सुधा यादव ने कर्नाटक की राज्यपाल के रूप में ली शपथ

पूर्व लोकसभा सदस्य एवं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) संसदीय बोर्ड की सदस्य सुधा यादव ने शुक्रवार को यहां राजभवन में कर्नाटक की राज्यपाल के रूप में शपथ ली। उन्होंने श्री थावरचंद गहलोत का स्थान लिया है, जिनका कार्यकाल पूरा हो गया है।

कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश विभु बखरू ने मुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार और अन्य गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में उन्हें पद की शपथ दिलाई।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने छह राज्यों में राज्यपालों की नियुक्ति और फेरबदल के तहत सुधा यादव को कर्नाटक का राज्यपाल नियुक्त किया है।

हरियाणा के महेंद्रगढ़ से पूर्व सांसद रहीं सुधा यादव ने आईआईटी रुड़की से रसायन विज्ञान (केमिस्ट्री) में एमएससी और पीएचडी की डिग्री हासिल की है। वह 2019 से 2022 तक ‘राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग’ की सदस्य रहीं और भाजपा में कई संगठनात्मक पदों पर काम कर चुकी हैं।

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वह अपने पति सुखबीर सिंह यादव की मृत्यु के बाद चुनावी राजनीति में आईं। उनके पति सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में डिप्टी कमांडेंट थे और कारगिल युद्ध के दौरान शहीद हो गए थे। इसके बाद, उन्होंने लोकसभा में महेंद्रगढ़ का प्रतिनिधित्व किया और हरियाणा में एक प्रमुख अन्य पिछड़ा वर्ग के नेता के रूप में उभरीं।

इस फेरबदल के तहत श्री ढाल सिंह बिसेन को उत्तराखंड का राज्यपाल, श्री ब्रज मोहन राम को ओडिशा का राज्यपाल और श्री दुष्यंत गौतम को सिक्किम का राज्यपाल नियुक्त किया गया है।

सिक्किम के राज्यपाल रहे ओम प्रकाश माथुर को केरल का राज्यपाल बनाया गया है, जबकि केरल के निवर्तमान राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर को तमिलनाडु का राज्यपाल नियुक्त किया गया है।

ये नियुक्तियां राष्ट्रपति द्वारा विभिन्न राज्यों में राज्यपालों की नियुक्ति और उनके तबादले की संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं।

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Nana Patekar Death: जब बॉलीवुड छोड़ नाना पाटेकर पहुंच गए थे कारगिल बॉर्डर, 60 दिन सेना के साथ रहे; 76 से 56 किलो हो गया था वजन

Nana Patekar Death: नाना पाटेकर को आपने पर्दे पर पुलिस अफसर, गैंगस्टर, सैनिक और आम आदमी जैसे तमाम किरदारों में देखा होगा। लेकिन उनकी जिंदगी का एक ऐसा अध्याय भी है जो किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान नाना पाटेकर करीब 60 दिनों तक भारतीय सेना के जवानों के साथ रहे थे। नाना ने एक इंटरव्यू में बताया था कि कारगिल युद्ध के दौरान वह सेना के साथ जाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस से इजाजत मांगी।

शुरुआत में उन्हें बताया गया कि एक आम नागरिक को इस तरह सेना में शामिल नहीं किया जा सकता। लेकिन नाना ने बताया कि उन्होंने कमांडो ट्रेनिंग की है। वह राष्ट्रीय स्तर पर राइफल शूटिंग में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।

फिर सेना के साथ जाने की मिली इजाजत

नाना पाटेकर के मुताबिक, जॉर्ज फर्नांडिस से बातचीत के बाद उन्हें सेना के साथ जाने की अनुमति मिल गई। वह करीब 60 दिन तक सेना के जवानों के साथ रहे और द्रास, लेह, कुपवाड़ा, बारामूला और सोपोर जैसे इलाकों में गए। उन्होंने यह भी बताया कि वह एक Quick Reaction Team (QRT) का हिस्सा बने थे। हालांकि, जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने वहां वास्तव में क्या काम किया, तो नाना ने ऑपरेशनल जानकारी बताने से इनकार कर दिया।

76 किलो से 56 किलो रह गया था वजन

कारगिल में बिताए उन करीब दो महीनों का असर नाना के शरीर पर भी पड़ा। उन्होंने बताया था कि जब वह वहां गए थे, तब उनका वजन करीब 76 किलो था। लेकिन लौटने तक यह घटकर 56 किलो रह गया था। यानी करीब 20 किलो वजन कम हो गया था। नाना के लिए यह सिर्फ रोमांच या प्रचार का हिस्सा नहीं था। उन्होंने कहा था कि उन्हें खुशी थी कि वह देश के लिए कुछ छोटा-सा योगदान कर सके।

फिल्मों में सैनिक का किरदार निभाने से पहले असल ट्रेनिंग

नाना पाटेकर की सेना से यह दिलचस्प जुड़ाव फिल्म ‘प्रहार’ से भी रहा। फिल्म के लिए उन्होंने करीब तीन साल की सैन्य ट्रेनिंग ली थी। उन्हें मानद तौर पर कैप्टन की रैंक भी दी गई थी। यही वजह है कि पर्दे पर सैनिक या पुलिस अधिकारी के किरदार निभाते समय उनकी बॉडी लैंग्वेज और संवाद अदायगी में एक अलग वास्तविकता दिखाई देती थी।

गरीबी में पोस्टर और सड़क की लाइनें भी पेंट कीं

नाना पाटेकर की जिंदगी का एक और पहलू बेहद संघर्षपूर्ण रहा है। फिल्मों में आने से पहले वह फिल्मों के पोस्टर और सड़क की जेब्रा क्रॉसिंग तक पेंट करने का काम कर चुके थे। एक दौर में वह रोजाना करीब 35 रुपये कमाते थे। उसी में गुजारा करते थे। यही संघर्ष आगे चलकर उनके अभिनय में भी दिखाई दिया। उनकी फिल्मों के किरदारों में आम आदमी का गुस्सा, दर्द और संघर्ष बेहद स्वाभाविक नजर आया।

किसानों के लिए भी उठाया बड़ा कदम

नाना पाटेकर की पहचान सिर्फ अभिनेता के तौर पर नहीं रही। 2015 में उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर ‘NAAM Foundation’ की शुरुआत की। इसका फोकस महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित गांवों और संकट से जूझ रहे किसानों की मदद करना है। संस्था पानी, गांवों के विकास और किसानों की आजीविका से जुड़े काम करती है। पर्दे पर जिस अभिनेता ने सैनिकों और आम आदमी के किरदारों में जान फूंकी, असल जिंदगी में भी उनकी कहानी संघर्ष, सेना और किसानों से जुड़ी रही।

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क्यों मनाया जाता है भारतीय वायुसेना दिवस? जानें दुनिया की चौथी सबसे बड़ी ताकत का इतिहास

क्यों मनाया जाता है भारतीय वायुसेना दिवस? जानें दुनिया की चौथी सबसे बड़ी ताकत का इतिहास

Why is Indian Air Force Day celebrated, Learn about history of world's fourth largest air power

Indian Air Force Day 2026: हर साल 8 अक्टूबर को भारतीय वायुसेना दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह वह पावन अवसर है जब पूरा देश अपनी वायुसेना के शौर्य, अदम्य साहस और समर्पण को नमन करता है। ‘नभः स्पृशं दीप्तम्’ (गर्व के साथ आकाश को छूना) के अमर ध्येय वाक्य को जीने वाली भारतीय वायुसेना केवल हमारी सीमाओं की रक्षा ही नहीं करती, बल्कि देशवासियों के विश्वास का वो मज़बूत आधार है जो हर संकट में ढाल बनकर खड़ा रहता है। 8 अक्टूबर 1932 को भारतीय वायुसेना की स्थापना हुई थी। आइए जानते हैं भारतीय वायुसेना दिवस पर उसके इतिहास और महत्‍व के बारे में विस्‍तार से… 

 

भारतीय वायुसेना का इतिहास

8 अक्टूबर 1932 को ब्रिटिश शासनकाल के दौरान ‘रॉयल इंडियन एयर फोर्स’ (RIAF) के रूप में इसकी नींव रखी गई। 1 अप्रैल 1933 को महज 4 वेस्टलैंड वापिटी विमानों और 6 निडर भारतीय अधिकारियों के साथ वायुसेना के पहले स्क्वाड्रन ने सांसें लीं। द्वितीय विश्व युद्ध में अदम्य साहस दिखाने के लिए इसे ‘रॉयल’ उपाधि मिली थी।

इसे 1950 में पूर्ण गणतंत्र घोषित होने से पहले ‘रॉयल इंडियन एयरफोर्स’ के नाम से जाना जाता था। इसने 1945 के द्वितीय विश्वयुद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 1950 में आजादी यानी पूर्ण गणतंत्र घोषित होने के बाद इसमें से ‘रॉयल’ शब्द हटाकर उसे सिर्फ इंडियन एयर फोर्स (Indian Air Force) कर दिया गया। दुनियाभर में सिर्फ अमेरिका, चीन और रूस के पास भारत से बड़ी वायुसेना मौजूद है।

 

शौर्य और अभियानों की गाथा

भारतीय वायुसेना दुनिया की चौथी सबसे बड़ी और ताकतवर वायुसेना है, जिसने इतिहास के हर मोड़ पर अपनी श्रेष्ठता साबित की है। साल 1947, 1965, 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों से लेकर 1962 के भारत-चीन युद्ध और 1999 के कारगिल युद्ध की बर्फीली चोटियों तक वायुसेना ने दुश्मनों के हौसले पस्त किए हैं।

सियाचिन की शून्य से नीचे की बर्फ में ‘ऑपरेशन मेघदूत’, मालदीव में लोकतंत्र बचाने का ‘ऑपरेशन कैक्टस’ और 2019 में सीमा पार जाकर की गई ‘बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक’ वायुसेना की अचूक क्षमता का प्रमाण हैं। 

 

आपदा में सबसे पहली उम्मीद

वायुसेना केवल विनाशकारी युद्धों के लिए ही नहीं, बल्कि संकटग्रस्त जिंदगियों को बचाने के लिए भी जानी जाती है। प्राकृतिक आपदाओं (चाहे उत्तराखंड की विनाशकारी बाढ़ हो, गुजरात का भूकंप या केरल की सुनामी) हर जगह वायुसेना के चॉपर संकटमोचन बनकर पहुंचे हैं। महामारी या विदेशों में गृहयुद्ध के दौरान फंसे भारतीयों और मित्र देशों के नागरिकों को सुरक्षित निकालने में वायुसेना के सी-17 ग्लोबमास्टर जैसे विशाल विमानों ने हमेशा मिसाल कायम की है।

 

जब वायुसेना नीले गगन में रचती है इतिहास

वायुसेना दिवस का जश्न सिर्फ एक औपचारिक परेड नहीं, बल्कि भारत की सैन्य ताकत और एयरोबेटिक कलाबाजी का अद्भुत संगम है। कार्यक्रम की शुरुआत वायुसेना प्रमुख द्वारा राष्ट्रीय ध्वज फहराने, भव्य परेड के निरीक्षण और अदम्य साहस दिखाने वाले वीर वायु सैनिकों को वीरता पदकों से अलंकृत करने के साथ होती है।

 

देश के अलग-अलग हिस्सों में आयोजित होने वाले भव्य एयर शो में जब राफेल, सुखोई Su-30MKI, स्वदेशी तेजस, जगुआर और मिराज जैसे घातक लड़ाकू विमान एक साथ उड़ान भरते हैं, तो धरती से आसमान तक गर्व की लहर दौड़ जाती है। एयरोबेटिक टीम ‘सूर्य किरण’ के लाल-सफेद विमान और ‘सारंग’ हेलीकॉप्टर दल जब हवा में जटिल और हैरतअंगेज फॉर्मेशन्स बनाते हैं, तो दर्शक दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर हो जाते हैं।

 

भारतीय वायुसेना की भविष्य की ओर उड़ान

आज भारतीय वायुसेना केवल अपनी पुरानी विरासत पर निर्भर नहीं है, बल्कि भविष्य की चुनौतियों के लिए तेज़ी से खुद को बदल रही है। ‘मेक इन इंडिया’ के तहत ‘तेजस’ (LCA), प्रचंड अटैक हेलीकॉप्टर और आधुनिक ड्रोन प्रणालियों को शामिल कर आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाए गए हैं। अब वायुसेना केवल हवाई सीमा तक सीमित नहीं है, बल्कि स्पेस (अंतरिक्ष) और साइबर सुरक्षा के नए आयामों में भी अपनी पकड़ मज़बूत कर रही है।

 

भारतीय वायुसेना का महत्व

वर्तमान युग में युद्ध की स्थिति में सबसे अधिक महत्व वायुसेना का होता है, इसलिए सेना के इस अंग का सबसे मजबूत होना अति आवश्यक है। भारतीय वायुसेना दुनिया की चौथी सबसे बड़ी वायुसेना है। दुनियाभर में सिर्फ अमेरिका, चीन और रूस के बाद भारत में बड़ी वायुसेना मौजूद है। भारतीय वायुसेना कई ऐसे लड़ाकू विमान हैं जो इसे दुनिया की चौथी सबसे बड़ी वायुसेना होने का दर्जा दिलाती है। भारतीय वायुसेना बल, वीरता और पराक्रम का प्रतीक है।

 

वायुसेना दिवस पर भारतीय वायु सैनिकों की बहादुरी, शौर्य और पराक्रम के लिए उन्हें सलाम करती है। यह दिवस हर भारतीय के दिल में देशभक्ति का जज़्बा जगाता है और उन वीर सपूतों को नमन करने का अवसर देता है जो दिन-रात हमारी नींद की हिफाज़त के लिए आसमान में पहरा देते हैं। 

Kargil War Veteran Attack: ऑपरेशन सफेद सागर’ के पूर्व सैनिक पर पार्किंग अटेंडेंट ने किया रॉड से हमला, सिर में आई गंभीर चोट, हाथ की हड्डी टूटी

Kargil War Veteran Attack: कारगिल युद्ध के एक पूर्व सैनिक ने आरोप लगाया है कि गुरुग्राम के मैग्नम ग्लोबल पार्क में एक पार्किंग अटेंडेंट ने लोहे की रॉड से उन पर हमला किया, जिससे उनके सिर में गंभीर चोटें आईं और हाथ की हड्डी टूट गई।

ग्रुप कैप्टन अमित कुमार गुप्ता (रिटायर्ड), जो 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय वायु सेना के ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ का हिस्सा थे, ने यह भी आरोप लगाया है कि हमले के बाद पार्किंग अटेंडेंट ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी। NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, गुप्ता ने पुलिस में दर्ज कराई गई शिकायत में ये आरोप लगाए हैं।

गुप्ता परिवार के साथ पहुंचे थे डिनर करने

बता दें कि गुप्ता गुरुवार रात अपने परिवार के साथ डिनर के लिए मैग्नम ग्लोबल पार्क के गोंजो रेस्टोरेंट गए थे। रात करीब 8 बजे, परिवार को उतारने के बाद, वे पार्किंग की जगह ढूंढने गए।

उनकी शिकायत के अनुसार, पार्किंग स्टाफ ने उन्हें वैलेट एरिया, बेसमेंट और मल्टी-लेवल पार्किंग के बीच घुमाया और फिर उनकी कार पार्क करने से मना कर दिया।

गुप्ता का आरोप है कि जब उन्होंने अपनी गाड़ी पीछे करने की कोशिश की, तो पार्किंग अटेंडेंट में से एक ने विंडशील्ड पर मारा, जैसे कि वह उसे तोड़ने की कोशिश कर रहा हो।

लोहे की रॉड से अटेंडेट ने मारा

गुप्ता ने NDTV को बताया कि विरोध करने के लिए वे कार से बाहर निकले, जिसके बाद अटेंडेंट ने कथित तौर पर लोहे की रॉड उठाई और उन्हें दो बार मारा—पहले उनके हाथ पर और फिर उनके सिर पर।

गुप्ता ने कहा, “मैं खून से लथपथ था।”

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि घटना के दौरान आरोपियों ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी। गुप्ता ने यह भी बताया कि मौके पर मौजूद सुरक्षाकर्मियों और पार्किंग के अन्य कर्मचारियों ने बीच-बचाव नहीं किया।

गुप्ता के मुताबिक, उन्होंने पुलिस हेल्पलाइन पर कॉल किया, लेकिन पुलिस करीब 30 मिनट तक नहीं पहुंची। उन्होंने बताया कि आखिर में रेस्टोरेंट के एक शेफ ने बीच-बचाव किया, जिससे स्थिति को और बिगड़ने से रोका जा सका।

गुप्ता को मेदांता अस्पताल में कराया गया भर्ती

सिर और कोहनी में चोट लगने के बाद गुप्ता को एम्बुलेंस से मेदांता अस्पताल ले जाया गया। उन्होंने बताया कि इसके बाद उनकी सर्जरी हुई, जिसमें कोहनी की हड्डी को जोड़ने के लिए प्लेट्स का इस्तेमाल किया गया।

गुप्ता ने NDTV को बताया, “हमला अचानक और बिना किसी उकसावे के हुआ। मैं अपना बचाव भी नहीं कर पाया।”

अस्पताल ने गलत रिपोर्ट की तैयार

गुप्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि अस्पताल ने गलत मेडिको-लीगल केस (MLC) रिपोर्ट तैयार की; उनका दावा है कि रिपोर्ट में उनके खून बहने और कोहनी की चोट का जिक्र नहीं किया गया।

गुप्ता ने आरोप लगाते हुए कहा, “मुझे पुलिस से किसी तरह का सहयोग नहीं मिल रहा है।”

अपनी शिकायत में, गुप्ता ने कथित हमलावर के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है और हत्या की कोशिश व गंभीर चोट पहुंचाने जैसे आरोपों के तहत FIR दर्ज करने को कहा है।

क्या था ऑपरेशन सफेद सागर?

बता दें कि ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय वायु सेना का ऊंचाई वाले इलाकों में चलाया गया हवाई अभियान था, जिसका मकसद कारगिल सेक्टर में भारतीय ठिकानों से पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ना था।

अगस्त में रिलीज हुई एक OTT सीरीज में भी इस ऑपरेशन को श्रद्धांजलि दी गई थी।

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देवरिया के रहने वाले पूर्व एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा बने राम मंदिर के पहले CEO, ऑपरेशन सिंदूर के समय की इनकी कहानी जानिए

Ram Mandir CEO: ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में अपनी भूमिका के लिए ‘सर्वोत्तम युद्ध सेवा मेडल’ पाने वाले रिटायर्ड एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा को श्री राम जन्मभूमि मंदिर का चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर (CEO) चुना गया है। यह फैसला तब लिया गया जब श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने बुधवार को अयोध्या में हुई एक बैठक में CEO की नियुक्ति पर विचार विमर्श किया।

इसके अलावा, ट्रस्ट ने तीन नए ट्रस्टी भी नियुक्त किए: दिल्ली के महेश भागचंदका (जो VHP के दिवंगत नेता अशोक सिंघल के रिश्तेदार हैं), अयोध्या के मदन मोहन पांडे और शिकोहाबाद की निर्मला यादव।

भारतीय वायु सेना के सम्मानित पूर्व कमांडर अप्रैल 2026 में रिटायर हुए थे और अब वे मंदिर ट्रस्ट के कामकाज के विस्तार के साथ एक अहम प्रशासनिक भूमिका संभालेंगे।

बता दें कि मिश्रा उन सीनियर मिलिट्री कमांडरों में शामिल थे जिन्हें ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान उनकी लीडरशिप के लिए सम्मानित किया गया था। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उनकी शानदार सेवाओं और महत्वपूर्ण योगदान के लिए उन्हें ‘सर्वोत्तम युद्ध सेवा मेडल’ से सम्मानित किया था।

यह मेडल युद्ध, संघर्ष या सैन्य कार्रवाई के दौरान सबसे बेहतरीन सेवा के लिए दिया जाता है और यह भारत के सबसे बड़े युद्ध-कालीन मिलिट्री सम्मानों में से एक है।

जितेंद्र मिश्रा ने ऑपरेशन सिंदूर के हवाई हमलों के बारे में बताया

हाल ही में एक पॉडकास्ट इंटरव्यू में, मिश्रा ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चलाए गए हवाई अभियान के बारे में बात की और बताया कि कैसे भारतीय सेना ने पाकिस्तान के अंदर काफी दूर मौजूद ठिकानों की पहचान की और उन पर हमला किया।

उन्होंने एक ऑपरेशन का जिक्र करते हुए बताया कि करीब 314 किलोमीटर दूर स्थित एक टारगेट को नष्ट किया गया था। मिश्रा के मुताबिक, इस कार्रवाई के दौरान सिर्फ एक छोटा सा ऑपरेशनल निर्देश दिया गया और इसके बाद टारगेट को सफलतापूर्वक तबाह कर दिया गया।

ऑपरेशन के बारे में बात करते हुए, मिश्रा ने प्लानिंग, सटीकता, टेक्नोलॉजी और सशस्त्र बलों की अलग-अलग शाखाओं के बीच तालमेल के महत्व पर जोर दिया। हालांकि, ऑपरेशन से जुड़ी कई बातें अभी भी गोपनीय रखी गई हैं।

उनकी बातों से एयर कैंपेन की प्लानिंग और उसे अंजाम देने के बारे में कुछ खास जानकारी मिली, हालांकि, उन्होंने ऐसी कोई संवेदनशील जानकारी साझा नहीं की, जिसका सार्वजनिक किया जाना सुरक्षा के लिहाज से ठीक न हो।

जितेंद्र मिश्रा का उत्तर प्रदेश से है खास कनेक्शन

मिश्रा मूल रूप से उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के भोपतपुरा के रहने वाले हैं, जो अयोध्या से सड़क मार्ग से लगभग तीन घंटे की दूरी पर है। वे एक मध्यम-वर्गीय परिवार से आते हैं और उनके पिता बतौर लेक्चरर काम करते थे।

अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर में एक अहम प्रशासनिक पद संभालने के बाद अब उनका उत्तर प्रदेश से और खास जुड़ाव हो गया है।

राम मंदिर ट्रस्ट के CEO के तौर पर जितेंद्र मिश्रा क्या करेंगे?

CEO के तौर पर, मिश्रा से उम्मीद है कि वे मंदिर ट्रस्ट के रोजमर्रा के कामकाज को संभालेंगे और इसके बढ़ते हुए ऑपरेशन्स में तालमेल बिठाएंगे।

उनकी जिम्मेदारियों में तीर्थयात्रियों के लिए सुविधाएं, वित्तीय इंतजाम, स्टाफ के बीच तालमेल, सुरक्षा से जुड़ा तालमेल और बड़े धार्मिक आयोजनों का प्रबंधन शामिल हो सकता है।

अपने मिलिट्री करियर के दौरान बड़े संगठनों को संभालने, ऑपरेशनल प्लानिंग और तालमेल बिठाने का उनका अनुभव इस भूमिका के लिए काम का साबित हो सकता है।

रिटायर्ड एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा कौन हैं?

रिटायर्ड एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा (SYSM, AVSM, VSM) भारतीय वायु सेना के पूर्व अधिकारी हैं, जिन्होंने वेस्टर्न एयर कमांड के एयर ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ के तौर पर काम किया है।

रिटायरमेंट से पहले, मिश्रा ने इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (ऑपरेशन्स) के डिप्टी चीफ के तौर पर काम किया। इससे पहले, उन्होंने इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ में डिप्टी चीफ (डॉक्ट्रिन, ऑर्गनाइज़ेशन और ट्रेनिंग) के तौर पर भी काम किया था।

मिश्रा को 6 दिसंबर, 1986 को एयर फोर्स एकेडमी से ट्रेनिंग पूरी करने के बाद भारतीय वायु सेना की फाइटर स्ट्रीम में कमीशन किया गया था।

जितेंद्र मिश्रा का 38 साल का IAF करियर

मिश्रा का मिलिट्री करियर 38 साल से ज्यादा का रहा, जिसमें उन्होंने 3,000 घंटे से ज्यादा की फ्लाइंग का अनुभव हासिल किया।

उन्होंने 18 से ज्यादा तरह के फाइटर और ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और हेलिकॉप्टर उड़ाए और फाइटर पायलट, फाइटर कॉम्बैट लीडर और एक्सपेरिमेंटल टेस्ट पायलट के तौर पर काम किया। उन्होंने कई इंस्ट्रक्शनल और स्टाफ पद भी संभाले।

स्क्वाड्रन लीडर के तौर पर, मिश्रा उस टीम का हिस्सा थे जिसने कारगिल युद्ध की शुरुआत में मिराज 2000 एयरक्राफ्ट पर लेजर-गाइडेड बमों को ऑपरेशनल किया था। इन हथियारों का इस्तेमाल बाद में ऑपरेशन सफेद सागर के दौरान टाइगर हिल और मुंथो ढालो पर हमलों में किया गया था।

कारगिल युद्ध में जितेंद्र मिश्रा की भूमिका

IAF में अपने करियर के दौरान मिश्रा ने कई अहम ऑपरेशनल जिम्मेदारियां निभाईं। उन्होंने ईस्टर्न सेक्टर में एक फाइटर स्क्वाड्रन के कमांडिंग ऑफिसर के तौर पर काम किया और बाद में विंग कमांडर के पद पर रहते हुए हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के नासिक डिवीन में चीफ टेस्ट पायलट बने।

ग्रुप कैप्टन के तौर पर, उन्होंने एयरक्राफ्ट एंड सिस्टम्स टेस्टिंग एस्टेब्लिशमेंट में चीफ टेस्ट पायलट और नई दिल्ली में एयर हेडक्वार्टर में ऑपरेशनल प्लानिंग एंड असेसमेंट ग्रुप के डायरेक्टर के तौर पर काम किया।

जून 2010 में, फ्रांस में होने वाली मल्टीनेशनल एयर एक्सरसाइज ‘गरुड़ IV’ में भारतीय वायु सेना की टुकड़ी का नेतृत्व करने के लिए मिश्रा को चुना गया।

जितेंद्र मिश्रा की सीनियर IAF पोस्टिंग

एयर कमोडोर के तौर पर, मिश्रा ने एयर फोर्स स्टेशन बरेली में 15 विंग और एयर फोर्स स्टेशन पठानकोट में 18 विंग की कमान संभाली।

बाद में उन्होंने एयर हेडक्वार्टर में एयर कमोडोर (एयर स्टाफ रिक्वायरमेंट्स) के तौर पर काम किया।

एयर वाइस मार्शल के पद पर प्रमोट होने के बाद, मिश्रा ने एयर हेडक्वार्टर में असिस्टेंट चीफ ऑफ एयर स्टाफ (प्रोजेक्ट्स) और एयरक्राफ्ट एंड सिस्टम्स टेस्टिंग एस्टेब्लिशमेंट के कमांडेंट के तौर पर काम किया।

ऑपरेशन सिंदूर में जितेंद्र मिश्रा की भूमिका

मिश्रा को ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उनकी भूमिका के लिए 2025 में स्वतंत्रता दिवस पर ‘सर्वोत्तम युद्ध सेवा मेडल’ से सम्मानित किया गया था।

उन्हें मिले अन्य सम्मानों में 2024 में मिला ‘अति विशिष्ट सेवा मेडल’ (AVSM) और 2013 में मिला ‘विशिष्ट सेवा मेडल’ (VSM) शामिल हैं।

‘सर्वोत्तम युद्ध सेवा मेडल’ ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उनकी बेहतरीन सेवा को मान्यता दी और उनके करियर में मिले सैन्य सम्मानों की लंबी सूची में एक और सम्मान जोड़ा।

जितेंद्र मिश्रा वेस्टर्न एयर कमांड के प्रमुख कब बने?

मिश्रा को एयर मार्शल के पद पर प्रमोट किया गया और उन्होंने 9 जनवरी, 2023 को इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (डॉक्ट्रिन, ऑर्गनाइज़ेशन और ट्रेनिंग) के डिप्टी चीफ के तौर पर कार्यभार संभाला।

इसके बाद, 5 दिसंबर, 2023 को वे इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (ऑपरेशन्स) के डिप्टी चीफ बने।

1 जनवरी, 2025 को मिश्रा ने वेस्टर्न एयर कमांड के एयर ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ का पद संभाला। उन्होंने एयर मार्शल पंकज मोहन सिन्हा की जगह ली, जो 31 दिसंबर, 2024 को रिटायर हुए थे।

बता दें कि 38 साल से ज्यादा के करियर के बाद, मिश्रा अप्रैल 2026 में इंडियन एयर फोर्स से रिटायर हुए।

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‘जय जवान, जय किसान’ सिर्फ टैटू नहीं, ध्रुव जुरेल की भावुक कर देने वाली कहानी है, VIDEO में देखें

श्रीलंका के खिलाफ कोलंबो में खेले जा रहे दूसरे टेस्ट के दूसरे दिन ध्रुव जुरेल ने अपने टेस्ट करियर का दूसरा शतक जड़कर महफिल लूट ली। जुरेल ने नाबाद 115 रन की पारी खेली और भारत को 503/9 घोषित के मजबूत स्कोर तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। उनके शतक की खास बात सिर्फ उनका शानदार बल्लेबाजी प्रदर्शन नहीं था, बल्कि सेंचुरी पूरी करने के बाद किया गया उनका सेलिब्रेशन भी रहा। जुरेल ने बैट उठाकर शतक का जश्न मनाया और फिर अपनी बांह पर बना ‘जय जवान, जय किसान’ (Jai Jawan Jai Kishan Tattoo) टैटू दिखाया। यह पल सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बना, क्योंकि इस टैटू के पीछे जुरेल की अपनी जड़ों और परिवार से जुड़ी बेहद खास कहानी है। 

 पिता सैनिक, दादा किसान… जुरेल ने बताया टैटू का मतलब

 

जुरेल ने दिन का खेल खत्म होने के बाद बताया कि ‘जय जवान, जय किसान’ उनके लिए सिर्फ एक स्लोगन नहीं, बल्कि उनकी पहचान और परिवार की विरासत है। उन्होंने कहा कि उनके दादा किसान थे, जबकि पिता भारतीय सेना में सैनिक रहे है। उनके पिता ने 1999 के कारगिल युद्ध में भी हिस्सा लिया था। यही वजह है कि जुरेल अपनी बांह पर इस संदेश को हमेशा अपने साथ रखना चाहते हैं। सेंचुरी के बाद उनका सलाम और टैटू दिखाने वाला सेलिब्रेशन भी उन्होंने अपने पिता और दादा को समर्पित किया। जुरेल के मुताबिक, ये वही जड़ें हैं जहां से वह आए हैं और वह इन्हें कभी नहीं भूलना चाहते। दूसरे दिन के खेल में उनका यह अंदाज शतक से भी ज्यादा भावुक कर देने वाला पल बन गया। 

पंत के साथ 112 रन की साझेदारी, लेकिन अपना गेम नहीं छोड़ा

 

जुरेल ने दूसरे दिन ऋषभ पंत के साथ मिलकर 112 रन की साझेदारी की। पंत ने अपने आक्रामक अंदाज में 63 रन बनाए, जबकि जुरेल ने दूसरी तरफ संयम और समझदारी से अपनी पारी को आगे बढ़ाया। पंत के साथ बल्लेबाजी को लेकर जुरेल ने कहा कि वह उनके अनुभव से काफी कुछ सीखते हैं और मुश्किल परिस्थितियों में उनसे सलाह भी लेते हैं। हालांकि, उन्होंने यह साफ किया कि पंत की तरह खेलने की कोशिश करना उनके गेम का हिस्सा नहीं है।

शतक, सलाम और ‘जय जवान, जय किसान’… ध्रुव जुरेल के टैटू का इमोशनल कनेक्शन, VIDEO
उनका फोकस अपनी ताकत के मुताबिक बल्लेबाजी करने, सही गेंदबाज को निशाना बनाने और सही समय पर जोखिम लेने पर रहता है। जुरेल ने यह भी बताया कि शतक पूरा करने में मोहम्मद सिराज की भूमिका अहम रही, जिन्होंने उनके साथ टिककर 29 गेंदें खेलीं और उन्हें सेंचुरी तक पहुंचने का मौका दिया। 

 

भारत में इस्तीफे जोर जबरदस्ती ही होते हैं

दुनिया के संभवतः किसी दूसरे देश में नैतिकता की उतनी बात नहीं होती होंगी, जितनी भारत में होती हैं। भारत ने दया, करुणा, सत्य, प्रेम, भाईचारे आदि के जितने प्रतीक गढ़े हैं, दुनिया के किसी और देश में उतने नहीं होंगे। भारत में तो एक सतयुग ही था, जिसमें सत्य हरिश्चंद्र थे। लेकिन यह भी सही है कि सत्य, अहिंसा, प्रेम, भाईचारे, करुणा, दया आदि से जितनी दूरी भारत में है उतनी शायद ही कहीं और होगी। इस पर लंबी बहस हो सकती है। इसलिए उसमें जाने की जरुरत नहीं है। लेकिन दुनिया के जिन देशों में सत्य और नैतिकता आदि का ढोल रोज नहीं बताया जाता है वहां लोग ज्यादा नैतिक होते हैं। वहां लोग नैतिक जिम्मेदारी लेते हैं और अगर कोई अपराध किया है तो उसे भी स्वीकार करके सजा पाते हैं। भारत में कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं लेता है और अपराध करते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया व्यक्ति भी अदालत में खड़े होकर कहता है कि वह बेकसूर है और उसका पूरा परिवार और ज्यादातर मामलों में पूरी जाति उसके बचाव में खड़ी होती है।

भारत की राजनीति में भी नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देने का कोई सिद्धांत नहीं रहा है। नैतिक जिम्मेदारी लेकर कुछ मंत्रियों आदि ने जरूर इस्तीफे दिए, जिनकी आज तक चर्चा होती है। लाल बहादुर शास्त्री, माधवराव सिंधिया या नीतीश कुमार का जिक्र किया जाता है। यह संयोग है कि इन तीनों के इस्तीफे ट्रेन दुर्घटना को लेकर हुए थे। इनके रेल मंत्री रहते ट्रेन दुर्घटनाएं हुईं और उसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने इस्तीफा दिया। यह अलग बात है कि रेल मंत्रालय में विफल होने के बाद भी इन सभी लोगों को दूसरे मंत्रालयों में अहम जिम्मेदारी मिली। लाल बहादुर शास्त्री तो बाद में प्रधानमंत्री बने। बहरहाल, भारत में गंभीर से गंभीर विफलता या आर्थिक अपराध में शामिल होने के आरोपों के बाद भी इस्तीफा कराना बड़ा मुश्किल होता है। आर्थिक अपराध के मामलों में तो अब गिरफ्तार होकर जेल जाने के बाद भी नेता इस्तीफा नहीं देते हैं। दिल्ली का मुख्यमंत्री रहते अरविंद केजरीवाल ने कमाल की मिसाल बनाई। वे कई महीने जेल में रहे और उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया। हेमंत सोरेन ने थोड़ी शर्म दिखाई और गिरफ्तारी से चंद मिनट पहले इस्तीफा दे दिया। अगर गिरफ्तारी की बाध्यता नहीं होती तो वे भी इस्तीफा नहीं देते।

सवाल है कि ऐसा क्यों होता है कि भारत में केंद्र या राज्य का मंत्री या मुख्यमंत्री किसी भी विवाद में फंसने या अपनी कैसी भी विफलता के बाद इस्तीफा नहीं देते हैं? इसे दो पहलुओं से देख सकते हैं। एक आपराधिक मामला और दूसरा विफलता व नैतिकता का मामला। जहां तक आपराधिक मामलों में फंसने पर इस्तीफे का सवाल है तो वह इसलिए आसानी से नहीं होता है क्योंकि भारत में पहले से जिनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं ऐसे, सैकड़ों लोग सांसद और विधायक चुने गए हैं। सवाल है जब गंभीर आपराधिक मामले दर्ज होने और उनकी जानकारी सार्वजनिक होने के बावजूद जनता उनको चुन देती है तो चुने जाने के बाद किए गए किसी अपराध के लिए वे क्यों इस्तीफा देंगे? जब जनता ने उनको सांसद चुन दिया है तो वे केंद्र में मंत्री बनने के योग्य हैं और जनता ने विधायक चुना है तो वे राज्य में मंत्री और मुख्यमंत्री बनने के योग्य हैं। ऐसे में उनके और जनता के बीच में नैतिकता की बात कहां से आ गई! उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि जानने के बाद भी अगर जनता ने चुना है तो वे वैसे ही किसी अन्य अपराध के मामले में भी क्यों इस्तीफा देंगे? तभी भारत में ऐसे मामलों में भी जोर जबरदस्ती ही इस्तीफा होता है। गिरफ्तार होने या गिरफ्तारी की नौबत आने या पार्टी व सरकार के प्रमुख की ओर से राजनीतिक नुकसान की आशंका देख कर दबाव डालने के बाद ही इस्तीफा होता है।

अब रही जिम्मेदारी के निर्वहन में विफलता की बात तो उसमें भी आजादी के बाद से ही यह परंपरा चलती आ रही है कि इस्तीफा जोर जबरदस्ती ही होगा। ध्यान रहे भारत में पहला हाई प्रोफाइल इस्तीफा वीके कृष्ण मेनन का हुआ था। चीन के साथ युद्ध में भारत की हार के बाद तत्कालीन रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन पर दबाव था कि वे इस्तीफा दें। लेकिन वे इस्तीफा देने को तैयार नहीं थे। जब जन दबाव बहुत बढ़ा तो अंत में उन्होंने इस्तीफा दिया। हालांकि जयराम रमेश ने उनके जीवन पर एक किताब लिखी है, ‘अ चेकर्ड ब्रिलियंसः द मेनी लाइव्स ऑफ वीके कृष्ण मेनन’, जिसमें उन्होंने दावा किया है कि कृष्ण मेनन तो बहुत पहले इस्तीफा देने को तैयार थे लेकिन उन्हें रोका गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू मानते थे कि चीन के साथ युद्ध में पराजय का मेनन से कोई संबंध नहीं है। फिर वे क्यों इस्तीफा देंगे।

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को लेकर चल रही बातें सुन कर क्या कृष्ण मेनन के इस्तीफे की कहानी से समानता नहीं दिखती है? ध्यान रहे पिछले कई दिनों से कहा जा रहा है कि धर्मेंद्र प्रधान तो बहुत पहले इस्तीफा देना चाहते थे। लेकिन प्रधानमंत्री को लगता था कि पेपर लीक होने से उनका कोई लेना देना नहीं है, बल्कि उन्होंने तो पेपर लीक होने के तुरंत बाद सक्रियता दिखाई। सारे आरोपी पकड़े गए और रिकॉर्ड समय में दोबारा परीक्षा करा ली गई ताकि छात्रों का एक साल बरबाद न हो। इसके बाद भी उनका इस्तीफा हुआ तो उसका कारण यही है कि जन दबाव बहुत बढ़ गया यानी जोर जबरदस्ती से ही उनका इस्तीफा हुआ।

सोचें, पेपर लीक कितनी बड़ी विफलता है! एक मंत्री के कार्यकाल में दो बार नीट यूजी जैसी विशाल अखिल भारतीय परीक्षा के पेपर लीक हो जाएं तो उससे बड़ी विफलता क्या हो सकती है? आश्चर्य यह है कि 2024 के शुरू में बजट सत्र में पेपर लीक का कठोर कानून बना था और मई में पेपर लीक हो गया, उसके बाद भी जून में जब नई सरकार बनी तो फिर धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्री बना दिया गया! फिर 2026 के मई में नीट यूजी की परीक्षा का पेपर लीक हो गया और धर्मेंद्र प्रधान कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं थे।

यह सिर्फ धर्मेंद्र प्रधान का मामला नहीं है। यह भारत की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था का मामला है, जहां हर व्यक्ति चाहता है कि जवाबदेही और नैतिकता का तकाजा दूसरे पर लागू हो। अपनी जवाबदेही और नैतिकता का ध्यान किसी को नहीं रहता है। जोर जबरदस्ती न हो तो न वीके कृष्ण मेनन का इस्तीफा होता और न धर्मेंद्र प्रधान का। याद करें कैसे कारगिल युद्ध के समय ताबूत घोटाला खुला था और तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीज ने कितनी मुश्किल से इस्तीफा दिया था। ऐसे ही दबाव नहीं होता और पार्टियों को चुनावी नुकसान का भय नहीं होता तो न ए राजा इस्तीफा देते और न अशोक चव्हाण की विदाई होती। महिलाओं का दबाव नहीं होता तो एमजे अकबर का भी इस्तीफा नहीं होता। सोचें, इंगलैंड में क्रिस्टीन किलर कांड में एक मंत्री लॉर्ड प्रोफ्यूमो का नाम आया था तो प्रधानमंत्री हेराल्ड मैकमिलन की पूरी सरकार को इस्तीफा देना पड़ा था। भारत में मी टू के उतने बड़े मुद्दे में एमजे अकबर फंसे तो उनका भी इस्तीफा मुश्किल से हुआ और दुनिया के सबसे बड़े सेक्स अपराधी एपस्टीन के साथ संबंधों का खुलासा होने के बाद भी हरदीप पुरी का इस्तीफा नहीं हुआ।

PM मोदी ने गिनाई भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता की ताकत, INS महेंद्रगिरि और पिनाका रॉकेट सिस्टम को बताया बड़ी उपलब्धि, Mann Ki Baat में क्या बोले

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' के 136वें एपिसोड में भारत की बढ़ती रक्षा आत्मनिर्भरता और स्वदेशी तकनीक की उपलब्धियों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि भारत अपनी सशस्त्र सेनाओं के साहस के साथ-साथ रक्षा क्षेत्र में तकनीकी क्षमता को लगातार मजबूत कर रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय नौसेना में शामिल किए गए INS महेंद्रगिरि को भारत की स्वदेशी रक्षा निर्माण क्षमता का उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि यह आधुनिक युद्धपोत भारत में डिजाइन और निर्मित किया गया है और इसमें 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है।

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पीएम मोदी ने कहा, “यह आत्मनिर्भर भारत की बढ़ती ताकत का प्रतीक है।” प्रधानमंत्री ने भारत में विकसित पिनाका लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट (LRGR-120) का भी उल्लेख किया। यह रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा विकसित एक आधुनिक और सटीक निशाना लगाने वाली आर्टिलरी रॉकेट प्रणाली है। उन्होंने कहा कि इस सफलता के पीछे देश के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की सामूहिक मेहनत है। पिनाका LRGR-120 की मारक क्षमता 60 किलोमीटर से 120 किलोमीटर तक बताई गई है।

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'खुशा मिसाइल' परीक्षण को बताया बड़ी उपलब्धि

 

प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमताओं में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में खुशा मिसाइल के सफल उड़ान परीक्षण का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रयास भारत को रक्षा क्षेत्र में और अधिक आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

 

कारगिल विजय दिवस पर जवानों को किया याद

अपने संबोधन के दौरान पीएम मोदी ने 1999 के कारगिल युद्ध में देश के लिए लड़ने वाले वीर सैनिकों को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा कि कारगिल विजय दिवस हर भारतीय के लिए गर्व का अवसर है और यह सशस्त्र बलों के अद्भुत साहस की याद दिलाता है। प्रधानमंत्री ने कहा कि देश के वीर जवानों का त्याग और पराक्रम हमेशा प्रेरणा देता रहेगा।

Kargil Vijay Diwas: ‘लक्ष्य’ से ‘शेरशाह’ तक…, हिंदी सिनेमा ने इन फिल्मों के जरिए जवानों की बहादुरी और बलिदान को किया सलाम

Kargil Vijay Diwas: भारत और पाकिस्तान के बीच 1999 का कारगिल युद्ध देश के इतिहास की एक ऐतिहासिक घटना रही है और इस पर कई भारतीय फ़िल्में और शो भी बने हैं। जहाँ आने वाली सीरीज़ ‘ऑपरेशन सफ़ेद सागर’ इस युद्ध में एयर फ़ोर्स की भूमिका को दिखाएगी, वहीं आज कारगिल विजय दिवस के मौके पर हम उन प्रोजेक्ट्स पर नज़र डालते हैं जिन्होंने कारगिल युद्ध की वीरता को स्क्रीन पर जीवंत किया।

Operation Safed Sagar

कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय वायु सेना के ऐतिहासिक अभियान पर आधारित यह आने वाली वेब सीरीज, भारतीय वायु सेना के पायलटों के ‘गोल्डन एरोज़’ स्क्वाड्रन की कहानी बताती है। इन पायलटों ने हवाई युद्ध में शानदार काम करते हुए भारत को जीत दिलाई थी। इस सीरीज़ में जिमी शेरगिल, सिद्धार्थ, अभय वर्मा, मिहिर आहूजा, अर्णव भसीन, तारुक रैना, दीया मिर्ज़ा रेखी और प्राजक्ता कोली जैसे कलाकार शामिल हैं।

Shershaah

यह फ़िल्म कारगिल युद्ध में शहीद हुए और मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित कैप्टन विक्रम बत्रा के जीवन पर आधारित है। सिद्धार्थ मल्होत्रा ​​ने इसमें भारतीय सेना के अफ़सर की भूमिका निभाई है। फ़िल्म में दिखाया गया है कि उन्होंने किस तरह पूरे दिल से ज़िंदगी जी और उनकी हिम्मत व मज़बूती की वजह से भारत ने पॉइंट 5140 और पॉइंट 4875 पर कब्ज़ा किया। यह घटना युद्ध में भारत की जीत का एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई।

LOC Kargil

जेपी दत्ता की डायरेक्ट की गई यह फ़िल्म भारतीय सेना के सफल ‘ऑपरेशन विजय’ पर आधारित है। यह ऑपरेशन मई 1999 में कारगिल सेक्टर में पाकिस्तानी घुसपैठ और रणनीतिक ऊंचाइयों पर कब्ज़े के बाद शुरू किया गया था, ताकि लाइन ऑफ़ कंट्रोल (LoC) के भारतीय हिस्से से पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ा जा सके। इस फ़िल्म में अक्षय खन्ना, सैफ अली खान, संजय दत्त, सुनील शेट्टी, अभिषेक बच्चन और अजय देवगन जैसे कई कलाकार शामिल थे।

Gunjan Saxena: The Kargil Girl

इस बायोपिक ड्रामा में जाह्नवी कपूर ने इंडियन एयर फ़ोर्स की पायलट गुंजन सक्सेना का किरदार निभाया है, जो कॉम्बैट ज़ोन में उड़ान भरने वाली पहली महिलाओं में से एक थीं। उन्होंने कारगिल से घायल सैनिकों को निकालने, ज़रूरी सामान पहुँचाने और निगरानी में अहम भूमिका निभाई। सक्सेना ने कारगिल से 900 से ज़्यादा सैनिकों (घायलों और मृतकों) को निकालने के ऑपरेशन में भी हिस्सा लिया।

Tango Charlie

इस फ़िल्म में बॉबी देओल ने तरुण चौहान का किरदार निभाया है। फ़िल्म में एक पैरा-मिलिट्री जवान के तौर पर तरुण के सफ़र को दिखाया गया है—कैसे वह बॉर्डर पर तैनात एक नए रिक्रूट से भारतीय बॉर्डर सिक्योरिटी फ़ोर्स (BSF) के एक अनुभवी और मज़बूत फ़ाइटर में बदलता है। ‘टैंगो चार्ली’ के नाम से पहचाने जाने वाले तरुण को भारत के अलग-अलग इलाकों में हिंसक विद्रोहों, दंगों और आतंकवाद-विरोधी अभियानों का सामना करना पड़ता है। बाद में, इस BSF जवान और उसकी बटालियन को कारगिल भेजा जाता है।

Lakshya

ऋतिक रोशन की यह फ़िल्म करण नाम के एक ऐसे युवा की कहानी है जिसका जीवन में कोई मकसद नहीं है। वह अचानक भारतीय सेना में शामिल तो हो जाता है, लेकिन एक सैनिक की चुनौतियों का सामना करने से घबराकर पीछे हट जाता है। हालाँकि, जब इस वजह से उसकी गर्लफ्रेंड (प्रीति ज़िंटा) के साथ अनबन हो जाती है, तो वह उसे गर्व महसूस कराने के लिए सेना में दोबारा शामिल हो जाता है और कारगिल युद्ध में अपनी बटालियन के साथ ‘पॉइंट 5179’ को सुरक्षित करने के मिशन पर लड़ता है।

Kurukshetra

2006 की फ़िल्म ‘कीर्ति चक्र’ का सीक्वल और ‘मेजर महादेवन’ फ़िल्म सीरीज़ की दूसरी फ़िल्म, 2008 में रिलीज़ हुई इस मलयालम फ़िल्म में मोहनलाल ने कर्नल महादेवन का किरदार दोबारा निभाया है और इसकी कहानी कारगिल युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित है। यह फ़िल्म भारतीय सेना के कर्नल महादेवन और पाकिस्तानी सेना के कर्नल चंगेज के बीच हुई टोलोलिंग की लड़ाई पर केंद्रित है।

Alpha Alia Bhatt Movie Review: मिसफिट आलिया भट्ट….तो स्पाई फिल्म में ग्लैमर डॉल बनकर रह गईं शरवरी वाघ, बॉबी देओल ने बचा ली थोड़ी इज्जत

फिल्म- ऐल्फा

निर्देशक- शिव रवैल

कलाकार- आलिया भट्ट, शरवरी, अनिल कपूर, बॉबी देओल

रेटिंग-2/5

Alpha Alia Bhatt Movie Review: जब यशराज ने फिल्म ऐल्फा का ऐलान किया था तो फैंस का एक्साइटमेंट और उम्मीदें काफी बढ़ी थीं। इसके बाद फिल्म की स्टार कास्ट का ऐलान हुआ तो आलिया भट्ट, शरवरी वाघ, बॉबी देओल और अनिल कपूर का नाम सुनकर हर किसी की उम्मीदें और ज्यादा बढ़ गई थीं। लेकिन फिल्म देखकर आप ठगा हुआ सा महसूस करने वाले हैं।

कहानी

शिव रावेल की डायरेक्ट की गई फिल्म ऐल्फा में आलिया का किरदार ‘सीता’ आपको फुल एक्शन में नजर आती हैं। वह अजेय है, उससे कोई गलती नहीं होती, वह मौत को कई बार टक से छूकर वापस आती हैं। वहीं हवा में उछलकर ऐसे दुश्मनों को ढेर कर देती हैं जैसे ग्रेवटी से उनका लेना देना ही न हो। उसे ‘टेस्ट सब्जेक्ट’ के तौर पर बढ़ा किया जाता है। घर-परिवार प्यार से कोसों दूर होती है।

प्यार और हमदर्दी क्या होती है उसे नहीं पता है। उसे अपने इमोशंस भी जाहिर करने में भी काफी मुश्किल होती है। इसीलिए, जब वह अपनी अलग हो चुकी जुड़वां बहन दुर्गा के साथ कुछ प्यार भरे पल बिताती है, तो खुश होती है नया एहसास करती है। लेकिन आलिया पर उनका ये किरदार उतना जच नहीं रहा है। ‘अल्फा’ की कहानी 1999 के कारगिल युद्ध पर बेस्ड है, जिसमें दोनों तरफ काफी नुकसान हुआ था। बढ़ते खतरों के बीच भारत को अजेय बनाने के पक्के इरादे के साथ, कर्नल फतेह सिंह लखावत वैज्ञानिक डॉ. वर्गीज की मदद से एक खास टास्क फोर्स बनाने के लिए एक ‘बेहतरीन और एडवांस्ड प्रोग्राम’ तैयार करते हैं। जल्द ही, कुछ युवा पुरुषों को ‘अल्फा’ नाम का सीरम दिया जाता है, जिसे सुपरह्यूमन बनाने के लिए खास तौर पर तैयार किया गया था।

यह सीरम देखने की क्षमता, रिफ्लेक्स, फेफड़ों की क्षमता और इंद्रियों की शक्ति को बढ़ाता है। इससे सुनने की क्षमता तेज हो जाती है और पानी के अंदर आठ मिनट तक सांस रोके रखने की काबिलियत मिलती है। लेकिन जल्द ही, सीरम के खतरनाक साइड इफेक्ट्स दिखने लगते हैं। इस बात से अनजान, लेफ्टिनेंट कर्नल विक्रांत कौल अपनी पत्नी जानकी को यह सीरम दे देते हैं, जब प्रेग्नेंसी के दौरान उन्हें दिल का दौरा पड़ने का खतरा होता है।

नतीजा? एक बच्ची को जन्म देने के बाद जानकी की ऑपरेशन टेबल पर ही मौत हो जाती है। उस बच्ची को फतेह सिंह चुपके से बदल देते हैं और उसे एक ‘ऐल्फा’ सोल्जर के तौर पर पालते-पोसते हैं। दुनिया से दूर, राजस्थान की एक फैसिलिटी में कैद और किसी एक्सपेरिमेंट की तरह लगातार निगरानी में पली-बढ़ी सीता एक हथियार बन जाती है। लेकिन फतेह सिंह असल में वो नहीं हैं जो होने का दावा करते हैं। और इसी उतार-चढ़ाव भरे माहौल में एंट्री होती है उसकी जुड़वां बहन दुर्गा की, जो उससे अलग हो गई थी।

डायरेक्शन

बात अगर डायरेक्टर शिव रवैल की करें, जिन्होंने ऐल्फा को निर्देशित किया है। एक तरह से कहा जा सकता है कि शिव ने स्पाई थ्रिलर को स्टाइलिश थिलर बना दिया है। फिल्म को देखकर आपको बोरियत होने लगती है। एक सीन भी आपके अंदर एक्साइटमेंट नहीं जगाता है। फिल्म के कई सीन अधूरेपन का शिकार है। वहीं कई जगह आप को एक्शन देख ऐसा लगेगा कि ये आखिर क्यों हो रहा है?

एक्टिंग

फिल्म ऐल्फा का लीड किरदार आलिया भट्ट हैं। बाकी पूरी कास्ट को यशराज ने सपोर्टिंग रोल में रखा है। फिल्म की कहानी आलिया के ईर्द-गिर्द ही घूमती हैं। फिल्म देख आपको बस एक ही सवाल खाए जाता है कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी, जो आलिया ने इस फिल्म को हां कहा। जिगरा के बाद आलिया के करियर में एक और बुरी फिल्म एड हो गई है ‘ऐल्फा’। आलिया भट्ट जैसी दमदार एक्ट्रेस की फिल्म से हर किसी को काफी उम्मीदें रहती हैं। उन्होंने हाईवे, गंगूबाई बाई जैसी शानदार फिल्में दी हैं।

अब बात करते हैं शरवरी वाघ की। यशराज ने शरवरी को फिल्मी दुनिया में लॉन्च किया है। यशराज के अलावा वे और भी फिल्मों में शानदार काम के साथ नजर आई हैं। हाल में रिलीज हुई उनकी मैं वापस आउंगा हो या फिर महाराज दोनों ही फिल्मों में एक्ट्रेस का इतना शानदार है कि उनसे भी काफी उम्मीदें रहती हैं। लेकिन अफसोस निर्देशक एक्ट्रेस के टैलेंट का यूज न कर सके। फिल्म ऐल्फा में शरवरी को बहुत कम स्क्रीन टाइम दिया गया है। वहीं उनका रोल फिल्म के लिए जरूरी भी नहीं लगता है। अगर वह फिल्म में न होती तो भी कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था।

फिल्म की इज्जत थोड़ी बहुत बॉबी देओल ने अपनी दमदार एक्टिंग से बचा ली है। लेकिन बेतुक कमजोर कहानी ने उनका काम भी खराब किया है। वहीं अनिल कपूर भी अपने रोल के हिसाब से फिट हैं। फिल्म में ऋतिक के कबीर वाले कौमियो ने फिल्म को थोड़ी बहुत हाईप दिलाई है।

फिल्म को देखें या नहीं

फिल्म को न देखना कहना जायज नहीं होता है। एक फिल्म बनाने में कई लोगों की मेहनत होती है। लेकिन कुछ फिल्में ऐसी होती हैं, जिन्हें किसी भी हाल में टॉलरेट करना मुश्किल होता है। ऐल्फा के साथ भी कुछ ऐसा ही है। अगर आप लीड कास्ट के जबरा फैन हैं…यानी उनकी शक्ल देख चेन मिल जाता है, तो आप इसे देख सकते हैं। बाकि फिल्म में देखने लायक कुछ भी नहीं।