मखाना, सत्तू और बहुत कुछ… BRICS Summit में दिखी ‘Vocal for Local’ की झलक, जानें Media Kit में क्या-क्या है?

BRICS Summit Media Kit: नई दिल्ली में हो रहा 18वां ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन दुनिया की कुछ सबसे ताकतवर उभरती अर्थव्यवस्थाओं को एक साथ ला रहा है, लेकिन इस सम्मेलन की कवरेज करने वाले पत्रकारों को दी गई मीडिया किट एक बिल्कुल अलग वजह से चर्चा में है – और वह वजह है इसका खास भारतीय अंदाज।

सोशल मीडिया पर इस मीडिया किट को “वोकल फॉर लोकल” (स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने) की पहल बताया जा रहा है, क्योंकि भारतीय और अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों को दिए जा रहे इस पैकेज में देश के अलग-अलग हिस्सों से लाए गए उत्पादों को शामिल किया गया है।

पत्रकार सिद्धांत सिब्बल ने ब्रिक्स दिल्ली समिट की मीडिया किट को “चर्चा का विषय” बताया। उन्होंने “वोकल फॉर लोकल” (स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने वाली) पहल के तहत शामिल एक बैग का जfक्र किया, जिसमें बिहार का मखाना और सत्तू, ओडिशा की कोरापुट कॉफी और गुजरात के हैंडीक्राफ्ट्स (हाथ से बनी चीजें) शामिल थे। एक और पोस्ट में सिबल ने बताया कि समिट की कवरेज करने वाले देश-विदेश के पत्रकारों के लिए तैयार मीडिया किट में “मखाना (फॉक्स नट) और गुजरात के हैंडीक्राफ्ट्स” भी शामिल थे।

मीडिया किट में अलग-अलग राज्यों के सामान को शामिल करने से इसे एक खास भारतीय और क्षेत्रीय पहचान मिलती है।

मीडिया किट में अलग-अलग राज्यों के उत्पादों को शामिल करने से एक मजबूत क्षेत्रीय पहचान मिलती है। बिहार का सत्तू (भुने हुए चने के आटे से बनी पारंपरिक चीज) और मखाना (फॉक्स नट्स) ऐसे दो उत्पाद हैं जो राज्य की खान-पान और खेती-बाड़ी की विरासत का अहम हिस्सा बन गए हैं। जबकि ओडिशा के पहाड़ी इलाकों में उगाई जाने वाली कोरापुट कॉफी, भारत के एक ऐसे उत्पाद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाती है जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।

वहीं, गुजरात की हस्तकलाएं भारत की पारंपरिक कारीगरी और खान-पान की विविधता को एक साथ पेश करते हुए इसमें एक खास कारीगरी की झलक दिखाते हैं।

न्यूज एजेंसी ANI के अनुसार, BRICS समिट में मीडिया किट बैग उच्च-स्तरीय कूटनीति के साथ-साथ “भारत की समृद्ध पाक-कला परंपराओं, स्थानीय उत्पादों और कारीगरी के हुनर” को भी सामने लाता है। न्यूज एजेंसी के मुताबिक, 12-13 सितंबर को होने वाले समिट से पहले, विदेश मंत्रालय (MEA) की मीडिया किट भारत और दुनिया भर के पत्रकारों को “भारत की जीवंत सांस्कृतिक विविधता का अनुभव” कराती है।

इस पैकेज में सस्टेनेबिलिटी (टिकाऊपन) का पहलू भी शामिल है। सिब्बल ने खास तौर पर “रीपरपज्ड बैग” (दोबारा इस्तेमाल के लिए तैयार बैग) का जिक्र किया, जबकि पत्रकार सुहासिनी हैदर ने विदेश मंत्रालय और इंडियन डिप्लोमेसी का शुक्रिया अदा किया। उन्होंने कहा कि यह बैग #BRICS2026 की उन सभी यादों को संजोने के लिए एक सोच-समझकर बनाया गया “रीपरपज्ड बैग” है, जिन्हें समिट के बाद मीडिया अपने साथ ले जाएगा!

हैदर ने इसमें शामिल अधिकारियों की भी तारीफ की और लिखा, “हम अक्सर ऐसा कहते नहीं हैं, लेकिन टीम XP जबरदस्त है।”

हो सकता है कि मीडिया किट उस समिट का एक छोटा सा हिस्सा हो, जिसमें जियोपॉलिटिक्स, ट्रेड और ‘ग्लोबल साउथ’ जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा हो रही हो। लेकिन इसमें मौजूद चीज़ें यह बताती हैं कि भारत की ग्लोबल कहानी सिर्फ उसकी आर्थिक या रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं के बारे में नहीं है। बल्कि यह उसके किसानों, कारीगरों, क्षेत्रीय खान-पान की परंपराओं और स्थानीय उत्पादों के बारे में भी है।

बता दें कि दुनिया भर के पत्रकारों को सत्तू, मखाना, कोरापुट कॉफ़ी और गुजरात के हैंडीक्राफ्ट्स देकर, ब्रिक्स समिट असल में एक साधारण सी मीडिया किट को भारत की ‘वोकल फॉर लोकल’ मुहिम को दिखाने का जरिया बना रहा है।

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चाबहार पोर्ट पर संकट क्यों? समझिए US प्रतिबंध के खतरे और ईरान युद्ध के बीच भारत कैसे बचाएगा अपना ड्रीम प्रोजेक्ट

Chabahar Port Challenge: ईरान के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चाबहार पोर्ट में भारत का बड़ा निवेश अब तक की सबसे कठिन और जटिल परीक्षा के दौर से गुजर रहा है। अमेरिका द्वारा दी गई प्रतिबंध छूट की अवधि समाप्त होने, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और सैन्य संघर्ष, जटिल कूटनीति के बीच भारत अपने इस ड्रीम प्रोजेक्ट को बचाने और अफगानिस्तान व मध्य एशिया तक अपनी पहुंच बनाए रखने के लिए सभी संभव विकल्पों का आकलन कर रहा है।

इस बीच भारत ईरान के शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल को संसाधन उपलब्ध कराने और उसके संचालन के लिए 10 साल के समझौते के तहत अपनी 120 मिलियन डॉलर (लगभग 12 करोड़ डॉलर) की मदद का वादा भी पूरा कर चुका है। हालांकि, अप्रैल में अमेरिकी प्रतिबंध छूट की मियाद खत्म होने के बाद से इस प्रोजेक्ट के संचालन पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

संसद में सरकार का बयान और भारत के सामने धर्मसंकट

भारत सरकार ने 31 जुलाई को लोकसभा में एक लिखित जानकारी में बताया कि चाबहार परियोजना के लिए अमेरिका द्वारा दी गई सशर्त प्रतिबंध छूट 26 अप्रैल को ही खत्म हो चुकी है। केंद्र सरकार ने कहा कि वह इसके प्रभावों और जटिलताओं से निपटने के लिए इससे जुड़े स्टेकहोल्डर्स के साथ लगातार संपर्क में है और बातचीत जारी है।

सरकार का यह बयान भारत के सामने मौजूद बड़े रणनीतिक धर्मसंकट की ओर भी इशारा है। भारत का मुख्य उद्देश्य एक तरफ अपने सबसे महत्वपूर्ण कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट की रक्षा करना है, तो दूसरी तरफ भारतीय संस्थाओं और कंपनियों को अमेरिकी प्रतिबंधों के जोखिम से पूरी तरह सुरक्षित रखना भी है। चाबहार भारत के लिए सिर्फ एक इंफ्रास्ट्रक्चर इंवेस्टमेंट नहीं है बल्कि यह पाकिस्तान को दरकिनार कर अफगानिस्तान और मध्य एशिया के बाजारों में सीधे प्रवेश करने की दीर्घकालिक रणनीति का मेन आधार भी है।

120 मिलियन डॉलर का निवेश और भारत की परिचालन भूमिका

भारत सरकार की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल चाबहार फ्री जोन (IPGCFZ) के माध्यम से इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड वर्ष 2018 से इस बंदरगाह का संचालन कर रही है। मई 2024 में ईरान के पोर्ट्स एंड मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन के साथ 10 साल का एक लंबा कॉन्ट्रैक्ट साइन किया गया था। इसके तहत भारत ने टर्मिनल के ऑपरेशन और उपकरण लगाने के लिए 120 मिलियन डॉलर देने की प्रतिबद्धता जताई थी।

सरकार ने अब आधिकारिक तौर पर पुष्टि कर दी है कि अगस्त 2025 तक अंतिम किस्त सहित पूरी 120 मिलियन डॉलर की राशि ईरान को ट्रांसफर की जा चुकी है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत अमेरिकी प्रतिबंधों के इस कड़े दौर में भी चाबहार पर अपना ऑपरेशनल कंट्रोल और रणनीतिक प्रभाव बनाए रख पाएगा या नहीं।

भारत के लिए क्यों बेहद खास और रणनीतिक है चाबहार पोर्ट?

ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में ओमान की खाड़ी के तट पर स्थित चाबहार पोर्ट भारत की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी योजनाओं में एक अनूठा स्थान रखता है। ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान ने भारत को अफगानिस्तान तक जाने के लिए जमीनी रास्ता देने से हमेशा इनकार किया है। चाबहार ने भारत को इस भौगोलिक और राजनीतिक बाधा से बाहर निकलने का सीधा समुद्री और जमीनी विकल्प दिया है।

चाबहार पोर्ट, पाकिस्तान में चीन द्वारा विकसित किए जा रहे ग्वादर पोर्ट से महज 72 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। ग्वादर पोर्ट चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) और चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) का प्रमुख हिस्सा है। ऐसे में चाबहार में भारत की मौजूदगी इस पूरे क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए बेहद जरूरी रणनीतिक काउंटर-वेट है।

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक भारतीय संचालन शुरू होने के बाद से चाबहार के रास्ते भारत से अफगानिस्तान को 25 लाख टन से अधिक गेहूं और 2000 टन दालें मानवीय सहायता के रूप में भेजी गई हैं। इसके अलावा इस बंदरगाह ने अब तक 90000 TEU से अधिक कंटेनर ट्रैफिक और 84 लाख मीट्रिक टन से अधिक बल्क और जनरल कार्गो को संभाला है।

चाबहार पोर्ट अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे से भी जुड़ा है, जो भारत को ईरान, कैस्पियन क्षेत्र, रूस और यूरोप से जोड़ने वाला एक बहु-स्तरीय नेटवर्क है। पूर्व भारतीय राजदूत फुंचोक स्टोबदान के मुताबिक INSTC और चाबहार पोर्ट रूस और यूरेशिया के साथ भारतीय कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने के लिए एक-दूसरे के पूरक होंगे।

अमेरिकी प्रतिबंधों की समयसीमा और कानूनी अड़चनें

चाबहार परियोजना के सामने सबसे बड़ी और तात्कालिक अड़चन अमेरिका का रुख है। इससे पहले अमेरिका ने अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास में चाबहार की भूमिका को स्वीकार करते हुए भारत को प्रतिबंधों से विशेष छूट दी थी। इस छूट को सितंबर 2025 में रद्द कर दिया गया था और भारत को अपने संचालन को व्यवस्थित करने के लिए एक सशर्त समय दिया गया था, जो अंततः 26 अप्रैल 2026 को समाप्त हो गया।

भारत के लिए समय बहुत जटिल रहा क्योंकि ईरान के साथ 10 साल का मुख्य अनुबंध मई 2024 में हुआ था और 120 मिलियन डॉलर का पूरा भुगतान भी कर दिया गया था। अब भारत अमेरिका के साथ अपने संबंधों को मजबूत रखने और चाबहार में अपने निवेश व प्रभाव को बचाने के बीच का रास्ता खोज रहा है।

क्या हैं भारत के पास आगे के विकल्प?

सूत्रों और रिपोर्टों के मुताबिक भारत और ईरान इस बंदरगाह के प्रबंधन के लिए वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर विचार कर रहे हैं। एक विकल्प पर चर्चा चल रही है कि जब तक अमेरिकी प्रतिबंधों की स्थितियां बदल नहीं जातीं, तब तक ईरानी पोर्ट अथॉरिटी के साथ मिलकर एक अस्थायी व्यवस्था बनाई जाए ताकि भारत के हितों और निवेश की रक्षा की जा सके। चुनौती यह है कि यह अस्थायी व्यवस्था भारत की दीर्घकालिक परिचालन भूमिका को हमेशा के लिए कमजोर न करे।

भारत का पूरी तरह पीछे हटना रणनीतिक रूप से नुकसानदेह हो सकता है, क्योंकि भारत के कदम पीछे खींचते ही चीन या दूसरी क्षेत्रीय शक्तियां यहां अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर सकती हैं। हालांकि, इसके व्यावसायिक संचालन के लिए सिर्फ भारत की मौजूदगी ही काफी नहीं है बल्कि इसके लिए बेहतर सड़क एवं रेल कनेक्टिविटी, नियमित जहाजों की आवाजाही और कार्गो की भारी मात्रा की आवश्यकता है।

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पश्चिम एशिया में जारी युद्ध, ईरान के इर्द-गिर्द बढ़ता तनाव और अमेरिका-ईरान संबंधों की अनिश्चितता ने इस प्रोजेक्ट के जोखिम को काफी बढ़ा दिया है। इसके बावजूद, भारत सरकार ने संकेत दिया है कि वह इस प्रोजेक्ट से पीछे नहीं हट रही है। भारत की रणनीति धैर्यपूर्ण कूटनीति की है। इसके तहत तेहरान के साथ कूटनीतिक रास्ते खुले रखे जाएंगे और प्रतिबंधों के जोखिम से बचते हुए अपने रणनीतिक हितों को सुरक्षित रखा जाएगा।