गले मिलने का दिखावा और जबकि असल ताकत?

trump and musk

भारत जैसी विश्व व्यवस्था चाहता है, वैसी खुद क्यों नहीं बनाता?…. किसी बड़े नेता तक पहुँच होने से यह पता नहीं चलता कि मुलाकात के बाद कौन-सी शर्तें कायम रहीं। असली परीक्षा तब होती है जब दोनों देशों के हित टकराते हैं। व्यक्तिगत कूटनीति तभी सार्थक होती है जब संस्थाएँ उस पहुँच को स्थायी राष्ट्रीय लाभ में बदल सकें। ऐसा नहीं होने पर गले मिलने की तस्वीर एक ऐसा विज्ञापन बन जाती है जिसके दावों को वास्तविक बातचीत और समझौतों ने अभी साबित नहीं किया है।

पश्चिमी देशों के बुद्धिजीवियों और रणनीतिक विशेषज्ञों की बैठकों में भारत की वैश्विक हैसियत पर अक्सर ऐसे चर्चा होती है, मानो दुनिया की सबसे बड़ी मेज पर उसके लिए कुर्सी रखी जानी बाकी हो। पश्चिम को भारत का महत्व स्वीकार करना चाहिए। उसकी रणनीतिक स्वायत्तता का सम्मान करना चाहिए। ऐसी शर्तें नहीं थोपनी चाहिए जिनसे एक अनिवार्य साझेदार नाराज हो जाए। मान लिया गया है कि दुनिया की बड़ी शक्तियों में भारत का शामिल होना तय है। बस यह फैसला होना बाकी है कि उसे कहाँ बैठाया जाएगा।

इस सोच में दम है। भारत का विशाल बाजार, उसकी भौगोलिक स्थिति, तकनीकी प्रतिभा और सैन्य शक्ति उसे अंतरराष्ट्रीय सौदेबाजी में पर्याप्त ताकत देते हैं। क्वाड के जरिए सहयोग, सेमीकंडक्टर क्षेत्र में निवेश और रक्षा उत्पादन में साझेदारी ऐसे साझा हित हैं जिन्हें कोई गंभीर सरकार नजरअंदाज नहीं कर सकती। पश्चिम के दोहरे मानदंडों पर भारत की आपत्तियाँ भी बेबुनियाद नहीं हैं। जो देश अपनी सुविधा के अनुसार कभी संप्रभुता का सम्मान करते हैं और कभी उसकी अनदेखी, उन्हें दूसरों को सिद्धांतों पर कायम रहने का उपदेश देने का कितना अधिकार है?

लेकिन किसी देश का अनिवार्य होना उसे दबाव से सुरक्षित नहीं बना देता। उसकी उपयोगिता सौदेबाजी में ताकत जरूर देती है, मगर यह गारंटी नहीं कि उस पर दबाव नहीं डाला जाएगा। कोई देश आपकी जरूरतों के कारण आपको गले भी लगा सकता है और आपकी कमजोरियों का फायदा उठाकर दबाव भी बना सकता है। निमंत्रण और शिकंजा, दोनों साथ आ सकते हैं।

यहीं भारत के बढ़ते वैश्विक महत्व की चमकदार कहानी भ्रामक हो जाती है। किसी ताकतवर देश के लिए उपयोगी होना और उस उपयोगिता की शर्तें स्वयं तय करने की ताकत रखना, दो अलग बातें हैं।

इस फर्क को समझने के लिए भारतीय रणनीतिकारों को विदेशों की ओर देखने की जरूरत नहीं है। अपने ही देश की कॉरपोरेट अर्थव्यवस्था में इसका उदाहरण मौजूद है।

मुंबई हवाई अड्डे का नियंत्रण जीवीके समूह से अदाणी समूह के हाथों में जाने की घटना को देखें। जीवीके के पास एक महत्वपूर्ण रणनीतिक संपत्ति थी। हवाई अड्डे के संचालन का अनुभव था। बड़े निवेशकों से संबंध थे। इसके बावजूद कर्ज, वित्तीय कठिनाइयों और जाँच एजेंसियों की कार्रवाइयों का सिलसिला उसके हवाई अड्डा कारोबार के आसपास बना। अंततः अदाणी समूह ने उसका नियंत्रण हासिल कर लिया।

बाद में जीवीके के उपाध्यक्ष ने इस बात से इनकार किया कि किसी दबाव के कारण हवाई अड्डा बेचना पड़ा। उनका यह खंडन भी घटनाक्रम का हिस्सा है। लेकिन उन परिस्थितियों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता जिनके कारण यह सौदा राजनीतिक विवाद का विषय बना। यहाँ मुद्दा सौदे को लेकर किसी एक विवादित दावे को सही या गलत ठहराना नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि किसी संपत्ति का मालिक होना कितना मायने रखता है, यदि उसे बनाए रखने के लिए जरूरी पूँजी, पहुँच या अनुमति किसी दूसरे के नियंत्रण में हो?

कंपनी की बैलेंस शीट पर अरबों की संपत्ति दिखाई दे सकती है, जबकि उसके पीछे छिपी निर्भरता नजर नहीं आती। कोई स्थापित कारोबारी तब तक सुरक्षित दिखाई देता है जब तक उसकी सुरक्षा की शर्तें नहीं बदलतीं।

संप्रभु देशों के सामने भी यही समस्या होती है। फर्क इतना है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इसके परिणाम कहीं अधिक खतरनाक हो सकते हैं। अमेरिका अपने बाजार, तकनीक, वित्तीय व्यवस्था और सुरक्षा संबंधों तक पहुँच के जरिए दूसरे देशों पर दबाव बना सकता है। जरूरी नहीं कि उसका नियंत्रण हर क्षेत्र में हो। दबाव प्रभावी बनाने के लिए इतना पर्याप्त है कि वह ऐसी किसी चीज तक पहुँच रोक सके जिसका विकल्प सामने वाला देश आसानी से नहीं खोज सकता।

भारत के पास भी सौदेबाजी के लिए पर्याप्त संसाधन हैं। मगर असली सवाल यह है कि भारत अपनी किसी महत्वपूर्ण जरूरत की आपूर्ति रुकने पर कितने समय तक टिक सकता है? और दूसरी तरफ, अमेरिका या कोई दूसरा साझेदार भारत से मिलने वाले लाभ के बिना कितने समय तक रह सकता है?

रणनीतिक स्वायत्तता की असली परीक्षा इसी असमान सहनशक्ति में होती है।

इसका अर्थ यह नहीं कि अंतरराष्ट्रीय संबंध किसी गणितीय समीकरण के अनुसार चलते हैं। सरकारें गलत आकलन करती हैं। गठबंधन बदलते हैं। घरेलू विरोध के कारण नेताओं की समझौता करने की क्षमता सीमित होती है। आर्थिक और सैन्य शक्ति के साथ विश्वसनीयता, जनमत और संस्थाओं के प्रति भरोसा भी परिणामों को प्रभावित करते हैं।

बड़ी शक्तियाँ अक्सर दूसरों से सहयोग के बदले उनके व्यवहार में बदलाव की माँग करती हैं। शर्तें लगाती हैं, जबकि अपने ऊपर वैसी ही निगरानी या जवाबदेही स्वीकार नहीं करतीं। उनका पाखंड उन शर्तों को समाप्त नहीं करता। उलटे, निर्भर देश के लिए उनकी कीमत और बढ़ा देता है। इसलिए भारत के सामने दो परस्पर जुड़े काम हैं। पहला, ऐसी क्षमता विकसित करना जिससे वह बाहरी दबाव का सामना कर सके। दूसरा, ऐसी विश्वसनीयता अर्जित करना जिससे दूसरे देश भी उसके साथ खड़े होने को तैयार हों।

इन दोनों का सीधा संबंध भारत की घरेलू शासन व्यवस्था से है। स्वतंत्र नियामक संस्थाएँ हों तो निवेश के लिए राजनीतिक पहुँच पर निर्भरता कम होती है। विश्वसनीय न्यायपालिका हो तो सत्ता के कृपापात्र समूहों से बाहर रहकर कारोबार खड़ा करने का जोखिम घटता है। खुली प्रतिस्पर्धा हो तो देश की उत्पादन क्षमता का आधार व्यापक बनता है। विश्वविद्यालयों में असहमति और स्वतंत्र विचार की गुंजाइश हो तो वह बौद्धिक स्वतंत्रता विकसित होती है जिसके बिना तकनीकी आत्मनिर्भरता संभव नहीं।

यही संस्थाएँ किसी शक्तिशाली साझेदार के शर्तें लगाने पर देश को अधिक विकल्प देती हैं। इनके कमजोर होने पर राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा कुछ कंपनियों, कुछ फैसलों और कुछ व्यक्तियों पर निर्भर होती चली जाती है। मगर नई दिल्ली में भारत की ताकत का सार्वजनिक प्रदर्शन अक्सर व्यक्तिगत कूटनीति के इर्दगिर्द घूमता दिखाई देता है।

प्रधानमंत्री का विदेशी नेताओं से गले मिलना इसकी सबसे पहचानी जाने वाली तस्वीर है। सामने खड़े नेता से आत्मीयता दिखाई जाती है और उस दृश्य को भारत की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा के प्रमाण के रूप में प्रसारित किया जाता है। गले मिलना आत्मीयता का संकेत हो सकता है। लेकिन उससे वह सब साबित नहीं होता जो तस्वीर देखकर नागरिकों को समझाया जाता है।

किसी बड़े नेता तक पहुँच होने से यह पता नहीं चलता कि मुलाकात के बाद कौन-सी शर्तें कायम रहीं। असली परीक्षा तब होती है जब दोनों देशों के हित टकराते हैं। भारत किस बात से इनकार कर सकता है? क्या हासिल कर सकता है? और मतभेद होने पर संबंध कितना दबाव सह सकता है?

व्यक्तिगत कूटनीति तभी सार्थक होती है जब संस्थाएँ उस पहुँच को स्थायी राष्ट्रीय लाभ में बदल सकें। ऐसा नहीं होने पर गले मिलने की तस्वीर एक ऐसा विज्ञापन बन जाती है जिसके दावों को वास्तविक बातचीत और समझौतों ने अभी साबित नहीं किया है।

भारत की विदेश नीति के प्रचार और वास्तविक आचरण के बीच यह अंतर केवल व्यक्तिगत कूटनीति तक सीमित नहीं है। एक अधिक न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था की भारत की माँग में भी यही सवाल उठता है।

नई दिल्ली का विरोध सही है जब शक्तिशाली देश नियमों को अपनी सुविधा के अनुसार मोड़ते हैं, असहमति जताने वालों को दंडित करते हैं या विशेषाधिकार अपने लिए सुरक्षित रखते हैं। लेकिन जब ऐसे ही सवाल भारत के भीतर उठते हैं तो उसकी दलील का नैतिक वजन कम होने लगता है। मतदाता सूचियों को लेकर विवाद, विपक्षी नेताओं के विरुद्ध जाँच एजेंसियों के चुनिंदा इस्तेमाल के आरोप, निवारक हिरासत और विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिबंध जैसे सवाल लोकतांत्रिक विश्वसनीयता से जुड़े हैं। इंटरनेट बंद करने की कार्रवाइयों का लोगों की आजीविका और आवश्यक सेवाओं तक पहुँच पर पड़ने वाला नुकसान भी दस्तावेजों में दर्ज है।

इन सवालों का उत्तर संप्रभुता का हवाला देकर नहीं दिया जा सकता। संप्रभुता तो यह तय करती है कि इनके जवाब देने की जिम्मेदारी किसकी है। ऐसा नहीं कि दूसरे देशों की आलोचना करने से पहले भारत को हर मामले में आदर्श बनना होगा। भारतीय नागरिकों के अधिकारों की परीक्षा लेने का अधिकार वाशिंगटन को नहीं है। लेकिन जो सरकार दुनिया से कहती है कि साझा शक्ति और न्यायपूर्ण व्यवस्था के उसके दृष्टिकोण पर भरोसा किया जाए, उसे यह भी स्वीकार करना होगा कि अपने देश में उसे सौंपी गई सत्ता का इस्तेमाल कैसे होता है, इसकी पड़ताल होगी।

यही कसौटी व्यापार नीति पर भी लागू होती है।

भारत के पास कमजोर आजीविकाओं की रक्षा करने और अपनी औद्योगिक क्षमता विकसित करने के उचित कारण हैं। इन उद्देश्यों के पक्ष में ठोस तर्क दिए जा सकते हैं। लेकिन इनके नाम पर हर व्यापारिक बाधा को जायज नहीं ठहराया जा सकता, जबकि दूसरे देशों की ऐसी ही पाबंदियों को मुक्त और निष्पक्ष व्यापार के विरुद्ध बताया जाए।

एक न्यायसंगत व्यापार नीति को स्पष्ट करना चाहिए कि संरक्षण किसे दिया जा रहा है, उससे कौन-सी नई क्षमता विकसित होगी और कब संरक्षण पाने वाले उद्योगों को खुली प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। वरना रणनीतिक स्वायत्तता एक भव्य नाम बनकर रह जाएगी, जिसके पीछे राजनीतिक पहुँच रखने वाले कारोबारियों को प्रतिस्पर्धा से बचाने की व्यवस्था चलती रहेगी।

दुनिया में प्रभावशाली भूमिका निभाने का भारत का दावा मजबूत है। लेकिन उसकी वास्तविक उपलब्धि इस पर निर्भर करेगी कि देश की विशाल आबादी और संस्थाएँ मिलकर कितनी व्यापक उत्पादन क्षमता, प्रतिभा और स्वतंत्र शक्ति विकसित करती हैं।

जिस देश में कारोबारी स्थापित कंपनियों को चुनौती दे सकते हों, नागरिक अधिकारियों से सवाल कर सकते हों और संस्थाएँ सत्ता की नाराजगी सह सकती हों, उसके पास कहीं अधिक ताकत होती है। उसकी तुलना में वह देश कमजोर स्थिति में होगा जहाँ अवसर और सफलता का रास्ता सत्ता तक विशेष पहुँच से होकर गुजरता हो।

ऐसी घरेलू शक्ति विकसित हो जाने से अमेरिका का दबाव, चीन की चुनौती या पश्चिम के दोहरे मानदंड समाप्त नहीं हो जाएँगे। लेकिन भारत के पास उनका सामना करने के अधिक विकल्प होंगे। साथ ही एक अलग विश्व व्यवस्था की उसकी माँग उन देशों को भी अधिक विश्वसनीय लगेगी जो स्वयं अपनी स्वतंत्रता और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ाना चाहते हैं।

भारत यह तय नहीं कर सकता कि उससे अधिक शक्तिशाली देश उसकी निर्भरताओं की परीक्षा लेंगे या नहीं। लेकिन वह यह जरूर तय कर सकता है कि उसकी अपनी घरेलू व्यवस्था उन निर्भरताओं को बढ़ाएगी या कम करेगी।

कैमरे हटते ही गले मिलना समाप्त हो जाता है। उसके बाद जो बचता है, वही असली ताकत है। भारत अपने बूते क्या बना सकता है, कितना दबाव सह सकता है और जिन नियमों पर दुनिया को चलने की सलाह देता है, उन पर स्वयं कितना भरोसा पैदा कर सकता है।

यूपी ट्रेड शो: अमित शाह बोले- उत्तर प्रदेश में बनी ब्रह्मोस मिसाइलों ने उड़ाई पाकिस्तान की नींद

ग्रेटर नोएडा के इंडिया एक्सपो सेंटर एंड मार्ट में आयोजित UP इंटरनेशनल ट्रेड शो 2026 के चौथे एडिशन की शुरुआत हो गई है। पांच दिनों तक चलने वाले इस आयोजन का उद्घाटन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किया। इस ट्रेड शो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उत्तर प्रदेश की बढ़ती रक्षा उत्पादन क्षमता का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि, राज्य अब की सुरक्षा के लिए अहम भूमिका निभा रहा है। शाह ने आगे कहा कि, उत्तर प्रदेश में तैयार की जा रही ब्रह्मोस मिसाइल भारत की सैन्य ताकत को मजबूत कर रही है।

पाकिस्तान को नहीं आ रही नींद!

केंद्रीय मंत्री ने भारत की डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में यूपी की बढ़ती भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि, राज्य में बनी ब्रह्मोस मिसाइल अब पाकिस्तान की “रातों की नींद हराम” कर रही है। UP इंटरनेशनल ट्रेड शो में अमित शाह ने कहा कि, उत्तर प्रदेश के डिफेंस कॉरिडोर से रक्षा क्षेत्र में इन्वेस्टमेंट को बढ़ावा मिल रहा है। उन्होंने बताया कि भारत का कुल डिफेंस प्रोडक्शन अब करीब 1.78 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। शाह ने कहा कि इससे देश में ही आधुनिक हथियार तैयार करने और रक्षा क्षेत्र को मजबूत बनाने में मदद मिल रही है।

भारत का एक्सपोर्ट अब 56 गुना बढ़ा

शाह ने कहा कि, “साल 2013 के मुकाबले भारत का एक्सपोर्ट अब 56 गुना बढ़ चुका है और इसमें उत्तर प्रदेश की भी अहम भूमिका रही है।” उन्होंने कहा कि राज्य में कानून-व्यवस्था में सुधार होने से निवेश के लिए माहौल बेहतर हुआ है। शाह ने इसके लिए योगी आदित्यनाथ सरकार की नीतियों और प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि, उत्तर प्रदेश में तैयार हो रही ब्रह्मोस मिसाइल देश की रक्षा ताकत को मजबूत कर रही है और इससे पाकिस्तान पर भी दबाव बढ़ा है। उन्होंने कहा कि डबल इंजन सरकार के प्रयासों से उत्तर प्रदेश तेजी से मैन्युफैक्चरिंग के बड़े केंद्र के रूप में आगे बढ़ रहा है और राज्य ने 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य रखा है।

तनाव के बीच भी नहीं रुकी तरक्की

अमित शाह ने कहा कि दुनिया में जारी तनाव और कई चुनौतियों के बीच भी भारत ने अपनी आर्थिक तरक्की को बनाए रखा है। उन्होंने बताया कि देश में GST कलेक्शन 2.11 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा है। इसके अलावा छह राज्यों में 12 सेमीकंडक्टर प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है और सरकार ने 12.2 लाख करोड़ रुपये का कैपिटल खर्च किया है। शाह ने कहा कि सरकार का लक्ष्य आने वाले वर्षों में देश को हर महत्वपूर्ण क्षेत्र में मजबूत बनाना है और 2047 तक भारत को दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल करना है।

यहां हर साल बनेंगे करीब 100 ब्रह्मोस मिसाइल

लखनऊ में बनी ब्रह्मोस इंटीग्रेशन एंड टेस्टिंग फैसिलिटी उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर की एक महत्वपूर्ण परियोजना है। पिछले साल रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यहां तैयार की गई ब्रह्मोस मिसाइलों के पहले बैच को रवाना किया था। करीब 380 करोड़ रुपये की लागत से 200 एकड़ में तैयार इस केंद्र ने वर्चुअल उद्घाटन के करीब पांच महीने बाद ही काम शुरू कर दिया था। यहां हर साल करीब 100 मिसाइल सिस्टम तैयार किए जाने की उम्मीद है।

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बांग्लादेश-तुर्किये मिलकर ड्रोन फैक्ट्री बनाएंगे, तकनीक भी ट्रांसफर होगी:बोगुरा में बनेगी यूनिट, यह भारत की सीमा सिर्फ 75 किमी दूर

पाकिस्तान के बाद अब तुर्किये बांग्लादेश में भी अपनी डिफेंस इंडस्ट्री का दायरा बढ़ा रहा है। बांग्लादेश और तुर्किये अब मिलकर ड्रोन बनाने की तैयारी में हैं। दोनों देशों की साझेदारी से बोगुरा में ड्रोन फैक्ट्री बनाई जाएगी। इस ड्रोन फैक्ट्री की लागत 25 हजार करोड़ रुपए है। तुर्किये बांग्लादेश को ड्रोन बनाने की तकनीक भी देगा। बोगुरा भारत की सीमा से करीब 75 किमी दूर है। फैक्ट्री के पास एयरफोर्स का नया एयरबेस भी बनेगा बोगुरा बांग्लादेश के उत्तरी हिस्से में है। यहां जिस इलाके में फैक्ट्री की योजना है, उसके पास ही बांग्लादेश एयरफोर्स का नया एयरबेस विकसित किया जा रहा है। बोगुरा एयरपोर्ट को भी अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक अपग्रेड करने की योजना है। भारत के लिहाज से इसकी अहमियत इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि बांग्लादेश की करीब 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा भारत से लगती है। भास्कर एक्सपर्ट अविनाश मोहनानी, आईबी के पूर्व संयुक्त निदेशक के मुताबिक, भारत की सबसे लंबी लगभग चार हजार किमी लंबी सीमा बांग्लादेश से लगती है। ये भारत के किसी भी पड़ोसी देश के साथ सबसे लंबी बॉर्डर है। साथ ही ये दुनिया में किन्हीं भी दो देशों के बीच की 5वीं सबसे लंबी भू-सीमा मानी जाती है। भारत के नजरिये से देखें तो बांग्लादेश के तुर्किये से डिफेंस गठजोड़ से पूर्वोत्तर के राज्यों में खतरा बढ़ेगा। बांग्लादेश का भारत से लगती सीमा पर ड्रोन की तैनाती का प्लान भी है। बांग्लादेश सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान वाले मक्का रक्षा करार में भी एंट्री चाहता है। पाक इसमें मध्यस्थ के रोल में है। तुर्किये ने ड्रोन तकनीक को कई देशों तक पहुंचाया तुर्किये की पहचान दुनिया में उसके सैन्य ड्रोन कार्यक्रम से बनी है। इनमें बायरक्तार TB2 प्रमुख है। तुर्किये ने ड्रोन तकनीक को कई देशों तक पहुंचाया है। बांग्लादेश के साथ भी ड्रोन सहयोग पिछले कुछ समय में दोनों देशों के रक्षा रिश्तों का अहम हिस्सा बना है। द डिप्लोमैट ने जून 2026 में रिपोर्ट किया था कि दोनों देशों के बीच सहयोग का केंद्र ड्रोन हैं और सैन्य उपकरणों के संयुक्त उत्पादन पर भी चर्चा चल रही है। बांग्लादेश पहले से तुर्किये के बनाए सैन्य उपकरणों का इस्तेमाल करता है। इनमें ओटोकर के COBRA सीरीज के बख्तरबंद वाहन भी शामिल हैं। ओटोकर के मुताबिक COBRA II का इस्तेमाल दुनिया के 20 से ज्यादा देशों की सेनाएं करती हैं। तुर्किये की ड्रोन बनाने वाली कंपनी पाकिस्तान में भी है तुर्किये और पाकिस्तान के बीच भी ड्रोन और रक्षा तकनीक पर सहयोग लगातार बढ़ा है। तुर्किये की ड्रोन बनाने वाली कंपनी बायकर पाकिस्तान में पहले से मौजूद है। 2023 में बायकर की पाकिस्तानी सहायक कंपनी ने नेशनल एयरोस्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी पार्क (NASTP) में रिसर्च एंड डेवलपमेंट गतिविधियों के लिए समझौता किया था। पाकिस्तान और तुर्किये ने एयरोस्पेस, ड्रोन और रक्षा उत्पादन में संयुक्त उपक्रम और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर भी बातचीत की है। बांग्लादेश में तुर्किये के 12 कल्चरल सेंटर बनें बांग्लादेश में 6 महीने के दौरान तुर्किये के 12 कल्चरल सेंटर बन गए हैं। कट्टरपंथी छात्र शिबिर और जमात-ए-इस्लामी के साथ चल रहे इन सेंटरों में भारत विरोधी एजेंडे पर जोर दिया जा रहा है। ढाका में यूनुस एम्रे इंस्टीट्यूट और एक समर्पित तुर्की कल्चरल सेंटर स्थापित करने की तैयारी चल रही है। तुर्किये की सरकार की ‘तुर्किये स्कॉलरशिप्स’ प्रोग्राम में इस साल बांग्लादेश के 3 हजार छात्रों को तुर्किये में उच्च शिक्षा के लिए भेजा जा चुका है। ————————- ये खबर भी पढ़ें… सऊदी को F-35 फाइटर जेट देगा अमेरिका: ट्रम्प की ₹2.3 लाख करोड़ की डील को मंजूरी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सऊदी अरब को 48 F-35 फाइटर जेट बेचने की मंजूरी दे दी है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

बांग्लादेश-तुर्किये मिलकर ड्रोन फैक्ट्री बनाएंगे, तकनीक भी ट्रांसफर होगी:बोगुरा में बनेगी यूनिट, यह भारत की सीमा सिर्फ 75 किमी दूर

पाकिस्तान के बाद अब तुर्किये बांग्लादेश में भी अपनी डिफेंस इंडस्ट्री का दायरा बढ़ा रहा है। बांग्लादेश और तुर्किये अब मिलकर ड्रोन बनाने की तैयारी में हैं। दोनों देशों की साझेदारी से बोगुरा में ड्रोन फैक्ट्री बनाई जाएगी। इस ड्रोन फैक्ट्री की लागत 25 हजार करोड़ रुपए है। तुर्किये बांग्लादेश को ड्रोन बनाने की तकनीक भी देगा। बोगुरा भारत की सीमा से करीब 75 किमी दूर है। फैक्ट्री के पास एयरफोर्स का नया एयरबेस भी बनेगा बोगुरा बांग्लादेश के उत्तरी हिस्से में है। यहां जिस इलाके में फैक्ट्री की योजना है, उसके पास ही बांग्लादेश एयरफोर्स का नया एयरबेस विकसित किया जा रहा है। बोगुरा एयरपोर्ट को भी अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक अपग्रेड करने की योजना है। भारत के लिहाज से इसकी अहमियत इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि बांग्लादेश की करीब 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा भारत से लगती है। भास्कर एक्सपर्ट अविनाश मोहनानी, आईबी के पूर्व संयुक्त निदेशक के मुताबिक, भारत की सबसे लंबी लगभग चार हजार किमी लंबी सीमा बांग्लादेश से लगती है। ये भारत के किसी भी पड़ोसी देश के साथ सबसे लंबी बॉर्डर है। साथ ही ये दुनिया में किन्हीं भी दो देशों के बीच की 5वीं सबसे लंबी भू-सीमा मानी जाती है। भारत के नजरिये से देखें तो बांग्लादेश के तुर्किये से डिफेंस गठजोड़ से पूर्वोत्तर के राज्यों में खतरा बढ़ेगा। बांग्लादेश का भारत से लगती सीमा पर ड्रोन की तैनाती का प्लान भी है। बांग्लादेश सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान वाले मक्का रक्षा करार में भी एंट्री चाहता है। पाक इसमें मध्यस्थ के रोल में है। तुर्किये ने ड्रोन तकनीक को कई देशों तक पहुंचाया तुर्किये की पहचान दुनिया में उसके सैन्य ड्रोन कार्यक्रम से बनी है। इनमें बायरक्तार TB2 प्रमुख है। तुर्किये ने ड्रोन तकनीक को कई देशों तक पहुंचाया है। बांग्लादेश के साथ भी ड्रोन सहयोग पिछले कुछ समय में दोनों देशों के रक्षा रिश्तों का अहम हिस्सा बना है। द डिप्लोमैट ने जून 2026 में रिपोर्ट किया था कि दोनों देशों के बीच सहयोग का केंद्र ड्रोन हैं और सैन्य उपकरणों के संयुक्त उत्पादन पर भी चर्चा चल रही है। बांग्लादेश पहले से तुर्किये के बनाए सैन्य उपकरणों का इस्तेमाल करता है। इनमें ओटोकर के COBRA सीरीज के बख्तरबंद वाहन भी शामिल हैं। ओटोकर के मुताबिक COBRA II का इस्तेमाल दुनिया के 20 से ज्यादा देशों की सेनाएं करती हैं। तुर्किये की ड्रोन बनाने वाली कंपनी पाकिस्तान में भी है तुर्किये और पाकिस्तान के बीच भी ड्रोन और रक्षा तकनीक पर सहयोग लगातार बढ़ा है। तुर्किये की ड्रोन बनाने वाली कंपनी बायकर पाकिस्तान में पहले से मौजूद है। 2023 में बायकर की पाकिस्तानी सहायक कंपनी ने नेशनल एयरोस्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी पार्क (NASTP) में रिसर्च एंड डेवलपमेंट गतिविधियों के लिए समझौता किया था। पाकिस्तान और तुर्किये ने एयरोस्पेस, ड्रोन और रक्षा उत्पादन में संयुक्त उपक्रम और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर भी बातचीत की है। बांग्लादेश में तुर्किये के 12 कल्चरल सेंटर बनें बांग्लादेश में 6 महीने के दौरान तुर्किये के 12 कल्चरल सेंटर बन गए हैं। कट्टरपंथी छात्र शिबिर और जमात-ए-इस्लामी के साथ चल रहे इन सेंटरों में भारत विरोधी एजेंडे पर जोर दिया जा रहा है। ढाका में यूनुस एम्रे इंस्टीट्यूट और एक समर्पित तुर्की कल्चरल सेंटर स्थापित करने की तैयारी चल रही है। तुर्किये की सरकार की ‘तुर्किये स्कॉलरशिप्स’ प्रोग्राम में इस साल बांग्लादेश के 3 हजार छात्रों को तुर्किये में उच्च शिक्षा के लिए भेजा जा चुका है। ————————- ये खबर भी पढ़ें… सऊदी को F-35 फाइटर जेट देगा अमेरिका: ट्रम्प की ₹2.3 लाख करोड़ की डील को मंजूरी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सऊदी अरब को 48 F-35 फाइटर जेट बेचने की मंजूरी दे दी है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

वायुसेना को मिलेगा तेजस ट्विन सीटर और HTT-40 ट्रेनर एयरक्राफ्ट, ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में HAL करने जा रही बड़ा धमाका

Aatmanirbhar Bharat: हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) कल यानी 18 सितंबर 2026 को कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में आयोजित एक कार्यक्रम में भारतीय वायुसेना (IAF) को LCA तेजस FOC ट्विन-सीटर ट्रेनर और HTT-40 बेसिक ट्रेनर एयरक्राफ्ट सौंपेगा। इसके अलावा ध्रुव नेक्स्ट जेनरेशन (NG) हेलीकॉप्टर पवन हंस लिमिटेड (PHL) को सौंपे जाएंगे। यह कार्यक्रम रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और नागरिक उड्डयन मंत्री के. राममोहन नायडू की मौजूदगी में होगा।

HAL के अनुसार, यह हैंडओवर भारत की आत्मनिर्भरता और स्वदेशी एयरोस्पेस क्षमता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इस कार्यक्रम में HAL और उसके उद्योग साझेदारों की भूमिका को दिखाया किया जाएगा। इन्होंने देश में सैन्य और नागरिक, दोनों क्षेत्रों के लिए उन्नत एयरोस्पेस प्लेटफॉर्म के डिजाइन, विकास और निर्माण की क्षमता को मजबूत किया है।

वायुसेना और पवन हंस के लिए अहम सौंपे जाएंगे प्लेटफॉर्म

इस अवसर पर भारतीय वायुसेना को LCA तेजस के FOC ट्विन-सीटर ट्रेनर और HTT-40 बेसिक ट्रेनर एयरक्राफ्ट मिलेंगे। वहीं, ध्रुव NG हेलीकॉप्टरों की डिलीवरी पवन हंस लिमिटेड को की जाएगी। कार्यक्रम में चीफ ऑफ एयर स्टाफ एयर चीफ मार्शल एपी सिंह, रक्षा उत्पादन सचिव संजीव कुमार, नागरिक उड्डयन मंत्रालय के सचिव समीर कुमार सिन्हा, HAL के CMD रवि के. सहित रक्षा और नागरिक उड्डयन मंत्रालयों, वायुसेना, पवन हंस, नियामक एजेंसियों तथा एयरोस्पेस एवं रक्षा क्षेत्र से जुड़े अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहेंगे।

स्वदेशी रक्षा उत्पादन पर सरकार का जोर

सरकार ने एयरोस्पेस और रक्षा क्षेत्रों में स्वदेशी डिजाइन, विकास और निर्माण को बढ़ावा देने को उच्च प्राथमिकता दी है। इन प्लेटफॉर्म्स को शामिल करना स्वदेशी क्षमताओं को मजबूत करने और विदेशी स्रोतों पर निर्भरता कम करने की दिशा में एक और बड़ा कदम है।

‘भारत के विजन की आधारशिला है रक्षा क्षेत्र’

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हाल ही में कहा कि भविष्य की लड़ाई में रणनीतिक बढ़त तकनीकी नेतृत्व से तय होगी। उन्होंने कहा कि आज हम जो कल्पना करते हैं। वही कल की सैन्य क्षमता बनेगी। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सिंह ने कहा कि 2047 तक ‘विकसित भारत’ का विजन सिर्फ आर्थिक रूप से मजबूत देश बनाने के बारे में नहीं है। बल्कि ऐसा भारत बनाने के बारे में है जो तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर, सामाजिक रूप से समावेशी, पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ और रणनीतिक रूप से सुरक्षित हो।

सिंह ने रक्षा क्षेत्र को इस विज़न की नींव बताया। उन्होंने कहा, “2047 तक हमें अहम तकनीकों में आत्मनिर्भरता हासिल करनी होगी। स्वदेशी उत्पादों का इस्तेमाल काफी बढ़ाना होगा। रक्षा निर्यात कई गुना बढ़ाना होगा और ग्लोबल सप्लाई चेन में भारत की मजबूत मौजूदगी सुनिश्चित करनी होगी।” रक्षा मंत्री ने जोर दिया कि सहयोग के बिना इनमें से कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र के सभी स्टेकहोल्डर्स के बीच मजबूत साझेदारी होनी चाहिए।

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सिंह ने कहा कि DRDO और इंडस्ट्री के बीच साझेदारी सिर्फ प्रोडक्शन तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए। बल्कि इसे रिसर्च, डिजाइन, टेस्टिंग, सर्टिफिकेशन और पूरी मैन्युफैक्चरिंग वैल्यू चेन तक फैलाना चाहिए। रक्षा मंत्री ने कहा कि नई टेक्नोलॉजी, खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और ड्रोन, भविष्य की लड़ाई में अहम भूमिका निभाएंगी। उन्होंने इस क्षेत्र में तेजी से तकनीकी इनोवेशन करने का आग्रह किया।

यहां के एल्युमिनाई OG हैं, PM नरेंद्र मोदी की GenZ स्टाइल में स्‍पीच, मोदी जी ने किसे कह डाला नाराज फूफा जी

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PM Narendra Modi

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को दिल्ली विश्वविद्यालय के श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के शताब्दी समारोह को संबोधित किया। उन्होंने कॉलेज की 100 साल की उपलब्धियों, पूर्व छात्रों और 2013 के अपने पुराने भाषण को याद किया। मोदी ने 2013 के भारत और आज के भारत की तुलना करते हुए अर्थव्यवस्था, जनधन योजना, ‘मेड इन इंडिया’, रक्षा उत्पादन और रेलवे विद्युतीकरण जैसी उपलब्धियां गिनाईं। उन्होंने युवाओं से बड़े लक्ष्य तय करने और भारत को विकसित व आत्मनिर्भर बनाने में योगदान देने का आह्वान किया।

बता दें कि पीएम मोदी श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (SRCC) के शताब्दी समारोह में भाग लेने पहुंचे। जहां उन्होंने जेन जी के स्टाइल में कहा कि यहां के एल्युमिनाई OG हैं। पीएम मोदी के ऐसा बोलने पर जोरदार ठहाके लगे। पीएम मोदी ने कहा कि सौ से अधिक साल से श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (SRCC) ने छात्रों की पीढ़ियों को सीखने, आगे बढ़ने और बदलाव लाने का अवसर प्रदान किया है।

बता दें कि एसआरसीसी (SRCC) ने 1926 में सफर शुरू किया था। अब यह संस्थान अपने 100 साल पूरे कर रहा है। इस दौरान कॉलेज ने शिक्षा, अर्थशास्त्र और प्रबंधन के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है। एसआरसीसी दिल्ली विश्वविद्यालय का प्रमुख कॉलेज है और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में गिना जाता है।

‘नाराज फूफाओं’ को जवाब दिया: इस दौरान पीएम मोदी ने विपक्ष पर भी कटाक्ष किया। पीएम मोदी ने विपक्ष को ‘नाराज फूफा’ कहकर तंज कसा। पीएम ने कहा- जब हम दुनिया का सबसे बड़ा स्टेच्यू बना रहे थे तब फूफा जी ने कमर कस ली, इसकी जरूरत क्या है। जब हमने हाई स्पीड ट्रेन पर काम किया तो फूफा जी बोले, इसकी जरूरत क्या है। जब यूपीआई लेकर आए तो फूफा बोले, इसकी जरूरत क्या है। हमने नई पार्लियामेंट बिल्डिंग बनाई तो फिर बोले, इसकी जरूरत क्या है। जब हमने हमारे वीर सेना नायकों का मेमोरियल बनाया तो फूफा फिर मैदान में आ गए, इसकी क्या जरूरत थी। लेकिन भारत ने ऐसे सारे फूफाओं को जवाब दिया। जो देश के लिए जरूरी है वो भारत को करने से कोई रोक नहीं सकता।

मेड इन इंडिया' से लेकर आज तक का जिक्र: PM मोदी ने अपने 2013 के भाषण में ‘मेड इन इंडिया’ की जरूरत बताए जाने का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि उस समय कुछ लोगों को यह विचार मुश्किल या असंभव लगता था, लेकिन आज भारत में बने उत्पादों और देश की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता की पहचान बढ़ी है। प्रधानमंत्री ने कहा कि वह SRCC में अपना ‘रिपोर्ट कार्ड’ लेकर आए हैं। उनके भाषण का मुख्य संदेश यही रहा कि 2013 में जिस बदलाव और आत्मनिर्भरता की बात उन्होंने की थी, उसके बाद भारत की अर्थव्यवस्था और शासन व्यवस्था में कई बदलाव हुए हैं।

गिलास जिनके लिए आधा खाली था : पीएम मोदी ने संबोधन के दौरान कहा कि 2013 में गिलास जिनके लिए आधा खाली था, उनकी सोच आज भी वैसी ही है, उनके लिए गिलास हमेशा आधा खाली ही रहेगा। उस समय एसआरसीसी के मंच से मैंने P2G2 यानी 'प्रो-पीपल, गुड गवर्नेंस' (जन-केंद्रित सुशासन) की चर्चा की थी। जिन लोगों ने देश में लंबे समय तक शासन किया, उनकी कार्यशैली थी-'जब आग लगे तभी नींद से जागो' और 'जब प्यास लगे तभी कुआं खोदो'। मैंने इसी सोच को बदलने का प्रयास किया और 2014 के बाद इसे अमल में लाकर भी दिखाया।

Defence Stocks: रिलायंस, टाटा से अदाणी तक… विदेशी दिग्गजों के साथ मिलकर हथियार बनाएंगी ये 5 भारतीय कंपनियां

Defence Stocks: दुनिया में तनाव बढ़ रहा है। युद्ध और टकराव की वजह से सप्लाई चेन पर भी असर पड़ रहा है। ऐसे में भारत अब अपने डिफेंस प्रोडक्शन को तेजी से बढ़ा रहा है। सरकार की Make in India नीति के तहत विदेशी कंपनियों के साथ साझेदारी पर जोर है। मकसद साफ है। एडवांस टेक्नोलॉजी और हथियारों का उत्पादन भारत में हो।

रक्षा खर्च 8.9% बढ़कर 92.1 अरब डॉलर

SIPRI के मुताबिक, 2025 में भारत का रक्षा खर्च 8.9% बढ़कर 92.1 अरब डॉलर हो गया। भारत अब दुनिया का पांचवां सबसे ज्यादा रक्षा खर्च करने वाला देश है। वहीं, 2025-26 में देश का रक्षा उत्पादन रिकॉर्ड ₹1.78 लाख करोड़ तक पहुंच गया। इसमें निजी कंपनियों की हिस्सेदारी 24% रही।

हाल ही में Tata Advanced Systems ने Javelin Joint Venture के साथ MoU किया है। इसके तहत भारत में Javelin एंटी-टैंक मिसाइलों का उत्पादन करने की संभावना तलाशी जाएगी।

2026 में ऐसी कई बड़ी साझेदारियां हुई हैं। आइए 5 अहम डिफेंस पार्टनरशिप पर नजर डालते हैं।

भारतीय कंपनीग्लोबल पार्टनरकिस टेक्नोलॉजी पर काम
2026 में क्या हुआ?

Reliance Industries

Rolls-Royceफाइटर जेट इंजन
साझेदारी के लिए Statement of Intent

Tata Advanced Systems

Lockheed Martin / RaytheonJavelin एंटी-टैंक मिसाइलMoU साइन
Bharat Electronics

Safran ElectronicsHAMMER स्मार्ट हथियार
50:50 JV समझौता

Adani DefenceLeonardoमिलिट्री हेलीकॉप्टर
इंडस्ट्रियल फ्रेमवर्क एग्रीमेंट

Paras DefenceTandem DefenseGuardian-1 काउंटर-ड्रोन सिस्टम
एक्सक्लूसिव IP लाइसेंस

Reliance Industries और Rolls-Royce: फाइटर जेट इंजन

रिलायंस इंडस्ट्रीज और Rolls-Royce ने अगस्त में एक बड़ी साझेदारी का इरादा जताया था। दोनों कंपनियां भारत के AMCA फाइटर जेट प्रोग्राम के लिए कॉम्बैट इंजन बनाने की संभावनाएं तलाशेंगी।

योजना सिर्फ इंजन बनाने तक सीमित नहीं है। दोनों कंपनियां भारत में Aerospace Gas Turbine Complex बनाने की संभावना भी देख रही हैं।

यहां पावर और प्रोपल्शन टेक्नोलॉजी पर काम हो सकता है। अगर यह साझेदारी आगे बढ़ती है, तो भारत को एयरो-इंजन टेक्नोलॉजी में मदद मिल सकती है।

Tata Advanced Systems और Javelin: एंटी-टैंक मिसाइल

Tata Advanced Systems ने Javelin Joint Venture के साथ MoU साइन किया है। इस जॉइंट वेंचर में Raytheon और Lockheed Martin शामिल हैं। दोनों कंपनियां भारत में Javelin All Up Round यानी AUR का को-प्रोडक्शन करने की संभावना तलाशेंगी।

भारत में मिसाइल की फाइनल असेंबली और इंटीग्रेशन की सुविधा बनाई जा सकती है। कुछ पार्ट्स का उत्पादन भी देश में हो सकता है। भारत ने अमेरिका से Javelin एंटी-टैंक मिसाइल सिस्टम खरीदने पर भी सहमति जताई है।

BEL और Safran: HAMMER स्मार्ट हथियार

Bharat Electronics यानी BEL और Safran Electronics & Defense ने फरवरी में Joint Venture Agreement साइन किया था।

दोनों कंपनियां भारत में HAMMER प्रिसिजन-गाइडेड हथियार बनाने की योजना पर काम कर रही हैं। इसका इस्तेमाल हवा से जमीन पर हमला करने के लिए किया जाता है। दोनों की 50:50 हिस्सेदारी वाली जॉइंट वेंचर कंपनी बनाने की योजना है।

HAMMER का उत्पादन भारत में लाने के लिए मास्टर प्रोडक्शन एग्रीमेंट किया जाएगा। मैन्युफैक्चरिंग, सप्लाई, मेंटेनेंस और रिपेयर के लिए एक सेंटर ऑफ एक्सीलेंस भी बनाया जा सकता है।

Adani Defence और Leonardo: हेलीकॉप्टर

Adani Defence & Aerospace ने इटली की कंपनी Leonardo के साथ फरवरी में MoU साइन किया था। दोनों कंपनियां भारत में हेलीकॉप्टर बनाने का मजबूत इकोसिस्टम तैयार करना चाहती हैं। शुरुआत में फोकस मिलिट्री हेलीकॉप्टरों पर रहेगा।

आगे चलकर इसका इस्तेमाल सिविल मार्केट के लिए भी हो सकता है। भारत को Leonardo की ग्लोबल सप्लाई चेन से जोड़ने की भी योजना है।

Paras Defence और Tandem Defense: काउंटर-ड्रोन सिस्टम

पारस डिफेंस एंड स्पेस टेक्नोलॉजीज ने Tandem Defense के साथ एक एक्सक्लूसिव IP लाइसेंस एग्रीमेंट किया है। ये अमेरिकी कंपनी Autonomous Power Corporation की सब्सिडियरी है। इस समझौते से Paras Defence को Guardian-1 Interceptor टेक्नोलॉजी के भारत में प्रोडक्शन और कमर्शियल इस्तेमाल का विशेष अधिकार मिलेगा।

Guardian-1 एक हाई-स्पीड काउंटर-ड्रोन सिस्टम है। यह बैटरी से चलता है। इसे छोटे और कम लागत वाले हवाई खतरों को रोकने के लिए डिजाइन किया गया है।

ड्रोन के बढ़ते इस्तेमाल की वजह से काउंटर-ड्रोन सिस्टम की जरूरत तेजी से बढ़ रही है। हालांकि, Guardian-1 को अभी भारतीय सेना ने शामिल करने के लिए नहीं चुना है।

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हथियार बनाने में भारत की लंबी छलांग! प्रोडक्शन ₹1.80 लाख करोड़ और एक्सपोर्ट ₹39,000 करोड़ के पार

India Defence Sector Growth: भारत का रक्षा क्षेत्र आत्मनिर्भरता की दिशा में ऐतिहासिक छलांग लगा रहा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गुरुवार को जानकारी दी कि पिछले एक दशक में भारत का घरेलू रक्षा उत्पादन करीब 4 गुना बढ़कर लगभग ₹1.80 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। वहीं, भारत से रक्षा उपकरणों का निर्यात बढ़कर ₹39,000 करोड़ के करीब हो गया है।

रक्षा मंत्री मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित 57 साल पुरानी व्हीकल फैक्ट्री जबलपुर (VFJ) में T-सीरीज के मेन बैटल टैंक्स के ओवरहॉलिंग के लिए बनने वाले ₹472 करोड़ के नए प्लांट का शिलान्यास करने पहुंचे थे।

2014 से 2026: रक्षा उत्पादन और निर्यात के आंकड़े

राजनाथ सिंह ने 2014 के मुकाबले रक्षा क्षेत्र में हुई अभूतपूर्व प्रगति का ब्योरा पेश किया। साल 2014 में देश का हथियारों और गोला-बारूद का उत्पादन महज ₹46,000 करोड़ था, जो अब बढ़कर ₹1.80 लाख करोड़ हो गया है। 2014 में भारत का रक्षा निर्यात सिर्फ ₹1,000 करोड़ का था, जो अब ₹39,000 करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2028-29 तक ₹50,000 करोड़ के रक्षा निर्यात का लक्ष्य तय किया है।

जबलपुर VFJ में ₹472 करोड़ का प्रोजेक्ट

जबलपुर की व्हीकल फैक्ट्री में बनने वाला नया प्रोजेक्ट भारत के रक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करेगा। यह नया प्लांट सालाना 80 T-72 और T-90 टैंकों का ओवरहॉल यानी मरम्मत व अपग्रेडेशन करने में सक्षम होगा। भारतीय सेना को हर साल करीब 230 T-सीरीज टैंकों के ओवरहॉल की जरूरत होती है।

अब तक चेन्नई के आवडी स्थित हैवी व्हीकल्स फैक्ट्री (HVF) में सालाना लगभग 150 टैंकों की ओवरहॉलिंग होती थी। जबलपुर का नया प्लांट शुरू होने के बाद सेना की यह कमी पूरी तरह से दूर हो जाएगी।

‘अब केवल हथियार बना ही नहीं रहे, मेंटेन भी कर रहे हैं’

रक्षा मंत्री ने कहा कि रक्षा के क्षेत्र में दुनिया का भारत को देखने का नजरिया बदल चुका है और इसके पीछे ‘आत्मनिर्भर भारत’ का विजन है। भारत अब न सिर्फ अपनी धरती पर आधुनिक हथियार बना रहा है, बल्कि उनका रखरखाव, ओवरहॉलिंग और अपग्रेडेशन करने की पूरी क्षमता हासिल कर चुका है।

इस प्रोजेक्ट से स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और यह भारतीय सेना के टैंकों को युद्ध के लिए हमेशा तैयार रखने में ‘वरदान’ साबित होगा।

व्हीकल फैक्ट्री जबलपुर का ऐतिहासिक सफर

व्हीकल फैक्ट्री जबलपुर(VFJ) की स्थापना 1969 में हुई थी, जो वर्तमान में आर्मर्ड व्हीकल्स निगम लिमिटेड (AVNL) के तहत काम करती है। शुरुआत में इस फैक्ट्री में जर्मनी की MAN कंपनी के सहयोग से ‘शक्तिमान 3-टन’ ट्रक और जापान की निसान के सहयोग से ‘निसान 1T’ व ‘जोन्गा’ गाड़ियां बनाई जाती थीं। यह फैक्ट्री 330 एकड़ में फैली है और इसका संलग्न एस्टेट 600 एकड़ का है।

अपोलो माइक्रो सिस्टम्स ने नई डिफेंस कंपनी में 34% हिस्सेदारी खरीदी, वैज्ञानिक वीके सारस्वत करेंगे अगुवाई

Apollo Micro Systems: डिफेंस और एयरोस्पेस सेक्टर की कंपनी Apollo Micro Systems ने नई रक्षा तकनीक कंपनी ShauryAstra Defence Systems में 34% हिस्सेदारी खरीदी है। कंपनी ने इसके लिए ₹34,000 का निवेश किया है। ShauryAstra का फोकस ऐसी रक्षा तकनीकों पर रहेगा, जिनकी जरूरत भारतीय सेना को है, लेकिन अभी उनके स्वदेशी समाधान उपलब्ध नहीं हैं।

ShauryAstra में 34% हिस्सेदारी

Apollo Micro Systems ने ShauryAstra के 3,400 इक्विटी शेयर खरीदे हैं। इनकी फेस वैल्यू ₹10 प्रति शेयर है। इस निवेश के बाद ShauryAstra में Apollo Micro Systems की हिस्सेदारी 34% हो गई है।

ShauryAstra को 21 अगस्त 2026 को शामिल किया गया था। अब यह Apollo Micro Systems की एसोसिएट कंपनी बन गई है।

डॉ. वी.के. सारस्वत का मिलेगा अनुभव

नई कंपनी का वैज्ञानिक नेतृत्व डॉ. वी.के. सारस्वत करेंगे। वह DRDO के पूर्व महानिदेशक और रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के पूर्व सचिव रह चुके हैं। वह रक्षा मंत्री के पूर्व वैज्ञानिक सलाहकार भी रहे हैं।

डॉ. सारस्वत भारत के कई बड़े रक्षा कार्यक्रमों से जुड़े रहे हैं। इनमें पृथ्वी, धनुष, प्रहार और अग्नि-5 मिसाइल कार्यक्रम शामिल हैं। वह भारत के बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस कार्यक्रम, तेजस और INS अरिहंत से भी जुड़े रहे हैं।

फोकस होगा अगली पीढ़ी की रक्षा तकनीक पर

ShauryAstra संपूर्ण हथियार प्रणालियों, लंबी दूरी की प्रणालियों और मानव रहित प्लेटफॉर्म्स पर काम करेगी। कंपनी का फोकस एडवांस्ड डिफेंस टेक्नोलॉजी विकसित करने पर रहेगा।

खास बात यह है कि कंपनी सिर्फ मौजूदा जरूरतों पर काम नहीं करेगी। वह भविष्य के युद्धक्षेत्र में आने वाली तकनीकी जरूरतों और संभावित कमियों की भी पहचान करेगी।

Apollo की मौजूदा क्षमता का मिलेगा फायदा

Apollo Micro Systems पिछले चार दशक से डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स कारोबार में है। कंपनी मिशन-क्रिटिकल इलेक्ट्रॉनिक्स, एवियोनिक्स, रग्ड कंप्यूटिंग, फ्यूज, एक्ट्यूएटर्स और वेपन इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में काम करती है।

ShauryAstra रिसर्च और सिस्टम डिजाइन पर ज्यादा फोकस करेगी। वहीं Apollo Group की इंजीनियरिंग, मैन्युफैक्चरिंग और सिस्टम इंटीग्रेशन क्षमता का इस्तेमाल उत्पादन के लिए किया जा सकेगा।

कंपनी का लक्ष्य क्या है?

Apollo Micro Systems अब सिर्फ कंपोनेंट और सबसिस्टम बनाने तक सीमित नहीं रहना चाहती। कंपनी संपूर्ण स्वदेशी हथियार प्रणालियों और प्लेटफॉर्म्स के विकास में बड़ी भूमिका बनाना चाहती है।

कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर बी. करुणाकर रेड्डी के मुताबिक ShauryAstra इसी दिशा में अगला कदम है। यह पहल भारत के स्वदेशी रक्षा उत्पादन और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य के मुताबिक भी है।

Apollo Micro Systems के शेयर NSE पर 0.14% गिरकर ₹384 प्रति शेयर पर बंद हुए।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

मुक्त व्यापार समझौतों से बने हैं बड़े मौके, MSME उठाएं फायदा: PM मोदी

भारत ने 2014 से अब तक लगभग 40 देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) को अंतिम रूप दिया है। इससे देश के सूक्ष्म, लघु और मंझोले उद्यमों (MSMEs) के लिए एक बड़ा अवसर तैयार हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छोटे उद्यमों से इन अवसरों का लाभ उठाने और इस मौके को हाथ से न जाने देने की अपील की है। उन्होंने 80वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए कहा कि भारतीय उत्पादों की वैश्विक पहुंच का विस्तार करने और यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि कपड़ा, मशीनरी और दवाओं जैसे सामान अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी जगह बनाएं। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए हमें वैश्विक मानकों (ग्लोबल स्टैंडर्ड्स) पर खरा उतरना होगा।

भारत ने हाल में संयुक्त अरब अमीरात (UAE), मॉरीशस, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, EFTA समूह और ओमान के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट किए हैं। यूरोपीय संघ (EU) और न्यूजीलैंड के साथ व्यापार समझौतों को भी अंतिम रूप दिया जा चुका है। इस वर्ष का स्वतंत्रता दिवस समारोह ‘वंदे मातरम्’ के 150 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में राष्ट्रीय गीत को विशेष रूप से समर्पित है। लाल किले के समारोह में आज, शनिवार को पहली बार ‘वंदे मातरम्’ गाया गया।

देश की मैन्युफैक्चरिंग में MSME सेक्टर का हिस्सा लगभग 35.4 प्रतिशत है। वहीं एक्सपोर्ट में लगभग 48.58 प्रतिशत और GDP में 31.1 प्रतिशत का योगदान है। MSME सेक्टर में 7.47 करोड़ से ज्यादा उद्यम हैं और यह 32.82 करोड़ से ज्यादा लोगों को रोजगार देता है। यह खेती के बाद रोजगार देने वाला दूसरा सबसे बड़ा सेक्टर है। दुनिया भर में कुल कारोबारों में MSMEs का हिस्सा लगभग 90 प्रतिशत है। ये कुल वैश्विक रोजगार में 50 प्रतिशत से ज्यादा का योगदान देते हैं।

अवसर को गंवाने का जोखिम नहीं उठा सकते

अपने संबोधन में पीएम मोदी ने कहा, ”भारत की वैश्विक साख बढ़ रही है। आज यह विश्व मंच पर एक सम्मानित राष्ट्र बन रहा है। भारत के पास एक स्थिर राजनीतिक जनादेश और सरकार, एक जीवंत लोकतंत्र और एक मजबूत न्याय व्यवस्था है। ये सभी भारतीय संविधान द्वारा निर्देशित हैं। दुनिया हमारी क्षमताओं को पहचान रही है, यही वजह है कि 2014 से हमने लगभग 40 देशों के साथ FTA किया है।”

उन्होंने आगे कहा, ”इन व्यापार समझौतों से तैयार हुए विशाल अवसर को देखिए। मैं अपने MSME क्षेत्र से आग्रह करना चाहता हूं कि वे इस मौके को हाथ से न जाने दें। हमें वैश्विक मंच तक पहुंचना है। भारतीय उत्पाद, चाहे वे कपड़ा हों, मशीनरी हों या दवाएं, उन्हें वैश्विक बाजारों में जगह बनाने की जरूरत है। हम इस अवसर को गंवाने का जोखिम नहीं उठा सकते।”

प्रधानमंत्री ने कहा, ”हमें वैश्विक स्तर पर उत्पादों की मौजूदा उपलब्ध गुणवत्ता से बेहतर गुणवत्ता और कम कीमत की पेशकश करनी चाहिए। पंजाब के लुधियाना से लेकर तमिलनाडु के तिरुप्पुर तक फैले हमारे कपड़ों में वैश्विक बाजार तक पहुंचने की क्षमता है।”

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घरेलू समुद्री खाद्य क्षेत्र के लिए भी भारी अवसर

पीएम ने यह भी कहा कि इन समझौतों ने घरेलू समुद्री खाद्य (seafood) क्षेत्र के लिए भी भारी अवसर खोले हैं। केरल से लेकर गुजरात और तमिलनाडु से लेकर बंगाल तक, ये FTA घरेलू झींगा निर्यात को बढ़ावा दे रहे हैं। पीएम मोदी ने कहा, ”मैं चाहूंगा कि हम इस स्थिति का पूरा फायदा उठाएं।” पीएम ने हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी और ड्रोन प्रणाली जैसी एडवांस्ड क्षमताओं में आत्मनिर्भरता पर विशेष जोर देते हुए भारत को डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग का वैश्विक केंद्र बनाने की भी वकालत की। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत के घरेलू रक्षा उत्पादन की मात्रा वित्त वर्ष 2025-26 में 1.78 लाख करोड़ रुपये दर्ज की गई।