Silver Price Today: हफ्ते के दूसरे दिन भी चांदी गिरी, जानिए आपके आपने शहर का ताजा भाव

Silver Price Today: हफ्ते के दूसरे दिन भी चांदी की कीमतो में गिरावट देखने को मिली। दिल्ली के सर्राफा बाजार में चांदी की कीमत गिरकर 2,26,500 रुपये प्रति किलोग्राम (सभी टैक्स सहित) रह गई। उधर गुडरिटर्न्स के मुताबिक चांदी की कीमत 2,40,000 रुपये प्रति किलो हो गई।

आज बाजार ओपन होने से पहले तक मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर चांदी का वायदा भाव 1.24% घटकर यानी 2805 रुपये गिरावट के साथ 2,22,950 रुपये प्रति किलो हो गया। जबकि पिछले कारोबारी सत्र में चांदी 2,25,755 रुपये प्रति किलो पर बंद हुई थी। बुलियंस के मुताबिक चांदी की कीमत 2,23,280 रुपये किलो हो गई। जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में 60.37 डॉलर प्रति औंस हो गई।

औद्योगिक मांग, अंतरराष्ट्रीय बाजार में हलचल और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत में उतार-चढ़ाव, ये सभी घरेलू स्तर पर चांदी की कीमतों को प्रभावित कर सकते हैं। स्थानीय बाज़ार की स्थितियों के आधार पर अलग-अलग शहरों में कीमतें अलग-अलग हो सकती हैं।

आइए 13 अक्टूबर को भारत के प्रमुख शहरों में चांदी की ताजा कीमतों पर एक नज़र डालते हैं

शहर1 किलो चांदी का भाव
दिल्ली₹ 2,39,900
मुंबई₹ 2,39,900
कोलकाता₹2,39,900
चेन्नई₹2,44,900
लखनऊ₹2,39,900
पटना₹2,39,900
जयपुर₹2,39,900
अहमदाबाद₹2,39,900
पुणे₹2,39,900
बेंगलुरु₹2,39,900
हैदराबाद₹2,39,900
भोपाल₹2,39,900
चंडीगढ़₹2,39,900
नोएडा₹2,39,900
गुरुग्राम₹2,39,900

चांदी में गिरावट क्यों

डॉलर मजबूत होने की वजह से चांदी की कीमतों में ज्यादा तेजी नहीं आ पा रही है। वहीं, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण महंगाई को लेकर चिंता बनी हुई है। अब निवेशकों की नजर अमेरिका के महंगाई के आंकड़ों पर है, जिनसे यह संकेत मिलेगा कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व आगे ब्याज दरों में क्या बदलाव कर सकता है।

अमेरिकी डॉलर इंडेक्स करीब 18 महीने के ऊंचे स्तर पर है, जिससे सोने और चांदी की कीमतों में तेजी सीमित हो रही है। सोने और चांदी की कीमतों पर डॉलर और अमेरिकी बॉन्ड की ब्याज दरों का सीधा असर पड़ता है। डॉलर मजबूत होने पर दूसरे देशों के खरीदारों के लिए सोना महंगा हो जाता है। वहीं, ब्याज दरें बढ़ने पर निवेशक सोने के बजाय ऐसे विकल्पों में पैसा लगाना पसंद कर सकते हैं, जिनसे ब्याज मिलता है।

दूसरी ओर, पश्चिम एशिया में तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भी बाजार को प्रभावित कर रही हैं। ब्रेंट क्रूड करीब 105 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया, जो दो सप्ताह के ऊंचे स्तर के करीब है। तेल महंगा होने से महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है। ऐसे में अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में कटौती करने में देरी कर सकता है।

अब कहां रखें नजर

आने वाले दिनों में अमेरिका के महंगाई के आंकड़े, फेडरल रिजर्व के बयान, डॉलर की चाल और अमेरिकी बॉन्ड की ब्याज दरें सोने-चांदी की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगी। एक्सपर्ट्स का कहना है कि पिछले सप्ताह फेडरल रिजर्व के सख्त रुख, मजबूत डॉलर और अमेरिकी बॉन्ड की ऊंची ब्याज दरों से सोने-चांदी पर दबाव पड़ा था। हालांकि, ईरान के साथ बातचीत में प्रगति से जुड़ी टिप्पणियों के बाद तेल की कीमतों और महंगाई को लेकर चिंता कुछ कम हुई, जिससे बाजार के माहौल में सुधार आया।

(डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सार्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

RBI MPC Meet: आपकी होम और कार लोन की EMI बढ़ेगी या घटेगी? कल 10 बजे RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा करेंगे बड़ा ऐलान

RBI MPC Meet October 2026: देश के करोड़ों आम नागरिकों, होम लोन ग्राहकों और शेयर बाजार की नजरें कल यानी 7 अक्टूबर को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के फैसले पर टिकी होंगी। मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) कल सुबह 10 बजे अपनी नई मौद्रिक नीति का ऐलान करेगी, जिसके बाद दोपहर में गवर्नर संजय मल्होत्रा प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करेंगे।

पिछले 4 लगातार बैठकों से रिजर्व बैंक ने रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखा है। हालांकि, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल व कमोडिटीज की कीमतों में तेजी के कारण इस बार ब्याज दरें बढ़ाए जाने की मजबूत संभावना जताई जा रही है।

क्रेडिट रेटिंग एजेंसी इकरा (ICRA) और ब्रोकरेज फर्म गोल्डमैन सैक्स समेत अधिकांश अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि इस बार रेपो रेट को 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 5.50% किया जा सकता है।

इस बार की पॉलिसी पर क्या है दिग्गजों की राय?

बॉम्बे चार्टर्ड अकाउंटेंट्स सोसाइटी की अध्यक्ष सीए किंजल शाह के मुताबिक, ‘खुदरा महंगाई बढ़ने, ऊर्जा की ऊंची लागत और वैश्विक स्तर पर मौद्रिक सख्ती के बीच रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी कर इसे 5.50% किए जाने की व्यापक उम्मीद है। हालांकि, केवल दरों का फैसला ही पर्याप्त नहीं होगा। महंगाई की उम्मीदों को नियंत्रित रखने और घरेलू आर्थिक वृद्धि को बनाए रखते हुए कर्ज की उपलब्धता जारी रखने के लिए तरलता और भविष्य में ब्याज दरों की दिशा पर आरबीआई की स्पष्ट स्थिति भी बेहद महत्वपूर्ण होगी।’

बॉम्बे चार्टर्ड अकाउंटेंट्स सोसाइटी के उपाध्यक्ष सीए मंदार तेलंग ने कहा कि, ‘अब समय आ गया है कि सरकार केवल प्रक्रियाओं में छोटे-मोटे बदलाव करने के बजाय GST प्रशासन से जुड़े कुछ बुनियादी और संरचनात्मक मुद्दों पर भी ध्यान दे। केवल इस वजह से इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) नहीं रोका जाना चाहिए कि सप्लायर या प्राप्तकर्ता ने रिटर्न दाखिल करते समय कोई वास्तविक क्लेरिकल, गणना संबंधी या प्रक्रियात्मक गलती कर दी हो, खासकर तब जब लेन-देन वास्तविक हो। सरकार को कई राज्यों में काम करने वाली कंपनियों के लिए वास्तविक केंद्रीकृत GST पंजीकरण और अनयूज्ड ITC को आपस में ट्रांसफर करने की सुविधा देनी चाहिए। 180 दिनों में भुगतान की शर्त और MSMEs के लिए पेमेंट बेसिस टैक्स जैसे व्यावहारिक सुधारों से अनावश्यक मुकदमेबाजी कम होगी और कारोबारियों की वर्किंग कैपिटल पर दबाव घटेगा।’

कब और कहां देखें लाइव प्रसारण?

तारीख और समय: 7 अक्टूबर 2026, सुबह 10:00 बजे (पॉलिसी ऐलान) एवं दोपहर में प्रेस कॉन्फ्रेंस।

कहां देखें: आरबीआई के आधिकारिक यूट्यूब चैनल (YouTube Channel) और hindi.moneycontrol.com पर लाइव अपडेट्स।

कम होगी EMI या बढ़ेगा FDs पर ब्याज? जानिए 7 अक्टूबर को RBI के फैसले से आपकी जेब पर क्या असर पड़ेगा

FPI लगातार निकाल रहे पैसा, सितंबर में अब तक बेचे ₹20974 करोड़ के भारतीय शेयर; डेट मार्केट से भी मोह भंग

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने एक बार फिर भारतीय शेयर बाजार से दूरी बनानी शुरू कर दी है। उन्होंने सितंबर में अब तक भारतीय शेयरों से 20,974 करोड़ रुपये निकाले हैं। वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितता, अमेरिका में ऊंची ब्याज दरें, बढ़ती बॉन्ड यील्ड, महंगा कच्चा तेल और कमजोर रुपया इसकी वजह हैं। सेंट्रल डिपॉजिटरी सर्विसेज लिमिटेड (CDSL) के आंकड़ों के अनुसार, सितंबर में हुई बिकवाली से पहले विदेशी निवेशकों ने जुलाई में भारतीय शेयरों में 20,200 करोड़ रुपये और अगस्त में 29,630 करोड़ रुपये का निवेश किया था। हालांकि, मार्च से जून तक लगातार 4 महीने भारतीय शेयरों में बिकवाली की थी।

ताजा सेलिंग के बाद साल 2026 में अब तक FPI भारतीय शेयर बाजार से कुल 2.45 लाख करोड़ रुपये निकाल चुके हैं। साल 2025 में उन्होंने 1.66 लाख करोड़ रुपये की सेलिंग की थी। 1-18 सिंतबर 2026 तक FPI ने 20,974 करोड़ रुपये के भारतीय शेयर बेचे। लेकिन IPO बाजार के जरिए FPI का निवेश जारी रहा।

विदेशी निवेशकों ने भारतीय ऋण या बॉन्ड बाजार में भी बिकवाली की है। सितंबर में अब तक उन्होंने फुली एक्सेसिबल रूट (FAR) के जरिए 10,296 करोड़ रुपये, वॉलंटरी रिटेंशन रूट (VRR) के तहत 1,817 करोड़ रुपये और जनरल रूट से 1,068 करोड़ रुपये निकाले हैं।

एक्सपर्ट्स का क्या है मानना

न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, चॉइस वेल्थ के चीफ इनवेस्टमेंट स्ट्रैटेजी ऑफिसर धीरज गौड़ का कहना है कि FPI की हालिया बिकवाली के पीछे 3 प्रमुख कारण हैं— अमेरिका में ऊंची ब्याज दरें और ऊंची बॉन्ड यील्ड, भू-राजनीतिक तनाव के बीच कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और भारतीय रुपये में कमजोरी। अमेरिका के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने सितंबर की मीटिंग में बेंचमार्क ब्याज दरों में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है। इसके बाद ये 3.75-4 प्रतिशत हो गई हैं। इससे भारत और अमेरिका के बीच यील्ड का अंतर कम हुआ है, जिससे विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय एसेट्स का आकर्षण घटा है।

दूसरी ओर, ब्रेंट कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना हुआ है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने तेल को और महंगा कर दिया है, जिससे महंगाई और भारत के आयात बिल को लेकर​ चिंता बढ़ गई है। रुपये पर भी दबाव बना हुआ है। पिछले सप्ताह रुपये में 1.1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जो 4 महीने में उसकी सबसे बड़ी साप्ताहिक गिरावट रही। रुपया 95.92-95.96 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर के आसपास कारोबार करता रहा और कारोबार के दौरान 96 रुपये प्रति डॉलर के स्तर को भी पार कर गया।

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इनवेस्टमेंट प्लेटफॉर्म Trackk के को-फाउंडर और CEO वेदांत गुप्ते का मानना है कि FPI की सितंबर की बिकवाली को मुख्य रूप से कच्चे तेल और डॉलर की स्थिति से जोड़कर देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, तेल की कीमतों में तेजी और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी का असर केवल भारत पर ही नहीं, बल्कि दूसरे उभरते बाजारों पर भी काफी ज्यादा पड़ रहा है। आगे FPI का फ्लो ईरान-अमेरिका के बीच चल रहे टकराव और उसके कारण कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ने वाले असर से काफी हद तक प्रभावित होगा।

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Market This Week : इस हफ्ते 2% टूटे सेंसेक्स-निफ्टी,जानिए अगले हफ्ते कैसी रह सकती है इनकी चाल

Market This Week : 11 सितंबर को मेटल,रियल्टी और PSU बैंक शेयरों में बिकवाली के बीच,उतार-चढ़ाव भरे सेशन में भारतीय बेंचमार्क इंडेक्स दिन के निचले स्तर से तेजी से सुधरे और मामूली गिरावट के साथ बंद हुए। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के चलते ब्रेंट क्रूड का भाव बढ़कर लगभग $109 प्रति बैरल पर आ गया, जिससे मार्केट गैप-डाउन खुला और ज्यादातर समय नेगेटिव जोन में रहा। निफ्टी ने 23,231.40 का इंट्राडे लो बनाया,जबकि सेंसेक्स 740 अंक तक गिर गया। हालांकि, बाद में क्रूड ऑयल की कीमतों में नरमी से बिकवाली का दबाव कम हुआ,जिससे इंडेक्स दिन के निचले स्तर से रिकवर हुए और मामूली नुकसान के साथ बंद हुए।

कारोबार के अंत में सेंसेक्स 120.83 अंक या 0.16 प्रतिशत गिरकर 74,781.76 पर और निफ्टी 79.70 अंक या 0.34 प्रतिशत गिरकर 23,398.10 पर बंद हुआ। वीकली बेसिस पर देखें तो इस हफ्ते BSE सेंसेक्स और निफ्टी दोनों में 2% की गिरावट आई।

बाजार की वीकली चाल पर एक नजर

कोटक सिक्योरिटीज में VP टेक्निकल रिसर्च, अमोल अठावले का कहना है कि आज खत्म हुए हफ्ते में बेंचमार्क इंडेक्स में तेज गिरावट आई। निफ़्टी लगभग 2 प्रतिशत नीचे बंद हुआ,जबकि सेंसेक्स 1,700 अंक गिर गया। सेक्टरों की बात करें तो लगभग सभी अहम सेक्टर इंडेक्स में ऊपरी स्तरों पर प्रॉफिट बुकिंग रही। लेकिन रियल्टी और IT इंडेक्स को सबसे अधिक नुकसान हुआ। रियल्टी 6.50 प्रतिशत और IT 5.75 प्रतिशत नीचे गिर कर बंद हुए।

इस हफ्ते मार्केट ने 23,800/76,000 के अहम सपोर्ट जोन को तोड़ा और इसके बाद बिकवाली का दबाव बढ़ गया। टेक्निकल तौर पर डेली और इंट्राडे चार्ट पर मार्केट लोअर हाई और लोअर लो का पैटर्न दिखा रहा है और वीकली चार्ट पर एक लंबी बेयरिश कैंडल बनी है,जो काफी हद तक नेगेटिव संकेत है।

अगले हफ्ते कैसा रह सकता है बाजार?

अमोल अठावले का मानना ​​है कि शॉर्ट-टर्म के लिए मार्केट का ट्रेंड कमजोर है,लेकिन ओवरसोल्ड लेवल से संकेत मिलता है कि मौजूदा लेवल से एक पुलबैक रैली की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। ट्रेडर्स के लिए,तत्काल सपोर्ट जोन 23,200/74,200 के आसपास है। अगर मार्केट इस लेवल से ऊपर ट्रेड करने में कामयाब रहता है,तो 23,500/75,000 तक उछाल जारी रह सकता है। इसके बाद और तेजी आ सकती है,जिससे इंडेक्स 23,700–23,750/75,500–75,800 के आसपास पहुंच सकता है। इसके विपरीत अगर मार्केट 23,200/74,200 से नीचे गिरता है तो बिकवाली का दबाव बढ़ने की संभावना है। इस लेवल से नीचे जाने पर मार्केट 23,000–22,900/73,700–73,500 के लेवल को फिर से टेस्ट कर सकता है।

बैंक निफ्टी के लिए सबसे नजदीकी सपोर्ट 56,000 पर है। इस लेवल के ऊपर जाने पर यह 57,000–57,500 की ओर बढ़ सकता है। नीचे की तरफ, अगर यह 56,000 से नीचे गिरता है तो इसके 55,500–55,200 तक गिरने की संभावना बढ़ जाती है।

मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज़ में हेड ऑफ़ रिसर्च,वेल्थ मैनेजमेंट सिद्धार्थ खेमका का कहना है कि भारतीय इक्विटी बाजार पर दबाव बने रहने की संभावना है। ब्रेंट क्रूड की कीमत US$100 प्रति बैरल के स्तर को पार कर US$110 प्रति बैरल की ओर बढ़ गई है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण सप्लाई में रुकावट की चिंताएं बढ़ गई हैं।

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण ग्लोबल बॉन्ड यील्ड में बढ़त हुई है, जिससे US 10-ईयर ट्रेजरी यील्ड 5% के करीब पहुंच गई है। इससे इक्विटी वैल्यूएशन पर दबाव बढ़ रहा है और फेड के ज्यादा सख्त रुख अपनाने की उम्मीदें भी बढ़ रही हैं। रुपया गिरकर ₹95.6/US$ पर आ गया है। जबकि FII की लगातार बिकवाली ने दबाव को और बढ़ा दिया है।

अगले हफ्ते निवेशक भारत के अगस्त के CPI और WPI महंगाई के आंकड़ों, US फ़ेड की पॉलिसी से जुड़े फैसले,US में रिटेल बिक्री और इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन पर नजर रखेंगे। साथ ही कच्चे तेल की कीमतें,रुपये की चाल और ग्लोबल यील्ड भी बाजार के लिए अहम होंगे।

बोनान्जा में रिसर्च एनालिस्ट अभिनव तिवारी का कहना है कि निकट भविष्य में बाजार की दिशा तय करने में कच्चे तेल की कीमतें और पश्चिम एशिया में हो रही घटनाओं की बड़ी भूमिका होगी। हालांकि,घरेलू संस्थागत निवेशकों का मजबूत निवेश बाजार को सहारा दे रहा है। कच्चे तेल की कीमतों में कोई भी बड़ी गिरावट भारतीय इक्विटी बाजार को राहत दे सकती है। इसलिए, चुनिंदा और स्टॉक-स्पेसिफिक रणनीति अपना सही रहेगा। ऐसी कंपनियों पर फोकस करें जिनकी अर्निंग की संभावना मजबूत है और जिनका वैल्यूएशन सही है।

 

Market Outlook : गिरावट के साथ बंद हुआ बाजार, जानिए 15 सितंबर को कैसी रह सकती है इसकी चाल

 

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Asian Market: ग्लोबल बाजारों में आज भी कोहराम, US मार्केट और एशिया कमजोर, US बॉन्ड यील्ड में जोरदार उछाल

Asian Market Today: गुरुवार, 10 सितंबर को वॉल स्ट्रीट में बिकवाली के असर से एशियाई शेयरों में गिरावट आई। तेल की कीमतों में उछाल ने महंगाई की चिंताओं को फिर से बढ़ा दिया और ट्रेजरी यील्ड को ऊपर धकेल दिया। शुरुआती कारोबार में MSCI एशिया पैसिफिक इंडेक्स 0.3% गिर गया। जापान के निक्केई 225 में सबसे ज़्यादा 1.07% की गिरावट आई, जबकि टॉपिक्स (Topix) 0.53% नीचे आया।दक्षिण कोरिया का कोस्पी (Kospi) 0.56% गिरा और हैंग सेंग फ्यूचर्स में 0.9% की गिरावट के संकेत मिले।

एक दिन पहले 0.3% की बढ़त के बाद जापानी येन 153.57 प्रति डॉलर पर स्थिर रहा, जबकि ऑफशोर युआन 6.7056 प्रति डॉलर पर लगभग स्थिर रहा।

भारत में, GIFT निफ्टी 103 अंक से ज़्यादा नीचे था, जिससे संकेत मिलता है कि निफ्टी लाल निशान में खुल सकता है।

क्षेत्रीय कमजोरी वॉल स्ट्रीट में आई तेज गिरावट के बाद देखी गई। S&P 500 में 0.5% की गिरावट आई, जिसमें इंडस्ट्रियल और कंज्यूमर-डिस्क्रिशनरी शेयरों पर बिकवाली का सबसे ज़्यादा असर पड़ा। नैस्डैक 100 में 0.3% की गिरावट आई क्योंकि एनवीडिया, अमेज़न और अल्फाबेट जैसी बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों के शेयरों में गिरावट दर्ज की गई।

बढ़ती बॉन्ड यील्ड ने शेयरों पर दबाव और बढ़ा दिया। बुधवार को बढ़ने के बाद एशियाई घंटों में 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड स्थिर रही। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी सरकार ने 6 बिलियन डॉलर तक के लंबी अवधि के कर्ज को खरीदने की योजना का खुलासा किया था, जो कुछ निवेशकों की उम्मीद से कम राशि थी। महंगाई की चिंताओं से पहले से ही तनावपूर्ण माहौल पर इस निराशा का और असर पड़ा।

तेल की कीमतों ने सबसे बड़ा झटका दिया क्योंकि ब्रेंट क्रूड 0.5% बढ़कर 101.69 डॉलर पर पहुंच गया और बढ़त जारी रखते हुए 102 डॉलर प्रति बैरल तक चला गया। वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट 1% बढ़कर 97.05 डॉलर प्रति बैरल हो गया, जबकि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने इस तेजी को बढ़ावा दिया, क्योंकि ट्रेडर्स ऊर्जा आपूर्ति में संभावित रुकावटों को लेकर चिंतित दिख रहे थे।

कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने इस उम्मीद को और बढ़ा दिया कि महंगाई को काबू में रखने के लिए फेडरल रिजर्व को ब्याज दरें और बढ़ानी पड़ेंगी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तेल की बढ़ती कीमतों को लेकर चिंता को कम करके आंका और कहा कि मिड-टर्म चुनाव के बाद यह टकराव खत्म हो जाएगा, जबकि तनाव कम होने के कोई संकेत नहीं दिख रहे थे।

ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने चेतावनी दी कि अगर अमेरिका ईरानी इलाके और इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले जारी रखता है, तो तेहरान अपने जवाबी हमलों को और तेज़ कर देगा।

अब बाज़ार की नज़र शुक्रवार को आने वाले अमेरिका के महंगाई के आंकड़ों पर होगी। ट्रेडर इस रिपोर्ट को ध्यान से देखेंगे ताकि यह अंदाज़ा लगाया जा सके कि क्या अमेरिकी फेडरल रिज़र्व सितंबर की बैठक में ब्याज दरें बढ़ाएगा या नहीं।

 

Stock Market Live Update: गिफ्ट निफ्टी 90 अंक नीचे, क्रूड $102 के करीब, इन शेयरों पर करें आज फोकस

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Silver Price Today: खरीदारी से पहले जान लें चांदी का भाव, दिल्ली-NCR से मुंबई तक ये हैं ताजा रेट

Silver Price Today: चांदी की कीमतों में इन दिनों लगातार हलचल देखने को मिल रही है। शनिवार और रविवार को बाजार बंद होने की वजह से अब अगले कारोबारी सत्र में ही तस्वीर साफ होगी। इससे पहले MCX पर चांदी का वायदा भाव 158 रुपये यानी 0.07% की गिरावट के साथ 2,37,500 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गया। पिछले कारोबारी सत्र में यह 2,37,658 रुपये प्रति किलो पर बंद हुआ था।

वहीं, बुलियन्स के अनुसार चांदी का भाव 2,37,130 रुपये प्रति किलो रहा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी चांदी 66.82 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार करती नजर आई। दूसरी ओर, Goodreturns के आंकड़ों में चांदी की कीमत 2,50,000 रुपये प्रति किलो बताई गई है।

आज एक किलो चांदी का क्या है भाव?

शहरों के हिसाब से चांदी की कीमतों में अंतर देखने को मिल रहा है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता समेत कई बड़े शहरों में एक किलो चांदी का भाव 2.50 लाख रुपये है। वहीं चेन्नई, भुवनेश्वर, कटक और कई दक्षिण भारतीय शहरों में कीमत 2.55 लाख रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है।

शहरवार चांदी के ताजा रेट

शहर1 किलो चांदी का भाव
दिल्ली₹2,50,000
मुंबई₹2,50,000
कोलकाता₹2,50,000
चेन्नई₹2,55,000
पटना₹2,50,000
लखनऊ₹2,50,000
जयपुर₹2,50,000
अहमदाबाद₹2,50,000
सूरत₹2,50,000
पुणे₹2,50,000
नागपुर₹2,50,000
बेंगलुरु₹2,50,000
हैदराबाद₹2,55,000
भुवनेश्वर₹2,55,000
वाराणसी₹2,50,000
नोएडा₹2,50,000
गुरुग्राम₹2,50,000
चंडीगढ़₹2,50,000
अमृतसर₹2,50,000
लुधियाना₹2,50,000
भोपाल₹2,50,000
इंदौर₹2,50,000
राजकोट₹2,50,000
गोवा₹2,50,000
कोच्चि₹2,55,000
तिरुवनंतपुरम₹2,55,000
कोयंबटूर₹2,55,000
मदुरै₹2,55,000
विजयवाड़ा₹2,55,000
विशाखापत्तनम₹2,55,000
तिरुपति₹2,55,000
रायपुर₹2,50,000
रांची₹2,50,000

पिछले कारोबारी दिन चांदी का भाव कैसा रहा?

शुक्रवार को दिल्ली के सर्राफा बाजार में चांदी 2,40,500 रुपये प्रति किलोग्राम पर स्थिर रही। वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में हाजिर चांदी 0.38% फिसलकर 66.72 डॉलर प्रति औंस पर आ गई।

MCX पर भी चांदी में कमजोरी दिखी। दिसंबर डिलीवरी वाले कॉन्ट्रैक्ट का भाव 749 रुपये यानी 0.31% गिरकर 2,41,600 रुपये प्रति किलो रह गया। लगातार दो कारोबारी दिनों की तेजी के बाद शुक्रवार को चांदी की रफ्तार थम गई।

चांदी के भाव पर क्यों बढ़ रहा दबाव?

विशेषज्ञों के मुताबिक, हालिया तेजी के बाद निवेशकों की ओर से मुनाफावसूली किए जाने से चांदी की कीमतों पर दबाव बना है। इसके अलावा वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर अनिश्चितता भी कीमती धातुओं के बाजार को प्रभावित कर रही है।

मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज के सिद्धार्थ खेमका के अनुसार, घरेलू चांदी की कीमत जनवरी में 4 लाख रुपये प्रति किलो से अधिक के रिकॉर्ड स्तर से 40% से ज्यादा नीचे आ चुकी है और अब करीब 2.3 से 2.4 लाख रुपये प्रति किलो के आसपास है।

निवेश मांग कमजोर, स्टॉक बढ़ने की चिंता

विशेषज्ञों का कहना है कि चांदी में निवेश की मांग फिलहाल कमजोर बनी हुई है। इससे डीलरों के पास जमा स्टॉक को लेकर चिंता बढ़ रही है। अगर मांग में जल्द सुधार नहीं आया, तो भारतीय डीलरों की करीब 2,000 टन चांदी के ऑर्डर से बाजार में स्टॉक का दबाव और बढ़ सकता है।

पश्चिम एशिया तनाव का भी असर

मुड्रेक्स के विश्लेषक अक्षत सिद्धांत के मुताबिक, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और आपूर्ति से जुड़ी चिंताओं ने भी बाजार की दिशा प्रभावित की है। ईंधन की कीमतों में मजबूती से महंगाई और ब्याज दरों को लेकर चिंता बढ़ रही है।

ऐसे माहौल में निवेशक सोने-चांदी जैसी कीमती धातुओं में निवेश को लेकर भी सतर्क हो रहे हैं। आने वाले दिनों में वैश्विक आर्थिक आंकड़े, ब्याज दरों की दिशा और भू-राजनीतिक घटनाक्रम चांदी की कीमतों के लिए अहम संकेत साबित हो सकते हैं।

Gold Rate Today: एक हफ्ते में 24 कैरेट गोल्ड ₹3440 और 22 कैरेट गोल्ड ₹3150 तक हुआ सस्ता; चांदी ₹5000 लुढ़की

पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब की पहली रक्षा बैठक आज:इस्तांबुल में तीनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्री मिलेंगे; सैन्य प्रमुख भी शामिल होंगे

पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब के बीच मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के तहत पहली बैठक सोमवार को इस्तांबुल में होगी। बैठक में तीनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्री के साथ सैन्य प्रमुख भी शामिल होंगे। पाकिस्तान की ओर से उपप्रधानमंत्री मोहम्मद इशाक डार, रक्षा मंत्री ख्वाजा मुहम्मद आसिफ और सेना प्रमुख एवं चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज फील्ड मार्शल सैयद आसिम मुनीर हिस्सा लेंगे। पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने 7 अगस्त को मक्का में संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते के तहत किसी एक देश पर हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच इस समझौते को तीनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग मजबूत करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। बैठक का एजेंडा फिलहाल साफ नहीं मक्का रक्षा समझौते के तहत बनी रणनीतिक राजनीतिक और रक्षा समिति की पहली बैठक का एजेंडा सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन क्षेत्रीय सुरक्षा, ईरान से जुड़े हालात, रक्षा सहयोग और आपसी सुरक्षा रणनीति पर चर्चा होने की संभावना है। इसके अलावा क्षेत्र में बढ़ते तनाव और संभावित सुरक्षा खतरों से निपटने के लिए आपसी तालमेल मजबूत करने पर भी विचार किया जा सकता है। बांग्लादेश ने भी दिखाई रुचि मक्का समझौते के तहत भविष्य में अन्य देशों के जुड़ने की संभावना है। बांग्लादेश पहले ही इस समझौते में रुचि दिखा चुका है। पाकिस्तान के विदेश कार्यालय के मुताबिक, इस्तांबुल बैठक में उसकी भागीदारी तुर्किये और सऊदी अरब के साथ मजबूत संबंधों के साथ क्षेत्र में स्थायी शांति और स्थिरता के लिए उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है। चार देशों की अलग बैठक भी होगी मक्का रक्षा समझौते की बैठक के अलावा तुर्किये, पाकिस्तान, सऊदी अरब और मिस्र के विदेश मंत्रियों की एक अलग बैठक भी प्रस्तावित है। यह चार देशों का समूह क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता से जुड़े मुद्दों पर समन्वय बढ़ाने के उद्देश्य से मार्च में बनाया गया था। इस समूह की पिछली बैठक 5 अगस्त को जॉर्डन की राजधानी अम्मान में हुई थी। उस दौरान नेताओं ने क्षेत्रीय शांति, सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने के लिए संवाद और आपसी सहयोग को और मजबूत करने पर जोर दिया था। चुनौतियों का सामना कर रहे हैं तीनों देश मक्का रक्षा समझौता ऐसे समय में हुआ है, जब तीनों देश अपनी-अपनी सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहे हैं। इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर पूरे पश्चिम एशिया पर पड़ रहा है। पाकिस्तान का अफगानिस्तान के साथ सीमा विवाद चल रहा है, जबकि सऊदी अरब को हूती विद्रोहियों के हमलों का खतरा बना रहता है। वहीं, तुर्किये लंबे समय से कुर्द उग्रवादी समूहों के खिलाफ अभियान चला रहा है और इजराइल के साथ उसके संबंध भी तनावपूर्ण हैं। ऐसे हालात में तीनों देशों ने सुरक्षा और रक्षा सहयोग बढ़ाने के लिए यह समझौता किया है। खबर अपडेट हो रही है…

पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब की पहली रक्षा बैठक आज:इस्तांबुल में तीनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्री मिलेंगे; सैन्य प्रमुख भी शामिल होंगे

पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब के बीच मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के तहत पहली बैठक सोमवार को इस्तांबुल में होगी। बैठक में तीनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्री के साथ सैन्य प्रमुख भी शामिल होंगे। पाकिस्तान की ओर से उपप्रधानमंत्री मोहम्मद इशाक डार, रक्षा मंत्री ख्वाजा मुहम्मद आसिफ और सेना प्रमुख एवं चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज फील्ड मार्शल सैयद आसिम मुनीर हिस्सा लेंगे। पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने 7 अगस्त को मक्का में संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते के तहत किसी एक देश पर हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच इस समझौते को तीनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग मजबूत करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। बैठक का एजेंडा फिलहाल साफ नहीं मक्का रक्षा समझौते के तहत बनी रणनीतिक राजनीतिक और रक्षा समिति की पहली बैठक का एजेंडा सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन क्षेत्रीय सुरक्षा, ईरान से जुड़े हालात, रक्षा सहयोग और आपसी सुरक्षा रणनीति पर चर्चा होने की संभावना है। इसके अलावा क्षेत्र में बढ़ते तनाव और संभावित सुरक्षा खतरों से निपटने के लिए आपसी तालमेल मजबूत करने पर भी विचार किया जा सकता है। बांग्लादेश ने भी दिखाई रुचि मक्का समझौते के तहत भविष्य में अन्य देशों के जुड़ने की संभावना है। बांग्लादेश पहले ही इस समझौते में रुचि दिखा चुका है। पाकिस्तान के विदेश कार्यालय के मुताबिक, इस्तांबुल बैठक में उसकी भागीदारी तुर्किये और सऊदी अरब के साथ मजबूत संबंधों के साथ क्षेत्र में स्थायी शांति और स्थिरता के लिए उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है। पाकिस्तान-सऊदी-तुर्किये की सैन्य ताकत एक साथ इस समझौते के तहत तीनों देशों की अलग-अलग ताकत एक साथ आएगी। चार देशों की अलग बैठक भी होगी मक्का रक्षा समझौते की बैठक के अलावा तुर्किये, पाकिस्तान, सऊदी अरब और मिस्र के विदेश मंत्रियों की एक अलग बैठक भी प्रस्तावित है। यह चार देशों का समूह क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता से जुड़े मुद्दों पर समन्वय बढ़ाने के उद्देश्य से मार्च में बनाया गया था। इस समूह की पिछली बैठक 5 अगस्त को जॉर्डन की राजधानी अम्मान में हुई थी। उस दौरान नेताओं ने क्षेत्रीय शांति, सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने के लिए संवाद और आपसी सहयोग को और मजबूत करने पर जोर दिया था। चुनौतियों का सामना कर रहे हैं तीनों देश मक्का रक्षा समझौता ऐसे समय में हुआ है, जब तीनों देश अपनी-अपनी सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहे हैं। इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर पूरे पश्चिम एशिया पर पड़ रहा है। पाकिस्तान का अफगानिस्तान के साथ सीमा विवाद चल रहा है, जबकि सऊदी अरब को हूती विद्रोहियों के हमलों का खतरा बना रहता है। वहीं, तुर्किये लंबे समय से कुर्द उग्रवादी समूहों के खिलाफ अभियान चला रहा है और इजराइल के साथ उसके संबंध भी तनावपूर्ण हैं। ऐसे हालात में तीनों देशों ने सुरक्षा और रक्षा सहयोग बढ़ाने के लिए यह समझौता किया है। ये खबर भी पढ़ें… तुर्किये जा रही फेरी बोट समुद्र में पलटी:7 की मौत, 24 लापता; 270 यात्री सवार थे, बोट के ऊपर चढ़कर जान बचाई मेडिटेरियन सी में तुर्किये जा रही फेरी बोट रविवार को समुद्र में पलट गई। यह फेरी यूरोपीय देश साइप्रस के उत्तरी तट से 270 से ज्यादा यात्रियों के साथ रवाना हुई थी। पूरी खबर पढ़ें

पाकिस्तान पर अटैक हुआ तो सऊदी-तुर्किये हमला करेंगे? नए ‘इस्लामिक NATO’ का भारत के लिए क्या मायने है?

Saudi Arabia-Turkey-Pakistan Mecca Alliance: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने एक संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस मक्का डील के तहत इनमें से किसी एक भी देश पर किये गए हमले को तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। ‘मक्का ज्वाइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ के बाद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने अपने देश को आतंकवाद का शिकार बताने की कोशिशें शुरू कर दी है। उन्होंने इस समझौते को ‘इस्लामिक NATO’ करार दिया। साथ ही भारत और इजरायल की तरफ से पैदा की गई चुनौतियों से निपटने का आग्रह किया।

एक संयुक्त बयान के अनुसार, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, सऊदी युवराज (क्राउन प्रिंस) मोहम्मद बिन सलमान और तुर्किये के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन ने मक्का के अल-सफा पैलेस में हुई एक बैठक के दौरान ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौते’ पर हस्ताक्षर किए। संयुक्त रक्षा के लिए मक्का अल-मुकर्रमा शिखर सम्मेलन के दौरान हुए इस समझौते का मकसद किसी भी तरह के हमले के खिलाफ सामूहिक प्रतिरोध को मजबूत करना है।

एक देश पर हमले को तीनों पर हमला माना जाएगा

बयान के अनुसार, “इसमें यह भी तय किया गया कि तीनों देशों में से किसी एक पर भी हुआ कोई भी सशस्त्र हमला, उन सभी पर हमला माना जाएगा।” बयान में कहा गया है कि इसमें तीनों देशों के बीच रक्षा सहयोग के सभी पहलुओं को बेहतर बनाने की बात भी शामिल है। बयान में कहा गया है, “यह समझौता एक सुरक्षित और समृद्ध भविष्य की दिशा में अपनी सामूहिक सुरक्षा को और मजबूत करने तथा क्षेत्र और उसके बाहर शांति, सुरक्षा और स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए तीनों देशों की साझा प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करता है।”

यह समझौता पाकिस्तान (जो परमाणु हथियारों से लैस एकमात्र मुस्लिम देश है), सऊदी अरब (जो इस्लाम के सबसे पवित्र स्थलों का केंद्र और दुनिया के प्रमुख तेल निर्यातकों में से एक है) और तुर्की (जो नाटो का सदस्य है) को एक साथ जोड़ता है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब पश्चिम एशिया में संघर्ष कई मोर्चों पर फैल गया है। इसमें लाल सागर और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य भी शामिल हैं, जिसके कारण खाड़ी देशों को क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग मजबूत करना पड़ा है। शहबाज शरीफ ने अप्रैल में सऊदी अरब का दौरा किया था, जिस दौरान उन्होंने वहां के शीर्ष नेतृत्व के साथ बातचीत की थी।

तुर्किये और इजरायल में बढ़ा तनाव

हाल के महीनों में तुर्किये और इजरायल के बीच तनाव बढ़ा है। पिछले साल सितंबर में पाकिस्तान और सऊदी अरब ने सामरिक पारस्परिक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसमें यह संकल्प लिया गया था कि उन दोनों में से किसी भी देश पर हमले को दोनों के खिलाफ आक्रामक कार्रवाई माना जाएगा। रक्षा समझौते के तहत, पाकिस्तान ने संयुक्त ट्रेनिंग, रक्षा सहयोग और सऊदी अरब की सुरक्षा जरूरतों में मदद के लिए सैन्य कर्मियों और विमानों को तैनात किया।

संयुक्त बयान में कहा गया है कि मक्का समझौता तीनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे ऐतिहासिक संबंधों से प्रेरित है। यह भाईचारे और इस्लामी एकजुटता के मजबूत संबंध पर आधारित है जो उन्हें आपस में जोड़ते हैं। साथ ही यह उनके साझा रणनीतिक हितों और लंबे समय से चले आ रहे रक्षा सहयोग पर भी आधारित है। शुक्रवार को हुई बैठक के दौरान, तीनों पक्षों ने अपने संबंधों की समीक्षा की और पारस्परिक हित के कई मुद्दों पर चर्चा की।

क्या बोले एक्सपर्ट?

पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब के बीच हुए त्रिपक्षीय रक्षा समझौते से पश्चिम एशिया में अमेरिका की रणनीतिक भूमिका काफी कम हो सकती है। रक्षा विश्लेषक और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के एक पूर्व प्रमुख के बेटे अब्दुल्ला हमीद गुल ने कहा कि यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के सहयोगी देशों को सुरक्षा मुहैया कराने की अमेरिका की क्षमता को लेकर क्षेत्र में शंकाएं बढ़ रही हैं।

गुल ने कहा, “खाड़ी देशों में अमेरिका के 27 सैन्य अड्डे थे। उनमें से 17 को अमेरिका-ईरान युद्ध के दौरान ईरान ने तबाह कर दिया। इससे क्षेत्र में ये सवाल उठने लगे कि क्या अमेरिकी वाकई उनकी रक्षा कर सकते हैं। इसी वजह से ऐसे समझौते करने की जरूरत पड़ी।” गुल ने कहा कि इस समझौते के साथ ही क्षेत्र में अमेरिका की भूमिका बहुत कम या कहें कि खत्म सी हो जाएगी। गुल ने कहा, “कतर और कुवैत भी जल्द ही पाकिस्तान के साथ इसी तरह के समझौतों में शामिल होंगे।”

उन्होंने कहा कि खाड़ी देशों को आभास हो गया था कि ईरान के बजाय इजरायल उनके लिए बड़ी सुरक्षा चुनौती खड़ी कर सकता है। विदेश मामलों के विशेषज्ञ मोहम्मद मेहदी ने कहा कि इस समझौते ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की स्थिति को लेकर धारणा बदल दी है। वहीं, रिटायर्ड ब्रिगेडियर फारूक हमीद ने कहा कि इस समझौते में यह प्रावधान है कि किसी एक सदस्य देश पर हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। लिहाजा पाकिस्तान और भारत के बीच भविष्य में किसी तरह के संघर्ष के विरुद्ध यह प्रावधान ‘निवारक’ के रूप में काम करेगा।गठजोड़ से नई दिल्ली की बढ़ेगी टेंशन?

मक्का ज्वाइंट डिफेंस एग्रीमेंट के तहत पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की ने एक-दूसरे की सुरक्षा को लेकर सामूहिक रक्षा की प्रतिबद्धता जताई है। इस समझौते की सबसे अहम शर्त यह है कि तीनों में से किसी एक देश पर सशस्त्र हमला बाकी दोनों देशों पर हमला माना जाएगा। यही प्रावधान इस समझौते की तुलना NATO के Article 5 से किए जाने की सबसे बड़ी वजह है। NATO के Article 5 के तहत किसी सदस्य देश पर सशस्त्र हमला पूरे गठबंधन पर हमला माना जाता है। इसके सदस्य देश सामूहिक रूप से प्रतिक्रिया देने की प्रतिबद्धता जताते हैं।

पाकिस्तान ने उठाया आतंकवाद का मुद्दा

समझौते पर हस्ताक्षर के अगले ही दिन पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने अपने देश को आतंकवाद से पीड़ित राष्ट्र के रूप में पेश करने की कोशिश की। उन्होंने कथित तौर पर ‘Islamic NATO’ से उन चुनौतियों से निपटने की अपील, जिन्हें उन्होंने भारत और इजरायल से जुड़ा बताया। पाकिस्तान की इस बयानबाजी को खास तौर पर भारत के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि नई दिल्ली और इस्लामाबाद के बीच लंबे समय से सुरक्षा, आतंकवाद और सीमा संबंधी मुद्दों पर तनाव बना रहा है।

एक पर हमला तो तीनों आएंगे साथ?

मक्का में हुए इस संयुक्त रक्षा समझौते का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा सामूहिक सुरक्षा की प्रतिबद्धता है। यानी अगर समझौते के तहत किसी एक सदस्य देश पर सशस्त्र हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक विश्लेषक इसे NATO मॉडल से जोड़कर देख रहे हैं। हालांकि, केवल इस प्रावधान के आधार पर इसे NATO का सीधा विकल्प मानना सही नहीं होगा। NATO एक व्यापक, संस्थागत और दशकों पुराना सैन्य गठबंधन है। जबकि पाकिस्तान-सऊदी अरब और तुर्किये के बीच यह समझौता तीन देशों की रक्षा साझेदारी पर आधारित है।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह एग्रीमेंट?

नई दिल्ली के लिए इस समझौते का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि इसमें पाकिस्तान और सऊदी अरब दोनों शामिल हैं। साथ ही तुर्किये भी पाकिस्तान के साथ करीबी रक्षा संबंध रखता है। भारत की चिंता का एक पहलू यह हो सकता है कि पाकिस्तान भविष्य में क्षेत्रीय या अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी सुरक्षा चिंताओं को सामूहिक रक्षा के मुद्दे के रूप में पेश करने की कोशिश करे।

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खासकर तब, जब पाकिस्तान के रक्षा मंत्री भारत और इजरायल को कथित चुनौतियों से जोड़ रहे हैं। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या इस नए डिफेंस डील का इस्तेमाल पाकिस्तान अपने रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए करेगा?

क्या भारत के खिलाफ बनेगा सैन्य मोर्चा?

फिलहाल ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि यह समझौता सीधे तौर पर भारत के खिलाफ बनाया गया सैन्य गठबंधन है। समझौते का घोषित आधार तीनों देशों के बीच सामूहिक रक्षा और सुरक्षा सहयोग है। लेकिन पाकिस्तान के रक्षा मंत्री द्वारा भारत और इजरायल का नाम लेकर बयान देना निश्चित रूप से इस घटनाक्रम को नई दिल्ली के लिए अधिक संवेदनशील बना देता है। भारत के लिए अब सबसे अहम सवाल यह होगा कि यह समझौता केवल सुरक्षा सहयोग तक सीमित रहता है या भविष्य में इसे किसी व्यापक राजनीतिक-सैन्य गठबंधन का रूप दिया जाता है।

चाबहार पोर्ट पर संकट क्यों? समझिए US प्रतिबंध के खतरे और ईरान युद्ध के बीच भारत कैसे बचाएगा अपना ड्रीम प्रोजेक्ट

Chabahar Port Challenge: ईरान के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चाबहार पोर्ट में भारत का बड़ा निवेश अब तक की सबसे कठिन और जटिल परीक्षा के दौर से गुजर रहा है। अमेरिका द्वारा दी गई प्रतिबंध छूट की अवधि समाप्त होने, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और सैन्य संघर्ष, जटिल कूटनीति के बीच भारत अपने इस ड्रीम प्रोजेक्ट को बचाने और अफगानिस्तान व मध्य एशिया तक अपनी पहुंच बनाए रखने के लिए सभी संभव विकल्पों का आकलन कर रहा है।

इस बीच भारत ईरान के शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल को संसाधन उपलब्ध कराने और उसके संचालन के लिए 10 साल के समझौते के तहत अपनी 120 मिलियन डॉलर (लगभग 12 करोड़ डॉलर) की मदद का वादा भी पूरा कर चुका है। हालांकि, अप्रैल में अमेरिकी प्रतिबंध छूट की मियाद खत्म होने के बाद से इस प्रोजेक्ट के संचालन पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

संसद में सरकार का बयान और भारत के सामने धर्मसंकट

भारत सरकार ने 31 जुलाई को लोकसभा में एक लिखित जानकारी में बताया कि चाबहार परियोजना के लिए अमेरिका द्वारा दी गई सशर्त प्रतिबंध छूट 26 अप्रैल को ही खत्म हो चुकी है। केंद्र सरकार ने कहा कि वह इसके प्रभावों और जटिलताओं से निपटने के लिए इससे जुड़े स्टेकहोल्डर्स के साथ लगातार संपर्क में है और बातचीत जारी है।

सरकार का यह बयान भारत के सामने मौजूद बड़े रणनीतिक धर्मसंकट की ओर भी इशारा है। भारत का मुख्य उद्देश्य एक तरफ अपने सबसे महत्वपूर्ण कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट की रक्षा करना है, तो दूसरी तरफ भारतीय संस्थाओं और कंपनियों को अमेरिकी प्रतिबंधों के जोखिम से पूरी तरह सुरक्षित रखना भी है। चाबहार भारत के लिए सिर्फ एक इंफ्रास्ट्रक्चर इंवेस्टमेंट नहीं है बल्कि यह पाकिस्तान को दरकिनार कर अफगानिस्तान और मध्य एशिया के बाजारों में सीधे प्रवेश करने की दीर्घकालिक रणनीति का मेन आधार भी है।

120 मिलियन डॉलर का निवेश और भारत की परिचालन भूमिका

भारत सरकार की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल चाबहार फ्री जोन (IPGCFZ) के माध्यम से इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड वर्ष 2018 से इस बंदरगाह का संचालन कर रही है। मई 2024 में ईरान के पोर्ट्स एंड मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन के साथ 10 साल का एक लंबा कॉन्ट्रैक्ट साइन किया गया था। इसके तहत भारत ने टर्मिनल के ऑपरेशन और उपकरण लगाने के लिए 120 मिलियन डॉलर देने की प्रतिबद्धता जताई थी।

सरकार ने अब आधिकारिक तौर पर पुष्टि कर दी है कि अगस्त 2025 तक अंतिम किस्त सहित पूरी 120 मिलियन डॉलर की राशि ईरान को ट्रांसफर की जा चुकी है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत अमेरिकी प्रतिबंधों के इस कड़े दौर में भी चाबहार पर अपना ऑपरेशनल कंट्रोल और रणनीतिक प्रभाव बनाए रख पाएगा या नहीं।

भारत के लिए क्यों बेहद खास और रणनीतिक है चाबहार पोर्ट?

ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में ओमान की खाड़ी के तट पर स्थित चाबहार पोर्ट भारत की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी योजनाओं में एक अनूठा स्थान रखता है। ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान ने भारत को अफगानिस्तान तक जाने के लिए जमीनी रास्ता देने से हमेशा इनकार किया है। चाबहार ने भारत को इस भौगोलिक और राजनीतिक बाधा से बाहर निकलने का सीधा समुद्री और जमीनी विकल्प दिया है।

चाबहार पोर्ट, पाकिस्तान में चीन द्वारा विकसित किए जा रहे ग्वादर पोर्ट से महज 72 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। ग्वादर पोर्ट चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) और चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) का प्रमुख हिस्सा है। ऐसे में चाबहार में भारत की मौजूदगी इस पूरे क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए बेहद जरूरी रणनीतिक काउंटर-वेट है।

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक भारतीय संचालन शुरू होने के बाद से चाबहार के रास्ते भारत से अफगानिस्तान को 25 लाख टन से अधिक गेहूं और 2000 टन दालें मानवीय सहायता के रूप में भेजी गई हैं। इसके अलावा इस बंदरगाह ने अब तक 90000 TEU से अधिक कंटेनर ट्रैफिक और 84 लाख मीट्रिक टन से अधिक बल्क और जनरल कार्गो को संभाला है।

चाबहार पोर्ट अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे से भी जुड़ा है, जो भारत को ईरान, कैस्पियन क्षेत्र, रूस और यूरोप से जोड़ने वाला एक बहु-स्तरीय नेटवर्क है। पूर्व भारतीय राजदूत फुंचोक स्टोबदान के मुताबिक INSTC और चाबहार पोर्ट रूस और यूरेशिया के साथ भारतीय कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने के लिए एक-दूसरे के पूरक होंगे।

अमेरिकी प्रतिबंधों की समयसीमा और कानूनी अड़चनें

चाबहार परियोजना के सामने सबसे बड़ी और तात्कालिक अड़चन अमेरिका का रुख है। इससे पहले अमेरिका ने अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास में चाबहार की भूमिका को स्वीकार करते हुए भारत को प्रतिबंधों से विशेष छूट दी थी। इस छूट को सितंबर 2025 में रद्द कर दिया गया था और भारत को अपने संचालन को व्यवस्थित करने के लिए एक सशर्त समय दिया गया था, जो अंततः 26 अप्रैल 2026 को समाप्त हो गया।

भारत के लिए समय बहुत जटिल रहा क्योंकि ईरान के साथ 10 साल का मुख्य अनुबंध मई 2024 में हुआ था और 120 मिलियन डॉलर का पूरा भुगतान भी कर दिया गया था। अब भारत अमेरिका के साथ अपने संबंधों को मजबूत रखने और चाबहार में अपने निवेश व प्रभाव को बचाने के बीच का रास्ता खोज रहा है।

क्या हैं भारत के पास आगे के विकल्प?

सूत्रों और रिपोर्टों के मुताबिक भारत और ईरान इस बंदरगाह के प्रबंधन के लिए वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर विचार कर रहे हैं। एक विकल्प पर चर्चा चल रही है कि जब तक अमेरिकी प्रतिबंधों की स्थितियां बदल नहीं जातीं, तब तक ईरानी पोर्ट अथॉरिटी के साथ मिलकर एक अस्थायी व्यवस्था बनाई जाए ताकि भारत के हितों और निवेश की रक्षा की जा सके। चुनौती यह है कि यह अस्थायी व्यवस्था भारत की दीर्घकालिक परिचालन भूमिका को हमेशा के लिए कमजोर न करे।

भारत का पूरी तरह पीछे हटना रणनीतिक रूप से नुकसानदेह हो सकता है, क्योंकि भारत के कदम पीछे खींचते ही चीन या दूसरी क्षेत्रीय शक्तियां यहां अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर सकती हैं। हालांकि, इसके व्यावसायिक संचालन के लिए सिर्फ भारत की मौजूदगी ही काफी नहीं है बल्कि इसके लिए बेहतर सड़क एवं रेल कनेक्टिविटी, नियमित जहाजों की आवाजाही और कार्गो की भारी मात्रा की आवश्यकता है।

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पश्चिम एशिया में जारी युद्ध, ईरान के इर्द-गिर्द बढ़ता तनाव और अमेरिका-ईरान संबंधों की अनिश्चितता ने इस प्रोजेक्ट के जोखिम को काफी बढ़ा दिया है। इसके बावजूद, भारत सरकार ने संकेत दिया है कि वह इस प्रोजेक्ट से पीछे नहीं हट रही है। भारत की रणनीति धैर्यपूर्ण कूटनीति की है। इसके तहत तेहरान के साथ कूटनीतिक रास्ते खुले रखे जाएंगे और प्रतिबंधों के जोखिम से बचते हुए अपने रणनीतिक हितों को सुरक्षित रखा जाएगा।