FPI ने अक्टूबर में अब तक बेचे ₹52100 करोड़ के भारतीय शेयर, किन वजहों से बने हुए हैं सेलर

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने अक्टूबर में अब तक भारतीय शेयर बाजार से 52,100 करोड़ रुपये निकाले हैं। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों, अमेरिका में बॉन्ड पर बढ़ती यील्ड और डॉलर की मजबूती के कारण निवेशकों का भरोसा कमजोर हुआ है। इससे भारतीय शेयर बाजार पर दबाव बढ़ा है। सेंट्रल डिपॉजिटरी सर्विसेज लिमिटेड (CDSL) के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी निवेशकों ने सितंबर में भारतीय शेयरों से 35,861 करोड़ रुपये निकाले थे।

इससे पहले जुलाई में उन्होंने 20,200 करोड़ रुपये और अगस्त में 29,631 करोड़ रुपये का निवेश किया था। अक्टूबर की ताजा सेलिंग के साथ विदेशी निवेशक साल 2026 में अब तक भारतीय शेयर बाजार से 3.12 लाख करोड़ रुपये निकाल चुके हैं। साल 2025 में उन्होंने 1.66 लाख करोड़ रुपये के शेयर बेचे थे।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, चॉइस वेल्थ के चीफ इनवेस्टमेंट स्ट्रैटेजी ऑफिसर धीरज गौड़ का कहना है कि अमेरिका में सरकारी बॉन्ड पर हाई यील्ड, डॉलर की मजबूती और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण विदेशी निवेशक भारतीय शेयरों में लगातार बिकवाली कर रहे हैं। अमेरिका में महंगाई का ऊंचे स्तर पर बने रहना भी ब्याज दर में बढ़ोतरी की आशंकाओं को बढ़ा रहा है। इससे विदेशी निवेशकों के लिए अमेरिकी एसेट्स अधिक आकर्षक हो गए हैं।

यह भी कहा कि महंगा कच्चा तेल भारतीय अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव डाल रहा है। इसके अलावा, उत्तर एशियाई बाजारों में आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस (AI) से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में तेजी के कारण विदेशी पूंजी भारत के बजाय उन बाजारों की ओर जा रही है।

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16 अक्टूबर को की थी खरीद

16 अक्टूबर को विदेशी निवेशकों ने कुछ बाइंग की थी। अमेरिकी सरकारी बॉन्ड पर यील्ड के कुछ नीचे आने और रुपये में मजबूती के कारण ऐसा हुआ था। बजाज ब्रोकिंग के डिप्टी वाइस प्रेसिडेंट-रिसर्व पबित्रो मुखर्जी का कहना है कि विदेशी निवेशकों की बिकवाली में कमी और शुक्रवार को बाइंग इस बात का संकेत है कि बाजार में निवेशकों की धारणा स्थिर हो सकती है। हालांकि, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें बाजार में रिकवरी की राह में अब भी जोखिम बनी हुई हैं।

LTCG और STT पर FM सीतारमण का बड़ा इशारा! अगर कटौती हुई तो आपको कितना हो सकता है फायदा?

शेयर बाजार के निवेशकों और ट्रेडर्स के लिए एक बड़ी राहत की खबर सामने आ सकती है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) टैक्स और सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) को लेकर चर्चा करने और विभिन्न पक्षकारों के सुझाव सुनने की बात कही है। वित्त मंत्री के इस रुख के बाद बाजार के जानकारों और निवेशकों के बीच यह कयास लगाए जा रहे हैं कि आने वाले दिनों या आगामी बजट में इन दोनों टैक्स दरों में कटौती या कुछ ढील देखने को मिल सकती है।

वर्तमान में कितना है यह टैक्स?

लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स(LTCG): 23 जुलाई 2024 के बजट संशोधनों के बाद, भारतीय शेयर बाजार में 1 साल से अधिक समय तक शेयर या इक्विटी म्यूचुअल फंड रखने पर मिलने वाले लाभ पर 12.5% की दर से LTCG टैक्स लगता है। इसमें सालाना ₹1.25 लाख तक की छूट मिलती है यानी ₹1.25 लाख से ऊपर के प्रॉफिट पर ही 12.5% टैक्स देना होता है।

सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स(STT): STT शेयर बाजार में प्रतिभूतियों की खरीद और बिक्री पर लगने वाला एक प्रत्यक्ष कर है। शेयर डिलीवरी सेगमेंट में खरीद और बिक्री दोनों पर 0.1% एसटीटी लगता है, जबकि फ्यूचर्स में बिक्री पर 0.02% और ऑप्शंस प्रीमियम की बिक्री पर 0.1% लागू है।

वित्त मंत्री ने क्या कहा?

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में नई दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान स्पष्ट किया कि भारतीय निवेशक और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPIs) दोनों ही LTCG टैक्स को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर करते रहे हैं।

वित्त मंत्री ने कहा, कई मंत्रियों और हितधारकों ने यह मुद्दा भी उठाया है कि LTCG और STT दोनों टैक्स एक साथ चल रहे हैं, और भारत को इनमें से किसी एक को ही प्रमुखता से लागू करना चाहिए या दोनों में सामंजस्य बिठाना चाहिए। इसलिए इस विषय पर चर्चा होना स्वस्थ परंपरा है और मैं सभी पक्षों की राय ध्यान से सुनूंगी।’

कटौती की संभावना कितनी है?

बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि बजट 2027 की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। चूंकि 2026 में अब तक FIIs की ओर से भारतीय बाजार से 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक की रिकॉर्ड बिकवाली देखी गई है, ऐसे में विदेशी और घरेलू निवेशकों को आकर्षित करने के लिए सरकार LTCG की एग्जेम्पशन लिमिट ₹1.25 लाख से बढ़ाकर ₹2 लाख करना या STT की दरों में आंशिक कटौती पर गंभीरता से विचार कर सकती है।

अगर टैक्स घटता है, तो किसको और कितना फायदा होगा?

अगर सरकार LTCG टैक्स रेट घटाती है या STT का दोहरा बोझ कम करती है, तो इसके ये बड़े फायदे होंगे:

रिटेल निवेशकों की जेब में अधिक मुनाफा: लॉन्ग टर्म टैक्स घटने या छूट की सीमा बढ़ने से आम निवेशक जो लंबे समय के लिए SIP या शेयरों में निवेश करते हैं, उन्हें अपनी कमाई पर कम टैक्स देना होगा।

विदेशी निवेशकों (FPIs) की वापसी: ग्लोबल मार्केट में प्रतिस्पर्धा के बीच विदेशी फंड्स भारत में दोबारा भारी निवेश शुरू कर सकते हैं, जिससे भारतीय शेयर बाजार को नई मजबूती मिलेगी।

ट्रेडर्स के लिए ट्रांजैक्शन कॉस्ट में कमी: अगर STT में कटौती की जाती है, तो रोजाना ट्रेडिंग करने वाले रिटेल व इंस्टीट्यूशनल ट्रेडर्स की लागत घटेगी और बाजार में लिक्विडिटी बढ़ेगी।

दोहरे टैक्स के दबाव से मुक्ति: वर्तमान में निवेशक को शेयर बेचने पर STT भी देना पड़ता है और साल के अंत में मुनाफे पर LTCG भी। यदि दोनों में से किसी एक को तार्किक बनाया जाता है, तो टैक्स सिस्टम अधिक पारदर्शी और आसान होगा।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

क्या है भारत की आर्थिकी का इंजन?

india Economy

बेसिक सवाल है! इस सप्ताह रिजर्व बैंक के ब्याज दर फैसले, शेयर बाजार, जीडीपी की हवाबाजी, लुढ़कते रुपए, भारत से भागती पूंजी जैसे तथ्यों से बेसिक सवाल है कि तब देश की आर्थिकी भला चल कैसे रही है? वह प्लेटफॉर्म पर खड़ी है या वह उस छुक-छुक इंजन से बंधी है जो भाप छोड़ रहा है पर न कोयला है न बॉयलर में भभकती आग है?

आप भी सोचें, भारत के हर बंदे को सोचना चाहिए कि आखिर भारत की आर्थिकी के पहियों का मौजूदा इंजन है क्या?

पहले देश विशेष की ताक़त उसकी फ़ौज, कारखानों और खेतों से मापी जाती थी। अब पैसे से है। मतलब पूंजी, कमाई, बचत, श्रीवृद्धि, लक्ष्मी की चंचलता प्राथमिक कसौटी (वैश्विक भी) है। इस मायने में भारत की रियलिटी क्या है? क्या यह रियलिटी नहीं है कि देश के अमीर, देश की बुद्धि भारत छोड़ विदेश जा बस रही है? क्या यह खबर नहीं है कि विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) भारतीय शेयर बाजार से पूंजी निकाल कर दूसरे देशों के बाजारों में निवेश कर रहे हैं? मतलब भारत का शेयर बाजार जोखिम भरा, कम कमाई का है वही इंडोनेशिया हो या तुर्किये, आसियान देश वैश्विक पूंजी के लिए इसलिए कमाई वाले हैं क्योंकि इन देशों की इकोनॉमी सचमुच तेजी से बढ़ती हुई है।

सोचें, सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में अप्रैल-जून 2026 में वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.8 प्रतिशत थी, जबकि सकल मूल्य वर्धन (GVA) की बढ़ोतरी 8.2 प्रतिशत। सात अक्टूबर को रिज़र्व बैंक ने पूरे वित्त वर्ष 2026-27 की विकास दर का अनुमान बढ़ा कर 7.1 प्रतिशत किया। अब यदि भारत की वास्तविक अर्थव्यवस्था 7.8 प्रतिशत बढ़ रही है, तो उसकी करेंसी, रुपया और शेयर बाज़ार क्यों लगातार कमजोर होता हुआ है? गुरूवार को सेंसेक्स फिर भारी गिरा। तथ्य है कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने वर्ष 2026 में अब तक लगभग 30.4 अरब डॉलर के भारतीय शेयर बेचे है। अकेले अक्टूबर के शुरुआती नौ दिनों में लगभग 47,000 करोड़ रुपए के भारतीय शेयरों को विदेशियों ने बेचा।

दुनिया के किसी भी पैमाने पर यह मामूली उतार-चढ़ाव नहीं है। सो, सीधा सवाल है एक तरफ भारत में उत्पादन बढ़ने के सरकारी आंकड़े हैं, वहीं विदेशी निवेशक भारत की कंपनियों के भविष्य को लेकर घबराए हुए हैं, उनके शेयर बेच भाग रहे हैं? ऐसे ही भारत की करेंसी विदेशी बाजार में कौड़ियों वाली हैसियत में है। इस वर्ष डॉलर के मुक़ाबले रुपए का मूल्य सात प्रतिशत से अधिक गिर चुका है।

सरकारी दावा है कि आर्थिकी की रेलगाड़ी तेज़ विकास, डिजिटल अर्थव्यवस्था, रिकॉर्ड जीएसटी संग्रह, कंक्रीटों में नजर आते बुनियादी ढांचे से दुनिया की सर्वाधिक तेज़ बुलेट ट्रेन है। वहीं रियलिटी में गाड़ी प्लेटफॉर्म पर छुक-छुक करते हुए है। बाज़ार की हकीकत, भारतीय करेंसी के घटते भाव, विदेशी पूंजी के भागने, अब नई ऊंची ब्याज दर, महंगा तेल-ईंधन, महंगे कर्ज व व्यापारियों, अमीरों का भागना या हाथ पर हाथ धरे बैठे होना है।

कह सकते हैं कि खेती, आईटी कंपनियां, सेवा क्षेत्र, मेक इन इंडिया के कारखानों की भाप से आर्थिकी का इंजन सरपट भागता हुआ है। पर खेती यदि खुशहाल होती तो किसानों के पेट नहीं भरे होते! किसान तब दो-दो हजार रुपए की प्रधानमंत्री की रेवड़ी पर टकटकी लगाए उसका इंतजार क्या करते हुए होते? सब्जी बाजार, आटे-तेल के दाम क्या आम आदमी का जीना हराम ऐसा किए हुए होते जो रिजर्व बैंक को महंगाई के हवाले ब्याज दर बढ़ाने का फैसला करना पड़ता? ऐसी ही आईटी कंपनियों, सेवा क्षेत्र की कंपनियों के शेयर बाजार में लुढ़कने का औसत है। भारत की आईटी कंपनियों की अमेरिका में हुई एआई क्रांति से लुटिया डूबती हुई है। इन कंपनियों में ही निवेशित पूंजी सर्वाधिक भाग रही है। और मेक इन इंडिया या इंफ्रास्ट्रक्चर की तो बात ही नहीं होनी चाहिए। अंबानी हो, अडानी हो, एयरलाइंस सेक्टर हो या टेक्सटाइल सेक्टर या बैंकिंग सब महंगाई बढ़ा रहे हैं या बांग्लादेश, वियतनाम, आसियान देशों से पिट रहे हैं या आर्थिकी का कर्जा बढ़ा रहे हैं। बट्टेखाते में भारत की पूंजी, बचत वैसे ही जा रही है जैसे शेयर बाजार के चक्कर में मध्यवर्गीय नौकरीपेशा नौजवानों ने म्यूचुअल फंड (एसआईपी) के जरिए अपनी बचत को शेयर बाज़ार में उड़ेला, जबकि खर्चों के लिए कर्ज लेकर अपने आपको ब्याज (जो महंगा होना ही है) के चक्रव्यूह में फंसाया।

सो, पूंजी देशी (कभी भारत में घर-परिवार रिकॉर्ड बचत किया करते थे) हो या विदेशी वह भारत की इकोनॉमी को दौड़ाती हुई नहीं है। न ही भारत की उत्पादकता (यदि होती तो चीन के आयातों पर क्या खतरनाक स्तर पर आश्रित होते?) का इंजन है। तो ले देकर पैसे की मालिक या तो सरकार, उसके खर्च और बाबुओं का भ्रष्टाचार है या सरकारी कृपाओं के क्रोनी खरबपति याकि अडानी-अंबानी जैसे देशी जगत सेठ हैं। इन सबकी ऊर्जा के इंजन का नाम क्या है? 140 करोड़ लोगों का पेट! हां, भारत के 140 करोड़ लोगों की बुनियादी भूख, जीने का संघर्ष ही 2026 की इंडियन इकोनॉमी की वह छुक-छुक रेलगाड़ी है, जिसमें फर्स्ट क्लास, मिडिल क्लास के कुछ डिब्बे हैं बाकी तो भूखे पेटों की आग, उसके हाथ-पांव मार कर जीने की जिजीविषा है!

क्या नहीं?

फिनटेक कंपनी में 20% का अपर सर्किट, ₹189 करोड़ की ब्लॉक डील से रॉकेट बना स्टॉक

फिनटेक कंपनी One Mobikwik Systems के शेयर मंगलवार, 6 अक्टूबर को 20% चढ़ गए। शेयर 242.14 रुपये के भाव पर पहुंच गया। कंपनी के करीब 79.20 लाख शेयरों में ब्लॉक डील हुई।

यह कंपनी की कुल इक्विटी का करीब 10% हिस्सा है। इन शेयरों का औसत सौदा भाव 240 रुपये रहा। इस हिसाब से पूरी डील करीब 189 करोड़ रुपये की रही।

ब्लॉक डील के बाद शेयर में तेजी

ब्लॉक डील के बाद शेयर में जोरदार खरीदारी दिखी। यह लगातार दूसरा कारोबारी सत्र है, जब One Mobikwik का शेयर चढ़ा है।

दो कारोबारी सत्रों में शेयर करीब 23% ऊपर आ चुका है। हालांकि, इस बड़ी डील में खरीदार और बेचने वाला कौन था, इसकी जानकारी अभी सामने नहीं आई है।

Mobikwik में किसकी कितनी हिस्सेदारी?

जून 2026 तक One Mobikwik Systems में प्रमोटर्स की हिस्सेदारी 25.08% थी। वहीं, पब्लिक शेयरहोल्डर्स के पास 74.92% हिस्सेदारी थी।

प्रमोटर्स में बिपिन प्रीत सिंह के पास 14.52% और उपासना रूपकृष्णन टाकु के पास 10.11% हिस्सेदारी थी। प्रमोटर ग्रुप के पास दो फैमिली ट्रस्ट के जरिए भी शेयर हैं।

FPI और Bajaj Finance की हिस्सेदारी

पब्लिक शेयरहोल्डिंग में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों यानी FPI की हिस्सेदारी 4.48% थी। इसमें Government Pension Fund Global की 2.99% और FLC Investco की 1.16% हिस्सेदारी शामिल थी।

इंश्योरेंस कंपनियों के पास 2.69% हिस्सेदारी थी। इस पूरी हिस्सेदारी में Bajaj Life Insurance शामिल है। वहीं, Bajaj Finance के पास कंपनी की 10.13% हिस्सेदारी थी।

इसके अलावा Times Internet की 1.91% और Elimath Advisors Private Limited की 1.75% हिस्सेदारी थी। जून तिमाही के अंत में 1.62 लाख रिटेल शेयरहोल्डर्स के पास कंपनी की 36.95% हिस्सेदारी थी।

IPO प्राइस के करीब पहुंचा शेयर

मंगलवार की तेजी के बाद One Mobikwik Systems का शेयर 242.14 रुपये पर बंद हुआ। अब यह अपने IPO प्राइस 279 रुपये के काफी करीब पहुंच गया है।

2026 में शेयर अब तक 5% से ज्यादा चढ़ चुका है। हालांकि, पिछले 12 महीनों का प्रदर्शन अभी भी कमजोर है। इस दौरान शेयर करीब 13% नीचे है।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

FPI लगातार निकाल रहे पैसा, सितंबर में अब तक बेचे ₹20974 करोड़ के भारतीय शेयर; डेट मार्केट से भी मोह भंग

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने एक बार फिर भारतीय शेयर बाजार से दूरी बनानी शुरू कर दी है। उन्होंने सितंबर में अब तक भारतीय शेयरों से 20,974 करोड़ रुपये निकाले हैं। वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितता, अमेरिका में ऊंची ब्याज दरें, बढ़ती बॉन्ड यील्ड, महंगा कच्चा तेल और कमजोर रुपया इसकी वजह हैं। सेंट्रल डिपॉजिटरी सर्विसेज लिमिटेड (CDSL) के आंकड़ों के अनुसार, सितंबर में हुई बिकवाली से पहले विदेशी निवेशकों ने जुलाई में भारतीय शेयरों में 20,200 करोड़ रुपये और अगस्त में 29,630 करोड़ रुपये का निवेश किया था। हालांकि, मार्च से जून तक लगातार 4 महीने भारतीय शेयरों में बिकवाली की थी।

ताजा सेलिंग के बाद साल 2026 में अब तक FPI भारतीय शेयर बाजार से कुल 2.45 लाख करोड़ रुपये निकाल चुके हैं। साल 2025 में उन्होंने 1.66 लाख करोड़ रुपये की सेलिंग की थी। 1-18 सिंतबर 2026 तक FPI ने 20,974 करोड़ रुपये के भारतीय शेयर बेचे। लेकिन IPO बाजार के जरिए FPI का निवेश जारी रहा।

विदेशी निवेशकों ने भारतीय ऋण या बॉन्ड बाजार में भी बिकवाली की है। सितंबर में अब तक उन्होंने फुली एक्सेसिबल रूट (FAR) के जरिए 10,296 करोड़ रुपये, वॉलंटरी रिटेंशन रूट (VRR) के तहत 1,817 करोड़ रुपये और जनरल रूट से 1,068 करोड़ रुपये निकाले हैं।

एक्सपर्ट्स का क्या है मानना

न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, चॉइस वेल्थ के चीफ इनवेस्टमेंट स्ट्रैटेजी ऑफिसर धीरज गौड़ का कहना है कि FPI की हालिया बिकवाली के पीछे 3 प्रमुख कारण हैं— अमेरिका में ऊंची ब्याज दरें और ऊंची बॉन्ड यील्ड, भू-राजनीतिक तनाव के बीच कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और भारतीय रुपये में कमजोरी। अमेरिका के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने सितंबर की मीटिंग में बेंचमार्क ब्याज दरों में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है। इसके बाद ये 3.75-4 प्रतिशत हो गई हैं। इससे भारत और अमेरिका के बीच यील्ड का अंतर कम हुआ है, जिससे विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय एसेट्स का आकर्षण घटा है।

दूसरी ओर, ब्रेंट कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना हुआ है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने तेल को और महंगा कर दिया है, जिससे महंगाई और भारत के आयात बिल को लेकर​ चिंता बढ़ गई है। रुपये पर भी दबाव बना हुआ है। पिछले सप्ताह रुपये में 1.1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जो 4 महीने में उसकी सबसे बड़ी साप्ताहिक गिरावट रही। रुपया 95.92-95.96 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर के आसपास कारोबार करता रहा और कारोबार के दौरान 96 रुपये प्रति डॉलर के स्तर को भी पार कर गया।

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इनवेस्टमेंट प्लेटफॉर्म Trackk के को-फाउंडर और CEO वेदांत गुप्ते का मानना है कि FPI की सितंबर की बिकवाली को मुख्य रूप से कच्चे तेल और डॉलर की स्थिति से जोड़कर देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, तेल की कीमतों में तेजी और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी का असर केवल भारत पर ही नहीं, बल्कि दूसरे उभरते बाजारों पर भी काफी ज्यादा पड़ रहा है। आगे FPI का फ्लो ईरान-अमेरिका के बीच चल रहे टकराव और उसके कारण कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ने वाले असर से काफी हद तक प्रभावित होगा।

Disclaimer: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए सलाह या विचार एक्सपर्ट/ब्रोकरेज फर्म के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदायी नहीं है। यूजर्स को मनीकंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले हमेशा सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

Market Outlook: इस हफ्ते किस ओर मुड़ेगा बाजार; पश्चिम एशिया के हालात, कच्चे तेल की कीमत समेत इन फैक्टर्स से होगा तय

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और अमेरिका के महंगाई के आंकड़े इस सप्ताह भारतीय शेयर बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे। इसके अलावा विदेशी निवेशकों की गतिविधियां और वैश्विक बाजारों की चाल भी बाजार की दिशा को प्रभावित करेगी। पिछले सप्ताह सेंसेक्स 749.08 अंक या 0.96 प्रतिशत के नुकसान में रहा। वहीं निफ्टी 277.95 अंक या 1.14 प्रतिशत नीचे आया। शुक्रवार, 4 सितंबर को सेंसेक्स 362.57 अंक चढ़कर 76,515.43 पर और निफ्टी 24.25 अंकों की बढ़त के साथ 23,897.70 पर बंद हुआ था।

न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, रेलिगेयर ब्रोकिंग लिमिटेड के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट (रिसर्च) अजीत मिश्रा का कहना है, ‘‘इस सप्ताह बाजार वैश्विक मौद्रिक नीति, कच्चे तेल की कीमतों और भू-राजनीतिक घटनाक्रमों को लेकर संवेदनशील रह सकता है। अमेरिका के उम्मीद से बेहतर रोजगार आंकड़ों के बाद अब निवेशकों की नजर फेडरल रिजर्व की सितंबर में होने वाली मौद्रिक नीति बैठक को लेकर बदलती उम्मीदों पर रहेगी।’’

घरेलू मोर्चे पर विदेशी संस्थागत निवेशकों के रुख, रुपये की चाल, कच्चे तेल की कीमतों और घरेलू बाजार में नकदी की स्थिति पर नजर रहेगी। मिश्रा के मुताबिक, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़े घटनाक्रम भी महत्वपूर्ण रहेंगे, क्योंकि इनका भारत की महंगाई, बाहरी संतुलन और कंपनियों की प्रॉफिटेबिलिटी पर सीधा असर पड़ सकता है।

बीते सप्ताह 8 प्रतिशत महंगा हुआ ब्रेंट क्रूड

एनरिच मनी के चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर (CEO) पोनमुडी आर का कहना है कि पिछले सप्ताह ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत में 8 प्रतिशत से अधिक और वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) की कीमत में 9 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई। अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर चिंताओं ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में भू-राजनीतिक जोखिम बढ़ा दिया है। नए हफ्ते में भी तेल की कीमतों पर फोकस रहेगा। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण कच्चे तेल की ऊंची कीमतें बाजार की धारणा पर लगातार दबाव डाल सकती हैं।

बाजार की नजर अमेरिका के आने वाले महंगाई आंकड़ों पर भी होगी। ये आंकड़े फेडरल रिजर्व की पॉलिसी और ग्लोबल मार्केट के सेंटीमेंट को लेकर उम्मीदें तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। अमेरिकी बॉन्ड पर यील्ड भी महंगाई के आंकड़ों से प्रभावित होगी।

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FPI फिर बने सेलर

भारतीय शेयर बाजार में लगातार 2 महीने बायर रहने के बाद विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) सितंबर के पहले सप्ताह में फिर से सेलर बन गए। इस दौरान उन्होंने भारतीय शेयर बाजार से 7,443 करोड़ रुपये निकाले। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और डॉलर के मजबूत होने से विदेशी निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता प्रभावित हुई है। FPI ने इससे पहले जुलाई में भारतीय शेयरों में 20,200 करोड़ रुपये और अगस्त में 30,919 करोड़ रुपये का निवेश किया था। इससे पहले मार्च से जून तक लगातार 4 महीने सेलिंग की थी।

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FPI फिर बने सेलर, सितंबर के पहले हफ्ते में भारतीय शेयरों से निकाले ₹7443 करोड़

भारतीय शेयर बाजार में लगातार 2 महीने बायर रहने के बाद विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) सितंबर के पहले सप्ताह में फिर से सेलर बन गए। इस दौरान उन्होंने भारतीय शेयर बाजार से 7,443 करोड़ रुपये निकाले। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और डॉलर के मजबूत होने से विदेशी निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता प्रभावित हुई है। FPI ने इससे पहले जुलाई में भारतीय शेयरों में 20,200 करोड़ रुपये और अगस्त में 30,919 करोड़ रुपये का निवेश किया था। इससे पहले मार्च से जून तक लगातार 4 महीने सेलिंग की थी।

सेंट्रल डिपॉजिटरी सर्विसेज (इंडिया) लिमिटेड (CDSL) के आंकड़ों के अनुसार, सितंबर के पहले सप्ताह में की गई सेलिंग के बाद 2026 में भारतीय शेयर बाजार में FPI की कुल सेलिंग बढ़कर 2.32 लाख करोड़ रुपये हो गई है। साल 2025 में उन्होंने 1.66 लाख करोड़ रुपये की सेलिंग की थी।

एक्सपर्ट्स की राय

न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, यस सिक्योरिटीज के चीफ इनवेस्टमेंट ऑफिसर राजकुमार राठी का कहना है कि हाल में FPI की बिकवाली के पीछे कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी प्रमुख कारकों में से एक है। इससे भारत में महंगाई और चालू खाते की स्थिति को लेकर चिंता बढ़ी है। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बढ़ने और डॉलर सूचकांक के मजबूत बने रहने से उभरते बाजारों के प्रति विदेशी निवेशकों की जोखिम लेने की धारणा कमजोर हुई है।

जियोजीत इन्वेस्टमेंट्स के चीफ इनवेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट वी के विजयकुमार का कहना है कि आने वाले समय में वैश्विक बॉन्ड यील्ड FPI के रुख को तय करने वाला प्रमुख फैक्टर होगी। बजाज ब्रोकिंग के डिप्टी वाइस प्रेसिडेंट (रिसर्च) पबित्रो मुखर्जी के मुताबिक, ब्रेंट कच्चे तेल की कीमतें, अमेरिका-ईरान के बीच बदलते भू-राजनीतिक घटनाक्रम और अमेरिकी महंगाई के आगामी आंकड़े विदेशी निवेशकों के फ्लो को प्रभावित करेंगे। अमेरिका के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व की सितंबर के मध्य में होने वाली मौद्रिक नीति बैठक भी बाजार के लिए महत्वपूर्ण होगी।

नए हफ्ते में निफ्टी 50 के 23600-23500 के नीचे जाने की संभावना ज्यादा, ये शेयर करा सकते हैं अच्छी कमाई

बॉन्ड मार्केट में भी की सेलिंग

सितंबर के पहले सप्ताह में FPI ने ऋण या बॉन्ड बाजार में भी बिकवाली की है। इस दौरान उन्होंने फुली एक्सेसिबल रूट (FAR) के तहत 377 करोड़ रुपये और वॉलंटरी रिटेंशन रूट (VRR) के जरिए 231 करोड़ रुपये निकाले। वहीं, जनरल रूट के तहत 217 करोड़ रुपये का निवेश किया।

Disclaimer: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए सलाह या विचार एक्सपर्ट/ब्रोकरेज फर्म के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदायी नहीं है। यूजर्स को मनीकंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले हमेशा सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

Market Next Week: भारत से अमेरिका तक आ रहे ये आंकड़े, अगले हफ्ते तय करेंगे मार्केट की चाल

Market next week: 31 अगस्त से शुरू हो रहे अगले कारोबारी हफ्ते मार्केट की चाल मुख्य तौर पर जीडीपी के घरेलू आंकड़ों, कच्चे तेल के भाव और अमेरिका में गैर-कृषि पेरोल रिपोर्ट पर निर्भर करेगा। इसके अलावा एनालिस्ट्स के मुताबिक मैक्रोइकनॉमिक रिलीज, ऑटो सेल्स के आंकड़े और विदेशी निवेशकों की ट्रेडिंग एक्टिविटी भी आने वाले दिनों में बाजार की दिशा तय करेंगे। पिछले कारोबारी हफ्ते यानी 17-21 अगस्त के दौरान घरेलू इक्विटी बेंचमार्क इंडेक्सेज सेंसेक्स (Sensex) 276.32 प्वाइंट्स यानी 0.35% गिरा, तो निफ्टी (Nifty) 76.35 प्वाइंट्स यानी 0.31% नीचे आया। लगातार तीसरे हफ्ते ये लाल हुए।

Market next week: क्या कहना है एक्सपर्ट्स का?

रेलिगेयर ब्रोकिंग के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट (रिसर्च) अजीत मिश्र का कहना है कि आने वाला कारोबारी हफ्ता काफी अहम रहने वाला है। जीडीपी के घरेलू आंकड़े और वैश्विक आर्थिक आंकड़े मार्केट की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। भारतीय अर्थव्यस्था में बात करें तो जून 2026 तिमाही के आंकड़े 31 अगस्त को जारी होंगे। अजीत के मुताबिक निवेशकों की नजर अगस्त महीने के मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज पीएमआई के आंकड़ों, जीएसटी कलेक्शंस, फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व और रुपये की चाल पर भी रहेगी।

अजीत के मुताबिक सबसे बड़ा ट्रिगर तो अमेरिकी रोजगार का आंकड़ा रहेगा। 4 अगस्त को अगस्त के नॉन-फार्म पेरोल्स का आंकड़ा आएगा। अजीत का मानना है कि यग फेडरल रिजर्व के सितंबर महीने की मौद्रिक नीति, अमेरिकी डॉलर, ट्रेजरी यील्ड्स और एमर्जिंग मार्केट्स में फंड्स फ्लो से जुड़ी उम्मीदों पर असर डाल सकता है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने अगस्त में भारतीय इक्विटीज में अब तक ₹30,919 करोड़ का नेट निवेश किया है और लगातार दूसरे महीने उनकी नेट खरीदारी जारी रही।

ऑनलाइन ट्रेडिंग और वेल्थ-टेक फर्म एनरिच मनी के सीईओ पोनमुडी आर का कहना है कि घरेलू स्तर पर जून तिमाही के जीडीपी आंकड़े ब्रोडर रिस्क सेंटिमेंट के लिए अहम होंगे। इससे यह पता चलेगा कि घरेलू अर्थव्यवस्था किस चाल से बढ़ रही है, खासतौर से ऐसे समय में जब एनर्जी प्राइसेज रॉकेट बने हुए हैं और पश्चिमी एशिया में तनाव अभी भी बना हुआ है।

पोनमुडी का कहना है कि जैक्सन होल में फेड चेयर कैविन वार्श के हॉकिश कमेंट के बाद अब अमेरिकी मौद्रिक नीति वैश्विक बाजारों के लिए सबसे बड़ा कैटेलिस्ट बन गई है। पोनमुडी का कहना है कि मार्केट की नजर अब 4 सितंबर को आने वाले अगस्त की जॉब्स रिपोर्ट के साथ-साथ अगली इनफ्लेशन रीडिंग पर भी नजर रहेगी। इन आंकड़ो से यह तय होगा कि सितंबर में रेट हाइक की हाल में बढ़ी उम्मीदें बनी रहती हैं या कम होती हैं।

रिसर्च एनालिस्ट फर्म एचएसटी वेल्थ के फाउंडर और सीईओ हरिसेल्वन राधाकृष्णन का कहना है कि सोमवार को भारतीय इकॉनमी के लिए जून तिमाही के जीडीपी के आंकड़े के आंकड़े आएंगे, जिससे घरेलू आर्थिक विकास की दिशा पता चलेगी। वहीं शुक्रवार को आने वाला अमेरिकी रोजगार का आंकड़ा वैश्विक बाजारों के सेंटिमेंट पर असर डाल सकता है। उनका कहना है कि इसके बाद निवेशक फिर से फेडरल रिजर्व की सितंबर की मौद्रिक नीतियों को लेकर अपनी उम्मीदों को रिव्यू करेंगे।

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डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए सलाह या विचार एक्सपर्ट/ब्रोकरेज फर्म के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदायी नहीं है। यूजर्स को मनीकंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले हमेशा सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

GIFT Nifty Indicator: क्रूड में नरमी से क्या सुधरेगा बाजार का सेंटिमेंट, गिफ्ट निफ्टी दे रहा मजबूत शुरुआत के संकेत

GIFT Nifty Indicator:  लगातार दो हफ़्तों की गिरावट के बाद, सोमवार को इक्विटी बेंचमार्क इंडेक्स सेंसेक्स और निफ्टी के मामूली बढ़त के साथ खुलने की उम्मीद है। हालांकि, बाज़ार का मूड सतर्क रहेगा क्योंकि निवेशक ईरान पर अमेरिका द्वारा लगाए जा सकने वाले प्रतिबंधों के बारे में और जानकारी का इंतज़ार कर रहे हैं।

सुबह 8:30 बजे (IST) GIFT निफ्टी फ़्यूचर्स 24,378 पॉइंट्स पर था, जो बेंचमार्क निफ्टी 50 इंडेक्स के लिए अच्छी शुरुआत का संकेत देता है; यह इंडेक्स शुक्रवार को 24,252 पर बंद हुआ था।

पिछले सेशन में घरेलू इक्विटी इंडेक्स फ्लैट बंद हुए थे, जिसमें बेंचमार्क निफ्टी 50 24,300 के लेवल से नीचे बंद हुआ था। सेंसेक्स 3.11 पॉइंट या 0.00% बढ़कर 77,540.83 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 50 20.15 पॉइंट या 0.08% गिरकर 24,252 पर बंद हुआ।

ग्लोबल संकेत

एशियाई बाज़ार ज़्यादातर स्थिर रहे क्योंकि निवेशक ईरान पर संभावित अमेरिकी प्रतिबंधों और इस हफ़्ते के आखिर में आने वाले Nvidia के नतीजों का इंतज़ार कर रहे थे। इस बीच, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने इस महीने भारतीय इक्विटी में खरीदारी तेज़ कर दी है। अगस्त में अब तक उन्होंने 23,544 करोड़ रुपये का निवेश किया है, क्योंकि बेहतर तिमाही नतीजों, स्थिर रुपये और बाज़ार की बेहतर संभावनाओं ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है।

जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट वी के विजयकुमार ने कहा, “FPIs को भारतीय बाज़ार की ओर वापस लाने वाले कारक ये हैं: Q1 नतीजों में दिखी कमाई में बढ़ोतरी, ‘चिप ट्रेड’ से FPIs का बाहर निकलना, रुपये में स्थिरता और व्यापक बाज़ार की कंपनियों की शानदार ग्रोथ की संभावनाएँ।”

यह निवेश तब आया है जब FPIs ने जुलाई में 20,200 करोड़ रुपये का निवेश किया था। यह लगातार चार महीनों की भारी बिकवाली के बाद एक बड़ा बदलाव है और भारतीय इक्विटी में फिर से भरोसा बढ़ने का संकेत है।

इंडेक्स पर किन लेवल पर दें ध्यान

Enrich Money के CEO पोनमुडी आर ने कहा कि भारतीय इक्विटी बाज़ार सावधानी के साथ हफ़्ते की शुरुआत करने के लिए तैयार हैं, क्योंकि मिडिल ईस्ट में लगातार तनाव और कच्चे तेल की ऊंची कीमतें रिस्क लेने की इच्छा को कम कर रही हैं। कच्चे तेल की कीमतें मज़बूत बनी हुई हैं। WTI $86 प्रति बैरल के आसपास ट्रेड कर रहा है क्योंकि बाज़ार ईरान पर नए अमेरिकी प्रतिबंधों की तैयारी कर रहे हैं, जबकि पहले से ही लंबे समय से जियोपॉलिटिकल तनाव चल रहा है। GIFT Nifty फ्यूचर्स के शुरुआती संकेत – जो Nifty की पिछली क्लोजिंग 24,252 के मुकाबले 24,300–24,350 की रेंज में ट्रेड कर रहे हैं – घरेलू इक्विटी के लिए काफी हद तक सपाट या थोड़ी बढ़त वाली शुरुआत का संकेत देते हैं।

आज Bank Nifty के आउटलुक पर, Enrich Money के CEO पोनमुडी आर का मानना ​​है कि Bank Nifty का टेक्निकल सेटअप तुलनात्मक रूप से मज़बूत रहने की उम्मीद है, और इंडेक्स में लगातार मज़बूती दिख रही है। हालांकि, व्यापक स्ट्रक्चर एक रेंज में ही बना हुआ है, और इंडेक्स को ऊंचे लेवल पर रेजिस्टेंस का सामना करना पड़ रहा है। टेक्निकल नज़रिए से, 57,800–58,000 का ज़ोन तुरंत रेजिस्टेंस वाला एरिया बना हुआ है। 58,000 के ऊपर लगातार बने रहने से खरीदारी का मोमेंटम मज़बूत हो सकता है और 58,300–58,500 के लेवल की ओर बढ़ने का रास्ता खुल सकता है।

नीचे की तरफ, 57,400–57,300 तुरंत सपोर्ट ज़ोन बना हुआ है, और उसके बाद 57,100–57,000 का मज़बूत एरिया है। मौजूदा रिकवरी स्ट्रक्चर को बनाए रखने के लिए इन लेवल के ऊपर बने रहना ज़रूरी होगा, जबकि 57,000 के नीचे निर्णायक रूप से टूटने पर फिर से बिकवाली का दबाव बन सकता है और निकट अवधि का टेक्निकल रुझान कमज़ोर हो सकता है। कुल मिलाकर, Bank Nifty के लिए निकट अवधि का आउटलुक सावधानी के साथ सकारात्मक बना हुआ है, जिसमें 58,000 तुरंत ब्रेकआउट ट्रिगर के रूप में और 57,000 मुख्य डाउनसाइड सपोर्ट के रूप में काम कर रहा है।

Stock Market Live Update: गिफ्ट निफ्टी दे रहा संकेत, मजबूत हो सकती है भारतीय बाजार की शुरुआत

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Market Outlook: इस हफ्ते कैसी रहेगी शेयर बाजार की चाल; कच्चे तेल की कीमत, पश्चिम एशिया के हालात समेत इन फैक्टर्स से होगा तय

नए शुरू हो रहे सप्ताह में भारतीय शेयर बाजार की दिशा कच्चे तेल की कीमत और अमेरिका-ईरान संघर्ष से जुड़े घटनाक्रमों जैसे प्रमुख फैक्टर्स से तय होगी। पिछले सप्ताह सेंसेक्स में 468.42 अंकों की गिरावट रही। निफ्टी 114 अंक फिसला। न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, रेलिगेयर ब्रोकिंग लिमिटेड के सीनियर वाइस प्रेसिडेंड (रिसर्च) अजीत मिश्रा का कहना है कि निवेशक जैक्सन होल आर्थिक संगोष्ठी (Jackson Hole Symposium) पर करीबी नजर रखेंगे, खासकर अमेरिकी फेडरल रिजर्व के प्रमुख की टिप्पणियों पर। इससे बेंचमार्क ब्याज दरों की आगे की दिशा के संकेत मिलने की उम्मीद है।

आगे कहा कि अमेरिका के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के अनुमान, ड्यूरेबल गुड्स के ऑर्डर और कंज्यूमर कॉन्फिडेंस से भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मजबूती और फेडरल रिजर्व की नीतिगत दिशा के बारे में महत्वपूर्ण संकेत मिलेंगे। भारत को लेकर बात करें तो निवेशकों की नजर रुपये की चाल, विदेशी संस्थागत निवेशकों के रुख और घरेलू बाजार में नकदी की स्थिति पर रहेगी।

छाए रहेंगे 3 प्रमुख मुद्दे

ऑनलाइन ट्रेडिंग एंड वेल्थ टेक फर्म एनरिच मनी के CEO पोनमुडी आर का कहना है कि वैश्विक बाजारों में इस सप्ताह 3 प्रमुख मुद्दे छाए रहेंगे। इनमें अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति की दिशा, एनवीडिया के तिमाही नतीजे और अमेरिका-ईरान के बीच जारी तनाव शामिल हैं। लंबी अवधि के अमेरिकी बॉन्ड पर यील्ड में उतार-चढ़ाव के बीच जैक्सन होल संगोष्ठी में फेड के प्रमुख केविन वॉर्श के संबोधन पर करीबी नजर रहेगी। सितंबर में होने वाली पॉलिसी मीटिंग से पहले निवेशक संकेत तलाशेंगे कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक लगातार बनी हुई महंगाई के जोखिमों और श्रम बाजार के नरम पड़ने के संकेतों को कैसे तौल रहा है।

पोनमुडी ने आगे कहा कि कच्चे तेल की कीमतें भी एक बड़ा बाहरी जोखिम बनी हुई हैं। उनके मुताबिक, ‘‘अमेरिका और ईरान के बीच 60 दिन का समझौता किसी स्थायी समाधान के बिना समाप्त हो गया है। इससे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज एक बार फिर जारी तनाव का केंद्र बन गया है और क्षेत्र में ऊर्जा की सामान्य आपूर्ति प्रभावित हुई है।’’

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FPI की गतिविधियां

नए सप्ताह में निवेशक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) के रुख पर भी नजर रखेंगे। इन निवेशकों ने अगस्त में भारतीय शेयर बाजार में अपनी खरीद तेज की है। कंपनियों के बेहतर तिमाही नतीजों, रुपये की स्थिरता और बाजार की बेहतर संभावनाओं से निवेशकों का भरोसा मजबूत हुआ है। FPI ने अगस्त में अब तक भारतीय शेयर बाजार में 23,544 करोड़ रुपये डाले हैं। इससे पहले जुलाई में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों में 20,200 करोड़ रुपये का निवेश किया था। जुलाई से पहले लगातार 4 महीने सेलिंग की थी।

मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड के रिसर्च हेड (वेल्थ मैनेजमेंट) सिद्धार्थ खेमका का मानना है कि निफ्टी में बीते लगातार दो सप्ताह गिरावट रही। अब भारतीय शेयर बाजार में इस सप्ताह कुछ स्थिरता आ सकती है और निकट अवधि में मामूली रिकवरी की उम्मीद है। बाजार की निगाह ब्रेंट कच्चे तेल की कीमतों पर भी रहेगी, जो 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं। इसके अलावा वैश्विक घटनाक्रम भी महत्वपूर्ण रहेंगे।

Disclaimer: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए सलाह या विचार एक्सपर्ट/ब्रोकरेज फर्म के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदायी नहीं है। यूजर्स को मनीकंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले हमेशा सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।