देवरिया के रहने वाले पूर्व एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा बने राम मंदिर के पहले CEO, ऑपरेशन सिंदूर के समय की इनकी कहानी जानिए

Ram Mandir CEO: ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में अपनी भूमिका के लिए ‘सर्वोत्तम युद्ध सेवा मेडल’ पाने वाले रिटायर्ड एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा को श्री राम जन्मभूमि मंदिर का चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर (CEO) चुना गया है। यह फैसला तब लिया गया जब श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने बुधवार को अयोध्या में हुई एक बैठक में CEO की नियुक्ति पर विचार विमर्श किया।

इसके अलावा, ट्रस्ट ने तीन नए ट्रस्टी भी नियुक्त किए: दिल्ली के महेश भागचंदका (जो VHP के दिवंगत नेता अशोक सिंघल के रिश्तेदार हैं), अयोध्या के मदन मोहन पांडे और शिकोहाबाद की निर्मला यादव।

भारतीय वायु सेना के सम्मानित पूर्व कमांडर अप्रैल 2026 में रिटायर हुए थे और अब वे मंदिर ट्रस्ट के कामकाज के विस्तार के साथ एक अहम प्रशासनिक भूमिका संभालेंगे।

बता दें कि मिश्रा उन सीनियर मिलिट्री कमांडरों में शामिल थे जिन्हें ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान उनकी लीडरशिप के लिए सम्मानित किया गया था। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उनकी शानदार सेवाओं और महत्वपूर्ण योगदान के लिए उन्हें ‘सर्वोत्तम युद्ध सेवा मेडल’ से सम्मानित किया था।

यह मेडल युद्ध, संघर्ष या सैन्य कार्रवाई के दौरान सबसे बेहतरीन सेवा के लिए दिया जाता है और यह भारत के सबसे बड़े युद्ध-कालीन मिलिट्री सम्मानों में से एक है।

जितेंद्र मिश्रा ने ऑपरेशन सिंदूर के हवाई हमलों के बारे में बताया

हाल ही में एक पॉडकास्ट इंटरव्यू में, मिश्रा ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चलाए गए हवाई अभियान के बारे में बात की और बताया कि कैसे भारतीय सेना ने पाकिस्तान के अंदर काफी दूर मौजूद ठिकानों की पहचान की और उन पर हमला किया।

उन्होंने एक ऑपरेशन का जिक्र करते हुए बताया कि करीब 314 किलोमीटर दूर स्थित एक टारगेट को नष्ट किया गया था। मिश्रा के मुताबिक, इस कार्रवाई के दौरान सिर्फ एक छोटा सा ऑपरेशनल निर्देश दिया गया और इसके बाद टारगेट को सफलतापूर्वक तबाह कर दिया गया।

ऑपरेशन के बारे में बात करते हुए, मिश्रा ने प्लानिंग, सटीकता, टेक्नोलॉजी और सशस्त्र बलों की अलग-अलग शाखाओं के बीच तालमेल के महत्व पर जोर दिया। हालांकि, ऑपरेशन से जुड़ी कई बातें अभी भी गोपनीय रखी गई हैं।

उनकी बातों से एयर कैंपेन की प्लानिंग और उसे अंजाम देने के बारे में कुछ खास जानकारी मिली, हालांकि, उन्होंने ऐसी कोई संवेदनशील जानकारी साझा नहीं की, जिसका सार्वजनिक किया जाना सुरक्षा के लिहाज से ठीक न हो।

जितेंद्र मिश्रा का उत्तर प्रदेश से है खास कनेक्शन

मिश्रा मूल रूप से उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के भोपतपुरा के रहने वाले हैं, जो अयोध्या से सड़क मार्ग से लगभग तीन घंटे की दूरी पर है। वे एक मध्यम-वर्गीय परिवार से आते हैं और उनके पिता बतौर लेक्चरर काम करते थे।

अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर में एक अहम प्रशासनिक पद संभालने के बाद अब उनका उत्तर प्रदेश से और खास जुड़ाव हो गया है।

राम मंदिर ट्रस्ट के CEO के तौर पर जितेंद्र मिश्रा क्या करेंगे?

CEO के तौर पर, मिश्रा से उम्मीद है कि वे मंदिर ट्रस्ट के रोजमर्रा के कामकाज को संभालेंगे और इसके बढ़ते हुए ऑपरेशन्स में तालमेल बिठाएंगे।

उनकी जिम्मेदारियों में तीर्थयात्रियों के लिए सुविधाएं, वित्तीय इंतजाम, स्टाफ के बीच तालमेल, सुरक्षा से जुड़ा तालमेल और बड़े धार्मिक आयोजनों का प्रबंधन शामिल हो सकता है।

अपने मिलिट्री करियर के दौरान बड़े संगठनों को संभालने, ऑपरेशनल प्लानिंग और तालमेल बिठाने का उनका अनुभव इस भूमिका के लिए काम का साबित हो सकता है।

रिटायर्ड एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा कौन हैं?

रिटायर्ड एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा (SYSM, AVSM, VSM) भारतीय वायु सेना के पूर्व अधिकारी हैं, जिन्होंने वेस्टर्न एयर कमांड के एयर ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ के तौर पर काम किया है।

रिटायरमेंट से पहले, मिश्रा ने इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (ऑपरेशन्स) के डिप्टी चीफ के तौर पर काम किया। इससे पहले, उन्होंने इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ में डिप्टी चीफ (डॉक्ट्रिन, ऑर्गनाइज़ेशन और ट्रेनिंग) के तौर पर भी काम किया था।

मिश्रा को 6 दिसंबर, 1986 को एयर फोर्स एकेडमी से ट्रेनिंग पूरी करने के बाद भारतीय वायु सेना की फाइटर स्ट्रीम में कमीशन किया गया था।

जितेंद्र मिश्रा का 38 साल का IAF करियर

मिश्रा का मिलिट्री करियर 38 साल से ज्यादा का रहा, जिसमें उन्होंने 3,000 घंटे से ज्यादा की फ्लाइंग का अनुभव हासिल किया।

उन्होंने 18 से ज्यादा तरह के फाइटर और ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और हेलिकॉप्टर उड़ाए और फाइटर पायलट, फाइटर कॉम्बैट लीडर और एक्सपेरिमेंटल टेस्ट पायलट के तौर पर काम किया। उन्होंने कई इंस्ट्रक्शनल और स्टाफ पद भी संभाले।

स्क्वाड्रन लीडर के तौर पर, मिश्रा उस टीम का हिस्सा थे जिसने कारगिल युद्ध की शुरुआत में मिराज 2000 एयरक्राफ्ट पर लेजर-गाइडेड बमों को ऑपरेशनल किया था। इन हथियारों का इस्तेमाल बाद में ऑपरेशन सफेद सागर के दौरान टाइगर हिल और मुंथो ढालो पर हमलों में किया गया था।

कारगिल युद्ध में जितेंद्र मिश्रा की भूमिका

IAF में अपने करियर के दौरान मिश्रा ने कई अहम ऑपरेशनल जिम्मेदारियां निभाईं। उन्होंने ईस्टर्न सेक्टर में एक फाइटर स्क्वाड्रन के कमांडिंग ऑफिसर के तौर पर काम किया और बाद में विंग कमांडर के पद पर रहते हुए हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के नासिक डिवीन में चीफ टेस्ट पायलट बने।

ग्रुप कैप्टन के तौर पर, उन्होंने एयरक्राफ्ट एंड सिस्टम्स टेस्टिंग एस्टेब्लिशमेंट में चीफ टेस्ट पायलट और नई दिल्ली में एयर हेडक्वार्टर में ऑपरेशनल प्लानिंग एंड असेसमेंट ग्रुप के डायरेक्टर के तौर पर काम किया।

जून 2010 में, फ्रांस में होने वाली मल्टीनेशनल एयर एक्सरसाइज ‘गरुड़ IV’ में भारतीय वायु सेना की टुकड़ी का नेतृत्व करने के लिए मिश्रा को चुना गया।

जितेंद्र मिश्रा की सीनियर IAF पोस्टिंग

एयर कमोडोर के तौर पर, मिश्रा ने एयर फोर्स स्टेशन बरेली में 15 विंग और एयर फोर्स स्टेशन पठानकोट में 18 विंग की कमान संभाली।

बाद में उन्होंने एयर हेडक्वार्टर में एयर कमोडोर (एयर स्टाफ रिक्वायरमेंट्स) के तौर पर काम किया।

एयर वाइस मार्शल के पद पर प्रमोट होने के बाद, मिश्रा ने एयर हेडक्वार्टर में असिस्टेंट चीफ ऑफ एयर स्टाफ (प्रोजेक्ट्स) और एयरक्राफ्ट एंड सिस्टम्स टेस्टिंग एस्टेब्लिशमेंट के कमांडेंट के तौर पर काम किया।

ऑपरेशन सिंदूर में जितेंद्र मिश्रा की भूमिका

मिश्रा को ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उनकी भूमिका के लिए 2025 में स्वतंत्रता दिवस पर ‘सर्वोत्तम युद्ध सेवा मेडल’ से सम्मानित किया गया था।

उन्हें मिले अन्य सम्मानों में 2024 में मिला ‘अति विशिष्ट सेवा मेडल’ (AVSM) और 2013 में मिला ‘विशिष्ट सेवा मेडल’ (VSM) शामिल हैं।

‘सर्वोत्तम युद्ध सेवा मेडल’ ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उनकी बेहतरीन सेवा को मान्यता दी और उनके करियर में मिले सैन्य सम्मानों की लंबी सूची में एक और सम्मान जोड़ा।

जितेंद्र मिश्रा वेस्टर्न एयर कमांड के प्रमुख कब बने?

मिश्रा को एयर मार्शल के पद पर प्रमोट किया गया और उन्होंने 9 जनवरी, 2023 को इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (डॉक्ट्रिन, ऑर्गनाइज़ेशन और ट्रेनिंग) के डिप्टी चीफ के तौर पर कार्यभार संभाला।

इसके बाद, 5 दिसंबर, 2023 को वे इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (ऑपरेशन्स) के डिप्टी चीफ बने।

1 जनवरी, 2025 को मिश्रा ने वेस्टर्न एयर कमांड के एयर ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ का पद संभाला। उन्होंने एयर मार्शल पंकज मोहन सिन्हा की जगह ली, जो 31 दिसंबर, 2024 को रिटायर हुए थे।

बता दें कि 38 साल से ज्यादा के करियर के बाद, मिश्रा अप्रैल 2026 में इंडियन एयर फोर्स से रिटायर हुए।

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Bihar Mystery Fish: नेपाल में आई भीषण बाढ़ के बाद बिहार की नदियों में सीमा पार से बहकर आ रही अज्ञात और अजीब किस्म की मछलियों ने हड़कंप मचा दिया है। बाढ़ के पानी के साथ आई इन मछलियों को खाने के बाद लोगों के बीमार पड़ने की खबरें सामने आ रही हैं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए बिहार सरकार के पशु एवं मत्स्य संसाधन विभाग ने अडवाइजरी जारी कर लोगों को ऐसी मछलियों को खाने से से बचने की सख्त हिदायत दी है।

मछलियां क्यों बन रही हैं खतरनाक और बीमारी की क्या है वजह?

मत्स्य विभाग के मुताबिक बाढ़ के दौरान मछलियां तालाबों, झीलों, नदियों और जलाशयों से निकलकर पानी के तेज बहाव के साथ लंबी दूरी तय करती हैं। इस दौरान ये मछलियां कीचड़, गंदे नाले, सड़े-गले शवों और दूसरे हानिकारक प्रदूषकों के लगातार संपर्क में रहती हैं। इस वजह से ये मछलियां हानिकारक बैक्टीरिया, वायरस, फंगी और खतरनाक केमिकल से संक्रमित हो जाती हैं। विभाग ने स्पष्ट किया है कि जब तक पर्यावरण सामान्य न हो जाए और साफ मछलियां उपलब्ध न हों, तब तक बाढ़ के पानी से पकड़ी गई मछलियों का सेवन बिल्कुल नहीं किया जाना चाहिए।

सरकार की अपील और लक्षण दिखने पर क्या करें?

बिहार सरकार के पशु एवं मत्स्य संसाधन विभाग ने नागरिकों से सुरक्षा के मद्देनजर कई दिशा-निर्देशों का पालन करने की अपील की है। कहा गया है कि किसी भी अनजानी या अजीब दिखने वाली मछली को खाने के लिए इस्तेमाल न करें। बाढ़ के पानी से पकड़ी गई मछलियों को न खरीदें, न बेचें और न ही भोजन के रूप में इस्तेमाल करें। बिना विभागीय जांच और वेरिफिकेशन के किसी भी अनजान मछली को खाने लायक न समझें।

अगर ऐसी मछली खाने के बाद उल्टी, दस्त/डायरिया, पेट दर्, चक्कर आना या सांस लेने में तकलीफ जैसी समस्याएं हो रही हैं तो तुरंत अस्पताल जाएं या डॉक्टर की सलाह लें। साथ ही ये भी कहा गया है कि ऐसी असामान्य मछलियां दिखने पर तुरंत जिला मत्स्य अधिकारी या स्थानीय प्रशासन को इसकी सूचना दें और किसी भी तरह की अफवाहों पर ध्यान न दें।

पश्चिमी चंपारण में जागरूकता अभियान

अनजान मछलियों के खतरे को देखते हुए प्रशासन सक्रिय हो गया है। एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिमी चंपारण की जिला मत्स्य अधिकारी नूतन ने बताया कि क्षेत्र में व्यापक स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि नेपाल की बाढ़ से आ रही मछलियां अत्यधिक संक्रामक हैं और इनमें कई बीमारियां फैली हुई हैं। इनको खाने से पेट में तेज दर्द, उल्टी और पेचिश जैसे गंभीर लक्षण उभर रहे हैं। प्रशासन की ओर से विक्रेताओं को ऐसी मछलियां न बेचने और आम जनता को इन्हें न खरीदने व न खाने की सलाह दी जा रही है।

उधर नेपाल पुलिस ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर आधिकारिक निर्देश जारी कर अपने नागरिकों से बाढ़ के पानी में बहकर आई मछलियों और अन्य नदी आधारित खाद्य पदार्थों का सेवन न करने का अनुरोध किया है।

नेपाल में बाढ़ से 1127 लोगों की मौत, बिहार में अलर्ट

नेपाल पुलिस द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक 26 अगस्त को आई भीषण बाढ़ की वजह से नेपाल में मरने वालों की संख्या बढ़कर 1127 हो गई है। शवों के बरामद होने का सिलसिला अभी भी जारी है। नेपाल की नदियों में जलस्तर बढ़ने की वजह से निचले इलाकों में स्थित बिहार में हाई अलर्ट जारी है।

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बिहार की गंडक नदी में नेपाल से बहकर आईं अजीब विशालकाय मछलियां, जानिए क्यों प्रशासन ने जारी किया ‘नो-ईटिंग’ अलर्ट!

बिहार की गंडक नदी में नेपाल से बहकर आईं अजीब विशालकाय मछलियां, जानिए क्यों प्रशासन ने जारी किया 'नो-ईटिंग' अलर्ट!

Bihar no eating fish alert

Bihar no eating fish alert: नेपाल में हाल ही में आई प्रलयंकारी बाढ़ और लैंडस्लाइड के बाद इसका सीधा असर भारत के सीमावर्ती राज्य बिहार पर दिखाई दे रहा है। नेपाल की नदियों से बहकर विशालकाय और असामान्य वजन वाली मछलियां उत्तर बिहार की गंडक (Gandak River) और कोसी नदियों में पहुंच गई हैं।

 

स्थानीय लोग और मछुआरे इन विशाल मछलियों को पकड़ने के लिए नदियों के किनारे जुट रहे हैं, लेकिन स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग ने इन मछलियों को पकड़ने और खाने पर सख्त रोक लगा दी है। ALSO READ: Priya Adhikari कौन हैं , नेपाल बाढ़ के बीच 6 दिन में किए 100 रेस्क्यू मिशन, सैकड़ों जिंदगियां बचाईं

गंडक नदी में अचानक कैसे आईं ये विशाल मछलियां?

नेपाल में मूसलाधार बारिश और ग्लेशियर टूटने के कारण भोटे कोशी, त्रिशूली और गंडकी नदी प्रणालियों में भीषण फ्लैश फ्लड आया।

  • नेपाल के हैचरी और प्राकृतिक जलाशयों से बहाव : नेपाल के ऊपरी इलाकों में स्थित बड़े मत्स्य पालन केंद्रों (Fish Farms/Hatcheries) और प्राकृतिक झीलों के तटबंध बाढ़ में बह गए।
  • तेज बहाव के साथ भारत में प्रवेश : भारी पानी के बहाव और गाद (Sedimentation) के साथ 10 किलो से लेकर 40-50 किलो तक की विशालकाय मछलियां बहकर बिहार के वाल्मीकिनगर (पश्चिम चंपारण), गोपालगंज और सारण जिलों में गंडक नदी के मैदानी इलाकों में आ गईं।

प्रशासन क्यों कर रहा है इन मछलियों को खाने से मना?

विशालकाय मछलियों को देखकर स्थानीय लोगों में इन्हें खाने की होड़ मच गई है, लेकिन प्रशासन और जिला मत्स्य अधिकारियों ने इसे स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बताया है। इसके पीछे मुख्य वैज्ञानिक और चिकित्सीय कारण निम्नलिखित हैं:

 

(A) पानी में जहरीले रसायनों और भारी धातुओं का मिश्रण (Heavy Metal Contamination)

नेपाल में आई बाढ़ सिर्फ पानी नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर चट्टानों, खदानों के मलबे और औद्योगिक कचरे को बहाकर लाई है। गंडक नदी में बहकर आ रही मछलियों में आर्सेनिक, सीसा (Lead) और मरकरी (Mercury) जैसे जहरीले तत्वों की मात्रा अत्यधिक होने की आशंका है, जो मानव शरीर के लिए विषैले साबित हो सकते हैं।

 

(B) दूषित और सड़ी हुई मछलियों का खतरा (Bacterial Contamination)

बाढ़ के तीव्र बहाव में दम घुटने (Oxygen Depletion) और पत्थरों से टकराने के कारण कई मछलियां रास्ते में ही मर चुकी थीं या घायल हो गई थीं। पानी में पड़े रहने से इनमें ई-कोलाई (E-coli) और साल्मोनेला (Salmonella) जैसे खतरनाक जीवाणु पनप चुके हैं। ऐसी मछलियों का सेवन करने से:

  • फूड पॉइज़निंग (Food Poisoning)
  • पेट में गंभीर संक्रमण और उल्टी-दस्त
  • लिवर और किडनी को नुकसान पहुँच सकता है।

(C) एलियन/इन्वेंसिव स्पीशीज (Invasive Species) का खतरा

प्रशासन को यह भी अंदेशा है कि नेपाल के हैचरी से बहकर आई कुछ मछलियां 'सकर-माउथ कैटफिश' (Sucker-mouth Catfish) या 'थाई मांगुर' जैसी विदेशी नस्ल की हो सकती हैं, जिनमें प्राकृतिक रूप से विषाक्तता होती है और ये स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को भी नुकसान पहुंचाती हैं।

प्रशासन की सख्त कार्रवाई और एडवाइजरी

  • नदी घाटों पर धारा 144 व पुलिस बल : वाल्मीकिनगर बैराज और गंडक नदी के तटीय इलाकों में लोगों को पानी के पास जाने और जाल बिछाने से रोकने के लिए पुलिस बल तैनात किया गया है।
  • बाजारों में बिक्री पर रोक : स्थानीय बाजारों में नेपाल से बहकर आई संदिग्ध मछलियों की खरीद-बिक्री पर रोक लगाने के लिए खाद्य सुरक्षा अधिकारियों (Food Safety Officers) की टीमें छापेमारी कर रही हैं।
  • सैंपलिंग और लैब जांच: मत्स्य विभाग ने इन मछलियों के सैंपल इकट्ठा करके जांच के लिए लैबोरेटरी भेजे हैं, ताकि पानी और मछली में किसी भी प्रकार के टॉक्सिन (विष) की पुष्टि की जा सके।

नेपाल की बाढ़ से आई ये विशाल मछलियां पहली नजर में भले ही एक अवसर लग रही हों, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि लैब रिपोर्ट आने तक इन मछलियों का सेवन जानलेवा साबित हो सकता है। स्थानीय प्रशासन ने नागरिकों से अपील की है कि वे किसी भी अफवाह पर ध्यान न दें और नदी से पकड़ी गई संदिग्ध मछलियों को खाने से पूरी तरह परहेज करें।

Uttarakhand Fish: उत्तराखंड की ट्राउट मछलियों की 5 टन की खेप पहली बार पहुंची नेपाल, किसान हुए मालामाल

Uttarakhand Fish: उत्तराखंड के मत्स्य क्षेत्र ने पहली बार अंतरराष्ट्रीय बाजार में कदम रखते हुए नया इतिहास रच दिया है। राज्य गठन के बाद पहली बार पिथौरागढ़ जिले की तीन मत्स्य सहकारी समितियों द्वारा उत्पादित 5 मीट्रिक टन मछली का नेपाल को निर्यात किया गया है। इस पहल से 33 मत्स्य पालकों को सीधे आर्थिक लाभ मिला है। सरकार अब 30 मीट्रिक टन मछली के अन्य देशों में निर्यात की तैयारी कर रही है।

यह उत्तराखंड के मत्स्य क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है, जिससे राज्य के मछली पालकों की आय बढ़ेगी, निर्यात के नए अवसर खुलेंगे। साथ ही पहाड़ी क्षेत्रों में रोजगार एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

मत्स्य पालन क्षेत्र को बड़ी सफलता

उत्तराखंड सरकार की पहल से राज्य के मत्स्य पालन क्षेत्र को बड़ी सफलता मिली है। पिथौरागढ़ जिले के धारचूला और मुनस्यारी क्षेत्र की तीन मत्स्य सहकारी समितियों द्वारा तैयार की गई 5 मीट्रिक टन मछली को पहली बार इंटरनेशनल मार्केट में भेजा गया। इस खेप को कोल्ड-चेन व्यवस्था के तहत गुजरात के वेरावल ले जाया गया, जहां प्रोसेसिंग के बाद इसे नेपाल निर्यात किया गया।

23.50 लाख रुपये की हुई कमाई

मत्स्य विकास मंत्री सौरभ बहुगुणा ने इसे राज्य के मत्स्य क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि इस निर्यात से जुड़े 33 मत्स्य पालकों को करीब 23.50 लाख रुपये की आय हुई है। एक्सपोर्ट प्रक्रिया को सफल बनाने के लिए मत्स्य विभाग ने मछली की कटाई, पैकेजिंग और परिवहन पर 5.40 लाख रुपये की वित्तीय सहायता भी उपलब्ध कराई।

30 मीट्रिक टन मछली के निर्यात की तैयारी

मंत्री ने बताया कि दुबई में आयोजित ‘गल्फ फूड एक्सपो’ के दौरान अंतरराष्ट्रीय खरीदारों से बने संपर्कों का परिणाम अब सामने आने लगा है। विभाग यूरोप, मध्य-पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में भी उत्तराखंड की मछली के निर्यात की संभावनाएं तलाश रहा है। जल्द ही लगभग 30 मीट्रिक टन मछली के निर्यात की तैयारी की जा रही है।

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार की नीतियों का सकारात्मक प्रभाव मत्स्य क्षेत्र पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। सीमांत और पर्वतीय क्षेत्रों में मत्स्य पालन रोजगार का नया माध्यम बनकर उभरा है। साल 2024 में भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (Indo-Tibetan Border Police) के साथ ट्राउट मछली की आपूर्ति के लिए हुए समझौते के तहत अब तक 45.10 मीट्रिक टन ट्राउट मछली की आपूर्ति की जा चुकी है। , इसकी कीमत लगभग 2.10 करोड़ रुपये है।

मत्स्य पालकों की संख्या में भारी इजाफा

उत्तराखंड में मत्स्य पालकों की संख्या भी लगातार बढ़ी है। वर्ष 2022 में जहां मत्स्य पालकों की संख्या 10,011 थी। वहीं अब यह बढ़कर 15,657 हो गई है। इनमें 3,584 महिला मत्स्य पालक भी शामिल हैं। मछली उत्पादन की वार्षिक वृद्धि दर 2012-17 के दौरान 2 प्रतिशत थी, जो 2022-26 के दौरान बढ़कर 11 फीसदी हो गई है।

11,805 मीट्रिक टन मछली का उत्पादन

वर्ष 2026-27 में उत्तराखंड में 11,805 मीट्रिक टन मछली का उत्पादन हुआ, जिसका अनुमानित बाजार मूल्य करीब 165 करोड़ रुपये रहा। वहीं, मत्स्य विभाग का बजट भी 2021-22 के 55.76 करोड़ रुपये से बढ़कर 2026-27 में 261.41 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।

लोगों को मिला रोजगार

पिछले चार वर्षों में मत्स्य क्षेत्र में 5,646 लोगों को स्वरोजगार के अवसर मिले हैं। जबकि मत्स्य विभाग में 33 नियमित नियुक्तियां भी की गई हैं। सरकार का मानना है कि न्यू ट्राउट प्रमोशन स्कीम और मुख्यमंत्री मत्स्य संपदा योजना जैसी योजनाएं मत्स्य क्षेत्र में बदलाव की बड़ी वजह बनी हैं। इन योजनाओं के चलते मत्स्य पालन उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था का तेजी से उभरता हुआ क्षेत्र बन गया है। यह ग्रामीण आजीविका और रोजगार को नई मजबूती दे रहा है।

ऐतिहासिक उपलब्धि की बड़ी बातें

  • यूपी से अलग होकर राज्य बनने के बाद पहली बार उत्तराखंड में उत्पादित मछली का अंतरराष्ट्रीय निर्यात हुआ।
  • नेपाल को 5 मीट्रिक टन मछली निर्यात की गई।
  • यह निर्यात उत्तराखंड के पिथोरागढ़ जिले की तीन मत्स्य सहकारी समितियों द्वारा किया गया।

किसानों को हुआ बंपर लाभ

  • इस निर्यात से 33 मछली पालकों को सीधा लाभ मिला।
  • उन्हें लगभग ₹23.5 लाख की आय हुई।
  • राज्य सरकार ने कटाई, पैकेजिंग और परिवहन के लिए ₹5.40 लाख की सहायता (Gap Funding) दी।

निर्यात की प्रक्रिया

  • मछली को कोल्ड-चेन के माध्यम से वेरावल ले जाया गया।
  • वहां प्रोसेसिंग के बाद इसे नेपाल के बाजार में निर्यात किया गया।

आगे की योजना

  • उत्तराखंड सरकार जल्द ही लगभग 30 मीट्रिक टन मछली का निर्यात अन्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों में करने की तैयारी कर रही है।
  • यूरोप, मध्य पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया में भी निर्यात के अवसर तलाशे जा रहे हैं।

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Monsoon Fish Alert: इन 5 मछलियों में छिपे हो सकते हैं जहरीले तत्व, किडनी और हार्ट पर पड़ सकता है असर

बरसात के मौसम में बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है, खासकर फूड पॉइजनिंग का। इस समय वातावरण में नमी और गंदगी बढ़ने के साथ-साथ पानी के स्रोत भी आसानी से दूषित हो जाते हैं। नदियों, झीलों और समुद्री पानी में मौजूद प्रदूषण सीधे तौर पर जलीय जीवन पर असर डालता है। इसका सबसे बड़ा प्रभाव मछलियों और समुद्री भोजन की गुणवत्ता पर देखा जाता है। दूषित पानी में रहने वाली मछलियां कई तरह के हानिकारक तत्व अपने शरीर में जमा कर सकती हैं, जो आगे चलकर इंसानों के स्वास्थ्य के लिए जोखिम बन जाते हैं। इसलिए मानसून के दौरान खानपान को लेकर अधिक सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है, ताकि संक्रमण और बीमारियों से बचा जा सके।

पानी में घुलते हैं खतरनाक धातु तत्व

औद्योगिक कचरे, खनन और प्रदूषण की वजह से पानी में पारा (Mercury), सीसा (Lead) और कैडमियम जैसी भारी धातुएं मिल जाती हैं। मछलियां इन्हें अपने गलफड़ों, पानी और छोटे जीवों के जरिए शरीर में ले लेती हैं।

खाने की चेन से बढ़ता है खतरा

छोटी मछलियां और जलीय पौधे इन धातुओं को पहले ही अपने अंदर जमा कर लेते हैं। जब बड़ी शिकारी मछलियां इन्हें खाती हैं, तो उनके शरीर में इन धातुओं की मात्रा और बढ़ जाती है।

पारा सबसे ज्यादा खतरनाक

पारा मछलियों की मांसपेशियों में जमा हो जाता है, जो इंसान खाते हैं। शार्क, स्वोर्डफिश और टूना जैसी बड़ी मछलियों में इसका स्तर ज्यादा पाया जाता है। यह दिमाग, नसों और आंखों को नुकसान पहुंचा सकता है और बच्चों के विकास पर भी असर डाल सकता है। इसे पकाने से भी हटाया नहीं जा सकता।

सीसा और कैडमियम का असर

पुरानी पाइपलाइन, खेती और उद्योगों से पानी में सीसा और कैडमियम पहुंचता है। लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से किडनी की समस्या, ब्लड प्रेशर, हड्डियों की कमजोरी और गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।

आर्सेनिक भी बन सकता है खतरा

आर्सेनिक के कुछ रूप बेहद जहरीले होते हैं और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से जुड़े पाए गए हैं। यह त्वचा, फेफड़ों और अन्य अंगों को भी प्रभावित कर सकता है।

लक्षण धीरे-धीरे दिखाई देते हैं

इन भारी धातुओं का असर तुरंत नहीं दिखता। धीरे-धीरे शरीर में जमा होकर थकान, सिरदर्द, पाचन समस्या और तंत्रिका संबंधी दिक्कतें पैदा कर सकता है, जिसे अक्सर दूसरी बीमारी समझ लिया जाता है।

मछली चुनते समय रखें सावधानी

विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि शार्क, टूना, स्वोर्डफिश और किंग मैकेरल जैसी बड़ी मछलियों का सेवन कम किया जाए। इसके बजाय छोटी ताजा मछलियां चुनना ज्यादा सुरक्षित माना जाता है, खासकर मानसून के समय।

मछली के हर हिस्से में नहीं होता एक जैसा खतरा

मछली के सभी हिस्सों में भारी धातु समान रूप से नहीं होती। लीवर, किडनी और गलफड़ों में इनकी मात्रा ज्यादा हो सकती है, जबकि मांस (फिलेट) में अपेक्षाकृत कम स्तर पाया जाता है।

AC की ये सच्चाई जानकर रह जाएंगे हैरान, इंसानों के लिए नहीं हुआ था आविष्कार