वंदे मातरम् पर फिर घमासान: 150 साल पुराने गीत में आज का भारत क्या खोज रहा है?

वंदे मातरम् पर फिर घमासान: 150 साल पुराने गीत में आज का भारत क्या खोज रहा है?


बंकिमचंद्र की कविता से स्वतंत्रता संग्राम के उद्घोष तक और 2026 की सियासी बहस तक—‘वंदे मातरम्’ की पूरी कहानी, जिसमें इतिहास भी है, विवाद भी और भारत को समझने का एक बड़ा सवाल भी।

वंदे मातरम्। दो शब्द। डेढ़ सौ साल का इतिहास। और आज फिर एक राजनीतिक विवाद। सवाल सिर्फ गीत का नहीं है। सवाल उस भारत का है, जिसे हम इन दो शब्दों में देखते हैं।

गुलामी का दर्द, आजादी का सपना, स्वदेशी आंदोलन, क्रांतिकारियों का साहस, संविधान सभा की गरिमा और आज की राजनीति की गर्मी—सब कुछ ‘वंदे मातरम्’ के साथ चलता आया है।

150 साल बाद भी अगर ये दो शब्द बहस के केंद्र में हैं, तो यह उनकी कमजोरी नहीं, उनकी ताकत का प्रमाण है। लेकिन कहानी 1875 से थोड़ी पहले शुरू होती है।

जब धरती सिर्फ जमीन नहीं, मां थी

अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त की एक पंक्ति है—
माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।”
पृथ्वी मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूं।

इसे आधुनिक राष्ट्रवाद का प्राचीन प्रमाण मान लेना इतिहास के साथ ज्यादती होगी। उस समय आधुनिक अर्थों वाला राष्ट्र-राज्य था ही नहीं। लेकिन इतना जरूर है कि भारतीय सभ्यता में धरती को केवल जमीन नहीं, जीवन और मातृत्व से जोड़कर देखने का भाव बहुत पुराना है।

19वीं सदी में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने इसी सांस्कृतिक भावभूमि को औपनिवेशिक भारत की बेचैनी से जोड़ा और मातृभूमि को ‘मां’ की आवाज दी।

यहीं से ‘वंदे मातरम्’ की आधुनिक यात्रा शुरू होती है।

1875: कविता से राष्ट्रभावना तक

सरकारी अभिलेखों के अनुसार बंकिमचंद्र ने 7 नवंबर 1875 को ‘वंदे मातरम्’ की रचना की। बाद में इसे उनके उपन्यास आनंदमठ’ में शामिल किया गया।

‘वंदे मातरम्’ का अर्थ है—मां को नमन।

पहले दो अंतरों में यह मां कोई युद्धरत देवी नहीं, बल्कि जल, हरियाली, फसल और शीतल हवा से भरी मातृभूमि है। लेकिन गुलाम भारत में अपनी मातृभूमि को नमन करना सिर्फ कविता कैसे रह सकता था? उसमें राजनीति अपने आप आ गई।

1896 में रवींद्रनाथ ठाकुर ने इसे कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाया। इसके बाद यह साहित्य के पन्नों से निकलकर राष्ट्रीय आंदोलन के मंच पर पहुंच गया।

फिर आया 1905।

1905: जब गीत नारा बन गया

बंगाल विभाजन के खिलाफ स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ। विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, स्वदेशी का समर्थन, जुलूस, सभाएं और विरोध प्रदर्शन।
और हर जगह— वंदे मातरम्।
अब यह कविता नहीं थी।
यह सत्ता को चुनौती थी।

ब्रिटिश सरकार ने इसकी ताकत पहचानी और सार्वजनिक उपयोग को रोकने के प्रयास किए।
1906 में इसी नाम से Bande Mataram नाम का राष्ट्रवादी अंग्रेजी अखबार भी निकला, जिससे श्री अरविंद और बिपिन चंद्र पाल जैसे राष्ट्रवादी जुड़े।
एक गीत का नाम आंदोलन की पहचान बन चुका था।

लेकिन यहीं कहानी में एक जरूरी पेच आता है

‘वंदे मातरम्’ के पहले दो अंतरे मातृभूमि और प्रकृति का वर्णन करते हैं। लेकिन आगे के अंतरों में मातृभूमि को दुर्गा और अन्य हिंदू धार्मिक प्रतीकों से जोड़ा गया है।

यहीं सवाल उठा— क्या एक बहुधार्मिक देश का साझा राष्ट्रीय गीत धार्मिक प्रतीकों से जुड़ा हो सकता है?
यह आज की राजनीति का पैदा किया हुआ सवाल नहीं है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ही इस पर बहस हुई थी।
1937 में कांग्रेस के भीतर विचार के बाद राष्ट्रीय अवसरों के लिए पहले दो अंतरों को अपनाने की परंपरा बनी। कारण था—इनमें मातृभूमि और प्रकृति का वर्णन था, जबकि बाद के धार्मिक बिंबों को लेकर कुछ समुदायों की आपत्तियां थीं।

इसलिए आज इसे केवल गीत काट दिया गया” कहना इतिहास को बहुत सरल बना देना है।

लेकिन इसके उलट यह कहना भी सही नहीं कि मूल गीत में धार्मिक प्रतीक थे ही नहीं।

थे। बिल्कुल थे।

और शायद ‘वंदे मातरम्’ की सबसे बड़ी ऐतिहासिक सच्चाई यही जटिलता है।

आजादी की रात भी ‘वंदे मातरम्’ था

14 अगस्त 1947। देश आजादी की दहलीज पर था।
संविधान सभा की ऐतिहासिक बैठक शुरू हुई और सुचेता कृपलानी ने ‘वंदे मातरम्’ गाया।
जिस गीत ने अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी थी, वही आजाद भारत के जन्म का साक्षी बना।
15 अगस्त की सुबह पंडित ओंकारनाथ ठाकुर की आवाज में इसके प्रसारण ने इसे स्वतंत्र भारत की शुरुआती सांस्कृतिक स्मृतियों में दर्ज कर दिया।
इतिहास में इससे खूबसूरत दृश्य कम होंगे—
जिस गीत पर कभी रोक लगाई गई, वही आजाद भारत की पहली सुबह में गूंज रहा था।

1950: राष्ट्रीय गीत, लेकिन राष्ट्रीय गान नहीं

24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि ‘वंदे मातरम्’, जिसने स्वतंत्रता संघर्ष में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, उसे जन गण मन’ के समान सम्मान और दर्जा दिया जाएगा।
इसलिए तथ्य बिल्कुल स्पष्ट है—

जन गण मन — राष्ट्रीय गान।
वंदे मातरम् — राष्ट्रीय गीत।

दोनों प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं और एक दूसरे का विकल्प भी नहीं हैं। दोनों की ऐतिहासिक यात्राएं अलग हैं।
एक स्वतंत्र भारत की संवैधानिक पहचान का गान बना; दूसरा स्वतंत्रता संघर्ष की स्मृति और मातृभूमि के प्रति भावनात्मक समर्पण की आवाज रहा।

फिर 150 साल बाद विवाद क्यों?

2025-26 में देश ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ मना रहा है। इसी दौरान केंद्र ने सरकारी कार्यक्रमों के लिए राष्ट्रीय गीत के छह अंतरों वाले पूर्ण आधिकारिक संस्करण और उसके प्रस्तुतीकरण को लेकर नया प्रोटोकॉल जारी किया।

इसके बाद बहस तेज हुई—

पूरा गीत या पहले दो अंतरे?

भाजपा का तर्क है कि मूल रचना का पूरा सम्मान होना चाहिए।
कांग्रेस ने 1937 की परंपरा का हवाला देते हुए अपने कार्यक्रमों में पहले दो अंतरे जारी रखने का फैसला किया।
अब बहस सिर्फ गीत की नहीं रही।

राष्ट्रवाद, धर्म, तुष्टीकरण, इतिहास, कांग्रेस, भाजपा—सब एक साथ मैदान में हैं।
गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के फैसले पर तीखा हमला किया और इसे तुष्टीकरण की राजनीति से जोड़ा। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी कांग्रेस पर इसी तरह के आरोप लगाए।

कांग्रेस का जवाब है—वह स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान स्वीकार की गई ऐतिहासिक परंपरा का पालन कर रही है।
लेकिन इस पूरी बहस में एक दिलचस्प विडंबना भी सामने आई।

20 अगस्त को भाजपा-शासित नागपुर नगर निगम की बैठक में भी केवल दो अंतरे गाए गए।
अब सवाल और दिलचस्प हो गया—

क्या यह विवाद इतिहास का है, प्रोटोकॉल का है या राजनीति का?

असल विवाद दो अंतरों का नहीं है

मेरी नजर में ‘वंदे मातरम्’ पर मौजूदा विवाद का असली सवाल यह नहीं है कि दो अंतरे गाए जाएं या छह।
बड़ा सवाल यह है—

राष्ट्रवाद की परिभाषा कौन तय करेगा?

एक पक्ष कहता है—मूल रचना का पूरा सम्मान होना चाहिए।
दूसरा कहता है—राष्ट्रीय प्रतीक ऐसा होना चाहिए जिसमें हर भारतीय अपने लिए जगह महसूस करे।
और इतिहास?

इतिहास दोनों से थोड़ा बड़ा है।
क्योंकि सच यह है—
वंदे मातरम् स्वतंत्रता आंदोलन का महान राष्ट्रवादी उद्घोष था।
उसके मूल पाठ में धार्मिक प्रतीक भी हैं।
1937 में पहले दो अंतरों को राष्ट्रीय उपयोग के लिए चुनने का ऐतिहासिक निर्णय भी हुआ था।
1950 में उसे राष्ट्रीय गीत का सम्मान भी मिला।
इनमें से किसी एक तथ्य को मिटाकर हम इतिहास नहीं लिख सकते।

भारत की खूबसूरती शायद इसी जटिलता में है

भारत ने 1950 में जन गण मन और वंदे मातरम्—दोनों को जगह दी।
क्योंकि राष्ट्र केवल भावनाओं से नहीं चलता।
और सिर्फ संविधान से भी नहीं।
राष्ट्र चलता है—
भावना और विवेक के बीच संतुलन से।
‘वंदे मातरम्’ हमें मातृभूमि से प्रेम करना सिखाता है। लेकिन लोकतांत्रिक भारत हमें यह भी सिखाता है कि मातृभूमि में सिर्फ हम नहीं रहते।
हमसे अलग सोचने वाला भी।
हमसे अलग पूजा करने वाला भी।
हमसे असहमत नागरिक भी।
वह भी उतना ही भारत है जितने हम हैं।

150 साल बाद ‘वंदे मातरम्’ का अर्थ क्या है?

1875 में यह मातृभूमि की कविता थी।
1905 में प्रतिरोध का नारा बनी।
1947 में आजादी की आवाज।
1950 में राष्ट्रीय गीत।
और 2026 में?
शायद यह हमसे एक और कठिन सवाल पूछ रही है।
क्या राष्ट्रप्रेम सिर्फ नारा है?
या जिम्मेदारी भी?
क्या मातृभूमि को प्रणाम करना केवल मंच पर ‘वंदे मातरम्’ कहना है?
या उसकी नदियों, जंगलों, हवा, लोकतंत्र और संस्थाओं की रक्षा करना भी?
क्या देशभक्ति का अर्थ केवल अपने जैसे लोगों से प्रेम करना है?
या अपने से अलग नागरिक के अधिकार और सम्मान की रक्षा करना भी?
यहीं ‘वंदे मातरम्’ एक पुराने गीत से निकलकर आज के भारत का सवाल बन जाता है।

मां को नमन करना आसान है

डेढ़ सौ साल पहले ‘वंदे मातरम्’ गुलाम भारत के लिए स्वाधीनता का सपना था।
आज स्वतंत्र भारत में वही दो शब्द शायद हमें स्वतंत्रता की जिम्मेदारी याद दिला सकते हैं।
क्योंकि मातृभूमि को नमन केवल उसके नाम का उद्घोष करना नहीं है।
मातृभूमि को नमन उसके लोकतंत्र, उसकी विविधता, उसकी गरिमा और उसके हर नागरिक के सम्मान की रक्षा करना भी है।

आखिर—
मां को नमन करना आसान है।

मां के हर बच्चे को अपना मानना—शायद कहीं अधिक कठिन।

और अगर ‘वंदे मातरम्’ हमें यह कठिन काम सिखा दे, तो 150 साल बाद भी इसकी प्रासंगिकता बनी रहेगी।
क्योंकि 150 साल बाद भी ‘वंदे मातरम्’ हमसे यही पूछता है—जिस भारत को हम मां कहते हैं, उसके लिए हम कर क्या रहे हैं?
वंदे मातरम्।

वंदे मातरम पर राष्ट्रवाद की सियासत!, किसका फायदा, किसका नुकसान?

वंदे मातरम पर राष्ट्रवाद की सियासत!, किसका फायदा, किसका नुकसान?

भारतीय जनता पार्टी के वंदे मातरम पर देश में सियासी घमासान मचा हुआ है। कांग्रेस के वंदे मातरम के केवल एक अंतरे (दो पद) को पार्टी के कार्यक्रमों के गाने के फैसले को लेकर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के तीखे हमले के बाद इस पर सियासी बयानबाजी थमने का नाम नहीं ले  रही है। कांग्रेस ने वंदे मातरम को लेकर यह फ़ैसला ऐसे समय किया जब स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम में भाजपा ने सोनिया गांधी पर वंदे मातरम का अपमान करने का आरोप लगाया था। 
 
कांग्रेस वर्किंग कमेटी में वंदे मातरम के गाने के फैसले पर गृहमंत्री अमित शाह की आपत्ति पर  कांग्रेस ने भाजपा पर पलटवार करते हुए दिखावटी राष्ट्रवाद का आरोप लगाया। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह जनता से जुड़े मुद्दों पर अपनी नाकामियों से ध्यान भटकाने के लिए वंदे मातरम के मुद्दे को राजनीतिक रंग देने की कोशिश कर रहे है।
 
वंदे मातरम पर विवाद की शुरुआत कैसे?- वंदे मातरम पर नए विवाद पर स्वतंत्रता दिवस पर नई दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय में हुए कार्यक्रम मे वंदे मातरम के गायन के दौरान सोनिया गांधी के व्यवहार को लेकर हुई। भाजपा ने आरोप लगाया कि सोनिया गांधी ने वंदे मातरम को बीच में रोकने की कोशिश की। इसके बाद बुधवार को हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में पार्टी के नेताओं ने वंदे मातरम के गायन का मुद्दा उठाया था।
 
बैठक में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने पार्टी का रुख स्पष्ट करते हुए पार्टी के कार्यक्रमों में वंदे मातरम के दो पद गाने की बात कही। इसके लिए खरगे ने  28 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस कार्यसमिति की ओर से पारित प्रस्ताव का हवाला दिया।
 
दरअसल 1937 में कोलकाता मे हुई कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में वंदेमातम को लेकर चर्चा हुई और एक प्रस्ताव तैयार किया गया। इस प्रस्ताव को तैयार करने में जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, मौलाना अबुल कलाम आजाद, गोविंद बल्लभ पंत और आचार्य नरेंद्र देव जैसे नेताओं की भूमिका थी। यह प्रस्ताव गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर तैयार किया गया था।
 
25 जनवरी 1950 को संविधान सभा की आखिरी बैठक में संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की थी कि ‘जन गण मन’ देश का राष्ट्रगान और ‘वंदे मातरम’ राष्ट्रीय गीत होगा। उन्होंने कहा कि ‘जन गण मन’ में भी पांच में से केवल एक अंतरे को राष्ट्रगान के तौर पर अपनाया गया है।
 
अमित शाह ने कांग्रेस की तुष्टिकरण की सियासत से जोड़ा- कांग्रेस कार्यसमिति में वंदेमातरम पर हुए इस फैसले को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कांग्रेस की तुष्टिकरण की सियासत से जोड़ दिया। मीडिया एजेंसी से चर्चा करते हुए अमित शाह ने कहा कि “कांग्रेस पार्टी की कार्यसमिति ने एक आश्चर्यजनक और देशविरोधी फैसला लिया है। उन्होंने अपनी पार्टी के 1937 के रिजोल्यूशन को फॉलो करते हुए महान वंदे मातरम् गीत के दो ही छंद गाने का फैसला लिया है”।
 
अमित शाह ने आगे कहा कि “मैं पूरे देश को याद दिलाना चाहता हूं, 1937 में कांग्रेस पार्टी ने मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए वंदे मातरम् के दो टुकड़े कर देश के विभाजन की नींव डाली थी और वहीं से द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को ताकत मिली थी। अंततोगत्वा देश का विभाजन हुआ और पाकिस्तान का जन्म हुआ। आज जब उस ऐतिहासिक गलती को वंदे मातरम् गीत के प्राकट्य के 150वें साल में सुधार कर बंकिम बाबू की इस अमर कृति को पूरा गीत गाकर राष्ट्रीय एकात्मता को सुदृढ़ करने का प्रयास किया गया है, और सभी सरकारी कार्यक्रमों में इसे पूर्ण रूप से गाने का निर्णय किया गया है और इस निर्णय को कानूनी जामा भी पहनाया गया है। इसी की अवहेलना करने का निर्णय कांग्रेस ने कल किया है”।

अमित शाह ने आगे कहा कि “कांग्रेस का यह निर्णय केवल और केवल इनकी घोर तुष्टिकरण की नीति की पुष्टि करता है। वोट बैंक के लिए इन्होंने न सिर्फ बंकिम बाबू की इस अमर कृति का अपमान किया, बल्कि उन लाखों शहीदों का भी अपमान किया, जो वंदे मातरम् का नारा लगाते हुए देश की आजादी के लिए फांसी पर चढ़ गए।  आज कांग्रेस पार्टी 1937 के अपनी पार्टी के रिजोल्यूशन को मान रही है और पार्लियामेंट के एक्ट को नकार रही है। राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी फिर एक बार तुष्टिकरण की राजनीति को पुरजोर तरीके से आगे बढ़ा रही है”।
 
वहीं केंद्रीय शिवराज सिंह चौहान ने कांग्रेस के खिलाफ तीखा राजनीतिक प्रहार करते हुए कहा कि वंदे मातरम को अधूरा गाने का फैसला देश की भावना और राष्ट्रगीत का अपमान है। उन्होंने कहा  कि यह किसी पार्टी का नहीं बल्कि भारत माता के सम्मान का प्रश्न है। शिवराज सिंह ने कहा कि जो गीत स्वतंत्रता आंदोलन की प्रेरणा रहा, उसे पूरा गाना हर भारतीय का कर्तव्य है। उन्होंने कांग्रेस पर वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप लगाया और कहा कि कुछ दल देश की एकता और संस्कृति से जुड़े प्रतीकों को भी राजनीतिक लाभ के लिए तोड़-मरोड़ देते हैं।
 
कांग्रेस का भाजपा पर पलटवार-भाजपा के वंदे मातरम के मुद्दें को राजनीतिक तूल देने पर कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने पलटवार करते हुए कहा कि भाजपा ने बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय और रवींद्रनाथ टैगोर को लेकर एक अलग राजनीतिक नैरेटिव बनाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि यह मुद्दे का राजनीतिकरण है। उन्होंने आरोप लगाया कि इसके जरिए जनता से जुड़े वास्तविक मुद्दों और सरकार की कथित नाकामियों से ध्यान भटकाने की कोशिश हो रही है, जिसमें छात्रों से जुड़े मुद्दे भी शामिल हैं।
 
कांग्रेस के कानूनी प्रकोष्ठ के प्रमुख और राज्यसभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने इस पूरे विवाद में कानूनी पहलू सामने रखा है। कानून को उसकी मौजूदा स्थिति के हिसाब से देखा जाना चाहिए। उन्होंने सार्वजनिक और निजी कार्यक्रमों के बीच अंतर बताया। सिंघवी के मुताबिक मौजूदा कानून सरकारी आधिकारिक कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत के गायन से जुड़ी बात करता है। पार्टी के आंतरिक कार्यक्रमों के बारे में उसमें वैसी स्पष्ट व्यवस्था नहीं है। यही तर्क कांग्रेस के उस फैसले को समझने की कोशिश में अहम हो जाता है, जिस पर अब पार्टी के भीतर ही अलग-अलग राय सामने आ रही है।

मुक्त व्यापार समझौतों से बने हैं बड़े मौके, MSME उठाएं फायदा: PM मोदी

भारत ने 2014 से अब तक लगभग 40 देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) को अंतिम रूप दिया है। इससे देश के सूक्ष्म, लघु और मंझोले उद्यमों (MSMEs) के लिए एक बड़ा अवसर तैयार हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छोटे उद्यमों से इन अवसरों का लाभ उठाने और इस मौके को हाथ से न जाने देने की अपील की है। उन्होंने 80वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए कहा कि भारतीय उत्पादों की वैश्विक पहुंच का विस्तार करने और यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि कपड़ा, मशीनरी और दवाओं जैसे सामान अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी जगह बनाएं। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए हमें वैश्विक मानकों (ग्लोबल स्टैंडर्ड्स) पर खरा उतरना होगा।

भारत ने हाल में संयुक्त अरब अमीरात (UAE), मॉरीशस, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, EFTA समूह और ओमान के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट किए हैं। यूरोपीय संघ (EU) और न्यूजीलैंड के साथ व्यापार समझौतों को भी अंतिम रूप दिया जा चुका है। इस वर्ष का स्वतंत्रता दिवस समारोह ‘वंदे मातरम्’ के 150 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में राष्ट्रीय गीत को विशेष रूप से समर्पित है। लाल किले के समारोह में आज, शनिवार को पहली बार ‘वंदे मातरम्’ गाया गया।

देश की मैन्युफैक्चरिंग में MSME सेक्टर का हिस्सा लगभग 35.4 प्रतिशत है। वहीं एक्सपोर्ट में लगभग 48.58 प्रतिशत और GDP में 31.1 प्रतिशत का योगदान है। MSME सेक्टर में 7.47 करोड़ से ज्यादा उद्यम हैं और यह 32.82 करोड़ से ज्यादा लोगों को रोजगार देता है। यह खेती के बाद रोजगार देने वाला दूसरा सबसे बड़ा सेक्टर है। दुनिया भर में कुल कारोबारों में MSMEs का हिस्सा लगभग 90 प्रतिशत है। ये कुल वैश्विक रोजगार में 50 प्रतिशत से ज्यादा का योगदान देते हैं।

अवसर को गंवाने का जोखिम नहीं उठा सकते

अपने संबोधन में पीएम मोदी ने कहा, ”भारत की वैश्विक साख बढ़ रही है। आज यह विश्व मंच पर एक सम्मानित राष्ट्र बन रहा है। भारत के पास एक स्थिर राजनीतिक जनादेश और सरकार, एक जीवंत लोकतंत्र और एक मजबूत न्याय व्यवस्था है। ये सभी भारतीय संविधान द्वारा निर्देशित हैं। दुनिया हमारी क्षमताओं को पहचान रही है, यही वजह है कि 2014 से हमने लगभग 40 देशों के साथ FTA किया है।”

उन्होंने आगे कहा, ”इन व्यापार समझौतों से तैयार हुए विशाल अवसर को देखिए। मैं अपने MSME क्षेत्र से आग्रह करना चाहता हूं कि वे इस मौके को हाथ से न जाने दें। हमें वैश्विक मंच तक पहुंचना है। भारतीय उत्पाद, चाहे वे कपड़ा हों, मशीनरी हों या दवाएं, उन्हें वैश्विक बाजारों में जगह बनाने की जरूरत है। हम इस अवसर को गंवाने का जोखिम नहीं उठा सकते।”

प्रधानमंत्री ने कहा, ”हमें वैश्विक स्तर पर उत्पादों की मौजूदा उपलब्ध गुणवत्ता से बेहतर गुणवत्ता और कम कीमत की पेशकश करनी चाहिए। पंजाब के लुधियाना से लेकर तमिलनाडु के तिरुप्पुर तक फैले हमारे कपड़ों में वैश्विक बाजार तक पहुंचने की क्षमता है।”

कभी ‘फ्रेजाइल फाइव’ में था भारत, 12 साल में इस कैटेगरी से निकलकर बना सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था: PM मोदी

घरेलू समुद्री खाद्य क्षेत्र के लिए भी भारी अवसर

पीएम ने यह भी कहा कि इन समझौतों ने घरेलू समुद्री खाद्य (seafood) क्षेत्र के लिए भी भारी अवसर खोले हैं। केरल से लेकर गुजरात और तमिलनाडु से लेकर बंगाल तक, ये FTA घरेलू झींगा निर्यात को बढ़ावा दे रहे हैं। पीएम मोदी ने कहा, ”मैं चाहूंगा कि हम इस स्थिति का पूरा फायदा उठाएं।” पीएम ने हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी और ड्रोन प्रणाली जैसी एडवांस्ड क्षमताओं में आत्मनिर्भरता पर विशेष जोर देते हुए भारत को डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग का वैश्विक केंद्र बनाने की भी वकालत की। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत के घरेलू रक्षा उत्पादन की मात्रा वित्त वर्ष 2025-26 में 1.78 लाख करोड़ रुपये दर्ज की गई।

80th Independence Day: कॉम्पिटीटिव एग्जाम्स की तैयारी करने वाले छात्रों को मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग, PM मोदी ने किया ऐलान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को घोषणा की कि कॉम्पिटीटिव एग्जाम्स (प्रतियोगी परीक्षा) की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग की व्यवस्था की जाएगी। ऐसा छात्रों के परिवारों पर आर्थिक बोझ कम करने के लिए किया जा रहा है। 15 अगस्त 2026 को देश अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। इस मौके पर दिल्ली में ऐतिहासिक लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा, “कोचिंग क्लास से गरीब और मध्यम वर्ग पर बोझ पड़ता है। हम अलग-अलग परीक्षाओं के लिए मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग उपलब्ध कराएंगे।”

पीएम ने कहा कि हर माता-पिता को लगता है कि अगर वे अपने बच्चे को कोचिंग क्लास नहीं भेजेंगे तो वे प्रतिष्ठित परिवार नहीं कहलाएंगे। प्रधानमंत्री ने इन परिवारों को भरोसा दिलाया कि वे कोचिंग पर खर्च होने वाले हजारों करोड़ रुपये बचा सकते हैं, अपने बच्चों के करीब रह सकते हैं और उनकी देखभाल कर सकते हैं।

पीएम मोदी ने कहा, “इसलिए, हमने युवाओं के लिए अलग-अलग परीक्षाओं की मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग उपलब्ध कराने का फैसला किया है। हमारे पास डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर है, हमारे पास बेहतरीन टैलेंट और शिक्षक हैं। इन संसाधनों को एक साथ लाकर, हम देश के युवाओं को मुफ्त कोचिंग देने के लिए एक पूरा नेटवर्क बनाने जा रहे हैं।”

एक साल में 1 करोड़ युवाओं को AI की ट्रेनिंग

अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि हमने तय किया है कि अगले एक वर्ष में एक करोड़ युवाओं को आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस (AI) कौशल की ट्रेनिंग दी जाएगी। यह भी कहा कि युवाओं की क्षमताओं का इस्तेमाल राष्ट्र निर्माण में किया जाएगा। इसके साथ ही पीएम मोदी ने युवाओं से अपील की कि वे देश में जारी जनगणना प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लें। साथ ही जनगणना को त्रुटिरहित (जिसमें कोई गलती न हो) बनाने के लिए अपने परिवार की सही डिजिटल जानकारी उपलब्ध कराने में सहयोग करें।

इस वर्ष का समारोह ‘वंदे मातरम्’ के 150 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में राष्ट्रीय गीत को विशेष रूप से समर्पित है। लाल किले के स्वतंत्रता दिवस समारोह में आज, शनिवार को पहली बार ‘वंदे मातरम्’ गाया गया।

80th Independence Day: देश में 3 सेमीकंडक्टर प्लांट्स में उत्पादन शुरू, अगले 7-8 वर्षों में 5 से 8 और प्लांट शुरू होने की उम्मीद- PM मोदी

5,000 विशेष अतिथियों ने लिया हिस्सा

लाल किले पर शनिवार को आयोजित 80वें स्वतंत्रता दिवस समारोह में लगभग 5,000 विशेष अतिथियों ने हिस्सा लिया। इनमें महिला उद्यमी, युवा इनोवेटर्स, किसान और विभिन्न सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों सहित समाज के कई क्षेत्रों से जुड़े लोग शामिल रहे। समारोह में सांस्कृतिक रंग भरने के लिए विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से पारंपरिक वेशभूषा में सजे 1,500 से अधिक लोग भी उपस्थित रहे।

15 अगस्त पर लाल किले में दिखेगा नया इतिहास! जश्न में पहली बार दो ऐतिहासिक पल

15 अगस्त से पहले दिल्ली में स्वतंत्रता दिवस समारोह की तैयारियां तेज हो गई हैं। लाल किले के पास दंगल पार्क में भारतीय सेना के जवानों ने पारंपरिक 21 तोपों की सलामी रिहर्सल की जा रही है। इस बार समारोह में ‘युवा शक्ति’, ‘विकसित भारत 2047’ और ‘वंदे मातरम’ के 150 साल पूरे होने को खास जगह दी जाएगी।

युवा शक्ति और Gen-Z

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इस बार लाल किले पर होने वाला स्वतंत्रता दिवस समारोह देश की युवा शक्ति और Gen-Z पर फोकस रहेगा। इसमें युवाओं की अचीवमेंट, उनकी नई सोच और देश के डेवलपमेंट में उनके योगदान को सामने रखा जाएगा। साथ ही 2047 तक भारत को विकसित देश बनाने के लक्ष्य में युवाओं की भूमिका को भी खास तरीके से दिखाया जाएगा। सेरेमनी में युवा अचीवर्स को स्पेशल गेस्ट के तौर पर बुलाया गया है।

स्वतंत्रता दिवस समारोह

इस साल ‘वंदे मातरम’ के 150 साल पूरे हो रहे हैं, इसलिए स्वतंत्रता दिवस समारोह में इसे खास जगह दी जाएगी। पहली बार लाल किले की प्राचीर से ‘वंदे मातरम’ गाया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले से तिरंगा फहराएंगे और देश को संबोधित करेंगे।

टेक्नोलॉजी और साइंस

स्वतंत्रता दिवस समारोह में भारत की तकनीकी और वैज्ञानिक अचीवमेंट को भी दिखाया जाएगा। न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी, स्पेस और मॉडर्न टेक्निक सेक्टर में देश ने जो प्रगति की है, उसकी झलक विजुअल्स के जरिए दिखाई जाएगी। इन्विटेशन कार्ड में ‘सेवा तीर्थ’ को प्रायोरिटी दी गई है, जो पब्लिक सर्विस और विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को दिखाती है।

इंटर्नशिप और डेवलपमेंट स्कीम

इस बार समारोह में देश के युवा प्रतिभाओं को खास सम्मान दिया जाएगा। इंटरनेशनल फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी और मैथमैटिक्स ओलंपियाड 2026 में मेडल जीतने वाले 19 स्टूडेंट्स को सम्मानित किया जाएगा। इसके अलावा युवा इनोवेटर्स, स्टार्टअप फाउंडर्स, प्रधानमंत्री इंटर्नशिप स्कीम के इंटर्न, स्किल डेवलपमेंट स्कीम का लाभ लेने वाले और MY भारत के वॉलंटियर्स जैसे युवा अचीवर्स भी समारोह में शामिल होंगे।

जल संरक्षण

इस साल स्वतंत्रता दिवस समारोह में बैठने की जगहों के नाम भारत की प्रमुख झीलों के नाम पर रखे जाएंगे। इसका मकसद लोगों का ध्यान जल संरक्षण और पानी बचाने की जरूरत की ओर अट्रैक्ट करना है।

इस बार का स्वतंत्रता दिवस समारोह देश की परंपरा, युवाओं की ताकत और भारत की तरक्की की झलक एक साथ दिखाएगा। ‘वंदे मातरम’ के 150 साल पूरे होने से यह मौका और खास बन गया है। युवा प्रतिभाओं के सम्मान और देश की वैज्ञानिक उपलब्धियों के साथ समारोह में विकसित भारत 2047 का संदेश भी मिलेगा।