पिछले 4 साल में यह हूतियों की सबसे बड़ी क्षेत्रीय कामयाबी मानी जा रही है। अब हूती लड़ाके यमन के अहम शहर ताइज की ओर बढ़ रहे हैं। इस बीच सऊदी अरब ने पाकिस्तान के जरिए ईरान को संदेश भेजकर हूतियों को सऊदी अरब पर हमले रोकने के लिए कहने को कहा है। हालांकि, एक ईरानी अधिकारी ने कहा है कि ईरान हूतियों को कंट्रोल नहीं करता। मोखा पर कब्जे से हूतियों की पकड़ मजबूत मोखा लंबे समय से यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार के नियंत्रण में था। पिछले करीब 10 दिनों से हूती लड़ाके ताइज की पश्चिमी दिशा में लगातार आगे बढ़ रहे थे। उन्होंने रास्ते में पड़ने वाले अल-शकीरा इलाके पर भी कब्जा कर लिया। यह इलाका ताइज शहर को पश्चिमी तट से जोड़ने वाले अहम रास्ते पर है। इस पर कब्जे से हूतियों की इस इलाके में पकड़ और मजबूत हो गई। हूती पहले से ही यमन की राजधानी सना और लाल सागर के बड़े बंदरगाह होदेइदा पर नियंत्रण रखते हैं। मोखा पर कब्जे से उनके कब्जे वाले उत्तरी और पश्चिमी इलाकों के बीच संपर्क और मजबूत हुआ है। यही वजह है कि मोखा की लड़ाई को सिर्फ एक बंदरगाह शहर पर कब्जे के तौर पर नहीं देखा जा रहा। इससे यमन के पश्चिमी तट पर हूतियों की सैन्य और रणनीतिक स्थिति और मजबूत हो सकती है। बाब अल-मंदेब के करीब पहुंचे हूती, जहाजों पर बढ़ा खतरा मोखा पर कब्जे के बाद हूती बाब अल-मंदेब के और करीब पहुंच गए हैं। उन्होंने लाल सागर में मौजूद हनीश द्वीपों की ओर भी बढ़त बनाई है। धुबाब और उसके सामने मौजूद ये द्वीप बाब अल-मंदेब के बहुत करीब हैं। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अगर हूती इस इलाके में अपनी पकड़ और मजबूत करते हैं, तो लाल सागर से गुजरने वाले जहाजों पर नजर रखना और उन पर दबाव बनाना उनके लिए आसान हो सकता है। बाब अल-मंदेब समुद्र का एक संकरा रास्ता है। यहां से गुजरने वाले जहाजों को खतरा पैदा करने के लिए किसी बहुत बड़े इलाके पर कब्जा करना जरूरी नहीं है। यानी आसपास के कुछ रणनीतिक इलाकों पर पकड़ बनाकर भी हूती जहाजों के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं। पाकिस्तान बोला- सऊदी की मदद के लिए सेना नहीं भेजेंगे हूती विद्रोहियों को ईरान जबकि यमन सरकार को सऊदी अरब समर्थन दे रहे हैं। यमन में हूती हमलों के बीच पाकिस्तान ने फिलहाल सैन्य कार्रवाई से इनकार किया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सज्जाद हैदर खान ने कहा कि सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौते के तहत अभी हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई पर कोई चर्चा नहीं हो रही है। उन्होंने कहा, अभी ऐसी कोई बात चर्चा में नहीं है। जब समय आएगा, तब समझौते के तहत कार्रवाई की जाएगी। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय का यह बयान रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के एक दिन पहले दिए बयान के बाद आया है। आसिफ ने कहा था कि अगर यमन का संघर्ष सऊदी अरब तक पहुंचता है, तो पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच हुआ रक्षा समझौता लागू हो सकता है। 7 अगस्त को पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच हुए रक्षा समझौते के तहत किसी एक देश पर हमला होने पर बाकी दोनों देश उसकी सुरक्षा में मदद करेंगे। यमन में फिर क्यों तेज हुई लड़ाई यमन में हूतियों और अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार के बीच गृहयुद्ध 2014 में शुरू हुआ था। 2022 में संयुक्त राष्ट्र की कोशिशों से दोनों पक्षों के बीच संघर्षविराम हुआ। हालांकि लेकिन दोनों के बीच कोई स्थायी शांति समझौता नहीं हो सका। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ईरान के अमेरिका के साथ चल रहे संघर्ष में उलझे होने का असर यमन पर भी पड़ रहा है। ऐसे में यमन सरकार हूतियों के कब्जे वाले इलाकों को वापस लेना चाहती है। वहीं, हूती लाल सागर के किनारे और बाब अल-मंदेब के आसपास अपनी पकड़ और मजबूत करना चाहते हैं। यही वजह है कि अब मोखा, ताइज और होदेइदा के आसपास लड़ाई तेज हो गई है। पिछले कुछ दिनों में दोनों पक्षों के कई लड़ाके और आम लोग मारे गए हैं। हजारों लोगों को अपने घर छोड़कर दूसरी जगह जाना पड़ा है। सऊदी ने 2015 में हूती के खिलाफ जंग शुरू की हादी के पद छोड़ने के बाद से यमन पर किसी एक सरकार का कंट्रोल नहीं रह गया। इससे पड़ोस के सऊदी अरब को खतरा महसूस हुआ क्योंकि हूती का समर्थन ईरान कर रहा था। ऐसे में सऊदी ने 2015 में आठ अरब देशों के साथ मिलकर सैन्य गठबंधन बनाया और हूतियों के खिलाफ जंग शुरू कर दी। इस गठबंधन का मकसद राष्ट्रपति अब्दरब्बुह मंसूर हादी की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार को फिर सत्ता में लाना था। करीब आठ साल तक लड़ाई के बाद सऊदी अरब को समझ आ गया कि सिर्फ सैन्य ताकत से हूतियों को हराना संभव नहीं है। इसके बाद उसने बातचीत का रास्ता अपनाया और सीधे हूती नेताओं से संपर्क शुरू किया। आज उत्तरी यमन के बड़े हिस्से पर हूतियों का नियंत्रण है। वहीं दक्षिणी यमन अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार के नियंत्रण में है, लेकिन वह आर्थिक और सैन्य मदद के लिए काफी हद तक सऊदी अरब पर निर्भर है। खबर अपडेट हो रही है…