L&T Target Price: मैनेजमेंट से मुलाकात के बाद JPMorgan ने सबसे बड़ा टारगेट दिया, 30% चढ़ सकता है स्टॉक

L&T Target Price: ब्रोकरेज फर्म JPMorgan ने दिग्गज इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी Larsen and Toubro यानी L&T के शेयर पर ‘Overweight’ रेटिंग बरकरार रखी है। ब्रोकरेज ने शेयर का टारगेट प्राइस ₹5,060 रखा है। इस टारगेट के हिसाब से मौजूदा स्तर से शेयर में करीब 30% की तेजी की गुंजाइश है।

मंगलवार को L&T का शेयर 0.7% गिरकर ₹3,877 पर बंद हुआ। इस साल अब तक शेयर करीब 6% नीचे है। JPMorgan का ₹5,060 का टारगेट L&T के लिए सबसे ऊंचे टारगेट में शामिल है।

पश्चिम एशिया में प्रोजेक्ट्स पर बड़ा अपडेट

JPMorgan ने L&T के मैनेजमेंट से मुलाकात की। इसके बाद ब्रोकरेज ने अपनी रिपोर्ट जारी की। मैनेजमेंट के मुताबिक पश्चिम एशिया में कंपनी के प्रोजेक्ट्स का काम अभी भी बिना किसी बड़ी रुकावट के चल रहा है।

पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण लागत बढ़ी है। हालांकि, कंपनी के ग्राहकों ने बड़े स्तर पर इस बढ़ी हुई लागत को स्वीकार किया है। L&T ने इस मुश्किल दौर में ग्राहकों के साथ अपने मजबूत रिश्ते बनाए रखने पर फोकस जारी रखने की बात कही है।

भारत में सरकारी खर्च बढ़ने की उम्मीद

L&T के मुताबिक भारत में सरकारी कैपेक्स कुछ समय तक सुस्त रहने के बाद फिर बढ़ सकता है। वहीं, निजी कंपनियों का कैपेक्स भी अब रफ्तार पकड़ रहा है। इसमें थर्मल पावर सेक्टर में मिले बड़े ऑर्डर की अहम भूमिका है।

कंपनी ने आगे के लिए कई नए क्षेत्रों पर भी फोकस किया है। इनमें डेटा सेंटर, ग्रीन एनर्जी और इलेक्ट्रॉनिक मैन्युफैक्चरिंग शामिल हैं।

इसके अलावा L&T ने 2031 तक अपने डिफेंस कारोबार से होने वाले रेवेन्यू को दोगुना करने का लक्ष्य रखा है। कंपनी का फोकस रिटर्न ऑन इक्विटी, कैश फ्लो और शेयरधारकों को मिलने वाले रिटर्न पर भी बना रहेगा।

मिड-टीन्स ग्रोथ की उम्मीद

JPMorgan के मुताबिक पश्चिम एशिया का संघर्ष L&T के शेयर के लिए एक जोखिम बना हुआ है। इसके बावजूद कंपनी के कारोबार को पारंपरिक और नए क्षेत्रों में मिड-टीन्स यानी सालाना करीब 13-16% की ग्रोथ के लिए तैयार किया जा रहा है।

ब्रोकरेज के मुताबिक कंपनी के रिटर्न ऑन इक्विटी में भी मजबूती बनी हुई है। JPMorgan ने यह भी कहा कि L&T का वैल्यूएशन 25 गुना से कम P/E पर है। ब्रोकरेज ने इसे आकर्षक बताया है।

₹5,000 के ऊपर टारगेट देने वाले ब्रोकरेज

JPMorgan के अलावा दो और ब्रोकरेज ने L&T के लिए ₹5,000 या उससे ज्यादा का टारगेट दिया है। Jefferies और ICICI Direct दोनों ने शेयर का टारगेट ₹5,000 रखा है।

L&T को कुल 32 एनालिस्ट कवर कर रहे हैं। इनमें 26 ने शेयर पर ‘Buy’, 5 ने ‘Hold’ और 1 एनालिस्ट ने ‘Sell’ रेटिंग दी है।

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Rare Earth Magnet Scheme: ₹7280 करोड़ की सरकारी योजना, L&T और कोल इंडिया समेत 20 कंपनियों ने बोली लगाई

Rare Earth Magnet Scheme: सरकार की ₹7,280 करोड़ की रेयर अर्थ मैग्नेट मैन्युफैक्चरिंग योजना को कंपनियों का जबरदस्त रिस्पॉन्स मिला है। Larsen & Toubro (L&T), Coal India, ReNew, Attero Recycling और Lohum Magnets & Energy Solutions समेत 20 कंपनियों ने इस योजना के लिए बोली लगाई है।

भारी उद्योग मंत्रालय ने गुरुवार को इसकी जानकारी दी। तकनीकी बोलियां 13 अगस्त को खोली गईं। आवेदन जमा करने की आखिरी तारीख 12 अगस्त थी।

कौन-कौन सी कंपनियां दौड़ में हैं?

इस योजना में भारतीय कंपनियों के साथ विदेशी कंपनियों ने भी हिस्सा लिया है। इनमें NEO Performance Materials (Singapore) और जापान की Proterial की भारतीय इकाई Proterial India भी शामिल हैं।

इसके अलावा 20 Microns, N.A.N. Magnetech, PrNd Metal and Magnets, Prozeal Green Energy और Ramp Metals & Minerals जैसी कंपनियों ने भी बोली लगाई है।

सरकार की योजना क्या है?

सरकार इस योजना के तहत भारत में हर साल 6,000 मीट्रिक टन सिंटर्ड NdFeB रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट बनाने की क्षमता चाहती है। इस बंटवारा 5 कंपनियों के बीच किया जाएगा। हर कंपनी को अधिकतम 1,200 मीट्रिक टन सालाना क्षमता मिल सकती है।

केंद्रीय कैबिनेट ने नवंबर 2025 में इस योजना को मंजूरी दी थी। योजना की अवधि 7 साल होगी। इसमें पहले 2 साल फैक्ट्री लगाने के लिए होंगे। इसके बाद 5 साल तक बिक्री के आधार पर इंसेंटिव मिलेगा।

रेयर अर्थ मैग्नेट इतने अहम क्यों हैं?

रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट का इस्तेमाल इलेक्ट्रिक व्हीकल, विंड टरबाइन, हाई-एंड इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोस्पेस और डिफेंस सिस्टम में होता है। सरकार का लक्ष्य भारत में NdPr ऑक्साइड से लेकर तैयार मैग्नेट तक पूरी वैल्यू चेन विकसित करना है।

चीन पर निर्भरता घटाने की तैयारी

इस सेक्टर में चीन का दबदबा है। भारत अभी रेयर अर्थ मैग्नेट के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है। साल 2025 में चीन के एक्सपोर्ट प्रतिबंधों से सप्लाई प्रभावित हुई थी। इससे कई उद्योगों में कमी देखने को मिली। सरकार अब घरेलू उत्पादन बढ़ाकर आयात पर निर्भरता कम करना और सप्लाई को सुरक्षित बनाना चाहती है।

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