हथियार बनाने में भारत की लंबी छलांग! प्रोडक्शन ₹1.80 लाख करोड़ और एक्सपोर्ट ₹39,000 करोड़ के पार

India Defence Sector Growth: भारत का रक्षा क्षेत्र आत्मनिर्भरता की दिशा में ऐतिहासिक छलांग लगा रहा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गुरुवार को जानकारी दी कि पिछले एक दशक में भारत का घरेलू रक्षा उत्पादन करीब 4 गुना बढ़कर लगभग ₹1.80 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। वहीं, भारत से रक्षा उपकरणों का निर्यात बढ़कर ₹39,000 करोड़ के करीब हो गया है।

रक्षा मंत्री मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित 57 साल पुरानी व्हीकल फैक्ट्री जबलपुर (VFJ) में T-सीरीज के मेन बैटल टैंक्स के ओवरहॉलिंग के लिए बनने वाले ₹472 करोड़ के नए प्लांट का शिलान्यास करने पहुंचे थे।

2014 से 2026: रक्षा उत्पादन और निर्यात के आंकड़े

राजनाथ सिंह ने 2014 के मुकाबले रक्षा क्षेत्र में हुई अभूतपूर्व प्रगति का ब्योरा पेश किया। साल 2014 में देश का हथियारों और गोला-बारूद का उत्पादन महज ₹46,000 करोड़ था, जो अब बढ़कर ₹1.80 लाख करोड़ हो गया है। 2014 में भारत का रक्षा निर्यात सिर्फ ₹1,000 करोड़ का था, जो अब ₹39,000 करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2028-29 तक ₹50,000 करोड़ के रक्षा निर्यात का लक्ष्य तय किया है।

जबलपुर VFJ में ₹472 करोड़ का प्रोजेक्ट

जबलपुर की व्हीकल फैक्ट्री में बनने वाला नया प्रोजेक्ट भारत के रक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करेगा। यह नया प्लांट सालाना 80 T-72 और T-90 टैंकों का ओवरहॉल यानी मरम्मत व अपग्रेडेशन करने में सक्षम होगा। भारतीय सेना को हर साल करीब 230 T-सीरीज टैंकों के ओवरहॉल की जरूरत होती है।

अब तक चेन्नई के आवडी स्थित हैवी व्हीकल्स फैक्ट्री (HVF) में सालाना लगभग 150 टैंकों की ओवरहॉलिंग होती थी। जबलपुर का नया प्लांट शुरू होने के बाद सेना की यह कमी पूरी तरह से दूर हो जाएगी।

‘अब केवल हथियार बना ही नहीं रहे, मेंटेन भी कर रहे हैं’

रक्षा मंत्री ने कहा कि रक्षा के क्षेत्र में दुनिया का भारत को देखने का नजरिया बदल चुका है और इसके पीछे ‘आत्मनिर्भर भारत’ का विजन है। भारत अब न सिर्फ अपनी धरती पर आधुनिक हथियार बना रहा है, बल्कि उनका रखरखाव, ओवरहॉलिंग और अपग्रेडेशन करने की पूरी क्षमता हासिल कर चुका है।

इस प्रोजेक्ट से स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और यह भारतीय सेना के टैंकों को युद्ध के लिए हमेशा तैयार रखने में ‘वरदान’ साबित होगा।

व्हीकल फैक्ट्री जबलपुर का ऐतिहासिक सफर

व्हीकल फैक्ट्री जबलपुर(VFJ) की स्थापना 1969 में हुई थी, जो वर्तमान में आर्मर्ड व्हीकल्स निगम लिमिटेड (AVNL) के तहत काम करती है। शुरुआत में इस फैक्ट्री में जर्मनी की MAN कंपनी के सहयोग से ‘शक्तिमान 3-टन’ ट्रक और जापान की निसान के सहयोग से ‘निसान 1T’ व ‘जोन्गा’ गाड़ियां बनाई जाती थीं। यह फैक्ट्री 330 एकड़ में फैली है और इसका संलग्न एस्टेट 600 एकड़ का है।

Rare Earth Magnet Scheme: ₹7280 करोड़ की सरकारी योजना, L&T और कोल इंडिया समेत 20 कंपनियों ने बोली लगाई

Rare Earth Magnet Scheme: सरकार की ₹7,280 करोड़ की रेयर अर्थ मैग्नेट मैन्युफैक्चरिंग योजना को कंपनियों का जबरदस्त रिस्पॉन्स मिला है। Larsen & Toubro (L&T), Coal India, ReNew, Attero Recycling और Lohum Magnets & Energy Solutions समेत 20 कंपनियों ने इस योजना के लिए बोली लगाई है।

भारी उद्योग मंत्रालय ने गुरुवार को इसकी जानकारी दी। तकनीकी बोलियां 13 अगस्त को खोली गईं। आवेदन जमा करने की आखिरी तारीख 12 अगस्त थी।

कौन-कौन सी कंपनियां दौड़ में हैं?

इस योजना में भारतीय कंपनियों के साथ विदेशी कंपनियों ने भी हिस्सा लिया है। इनमें NEO Performance Materials (Singapore) और जापान की Proterial की भारतीय इकाई Proterial India भी शामिल हैं।

इसके अलावा 20 Microns, N.A.N. Magnetech, PrNd Metal and Magnets, Prozeal Green Energy और Ramp Metals & Minerals जैसी कंपनियों ने भी बोली लगाई है।

सरकार की योजना क्या है?

सरकार इस योजना के तहत भारत में हर साल 6,000 मीट्रिक टन सिंटर्ड NdFeB रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट बनाने की क्षमता चाहती है। इस बंटवारा 5 कंपनियों के बीच किया जाएगा। हर कंपनी को अधिकतम 1,200 मीट्रिक टन सालाना क्षमता मिल सकती है।

केंद्रीय कैबिनेट ने नवंबर 2025 में इस योजना को मंजूरी दी थी। योजना की अवधि 7 साल होगी। इसमें पहले 2 साल फैक्ट्री लगाने के लिए होंगे। इसके बाद 5 साल तक बिक्री के आधार पर इंसेंटिव मिलेगा।

रेयर अर्थ मैग्नेट इतने अहम क्यों हैं?

रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट का इस्तेमाल इलेक्ट्रिक व्हीकल, विंड टरबाइन, हाई-एंड इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोस्पेस और डिफेंस सिस्टम में होता है। सरकार का लक्ष्य भारत में NdPr ऑक्साइड से लेकर तैयार मैग्नेट तक पूरी वैल्यू चेन विकसित करना है।

चीन पर निर्भरता घटाने की तैयारी

इस सेक्टर में चीन का दबदबा है। भारत अभी रेयर अर्थ मैग्नेट के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है। साल 2025 में चीन के एक्सपोर्ट प्रतिबंधों से सप्लाई प्रभावित हुई थी। इससे कई उद्योगों में कमी देखने को मिली। सरकार अब घरेलू उत्पादन बढ़ाकर आयात पर निर्भरता कम करना और सप्लाई को सुरक्षित बनाना चाहती है।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Stock in Focus: डिफेंस कंपनी को HAL से ₹2205 करोड़ का बड़ा ऑर्डर मिला, शेयरों पर रहेगी नजर

Stock in Focus: डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी एस्ट्रा माइक्रोवेव प्रोडक्ट्स को HAL से ₹2,205.23 करोड़ का बड़ा ऑर्डर मिला है। यह ऑर्डर उत्तम रडार (Uttam Radar) प्रोग्राम के लिए है। कंपनी इसे अगले पांच साल में पूरा करेगी। खास बात यह है कि यह ऑर्डर कंपनी के पूरे FY26 के रेवेन्यू से भी करीब दोगुना है। इससे आने वाले वर्षों की कमाई की अच्छी तस्वीर दिखती है।

इस ऑर्डर के तहत कंपनी 122 Anti-Aircraft Auxiliary Units (AAAU) और 121 Interface Frames बनाएगी। ये दोनों इक्विपमेंट उत्तम रडार का अहम हिस्सा हैं। यह रडार भारत में डेवलपकिया गया है और लड़ाकू विमानों में लगाया जाएगा।

पहले भी मिला था HAL से ऑर्डर

HAL ने इससे पहले भी कंपनी पर भरोसा जताया था। 1 अप्रैल 2026 को एस्ट्रा माइक्रोवेव के जॉइंट वेंचर Astra Rafael Comsys को ₹250.58 करोड़ का ऑर्डर मिला था। इसके तहत सेना के लिए Software Defined Radio (SDR) सिस्टम की सप्लाई की जानी है। यह काम 18 महीने में पूरा होगा।

लगातार मिल रहे बड़े ऑर्डर से कंपनी की ऑर्डर बुक और मजबूत हुई है। इसका मतलब है कि आने वाले कई साल तक कंपनी के पास काम की कमी नहीं रहेगी। इससे रेवेन्यू और मुनाफे को भी सहारा मिलने की उम्मीद है।

एस्ट्रा माइक्रोवेव के शेयरों का हाल

एस्ट्रा माइक्रोवेव का शेयर गुरुवार को 2.51% गिरकर ₹1,729.20 पर बंद हुआ। हालांकि, पिछले 3 महीने में 53%, इस साल अब तक 76% और पिछले 1 साल में करीब 78% का रिटर्न दे चुका है। कंपनी का मार्केट कैप 16.42 हजार करोड़ रुपये है।

एस्ट्रा माइक्रोवेव का कारोबार क्या है

एस्ट्रा माइक्रोवेव डिफेंस और स्पेस सेक्टर के लिए रडार, सैन्य संचार सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और माइक्रोवेव उपकरण बनाती है। इसके ग्राहक DRDO, ISRO, HAL और भारतीय रक्षा बल जैसे बड़े सरकारी संस्थान हैं।

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ब्रह्मोस से आकाश तक भारत के हथियारों का जलवा! समझिए कैसे स्वदेशी मिसाइल सिस्टम बना रहे हैं डिफेंस एक्सपोर्ट का नया रिकॉर्ड

India Defence Sector: दशकों तक दुनिया के सबसे बड़े रक्षा उपकरण आयातकों में शुमार रहने वाला भारत अब ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर एक बड़े डिफेंस एक्सपोर्टर के रूप में मजबूती से उभर चुका है। विदेशी सप्लायरों पर निर्भरता धीरे-धीरे घट रही है और अब भारत की स्वदेशी डिफेंस सिस्टम की डिमांड दुनिया भर में तेजी से बढ़ रही है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा उत्पादन 1।78 लाख करोड़ रुपये के ऑल टाइम हाई पर पहुंच गया है। रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक इस दौरान देश के रक्षा निर्यात में पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में 62.66 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। अब यह रिकॉर्ड 38424 करोड़ रुपये पर पहुंच गया है। ये इससे पिछले वित्त वर्ष में 23622 करोड़ रुपये था।

कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज के मुताबिक पिछले एक दशक में भारत का रक्षा निर्यात लगभग 50 गुना बढ़ा है। ये वित्त वर्ष 2014 में सिर्फ 700 करोड़ रुपये हुआ करता था। जियो पॉलिटिकल टेंशन और बढ़ते सैन्य खर्चों के बीच स्वदेशी रक्षा प्रणालियों की मजबूत वैश्विक स्वीकार्यता की वजह से कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज ने अनुमान जताया है कि वित्त वर्ष 2029 तक भारत का रक्षा निर्यात बढ़कर 50000 करोड़ रुपये हो जाएगा।

इंडो-पैसिफिक क्षेत्र बना भारतीय हथियारों का मुख्य ठिकाना

भारत के रक्षा निर्यात के लिए इंडो-पैसिफिक (हिंद-प्रशांत) क्षेत्र सबसे प्रमुख ठिकाना बनकर उभरा है। इसमें मुख्य रूप से म्यांमार, फिलीपींस और वियतनाम से आने वाली भारी मांग का बड़ा योगदान है। आंकड़ों के मुताबिक साल 2020-2025 के दौरान भारत के कुल रक्षा निर्यात में इन तीनों दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों की हिस्सेदारी 70.1 प्रतिशत रही। इसके मुकाबले वर्ष 2014-2019 में यह हिस्सेदारी 16.5 प्रतिशत और 2008-2013 में सिर्फ 14.7 प्रतिशत थी। ये आंकड़े भारत के बदलते एक्सपोर्ट प्रोफाइल को साफ दिखाते हैं।

सुपरसोनिक ब्रह्मोस मिसाइल की बढ़ती ग्लोबल डिमांड

भारत के रक्षा क्षेत्र को इस महीने की शुरुआत में एक और बड़ी कामयाबी तब मिली जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जकार्ता यात्रा के दौरान इंडोनेशिया ने भारत की स्वदेशी ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल खरीदने के समझौते पर आधिकारिक हस्ताक्षर किए। फिलीपींस और वियतनाम के बाद इंडोनेशिया इस मिसाइल का तीसरा अंतरराष्ट्रीय खरीदार बन गया है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक इस मल्टि लेयर रणनीतिक रक्षा समझौते की कीमत 200 मिलियन डॉलर से 630 मिलियन डॉलर के बीच है। इसमें मिसाइल बैटरी, तटीय रक्षा प्रणाली और ऑपरेटरों की ट्रेनिंग शामिल है।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अपनी युद्ध प्रभावशीलता साबित करने वाली ब्रह्मोस मिसाइल शक्तिशाली तटीय रक्षा और एंटी-शिप क्षमताएं प्रदान करती है। इसकी बेहद तेज गति होने की वजह से दुश्मन के लिए इसे इंटरसेप्ट करना बहुत कठिन होता है। ऐसे में ये दक्षिण चीन सागर जैसे रणनीतिक जलमार्गों में शत्रु नौसैनिक बलों के खिलाफ एक मजबूत डिटरेंट का काम करती है।

इस मिसाइल को भारत के रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) और रूस के NPO Mashinostroyenia के जॉइंट वेंटर में तैयार किया गया है। इसका नाम भारत की ब्रह्मपुत्र नदी और रूस की मोस्कवा नदी के नाम पर रखा गया है।

पिनाका रॉकेट सिस्टम की सफलता और फ्रांस की नजर

भारत की रक्षा निर्यात महत्वाकांक्षाओं में महाराष्ट्र के नागपुर प्लांट में तैयार होने वाला पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर एक नया मील का पत्थर साबित हो रहा है। आर्मेनिया ने साल 2022 में चार पिनाका रॉकेट लॉन्चर बैटरियों (अनगाइडेड, एक्सटेंडेड-रेंज और गाइडेड वेरिएंट) के लिए 2000 करोड़ रुपये के समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। जुलाई 2023 से शुरू होकर एक साल के भीतर शुरुआती अनगाइडेड सिस्टम की डिलीवरी पूरी कर ली गई थी।

जनवरी 2026 में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने आर्मेनिया के लिए गाइडेड पिनाका रॉकेट सिस्टम की पहली खेप को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। पिछले हफ्ते ही डीआरडीओ (DRDO) ने ओडिशा के चांदीपुर एकीकृत परीक्षण रेंज से पिनाका लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट का सफल परीक्षण किया। इसने 60 किमी की न्यूनतम दूरी पर अपने लक्ष्य को बेहद सटीकता से भेदा। द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक आर्मेनिया के बाद अब फ्रांस भी अपने पुराने होते आर्टिलरी बेड़े को आधुनिक बनाने के लिए इस स्वदेशी रॉकेट सिस्टम को खरीदने पर विचार कर रहा है।

आकाश एयर डिफेंस सिस्टम ने रचा इतिहास

भारत का रक्षा निर्यात अब सिर्फ आक्रामक मिसाइल प्रणालियों तक सीमित नहीं है। स्वदेशी रूप से विकसित सतह से हवा में मार करने वाली आकाश वेपन सिस्टम विदेश में बेची जाने वाली पहली स्थानीय एयर डिफेंस प्लेटफॉर्म बन गई है। साल 2022 में आर्मेनिया ने आकाश मिसाइल सिस्टम के लिए 720 मिलियन डॉलर के समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसकी डिलीवरी साल 2024 में शुरू हुई। डीआरडीओ द्वारा विकसित और भारत डायनामिक्स लिमिटेड द्वारा निर्मित यह मध्यम दूरी की मोबाइल रक्षा प्रणाली लड़ाकू विमानों, ड्रोन, क्रूज मिसाइलों और हवा से सतह पर मार करने वाली मिसाइलों को मार गिराने के लिए डिजाइन की गई है।

आकाश मिसाइल प्रणाली ने पश्चिमी मोर्चे पर पाकिस्तान द्वारा किए गए लगातार ड्रोन और मिसाइल हमलों को नाकाम करने में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

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Adani Defence: ₹2500 करोड़ का डिफेंस प्लांट लगाएगा अदाणी ग्रुप, 5000 लोगों को मिलेगा रोजगार

Adani Defence: मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने रविवार को शिवपुरी में 2,500 करोड़ रुपये के डिफेंस प्लांट की नींव रखी। यह प्लांट अदाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस लगाएगी, जो अदाणी ग्रुप की कंपनी है।

इस प्लांट में मिसाइल कॉम्प्लेक्स, कॉम्पोजिट प्रोपेलेंट यूनिट और TNT प्लांट बनाया जाएगा। सरकार का कहना है कि इससे मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत मिशन को मजबूती मिलेगी।

आसपास के लोगों को भी मिलेगा फायदा

इस प्रोजेक्ट से हजारों लोगों के लिए रोजगार के मौके बनेंगे। स्थानीय लोगों को भी नौकरियां मिल सकती हैं। इसके अलावा, इलाके के छोटे कारोबार और MSME भी डिफेंस सेक्टर की सप्लाई चेन से जुड़ सकेंगे। इस कार्यक्रम में करण अदाणी और जीत अदाणी भी मौजूद रहे।

जीत अदाणी ने क्या कहा?

Adani Airport Holdings Limited (AAHL) के डायरेक्टर जीत अदाणी ने कहा कि कंपनी भारत में ही रक्षा उपकरण बनाने पर जोर दे रही है। इसके लिए DRDO और तीनों सेनाओं के साथ मिलकर काम किया जा रहा है। कोशिश है कि रक्षा सामान के लिए विदेशों पर निर्भरता कम हो।

उन्होंने कहा कि ग्वालियर में कंपनी पहले से लाइट मशीन गन (LMG), असॉल्ट राइफल और कार्बाइन बना रही है। जीत अदाणी ने बताया कि कंपनी अब तक भारतीय सेनाओं को 2,000 लाइट मशीन गन दे चुकी है। खास बात यह है कि यह सप्लाई तय समय से 11 महीने पहले पूरी कर ली गई।

शिवपुरी प्लांट में क्या बनेगा?

जीत अदाणी ने कहा कि शिवपुरी में छोटी, मध्यम और लंबी दूरी की मिसाइलों से जुड़ा पूरा इकोसिस्टम तैयार किया जाएगा। इससे विदेशों से मिसाइल सिस्टम मंगाने की जरूरत कम होगी। भारत में ही इनका निर्माण होगा।

उन्होंने कहा कि यहां सिर्फ मिसाइल जोड़ने का काम नहीं होगा। कॉम्पोजिट प्रोपेलेंट, TNT और विस्फोटक बनाने में इस्तेमाल होने वाला खास सामान भी यहीं तैयार किया जाएगा।

3 साल में तैयार होगा प्लांट

जीत अदाणी ने कहा कि अगले तीन साल में 2,500 करोड़ रुपये की लागत से यह प्लांट तैयार हो जाएगा। इससे करीब 5,000 लोगों को सीधे रोजगार मिलेगा।

उन्होंने बताया कि 50 से ज्यादा MSME भी इस प्रोजेक्ट से जुड़ेंगे। ग्वालियर और शिवपुरी मिलकर मध्य प्रदेश में डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग के बड़े हब बनेंगे। यहां बनने वाले रक्षा उपकरण पूरी तरह भारत में तैयार होंगे।

इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री मोहन यादव और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने 211.29 करोड़ रुपये की कई विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और भूमिपूजन भी किया।

*एजेंसी इनपुट के साथ

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।