‘टिपिंग प्वाइंट’ से बच पाएगा भारत?

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने हाल में सार्वजनिक रूप से कहा कि उनका अदालती प्रक्रिया से विश्वास उठ गया है। ..सिब्बल ने उल्लेख किया कि अदालत को मतदाताओं के नाम कथित रूप से गलत तरीके से हटाने और जोड़ने के बारे में बार-बार सूचित किया गया, फिर भी उसने कोई राहत नहीं दी, जबकि बाद के ट्रिब्यूनल डेटा से पता चला कि बहुत से नामों को हटाना गलत था।

कई ओर से खिंचाव और दबाव की शिकार हो रही भारत की संवैधानिक व्यवस्था का अंतिम खंभा भी इस परिघटना के दायरे में आ गया है। 12 अक्टूबर इस मायने में एक असाधारण दिन था, जब विपक्षी दलों के आह्वान पर हजारों लोगों के हुजूम ने सर्वोच्च न्यायालय पर जाकर मोर्चा लगाया। इसके साथ ही इस आम मान्यता पर विराम लग गया कि राजनीतिक दलों के लिए,

  • विरोध दर्ज कराने या अपना पक्ष रखने का उचित मंच संसद और विधानसभाएं हैं
  • अपना विरोध जताने के लिए जन अभियान, जन सभाएं, प्रेस कॉन्फ्रेंस, अधिकारियों के घेराव आदि जैसे वैध माध्यम उन्हें उपलब्ध हैं।
  • राजनीतिक दल या संगठन अगर अदालत तक जुलूस निकालते हैं, तो इससे संदेश जाता है कि वे न्यायिक प्रक्रिया को सड़क के दबाव से प्रभावित करना चाहते हैं। न्यायपालिका को ऐसे विवादों से ऊपर समझा जाता रहा है।
  • इसीलिए अदालत तक जुलूस निकालना अब तक नाजुक और विवादास्पद मामला माना जाता था।
  • खुद सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा है कि न्यायालय पर दबाव डालने वाले विरोध प्रदर्शन स्वीकार्य नहीं हैं।

लेकिन 12 अक्टूबर को ऐसा ही विरोध प्रदर्शन आयोजित हुआ। लोगों के हुजूम के साथ सुप्रीम कोर्ट पहुंच कर विपक्ष के 11 नेताओं ने निर्वाचन आयोग के खिलाफ अपनी याचिका दायर कराई। याचिका दायर कराना एक वैधानिक प्रक्रिया है। लेकिन जिस रूप में उस रोज यह कराया गया, निर्विवाद रूप से उसे एक राजनीतिक वक्तव्य और सियासी कदम अधिक समझा जाएगा। कहा जा सकता है कि यह तरीका अपना कर विपक्ष ने खुद न्यायपालिका को ही कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की है।

विचारणीय यह है कि आखिर ये नौबत क्यों आई? संवैधानिक मर्यादा के तहत राजनीतिक एवं तमाम विवादों से ऊपर मानी जाने वाली न्यायपालिका को लेकर ऐसी धारणा क्यों बनी कि उससे “इंसाफ पाने के लिए” यह जरूरी है कि राजनीतिक तरीके से उस पर दबाव डाला जाए? इस सवाल पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। इसलिए कि इस घटना ने यह साफ कर दिया है कि न्यायपालिका को अब राजनीतिक विवादों से ऊपर नहीं समझा जा रहा है। यानी यह मान्यता कमजोर पड़ी कि अदालतें अपने फैसले विशुद्ध कानूनी आधार पर और संवैधानिक दायरों के अंदर रहते हुए देती हैं। अगर यह धारणा टूटती है, तो उसका मतलब यह भी होगा कि न्यायपालिका के निर्णयों का आदर के साथ स्वेच्छा से अनुपालन करने का चलन कमजोर हो जाएगा।

यह स्थिति क्यों आई? इस बात को समझने के लिए हाल के वर्षों में बनी पृष्ठभूमि पर गौर करना चाहिए। कुछ वरिष्ठ अधिवक्ताओं की टिप्पणियों से इस पृष्ठभूमि को बेहतर समझा जा सकता हैः

  • वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने हाल में सार्वजनिक रूप से कहा कि उनका अदालती प्रक्रिया से विश्वास उठ गया है। उन्होंने कहा कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए कोर्ट के पास जाने का उन्हें कोई खास औचित्य नजर नहीं आता।
  • सिब्बल ने कहा- मैं सुप्रीम कोर्ट बार-बार जाकर थक चुका हूं। मुझे नहीं लगता कि वहां जाने का कोई फायदा है। मुझे भारत के सुप्रीम कोर्ट से ज्यादा उम्मीद नहीं बची है।
  • सिब्बल ने उल्लेख किया कि अदालत को मतदाताओं के नाम कथित रूप से गलत तरीके से हटाने और जोड़ने के बारे में बार-बार सूचित किया गया, फिर भी उसने कोई राहत नहीं दी, जबकि बाद के ट्रिब्यूनल डेटा से पता चला कि बहुत से नामों को हटाना गलत था। उन्होंने कहा कि हालांकि अभी भी संविधान को बचाने वाली एकमात्र संस्था सुप्रीम कोर्ट ही है, लेकिन कुछ मामलों में व्यक्तिगत रूप से उन्हें अब उससे बहुत उम्मीद नजर नहीं आती।

कपिल सिब्बल के अलावा कई अन्य वकीलों ने भी हाल में न्यायपालिका की सार्वजनिक रूप से कड़ी आलोचना की हैं। इनमें उनका आशय रहा है कि सुप्रीम कोर्ट लोगों के मौलिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा करने में विफल या अप्रभावी साबित हो रहा है। मसलन,

  • मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर अक्टूबर के पहले हफ्ते में शुरू हुए कॉकरोच आंदोलन के क्रम दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों और प्रदर्शनकारियों/ वकीलों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई के बीच वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने चेतावनी दी कि अगर सुप्रीम कोर्ट शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और वकीलों के खिलाफ हिंसा को रोकने के लिए हस्तक्षेप नहीं करता, तो “यह ना केवल अपनी प्रासंगिकता खो देगा, बल्कि देश और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपहास का पात्र भी बन जाएगा।”
  • इसके पहले भूषण ने न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा में सुप्रीम कोर्ट के नाकाम रहने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि लगभग आधे जज सरकार की कठपुतलियों की तरह काम कर रहे हैं। उन जजों के महत्त्वपूर्ण मामलों में सरकार के खिलाफ फैसला सुनाने की संभावना बहुत कम होती है।
  • वरिष्ठ अधिवक्ता और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष दुष्यंत दवे अदालत पर मौलिक अधिकारों की रक्षा करने में विफल रहने, इंसाफ देने से बचने, और नागरिकों को निराश करने का आरोप लगा चुके हैं। उन्होंने ऐसे सवालों से सुप्रीम कोर्ट को कठघरे में खड़ा किया है कि क्या वह नागरिक अधिकारों के संरक्षक के रूप में अपने संवैधानिक कर्त्तव्य को निभा रहा है?
  • मिहिर देसाई और गोपाल नारायण जैसे वरिष्ठ वकील भी इससे मिलती-जुलती बातें कह चुके हैं।
  • ये विचार आम तौर पर चुनावी मुद्दों, विरोध प्रदर्शनों, नागरिक स्वतंत्रता के मामलों, कड़े कानूनों के तहत जमानत ना मिलने, और वर्तमान सरकार के प्रति अत्यधिक नरमी के संदर्भ में जताए गए हैं।

भारत की संवैधानिक व्यवस्था के भविष्य के लिए ये बातें बेहद अहम हैं। इसलिए कि भारत में सरकार (कार्यपालिका) और विधायिका को लेकर आम जन में पहले ही भरोसा काफी घट चुका है। इसकी वजह आम जन से किए गए वादों को पूरा ना किया जाना है। सरकारें लोगों को बेहतर जीवन स्तर देने में विफल रही हैं और विधायिकाएं उनकी प्रभावशाली ढंग से जवाबदेही तय करने की अपनी भूमिका नहीं निभा पा रही हैं। इस कारण लोगों का सब्र टूट रहा है।

इसके बीच न्यायपालिका एकमात्र संस्था है, जिससे लोगों को इंसाफ पाने तथा सरकार के अतिरेक कदमों को रोकने की आशा बची थी। लेकिन गुजरे वर्षों में जनमत का एक बड़ा हिस्सा यह देखकर निराश होता चला गया है कि खास कर जिन मामलों में नरेंद्र मोदी सरकार के राजनीतिक हित जुड़े थे, उनमें न्यायपालिका संवैधानिक अपेक्षाओं के अनुरूप अवरोध एवं संतुलन की अपनी भूमिका निभाने में नाकाम रही। इस भावना की अभिव्यक्ति ही हालिया प्रतिक्रियाओं और विपक्ष की राजनीतिक गतिविधियों के जरिए हुई है।

यह संवैधानिक व्यवस्था के लिए बढ़ती चुनौतियों के एक नए मुकाम पर पहुंच जाने का संकेत है। राजनीतिक अर्थशास्त्री राहुल मुखर्जी ने भारत में आर्थिक सुधारों को समझाने के लिए एक मॉडल विकसित किया था, जिसे ‘टिपिंग-प्वाइंट मॉडल’ (Tipping-Point Model) कहा जाता है। यह मॉडल भारत की संवैधानिक व्यवस्था के प्रति हो रही प्रतिक्रियाओं को समझने के लिहाज से भी सहायक हो सकता है। इसके मुताबिक किसी व्यवस्था के भीतर चुनौतियां इकट्ठी हो रही हों, तब भी वह व्यवस्था वर्षों तक दबाव को सहन कर सकती है। लेकिन जब ये चुनौतियां एक निश्चित सीमा को पार जाती हैं, तो एक छोटा-सा झटका भी बहुत बड़े बदलाव की राह खोल सकता है।

राजनीतिक अर्थव्यवस्था के संदर्भ में मुखर्जी ने इस बात तो दो उदाहरणों से समझाने का प्रयास किया था। इसके मुताबिक किसी पुल पर वाहनों का बोझ बढ़ता चला जाए, तब भी पुल टिका रहता है। लेकिन एक हद के बात कोई आखिरी मोटर साइकिल आती है, तो पुल अपने ऊपर जमा हुए बोझ को सह पाने में नाकाम हो जाता है। वही क्षण टिपिंग प्वाइंट कहा जाता है। लेकिन टिपिंग प्वाइंट पुल ढहने का असल कारण नहीं होता। इसी तरह कोई भूकंप लंबे समय से धरती के नीचे टेक्टोनिक परतों की स्थिति में जारी अस्थिरता का परिणाम होता है। मगर किसी एक रोज कोई आखिरी परत खिसकती है, जिससे भूकंप आ जाता है।

भारतीय राजनीति भी शायद ऐसे ही किसी मोड़ की ओर बढ़ रही है। शिक्षा से जुड़े विरोध प्रदर्शनों ने दिखाया कि लगातार जारी लामबंदी (प्रदर्शन) सरकारों को झुकने पर मजबूर कर सकती है। निर्वाचन आयोग से जुड़े विवाद ने अब इस दबाव को चुनावी राजनीति तक पहुंचा दिया है।

तो इस समय हमारे सामने यह महत्त्वपूर्ण सवाल उपस्थित है कि क्या देश किसी बड़ी उथल-पुथल की ओर बढ़ रहा है?

अथवा, फिलहाल देश में बिखरा हुआ गुस्सा किसी टिकाऊ राजनीतिक संगठन का रूप ले सकता है?

पहली सूरत भयावह है। इसलिए कि सिर्फ उथल-पुथल से कभी कुछ नहीं बनता। उलटे बहुसंख्यक जनता को इसकी पीड़ा से गुजरना पड़ता है, जबकि उससे हासिल कुछ नहीं होता। लेकिन, जैसे पुल के ढहने या भूकंप के आने का पूर्वानुमान संभव नहीं है, वैसे ही अगर स्थितियां बन रही हों, तो सामाजिक या राजनीतिक उथल-पुथल से बचना अक्सर मुमकिन नहीं रह जाता है।

असल बात है ऐसी स्थितियों का बनना। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि नतीजों की बिना चिंता किए भारत में राजनीतिक ताकतों ने ऐसी स्थिति बनने दी है। वे यह समझने में नाकाम रहीं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था एक सेफ्टी वॉल्व की तरह काम करती है, जिसमें लोगों का गुस्सा विस्फोट की स्थिति आने के पहले ही संस्थागत माध्यमों के जरिए निकल जाता है। अपनी बात कहने और प्रतिरोध जताने की इजाजत, विधि-सम्मत न्याय व्यवस्था और अंततः चुनाव के जरिए जवाबदेही तय करने का सिस्टम- इसी तरह के सेफ्टी वॉल्व समझे जाते हैं। भले इनसे असल में कुछ ना बदलता हो- लोगों की जिंदगी बेहतर ना होती हो, लेकिन इस सिस्टम के जरिए ऐसा होने का भ्रम बना रहता है, जिससे व्यवस्था सुरक्षित रहती है। यह साफ है, आज भारत की संवैधानिक व्यवस्था के बारे में ऐसा भरोसा रखना कठिन हो गया है।

वैसे, एक और सूरत होती है, जिससे टिपिंग प्वाइंट किसी नए निर्माण का बिंदु बन सकती है। ऐसा तब होता है, अगर ऐसी नई ताकतें उभरें, जो पुरानी व्यवस्था को चुनौती भर देने से आगे बढ़ें और अगली व्यवस्था का निर्माण करें। क्या भारत में इसकी संभावना है? फिलहाल, ये उम्मीद नहीं दिखती। इसलिए कि नई ताकतों का उदय नए विमर्श के साथ होता है। फिलहाल, राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे किसी विमर्श का संकेत तक मौजूद नहीं है।

फिलहाल सूरत यह है कि एक तरफ सत्ता पक्ष है, जो अपने समर्थन आधार और चुनाव प्रबंधन की क्षमता के बूते अपनी सत्ता कायम रखने को लेकर आश्वस्त है। इसलिए उसे दूसरी तरफ उबल रहे “गुस्से” की कोई परवाह नहीं है। उसे वह पराजित एवं विफल ताकतों की निष्प्रभावी प्रतिक्रिया मानता है। उसे यकीन है कि राज्य के दमनकारी तंत्र के जरिए विरोधी ताकतों को वह नियंत्रित रखा जा सकता है।

दूसरी तरफ विपक्ष एवं वे समूह हैं, जो सही या गलत, लेकिन धीरे-धीरे यह मानने लगे हैं कि सत्ता पक्ष इसलिए सत्ता में नहीं है कि उसके साथ लोगों की बहुसंख्या है। बल्कि वह सत्ता में इसलिए बना हुआ है, क्योंकि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के धरातल को अनुचित तरीकों से अपनी तरफ झुका कर वह जनादेश गढ़ रहा है। इस स्थिति में निर्वाचित सरकार की वैधता (legitimacy) का सवाल खड़ा होता है, जिसे असल में इस समय उठाया जा रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे दावा कर चुके हैं कि 2024 से हुए सभी चुनावों में धांधली हुई और इस कारण उनसे चुनी गई सरकारें अवैध हैं। विपक्षी दलों और सिविल सोसायटी मे ऐसे बहुत से लोग हैं, जो खड़गे की राय से सहमत नजर आते हैं।

इन हालात ने भारत के राजनीतिक क्षितिज पर एक गतिरोध निर्मित कर दिया है। अगर न्यायपालिका से न्याय पाने की संभावना सभी पक्षों में बनी रहती, तो इस गतिरोध का समाधान संभव था। दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब खुद न्यायपालिका की भूमिका पर सवाल गहरा गए हैं। इसी से उपजे विवाद की झलक 12 अक्टूबर को देखने को मिली। उस रोज जो हुआ, वह कई वर्षों से बनती स्थिति का परिणाम था। इस नई सूरत का क्या नतीजा होगा, उस बारे में सोचना भयभीत करता है, हालांकि उसका सही अनुमान लगाना फिलहाल संभव नहीं है।

ज्ञानेश कुमार सरकारी गवाह बनें : राहुल

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष तथा लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा है कि देश में ‘वोट चोरी’ करवाई जा रही है इसलिए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देकर सरकारी गवाह बन जाना चाहिए।

श्री गांधी ने शनिवार को अपने पॉडकास्ट में परीक्षाओं में देरी, नियुक्तियां अटकने और बुनियादी सुविधाओं की कमी का जिक्र करते हुए ऐसे मुद्दों पर जवाबदेही तय करने की जरूरत बतायी। उन्होंने पिछले एक महीने में इंदौर, नासिक, बालाघाट और दिल्ली में छात्रों की गूंज कार्यक्रम के दौरान के अनुभव साझा करते हुए कहा कि छात्रों के सवाल ऐसी व्यवस्था को चुनौती देते हैं।

उन्होंने कहा कि आरएसएस-भाजपा से जुड़े लोगों ने देश के संस्थानों पर कब्जा कर लिया है और आदिवासी और पिछड़े वर्ग के छात्रों को जो सुविधाएं मिलती हैं उनमें कटौती की जा रही है इसलिए इन मामलों में सरकार की ओर से जवाबदेही तय होनी चाहिए।

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श्री गांधी ने इस पॉडकास्ट में महाराष्ट्र के नासिक में आंदोलनरत आदिवासी विद्यार्थियों, महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग की परीक्षा में कथित अनियमितताओं के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों और मध्य प्रदेश के बालाघाट में कुपोषण तथा बीमारियों से बच्चों को खोने वाले आदिवासी परिवारों के साथ अपनी मुलाकात का भी जिक्र किया। उन्होंने बालाघाट में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण पूरी तरह लागू करने का आग्रह किया और कहा कि उन्होंने मुख्यमंत्री मोहन यादव को इस संदर्भ में पत्र लिखा है।

उन्होंने कहा कि दिल्ली के बेला एस्टेट की झुग्गी बस्ती में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद 729 निवासियों में से 728 के नाम मतदाता सूची से हट गये। इसे मतदान के अधिकार के उल्लंघन का गंभीर मामला बताते हुए उन्होंने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देकर सरकारी गवाह बनना चाहिए।

वोट चोरी को संविधान पर हमला बताते हुए श्री गांधी ने 30 सितंबर को यहां इंडिया गठबंधन के नेताओं के साथ हुई बैठक का उल्लेख किया और कहा कि उसमें प्रत्येक भारतीय के मतदान के अधिकार की रक्षा पर विचार-विमर्श किया गया है।

उन्होंने परीक्षा में देरी, नियुक्तियां अटकने और बुनियादी सुविधाओं की कमी जैसे मुद्दों के साथ ही दिल्ली के सत्य निकेतन की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि शिक्षा बजट में कटौती की वजह से ऐसा हो रहा है और इन सब मामलों में जवाबदेही तय होनी चाहिए।

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पाकिस्तान के बलूचिस्तान में भूकंप के तेज झटके

पाकिस्तान के बलूचिस्तान क्षेत्र में शनिवार को भूकंप के तेज झटके महसूस किये गये। भारत के राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र (एनसीएस) के अनुसार भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल पर 5.8 आंकी गयी। भूकंप का केंद्र जमीन से 15 किलोमीटर की गहराई में था।

एजेंसी ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट में बताया कि भूकंप के झटके भारतीय समयानुसार आज पूर्वाह्न 10 बजकर 37 मिनट पर आए। इसका अक्षांश 27.944 डिग्री उत्तर और देशांतर 66.532 डिग्री पूर्व था। भूकंप के बाद तत्काल किसी के हताहत होने या नुकसान की कोई सूचना नहीं मिली है।

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उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान में भूकंप आने का खतरा अधिक रहता है, क्योंकि यह भारतीय और यूरेशियाई टेक्टोनिक प्लेटों की सीमा के पास स्थित है। इन दोनों प्लेटों के टकराव से भूकंपीय गतिविधियां उत्पन्न होती हैं।

दक्षिण-पश्चिमी पाकिस्तान का विशाल प्रांत बलूचिस्तान भूकंप के खतरे वाले क्षेत्रों में शामिल है। इसके अलावा खैबर पख्तूनख्वा और गिलगित-बाल्टिस्तान भी संवेदनशील क्षेत्र हैं, जहां सक्रिय भ्रंश रेखाओं और जटिल पर्वतीय प्रणालियों के कारण भूकंप का खतरा बना रहता है। पंजाब और सिंध के कुछ हिस्सों में भी भूकंपीय गतिविधियों की आशंका रहती है।

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पाकिस्तान के बलूचिस्तान में 5.7 तीव्रता का भूकंप आया:सिंध में भी झटके महसूस हुए; इतनी ही तीव्रता का भूकंप फरवरी में भी आया था

पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में शनिवार को 5.7 तीव्रता का भूकंप आया। अमेरिकी भूगर्भीय सर्वेक्षण (USGS) के मुताबिक, भूकंप का केंद्र खुझदार शहर से 48 किलोमीटर दूर था। इसी साल फरवरी में यहां इतनी ही तीव्रता का भूकंप आया था। भूकंप के झटके सिंध में भी महसूस किए गए हैं। स्थानीय प्रशासन और आपदा प्रबंधन टीमें खुझदार और आसपास के ग्रामीण इलाकों में नुकसान का आकलन कर रही हैं। जिले में राहत-बचाव दल, अस्पताल और पुलिस को अलर्ट पर रखा गया है। फिलहाल, भूकंप से जान-माल के नुकसान की कोई जानकारी सामने नहीं आई हैं। फरवरी में भी भूकंप आया था इससे पहले फरवरी में बलूचिस्तान में 5.6 तीव्रता का भूकंप आया था। यह सुबह 6 बजकर 30 मिनट पर आया था और इसका केंद्र जमीन से 13 किलोमीटर की गहराई में था। उस समय भूकंप का केंद्र खुझदार शहर से 86 किलोमीटर दूर था। भूकंप के झटके बलूचिस्तान के झल मगसी, जाफराबाद और नसीराबाद में महसूस किए गए थे। पड़ोसी सिंध प्रांत के सुक्कुर, कंबर, शहदादकोट और दादू जिलों में भी झटके महसूस हुए थे। बलूचिस्तान में पहले भी खतरनाक भूकंप आ चुके हैं बलूचिस्तान के क्वेटा में 1935 में 7.7 तीव्रता का विनाशकारी भूकंप आया था। इसमें करीब 35 हजार लोगों की मौत हुई थी। वहीं, 1945 में मकरान तट के पास 8.1 तीव्रता का शक्तिशाली भूकंप आया था, जिससे समुद्र में सुनामी भी उठी थी। 2005 के भूकंप में 74 हजार से ज्यादा मौतें हुई थीं पाकिस्तान में अब तक के सबसे विनाशकारी भूकंपों में से एक 8 अक्टूबर 2005 को आया था। इस भूकंप में 74 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। विशेषज्ञों के मुताबिक, पाकिस्तान तीन प्रमुख टेक्टोनिक प्लेटों – अरबियन, यूरेशियन और भारतीय प्लेट- के संपर्क वाले क्षेत्र में स्थित है। इन प्लेटों की हलचल के कारण देश में अक्सर भूकंप के झटके महसूस होते हैं। ——————– ये खबर भी पढ़ें… बांग्लादेश में छात्रों ने मंदिर के सामने गोमांस पकाया: आज यूनिवर्सिटी में गाय काटने की तैयारी बांग्लादेश की जगन्नाथ यूनिवर्सिटी में 12 अक्टूबर को मंदिर के पास गोमांस पकाने को लेकर विवाद हो गया। इसके दो दिन बाद यूनिवर्सिटी प्रशासन ने कैंपस में पशु काटने से बचने का नोटिस जारी किया। पूरी खबर यहां पढ़ें…

रूस के कामचटका में 7 तीव्रता का भूकंप:सुनामी का खतरा नहीं; पिछले साल यहां आए भूकंप में गांव समुद्र में बह गया था

रूस के कामचटका प्रायद्वीप में शुक्रवार को 7 तीव्रता का भूकंप आया। यूरोपियन-मेडिटेरेनियन सीस्मोलॉजिकल सेंटर (EMSC) ने इसकी जानकारी दी। भूकंप स्थानीय समय के मुताबिक दोपहर 3:35 बजे दर्ज किया गया। भूकंप 152 किमी की गहराई में आया। अमेरिकी सुनामी चेतावनी केंद्र ने कहा कि झटकों के बाद सुनामी का खतरा नहीं है। कामचटका प्रायद्वीप प्रशांत महासागर के ज्यादातर हिस्से को घेरने वाले टेक्टोनिक बेल्ट ‘रिंग ऑफ फायर’ पर स्थित है। यह इलाका भूकंपीय गतिविधियों के लिए संवेदनशील माना जाता है। पिछले साल जुलाई में क्षेत्र के तट के पास 8.8 तीव्रता का शक्तिशाली भूकंप आया था। इसके बाद आई सुनामी तटीय गांव के एक हिस्से को समुद्र में बहा ले गई थी। खबर लगातार अपडेट हो रही है…

रूस के कामचटका में 7 तीव्रता का भूकंप:2025 में यहां साल का सबसे तेज भूकंप आया, इससे उठी सुनामी में गांव बहा

रूस के कामचटका प्रायद्वीप में शुक्रवार को 7 तीव्रता का भूकंप आया। यूरोपियन-मेडिटेरेनियन सीस्मोलॉजिकल सेंटर (EMSC) के मुताबिक यह दोपहर 3:30 बजे आया। भूकंप 152 किमी की गहराई में आया। फिलहाल वहां सुनामी का खतरा नहीं है। पिछले साल 30 जुलाई को रूस के कामचटका प्रायद्वीप के तट के पास 8.8 तीव्रता का शक्तिशाली भूकंप आया था। यह 2025 का सबसे शक्तिशाली भूकंप था। इसके बाद आई सुनामी ने तटीय इलाकों में तबाही मचाई और एक गांव का कुछ हिस्सा समुद्र में बह गया। जापान में 9.9 तीव्रता का गलत अलर्ट, 12 मिनट में वापस लिया जापान की मौसम एजेंसी ने शुक्रवार को गलती से 9.9 तीव्रता के भूकंप का अलर्ट जारी कर दिया। यह चेतावनी रूस के कामचटका प्रायद्वीप में 7.0 तीव्रता का भूकंप आने के बाद जारी हुई थी। हालांकि, एजेंसी ने करीब 12 मिनट बाद इसे वापस ले लिया। जापान टाइम्स के मुताबिक, अलर्ट स्थानीय समय के अनुसार दोपहर करीब 12:36 बजे जारी हुआ था। इसमें होक्काइडो से तोकाई इलाके तक तेज झटके आने की चेतावनी दी गई थी। NHK के मुताबिक, जापान मौसम एजेंसी ने दोपहर 12:48 बजे चेतावनी रद्द कर दी। एजेंसी ने कहा कि भूकंप की तीव्रता का अनुमान जरूरत से ज्यादा लगाया गया था। 2025 में यहां 1200 से ज्यादा भूकंप आए थे यूनाइटेड स्टेट्स जियोलॉजिकल सर्वे (USGS) के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में कामचटका में 1200 से ज्यादा भूकंप दर्ज किए गए थे। इनमें से अधिकांश छोटे-मोटे (मैग्निट्यूड 2.0 से 4.0 के बीच) थे, लेकिन 4.0 या इससे ऊपर के 150 से ज्यादा भूकंप हुए। इस क्षेत्र में पिछले साल 3 बड़े भूकंप 7.0 या उससे अधिक तीव्रता के दर्ज किए गए थे। साल 2025 का सबसे विनाशकारी भूकंप जुलाई को रूस के कामचटका में पर आया, जिसकी तीव्रता रिक्टर स्केल पर 8.8 मापी गई। यह पिछले 10 वर्षों का सबसे बड़ा झटका था। इसने कई देशों को प्रभावित किया। यह भूकंप समुद्री क्षेत्र में आए जिसके कारण ज्यादा तबाही नहीं हुई। कामचटका में बार-बार भूकंप क्यों आते है? कामचटका प्रशांत महासागर के उस इलाके में है, जिसे ‘रिंग ऑफ फायर’ कहा जाता है। यह प्रशांत महासागर के चारों ओर फैला ऐसा क्षेत्र है, जहां दुनिया के सबसे ज्यादा भूकंप आते हैं और ज्वालामुखी फटते हैं। कामचटका में बार-बार भूकंप आने की मुख्य वजह जमीन के नीचे मौजूद विशाल प्लेटों की हलचल है। यहां प्रशांत प्लेट धीरे-धीरे ओखोत्स्क प्लेट के नीचे खिसक रही है। इस प्रक्रिया को सबडक्शन कहते हैं। दोनों प्लेटों के बीच घर्षण से चट्टानों में दबाव जमा होता रहता है। जब यह दबाव अचानक बाहर निकलता है, तो भूकंप आता है। प्लेटों की इसी हलचल से जमीन के नीचे गर्म पिघला हुआ पदार्थ बनता है, जिसे मैग्मा कहते हैं। यह बाहर निकलता है तो ज्वालामुखी फटता है। यहां कई सक्रिय ज्वालामुखी मौजूद हैं। समुद्र के नीचे तेज भूकंप आने पर सुनामी का खतरा भी रहता है। इस इलाके में जमीन के नीचे प्लेटों की हलचल लगातार जारी रहती है। इसलिए यहां भविष्य में भी भूकंप आने की आशंका बनी रहेगी। ——————– यह खबर भी पढ़ें… पनामा में 7.6 तीव्रता का भूकंप, 400 इमारतों को नुकसान:18 घंटे में 100 और झटके आए, 9 देशों में सुनामी की चेतावनी जारी पनामा में शुक्रवार दोपहर आए 7.6 तीव्रता के भूकंप से भारी नुकसान हुआ। अब तक 27 लोगों के घायल होने की खबर है। भूकंप का केंद्र राजधानी पनामा सिटी से करीब 200 किलोमीटर दूर अजुएरो प्रायद्वीप के पास था। पूरी खबर पढ़ें…

Zoho में इस साल सैलरी हाइक नहीं करने का ऐलान कर इसके फाउंडर श्रीधर वेम्बू ने मांगी माफी, खस्ता हालत की वजह भी बताई

नौकरी करने वाले लोगों के लिए सालाना सैलरी हाइक का इंतजार काफी अहम होता है। बढ़ती महंगाई के बीच वेतन में होने वाली बढ़ोतरी से घर का बजट संभालने में मदद मिलती है। लेकिन सॉफ्टवेयर कंपनी Zoho के कर्मचारियों को इस साल निराशा का सामना करना पड़ सकता है। कंपनी के संस्थापक श्रीधर वेम्बू ने बताया है कि इस साल कर्मचारियों की सैलरी में सामान्य सालाना बढ़ोतरी नहीं की जाएगी। इसके पीछे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़े बढ़ते खर्च, सर्वर की महंगी कीमतें और वैश्विक कारोबारी अनिश्चितता जैसे कारण हैं। हालांकि, उन्होंने कर्मचारियों को यह भरोसा भी दिया है कि कंपनी बड़े पैमाने पर छंटनी से बचने की पूरी कोशिश करेगी।

Zoho कर्मचारियों को इस साल नहीं मिलेगा सालाना इंक्रीमेंट

श्रीधर वेम्बू ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट के जरिए कंपनी की मौजूदा स्थिति साझा की। उन्होंने बताया कि सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री का भविष्य फिलहाल अनिश्चित बना हुआ है और AI के बढ़ते इस्तेमाल से कंपनियों का खर्च काफी बढ़ गया है। इसी दबाव के चलते Zoho ने इस साल कर्मचारियों की सामान्य वेतन वृद्धि रोकने का फैसला किया है। वेम्बू ने स्वीकार किया कि यह फैसला लेना आसान नहीं था। उन्होंने कर्मचारियों से माफी भी मांगी कि वह इस साल सैलरी हाइक को जारी नहीं रख सके।

AI के कारण चार गुना बढ़ी सर्वर की कीमतें

कंपनी के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक डेटा सेंटर के लिए जरूरी सर्वर की बढ़ती लागत है। वेम्बू के मुताबिक, सर्वर की कीमतें चार गुना तक बढ़ गई हैं। इसके अलावा, AI टूल्स का इस्तेमाल तेजी से बढ़ने के कारण कंपनी के परिचालन खर्च में भी इजाफा हुआ है। इन बढ़ते खर्चों को नियंत्रित करने के लिए Zoho ने अपने मार्केटिंग बजट में कटौती की है। वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों ने भी कारोबारी माहौल को चुनौतीपूर्ण बना दिया है।

बड़े पैमाने पर छंटनी से बचने की कोशिश

सैलरी हाइक रोकने के फैसले के बीच कर्मचारियों के लिए राहत की बात यह है कि कंपनी फिलहाल बड़े पैमाने पर छंटनी से बचना चाहती है। वेम्बू ने कहा कि कंपनी कर्मचारियों की बड़े स्तर पर नौकरी जाने की स्थिति से बचने के लिए पूरी मेहनत करेगी।

हालांकि, उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि सॉफ्टवेयर क्षेत्र में नौकरियों का भविष्य चुनौतीपूर्ण दिखाई दे रहा है। उनके मुताबिक, Zoho ने पिछले 18 महीनों से अपने कर्मचारियों की संख्या में बढ़ोतरी नहीं की है। इससे कंपनी में भर्ती की रफ्तार धीमी रहने का संकेत मिलता है।

अगले 3 से 5 साल Zoho के लिए अहम

वेम्बू ने बताया कि कंपनी इस समय खुद को नए कारोबारी माहौल के अनुरूप ढालने की प्रक्रिया में है। अगले तीन से पांच साल यह तय करने में महत्वपूर्ण होंगे कि कंपनी का बदलाव कितना सफल रहता है।

उन्होंने कर्मचारियों के सहयोग के लिए आभार भी जताया। उनके मुताबिक, ज्यादातर कर्मचारी कंपनी की स्थिति को समझ रहे हैं। यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब तकनीकी कंपनियां AI में निवेश बढ़ाने के साथ अपने खर्चों पर नियंत्रण रखने की चुनौती का सामना कर रही हैं।

भूकंप के मलबे में फोटोशूट करवाने वाली ये मॉडल इंटरनेट पर हो गईं वायरल, कौन हैं ग्रेसी बोन?

भूकंप के मलबे में फोटोशूट करवाने वाली ये मॉडल इंटरनेट पर हो गईं वायरल, कौन हैं ग्रेसी बोन?

सोशल मीडिया पर कभी-कभी कुछ तस्वीरें ऐसी सामने आती हैं, जो लोगों का ध्यान खींचने के साथ विवाद भी खड़ा कर देती हैं। इन दिनों मॉडल ग्रेसी बोन (Gracie Bon) अपनी कुछ तस्वीरों को लेकर चर्चा में हैं। भूकंप से प्रभावित इलाके में मलबे के बीच उनकी तस्वीरें वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई। कुछ लोगों ने उनके फोटोशूट के तरीके पर सवाल उठाए, तो ग्रेसी ने वीडियो जारी कर अपनी सफाई दी। आखिर कौन हैं ग्रेसी बोन और उनकी तस्वीरों को लेकर इतना विवाद क्यों हो रहा है? आइए जानते हैं।

मलबे के बीच तस्वीरें शेयर कर चर्चा में आईं ग्रेसी बोन

पिछले हफ्ते आए 7.7 तीव्रता के भूकंप ने भारी तबाही मचाई थी। इस प्राकृतिक आपदा के बाद कई जगहों पर इमारतों और घरों को नुकसान पहुंचा। इसी बीच ग्रेसी बोन ने रविवार को भूकंप प्रभावित इलाके की कुछ तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर कीं। इनमें वह मलबे के बीच पोज देती नजर आईं।

तस्वीरों के साथ उन्होंने अपने देश के हालात पर दुख जताया। ग्रेसी ने लिखा कि भौतिक चीजों को दोबारा हासिल किया जा सकता है, लेकिन जिंदगी अनमोल है। उन्होंने लोगों से वर्तमान के लिए आभारी रहने और जरूरतमंदों की मदद करने की अपील भी की।

आखिर कौन हैं ग्रेसी बोन?

ग्रेसी बोन एक मॉडल और सोशल मीडिया पर्सनैलिटी हैं, जो अपनी तस्वीरों और सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए लोगों का ध्यान खींचती हैं। इस बार उनकी चर्चा किसी फैशन शूट के कारण नहीं, बल्कि भूकंप से प्रभावित इलाके में खिंचवाई गई तस्वीरों की वजह से हो रही है।

उनकी पोस्ट सामने आने के बाद कई यूजर्स ने सवाल उठाया कि प्राकृतिक आपदा से प्रभावित जगह पर इस तरह पोज देकर तस्वीरें शेयर करना कितना सही है। कुछ लोगों को उनका यह अंदाज असंवेदनशील लगा, क्योंकि भूकंप से प्रभावित परिवार उस समय मुश्किलों का सामना कर रहे थे।

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वायरल तस्वीरों पर ग्रेसी बोन ने क्या कहा?

आलोचनाओं के बीच ग्रेसी ने एक वीडियो साझा कर अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि वह प्रभावित इलाके में केवल तस्वीरें खिंचवाने नहीं गई थीं, बल्कि परिवारों को जरूरी सामान देने और उनकी जिंदगी दोबारा पटरी पर लाने में मदद करना चाहती थीं।

ग्रेसी के मुताबिक, तस्वीरें साझा करने का उद्देश्य लोगों का ध्यान प्रभावित परिवारों की ओर खींचना और अपने फॉलोअर्स को मदद के लिए प्रेरित करना था। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका मकसद आपदा की गंभीरता को नजरअंदाज करना नहीं था।

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

ग्रेसी बोन की तस्वीरों को लेकर इंटरनेट पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ यूजर्स ने उनके फोटोशूट के तरीके की आलोचना की, जबकि उनकी सफाई के मुताबिक, वह प्रभावित लोगों की मदद के लिए जागरूकता फैलाना चाहती थीं।

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खैबर पख्तूनख्वा में पाकिस्तानी चुनाव आयोग के अधिकारी की गोली मारकर हत्या, अज्ञात हमलावरों की तलाश जारी

पाकिस्तान में एक सनसनीखेज घटना में शनिवार को चुनाव आयोग के वरिष्ठ अधिकारी की गोली मारकर हत्या कर दी गई। पुलिस ने बताया कि अज्ञात बंदूकधारियों ने खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में शक के आधार पर हत्या को अंजाम दिया। मृत अधिकारी पाकिस्तान चुनाव आयोग (ECP) के डायरेक्टर जनरल शमशाद अख्तर बताए जा रहे हैं। उनकी हत्या टैंक जिले के गिरह बलूच के पास की गई, जो दक्षिण वजीरिस्तान की सीमा से लगा है।

शुरुआती जांच में स्थानीय पुलिस ने बताया कि ईसीपी के डायरेक्टर जनरल शमशाद अख्तर को अज्ञात हमलावरों ने गोली मार दी, जिसमें उनकी मौत हो गई। पुलिस की जानकारी के मुताबिक हमलावरों ने शक के आधार पर डायरेक्टर जनरल को मौत के घाट उतार दिया। गोलीबारी के बाद हमलावर मौके से भाग गए, जबकि रेस्क्यू 1122 के कर्मचारियों ने शव को डिस्ट्रिक्ट हेडक्वार्टर हॉस्पिटल पहुंचाया।

परिवार के सदस्यों ने बताया कि अख्तर अपने भाई की मौत के बाद टैंक आए थे, जिनकी शुक्रवार को मौत हो गई थी। पुलिस और सुरक्षा बलों ने हमलावरों को पकड़ने के लिए इलाके में सर्च ऑपरेशन शुरू किया है। ECP ने एक बयान में अख्तर की मौत पर गहरा दुख जताया, जिसमें चीफ इलेक्शन कमिश्नर, कमीशन के सदस्य, उसके सेक्रेटरी और सभी स्टाफ ने दुखी परिवार के प्रति संवेदना जताई।

आयोग ने कहा कि वह इस मुश्किल समय में परिवार के साथ है और मृतक की माफी और उसके परिवार के लिए सब्र और ताकत की प्रार्थना करता है। ECP और उसके कर्मचारियों ने सरकार से यह भी आग्रह किया कि वह सभी सरकारी कर्मचारियों को आतंकवाद के कामों से सुरक्षा दे।

पनामा में 7.7 तीव्रता के भूकंप से मची तबाही, धरती कांपते ही घरों और दफ्तरों से बाहर भागे लोग

भूकंप में जान दांव पर लगाकर शराब की बातलें बचाईं:पनामा में 7.6 तीव्रता का भूकंप, अब तक 100 से ज्यादा बार धरती कांपी

पनामा में भूकंप के दौरान एक शख्स जान की परवाह किए बिना शराब की बोतलें बचाता नजर आया। भूकंप के झटकों से दुकान का सामान हिलने लगा, लेकिन वह बोतलों को संभालने में जुटा रहा। इस दौरान कुछ बोतलें गिर कर टूट गईं। पनामा में स्थानीय समय के मुताबिक शुक्रवार दोपहर करीब 1 बजे 7.6 तीव्रता का भूकंप आया था। इसका केंद्र राजधानी पनामा सिटी से करीब 200 किलोमीटर दूर अजुएरो प्रायद्वीप में था। भूकंप में अब तक 27 लोगों के घायल होने की खबर हैं, जिन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया है। पिछले 18 घंटे में यहां 100 से आफ्टरशॉक (झटके) आ चुके हैं। पनामा में आए भूकंप से जुड़ी 3 तस्वीरें चर्च का घंटाघर गिरा, सड़कों पर आईं दरारें पनामा की नागरिक सुरक्षा एजेंसी के मुताबिक, वेरागुआस, हेरेरा और लॉस सैंटोस समेत कई प्रांतों में नुकसान हुआ। पेनोनोमे शहर में एक चर्च का घंटाघर गिर गया और कई इमारतें क्षतिग्रस्त हुईं। वेरागुआस में सड़कों पर दरारें आने की खबरें भी सामने आईं। नागरिक सुरक्षा सेवा के अधिकारी के मुताबिक, कई लोग घायल हुए हैं। इनमें एक व्यक्ति पेनोनोमे में मलबे की चपेट में आने से घायल हुआ। सुनामी का अलर्ट भी जारी हुआ था भूकंप के बाद मध्य और दक्षिण अमेरिका के कई तटीय इलाकों के लिए सुनामी का अलर्ट जारी किया गया। पनामा, कोस्टा रिका, अल सल्वाडोर, पेरू, मैक्सिको, ग्वाटेमाला, निकारागुआ, कोलंबिया और इक्वाडोर के तटीय क्षेत्रों में संभावित खतरे की चेतावनी दी गई। एसोसिएटेड प्रेस (AP) के मुताबिक, बाद में पनामा, कोलंबिया, इक्वाडोर, निकारागुआ और ग्वाटेमाला के तटों के लिए सुनामी की चेतावनी हटा ली गई। अल सल्वाडोर और चिली के ईस्टर आइलैंड के लिए जारी अलर्ट भी हटा दिए गए। पनामा यूनिवर्सिटी के नेस्टर लुके ने बताया कि इस्ला कानास और लॉस सैंटोस के दक्षिणी तट के पास 1 से 3 मीटर ऊंची लहरें उठने की आशंका थी। इस्ला कानास में समुद्र का पानी कुछ घरों तक पहुंचने की खबर भी सामने आई। दो मेट्रो लाइनों के साथ एयरपोर्ट कुछ घंटे बंद रहा भूकंप के बाद जांच के लिए राजधानी की दो मेट्रो लाइनें बंद कर दी गईं। स्कूलों में भी छुट्टी कर दी गई। टोकुमेन इंटरनेशनल एयरपोर्ट को कुछ घंटों के लिए बंद रखा गया। शुक्रवार दोपहर बाद एयरपोर्ट पर उड़ानें फिर शुरू हो गईं। पनामा नहर में जहाजों की आवाजाही पर भूकंप का असर नहीं पड़ा। नहर का काम सामान्य रूप से चलता रहा। हालांकि, भूकंप से कहीं नुकसान तो नहीं हुआ, इसकी जांच के लिए टीमें तैनात की गईं। भूकंप के कारण छह प्रांतों में भी बिजली की सप्लाई रुक गई थी। ——————– यह खबर भी पढ़ें… अमेरिका में फ्लोरिडा के तट से टकराया इसायस तूफान: 170 किमी की रफ्तार से हवाएं चल रहीं अमेरिका के मेक्सिको की खाड़ी से लगे तटीय इलाकों में शुक्रवार को इसायस तूफान टकराया। फ्लोरिडा और अलबामा में 170 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चल रही हैं। पूरी खबर पढ़ें…