इशाक डार के सामने राजनाथ सिंह ने आतंकवाद पर घेरा:कहा- आतंकियों को पनाह देने वालों के खिलाफ एकजुट हों, चीन पर भी निशाना

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की बैठक में आतंकवाद के खिलाफ सख्त संदेश दिया। उन्होंने कहा कि आतंकवाद को किसी भी तरह सही नहीं ठहराया जा सकता। मंत्री ने कहा कि आतंकवाद से निपटने में दोहरा रवैया नहीं होना चाहिए। आतंकियों को पैसा देने, उनका समर्थन करने और उन्हें पनाह देने वालों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार भी बैठक में मौजूद थे। राजनाथ ने कहा कि आतंकवाद से निर्दोष लोगों की जान जाती है। इससे निवेश और कारोबार प्रभावित होते हैं, समाज में कट्टरता बढ़ती है। उन्होंने सदस्य देशों से आतंकवाद के खिलाफ बिना किसी भेदभाव के कार्रवाई करने की अपील की। राजनाथ ने अपने भाषण में पाकिस्तान या इशाक डार का नाम लेकर सीधे कोई आरोप नहीं लगाया। उन्होंने बिना नाम लिए चीन पर भी निशाना साधा और कहा कि कनेक्टिविटी के नाम पर किसी भी देश की संप्रभुता से समझौता नहीं किया जाना चाहिए। राजनाथ बोले- संप्रभुता का सम्मान करते हुए योजनाएं बनें राजनाथ सिंह ने कहा कि देशों को जोड़ने वाली परियोजनाएं सभी देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करते हुए बनाई जानी चाहिए। इसके लिए सभी संबंधित देशों से सलाह-मशविरा करना भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि इन सिद्धांतों का पालन नहीं करने वाली परियोजनाएं लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकतीं। भारत ऐसी परियोजनाओं का समर्थन करता है, जो देशों के बाजारों को जोड़ें, व्यापार बढ़ाएं और विकास के नए रास्ते खोलें। लेकिन इनके नाम पर किसी देश की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। राजनाथ सिंह ने चीन का नाम नहीं लिया, लेकिन संप्रभुता और कनेक्टिविटी पर उनकी बात भारत के इसी पुराने रुख से जुड़ती है। इसके पीछे सबसे अहम मामला चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का है। BRI प्रोजेक्ट का विरोध करता है भारत चीन ने 2013 में बेल्ट एंड रोड (BRI) पहल शुरू की थी। इसका मकसद सड़क, रेल, बंदरगाह और दूसरी बुनियादी सुविधाओं के जरिए चीन को एशिया, यूरोप और अन्य क्षेत्रों के बाजारों से जोड़ना है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) बेल्ट एंड रोड (BRI) पहल की प्रमुख परियोजनाओं में से एक है। यह चीन के शिनजियांग क्षेत्र को पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से जोड़ता है। इसका एक हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से गुजरता है। भारत जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के उन इलाकों को अपना हिस्सा मानता है, जिन पर पाकिस्तान का कब्जा है। भारत का कहना है कि इन इलाकों में चीन की परियोजनाएं उसकी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से जुड़े सवाल उठाती हैं। राजनाथ सिंह के बयान की 4 और अहम बातें… – चाबहार बंदरगाह पर: राजनाथ ने ईरान के चाबहार बंदरगाह और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इनसे मध्य एशिया को बड़े बाजारों से जोड़ने और व्यापार बढ़ाने में मदद मिल सकती है। – SCO की भूमिका पर: राजनाथ ने कहा कि संगठन में सिर्फ नई संस्थाएं बनाने से उपलब्धियां नहीं बढ़ेंगी। नई व्यवस्थाएं ऐसी होनी चाहिए, जो सदस्य देशों की जरूरतें पूरी करें, पहले से चल रहे काम को न दोहराएं और लोगों को सीधा फायदा पहुंचाएं। – दुनिया की आर्थिक चुनौतियों पर: भू-राजनीतिक तनाव, व्यापार में रुकावटें, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा की चिंताएं और तकनीक के क्षेत्र में बढ़ता अंतर वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने बड़ी चुनौतियां हैं। राजनाथ ने इनसे निपटने के लिए आपूर्ति व्यवस्था मजबूत करने और व्यापार व निवेश को आसान बनाने पर जोर दिया। – व्यापार को आसान बनाने पर: राजनाथ ने कहा कि देशों को जोड़ने के लिए केवल सड़क, रेल और बंदरगाह बनाना काफी नहीं है। सीमा शुल्क की प्रक्रिया आसान करनी होगी, डिजिटल दस्तावेजों का इस्तेमाल बढ़ाना होगा और सामान की ढुलाई से जुड़ी व्यवस्थाओं को बेहतर बनाना होगा, ताकि कारोबार की लागत घटे।

इशाक डार के सामने राजनाथ सिंह ने आतंकवाद पर घेरा:कहा- आतंकियों को पनाह देने वालों के खिलाफ एकजुट हों, चीन पर भी निशाना

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की बैठक में आतंकवाद के खिलाफ सख्त संदेश दिया। उन्होंने कहा कि आतंकवाद को किसी भी तरह सही नहीं ठहराया जा सकता। मंत्री ने कहा कि आतंकवाद से निपटने में दोहरा रवैया नहीं होना चाहिए। आतंकियों को पैसा देने, उनका समर्थन करने और उन्हें पनाह देने वालों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार भी बैठक में मौजूद थे। राजनाथ ने कहा कि आतंकवाद से निर्दोष लोगों की जान जाती है। इससे निवेश और कारोबार प्रभावित होते हैं, समाज में कट्टरता बढ़ती है। उन्होंने सदस्य देशों से आतंकवाद के खिलाफ बिना किसी भेदभाव के कार्रवाई करने की अपील की। राजनाथ ने अपने भाषण में पाकिस्तान या इशाक डार का नाम लेकर सीधे कोई आरोप नहीं लगाया। उन्होंने बिना नाम लिए चीन पर भी निशाना साधा और कहा कि कनेक्टिविटी के नाम पर किसी भी देश की संप्रभुता से समझौता नहीं किया जाना चाहिए। राजनाथ बोले- संप्रभुता का सम्मान करते हुए योजनाएं बनें राजनाथ सिंह ने कहा कि देशों को जोड़ने वाली परियोजनाएं सभी देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करते हुए बनाई जानी चाहिए। इसके लिए सभी संबंधित देशों से सलाह-मशविरा करना भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि इन सिद्धांतों का पालन नहीं करने वाली परियोजनाएं लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकतीं। भारत ऐसी परियोजनाओं का समर्थन करता है, जो देशों के बाजारों को जोड़ें, व्यापार बढ़ाएं और विकास के नए रास्ते खोलें। लेकिन इनके नाम पर किसी देश की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। राजनाथ सिंह ने चीन का नाम नहीं लिया, लेकिन संप्रभुता और कनेक्टिविटी पर उनकी बात भारत के इसी पुराने रुख से जुड़ती है। इसके पीछे सबसे अहम मामला चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का है। BRI प्रोजेक्ट का विरोध करता है भारत चीन ने 2013 में बेल्ट एंड रोड (BRI) पहल शुरू की थी। इसका मकसद सड़क, रेल, बंदरगाह और दूसरी बुनियादी सुविधाओं के जरिए चीन को एशिया, यूरोप और अन्य क्षेत्रों के बाजारों से जोड़ना है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) बेल्ट एंड रोड (BRI) पहल की प्रमुख परियोजनाओं में से एक है। यह चीन के शिनजियांग क्षेत्र को पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से जोड़ता है। इसका एक हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से गुजरता है। भारत जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के उन इलाकों को अपना हिस्सा मानता है, जिन पर पाकिस्तान का कब्जा है। भारत का कहना है कि इन इलाकों में चीन की परियोजनाएं उसकी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से जुड़े सवाल उठाती हैं। राजनाथ सिंह के बयान की 4 और अहम बातें… – चाबहार बंदरगाह पर: राजनाथ ने ईरान के चाबहार बंदरगाह और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इनसे मध्य एशिया को बड़े बाजारों से जोड़ने और व्यापार बढ़ाने में मदद मिल सकती है। – SCO की भूमिका पर: राजनाथ ने कहा कि संगठन में सिर्फ नई संस्थाएं बनाने से उपलब्धियां नहीं बढ़ेंगी। नई व्यवस्थाएं ऐसी होनी चाहिए, जो सदस्य देशों की जरूरतें पूरी करें, पहले से चल रहे काम को न दोहराएं और लोगों को सीधा फायदा पहुंचाएं। – दुनिया की आर्थिक चुनौतियों पर: भू-राजनीतिक तनाव, व्यापार में रुकावटें, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा की चिंताएं और तकनीक के क्षेत्र में बढ़ता अंतर वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने बड़ी चुनौतियां हैं। राजनाथ ने इनसे निपटने के लिए आपूर्ति व्यवस्था मजबूत करने और व्यापार व निवेश को आसान बनाने पर जोर दिया। – व्यापार को आसान बनाने पर: राजनाथ ने कहा कि देशों को जोड़ने के लिए केवल सड़क, रेल और बंदरगाह बनाना काफी नहीं है। सीमा शुल्क की प्रक्रिया आसान करनी होगी, डिजिटल दस्तावेजों का इस्तेमाल बढ़ाना होगा और सामान की ढुलाई से जुड़ी व्यवस्थाओं को बेहतर बनाना होगा, ताकि कारोबार की लागत घटे।

चाबहार पोर्ट पर संकट क्यों? समझिए US प्रतिबंध के खतरे और ईरान युद्ध के बीच भारत कैसे बचाएगा अपना ड्रीम प्रोजेक्ट

Chabahar Port Challenge: ईरान के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चाबहार पोर्ट में भारत का बड़ा निवेश अब तक की सबसे कठिन और जटिल परीक्षा के दौर से गुजर रहा है। अमेरिका द्वारा दी गई प्रतिबंध छूट की अवधि समाप्त होने, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और सैन्य संघर्ष, जटिल कूटनीति के बीच भारत अपने इस ड्रीम प्रोजेक्ट को बचाने और अफगानिस्तान व मध्य एशिया तक अपनी पहुंच बनाए रखने के लिए सभी संभव विकल्पों का आकलन कर रहा है।

इस बीच भारत ईरान के शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल को संसाधन उपलब्ध कराने और उसके संचालन के लिए 10 साल के समझौते के तहत अपनी 120 मिलियन डॉलर (लगभग 12 करोड़ डॉलर) की मदद का वादा भी पूरा कर चुका है। हालांकि, अप्रैल में अमेरिकी प्रतिबंध छूट की मियाद खत्म होने के बाद से इस प्रोजेक्ट के संचालन पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

संसद में सरकार का बयान और भारत के सामने धर्मसंकट

भारत सरकार ने 31 जुलाई को लोकसभा में एक लिखित जानकारी में बताया कि चाबहार परियोजना के लिए अमेरिका द्वारा दी गई सशर्त प्रतिबंध छूट 26 अप्रैल को ही खत्म हो चुकी है। केंद्र सरकार ने कहा कि वह इसके प्रभावों और जटिलताओं से निपटने के लिए इससे जुड़े स्टेकहोल्डर्स के साथ लगातार संपर्क में है और बातचीत जारी है।

सरकार का यह बयान भारत के सामने मौजूद बड़े रणनीतिक धर्मसंकट की ओर भी इशारा है। भारत का मुख्य उद्देश्य एक तरफ अपने सबसे महत्वपूर्ण कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट की रक्षा करना है, तो दूसरी तरफ भारतीय संस्थाओं और कंपनियों को अमेरिकी प्रतिबंधों के जोखिम से पूरी तरह सुरक्षित रखना भी है। चाबहार भारत के लिए सिर्फ एक इंफ्रास्ट्रक्चर इंवेस्टमेंट नहीं है बल्कि यह पाकिस्तान को दरकिनार कर अफगानिस्तान और मध्य एशिया के बाजारों में सीधे प्रवेश करने की दीर्घकालिक रणनीति का मेन आधार भी है।

120 मिलियन डॉलर का निवेश और भारत की परिचालन भूमिका

भारत सरकार की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल चाबहार फ्री जोन (IPGCFZ) के माध्यम से इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड वर्ष 2018 से इस बंदरगाह का संचालन कर रही है। मई 2024 में ईरान के पोर्ट्स एंड मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन के साथ 10 साल का एक लंबा कॉन्ट्रैक्ट साइन किया गया था। इसके तहत भारत ने टर्मिनल के ऑपरेशन और उपकरण लगाने के लिए 120 मिलियन डॉलर देने की प्रतिबद्धता जताई थी।

सरकार ने अब आधिकारिक तौर पर पुष्टि कर दी है कि अगस्त 2025 तक अंतिम किस्त सहित पूरी 120 मिलियन डॉलर की राशि ईरान को ट्रांसफर की जा चुकी है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत अमेरिकी प्रतिबंधों के इस कड़े दौर में भी चाबहार पर अपना ऑपरेशनल कंट्रोल और रणनीतिक प्रभाव बनाए रख पाएगा या नहीं।

भारत के लिए क्यों बेहद खास और रणनीतिक है चाबहार पोर्ट?

ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में ओमान की खाड़ी के तट पर स्थित चाबहार पोर्ट भारत की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी योजनाओं में एक अनूठा स्थान रखता है। ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान ने भारत को अफगानिस्तान तक जाने के लिए जमीनी रास्ता देने से हमेशा इनकार किया है। चाबहार ने भारत को इस भौगोलिक और राजनीतिक बाधा से बाहर निकलने का सीधा समुद्री और जमीनी विकल्प दिया है।

चाबहार पोर्ट, पाकिस्तान में चीन द्वारा विकसित किए जा रहे ग्वादर पोर्ट से महज 72 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। ग्वादर पोर्ट चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) और चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) का प्रमुख हिस्सा है। ऐसे में चाबहार में भारत की मौजूदगी इस पूरे क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए बेहद जरूरी रणनीतिक काउंटर-वेट है।

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक भारतीय संचालन शुरू होने के बाद से चाबहार के रास्ते भारत से अफगानिस्तान को 25 लाख टन से अधिक गेहूं और 2000 टन दालें मानवीय सहायता के रूप में भेजी गई हैं। इसके अलावा इस बंदरगाह ने अब तक 90000 TEU से अधिक कंटेनर ट्रैफिक और 84 लाख मीट्रिक टन से अधिक बल्क और जनरल कार्गो को संभाला है।

चाबहार पोर्ट अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे से भी जुड़ा है, जो भारत को ईरान, कैस्पियन क्षेत्र, रूस और यूरोप से जोड़ने वाला एक बहु-स्तरीय नेटवर्क है। पूर्व भारतीय राजदूत फुंचोक स्टोबदान के मुताबिक INSTC और चाबहार पोर्ट रूस और यूरेशिया के साथ भारतीय कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने के लिए एक-दूसरे के पूरक होंगे।

अमेरिकी प्रतिबंधों की समयसीमा और कानूनी अड़चनें

चाबहार परियोजना के सामने सबसे बड़ी और तात्कालिक अड़चन अमेरिका का रुख है। इससे पहले अमेरिका ने अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास में चाबहार की भूमिका को स्वीकार करते हुए भारत को प्रतिबंधों से विशेष छूट दी थी। इस छूट को सितंबर 2025 में रद्द कर दिया गया था और भारत को अपने संचालन को व्यवस्थित करने के लिए एक सशर्त समय दिया गया था, जो अंततः 26 अप्रैल 2026 को समाप्त हो गया।

भारत के लिए समय बहुत जटिल रहा क्योंकि ईरान के साथ 10 साल का मुख्य अनुबंध मई 2024 में हुआ था और 120 मिलियन डॉलर का पूरा भुगतान भी कर दिया गया था। अब भारत अमेरिका के साथ अपने संबंधों को मजबूत रखने और चाबहार में अपने निवेश व प्रभाव को बचाने के बीच का रास्ता खोज रहा है।

क्या हैं भारत के पास आगे के विकल्प?

सूत्रों और रिपोर्टों के मुताबिक भारत और ईरान इस बंदरगाह के प्रबंधन के लिए वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर विचार कर रहे हैं। एक विकल्प पर चर्चा चल रही है कि जब तक अमेरिकी प्रतिबंधों की स्थितियां बदल नहीं जातीं, तब तक ईरानी पोर्ट अथॉरिटी के साथ मिलकर एक अस्थायी व्यवस्था बनाई जाए ताकि भारत के हितों और निवेश की रक्षा की जा सके। चुनौती यह है कि यह अस्थायी व्यवस्था भारत की दीर्घकालिक परिचालन भूमिका को हमेशा के लिए कमजोर न करे।

भारत का पूरी तरह पीछे हटना रणनीतिक रूप से नुकसानदेह हो सकता है, क्योंकि भारत के कदम पीछे खींचते ही चीन या दूसरी क्षेत्रीय शक्तियां यहां अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर सकती हैं। हालांकि, इसके व्यावसायिक संचालन के लिए सिर्फ भारत की मौजूदगी ही काफी नहीं है बल्कि इसके लिए बेहतर सड़क एवं रेल कनेक्टिविटी, नियमित जहाजों की आवाजाही और कार्गो की भारी मात्रा की आवश्यकता है।

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पश्चिम एशिया में जारी युद्ध, ईरान के इर्द-गिर्द बढ़ता तनाव और अमेरिका-ईरान संबंधों की अनिश्चितता ने इस प्रोजेक्ट के जोखिम को काफी बढ़ा दिया है। इसके बावजूद, भारत सरकार ने संकेत दिया है कि वह इस प्रोजेक्ट से पीछे नहीं हट रही है। भारत की रणनीति धैर्यपूर्ण कूटनीति की है। इसके तहत तेहरान के साथ कूटनीतिक रास्ते खुले रखे जाएंगे और प्रतिबंधों के जोखिम से बचते हुए अपने रणनीतिक हितों को सुरक्षित रखा जाएगा।

चीन ने पाकिस्तान के बाद अब बांग्लादेश में चली बड़ी चाल, बंगाल की खाड़ी को लेकर उसकी ये योजना कान खड़े कर देगी

भारत के पूर्वी सीमा के आसपास पकड़ बनाने के लिए चीन पूरे दक्षिण एशिया में अपनी कनेक्टिविटी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। पहले चीन ने पाकिस्तान में चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) में बड़ा निवेश किया था। अब उसने एक नया प्रस्ताव दिया है, जिसके तहत वह म्यांमार के रास्ते बांग्लादेश तक एक नया आर्थिक कॉरिडोर बनाना चाहता है।

हालांकि, यह प्रस्ताव सिर्फ एक सामान्य इंफ्रास्ट्रक्चर प्लान नहीं लगता है, बल्कि इसके पीछे रणनीतिक सोच भी है। इसका मकसद चीन के लिए समुद्री रास्तों तक आसान पहुंच बनाना है, खासकर बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) तक। फिलहाल, भारत के लिए इस संदेश को नजरअंदाज करना मुश्किल है। लेकिन यह कॉरिडोर अभी हकीकत से बहुत दूर है, और यह हिंद महासागर के आस-पास अपनी रणनीतिक मौजूदगी बढ़ाने की बीजिंग की लगातार कोशिशों को दिखाता है।

बीजिंग ने भारत को छोड़कर एक पुराने विचार को फिर से शुरू किया

यह प्रस्ताव बांग्लादेशी प्रधानमंत्री तारिक रहमान की हालिया बीजिंग यात्रा के दौरान सामने आया। जहां चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इस विचार का समर्थन किया और इसे दोनों देशों के बीच व्यापक सहयोग का हिस्सा बताया।

तारिक रहमान के प्रवक्ता महदी अमीन के अनुसार, इस कॉरिडोर को आर्थिक विकास और लॉजिस्टिक्स (logistics) को बेहतर बनाने के एक साधन के रूप में पेश किया जा रहा है।

अमीन ने कहा, “बैठक के दौरान एक प्रस्ताव आया कि म्यांमार के रास्ते बांग्लादेश से चीन तक एक आर्थिक कॉरिडोर कैसे बनाया जा सकता है।” प्रवक्ता ने आगे कहा कि इस प्रस्ताव का मकसद “बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था का विस्तार करना, आर्थिक लेन-देन बढ़ाना और मल्टीमॉडल ट्रांसपोर्टेशन को और बेहतर बनाना” है।

असल में, यह प्रोजेक्ट लंबे समय से चर्चा में रहे बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार  (BCIM) कॉरिडोर को फिर से शुरू करता है, लेकिन इसमें एक बड़ा बदलाव है: भारत अब इसका हिस्सा नहीं है।

बता दें कि शुरुआती BCIM कॉरिडोर में चारों देशों को जोड़ने वाली सड़क और रेल कनेक्टिविटी की योजना थी। हालांकि, भारत ने सावधानी बरती और चीन के ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ में कभी शामिल नहीं हुआ; इसकी कुछ वजहें संप्रभुता से जुड़ी चिंताएं और बीजिंग की बढ़ती भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं थीं।

अरब सागर से बंगाल की खाड़ी तक

CPEC के नजरिए से देखने पर चीन की बड़ी रणनीति और साफ हो जाती है। दरअसल, बीजिंग ने पाकिस्तान के जरिए, ग्वादर पोर्ट के माध्यम से अरब सागर तक पहुंच हासिल की। हालांकि ​​इस प्रोजेक्ट की भारत लंबे समय से आलोचना करता रहा है क्योंकि यह गिलगित-बाल्टिस्तान से होकर गुजरता है, जिसे भारत पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाला इलाका मानता है।

वहीं, अब,बांग्लादेश-म्यांमार रूट से चीन को एक और रणनीतिक पहुंच मिल सकती है, जो इस बार भारत के पूर्वी समुद्री पड़ोस के ज्यादा करीब होगी। इससे बीजिंग को मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिल सकती है, जो दुनिया के सबसे अहम और संवेदनशील शिपिंग चोकपॉइंट्स में से एक है।

बांग्लादेश की नजर बंदरगाह, व्यापार और चीनी निवेश पर

ढाका ने इस प्रस्ताव को सार्वजनिक रूप से एक आर्थिक अवसर के तौर पर पेश किया है। खबरों के मुताबिक, बातचीत मुख्य रूप से चट्टोग्राम बंदरगाह और मोंगला बंदरगाह के आस-पास बुनियादी ढांचे पर केंद्रित रही।

बांग्लादेशी प्रधानमंत्री के प्रवक्ता मेहदी अमीन ने कहा, “हम इस बात पर काम करना चाहते हैं कि इस बंदरगाह [मोंगला बंदरगाह] को एक क्षेत्रीय केंद्र के रूप में कैसे विकसित किया जाए, जो न केवल बांग्लादेश बल्कि अन्य देशों के लिए भी काम आए।”

बांग्लादेश ने हाल के समय में चीनी समर्थित इंफ्रास्ट्रक्चर फंडिंग की ओर भी रुख किया है। मोंगला के आसपास की जमीन, जिसे पहले 2015 के एक द्विपक्षीय समझौते के तहत भारत समर्थित आर्थिक परियोजना के लिए रखा गया था, उसे 2025 में मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने हटा दिया।

रहमान की यात्रा के दौरान, ढाका ने उस आर्थिक क्षेत्र को विकसित करने के लिए चीन की सरकारी कंपनी के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए।

‘द डेली स्टार’ के अनुसार, यह प्रस्तावित रूट चीन के कुनमिंग से शुरू होकर म्यांमार के मांडले तक जाएगा, फिर यह दो हिस्सों में बंटकर यांगून और क्याउकफ्यू पोर्ट तक पहुंचेगा, और आगे चलकर बांग्लादेश के चट्टोग्राम और कॉक्स बाजार से जुड़ेगा।

म्यांमार सबसे कमजोर कड़ी बना

इस प्रस्ताव को लेकर जितनी भी उम्मीदें हैं, उनमें सबसे बड़ी चुनौती म्यांमार है। यह प्रस्तावित कॉरिडोर ऐसे इलाकों से होकर गुजरेगा जो लंबे समय से गृहयुद्ध और अस्थिरता से प्रभावित हैं।

रखाइन राज्य (Rakhine State), जहां रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्याउकफ्यू (Kyaukphyu) डीप-सी पोर्ट स्थित है, वहां सेना और सशस्त्र समूहों के बीच भारी संघर्ष चल रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, वहां की कई जगहों पर सेना का नियंत्रण भी कमजोर पड़ चुका है। इस वजह से किसी बड़े ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर को पूरी तरह लागू करना बेहद मुश्किल माना जा रहा है।

The Daily Star की रिपोर्ट के मुताबिक, म्यांमार में पहले से मौजूद चीनी निवेश भी गंभीर सुरक्षा जोखिमों का सामना कर रहा है, जिनमें इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में रुकावट और संपत्तियों को सुरक्षित जगहों पर ले जाने जैसी समस्याएं शामिल हैं।

सीधे शब्दों में कहें तो, जब तक म्यांमार के रास्ते एक सुरक्षित और स्थिर मार्ग नहीं बनता, यह पूरा कॉरिडोर फिलहाल सिर्फ एक सैद्धांतिक योजना ही बना रहेगा।

भारत इस प्रस्ताव को क्यों नजरअंदाज नहीं कर सकता

भारत के नजरिए से देखें तो इस योजना से तुरंत कोई बड़ा खतरा न भी हो, लेकिन लंबे समय में इसके रणनीतिक असर काफी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

अगर चीन-म्यांमार-बांग्लादेश कॉरिडोर पूरी तरह काम करने लगता है, तो इससे चीन की मौजूदगी बंगाल की खाड़ी के आसपास और मजबूत हो जाएगी। वह बंदरगाहों, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क और औद्योगिक ढांचे के जरिए इस पूरे क्षेत्र में अपनी पकड़ बढ़ा सकता है। इससे चीन का प्रभाव भारत के पड़ोसी क्षेत्र में और गहरा होगा और उसे हिंद महासागर (Indian Ocean) तक अधिक पहुंच मिल सकती है।

वरिष्ठ पत्रकार सुबीर भौमिक ने Rediff में लिखा कि युन्नान स्थित थिंक टैंक से जुड़े चीनी विशेषज्ञों ने उन्हें बताया कि बीजिंग अपनी व्यापक समुद्री रणनीति के तहत चीन-म्यांमार आर्थिक कॉरिडोर को बांग्लादेश तक विस्तारित करना चाहता है।

उन्होंने कहा कि इस तरह के कदम पर “दिल्ली और वाशिंगटन की नजर रहेगी और वे इससे खुश नहीं होंगे”।

अभी के लिए यह प्रोजेक्ट से ज्यादा एक संकेत है

फिलहाल चीन-म्यांमार-बांग्लादेश कॉरिडोर सिर्फ एक प्रस्ताव है, कोई पूरी तरह मंजूर किया गया प्रोजेक्ट नहीं। लेकिन इस स्तर पर भी, यह एक साफ संकेत देता है।

भारत के बेल्ट एंड रोड पहल से बाहर रहने और BCIM कॉरिडोर के लगभग खत्म हो जाने के बावजूद, चीन लगातार ऐसे वैकल्पिक रास्ते तलाश रहा है, जिनसे वह दक्षिण एशिया में अपना आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव बढ़ा सके।

चाहे यह कॉरिडोर आगे जाकर बने या न बने, बीजिंग की मंशा अब साफ होती जा रही है—हिंद महासागर तक पहुंच के लिए कई रास्ते तैयार करना और भारत के आसपास के क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करना।

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