अब नहीं लीक होगा कोई पेपर! धांधली रोकने के लिए एक्शन में नंदन नीलेकणि का टास्क फोर्स, NTA में बड़े बदलाव की तैयारी

NTA Exam Reforms Updates: नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) द्वारा आयोजित की जाने वाली राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं को अधिक पारदर्शी, सुरक्षित और हाई-टेक बनाने के लिए केंद्र सरकार द्वारा गठित नंदन नीलेकणि हाई-पावर्ड टास्क फोर्स (HPTF) ने अपनी रणनीतिक बैठकों का दौर तेज कर दिया है।

अधिकारियों के अनुसार, जुलाई 2026 में गठित इस विशेष टास्क फोर्स ने पूर्व इसरो (ISRO) प्रमुख के राधाकृष्णन के साथ गहन परामर्श किया है। गौरतलब है कि के राधाकृष्णन ने 2024 के NEET-UG पेपर लीक विवाद के बाद सरकार द्वारा गठित उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति का नेतृत्व किया था।

राधाकृष्णन समिति की रिपोर्ट और समीक्षा का दायरा

वर्ष 2024 में NEET-UG परीक्षा में हुई गड़बड़ियों के बाद जून 2024 में इसरो के पूर्व अध्यक्ष के राधाकृष्णन की अध्यक्षता में एक हाई-लेवल कमेटी बनाई गई थी। इस समिति ने अक्टूबर 2024 में अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपी थी, जिसमें परीक्षा प्रणाली में सुधार, डाटा सुरक्षा और NTA के पुनर्गठन को लेकर 101 महत्वपूर्ण सिफारिशें शामिल थीं। बाद में इन सिफारिशों के कार्यान्वयन की निगरानी के लिए केंद्र सरकार ने एक ‘हाई पावर्ड स्टीयरिंग कमेटी’ बनाई, जिसके प्रमुख भी के राधाकृष्णन ही बनाए गए।

सुप्रीम कोर्ट भी केंद्र सरकार से राधाकृष्णन समिति की सिफारिशों के क्रियान्वयन और नीलेकणि टास्क फोर्स की अब तक की प्रगति पर अपडेट मांग चुका है। नंदन नीलेकणि की अगुवाई वाली नई टास्क फोर्स अब राधाकृष्णन समिति की पूर्व सिफारिशों की समीक्षा कर रही है ताकि देश में परीक्षा सुधारों के अगले चरण को लागू किया जा सके।

7-सदस्यीय नीलेकणि टास्क फोर्स

UIDAI के पूर्व अध्यक्ष और आईटी विशेषज्ञ नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता वाली इस 7-सदस्यीय समिति में देश की तकनीक, सुरक्षा और शिक्षा नीति से जुड़ी दिग्गज हस्तियों को शामिल किया गया है:

  1. नंदन नीलेकणि(पूर्व अध्यक्ष, UIDAI)- अध्यक्ष
  2. के राधाकृष्णन(पूर्व अध्यक्ष, ISRO)- विशेष परामर्शदाता
  3. एस सोमनाथ(पूर्व अध्यक्ष, ISRO)- सदस्य
  4. तपन डेका(पूर्व निदेशक, इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB))- सदस्य
  5. वी कामाकोटी(निदेशक, IIT मद्रास)- सदस्य
  6. अनीता करवाल(पूर्व शिक्षा सचिव)- सदस्य
  7. अमृत लाल मीणा(लॉजिस्टिक्स विशेषज्ञ)- सदस्य

टेक्नोलॉजी आधारित सुधार और सुरक्षा पर रहेगा पूरा फोकस

श्रम और शिक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, इस टास्क फोर्स का मुख्य जोर परीक्षाओं को साइबर थ्रेट्स और तकनीकी सेंधमारी से बचाना है।

तकनीक का आधुनिक इस्तेमाल: टास्क फोर्स की सिफारिशें अत्याधुनिक तकनीकों के उपयोग और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण पर आधारित होंगी ताकि परीक्षा प्रणाली मजबूत, पारदर्शी, सुरक्षित और भविष्य के अनुकूल बन सके।

NTA के दायरे को सीमित करना: पूर्व की कमेटी ने यह सुझाव दिया था कि NTA की भूमिका को मुख्य रूप से केवल उच्च शिक्षा की प्रवेश परीक्षाओं तक सीमित किया जाए और इसके डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर व गवर्नेंस को मजबूत किया जाए।

हितधारकों से राय: टास्क फोर्स ने NTA के महानिदेशक और उच्च शिक्षा विभाग के अलावा छात्रों, अभिभावकों, शिक्षकों, शैक्षणिक संस्थानों, विषय विशेषज्ञों और परीक्षा कराने वाली एजेंसियों से सुझाव मांगे हैं।

ISRO Roadmap: 2028 तक लॉन्च होगा भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन का पहला मॉड्यूल, इसरो का मून प्लान जानिए

ISRO Roadmap Bharatiya Antariksh Station:  चंद्रयान-3 की ऐतिहासिक सफलता के बाद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) अब स्पेस टेक्नोलॉजी के एक नए और महत्वाकांक्षी युग में प्रवेश करने की तैयारी में है। भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम अब सिर्फ रॉकेट लॉन्चिंग और उपग्रह भेजने तक सीमित नहीं है बल्कि इसका मुख्य फोकस अब मानव अंतरिक्ष उड़ान (ह्यूमन स्पेसफ्लाइट), भारत का अपना स्पेस स्टेशन, चंद्रमा से मिट्टी व पत्थरों के सैंपल वापस लाना और साल 2040 तक चांद पर भारतीय अंतरिक्ष यात्री को भेजने पर है।

IIT दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान ISRO के चेयरमैन और अंतरिक्ष विभाग के सचिव डॉ वी नारायणन ने भारत के भावी अंतरिक्ष रोडमैप, आगामी बड़े मिशनों और इस क्षेत्र में हो रहे ऐतिहासिक बदलावों के बारे में विस्तृत जानकारी साझा की।

440 से ज्यादा स्पेस स्टार्टअप कर रहे हैं काम

भारत के स्पेस सेक्टर में सबसे बड़ा बदलाव सरकारी संस्थानों के साथ-साथ प्राइवेट कंपनियों और स्टार्टअप की बढ़ती भागीदारी है। डॉ नारायणन के कहा कि 2020 में स्पेस सेक्टर रिफॉर्म्स के बाद देश में करीब 440 स्पेस स्टार्टअप चल रहे हैं। कंपनियों को सैटेलाइट, लॉन्च व्हीकल, स्पेस एप्लीकेशन और दूसरी नई टेक्नोलॉजी से जुड़े एरिया में काम करने के मौके बढ़े हैं। नतीजतन भारत का प्राइवेट स्पेस इकोसिस्टम भी ISRO के बड़े मिशन के साथ-साथ डेवलप हो रहा है।

भारत ने खुद डेवलप किया क्रायोजेनिक टेक्नोलॉजी

स्पेस सेक्टर में भारत की आत्मनिर्भरता का एक उदाहरण देते हुए डॉ नारायणन ने क्रायोजेनिक टेक्नोलॉजी का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि 1990 के दशक में भारत को यह टेक्नोलॉजी नहीं दी गई थी। इसके बाद ISRO ने इस टेक्नोलॉजी को देश में ही डेवलप करने पर काम किया। भारत ने अब तीन क्रायोजेनिक प्रोपल्शन सिस्टम डेवलप कर लिए हैं। इसका मतलब है कि भारत ने अब एक ऐसी टेक्नोलॉजी में अपनी क्षमताएं डेवलप कर ली हैं जिसके लिए पहले दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता था। यह क्षमता भविष्य के बड़े और भारी स्पेस मिशन के लिए भी बहुत जरूरी होगी।

अब चंद्रयान-4 की तैयारी

23 अगस्त 2023 भारत के स्पेस प्रोग्राम के लिए एक अहम दिन था। चंद्रयान-3 ने चांद के साउथ पोलर रीजन के पास सक्सेसफुली सॉफ्ट-लैंडिंग की। इसके बाद ISRO अब चांद के सैंपल धरती पर वापस लाने की दिशा में काम कर रहा है। डॉ नारायणन ने चंद्रयान-4 को इस बड़े लक्ष्य से जोड़ा और बताया कि इसका मकसद चांद के सैंपल निकालकर उन्हें धरती पर वापस लाना है। इसके अलावा भारत ने स्पेस में डॉकिंग टेक्नोलॉजी को सक्सेसफुली दिखाया। इस टेक्नोलॉजी को भविष्य के स्पेस स्टेशन और दूसरे मुश्किल मिशन के लिए बहुत जरूरी माना जाता है।

गगनयान के बाद भारतीय स्पेस स्टेशन

भारत का अगला बड़ा कदम इंसानों को स्पेस में भेजना है। ISRO गगनयान मिशन के तहत इंसानों को स्पेसफ्लाइट भेजने की तैयारी कर रहा है। अभी बिना पायलट वाली उड़ानों के जरिए मिशन की तैयारियों को आगे बढ़ा रहा है। भारत अपना भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन भी डेवलप कर रहा है। डॉ. नारायणन के मुताबिक, स्टेशन का पहला मॉड्यूल 2028 तक लॉन्च करने का प्लान है। आने वाले सालों में दूसरे मॉड्यूल भी जोड़े जाएंगे। इसका लक्ष्य 2035 तक इसे डेवलप करना है। यह भारत के लिए न सिर्प एक साइंटिफिक मिशन होगा बल्कि स्पेस में लंबे समय तक रिसर्च और टेक्नोलॉजी करने की क्षमता बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।

2040 तक चंद्रमा पर इंसान भेजने का प्लान

ISRO का रोडमैप सिर्फ लूनर मिशन तक ही खत्म नहीं होता है। भारत 2040 तक चांद पर ह्यूमन मिशन की दिशा में भी काम कर रहा है। इसके अलावा वीनस मिशन और नेक्स्ट-जेनरेशन लॉन्च व्हीकल पर भी काम चल रहा है। डॉ नारायणन ने कहा कि ISRO एक नेक्स्ट-जेनरेशन लॉन्च व्हीकल पर काम कर रहा है जो लो अर्थ ऑर्बिट में 30,000 किलोग्राम तक वजन ले जा सकता है। पार्शियली रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल सिस्टम पर भी काम चल रहा है।

स्पेस इकोनॉमी के लिए क्यों अहम है यह मिशन?

डॉ नारायणन ने कहा कि गगनयान, स्पेस स्टेशन, चंद्रयान-4, और भविष्य के बड़े लॉन्च व्हीकल सिर्फ साइंटिफिक उपलब्धियां नहीं हैं। वे प्राइवेट कंपनियों के लिए नई टेक्नोलॉजी, मैन्युफैक्चरिंग, रिसर्च और काम के नए एरिया भी शुरू कर सकते हैं।जैसे-जैसे स्पेस मि न की संख्या और कॉम्प्लेक्सिटी बढ़ेगी वैसे ही लॉन्च सिस्टम, सैटेलाइट टेक्नोलॉजी, स्पेस कम्युनिकेशन, डेटा और दूसरे स्पेस एप्लीकेशन से जुड़े एरिया में भी एक्टिविटी बढ़ेगी। यही वजह है कि स्पेस सेक्टर में सुधारों के बाद भारत में स्टार्टअप्स की बढ़ती संख्या को अहम माना जा रहा है। आने वाले सालों में ISRO के सरकारी मिशन के साथ-साथ प्राइवेट कंपनियों की भूमिका कैसे बढ़ती है, यह भारत की स्पेस इकॉनमी के विकास के लिए बहुत जरूरी होगा।

(दिल्ली से शुभांगी तिवारी की रिपोर्ट)

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नेपाल तबाही के बावजूद नहीं माना चीन : ब्रह्मपुत्र पर 14 लाख करोड़ का ‘सदी का बांध’ बनाने की ज़िद, भारत के पूर्वोत्तर पर बड़ा संकट?

नेपाल तबाही के बावजूद नहीं माना चीन : ब्रह्मपुत्र पर 14 लाख करोड़ का 'सदी का बांध' बनाने की ज़िद, भारत के पूर्वोत्तर पर बड़ा संकट?

China Brahmaputra Dam

China Brahmaputra Dam: तिब्बत के 'ग्रेट बैंड' (Great Bend) क्षेत्र में यारलुंग ज़ंगबो (ब्रह्मपुत्र नदी) के निचले प्रवाह पर चीन द्वारा 60 गीगावाट (GW) क्षमता की 'यारलुंग ज़ंगबो लोअर रीचेस हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट' का निर्माण भारत की सामरिक और जल सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।

14 लाख करोड़ (1.2 ट्रिलियन युआन) की लागत से बनने वाली यह परियोजना न केवल दुनिया का सबसे बड़ा जलविद्युत ढांचा (विश्व प्रसिद्ध 'थ्री गॉर्जियस डैम' से तीन गुना बड़ा) है, बल्कि यह सीधे भारत के अरुणाचल प्रदेश और असम की जीवन रेखा को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।
परियोजना की पूरी इनसाइड स्टोरी

 

China Brahmaputra Dam

 

 'ग्रेट बैंड' (बड़ा मोड़) पर इंजीनियरिंग की बिसात

यह विशाल बांध ब्रह्मपुत्र नदी के उस हिस्से पर बनाया जा रहा है जिसे “ग्रेट बैंड” (Great Bend) कहा जाता है। यहाँ से नदी एक तीखा मोड़ लेते हुए तेजी से भारत के अरुणाचल प्रदेश की ओर गिरती है।

  • रन-ऑफ-द-रिवर का दावा : यद्यपि चीन इसे 'रन-ऑफ-द-रिवर' परियोजना बता रहा है, लेकिन इसमें न्यिंगची के ऊपरी क्षेत्र मेनलिंग में एक विशाल जलाशय (Reservoir) का निर्माण शामिल है।
  • 40 किमी लंबी सुरंग : नदी के पानी को लगभग 40 किलोमीटर लंबी विशाल सुरंग के माध्यम से मोड़कर 5 पावरहाउस संचालित किए जाएंगे, जिसके बाद पानी पुनः निचले प्रवाह में मिल जाएगा।
  • जांगमू बांध का अनुभव : चीन पहले ही मध्य प्रवाह पर जांगमू बांध बना चुका है, जिससे तिब्बत की 26% बिजली मांग पूरी होती है।

भारत की 3 मुख्य चिंताएं और सामरिक कोण

चीन की इस ज़िद से भारत के पूर्वोत्तर राज्यों (विशेष रूप से अरुणाचल प्रदेश और असम) के लिए गंभीर स्थिति उत्पन्न हो गई है:

  1. जल प्रवाह और जलाशय का नियंत्रण : ऊपरी इलाके मेनलिंग में जलाशय बनने से चीन के पास ब्रह्मपुत्र के पानी को रोकने या अचानक छोड़ने की चाबी आ जाएगी। सूखे के मौसम में पानी रोका जा सकता है और मानसून में अचानक छोड़कर निचले इलाकों में कृत्रिम बाढ़ लाई जा सकती है।
  2. पारिस्थितिकी व भूकंपीय जोखिम: यह पूरा हिमालयी बेल्ट अत्यधिक संवेदनशील टेकटोनिक प्लेट्स (Seismic Zone V) पर स्थित है। हाल ही में नेपाल-चीन सीमा पर आए हिमस्खलन इस बात का प्रमाण हैं। इतने बड़े पैमाने पर टनलिंग और निर्माण से भूस्खलन व बांध टूटने का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा।
  3. डेटा साझाकरण में अनिश्चितता: यद्यपि दोनों देशों के बीच 'विशेषज्ञ-स्तरीय तंत्र' (Expert-Level Mechanism) मौजूद है, लेकिन सीमा तनाव के दौरान चीन द्वारा हाइड्रोलॉजिकल डेटा (जल-विज्ञान आंकड़े) देना निलंबित कर दिया जाता है, जिससे भारत समय पर बाढ़ की अग्रिम चेतावनी जारी करने में असमर्थ हो जाता है।

भारत की जल सुरक्षा पर मुख्य प्रभाव (Water Security Impact)

(A) 'वाटर वेपन' (Water Weapon) या कृत्रिम नियंत्रण का खतरा
यद्यपि बीजिंग इसे पर्यावरण-अनुकूल 'रन-ऑफ-द-रिवर' (Run-of-the-river) परियोजना बताता है, लेकिन इसमें तिब्बत के न्यिंगची स्थित मेनलिंग में एक विशाल जलाशय (Reservoir) और 40 किलोमीटर लंबी सुरंग शामिल है।

  • सूखे के मौसम में पानी का कम होना : शीत ऋतु या शुष्क मौसम (Lean Season) में चीन यदि जलाशय में पानी रोकता है, तो भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में पानी का प्राकृतिक प्रवाह 20% से 30% तक घट सकता है, जिससे कृषि, पेयजल और मत्स्य पालन संकट में आ जाएंगे।
  • आकस्मिक डिस्चार्ज और कृत्रिम बाढ़ : मानसून के दौरान चीन द्वारा बिना पूर्व चेतावनी भारी मात्रा में पानी छोड़ने पर असम के मैदानी इलाकों में अचानक विनाशकारी बाढ़ (Flash Floods) आ सकती है।

(B) हाइड्रोलॉजिकल डेटा साझाकरण में अनिश्चितता
भारत और चीन के बीच जल-विज्ञान संबंधी डेटा (पानी का बहाव और स्तर) साझा करने का समझौता है। लेकिन पूर्व के अनुभवों (जैसे 2017 के डोकलाम विवाद) में देखा गया है कि सीमा पर राजनीतिक या सैन्य तनाव के दौरान चीन अचानक डेटा रोक देता है। विश्वसनीय पूर्व चेतावनी के अभाव में भारत की आपदा प्रबंधन एजेंसियां समय पर कार्रवाई करने में असमर्थ हो जाती हैं।

China Brahmaputra Dam

(A) अरुणाचल प्रदेश : सियांग नदी का बिगड़ता स्वरूप

  • ब्रह्मपुत्र जब अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है, तो इसे सियांग (Siang) कहा जाता है।
  • ऊपरी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर टनलिंग और ब्लास्टिंग के कारण नदी के पानी में अत्यधिक गाद (Silt/Sediment) और मलबे की मात्रा बढ़ जाएगी, जिससे पानी पीने योग्य नहीं रहेगा और स्थानीय जलीय जीव नष्ट हो जाएंगे।
  • चीन के नियंत्रण से सीमावर्ती क्षेत्रों में अचानक जलस्तर के उतार-चढ़ाव से नदी तटबंधों का कटाव (Soil Erosion) तेज होगा।

(B) असम : ब्रह्मपुत्र घाटी की जैव-विविधता पर प्रहार

  • काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान पर खतरा : काजीरंगा का अनूठा पारिस्थितिकी तंत्र ब्रह्मपुत्र के प्राकृतिक जल चक्र और बाढ़ पर निर्भर है। पानी के अप्राकृतिक प्रवाह से एक-सींग वाले गैंडों और दुर्लभ वनस्पतियों के अस्तित्व पर खतरा मंडराएगा।
  • माजुली द्वीप का अस्तित्व संकट में: दुनिया के सबसे बड़े नदी द्वीप 'माजुली' (Majuli) का क्षेत्र पहले से ही कटाव के कारण घट रहा है। बांध से होने वाले अनियमित प्रवाह से माजुली का बचा हुआ हिस्सा भी जलमग्न होने या कटने के कगार पर पहुंच सकता है।

पारिस्थितिकीय और भूगर्भीय जोखिम (Ecological & Seismic Hazards)

  1. अत्यधिक भूकंप-संवेदनशील क्षेत्र (Seismic Zone V): 'ग्रेट बैंड' हिमालयन सिंटैक्सिस (Himalayan Syntaxis) पर स्थित है, जहां भारतीय और यूरेशियन प्लेट आपस में टकराती हैं। यहां 7+ तीव्रता के भूकंप आने की संभावना हमेशा बनी रहती है।
  2. बांध टूटने (Dam Failure) का भयानक खतरा : यदि भूकंप या लैंडस्लाइड के कारण चीन का यह विशाल बांध या जलाशय क्षतिग्रस्त होता है, तो लाखों क्यूसेक पानी अरुणाचल और असम को जलमग्न कर देगा, जिससे लाखों इंसानी जानें जा सकती हैं।

भारत का जवाबी और रणनीतिक एक्शन प्लान

चीन के इस 'जल-घेराबंदी' (Water Encirclement) का मुकाबला करने के लिए भारत ने अपनी रणनीति तेज कर दी है:

  • अरुणाचल प्रदेश में 'सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट' (Siang Upper Multipurpose Project): भारत सरकार अरुणाचल में 11 GW क्षमता वाले विशाल बांध के निर्माण की योजना पर तेजी से काम कर रही है। इसका मुख्य उद्देश्य बिजली बनाना नहीं, बल्कि चीन द्वारा अचानक छोड़े गए पानी को बफर के रूप में स्टोर करना और सूखे के दौरान पानी का प्रवाह बनाए रखना है।
  • अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक दबाव : भारत, बांग्लादेश के साथ मिलकर (जो ब्रह्मपुत्र का तीसरा सबसे बड़ा प्रभावित देश है) ट्रांस-बाउंड्री नदियों पर बहुपक्षीय संधि और तीसरे पक्ष की निगरानी (Third-party inspection) के लिए वैश्विक कूटनीतिक दबाव बढ़ा रहा है।
  • सैटेलाइट आधारित निगरानी : भारत की अंतरिक्ष एजेंसी (ISRO) और सैन्य उपग्रह तिब्बत में यारलुंग ज़ंगबो के प्रवाह, टनल निर्माण और जलाशयों में पानी के स्तर पर 24×7 रियल-टाइम निगरानी रख रहे हैं।

चीन का आधिकारिक पक्ष

दूसरी ओर, चीनी विदेश मंत्रालय का दावा है कि बीजिंग एक ज़िम्मेदार रुख अपना रहा है। चीन का तर्क है कि यह परियोजना पूरी नदी घाटी में बाढ़ नियंत्रण और आपदा प्रबंधन में मददगार साबित होगी तथा इससे भारत या बांग्लादेश जैसे निचले प्रवाह वाले देशों को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा।

ISRO Privatisation: निजीकरण की खबरों को ISRO ने ‘बेबुनियाद’ बताया, कहा- हमारी अहमियत बनी रहेगी

ISRO Privatisation: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने अपने निजीकरण की खबरों को खारिज किया है। एजेंसी ने ऐसी अटकलों को ‘बेबुनियाद और गलत’ बताया। ISRO ने कहा कि स्पेस सेक्टर में निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ रही है। लेकिन इससे उसकी भूमिका कम नहीं होगी।

ISRO देश में एडवांस्ड स्पेस रिसर्च और टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट का मुख्य संस्थान बना रहेगा। राष्ट्रीय और रणनीतिक मिशन भी उसके पास रहेंगे। अंतरिक्ष विज्ञान, खोज और महत्वपूर्ण स्पेस टेक्नोलॉजी पर भी ISRO काम करता रहेगा।

निजी कंपनियों की एंट्री क्यों बढ़ रही है?

भारत अपने स्पेस सेक्टर में ज्यादा कंपनियों को जोड़ रहा है। इसमें प्राइवेट कंपनियां, स्टार्टअप, शिक्षण संस्थान और सरकारी कंपनियां शामिल हैं।

ISRO के मुताबिक, इसका मतलब यह नहीं है कि एजेंसी की अहमियत घट रही है। मकसद पूरे स्पेस इकोसिस्टम को बड़ा बनाना है। इससे ISRO को ज्यादा जटिल और नई तकनीकों पर ध्यान देने का मौका मिलेगा। ISRO ने कहा कि बदलाव उसकी भूमिका में नहीं, बल्कि पूरे स्पेस सेक्टर के आकार और काम करने के तरीके में है।

ISRO अब किन कामों पर ज्यादा ध्यान देगा?

ISRO का फोकस अब अगली पीढ़ी की तकनीकों पर और बढ़ेगा। इसमें अत्याधुनिक रिसर्च, मानव अंतरिक्ष उड़ान और नए लॉन्च सिस्टम शामिल हैं। डीप स्पेस और दूसरे ग्रहों से जुड़े मिशन भी अहम रहेंगे। रणनीतिक तकनीकों पर भी ISRO काम करता रहेगा।

इसके अलावा कम्युनिकेशन, नेविगेशन और अर्थ ऑब्जर्वेशन के लिए एडवांस्ड पेलोड बनाए जाएंगे। सेंसर और प्रोपल्शन सिस्टम जैसी महत्वपूर्ण तकनीकों पर भी काम जारी रहेगा।

मच्योर टेक्नोलॉजी बनाएगा प्राइवेट सेक्टर

जो तकनीक पूरी तरह तैयार हो चुकी है, उसका बड़े स्तर पर उत्पादन निजी कंपनियां और सरकारी कंपनियां कर सकती हैं। इसमें मच्योर लॉन्च व्हीकल, नियमित तौर पर बनने वाले सैटेलाइट और दूसरे स्थापित सिस्टम शामिल हैं।

ISRO पहले ही कई तकनीकों को इंडस्ट्री को ट्रांसफर कर चुका है। एजेंसी ने साफ किया कि टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का मतलब यह नहीं है कि वह उस क्षेत्र से हट रही है।

इसका मकसद बड़े स्तर पर उत्पादन बढ़ाना है। इससे कमर्शियलाइजेशन और इनोवेशन को भी बढ़ावा मिलेगा। कंपनियों को ग्लोबल मार्केट तक पहुंचने का मौका मिलेगा।

ISRO की भूमिका क्या रहेगी?

ISRO के पास मुख्य वैज्ञानिक और रणनीतिक जिम्मेदारियां रहेंगी। वहीं, इंडस्ट्री को तैयार तकनीकों को बड़े स्तर पर बनाने की जिम्मेदारी ज्यादा मिल सकती है। इससे ISRO अपने वैज्ञानिकों और संसाधनों को एडवांस्ड रिसर्च पर लगा सकेगा। दूसरी तरफ, निजी कंपनियां निवेश और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ाएंगी।

ISRO ने इस मॉडल को ‘ISRO-led national space ecosystem’ बताया है। यानी ISRO की भूमिका खत्म नहीं हो रही है। बल्कि स्पेस सेक्टर में ज्यादा कंपनियों के आने के साथ उसका फोकस और ज्यादा एडवांस्ड मिशन पर होगा।

PM Modi: पीएम मोदी ने दिल्ली बिल्डिंग हादसे पर जताया दुख, अब तक तीन लोगों की हुई मौत

Top News 4 September: देशभर में जन्माष्टमी की धूम, ISRO का EOS-05 लॉन्च, क्रूड 100 डॉलर के करीब

Top News 4 September: देशभर में जन्माष्टमी की धूम, ISRO का EOS-05 लॉन्च, क्रूड 100 डॉलर के करीब

top news 4 september : Janamashtmi, crude, ISRO EOS-05

Top News 4 September : देशभर में कृष्ण जन्माष्टमी की धूम, इसरों ने अंतरिक्ष में ईओएस-05 उपग्रह प्रक्षेपित किया। इंडियन बास्केट में क्रूड फिर 100 डॉलर के करीब पहुंचा। नेपाल भीषण बाढ़ के बाद भूकंप से थर्राया। अभिजीत दीपके की पीएम मोदी को अनोख चुनौती। 4 सितंबर की बड़ी खबरें :   

 

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की धूम 

देशभर में जन्माष्‍टमी पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है। मथुरा, वृंदावन समेत देशभर के कृष्ण मंदिरों में उमड़ी भक्तों की भीड़। शुक्रवार मध्यरात्रि 12 बजे होने वाले कृष्ण जन्मोत्सव की सभी तैयारियां हो चुकी है। पीएम नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को जन्माष्टमी की शुभकामनाएं दी। ALSO READ: कान्हा की नगरी में गूंजा कृष्ण नाम, जन्मभूमि से निकली भव्य श्रीकृष्णोत्सव शोभायात्रा, भक्तों का उमड़ा सैलाब

 

इसरो ने अंतरिक्ष में भेजा ईओएस-05 उपग्रह

इसरो ने ईओएस-05 उपग्रह का आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से प्रक्षेपण किया। जीएसएलवी-एफ17 रॉकेट के माध्यम से प्रक्षेपित उपग्रह भारत का पहला अत्याधुनिक भू-तुल्यकालिक इमेजिंग सैटेलाइट है।

 

क्रूड फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब

अमेरिका और ईरान के बीच जंग से तेल की कीमतें एक बार फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंचती नजर आ रही है। इंडियन बास्केट में आज कच्चे तेल के दाम 99.35 डॉलर प्रति बैरल हो गए। ब्रेंट क्रूड 96 डॉलर प्रति बैरल और WTI क्रूड 91.92 डॉलर प्रति बैरल है। 

 

नेपाल में भूकंप

नेपाल और तिब्बत में ग्लेशियर आपदा के बाद आई विनाशकारी बाढ़ के बीच गुरुवार को तिब्बत में 5.0 तीव्रता का भूकंप आया। भारत के नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी के मुताबिक, भूकंप का केंद्र उत्तराखंड के जोशीमठ से करीब 128 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में था। भूकंप के बाद फिलहाल किसी तरह के जान-माल के नुकसान की जानकारी सामने नहीं आई है। ALSO READ: Tibet Earthquake : भीषण बाढ़ की तबाही के बाद नेपाल पर एक और मुसीबत, हिमालयी क्षेत्र में क्यों मंडरा रहा है खतरा

 

अभिजीत दीपके की पीएम मोदी को चुनौती

कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने अपनी शैक्षणिक योग्यता पर उठ रहे सवालों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक अनोखी चुनौती दी है। अमेरिका की बोस्टन यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई के रिकॉर्ड पर हाल ही में शुरू हुए विवाद के बाद दीपके ने पीएम मोदी से कहा कि चलिए दोनों अपनी-अपनी डिग्री सार्वजनिक करते हैं। ALSO READ: अमेरिका में पढ़ाई पर घिरे अभिजीत दीपके ने PM मोदी को दी चुनौती, जानिए क्या कहा…

नेपाल में भूकंप जैसे आया पानी का बवंडर और उसी के साथ बहने लगा 24 साल का मजदूर बिबेक कुमाल! जीवन और मौत के बीच ऐसे हुआ मुकाबला

Nepal Flash Flood: नेपाल में बुधवार को हिमालयी क्षेत्र और तिब्बत सीमा के पास आई अचानक और भीषण बाढ़ हाल के कुछ सालों की की सबसे भयावह आपदा बन चुकी है। नेपाल-तिब्बत सीमा के पास आई विनाशकारी बाढ़ में अब तक कम से कम 160 लोगों की मौत हो चुकी है जबकि लगभग 1500 लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। नेपाली विदेश मंत्री शिशिर खनाल के मुताबिक लापता लोगों में करीब 300 भारतीय पर्यटक भी शामिल हैं। इस फ्लैश फ्लड ने सड़कों और बेसिक इंफ्रा को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है जिससे राहत और बचाव टीमों को कई प्रभावित इलाकों तक पहुंचने में भारी मशक्कत करनी पड़ रही है। इस बीच इस फ्लड का शिकार हुए लोगों की ऐसी कहानियां सामने आ रही हैं जो दहला रही हैं।

आम के पेड़ ने बचाई बिबेक की जिंदगी, देखते ही देखते गायब हो गया मकान

बाढ़ के इस तांडव से सुरक्षित बचे 24 साल के मजदूर बिबेक कुमाल की कहानी चमत्कार से कम नहीं है। जब यह आफत आई तब बिबेक बिदुर इलाके में मजदूरी कर रहे थे। हमारी सहयोगी वेबसाइट फर्स्ट पोस्ट ने अपनी रिपोर्ट में रॉयटर्स के हवाले से बताया है कि बिबेक एक नए बने मकान के बाहर शौचालय के लिए गड्ढा खोद रहे थे तभी उन्हें अचानक एक फुफकार जैसी तेज आवाज सुनाई दी। उनके ऊपर काम कर रहे चार साथियों ने उन्हें तुरंत बाहर निकलकर भागने के लिए चिल्लाया।

बिबेक गड्ढे से बाहर तो निकल गए लेकिन पानी की हाहाकारी धारा ने उन्हें तुरंत अपनी चपेट में ले लिया। काठमांडू के एक अस्पताल में इलाज करा रहे बिबेक ने कहा कि, ‘मैंने भागना शुरू किया तभी पानी की एक विशाल दीवार ऐसे गरजती हुई नीचे आई मानो भूकंप आ गया हो।’ बाढ़ का पानी, कीचड़ और मलबा उन्हें अपने साथ बहाकर ले जाने लगा। लेकिन तभी अचानक किस्मत से वे एक आम के पेड़ में जाकर अटक गए।

बिबेक ने कहा कि ‘सौभाग्य से मैं एक आम के पेड़ में अटक गया। अगर वह आम का पेड़ न होता तो मैं बहकर मौत के मुंह में चला जाता।’ बिबेक ने बताया कि जब वे पेड़ को पकड़े हुए थे तब उन्होंने अपनी आंखों के सामने उस पूरे मकान को गायब होते देखा जहां वे काम कर रहे थे। बाद में पुलिस ने मौके पर पहुंचकर उन्हें सुरक्षित बाहर निकाला। पानी के तेज बहाव और एक बड़े पत्थर की चपेट में आने से उनके दाहिने पैर में काफी चोटें आई हैं।

कीचड़ की दीवार में बह गई पत्नी, हेलीकॉप्टर से बचाए गए केशव प्रसाद

ऐसी ही कुछ कहानी 68 साल के केशव प्रसाद बराल की है। बाढ़ आने पर उन्हें संभलने तक का मौका नहीं मिला। उन्होंने रॉयटर्स को बताया कि उन्होंने अपने घर की तरफ कीचड़ का एक विशाल गुबार आते देखा। उन्होंने कहा कि कीचड़ का एक बहुत बड़ा सैलाब सीधा हमारी ओर आ रहा था। जैसे-जैसे यह करीब आ रहा था, इसकी ऊंचाई और बढ़ती जा रही थी।

जब कीचड़ घर में दाखिल हुआ तो केशव ने अपनी पत्नी का हाथ पकड़कर उन्हें छत पर ले जाने की कोशिश की। लेकिन कीचड़ के प्रचंड बहाव ने उनकी पत्नी को खींच लिया और वे बह गईं। बाद में केशव प्रसाद को हेलीकॉप्टर के जरिए रेस्क्यू किया गया लेकिन उनकी पत्नी अब भी कीचड़ के नीचे लापता हैं। शायद उनकी जान नहीं बच पाई है।

पीने को एक गिलास पानी तक नहीं बचा

बाढ़ प्रभावित एक और बस्ती में रहने वाली दीपिका (बदला हुआ नाम) ने भी इस तबाही का खौफनाक मंजर देखा। वे सुबह करीब 9:30 बजे अपने घर के बाहर बर्तन धो रही थीं। तभी उन्होंने त्रिशूली नदी के बाढ़ के पानी को तेज स्पीड से आते देखा। एनडीटीवी को उन्होंने बताया कि बाहर होने की वजह से वे तुरंत अपने परिवार को अलर्ट कर पाईं और उन्हें लेकर घर की छत पर भाग कर गईं।

त्रिशूली नदी के जलस्तर में अचानक हुए इस इजाफे से उनके घर की पहली मंजिल पूरी तरह कीचड़ से भर गई। उनका परिवार तो बच गया लेकिन घर का सारा सामान और जमा पूंजी मलबे में दफन हो गई। दीपिका ने बताया कि उनके पास पीने के लिए एक गिलास पानी तक नहीं बचा है। उन्होंने अपने आंगन की ओर इशारा करते हुए कहा कि जहां पीने के पानी का मटका रखा हुआ करता था अब वहां कुछ नहीं है।

इसी तरह एक दूसरी पीड़िता कल्पना मल्ला ने बीबीसी को बताया कि उन्होंने अपने पिता, मां, बहन और बहन के बच्चों को पानी के तेज बहाव में बहते देखा। कल्पना और उनका बेटा किसी तरह एक मकान की छत पर चढ़ने में सफल रहे। उन्होंने कहा कि उनके पास बचने का कोई मौका ही नहीं था। इस बाढ़ ने सब कुछ छीन लिया, लेकिन मैं और मेरा बेटा किसी तरह छत पर चढ़कर बच पाए।

सड़कों और बिजली इंफ्रास्ट्रक्चर को भारी नुकसान, इसरो ने बताई वजह

बाढ़ का पानी उतरने के बाद प्रभावित इलाकों के लोग नेपाल सेना के ट्रेनिंग सेंटर के बाहर अपने लापता रिश्तेदारों की जानकारी पाने के लिए जमा हो रहे हैं। यहां से हेलीकॉप्टर रेस्क्यू ऑपरेशन का संचालन किया जा रहा है। पुलिस लापता लोगों के नाम दर्ज कर रही है। इस आपदा ने देश के बुनियादी ढांचे को तहस-नहस कर दिया है। एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक प्रभावित इलाके के छह बड़े हाइड्रोपावर स्टेशनों को भारी नुकसान पहुंचा है। बड़े पैमाने पर बिजली आपूर्ति ठप हो गई है।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के शुरुआती विश्लेषण के मुताबिक नेपाल-तिब्बत सीमा के पास रसुवा जिले में आई इस विनाशकारी बाढ़ की मुख्य वजह ऊपरी हिमालयी क्षेत्र में एक बड़े ग्लेशियर का ढहना हो सकता है। तबाही के पूरे पैमाने का आकलन अभी जारी है और मौतों का आंकड़ा और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

बाढ़ के बीच में भी नेपाल की क्रिकेट टीम ने मैच जीतकर जनता को ढांढस बंधाई

नेपाल में बाढ़ ने मुश्किल हालत पैदा कर दी है लेकिन इसके बावजूद टीम ने अपने घरवालों की चिंता के बीच मलेशिया से खेले गए अभ्यास मैच में जीत अर्जित कर पूरे देश का मनोबल बढ़ाने का काम किया है। गौरतलब है कि नेपाल में आई बाढ़ के कारण कुल 177 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है।

मैच की बात करें तो नेपाल ने दूसरे अंतरराष्ट्रीय अभ्यास मैच में मलेशिया पर 27 रनों से जीत अर्जित की। पहले बल्लेबाजी करने उतरी नेपाल का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा और उसने 41.4 ओवरों में 170 रन बनाए। मलेशिया भी नेपाल के खिलाफ बल्ले से औसत खेल भी नहीं खेल पाई और 40.1 ओवर में 143 रन बनाकर आउट हो गई।

यह जीत क्रिकेट से ज्यादा देश के लिए है क्योंकि नेपाल नाजुक हालत से गुजर रहा है।गौरतलब है कि नेपाल-तिब्बत सीमा पर स्थित उत्तरी रसुवा जिले में भोटेकोशी नदी में आए भयंकर सैलाब और लैंडस्लाइड में 1500 से अधिक लोग लापता है। वहीं इस आपदा में बड़ी संख्या में भारतीय भी लापता है। कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर कई तीर्थ यात्रियों के लापता होने की जानकारी भी सामने आ रही है।

नेपाल में आई इस विनाशकारी बाढ़ भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की प्रमुख इकाई राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC) ने शुरुआती सैटेलाइट आधारित रिसर्च किया है। भारतीय और अंतरराष्ट्रीय उपग्रहों से प्राप्त तस्वीरों का उपयोग करते हुए वैज्ञानिकों ने तबाही के पैमाने का आकलन किया और उन घटनाओं को समझने की कोशिश की, जिनके कारण हाल के सालों में हिमालयी क्षेत्र की सबसे भीषण प्राकृतिक आपदाओं में से एक सामने आई।


4.9 तीव्रता से आए भूकंप के कारण टूटा ग्लेशियर, क्या आइस-रॉक एवलॉन्च है तबाही की वजह?

4.9 तीव्रता से आए भूकंप के कारण टूटा ग्लेशियर, क्या आइस-रॉक एवलॉन्च है तबाही की वजह?

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नेपाल में आई इस विनाशकारी बाढ़ भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की प्रमुख इकाई राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC) ने शुरुआती सैटेलाइट आधारित रिसर्च किया है। भारतीय और अंतरराष्ट्रीय उपग्रहों से प्राप्त तस्वीरों का उपयोग करते हुए वैज्ञानिकों ने तबाही के पैमाने का आकलन किया और उन घटनाओं को समझने की कोशिश की, जिनके कारण हाल के सालों में हिमालयी क्षेत्र की सबसे भीषण प्राकृतिक आपदाओं में से एक सामने आई।

वर्तमान में भारत के 56 उपग्रह पृथ्वी की कक्षा में सक्रिय हैं। NRSC के शुरुआती विश्लेषण के अनुसार, इस आपदा की शुरुआत तिब्बत के ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र में हुई। वैज्ञानिकों का मानना है कि 4.9 तीव्रता के भूकंप ने संभवतः एक सर्क ग्लेशियर (Cirque Glacier) को प्रभावित किया, जिसके बाद उसका एक बड़ा हिस्सा ढह गया। इस घटना से बर्फ और चट्टानों का विशाल हिमस्खलन हुआ, जो तेजी से नीचे घाटी की ओर बढ़ा। जो भारी मात्रा में पानी, मिट्टी, चट्टानें और मलबा लेकर अचानक नीचे की ओर बहा. इससे त्रिशूली नदी में भीषण बाढ़ आई, जिसने व्यापक तबाही मचाई। सैटेलाइट इमेज की स्टडी कर रहे वैज्ञानिकों का मानना है कि सर्क ग्लेशियर का ढहना और उसके बाद हुआ आइस-रॉक एवलॉन्च इस आपदा की सबसे संभावित वजह है।

पहाड़ी इलाकों को ज्यादा खतरा : इन झीलों से पैदा होने वाला खतरा मुख्य रूप से उन पर्वतीय और पहाड़ी जिलों में केंद्रित हैं, जो नीचे की ओर बहने वाली नदी घाटियों के रास्ते में स्थित हैं। यदि कोई बड़ा 'ग्लोफ' होता है, तो इन क्षेत्रों के लोगों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। पूर्वी और मध्य नेपाल, जिनमें कोशी और बागमती नदी बेसिन शामिल हैं, वहां कुल क्षेत्रीय जोखिम का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा संवेदनशील क्षेत्रों में केंद्रित है। सबसे अधिक जोखिम वाले जिलों में सोलुखुम्बु शामिल है, जहां दूध कोसी और इमजा बेसिन आते हैं। संखुवासभा जिला बरुण और अरुण नदी घाटियों के किनारे स्थित है। दोलखा जिला तामा कोशी नदी कॉरिडोर में है और त्सो रोल्पा झील से खतरे का सामना कर सकता है।

ISRO Recruitment 2026: अंतरिक्ष विभाग और इसरो ने 746 पदों पर भर्ती शुरू, 92 साइंटिस्ट/इंजीनियर और 410 एप्रेंटिस के पद भी भरे जाएंगे

ISRO Recruitment 2026: अंतरिक्ष विभाग (DoS) और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (ISRO) ने हाल के वर्षों में अपनी सबसे बड़ी भर्ती प्रक्रिया के लिए नोटिफिकेशन जारी किया है। अंतरिक्ष विभाग और इसरो ने 746 अलग-अलग पदों पर भर्ती प्रक्रिया शुरू की है। इनमें से कम से कम 43 बैकलॉग पद हैं। इसरो में नौकरी से जुड़ी सभी डिटेल्स ऑफिशियल वेबसाइट isro.gov.in/careers पर चेक कर सकते हैं।

आवेदन ऑनलाइन मोड में करना होगा। इच्छुक और योग्य उम्मीदवार इसरो के ऑफिशियल रिक्रूटमेंट पोर्टल पर 17 अगस्त 2026 तक फॉर्म भर सकते हैं। इन पदों पर भर्ती के लिए इसरो ने 27 जुलाई से 29 जुलाई के बीच तीन नोटिफिकेशन जारी किए थे। इसके तहत 336 रेगुलर और 410 अप्रेंटिसशिप पद शामिल हैं। इसरो की इस भर्ती प्रक्रिया के तहत वैज्ञानिकों और इंजीनियरों से लेकर प्रशासनिक स्टाफ और अप्रेंटिस तक के पद पर भर्तियां की जाएंगी। इसमें 92 पद साइंटिस्ट और इंजीनियर के भी हैं। इसरो साइंटिस्ट की सैलरी पे-मैट्रिक्स लेवल-10 के हिसाब से होती है।

किन पदों पर कितनी वैकेंसी?

इसरो के भर्ती अभियान को अलग-अलग श्रेणी में बांटा गया है, जिससे हर वर्ग और योग्यता वाले अभ्यर्थियों को मौका मिल सके: इस ताजा भर्ती प्रक्रिया का सबसे बड़ा हिस्सा इसरो सेंट्रलाइज्ड रिक्रूटमेंट बोर्ड (ICRB) के जरिए 244 लेवल-4 प्रशासनिक पदों पर भर्ती का है। इनमें 113 सहायक, 81 कनिष्ठ निजी सहायक, 22 अपर डिविजन क्लर्क, 10 आशुलिपिक, स्वायत्त संस्थानों के लिए 17 सहायक और एक स्वायत्त संस्थान के लिए एक कनिष्ठ निजी सहायक शामिल हैं।

इस भर्ती में वेतन मैट्रिक्स के लेवल-10 में 92 वैज्ञानिक/इंजीनियर ‘एससी’ पद भी शामिल हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स में सबसे ज्यादा 34 पद खाली हैं। इसके बाद मैकेनिकल (26), कंप्यूटर साइंस (13), सिविल (10), इलेक्ट्रिकल (4), प्रशीतन और एयर-कंडीशनिंग (2), आर्किटेक्चर (2) और अहमदाबाद के भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल) में एक सिविल इंजीनियर का पद हैं।

परमानेंट भर्ती के साथ, URSC, बेंगलुरु ने 2026-27 के लिए 410 अप्रेंटिसशिप पोस्ट की घोषणा की है। इनमें 220 ग्रेजुएट अप्रेंटिस, 120 टेक्नीशियन अप्रेंटिस और 70 डिप्लोमा इन कमर्शियल प्रैक्टिस अप्रेंटिस शामिल हैं।

ग्रेजुएट अप्रेंटिसशिप में इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग (83 पोस्ट) सबसे ज़्यादा हैं, इसके बाद मैकेनिकल (50), कंप्यूटर साइंस (40), केमिकल (15), इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट (10), एयरोनॉटिकल (10), एयरोस्पेस (10) और ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग (2) हैं। टेक्नीशियन अप्रेंटिसशिप में 38 इलेक्ट्रॉनिक्स, 30 कंप्यूटर साइंस, 30 मैकेनिकल, 10 इलेक्ट्रिकल, 5 सिविल, 5 इंस्ट्रूमेंटेशन और 2 ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग पोस्ट शामिल हैं।

अप्रेंटिस और साइंटिस्ट वेतन

इसरो अप्रेंटिस एक्ट, 1961 के तहत कानूनी जरूरतों को पूरा करने और नए स्नाताकों को प्रशिक्षित करने के लिए अप्रेंटिस भर्ती करता है। सभी उम्मीदवारों को मासिक स्टाइपेंड मिलता है, जो 10,900 रुपये से 12,300 रुपये है। वहीं, साइंटिस्ट/’SC’ के पद पर चयनित होने वाले उम्मीदवारों का शुरुआती बेसिक पे 56,100 रुपये प्रति माह होगा। इसके साथ ही केंद्र सरकार के नियमानुसार डीए, एचआरए और मेडिकल जैसी अन्य तमाम सुविधाएं भी मिलेंगी।

इसरो में नौकरी के लिए जरूरी योग्यता

साइंटिस्ट और इंजीनियर के पदों पर भर्ती के लिए संबंधित ट्रेड में बीई या बीटेक की डिग्री होनी चाहिए, जिसमें कम से कम 65% अंक होने जरूरी हैं। इस बार साइंटिस्ट पदों के लिए GATE (2025 या 2026) स्कोर के आधार पर शॉर्टलिस्टिंग की जाएगी। इसके बाद शॉर्टलिस्ट किए गए युवाओं को इंटरव्यू के लिए बुलाया जाएगा। अंतिम चयन में 50% वेटेज गेट स्कोर का और 50% वेटेज इंटरव्यू का रहेगा। वहीं प्रशासनिक और अप्रेंटिस पदों के लिए अलग-अलग लिखित परीक्षा या मेरिट के आधार पर चयन किया जाएगा।

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